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संरचनात्मक साकल्यवाद बनाम निर्वैयक्तिकतावाद

कृष्ण बिहारी पाठक
अतीत का कौनसा दुःख, वर्तमान का कौनसा अवसाद, और भविष्य की कौनसी दुराशा, अतीत की कौनसी सुखद स्मृति, वर्तमान का कौनसा श्रेयस कर्म और भविष्य की कौनसी आशा हृदय नीड में भाव-अभाव, संवेदना या रस बनकर इस मानस-सरोवर के तटों की मर्यादा को तोड कलम से स्याही की बूँद बन कोरे पृष्ठों को रंगबिरंगा करने को आतुर होती है, कौन जान सकता है? मनीषियों का कहना है कि कवित्व दैव का सबसे बडा दण्ड है, साहित्य का निर्माण जीवित मृत्यु का आह्वान है। मैं जान नहीं पाता क्यों? कैसे ?
कवित्व दण्ड है? किस अपराध का? कवि चर-अचर की अनुभूति संचित करता है। अनुभूति सबकी और अभिव्यक्ति का अधिकारी अकेला एक क्या यह अपराध नहीं ? कवि कहता है कि वह सबकी पीडा की अनुभूति करता है, और यदि सुख भी है, तो अभिव्यक्ति तो एक को अनेक करने का माध्यम है। फिर अभिव्यक्ति भी एकान्तिक नहीं है। कोई तो है, जो उसके कानों में झरनों का मधुर संगीत भर देता है। पक्षियों का कलरव, भ्रमरों का मधुगीत भर देता है। कोई तो है जो विप्लव का आवाहन भर देता है। कोई तो है जो निर्बल का आर्तनाद कानों में भर देता है । कोई तो है जो कानों में भक्ति का अल्हड राग सुनाता है। कोई तो है.. जो प्राणिनी का प्राण, मानिनी का मान और अनुरागिनी का प्रणय गान बन कर्णपुटों में शहद-सी मधु, सुरा-सी मादक और गंगाजल-सी प्रांजल मिठास घोल देता है। कोई तो है जो मातृभूमि की सम्मोहक रूप माधुरी में आकंठ मग्न किए जाता है। तो फिर क्या अनुचित है कि परंपरा से परिवेष्ठित एवं भाव-संवेदना से सिंचित और किसी रहस्यमयी प्रेरणा से आगत भाव संपदा लेखनी की वाणी से मुखरित होना चाहती है।
कैसे कोई बूँद-बूँद भाव संचय करता है, कैसे कोई रीते हाथों में लेखनी थमा देता है, कैसे कोई अपनी लेखनी को संस्कार दे जाता है और जब साहित्य का यह चित्र बनकर तैयार होता है तो चितेरा विस्मय विमुग्ध होकर देखता है कि यह तो कुछ और ही बन गया, यह वो चित्र नहीं जिसे बनाने के लिए मैंने कूँची उठायी थी! अग्निज्वालमाल घिरे बालक-सा वह आर्तनाद करता है, परंतु जगती को उसके क्रंदन में गान सुनाई देता है। बहुत हुआ, तो उससे पूछा जाता है कि यह क्रंदन क्यों? जगत को प्रश्न करना भी नहीं आता। प्रश्न करना चाहिए था कि तेरी वाणी में किस-किस के क्रंदन का आर्तनाद है? तेरे साहित्य में कितना जीवन है और जीवन में कितना साहित्य?...
