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आभासी यथार्थ और यथार्थ के मध्य साहित्यिक पत्रकारिता

सुनीता अवस्थी
अपने अपने युग के समय से सोच, विमर्श (discourse), अध्ययन, बहस,पक्ष,प्रतिपक्ष आदि से छनकर यथार्थ हमारे सामने प्रकट होता था। और उसकी विश्वसनीयता रहती थी। लेकिन आज जब सैनिक और जरनल अपने अपने घर से सूचना क्रांति करके बैठ चुके, तो यह जानना दिलचस्प होगा कि आज विमर्श, पक्ष, विपक्ष और संश्लेषण के क्षेत्र में क्या कुछ हमने पाया? हम कितने समृद्ध हुए। तो इसका जवाब यह है कि तकनीक ने जहाँ हमारा काम आसान किया, वहीं हमे यथार्थ से दूर खडा भी किया। हम यह जानने में चूक रहे हैं कि आभासी यथार्थ और यथार्थ में कितना भारी अंतर है। पत्रकारों की तो एक पूरी पीढी ही इससे विनष्ट हुई है, जो यही सीखकर आई कि गू्गल ,सोशल साइट्स ही सब कुछ है। और वह तथ्यों से, किताबों से और यथार्थ को जानने से उतने ही दूर हो गए, जैसे आभासी से यथार्थ । नतीजा अधिंकाश आज निशुल्क काम कर रहे और असंतुष्ट हैं। इसके लिए भाषा से लेकर व्यख्यानों तक की आवयश्यकता है। यह समय इस पर कार्य करने का है।
साहित्यिक पत्रकारिता - आभासी और वास्तविक
पहले यह समझ लें कि कविता, कहानी, समीक्षा के अलावा भी और बहुत कुछ होता है, जो साहित्यक पत्रकारिता की दिशा और दृष्टि तय करता है। वह है अपने परिवेश,समाज को अतीत से लेकर वर्तमान तक प्रभावित करने वाले वादों,पंथों, घटनाक्रम की लयबद्ध, तर्कनापूर्ण विवेचना। साथ ही उसकी अनेक दृष्टियों से पडताल के साथ उसके होने वाले दूरगामी परिणामों पर बेहतरीन लेख, आलोचना और चर्चा-परिचर्चा करके उसे पाठको के सम्मुख रखना। प्रबुद्ध से लेकर आम व्यक्ति तक अपनी सोच और बौद्धिकता का विकास करना चाहता है। वह समाचारपत्रों तक ही सीमित नही रहता। न ही उनसे (समाचारपत्रों से) आप किसी बौद्धिक विचारमंथन, विमर्श की उम्मीद रखें। तो वह गंभीर विमर्श और अपने संदेहों, विचारों की स्पष्टता के लिए साहित्यिक, वैचारिक पत्रिकाओं की मदद लेता है। लेकिन यही आभासी संसार उसे इन सबसे दूर ले जाता है। वहाँ इंस्टेंट का युग है और हैं नए-नए गुरु। कहाँ जाए ऐसे 1द्गह्म्ह्लह्वड्डद्य गुरु जिन्हें कुछ कहना अंधकार में काली बिल्ली पकडने के बराबर है। वह ऑनलाइन पीढी को गाइड करते हैं विभिन्न प्रश्नों, मुद्दों पर। पर प्रश्न अधिकांश गम्भीर नही, बल्कि सतही होते हैं। और हाल यह है कि संपादक की मर्जी से vertual वर्ल्ड में रोज नए चेहरे प्रकट और लुप्त होते हैं। शाम तक कुछ सौ लाइक्स आ जाते हैं, तो वह व्यक्ति हिंदी साहित्य, वैचारिकी की तो बात ही मत कीजिए, के विकास का बोझ अपने कंधों पर लिए चार फीट ऊपर उठ जाता है। कोई संपादन, चयन, सुधार नहीं, बस सीधे रिलीज। नतीजतन एक पूरी पीढी जिसमें से कुछ अच्छे गंभीर लेखक बन सकते थे, वह उसी भीड में खो जाते हैं। यह और विडम्बना है कि हर बहस के विषय सुबह तय होते हैं और ज्यादातर भावों और क्रोध में बहसे की जाती हैं। जबकि वास्तविक जगत के मुद्दे और उन पर विमर्श, उभय पक्षों के मध्य चर्चा और उसके सारभूत विवरण को समझना हर चिंतनशील प्राणी चाहता है। यही साहित्यिक पत्रकारिता की महत्ता और आवश्यकता है। जिस पर अफसोस, अधिकांश खरे नहीं उतरते। दरअसल हम जब तक अपनी सीमाएँ और क्षमताएँ दोनों को एक साथ नही जानेंगे, तब तक हम अपने समय से पीठ दिखाए बैठे रहेंगे।
