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नामवर नामवर है क्या कहना!

छबिल कुमार मेहेर
सोचा था, काव्य की दुनिया में ही रहूँगा। उसी में साँस लूँगा, ओढना, बिछौना वही होगा, लेकिन लोग हैं कि सडक पर घसीट लाने के लिए बेचैन। मतलब यह कि अस्तित्व रक्षा के लिए कमर कसकर मैदान में उतरना ही होगा। यही सही।
-नामवर सिंह की डायरी, 5 सितम्बर 1953
नामवरजी को वाणी सिद्ध है। अगर कोई मित्र, दिलचस्प-से-दिलचस्प पुस्तक मेरे हाथ में देते हुए कहे, लो तुम यह पुस्तक पढो, मैं एक गोष्ठी में नामवरजी का भाषण सुनने जा रहा हूँ, तो मैं पुस्तक पटककर नामवरजी का भाषण सुनने निकल पडूँगा, भले ही वह पुस्तक स्वयं नामवरजी ने ही क्यों न लिखी हो।
-भीष्म साहनी, वसुधा-54, पृ.501
सक्रिय उपस्थिति का साक्ष्य
हिन्दी आलोचना व समीक्षाशास्त्र का एक अपरिहार्य-अनिवार्य नाम है-नामवर सिंह। उनकी सक्रिय उपस्थिति से आधुनिक हिन्दी साहित्य एक लम्बे समय से आलोकित रहा है। नामवर सिंह आचार्य रामचद्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा के बाद आधुनिक युग के सर्वाधिक विवादास्पद, बहसतलब और बहुपठित आलोचक रहे हैं जिन्हें अपने जीवन काल में ही एक जीवित किंवदन्ती बन जाने का गौरव प्राप्त हुआ। प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक साहित्य के मर्मज्ञ नामवर सिंह के आलोचक व्यक्तित्व की असाधारण विशेषता है-पाण्डित्य और सहृदयता, शोध और आलोचना, शास्त्र और लोक, भारतीय तथा विदेशी विचार प्रवृत्तियाँ, पूर्वी साम्यवादी तथा पश्चिमी स्वाधीन समीक्षाधाराओं, पुराने तथा नये साहित्य में बराबर रुचियों का विरल सम्मिलन।1 एक ओर उन्होंने परम्परित व रूढिवादी मान्यताओं तथा बोझिल शास्त्रीयता के प्रति क्रान्तिकारी उन्मेष जाग्रत किया, साहित्य को एक नयी पृष्ठभूमि दी; तो दूसरी ओर साहित्य में समग्रता पर जोर देकर समकालीन युग-चिन्तन को नया स्वरूप प्रदान किया, साहित्य को लोक से जोडा और लोक-सौन्दर्य को साहित्य में उतारा।
सृजनात्मक आलोचना के पक्षधर नामवरजी एक लोकप्रिय अध्यापक व घोषित माक्र्सवादी आलोचक थे। माक्र्सवादी विचारधारा से अनुप्राणित होने के बावजूद वे खुले-स्वतंत्र चेता रहे और जरूरत पडने पर उसे अतिक्रमित भी करते रहे। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि विचारधारा चाहे जो भी-गाँधीवाद हो, हिन्दुत्व हो या माक्र्सवाद हो-लेखकीय सन्दर्भ में इससे उत्पन्न साहित्य की गुणवत्ता ही महत्त्वपूर्ण होगी।2 वे लगातार संवाद करना चाहते थे, साहित्य के सरोकारों में सभी को साझीदार बनाना चाहते थे। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने असहमति को कभी बुरा नहीं माना, बल्कि वे असहमतियों को लेकर भी सकारात्मक बने रहे। उन्होंने विचारधारा के पार जाकर भी साहित्य से प्राप्त दृष्टिकोण और रचनाशीलता की नवीनता की बात की और उसके मूल्यबोध को प्रधानता दी। आलोचना का एक स्वतंत्र मार्ग तलाशने में उन्हें कई गम्भीर चुनौतियों, आरोपों, कुत्सित एवं संकीर्ण मनोवृत्तियों का जमकर मुकाबला करना पडा। एक तरफ वे रूपवाद, कलावाद और प्रतिक्रियावाद की प्रवृत्तियों से अनवरत संघर्ष करते रहे, तो दूसरी तरफ उन्होंने वामपंथी आलोचना की जडता, कट्टरता और स्थूल समाजशास्त्रीयता का भी विरोध किया।3 उल्लेखनीय बात यह है कि नामवरजी जितने बडे कद के आलोचक थे, उतने ही बडे प्रतिभावान वाग्मीः ठीक वक्त पर ठीक सूत्र याद आना, व्युत्पन्नमति, सूत्र को उपयुक्ततम शब्दों, स्वर के उचित आरोह-अवरोह, स्वर-भंगिमा के साथ प्रस्तुत कर पाना। समर्थ तर्क-पाश जो यथोचित विक्षोभ भी उत्पन्न कर सके-ऐसी वाग्धारा। बोलने में भी वाक्य-गठन चुस्त एवं व्याकरण सम्मत। भाषण में आदि, मध्य, अन्त का सुसंगत अनुपात।4 इसीलिए नागार्जुनजी ने उन्हें वाचिक परम्परा का आलोचक कहा था। उनकी तेजस्वी, अप्रतिम वाग्मिता हमेशा सोचने-समझने की नई दृष्टि से लबरेज रही है। सचेत श्रोता उनका व्याख्यान सुनकर बेचैन हो जाता है और रात करवटें बदल-बदल कर गुजारने को विवश होता है। अपने उद्बोधन के मार्फत हिन्दी क्षेत्रों में उन्होंने घूम-घूम कर क्रान्तिकारी विचारों के, जो बीज बोए हैं, वे अप्रतिम हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि अपने वरिष्ठों और समकालीनों से वैचारिक मुठभेड करते समय काफी अक्खड नजर आने वाले नामवरजी नए लेखकों से संवाद करते हुए काफी विनम्र हो जाते हैं। एक सादगी भरे लिबास में उनके व्यक्तित्व की उदारता का विस्तार और प्रभाव हुआ था। देशज-चेतना, लोक-चेतना और वैचारिक आधुनिक चेतना को नामवर अपने भीतर जीते थे। उन्होंने अपनी आलोचना में महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचन्द, राहुल, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, यशपाल, मुक्तिबोध, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, हरिशंकर परसाई, धूमिल आदि के महत्त्व को हिन्दी समाज से परिचित कराया और अपने व्याख्यानों में उनकी सम्यक व्याख्या की। उनकी उपस्थिति सचमुच एक सच्चे योद्धा की उपस्थिति थी।