युग पलटते गये, परंतु ये प्रश्न नहीं पलटा, वरन और ज्यादा धारदार और नुकीला होता रहा है कि साहित्य कितना जीवनमुखी है और जीवन कितना साहित्यमुखी? साहित्य की बनावट और बुनावट जीवन से कितनी अभिन्न है और कितनी अभिन्न होनी चाहिए? साहित्य की पूर्णता किसमें है- जीवन से तटस्थ रहने में या जीवन में आकंठ मग्न होने में? उत्तर है दोनों में। साहित्य की पूर्णता इन दोनों मार्गों में निहित है। पहला मत कहता है कि साहित्य उतना ही श्रेष्ठ होगा, जितना वह जीवन से तटस्थ होगा (जीवनविहीन नहीं) और दूसरा मत कहता है कि साहित्य उतना ही श्रेष्ठ होगा जितना वह जीवन से आविष्ट होगा। पहले को मनीषियों ने निर्वैयक्तिकतावाद कहा है और दूसरे को संरचनात्मक साकल्यवाद। यद्यपि साहित्य का राजहंस इन दोनों लहरों पर ही डूबता-तिरता रसिक हृदयों में हिल्लोल पैदा करता है।
संरचनात्मक साकल्यवाद का सिद्धांत कृति की संरचना से जुडा है, जिसमें कृति की व्याख्या करते समय कृति के संदर्भ को और कृतिकार की अन्य रचनाओं का भी ध्यान रखना पडता है। इस प्रकार यह भोक्ता और स्रष्टा की अभिन्नता पर आधारित है कि भोगने वाला प्राणी और रचने वाला प्राणी परस्पर जितने अभिन्न होंगे रचना उतनी ही उत्कृष्ट और सच्ची होगी। व्यक्ति की अभिव्यक्तियों का स्रोत उसकी प्रत्यक्ष परोक्ष अनुभूतियाँ हैं इसे मनोविज्ञान की सुरक्षा युक्ति प्रक्षेपण के माध्यम से समझा जा सकता है। मनोविश्लेषणवादी फ्रायड ने सर्वप्रथम प्रक्षेपण शब्द का प्रयोग किया उनके अनुसार- प्रक्षेपण वह प्रक्रिया है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपने अभावों, विचारों, भावनाओं, इच्छाओं, संवेगों, स्थायी भावों एवं आंतरिक संघर्षों को अन्य व्यक्तियों या बाह्य संसार के माध्यम से सुरक्षात्मक रूप से प्रस्तुत करता है।1 इस प्रकार प्रक्षेपण अनुभूतियों और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है, तो साहित्य प्रक्षेपण का सर्वोत्तम माध्यम। और इस माध्यम यानी साहित्य को साहित्यकार तीन तरह से अपनाता है। पहले वह स्वयं से बात करता है, दूसरे, वह श्रोता, पाठक, समीक्षकों से बात करता है और तीसरे, वह पात्रों के माध्यम से बात करता है। यह तीसरा पंथ संरचनात्मक साकल्यवाद है जिसमें रचनाकार स्वयं अपनी रचनाओं में प्रवेश कर जाता है पात्रों के माध्यम से नहीं, सीधे सीधे।
आदिकवि वाल्मीकि, व्यास, चंदबरदाई को देखिए, सब के सब काव्यों के सर्जक भी हैं और पात्र भी, तो क्या रचना में रचनाकार की उपस्थिति उसकी महाकाव्यात्मकता में या सफलता में बाधक हुई है? (निर्वैयक्तिकतावादी स्रष्टा और भोक्ता की दूरी को काव्य की सफलता की गारंटी के रूप में प्रस्तुत करते हैं) कहने की आवश्यकता नहीं कि ये कितने बडे कवि हैं। भोक्ता और रचयिता के अलगाव को धत्ता बताते हुए भोक्ता और रचयिता की संपृक्तता को स्थापित करने वाले ये तीनों ही महाकवि हैं, इनमें से दो का उल्लेख आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने ललित निबंध में किया है- कहते हैं कर्णाट राज की प्रिया विज्जिका देवी ने गर्वपूर्वक कहा था कि एक कवि ब्रह्मा थे, दूसरे वाल्मीकि और तीसरे व्यास। एक नये वेदों का सृजन किया, दूसरे ने रामायण को और तीसरे ने महाभारत को। इनके अतिरिक्त और कोई यदि कवि होने का दावा करे, तो मैं कर्णाट राज की प्यारी रानी उनके सिर पर अपना बायाँ चरण रखती हूँ- तेषां मूध्र्नि ददामि वामचरणं कर्णाट राजप्रिया।2,
