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कुँवर नारायण का काव्य दर्शन

मंगलम कुमार रस्तोगी
साहित्य और दर्शन दोनों ही ज्ञान के सर्वाधिक प्राचीन अनुशासन हैं। साहित्य जहाँ समाज की अभिव्यक्ति है, वही दर्शन उसके विकास और ज्ञान का परिचायक। दर्शन जीवन की अध्यात्मिकता और रहस्य का अवलोकन करता है, वहीं साहित्य उसकी संसारिकता को दर्ज करता है। काव्यमीमांसा के अनुसार वांङमय अथवा साहित्य के दो प्रकार हैं- शास्त्र और काव्य। शास्त्र के दो प्रकार हैं, पौरुषेय और अपौरुषेय। चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के अतिरिक्त इतिहासवेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद और आयुर्वेद को उपवेद के अंतर्गत शास्त्र के विभाग में रखा गया है और काव्य को गेयवेद अथवा द्रौहिणि के अनुसार वेदोपवेदात्म्क सार्ववह्यर्णिक और भरतमुनि के अनुसार पंचमवेद अथवा सार्ववर्णिक कहा गया है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंदोंविचिति और ज्योतिष इसे सबसे प्राचीन ज्ञान का अनुशासन माना गया। इसके अतिरिक्त अलंकार को ज्ञान का सातवाँ अंग माना गया। इसमें वेद और वेदांग आदि दर्शन के अंग बने और अलंकार, व्याकरण, छंदोंविचिति आदि साहित्य के अंग बने। काव्य के उत्पत्ति के बारे में रोचक आख्यान वेदों में मिलता है। काव्य का पहला नियंता जन्म लेते ही अपनी माता सरस्वती के वंदना में कहता है,
यदेतद्वांगमयं विश्वमथ मूर्त्या विवर्तते।
सोसिस्म काव्यपुमानम्ब पादौ वन्देय तावकौ।।
(ऋग्वेद 3/8/10/2)
अर्थात् जो शब्दरूपी संसार मूर्तिमान होकर वर्तमान में मौजूद है, वही काव्यपुरुष मैं हूँ। हे माता मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। इसके बाद सरस्वती काव्यपुरुष का वर्णन करती हैं। उनके अनुसार शब्द और अर्थ शरीर है, संस्कृत मुँह, प्राकृत बाहु, अपभ्रंश जाँघ, पैशाच पैर, मिश्र भाषा वक्ष, रस आत्मा, छंद लोम और प्रश्नोत्तर और पहेली इत्यादि खेल, अनुप्रास और उपमा इत्यादि तुम्हारे गहने हैं।-
चत्वारि श्रृंगारस्त्रयोस्स्य पादा द्वे शीर्षे सप्तहस्तासोस्स्य।
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्या आविवेश।। (ऋग्वेद 3/8/10/3)
इसके बाद काव्यपुरुष की प्रतिष्ठा करते हुए उशनश ऋषि सुभाषित की कामधेनु से काव्य की तुलना करते हैं।
या दुग्धासिप न दुग्धेव कविदोग्धृभिरन्वह्म।
हृदि नः संनिधत्ताम सूक्तिधेनुः सरस्वती।।
सरस्वती के कृपा से आदिकवि वाल्मीकि को इसी काव्यपुरुष की खोज में मदद के लिए छंदोमयी वाणी का वरदान मिला और वाल्मीकि से निम्नोक्त श्लोक सृजित हुआ।
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधोः काममोहितं ।।
इस प्रकार हमारे यहाँ काव्य की परम्परा निर्मित करते हुए, एक दार्शनिक आधार देने की कोशिश हमारे वांङमय में मौजूद है।
पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्रांगमिश्रिताः।
वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश।।
(याज्ञवल्क्य)
(शास्त्र के सभी विद्यास्थानों का एक-मात्र आधार काव्य है- जो वांङमय का द्वितीय प्रभेद है। काव्य को ऐसा मानने का कारण यह है कि यह गद्यपद्यमय है, कविरचित है और हितोपदेशक है। यह काव्य शास्त्रों का अनुसरण करता है।)