कवि की कविताई
नामवरजी का जन्म बनारस के जियनपुर गाँव के एक ठाकुर परिवार में हुआ था। एक सामान्य गृहस्थी में पैदा होकर उन्होंने जैसी साधाना की वह साधारण से असाधारण होने की ही साधना थी। इसी बनारस में ही कविवर त्रिलोचन शास्त्री की संगति ने उन्हें शब्द के साथ खेलना सिखाया। घर, परिवार, आचार्य कुल और कवि-संगति ने नामवरजी को जितना बनाया, उसे उन्होंने अपनी साधना से दोगुना कर समूची परम्परा को लौटाने का गुरु-दायित्व निभाया। परन्तु आज यदि कहा जाए कि नामवर सिंह मूलतः एक कवि ही थे, तो बहुतों को अटपटा लगेगा और कइयों को तो विश्वास ही नहीं होगा। सच्चाई यह है कि नामवरजी की आरम्भिक पहचान एक कवि के रूप में बनी थी। जब वे कक्षा छठी के छात्र थे, तब वे पुनीत के उपनाम से कविता लिखने लगे थे। एक कविता का विषय था-इंग्लैण्ड पर हिटलर की जीत-उसकी अंतिम पंक्ति थी-चढयो बरतानिया पर हिटलर पुनीत ऐसे जैसे गढ लंक पर पवनसुत कूदि गौ। अगली कक्षा में आते ही नामवरजी घनाक्षरी जैसे जटिल छन्द में कविता करने लगे-आस दुइ मास प्रिय मिलन अवधि की है, उमगे उरोज रहै कंचुकी मसकि मसकि। इसी कविता और इतर पुस्तकें पढने के परिणामस्वरूप वे उसी वर्ष की माध्यमिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गए। अगले साल उन्होंने प्रथम श्रेणी वाली कामयाबी पाई।
परन्तु सवाल यह है क्या नामवरजी कवि थे, या कवि हो सकते थे? इस क्रम में स्वयं नामवरजी की स्वीकारोक्ति द्रष्टव्य हैः मैंने भी साहित्यिक जीवन का आरम्भ बहुतों की तरह कविता से किया।....मैं प्राइमरी पास कर के वर्नाकुलर मिडिल की पाँचवी छठी में पढ रहा था। उन दिनों मैं ब्रज भाषा में कविताएँ लिखा करता था।....1951 तक प्रकृति सम्बन्धी मेरी कुछ कविताएँ उस समय की पत्रिकाओं में छप चुकी थीं। इलाहबाद से निकलने वाली नयी कविता पत्रिका थी, उसमें भी मेरी कुछ कविताएँ छपी थीं। विष्णुचन्द्र शर्मा ने कवि में मेरी कुछ कविताएँ प्रकाशित की थीं।....नीम के फूल नाम से एक संग्रह लगभग कम्पोज भी हो गया था, पर मुकदमेबाजी के कारण प्रेस में ताला लग गया और पांडुलिपि भी वहीं रह गयी।5 इससे नामवरजी का कोई खास नुकसान नहीं हुआ। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि कोई पछतावा नहीं है कि मेरी कविताएँ पुस्तकाकार क्यों नहीं छपीं। जो किशोर वय की चीजें कही जाती हैं, वे कविताएँ उसी कोटि की थीं और उनकी पुस्तक न छपने से हिन्दी का कोई अहित नहीं हुआ।6 ऐसा उद्गार सिर्फ एक सहृदय मनीषा ही कर सकता है जिसे समृद्ध भारतीय साहित्य व परम्परा का सम्यक ज्ञान हो और नामवरजी को लेकर शायद ही किसी के मन में कोई शंका हो। परवर्ती समय में जब नामवरजी आलोचना की ओर उन्मुख होते है,ं तो उनकी यही अन्तर्निहित काव्यात्मक या सर्जनात्मक शक्ति ही उनकी समझ को सदैव धार देती रही है और शब्दों के बीच सटीक शब्द, उचित शब्द, शब्दों की अर्थछायाओं के प्रति उन्हें आजीवन जागरूक-सचेत बनाती रही। नामवरजी जानते थे कि कविता में शब्द महत्त्वपूर्ण होते हैं। शब्द की साधना ही पहली सीढी है। उसके बिना कोई आदमी विशाल कथ्य के बावजूद अच्छा नहीं लिख सकताः
व्योम-कुसुम! तुम दूर कहीं सौरभवाणी फैलाती
लहर-लहर मुझ तक पूरवा-सी याद तुम्हारी आती
अखिल आयु-प्लावित इस क्षण से नहीं बीतते साँझ।’
-नहीं बोलती साँझ कविता से
चर्चित प्रगतिवादी कवि त्रिलोचनजी ने उन्हें एक श्रेष्ठ कवि के रूप देखा-पहचाना हैः नामवर सिंह काल-विचार से ही नहीं, अर्थ-विचार से भी आधुनिक कवि हैं। उनकी छोटी-छोटी कविताएँ ऐसी नहीं हैं कि एक नजर डालकर ही कोई कह दे कि इनमें जितना कुछ जानना था, उसे जान लिया।....नामवर सिंह के प्रकृति-चित्र दृष्टि की सीमा तक विशद और फैले हुए हैं। प्रकृति उनकी कविताओं में आलम्बन और उद्दीपन रूपों में आई है। सांध्यकाल में नौका विहार करते हुए गंगा में शत्-शत् कम्पमान ज्योति-लताएँ, हरित फौवारों सरीखे धान, प्रभात काल के लघुवृक्ष दीपालोक, नदी पार के पेडों पर उगे हुए मृगशिरा नक्षत्र, पारदर्शी नील जल में सिहरते शैवाल, स्वर-ताल में पल्लव-सरीखे पंछियों का सुभग वन्दनवार, सूचीभेद्य घन के द्वार, शाम के सादे वदरफट घाम, रात के भीतर उभरती रात घुसी परिचित-अपरिचित जिसके तनों की फाँक के उस पार चमकता है शशिला निःसीम कल्प खुला-खुला-सा ताल, सवेग चलते हुए एक टहनी से फुदककर दूसरी फिर तीसरी पर उड रहा चंचल चिडी-सा चाँद, सबमें नामवर सिंह दूसरे कवियों से अलग दिखाई देते हैं।3 छायावादी सुगंध में लिपटी नामवरजी की काव्यभाषा बिल्कुल स्पष्ट थीः