संरचनात्मक साकल्यवाद वह बिंदु है जिस पर रचना और रचनाकार मिलकर एक हो जाते हैं, रचनाकार का अस्तित्व रचना में ही विलीन हो जाता है और यही कारक एक कवि को दूसरे कवि से, एक कृति को दूसरी कृति से स्वतंत्र अस्तित्व देता है। इसीलिए दिनकर कहते हैं - प्रत्येक कवि जीवन भर एक ही कविता लिखता है। उसकी भिन्न कविताएँ उसी एक कविता की विभिन्न कडियाँ होती हैं। यही कारण है कि मेरी कविताएँ बच्चन की कविताओं में फैंटी नहीं जा सकती, न बच्चन की कविता को देखकर किसी को यह भ्रम हो सकता है कि वह मेरी लिखी हुई है। छंद, शब्द प्रयोग, अर्थ, रस व अलंकार का निर्वाह कर देना काफी नहीं है। प्रत्येक कविता पर कवि की वैयक्तिकता की छाप होनी चाहिए।3 संरचनात्मक साकल्यवाद रचनाकार की सभी कृतियों को एक ही माना जाता है, अपनी सभी कविताओं को अपना वाङ्मय शरीर बताते हुए बच्चन ने कहा है- कवि की समस्त कृतियों को एक ही मानकर पढना चाहिए, यह उसका वाङ्मय शरीर है, अलग-अलग करके रचनाओं को देखना जैसे हाथ पाँव, नाक कान को काट काटकर देखना है। प्रत्येक अंग का महत्त्व सर्वांग के साथ है, सर्वांग का महत्व प्रत्येक अंग के साथ।
निर्वैयक्तिकतावाद में जहाँ रचयिता रचना से पार्थक्य चाहता है, वहीं साकल्यवाद में रचयिता रचना में प्रवेश चाहता है। रामचरितमानस में अपने इष्ट श्री राम के सानिध्य के लोभ में एक स्थान पर गोस्वामी तुलसीदास ने मानस में प्रवेश किया है- तेहि अवसर एक तापसु आवा, तेज पुंज लघु बयस सुहावना।4
पूर्वापर संबंध से इस तापस का कोई उल्लेख नहीं मिलता है, मानस के समीक्षकों ने ये तापस तुलसी ही माने हैं जो श्री राम के दर्शनार्थ काव्य में प्रवेश करते हैं। विनय पत्रिका सहित तुलसी की सभी कृतियों में यह बात मिलती है।
भक्तिकाल में ही दूसरे कवि मलिक मोहम्मद जायसी पद्मावत में अपनी कृति से तादात्म्य स्थापित कर इतने एकाकार हो जाते हैं कि बाँयें कान और आँख की जन्मजात विकृति का सम्बन्ध नागमती संदेश से स्थापित करते हुए कहते हैं :
मुहमद बायीं दिसि तजी, एक सरवन एक आँख।
जब ते दाहिन होइ मिलाए बोलु पपीहा पाँखि।।5
अर्थात् जिस दिन से पपीहा पक्षी ने रत्नसेन के दाहिनी ओर जाकर नागमती का संदेश सुनाया है, उसी दिन से मैंने बाँयें अंगों को अनुपयोगी समझकर एक कान और एक आँख को त्याग दिया है। इसे साकल्यवाद के चश्मे से ही समझा जा सकता है कि जायसी ने कैसे अपने विकृत अंगों को काव्यात्मक स्वीकृति दी है। वाल्मीकि, व्यास से लेकर चंदबरदायी तक, जायसी से तुलसी तक, आदिकाल से भक्तिकाल तक ही नहीं, ये प्रवृत्ति रीतिकाल से आधुनिक काल तक लगभग हर साहित्यकार में कमोबेश यह प्रवृत्ति मिलती है। यद्यपि रीतिमुक्त कवियों को छोड दें, तो रीतिकाल के अन्य कवियों में स्रष्टा और भोक्ता की अभिन्नता इतनी नहीं मिलती, रीति कवियों की निजी अनुभूति से इस दूरी को लक्ष्य कर दिनकर ने लिखा है- जब समाज कवि को अनुभूतियाँ नहीं देता, तब कवि दूर की कौडियाँ जमा करके अपना चमत्कार दिखाने लगता है.... ऐसे समय में वे कवि आए जिनकी जबान कोडा और शब्द तीर हों.... इन कवियों का ध्यान जीवन पर नहीं कला पर है, काव्यशास्त्र की गुत्थियों पर है।