चूँकि साहित्य समाज की सभी क्रिया-प्रतिक्रियाओं, आचारों-व्यवहारों, विकास-पतन और ज्ञान का संवेदनात्मक अंकन है अतः वह समय-समय पर मिथक, इतिहास और दर्शन को भी अपना विषय बनाता रहा है। दर्शन ने अपने इस समकालीन शाखा को समझने और उसे विकसित करने में भी महत्त्पूर्ण भूमिका निभाई है।
सभी भारतीय दर्शनों का उत्स तीन प्रश्नों में निहित है- 1. मैं कौन हूँ? 2. यह जगत क्या है? और 3. परमात्मा (ब्रह्म) क्या है? इन्हीं तीन प्रश्नों का उत्तर खोजने में विभिन्न दार्शनिक अवधारणाओं ने जन्म लिया है। नास्तिक दर्शनों को छोड दें, तो ब्रह्म के निर्गुण और आत्मा-परमात्मा के अद्वैत का मार्ग ज्ञान-मार्ग है, ऐसा सभी दर्शनों ने स्वीकार किया है। अहं ब्रह्मास्मि, तत्वमसि, अनलहक की प्रतीति ज्ञान मार्ग से ही संभव है। ज्ञान इस हद तक चरम है कि ईश्वर को ही ज्ञान कह दिया गया। ज्ञानमार्ग की सूक्ष्मता, एकांतिकता और साधना-पद्धति की जटिलता के कारण धर्म-मार्ग के लौकिक प्रसार की सीमित सम्भावना के मनोविज्ञान को ही दार्शनिक स्थापनाओं में तब्दील कर दिया गया। तत्वतः दर्शन सम्मत सभी प्रतिपत्तियाँ ज्ञान को माध्यम बनाती हैं। अहं ब्रह्मास्मि साहित्य में रूपांतरित होकर सर्वं खुल इदं ब्रह्म अथवा शिवोऽहम में बदल जाता है, जहाँ अहम् के विघटन द्वारा उदात्त जीवन की प्रतिष्ठा संभव है। साहित्य का प्रयोजन भी शिवेत्तर क्षतये, व्यवहारविदे, सद्यःपरनिर्वतये का उत्स भी दर्शन के उत्स में समाहित है। जिस पुरुषार्थ प्राप्ति का सर्वोच्च लक्ष्य भारतीय आस्तिक दर्शन में निहित है, उसे काव्य के माध्यम से भी प्राप्त किया जा सकता है। विश्वनाथ कविराज के मत के अनुसार, काव्य से चारो पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
साहित्य और दर्शन दोनो ही जीवन के प्रश्नों से सूक्षम अर्थों में जुडती हैं। जीवन से गहरे लगाव के फलस्वरूप अभिव्यक्ति से साहित्य और चिंतन से दर्शन उत्पन्न होता है। साहित्य अपने उदात्त अर्थों में दर्शन की ऊँचाई को प्राप्त होती है, वहीं दर्शन लोकधर्मी होने के लिए अपने को साहित्य में व्याख्यायित करता है। दर्शन की प्रकृति जटिल, तो साहित्य की प्रकृति सहज होती है। अंततः साहित्य और दर्शन दोनों का अंतिम लक्ष्य मनुष्य ही है। कुँवर नारायण कविता के संदर्भ में लिखते हैं- कविता और कविता की रचना-प्रक्रिया गहरे रूप से जीवन के समूचे संदर्भों से जुडी है। यह संबंध सहज और सीधा हो सकता है, जटिल और कल्पनाशील भी। ... विज्ञान, यहाँ तक कि साहित्य-शास्त्र की भाषा में बात करने की तुलना में यदि हम जीवन के रूपकों की भाषा में कविता के बारे में बात करते हैं, तो अचानक से कविता का बेहद नाजुक और संवेदनशील मर्म अधिक सुगम हो सकता है। संस्कृति, इतिहास, मिथक-शास्त्र और समकालीन यथार्थ जैसी विविधताएँ किस प्रकार कविता में विशिष्ट और निजी बनकर आती हैं-किस प्रकार कविता में वे भावात्मक एकत्व पा लेती हैं और हम सब के भीतर की उच्चतम मानवीयता को संचालित करने में मदद करती हैं।