साहित्यक पत्रकारिता के आधारभूत तत्व -
अपने समय के यथार्थ और उसके मिथ को समझने और विश्लेषण करने का दायित्व हर बुद्धिजीवी का होता है। उस पर पक्षरहित या इसके विलोम अपनी राय तथ्यों के साथ पाठकों के सम्मुख रखने का का गुरुतर दायित्व होता है। उसके लिए हमे यह जानना आवश्यक है कि कविता, कहानी आदि के ही पाठक नहीं हैं, बल्कि आलोचनात्मक लेखों ,विचारों की विशेष जगह है। वास्तव में इनके माध्यम से ही शिक्षित, अपने समय के यथार्थ को जानने और समझने वाला कहीं ज्यादा बडा वर्ग है। वह वर्ग जो यह समझना चाहता है कि उसके आसपास हो रहे बदलाव की वजह क्या है? उस बदलाव में उसकी कोई भूमिका है भी? भूमिका न भी हो, तो भी उसके नाम से किए जा रहे बदलाव के पीछे क्या कारण हैं? क्या उन कारणों से वह एक नागरिक, समाज के रूप में अपने मूलभूत अधिकारों को बरकरार रख पाएगा? और सबसे बढकर क्या वह चुपचाप इस बदलाव को सहन ही करेगा या अपना कोई योगदान देगा?
इस तरह के कई प्रश्नों को साहित्यिक वैचारिकी के धरातल पर समझाने का महत्ती कार्य करती है साहित्यिक पत्रकारिता। और स्वाभाविक है जब आप खुद समझेंगे, तो ही लिख पाएँगे। भले ही आप पत्रकार के स्तर पर माधवराव सप्रे, राजेन्द्र माथुर,रामनाथ गोयनका, प्रभाष जोशी, एन.राम, चित्रा सुब्रमण्यम न हो। साहित्य में महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, बद्रीविशाल पित्ती, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, रामविलास शर्मा,नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, प्रभाकर श्रोत्रिय, कन्हैयालाल नंदन,रविंदर कालिया आदि के कार्यों और पत्रिकाओं से आज की साहित्यिक पत्रकारिता की पीढी परिचित कम हो या न हो (हालांकि यह अक्षम्य है)। परन्तु आपमें नैतिक मूल्य,कर्तव्य और निर्भीकता जैसे मूलभूत गुण होना ही काफी है। जो आपको प्रतिबद्ध सम्पादक, पत्रकार और सबसे बढकर जनजागरण की दिशा में ले जाएँगे। यह विश्वास जरूर है की 21वीं सदी की पीढी, ओम थानवी, (जनसत्ता, मुअनजोदडो, अपने-अपने अज्ञेय), हेतु भारद्वाज, संपादक, कथाकार, कैलाशचन्द्र पंत (अक्षरा),अरुण तिवारी, लेखक, सम्पादक, प्रेरणा, भोपाल,विष्णु नागर, रमेश उपाध्याय, लीलाधर मंडलोई, आलोक चतुर्वेदी, मृणाल पाण्डेय, कुसुम खेमानी, लेखिका संपादिका, निर्मला भुराडिया, रचना समुंदर, नीलिमा टिक्कू,जयश्री शर्मा,उमा (लेखिका पत्रकार),आदि से तो परिचित होगी। यहाँ परिचित होने से मतलब है कि हमने उनके कार्यो को देखा और लिखे हुए को पढा है।
विडम्बना यह है कि यह बातें आज लुप्त प्रायः हैं। और इनकी आवश्यकता और उपयोग जाने बिना ही अधिकांश अपना काम चला रहे हैं। सुधीश पचौरी, वाक में कहते हैं, आप मुक्तिबोध का लाख जाप कर लें, लेकिन यदि आप मे मुक्तिबोध जैसी तीक्ष्ण विकलता नहीं है, और वह धैर्य,मेहनत और तैयारी नहीं है, तो बेकार है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हम कितने अपने प्रति और पर्यावरण (यहाँ भौगोलिकता अर्थ नही)के सवालों और उनके जवाबों की तलाश के लिए तैयार हैं? तैयारी नहीं है, पर की जा सकती है। इसके लिए अपनी कमियों को जानना और उसे दूर करने के लिए सही जगह पर सही व्यक्ति, किताबों के साथ होना आवश्यक है। और उसके लिए चाहिए वक्त, और उससे पहले प्राथमिकता। तो यह आधारभूत तत्त्वों की कमी और वर्चुअल यथार्थ के खतरों के साथ चलती हमारी आज की साहित्यिक पत्रकारिता।