6 दिनकर ने बहुत सोच समझ कर यह स्थापना दी है, परंतु रीतिकाल के सभी कवियों को इस चश्मे से देखने वालों की नजर में कुछ कमी समझनी चाहिए, इसीलिए घनानंद को पृथक करते हुए दिनकर लिखते हैं - दूसरों के लिए किराए के आँसू बहाने वालों के बीच यह एक ऐसा कवि है जो सचमुच अपनी पीडा में ही रो रहा है।7 अब रीतिकाल से आगे चलकर भारतेंदु युग में आते हैं जहाँ कविता से कंधा मिलाता गद्य साहित्य भी साकल्यवाद के आवरण में लिपटना चाहता है, और लिपटा भी है, पर एक अलग बानगी में। भारतेंदु के नाटक मुद्राराक्षस 8 में चाणक्य और मुद्राराक्षस क्रमशः राष्ट्रभक्ति और स्वामिभक्ति के प्रतीक हैं, जिन्हें भारतेंदु ने निजी अनुभूति के ऐसे दो प्रतीकों से संबद्ध करके देखा है, जो तत्कालीन ब्रिटिश राज में क्रमशः राष्ट्रभक्ति और स्वामीभक्ति के प्रतीक बनकर उभरे थे, पहले थे राजा लक्ष्मण सिंह और दूसरे थे राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद। प्रसिद्ध आलोचक रामविलास शर्मा ने शिवप्रसाद की राज भक्ति को लक्ष्य करते हुए कहा है कि- वह भारतेंदु हरिश्चंद्र के गुरू थे, सुयोग्य शिष्य ने मुद्राराक्षस उन्हीं को समर्पित किया था।... राजा शिवप्रसाद अंग्रेजों के परम प्रशंसक और अनुयायी थे। 9 भारतेंदु की बनाई यह लीक आगे चलकर राजमार्ग में परिणत हो गई। साहित्यकार स्वयं को संरचित पात्र बनाकर सामने आने लगे। द्विवेदी युग में बाल मुकुंद गुप्त आत्माराम के नाम से चुहलबाजीपूर्ण आलोचनात्मक लेखमाला में महावीर प्रसाद द्विवेदी से प्रश्न प्रति प्रश्न करते हैं, तो महावीर प्रसाद द्विवेदी सरगौ नरक ठेकाना नाहि कविता में कल्लू अल्हैत बनकर आल्हा शैली में उत्तर प्रत्युत्तर देते हैं।
संरचनात्मक साकल्यवाद के लिबास में छायावाद युग में निराला और पंत की साहित्यिक लडाई देखते ही बनती है। सुकुमार कवि पंत को गुलाब बताते हुए पंत कृत ज्योत्सना की भूमिका में निराला लिखते हैं प्रांजल श्री सुमित्रा नंदन काव्योपवन के सांजलि खिले हुए प्रकाश दृष्टि सुंदर गुलाब हैं।... मैं गुलाब को देखता हूँ, उसके काँटों को नहीं।10 ज्योत्स्ना की विज्ञापिका में 1934 ईस्वी में पंत को गुलाब बताकर अपनी लंबी कविता कुकुरमुत्ता में निराला गुलाब के बहाने मानों पंत को ही कह रहे हैं - अबे, सुन बे, गुलाब
भूल मत जो पायी खुशबू, रंग-ओ-आब
शाहों, राजों, अमीरों को रहा प्यारा11
निराला ने आभिजात्य के साथ साथ पंत को भी चुनौती दी है जिसके प्रत्युत्तर में पंत ने अपनी कृति लोकायतन में निराला को भ्रष्ट माधो गुरु बनाकर प्रस्तुत किया है। निराला की साहित्य साधना के लेखक और वरिष्ठ आलोचक रामविलास शर्मा ने पंत और निराला के जीवन साक्ष्य के आधार पर, उनके मधु कटु सम्बन्धों के आधार पर, लोकायतन के माधो को निराला का तथा युगकवि वंशी को पंत का प्रतीक माना है। लोकायतन के माधो गुरू के चित्रण का आधार. निराला हैं। उनके दान की कथाएँ, नयी पीढी पर उनका प्रभाव, उनकी कीर्ति के आगे वंशी का हतप्रभ होना...12 पहलवानों के इस जोडे की पुष्टि हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा नीड का निर्माण में की है- जीवित निराला पर तो उनका बस नहीं चला, पर निराला की लाश को उन्होंने जी भर पीटा है.. मुझे लोकायतन के माधो गुरू निराला की याद दिलाते रहे।13