पारदर्शी नील जल में सिहरते शैवाल
चाँद था, हम थे, हिला तुमने दिया भर लाल
क्या पता था, किन्तु, प्यासे को मिलेंगे आज
दूर ओंठों से, दृगों में संपुटित दो नाल।
कवि केदारनाथ सिंह ने नामवरजी के कवि-सहृदय की समीक्षा करते हुए स्वीकारा है कि उनकी कविताएँ उस समय के प्रचलित फैशन से अलग होती थीं। उनमें एक ताजगी भी होती थी और एक खास तरह की ऐन्द्रिकता भी।....पर सच्चाई यह है कि अपने आलोचना-कर्म के बीच भी उनके भीतर का कवि हमेशा जीवित रहता है-जीवित ही नहीं सक्रिय और रचनारत भी.... बहुत पहले त्रिलोचन जी ने नामवरजी के बारे में कभी कहा था कि उनके पास पुस्तक-पकी आँखें हैं। परन्तु वे सिर्फ पुस्तक-पकी होतीं, तो कोई खास बात न थी। उनके पास अनुभव-पकी आँखें भी हैं।7
धुँधवाता अलाव, चौतरफा मोढा मचिया
पडे, गुडगुडाते हुक्का कुछ खींच मिरजई
बाबा बोले लख अकासः ‘अब मटर भी गई’
देखा सिर पर नीम फाँक में से कचपचिया
डबडबा गई-सी, काँपती पश्वियाँ, टहनियाँ
लपटों की आभा में तरु की उभरी छाया ।

सृजन और आलोचनात्मक हस्तक्षेप
यद्यपि हिन्दी आलोचना की परम्परा काफी पुरानी है, लेकिन बीसवीं सदी के आरम्भ में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी आलोचना को एक स्थिर जमीन प्रदान की तथा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी आलोचना को एक व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। आचार्य शुक्ल के बाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, नन्ददुलारे वाजपेयी, डॉ. नगेन्द्र आदि ने हिन्दी आलोचना को विकसित किया। आचार्य नलिन विलोचन शर्मा, डॉ. रघुवंश, विजयदेवनारायण साही, रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉ. इन्द्रनाथ मदान आदि ने भी हिन्दी समालोचनाशास्त्र को समृद्ध किया। परन्तु हिन्दी आलोचना का परिपक्व स्वरूप, आचार्य शुक्ल और रामविलास शर्मा के बाद, नामवर सिंह में ही देखने को मिलता है। उनकी जैसी सम्पूर्ण और व्यवस्थित तैयारी अन्यत्र कठिनाई से मिलेगी। मात्र चौबीस वर्ष की आयु में नामवरजी के रचनात्मक-कर्म का आगाज हुआ- बकलम खुद (1951) के प्रकाशन से, जिसमें उनके सत्रह लेख शामिल थे। यह पुस्तक पिछले कई दशकों से अनुपलब्ध है। इसी वर्ष उनका काव्य-संग्रह नीम के फूल भी छप गया था, परन्तु वह रिलीज नहीं हो सका। उनका यह कवि रूप कविता पर आलोचनात्मक हस्तक्षेप में समाहित होकर सार्थक सृजन की गरिमा हासिल करता है। सन् 1952 में आलोचना के क्षेत्र में उनकी पहली पुस्तक हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग प्रकाशित हुई, जो सिद्धान्त आधारित व्यावहारिक आलोचना का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करती है। इसके बाद का उनका सम्पूर्ण लेखन आलोचना को समर्पित रहा। हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान दो खंडों में विभाजित है। पहले खंड में अपभं*श भाषा के उद्भव और विकास पर चर्चा कर परवर्ती हिन्दी भाषा से उसके सम्बन्धों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे खंड में अपभ्रंश साहित्य और हिन्दी के साहित्यिक सम्बन्धों का निरूपण किया गया है। अपभ्रंशकाल यानी आठवीं-नवीं सदी से लेकर अवहट्ठ तक की भाषा और साहित्य का विश्लेषण नामवरजी ने इस तरह किया है कि जिसे राहुलजी ने पुरानी हिन्दी कहा, उसके विकास क्रम का विश्लेषण करते हुए वे हिन्दी की प्रकृति का उत्स वहाँ दिखाते हैं। इसमें स्वयंभू और सरहपा का जो विवेचन है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इसी कृति की अगली कडी है पृथ्वीराज रासो की भाषा, जो पहले ग्रंथ की ही भाँति बेहद महत्त्वपूर्ण एवं सन्दर्भवान है। यह दोनों ग्रंथ हिन्दी साहित्य के आदिकाल को समझने में हमारी मदद करते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि नामवरजी शोध के मार्फत भाषा की महत्ता व सार्थकता की गहराई से जाँच-पडताल करते हैं। परन्तु आलोचना के क्षेत्र में जिन पुस्तकों ने नामवर सिंह को काफी प्रतिष्ठा दिलाई, उनमें अधिकतर सैद्धान्तिक आलोचना की पुस्तकें हैं। आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ पुस्तक में उन्होंने हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में