खुरदरा यथार्थ और चमकता आभासी संसार
यथार्थ का धरातल समझने के लिए अध्ययन,फील्ड वर्क,विमर्श और बौद्धिकता के साथ शब्दों का चयन आदि की आवश्यकता होती है। उसके लिए लगन के साथ यह समझना और सीखना पडता है। मैं यह मानकर चलती हूँ कि सभी न सही पर कुछ सीखने वाले हैं। परन्तु कहाँ और कैसे? जी हाँ, यह गौर करें, तो बहुत बडा सवाल है। साहित्यिक पत्रकारिता और समाजोन्मुखी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम न के बराबर हैं। वस्तुतः जिसे फील्ड वर्क, यथा क्राइम बीट, राजनीति,पेज 3, खेल आदि नहीं मिलता उसे साहित्यक पत्रकारिता या सामाजिकता का कार्य पकडा दिया जाता है। जबकि सबसे महत्त्वपूर्ण और सीधे समाज और व्यक्ति की सोच को भ्रम मुक्त और जागरूक बनाती है इस तरह की पत्रकारिता। हमारे पूर्व के समय मे यह सब साहित्यिक संपादक, लेखक अपने अनुभवः, अध्ययन,चिंतनशीलता और वरिष्ठों से सीखते थे। उनमे समर्पण के साथ एक तरीके का सद्भाव था अपने से बडे के प्रति। जबकि आभासी जगत का इन सबसे कोई लेना देना नही। वह चमकीला पर्दा बना रहा है बिना नियम, प्रोटोकाल की दुनिया जिसमे यह नहीं होता कि आप कितना अध्ययनशील या सीखे हो। बल्कि होता यह है सामने वाला अज्ञानी हो। इसी पर चलते हुए यह वर्चअल सच्चाई आज इस कगार पर है कि लोग इस पर विश्वास करना बंद कर चुके हैं। जबकि धरातल पर सीखने और सिखाने वाले रहे बराबर से। चाहे वह महावीर प्रसाद द्विवेदी हो माखनलाल चतुर्वेदी, श्रीकांत वर्मा, प्रभाष जोशी और राजेंद्र माथुर, धर्मवीर भारती और कन्हैयालाल नन्दन, रविंदर कालिया, बनवारी, ओम थानवी और आदि हो। परन्तु आज के समय मे यह होना असंभव-सा है। जब हर चीज लाभ और भविष्य से जोडकर देखी जाती है। बाजार नियंत्रित कर रहा है हमारे विचारों को। वही बताता है कि हमें क्या और क्यों स्टैंड लेना है। यहाँ नैतिकता और मूल्यों की बात करना ही बेमानी है।
जेमेसन कहते हैं कि यह वक्त नकारात्मक और सकारात्मक का भेद मिटा रहा है। क्योकि वास्तव में कोई भी गलत नहीं है। अपने-अपने टेन्जेन्ट पर सब सही हैं, चाहे थोडे कम या ज्यादा।
यह वह बारीक रेखा है (thin line) जो हमे समझानी और उससे पहले समझना है कि भाषा वह तत्त्व है जो आभासी से वास्तविक धरातल तक अनिवार्य कडी है। सोशल साइट्स की भाषा में शॉर्टकट काम करते है। lv, I'll, u , Tc, आदि, लेकिन यथार्थ की साहित्यिक पत्रकारिता की भाषा अभी भी उन उपकरणों और सावधानियों के मध्य संस्थित हैं, जो हमे कुछ बचे होने का संकेत करते हैं।
कुछ बानगी देखें, गाँधीजी के साथ ही विदा हो गए उनके आदर्श, रामराज्य की कल्पना। गाँधीवाद को धीरे-धीरे एक काल्पनिक और अव्यवहारिक सैद्धान्तिक दर्शन मात्र माना जाने लगा। (अरविंद जैन, आजकल 19)।