पंत और निराला की इस पारस्परिक लडत के अलावा निराला के साहित्य में स्थान-स्थान पर निराला के जीवन संदर्भ उनके पात्रों के जीवन संदर्भों को काटते छूते चलते हैं। राम की शक्ति पूजा में धिक जीवन का ये धिक्कार भाव जितना राम के संदर्भ से जुडा है, उससे कहीं अधिक स्वयं निराला के जीवन सत्य से-
धिक जीवन जो पाता ही आया विरोध।
धिक साधन जिनके लिए सदा ही किया शोध।14
यही नहीं कविता के अंत में यह है उपाय की पंक्ति भी निराला के दुर्धर्ष व्यक्तित्व की परिचायक है। इसीलिए राम की शक्तिपूजा, राम-रावण संघर्ष से कहीं अधिक व्यक्तिगत स्तर पर विषम परिस्थितियों के विरूद्ध कवि के अपने अपराजेय जीवन संघर्ष व आशा निराशा की अंतर्कथा है। शक्तिपूजा में राम और निराला के व्यक्तित्व के पारस्परिक प्रक्षेपण को दूधनाथ सिंह ने अपनी कृति निराला : एक आत्महंता आस्था में निजी रचनात्मक जीवन का आत्मप्रक्षेप या आत्मसाक्षात्कार कहा है। शक्ति पूजा के राम से लेकर तुलसीदास और कुकुरमुत्ता तक में निराला की ही जीवन छवियों का प्रक्षेपण है ।
छायावाद युगीन हालावादी कवि बच्चन में भी आत्मप्रक्षेपण की यह प्रवृत्ति खूब मिलती है। अपनी कितनी ही कविताओं के स्रोत खुद बच्चन ने अपने मुँह से कह डाले है, तो कितनी ही कविताएँ खुद पुकार-पुकार कर उनके जीवन नितांत एकान्तिक क्षणों का गुणगान कर रही हैं। वे जो भोग रहे हैं, वही कविता है। स्रष्टा और भोक्ता दोनों की अभिन्नता है। पंत की द्वा सुपर्णा कविता के संदर्भ में आत्मविश्लेषण करते हुए एक स्थान पर उन्होंने लिखा है- और पंतजी शायद आदर्श पंछी उसे कहते हैं जो स्रष्टा और भोक्ता साथ-साथ हो, पता नहीं मैं आदर्श पक्षी था या नहीं पर उस समय मेरी स्मृति स्पष्ट है, मैं स्रष्टा भोक्ता साथ-साथ था।15
पंतजी की द्वा सुपर्णा कविता का स्रोत संभवतः वह वैदिक श्लोक रहा होगा जिसमें दो पक्षियों की चर्चा है जिनमें से एक केवल देखता है और दूसरा जीवन फल चखता है। द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया ... दो पक्षी अलग-अलग एक भोक्ता दूसरा दर्शक...संरचनात्मक साकल्यवाद के विपरीत भोगने वाला और रचने वाला दोनों एक दूसरे से पूरी तरह निर्लिप्त और पृथक रहें यह स्थिति निर्वैयक्तिकतावाद कहलाती है।
निर्वैयक्तिकतावाद का सिद्धांत इलियट की देन है, इलियट का मानना है कि कवि वैज्ञानिक के समान ही निर्वैयक्तिक और वस्तुनिष्ठ होता है, वह सर्जक नहीं सृजन का माध्यम है, कवि के संफ से विभिन्न अनुभूतियाँ, संवेदन या भाव नये से नये रूप ग्रहण करते हैं, किन्तु वह स्वयं सर्वथा उनसे अप्रभावित रहता है। इलियट के इसी सिद्धांत को अज्ञेय ने स्पष्ट किया है- कलाकार जितना संपूर्ण होगा, उतना ही उसके भीतर भोगने वाले प्राणी और रचने वाली मनीषा का पृथकत्व स्पष्ट होगा।.... कलाकार जितना ही बडा होगा, उतना ही व्यक्ति जीवन और रचनाशील मन का यह अलगाव भी आत्यंतिक होगा।16