चार वादों-छायावाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद व प्रयोगवाद- का विशेष रूप से विश्लेषण किया है। उल्लेखनीय है कि छायावाद की छाया पूरी तरह विलुप्त नहीं हुई थी और छायावाद के चारों स्तम्भों को भी नामवर देख, पढ और पढा चुके थे। सन् 1954 में नामवरजी की महत्त्वपूर्ण आलोचानात्मक कृति छायावाद प्रकाशित हुई। पुस्तक के दूसरे संस्करण के फ्लैप पर यह स्पष्ट कर दिया गया है कि यह पुस्तक दृष्टि की मौलिकता, विवेचन की स्पष्टता तथा आलोचना-शैली की सर्जनात्मकता के लिए पिछले दशक की सबसे लोकप्रिय पुस्तक रही है। इसमें उन्होंने छायावाद की विषय वस्तु में प्रकृति, नारी आदि की चर्चा के साथ-साथ कविता के कलापक्ष, रूपविन्यास, पद-कल्पना, मुक्त छंद आदि पर भी विस्तार से विचार किया है। छायावाद को उन्होंने अनेक प्रवृत्तियों का समुच्चय कहा है, जिसमें राष्ट्रीय भावना केन्द्र में थी। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि छायावाद राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है, जो एक ओर पुरानी रूढियों से मुक्ति पाना चाहता है, तो दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से। इतिहास और आलोचना (1957) उनके आलोचनात्मक लेखों का संग्रह है जिसमें साहित्यिक आलोचना से जुडे अनेक सवालों पर विचार किया गया है। पुस्तक में संकलित लेखों के शीर्षकों -व्यापकता और गहराई, कलात्मक सौन्दर्य का आधार, समाज, साहित्य और लेखक का व्यक्तित्व, अनुभूति और वास्तविकता, आस्था का प्रश्न, इतिहास का नया दृष्टिकोण, इतिहास और आलोचना आदि- से यह बात स्पष्ट हो जाती है। वास्तव में इस पुस्तक में नामवरजी ने माक्र्सवादी आलोचना का दरपेश साहित्यिक समस्याओं सम्बन्धी सैद्धान्तिक दृष्टि से बडा गम्भीर विश्लेषण किया है। संकलित निबन्धों के बारे में नामवरजी का कहना है कि यह पुस्तक छठे दशक के वैचारिक संघर्ष का एक विवादमूलक दस्तावेज है। कहानीः नई कहानी (1964) में सैद्धान्तिक व व्यावहारिक आलोचना का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इस पुस्तक का महत्त्व इस बात में है कि इसी से हिन्दी में कहानी-आलोचना की गम्भीर परम्परा प्रारम्भ हुई। शायद यह कहना गलत न होगा कि कथा-आलोचना की प्रथम वस्तुनिष्ठ समालोचना की सार्थक जमीन नामवर सिंह ने ही रची थी। पुस्तक की भूमिका में नामवरजी ने अपनी विश्लेषण-पद्धति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि इस कहानी में आलोचना की वही विश्लेषणात्मक पद्धति अपनाई गई है जो पिछले कुछ दशकों से छोटी कविताओं के विश्लेषण में सफल पाई गई थी। इस निबन्ध से, मेरे निकट, उन लोगों के लिए भी उत्तर प्रस्तुत था जिनका यह आरोप था कि मैं कहानी-समीक्षा में काव्य-समीक्षा की पद्धति का बलात् उपयोग करके भूल कर रहा हूँ। यह पुस्तक हिन्दी कहानी, विशेषकर नई कहानी सैद्धान्तिक व व्यावहारिक, दोनों पक्ष पर प्रकाश डालती है। पुस्तक में नयी कहानी के प्रारम्भ की खोज करते हुए वे निर्मल वर्मा की कहानी परिन्दे को हिन्दी की पहली नयी कहानी कहते हैं: फकत सात कहानियों का संग्रह ‘परिन्दे’ निर्मल वर्मा की ही पहली कृति नहीं है, बल्कि जिसे हम ‘नयी कहानी’ कहना चाहते हैं उसकी भी पहली कृति है।....परिन्दे से यह शिकायत दूर हो जाती है कि हिन्दी कथा-साहित्य अभी पुराने सामाजिक संघर्ष के स्थूल धरातल पर ही मार्कटाइम कर रहा है। समकालीनों में निर्मल पहले कहानीकार हैं जिन्होंने इस दायरे को तोडा है- बल्कि छोडा है; और आज के मनुष्य की गहन आन्तरिक समस्या को उठाया है। (पृ. 52) इसी स्थापना के कारण नामवरजी को गाहेबगाहे कठघरे में खडा किया जाता है। निर्मलजी की राजनीतिक-सामाजिक दृष्टि में ज्यों-ज्यों परिवर्तन आता गया, त्यों-त्यों नामवरजी, उस समीक्षा के चलते, अधिकाधिक प्रश्नों का दंश झेलते रहे- मैंने लाखों के बोल सहे सितमगर तेरे लिए की मुद्रा में।