कैलाश चन्द्र पंत, प्रधान सम्पादक, अक्षरा में कहते हैं, संसद द्वारा पारित करने से पहले नागरिकता संशोधन कानून पर बहस हुई और वह पारित हुआ। उसे कुछ ने सर्वोच्च न्यायलय में चेलेंज किया और उस पर सुनवाई होगी। उससे पहले ही हिंसा, आगजनी करना यह क्या है? कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद जो कानूनविद भी हैं, कह चुके है कि कानून तो लागू करना होगा।
यह एक यथार्थपरक सम्पादकीय दायित्व है। अब हंस के संपादक संजय सहाय की टिप्पणी देखें, उत्तर पूर्व में जिन बंगलादेशियो के खिलाफ आक्रोश है उनमें हिन्दू, मुस्लिम दोनों ही हैं। पूर्व सरकारों ने इन्हें शरण दी जो आज स्थानीय लोगों की तुलना में खासे प्रभावशाली और समृद्ध हो चुके हैं। यह कहकर आगे सहायजी डटकर मौजूदा सरकार को कोसते हैं, जो इस घुसपैठ को बंद करके उन्हें वापस भेज रही है, जो 2014 के बाद के हैं। अर्थात 2014 तक के सभी हिन्दू और मुस्लिम वहाँ हैं, वह भारतीय नागरिक हैं। यह उद्धरण देने का अर्थ यह बताना है कि किस तरह साहित्यिक पत्रकारिता अपनी जिम्दारियों का निर्वहन करती है। जबकि आभासी जगत में तो बाकायदा आँधी आई हुई है कि नागरिकता कानून जन विरोधी है। एक समुदाय विशेष के खिलाफ है। अब सही और गलत का निर्णय कैसे होगा? दरअसल तथ्य आधारित और दस्तावेजी जानकारियों से आभासी संसार दूर है। यह कहना अनुचित होगा। लेकिन वह उन तक नही पहुँचता है, न पहुँचना चाहता है। क्योकि वहाँ वह जानता है कि उसके आभासी पाठक भी उतने ही भिज्ञ हैं, जितना वह खुद। और इसे यही, आभासी जगत के लोग, वास्तविक धरातल की पत्रकारिता के लिए खतरा बताते हैं। जो माध्यम 200 से भी अधिक वर्षों से भारत मे साहित्यिक और सामाजिक पत्रकारिता का है। छपे हुए शब्दों पर लोग आज भी भरोसा करते हैं। उसे आभासी संसार से कभी कोई कैसा भी कतरा नही हो सकता। बल्कि मेरा मानना है आभासी जगत की ऐसी मिथ्या बातों से लोग छपे हुए अक्षरों की तरफ, किताबो, पत्र- पत्रिकाओं की तरफ और अधिक लौटेंगे। लेकिन हमें कुछ बदलाव करने होंगे।
वस्तुतः आज के समय को देखते हुए हमारे बरसो पुराने चल रहे पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को आमूल चूल बदलना होगा। हिंदी ही नही, क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य, किताबो को स्थान देना होगा। साथ ही कुछ प्रश्नपत्र साहित्यिक पत्रकारिता, भाषा, नैतिकतावादी दर्शन और समय, संस्कृति और समाज, विश्व पत्रकारिता और आभासी पत्रकारिता के होने चाहिए। साथ ही विभिन्न साहित्यिक और सामाजिक व्यक्तियों से हर माह एक खुली बातचीत (श्ाश्चद्गठ्ठ द्गठ्ठस्रद्गस्र) का भी हर माह आयोजन होना चाहिए। यह सब बातें अभी आभासी जगत के लिए आकाश कुसुम जैसी हैं। लेकिन यतार्थ के धरातल की साहित्यिक और सामाजिक पत्रकारिता के लिए क्रियान्वयन करने और उसे फलीभूत होकर देखने की हैं। राजस्थान का हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, इस दिशा में अपने साहित्यिक और सम्पादक,वरिष्ठ पत्रकार कुलपति ओम थानवी के नेतृत्व में पहल कर रहा है। विश्वास है ऐसा ही हमारे अन्य संस्थान भी करेंगे।
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संफ - ऐसो.प्रोफेसर, हिंदी,
राजकीय सनातन धर्म महाविद्यालय,
ब्यावर, अजमेर, राजस्थान।
फोन 9928708899