अब प्रश्न यह उठता है कि रचनाकार की रचना में उपस्थिति पर रचनाकार का कितना नियंत्रण है? इसका उत्तर भी बहुत स्पष्ट है कि जिस प्रकार संरचनात्मक साकल्यवाद में रचनाकार अनुभूतियों के प्रक्षेपण को नियंत्रित नहीं कर पाता, उसी प्रकार रचना और उसके पात्रों के स्वमेव गठन की प्रक्रिया में रचयिता स्रष्टा से द्रष्टा मात्र बनकर रह जाता है। इसे शेखर एक जीवनी में अज्ञेय ने स्पष्ट किया है- शिशु मानस के चित्रण की सच्चाई के लिए मैंने शेखर के आरंभ के खंडों में घटनास्थल अपने ही जीवन से चुने हैं, फिर क्रमशः बढते हुए शेखर का जीवन और अनुभूति क्षेत्र मेरे जीवन और अनुभूति क्षेत्र से अलग चला गया है, यहाँ तक कि मैंने स्वयं अनुभव किया है कि मैं एक स्वतंत्र व्यक्ति की प्रगति का दर्शक और इतिहासकार हूँ, उसके जीवन पर मेरा किसी तरह का वश नहीं रहा है।... लेखक पात्र, स्थिति को विकसित करता है और एक समय ऐसा आता है जब रचना लेखक के हाथों से निकल जाती है, उसका स्वाभाविक विकास होने लगता है।17 भूमिका में उन्होंने जोर देकर यह भी कहा है कि जो आत्मघटित नहीं है, वह भी आत्मअनुभूत हो सकता है और कल्पना एवं अनुभूति सामर्थ्य के सहारे दूसरे के घटित में प्रवेश करना (आत्मघटित पूर्व धारणाओं और संस्कारों को स्थगित करते हुए) ही असल लेखन शक्ति का प्रमाण है।
शेखर अपने रचयिता को पीछे छोड स्वतंत्र विकसित होने लगता है, कैसी विवशता है। सृजन प्रक्रिया की इस पीडा को, इस विवशता को लेकर अज्ञेय कहते हैं- साहित्य का निर्माण मानो जीवित मृत्यु का आवाह्न है। साहित्यकार को निर्माण करके और लाभ भी तो क्या रचयिता होने का सुख भी नहीं मिलता, क्योंकि काम पूरा होते ही वह देखता है, अरे, यह तो वह नहीं है जो मैं बनाना चाहता था।18 संवदिया का हरगोबिन, तीसरी कसम का हीरामन और पहलवान की ढोलक कहानी का लुट्टन पहलवान गढने वाले रेणुजी ने कहा है कि-कुछ ऐसे चरित्र होते हैं जो प्राण प्रतिष्ठा पाते ही अपने सिरजनहार के बँधे-बँधाए नियम-कानून, नीति अथवा फार्मूले को तोडकर बाहर निकल आते हैं और अपने जीवन को अपने मन मुताबिक गढने लगते हैं। सृजन के उत्कर्ष के क्षणों में कृति और उसके पात्र स्वमेव अपने को गढने लगते हैं, जडने लगते हैं, अंधायुग के अश्वत्थामा के संदर्भ में धर्मवीर भारती ने इसे स्वीकार करते हुए लिखा है- इस बार ही नहीं अनेक बार ऐसा हुआ है कि पात्र के बारे में पूरे नोट्स बना लीजिए, यहाँ तक कि घटनाक्रम और संवादों की विस्तृत रूपरेखा भी सोच लीजिए, लेकिन जहाँ लिखते-लिखते पात्र अपने व्यक्तित्व को उपलब्ध कर ले गया, वहीं वह आफ हाथ में नहीं रहता। फिर उसका चरित्र विकास अपने आंतरिक क्रम के अनुसार होता है और आपका बनाया तथा कागज पर लिखा हुआ सारा ढाँचा नाकाफी सिद्ध होने लगता है अश्वत्थामा के बारे में भी यही हुआ। अंधायुग का अश्वत्थामा ही क्यों? गोदान का होरी, तीसरी कसम का हीरामन, उसने कहा था का लहना सिंह, संवदिया का हरगोबिन, शेखर एक जीवनी का शेखर, रंगभूमि का सूरदास, मैला आंचल का बामनदास, प्रसाद की गुंडा कहानी में नन्हकूसिंह और इन जैसे कितने ही अनगिनत पात्र हैं जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को स्वमेव ही उपलब्ध कर लिया है। बहुत दूर तक यह मत उपयुक्त जान पडता है कि यदि रचनाकार आत्मअनुभूत ही लिखता जाए, तो रचना जीवन चरित्र अधिक और साहित्य कम होगी और यह भी ठीक है कि रचयिता यदि रचना से बाहर होगा, तो रचना अधिक तटस्थ, और निर्लिप्त होगी। परंतु यह मत सर्वांगपूर्ण नहीं है, क्योंकि जब रचनाकार जीवन से अनुभूतियाँ नहीं उठाएगा, तो उसमें कितनी सच्चाई और पारदर्शिता होगी?