कविता के नये प्रतिमान (1968) में नामवरजी नई कविता की आलोचना-विवेचना करते हैं। नयी कविता को समझने के लिए इतनी बढिया पुस्तक शायद ही दूसरी लिखी गयी हो। इसमें नामवरजी ने कविता की परिभाषा, रस, अनुभूति की प्रामाणिकता, व्यंग्य, जटिलता और तनाव, प्रतीक, बिम्ब आदि की गम्भीर चर्चा की है। इस बहाने उन्होंने कविता के नये प्रतिमान भी गढे हैं और काव्यबाह्य प्रतिमानों को ध्वस्त भी किया है। कविता क्या है ?, कविता के नये प्रतिमान, रस के प्रतिमान की प्रसंगानुकूलता, काव्य भाषा और सृजनशीलता, काव्य बिम्ब और सपाटबयानी, विसंगति और विडम्बना, अनुभूति की जटिलता और तनाव, ईमानदारी और प्रामाणिक अनुभूति, परिवेश और मूल्य आदि शीर्षकों के अन्तर्गत उन्होंने काव्य-प्रक्रिया से सम्बन्धित जटिल प्रश्नों पर गम्भीरता से विचार किया है; और लगे हाथ न्यू क्रिटिसिज्म, एफ.आर. लीविस, ग्राम्शी के साथ-साथ माक्र्सवादी साहित्य चिन्तन व हिन्दी के माक्र्सवादी चर्चित आधुनिक कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की विशेष चर्चा की है। इस पुस्तक में मुक्तिबोध पर कदाचित पहली बार इतनी गहराई से विचार किया गया है। इस चिन्तन-मंथन से नामवरजी जिस निष्कर्ष तक पहुँचते हैं वह उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार है- मूल्यांकन की दिशा में सम्प्रति ये कुछ संकेत हैं जिनसे स्पष्ट है कि छायावादोत्तर कविता की प्रमुख उपलब्धियाँ नयी कविता के अन्तर्गत ही सुलभ हो सकती हैं; किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि नयी कविता के बाहर का सारा काव्य मूल्यहीन है।... छायावादोत्तर काल की यह सारी सार्थक काव्य-सर्जना उस नयी कविता के गिर्द हुई है जो इस काल की मुख्य काव्य-धारा रही है- स्पष्ट ही यहाँ नयी कविता से आशय प्रगति और प्रयोग दोनों के कल्पित कगारों को तोडती हुई समग्र नयी काव्य-धारा से है। जो भी हो, आज यह पुस्तक हिन्दी की नयी समीक्षा में एक मील का पत्थर साबित हुई है। इसी चर्चित कृति के लिए उन्हें वर्ष 1971 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से अलंकृत किया गया।
दूसरी परम्परा की खोज (1982) नामवरजी की एक अनुपम कृति है जो आकाशधर्मा गुरु हजारीप्रसाद द्विवेदी के चिन्तन और सृजन की मौलिकता को सुन्दर ढंग से रेखांकित करती है। यह विशिष्ट अष्टाध्यायी कृति जहाँ एक ओर शुक्लजी और द्विवेदीजी की दो परम्पराओं को जोडने का प्रयास करती है, वहीं दूसरी ओर द्विवेदीजी के सारस्वत अवदान को भी गहराई से रेखांकित करती हैः कबीर के माध्यम से जाति धर्म निरपेक्ष मानव की प्रतिष्ठा का श्रेय द्विवेदी जी को ही है। यह एक प्रकार से दूसरी परम्परा है। (पृ.13) डॉ. बच्चन सिंह दूसरी परम्परा की खोज को नामवरजी की महत्त्वपूर्ण कृति स्वीकारते हुए लिखते हैं कि किंचित अनपेक्षित के प्रवेश के बावजूद इसमें उनकी विकसित इतिहास-दृष्टि, वागर्थ प्रतिपत्ति और रचनाधर्मिता का पूरा संश्लेष दिखाई पडता है। वस्तुतः उनकी आलोचना में इन्हीं तीन सूत्रों की बुनावट है। वाद विवाद संवाद (1989) में 18 दिलचस्प निबंध संकलित हैं जो नामवरजी के प्रखर आलोचनात्मक विवेक का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। वाद विवाद संवाद की सार्थकता को स्पष्ट करते हुए नामवरजी ने लिखा है कि आलोचना-कर्म वाद, विवाद, संवाद नहीं तो और क्या है? लेखक-आलोचक के बीच। आलोचक-आलोचक के बीच। मौखिक हो या लिखित। संवाद के ही संकल्प के साथ 1967 में आलोचना शुरू की थी फिर से। पहले भी आलोचना के इसी स्वधर्म को निभाने की कोशिश की। लेकिन मुश्किल यह है कि संवाद की बातें तो बहुत होती हैं, संवाद करने के लिए लोग नहीं मिलते। वह संवाद ही क्या जिसमें कुछ वाद-विवाद न हो। नामवरजी ने इनमें अत्यन्त बारीकी और बेबाकी से उन मुद्दों पर विचार किया है जो कि समकालीन भाषा, साहित्य और आलोचना-कर्म की बुनियादी चिन्ताओं से सम्बद्ध हैं जिन्हें प्रायः अनदेखा कर दिया जाता है।5 आलोचना की भाषा, आलोचना और संस्थान, आलोचना की संस्कृति और संस्कृति की आलोचना, प्रासंगिकता का प्रमाद, विश्वविद्यालय में हिन्दी, युवा लेखन पर एक बहस, माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्र के विकास की दिशा आदि ऐसे ही निबन्ध हैं जो संवाद की अनिवार्यता के साथ-साथ उसके जनतांत्रिक मूल्य को बखूबी रेखांकित कर रहे हैं। हिन्दी में गम्भीर साहित्यिक आलोचना-समीक्षा का एक नया अध्याय तब प्रारम्भ हुआ, जब उन्होंने प्रसिद्ध पत्रिका आलोचना का सम्पादन-भार सँभाला। आलोचना का प्रत्येक अंक एक सन्दर्भ पुस्तक का दर्जा रखता है। आलोचना पत्रिका के माध्यम से एक ओर उन्होंने, हिन्दी पाठकों, प्राध्यापकों और रचनाकारों से वैश्विक विजन, कला मर्मज्ञता, काव्यभाषा, मूल्यचेतना व युगबोध पर सार्थक बहस जारी रखी, तो दूसरी ओर हिन्दी के अनेक युवा रचनाकारों-आलोचकों को पाश्चात्य काव्यशास्त्र की अधुनातन प्रवृत्तियों से परिचित कराया। उन्होंने माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की विशाल परम्परा को भी आलोचना के माध्यम से रेखांकित करने का सार्थक प्रयास भी किया। यही कारण है कि उनके द्वारा दुहराई गई एक पंक्ति-मुझमें भय चीखता है दिग्विजय, दिग्विजय-से धूमिल रातोंरात चमक उठते हैं। नई कहानियों के एक लेख से वापसी कहानी की लेखिका उषा प्रियंवदा चर्चित हो जाती हैं और निर्मल वर्मा की परिन्दे कहानी नई कहानी आन्दोलन की अग्रणी कहानी बन जाती है- मुक्तिबोध की लम्बी कविता अँधेरे में की चर्चा मात्र से सम्पूर्ण मुक्तिबोध-साहित्य प्रासंगिक हो जाता है और एक लेख-एक नया काव्यशास्त्र त्रिलोचन के लिए-से त्रिलोचन को प्रतिष्ठित कर देते हैं। नामवरजी का यह आलोचकीय पारस स्पर्श अविस्मरणीय रहेगा।
आलोचक और आलोचना की भाषा
भाषा मनुष्य की अनुपम उपलब्धि है। भाषा लिपिबद्ध होकर साकार हो उठती है। जैसे-जैसे भाषा मानवीय होती जाती है, वह संस्कारित भी होती जाती है और सृजन में भाषा सर्वाधिक सभ्य, प्राणवान व संवेदनशील हो जाती है। हम जिस भाषा में सोचते या लिखते हैं वह भाषा हमारे विचार, अन्तःवस्तु, हमारे जीवन की वास्तविकता को निर्धारित करती है। दूसरे शब्दों में, भाषा हमें संस्कारित-मर्यादित कर विवेकवान बनाती है। वैसे भी आज भाषा की प्रयोजनशीलता और जिम्मेदारी कुछ बढ-सी गई है। जिस भाषा को एक समय चन्द भाषा-वैज्ञानिकों और काव्यभाषा को लेकर चिन्तित रहनेवाले काव्य-चिन्तकों के हवाले कर दिया गया था, आज वह भाषा विचारप्रणाली के केन्द्र में आ गई है। एक संवेदनशील आलोचक होने के नाते नामवर सिंह इस बदलाव से भलीभाँति परिचित हैं। 70 के दशक में आलोचना की भाषा पर बात करते हुए उन्होंने रेखांकित किया था कि अब पहले की तरह भाषा को प्रश्न मानकर अभिव्यक्ति के लिए इस्तेमाल करना कठिन हो चला है, क्योंकि हम देख रहे हैं कि वह सम्प्रेषण से पहले संवेदन का माध्यम है, और इस प्रकार वह हमारे संवेदन का नियमन करती है। जिसे हम अपना अनुभव और अपना अन्वेषण समझते हैं, उसमें कितना अपना है ओर कितना सार्वजनिक भाषा का इसका बोध किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की नींद खो देने के लिए काफी है। और ऐसी स्थिति में आज भाषा हमसे एक नए ढंग के सम्बन्ध-स्थापन की माँग कर रही है।10
आलोचना की भाषा समस्या के बारे में नामवरजी का कहना है कि रचनाकार के समान ही आलोचक के सामने भी माध्यम की समस्या उपस्थित होती है। ‘आलोचना की भाषा’ की समस्या, इस प्रकार, माध्यम की समस्या है। माध्यम की वास्तविक समस्या का सामना वे आलोचक करते हैं जिनके लिए आलोचना एक सर्जनात्मक प्रयास है। इसी प्रयास में नया आलोचक भाषा का साक्षात्कार करता है। 11 भाषा-समस्या इस बहस को जारी रखते हुए आगे उन्होंने लिखा है कि अधिकांशतः भाषानुकूलित पाठक एक-सी वस्तु के अभ्यस्त हो जाते हैं- यहाँ तक कि भिन्न वस्तु उनमें कोई हरकत ही पैदा नहीं कर पाती। इस तरह एक दुष्चक्र पूरा होता है, जिसमें सभी लोग एक-सी भाषा बोलने लगते हैं, जबकि अपनी समझ से वे अपने मन की बात कहते होते हैं। भाषा का यही दुष्चक्र या वाग्जाल आलोचना में भाषा की समस्या-बल्कि भाषा को समस्या के रूप में प्रस्तुत करता है। समस्या सार्वजनिक है, किन्तु हर प्रबुद्ध आलोचक सबसे पहले व्यक्तिगत अनुभव के स्तर पर इसका सामना करता है।12 जब आलोचक के पास वह भाषा आती है, तो आलोचक शब्द की उसी प्राण-शक्ति और सभ्यता का उत्खनन करता है। भाषा के संरचनात्मक स्थापत्य या वास्तुशास्त्र को आलोचक ही अपनी प्रकृति से जाँचता है। इस अर्थ में आलोचक ही भाषा का वास्तविक आर्किटेक्ट(वास्तुविद) या इंजीनियर कहा जा सकता है। भाषा की वाकशक्ति को वही आलोचक अभिव्यक्त करता है जिसके पास वाक में विमर्श की विलक्षणता हो। भाषा के बारे में नामवरजी कहते हैं- हालांकि मैं भाषा को लेकर बहुत शुद्धतावादी नहीं हूँ। भाषा खिचडी भी होती है, भाषा में तद्भव, तत्सम का मिश्रण भी होता है, पर जो तत्सम शब्द हैं उनसे आप छेडछाड नहीं कर सकते, तद्भव में करना है कीजिए। वैसे तद्भव में भी लोक में जो रूप चलता है, वही चलेगा, आपका ‘तद्भव’ नहीं चलेगा।13
जहाँ तक नामवरजी की भाषा-शैली का प्रश्न है वह इतनी स्पष्ट, साफ-सुथरी व सुघड है कि कठिन आलोचनात्मक अवधारणाएँ भी उनकी शैली में बडे सहज रूप में समझ आने वाली भाषा में अंकित होती हैं। आलोचनात्मक गद्य की विशेषता को स्पष्ट करते हुए उन्होंने स्वीकारा था कि आलोचना ऐसे गद्य में लिखी जाए जिसमें सर्जनात्मकता का और अपनी जातीय परम्परा का पूरा का पूरा स्वाद मिले। उनकी यह भी तमन्ना रही कि उनका गद्य बोलता-सा लगेः मैं बोलने को लेकर भी उतना ही सावधान रहता हूँ। बोला हुआ भी यथावत लिखा जा सकता है। बशर्ते उसको लेकर सतर्कता हो। तमन्ना तो यही रहती है कि बोला हुआ लिखा-सा लगे और लिखा हुआ बोलता-सा। 14 आलोचनात्मक गद्य की बानगी के मद्देनजर उनकी कुछ स्थापनाएँ द्रष्टव्य हैं:
1. भारतीय साहित्य में स्वच्छन्दतावाद का उदय भारत की राष्ट्रीय स्वाधीनता के संघर्ष से सम्बद्ध है और इस प्रकार भारतीय स्वच्छन्दतावाद के अपने विशिष्ट चरित्र का निर्माण हुआ, तो इसके साथ भारत की प्रत्येक भाषा के साहित्य में भी स्वच्छन्दतावाद की अपनी जातीय विशेषता है। -आलोचना, अप्रैल-जून 1990
2. योरोप के आधुनिक उपन्यासों में यह तथ्य दृष्टिगोचर करने योग्य है कि इतिहास में जिस नारी को वाणी नहीं प्राप्त हुई थी, जो मूक थी, मुखर नहीं हुई थी-वह उपन्यास विधा के साथ कर्ता या कर्त्री के रूप में सामने आयी है। -प्रेमचन्द और भारतीय समाज
3. सुना है, जैनेन्द्रजी के सामने एक बार किसी ने कहा अक्ल बडी की भैंस? उन्होंने छूटते ही कहा- सवाल यह है कि किसकी अक्ल और किसकी भैंस? इसी तरह सवाल यह नहीं कि आस्था बडी या अनास्था? सवाल यह है कि किसकी आस्था और किसकी अनास्था? साथ ही, किसमें आस्था और किसमें अनास्था? -इतिहास और आलोचना
4. विभिन्न साहित्यिक कालों के बीच की आन्तरिक एकता स्वयं उनके विचारों या साहित्य-रूपों की ऊपरी समानता के द्वारा नहीं बल्कि हर युग द्वारा उठाये गये प्रश्नों की परम्परा से उभरती है, जिनका समाधान उपस्थित करने के लिए वे विचार एवं साहित्य-रूप निर्मित होते हैं। -इतिहास और आलोचना
नामवरजी के गद्य में ये जो गठन या कसावट है उसके प्रशिक्षण का श्रेय उन्होंने खुद अपने दो विद्वान शिक्षकों-मार्कण्डेय सिंह और आचार्य केशव प्रसाद मिश्र-को दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकारा है कि कविता के नये प्रतिमान में जो गद्य है, वह आचार्य शुक्ल और आचार्य केशवप्रसाद मिश्र के संस्कारों वाला गद्य है।15 परन्तु यह भी सच है कि उनके के धारदार गद्य की जडें कहीं न कहीं उनकी काव्य मर्मज्ञता में निहित हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि उनकी आलोचना में जो संवादधर्मिता है, वह उनके इस भाषिक खुलेपन व जीवट के चलते ही संभव हो पाई।
आलोचना में विचार और विचार की आलोचना
आज के इस आत्म-प्रचार और विज्ञापन के समय हर चीज बिकाऊ हो गई है- मनुष्य के शरीर, सौन्दर्य से लेकर ज्ञान, संवेदना तक सबकुछ। परिणामस्वरूप हर चीज के खरीददार भी हमारे आस-पास मँडरा रहे हैं। शास्त्र, साहित्य, आलोचना और समीक्षा भी आज बाजार की वस्तु की तरह खरीदी और बेची जा रही है। यही कारण है कि आज आलोचना का कार्य इतना सरल हो गया है कि हर कोई प्रवृत्तियों पर लेख लिखकर आलोचक बन बैठा है। परन्तु उनका स्वभाव इसके ठीक विपरीत रहा है। बकौल आशीष त्रिपाठी आज के समय में, जबकि लोग आत्म-प्रदर्शन की प्रवृत्ति का शिकार हैं, उनमें एक किसान का-सा संकोच है....। उनके समकालीनों, हमउम्रों और उन्हें ज्यादा जानने का दावा करने वाले लोगों के विचारों के समानान्तर मुझे नामवरजी में एक सूफियाना विराग मिलता है। नामवरजी ने स्पष्ट कर दिया है कि चाहे निबन्ध हो या पुस्तक, मुझे उसका प्रकाशन तभी जरूरी लगता रहा है, जब वह मौजूदा परिदृश्य में हस्तक्षेप करे, उसके ठहराव को तोडे ओर वाद-विवाद-संवाद की प्रक्रिया को आगे बढाए।16 छायावाद, इतिहास और आलोचना, कविता के नये प्रतिमान, दूसरी परम्परा की खोज, वाद विवाद संवाद- इस कथन के पुष्ट प्रमाण हैं। उनके लेखन की सबसे बडी विशेषता है- अपने विषय के प्रति स्पष्टता, समसामयिक यथार्थ की गहरी पकड और समझ, सामाजिक अन्तर्द्वन्द्वों को विश्लेषित करने की क्षमता। वे न तो साहित्य में विचारधारा को अनिवार्य मानते हैं, न गैरजरूरी। उनकी स्पष्ट स्वीकृति है कि विचारधारा के बिना भी साहित्य श्रेष्ठ साहित्य बन सकता है और विचारधारा के साथ भी। उनके लिए विचारधारा विचार मात्र नहीं, बल्कि अनुभूतियों की ऐसी संरचना है जिसमें अनेक प्रतीक, मिथक आदि भी घुले-मिले रहते हैं। नामवरजी की स्पष्टोक्ति हैः लोग कहते थे कि आपकी विचारधारा क्या है? विचारधारा शब्द सामने आया और लोगों ने सुना कि माक्र्सवाद एक आइडियोलॉजी है।....आइडिया, आइडियोलिज्म, आइडियोलॉजी- ये पश्चिमी चिन्तन परम्परा है। हमारी चिन्तन परम्परा में दर्शन शब्द है। हम लोग दिमाग पर जोर नहीं देते, हम लोग जोर देते हैं-देखना, दृष्टि पर । इसलिए विचारधरा शब्द के जो खतरे हैं, वो सारे खतरे पश्चिमी चिन्तन परम्परा का अनुवाद करने के कारण हमारे यहाँ उपस्थित हैं।17