निष्कर्षतः इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ये दोनों विचारधाराएँ समानांतर रूप से साहित्य में चली आ रही है और चलती रहेंगी। दोनों का मध्यममार्ग ही श्रेयस्कर है क्योंकि रचनाकार को रचना से इतना दूर भी नहीं किया जाना चाहिए कि अनुभूति शून्य हो जाए और दोनों में इतना एकत्व भी नहीं किया जाना चाहिए कि रचना साहित्येतर जीवनवृत्त मात्र रह जाए। स्रष्टा और भोक्ता की भिन्नता-अभिन्नता, एकत्व-पार्थक्य के सीमांकन की पडताल अभी शेष है।
संदर्भ :-
1. पांडेय कल्पलता, श्रीवास्तव शंकर शरण, शिक्षा मनोविज्ञान- भारतीय एवं पाश्चात्य दृष्टि, टाटा मैक्ग्रा हिल पब्लिकेशन, 2007 ईस्वी, पृष्ठ- 214
2. द्विवेदी, आचार्य हजारी प्रसाद, शिरीष के फूल
3. दिनकर, रामधारी सिंह, कविता की पुकार(भूमिका)
4. गोस्वामी तुलसीदास, रामचरितमानस (अयोध्याकांड), प्रकाशक-गीता प्रेस गोरखपुर
5. जायसी, मलिक मोहम्मद, पद्मावत (नागमती संदेश खंड)
6. दिनकर, रामधारी सिंह, काव्य की भूमिका (रीतिकाल का नया मूल्यांकन), लोक भारती प्रकाशन, संस्करण 2010 ईस्वी
7. वही
8. हरिश्चंद्र भारतेंदु, मुद्राराक्षस
9. शर्मा, रामविलास, भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परंपरा, संस्करण 2006 राजकमल प्रकाशन, पृ.165
10. पंत, सुमित्रानंदन, ज्योत्स्ना (विज्ञापिका-निराला), गंगा पुस्तकमाला कार्यालय, लखनऊ, 1934 ईस्वी
11. निराला रचनावली द्वितीय खंड, संपादक - नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, द्वितीय संस्करण 1992 ईस्वी
12. शर्मा, रामविलास, निराला की साहित्य साधना (1-पंत और निराला), राजकमल प्रकाशन
13. बच्चन, हरिवंश राय, नीड का निर्माण, राजपाल एंड संस
14. निराला, सूर्यकान्त त्रिपाठी, अनामिका (राम की शक्तिपूजा) राजकमल प्रकाशन
15. बच्चन, हरिवंश राय, क्या भूलूं क्या याद करूं ,पृ. 218, राजपाल एंड संस
16. अज्ञेय, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, त्रिशंकु (रूढि और मौलिकता, पृष्ठ 30-38), सरस्वती प्रेस बनारस
17. अज्ञेय, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायनए शेखर एक जीवनी (भूमिका) सरस्वती प्रेस बनारस, संस्करण 4 (1951)
18. वही / भाग 1/ ऊषा और ईश्वर

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