उन्होंने अपनी आलोचना में काव्य-भाषा, काव्य-बिम्ब, और सपाटबयानी, विसंगति और विडम्बना, अनुभूति की जटिलता और तनाव, ईमानदारी और प्रामाणिक अनुभूति तथा परिवेश और मूल्य आदि प्रतिमानक शब्दों की व्याख्या एक नए आलोक में की है। ऊपर स्पष्ट किया जा चुका है कि नामवर सिंह रामचन्द्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा की परम्परा को आगे बढाने वाले अग्रणी आलोचक हैं। उनकी आलोचना का विषय क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है- माक्र्सवाद, समकालीन विश्व, पूँजीवाद, नवसाम्राज्यवाद, फासीवाद और भारतीय लोकतंत्र के विरूपीकरण से लेकर कविता, नयी कविता, कहानी, नयी कहानी तक। उन्होंने माक्र्सवादी विचारधारा और दर्शन को लगातार संशोधित रूप में स्वीकार किया। उन्होंने किसी भी कृति का मूल्यांकन कृतिकार के ऐतिहासिक परिवेश और उसके जीवन सन्दर्भों में किया है। वे माक्र्सवाद की ऐतिहासिक दृष्टि को लेते हुए भी उसके जार्गन से बचते हैं। माक्र्सवादी आलोचकों में वागर्थ प्रतिपत्ति या शब्दार्थ मीमांसा पर शायद ही कोई दूसरा इतना बल देता होगा। इससे आलोचना में एक प्रामाणिकता आती है।18
उनकी आलोचना-पद्धति में विश्लेषण का बडा महत्त्व है। उन्होंने अपनी आलोचना में रचनाकार के युगीन परिवेश, ऐतिहासिक दायित्व, युगबोध एवं रचना शिल्प के वैशिष्ट्य को विशेष महत्त्व दिया है। पिछली पीढी के माक्र्सवादी आलोचकों ने जहाँ विषयवस्तु को ही महत्त्व दिया है, रूप-शैली-शिल्प को उसके अधीन माना है, वहाँ नामवर सिंह ने क्लिन्थ ब्रुक्स और एलेन टेट की मान्यताओं के अनुरूप नयी समीक्षा पद्धति को अपनाते हुए अपनी आलोचना पद्धति में रूप-शिल्प को पर्याप्त महत्त्व दिया है, जिससे माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्र समृद्ध है।19 डॉ. कमला प्रसाद के मतानुसार नामवर सिंह की आलोचना-पद्धति पर कॉडवेल, लूकाच, गोल्डमान, ग्राम्शी व मार्खेज का प्रभाव है। बकौल सत्यप्रकाश मिश्र माक्र्सवादी सौन्दर्यशास्त्र को लचीला बनाने का उनका प्रयत्न स्वयं माक्र्सवादी लेखकों द्वारा ही निन्दा का विषय रहा है। जडीभूत सौन्दर्याभिरुचि की तुलना में सहज और सपाट का पक्ष लेकर उन्होंने जिस परम्परा को अग्रगामिता प्रदान की उसके खतरों से भी वे अवगत हैं। इस दृष्टि के कारण वे निरन्तर अपने को काटते रहते हैं जिसके प्रमाण सर्वत्र मिलेंगे। इससे उनकी आलोचना भी हत्या से उत्पन्न होकर आत्महत्या की ओर ही बढती है लेकिन फिर सृजनशीलता भी तो यही है।20
सही अर्थों में आलोचक वह है, जिसके पास लोचन हो-ऐसा लोचन जिसमें अप्रत्यक्ष और अदृष्ट को देखने की क्षमता हो। आधुनिकताबोध और माक्र्सवाद की जमीन में लगातार संवाद करते हुए नामवरजी आजीवन हिन्दी का स्वरूप सँवारते रहे। उनमें वैचारिक जडता नहीं थी। उनकी रचना-प्रक्रिया के लिए वैचारिक उत्तेजना हमेशा अनिवार्य रही है। उनकी तथ्यपरक, समावेशी और जनपक्षधरता से युक्त आलोचना आज के सन्दर्भ में भी बेहद प्रासंगिक है। सन् 1950 से लेकर 2000 तक के पचास साल का दौर अगर किसी एक व्यक्ति के नाम से जाना जाएगा, तो वो है नामवर सिंह। क्योंकि इन पाँच दशकों के दौरान हिन्दी समाज में शायद ही कोई संवाद, प्रतिवाद या विवाद ऐसा हुआ है जिससे नामवरजी का प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्बन्ध न रहा हो। मैं उस भविष्यद्रष्टा शायर को प्रणाम करता हूँ जिसने नामवरजी को 20-22 की उम्र में ही उनकी प्रतिभा को देख आश्चर्य से कहा था- नामवर नामवर है क्या कहना!
सन्दर्भ :
1- चतुर्वेदी रामस्वरूप, हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, पृ. 261।
2- सिंह नामवर, अपना पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे..., वीणा, जून 2019, पृ. 07।
3- शर्मा सियाराम, नामवर की आलोचना दृष्टि, साक्षात्कार, अप्रैल-जूल 2019, पृ. 120।
4- त्रिपाठी विश्वनाथ, हक अदा न हुआ, वसुधा, अंक 54, पृ. 495।
5- वाद विवाद संवाद, फ्लैप से उद्धृत ।
6- सिंह नामवर, पाखी-34, अक्टूबर 2010, पृ. 205।
7- सिंह नामवर, पाखी-34, अक्टूबर 2010, पृ. 206।
8- शास्त्री त्रिलोचन, पूर्वग्रह, अंक 44-45, कवि नामवर सिंह, पृ. 53।
9- सिंह केदारनाथ, पहल-34, 1998, पृ. 47 व 51।
10-सिंह नामवर, वाद विवाद संवाद, पृ. 23।
11-वही, पृ. 22 12- वही, पृ. 23।
13-सं. अखिलेश, तद्भव-3, पृ. 11
14-वही, पृ. 10।
15-वही, पृ. 10।
16-सिंह नामवर, कविता की जमीन और जमीन की कविता, भूमिका, पृ. 07।
17-सिंह नामवर, साहित्य और विचारधारा, पृ. 16।
18-सिंह बच्चन, हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, पृ. 512।
19-रोहिताश्व, बहुवचन, अंक-19 पृ. 19-20।
20-मिश्र सत्यप्रकाश, कृति विकृति संस्कृति, पृ. 281।

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सम्पर्क - सी-100, विश्वविद्यालय परिसर
डॉ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय
सागर, मध्यप्रदेश-470003