रोग, जरा और मृत्यु का भय मानव मन की प्रारंभिक चिंताएँ रही हैं। यह सदियों पुरानी खोज रही है कि क्या इनसे मुक्ति संभव है? भारतीय चिंतन परम्परा के आस्तिक और नास्तिक दोनों ही दर्शनों की यह चिंता साझी रही है। एक ओर आस्तिक दर्शन सद्-चित्त्-आनंद में इसका हल खोजते हैं, तो दूसरी तरफ नास्तिक दर्शन भौतिकता की तरफ जाते हैं। कुँवर नारायण अपनी रचनाओं में यहीं से उपजीव्य ग्रहण करते हैं और उनका रचनाकार मन दार्शनिक चिन्तनों को अनायास ही रचना के केंद्र में ला देता है। कुँवर नारायण का आरंभिक समय इसी चिन्तन में बीता है। रोग, जरा और मृत्यु को उन्होंने बहुत नजदीक से देखा है। वे लिखते हैं-चौथे दशक की शुरुआत में किसी दिन मृत्यु का प्रश्न मेरे लिए एक बडी सच्चाई में बदल गया, जब मैंने अपने परिवार में यक्ष्मा से होने वाली कई मौतों को बिलकुल पास से देखा और सदमा पहुँचा देने वाले अनुभवों से गुजरा। कुछ समय के लिए एक भयानक आशंका से घिर गया कि शायद मैं भी इस बीमारी की चपेट में आ चुका हूँ। यही वजह रही है कि कुँवर नारायण आत्मपरक उपनिषद्कालीन तत्त्वों को परम्परा रूप में और वस्तुवादी दृष्टिकोण को आधुनिकता के बरक्स अपनाते हैं। जहाँ इनकी कविता परम्परा और संस्कृति से अनुप्राणित है, वहीं उसके सरोकार समकालीन वैचारिकी और सृजन पद्धति से युक्त है। इससे कविताओं का शिल्प क्लासिकल रचना की ओर और कंटेंट कविता की शर्तों पर दार्शनिक गंभीरता की ओर उन्मुख हो जाता है। यहाँ दार्शनिक चेतना कविता को बृहत्तर आयाम देती है। शिल्प के स्तर पर वे भारतीय चिंतन परम्परा से विकसित अद्वैत दर्शन और औपनिषदिक दर्शन की तरफ जाते हैं वही कविता में संवाद और अन्तः-क्रिया का सम्बन्ध बौद्ध दर्शन से लेते हैं। तत्वमीमांसा के प्रभाव को लेकर वे लिखते हैं-जीवन का एक तीव्र, उत्कट बोध और भीतर तक तोड देने वाला मृत्यु का भय- अक्सर सर्जनात्मकता से जुडे हुए दो अंतर्विरोधी भावों की तरह रहे हैं, काव्योचित और अन्यथा भी। जीवन की अ-नित्यता के संतुलन और उदात्तीकरण के प्रयास में मनुष्य ने जीवन के स्थायी प्रतीकों के निर्माण का उपऋम किया है और आत्म के छुपे हुए उर्जा-केन्द्रों की छान-बीन की है- एक ऐसा प्रसंग जो आत्मजयी की रचना करते हुए निजी तौर पर मर्म को छू लेने वाला था। इसे संयोग कहें या प्रेरणा कि प्राचीन उपनिषदों में से एक कठोपनिषद के नचिकेता के मिथक में इसके प्रतिफलन ने मुझे आकर्षित किया। मुझे नहीं मालूम कि अपने विनम्र अभिप्रायों में आत्मजयी कहाँ तक सफल रही, लेकिन समकालीन जीवन, आत्म (सेल्फ) और कविता के संदर्भ में भारतीय तत्वमीमांसा का अध्ययन (सामान्यतः तत्वमीमांसीय मनोवृतियों का) मेरे लिए एक रोचक अनुभव रहा है। यही वजह है कि कुँवर नारायण मिथकीय चरित्र अथवा पौराणिक अतीत को जीवंत स्मृतियों का साझेदार मानते हैं। उनके अनुसार पौराणिक अतीत केवल हमारी स्मृतियों का हिस्सा नहीं है, वह बहुत कुछ आज भी हमारी मानसिकता ने ‘प्रतीक’ रूप से जीवित और सक्रिय है। इन प्रतीकों और स्मृतियों के माध्यम से जनमानस तक पहुँचने की एक सशक्त और सांकेतिक भाषा हमारे अवचेतन में पहले से ही मौजूद है। कविता इस ‘भाषा’ में दूसरों से बात कर सकने की एक कला है। यह रोजमर्रा की व्यावहारिक भाषा का निषेध नहीं, उसका समय के एक बडे आयाम में विस्तार है।...इनमें हम जीवन के सारतत्व और उसकी असारताओं के अनंत जीवन-नाटक को पढते और देखते हैं।
कुँवर नारायण के काव्य आत्मजयी और वाजश्रवा के बहाने में दार्शनिकता के लिए कठोपनिषद का प्रसंग लिया गया है जहाँ नचिकेता एक असहमति का, एक अलग बौद्धिक स्वायत्तता का जिसके लिए हमेशा औपनिषदिक दर्शन में गुंजाईश रही है, प्रतीक है। वहीं कुमारजीव में कुमारजीव जीवन की उत्कट आकांक्षा का प्रतीक है, जिसका जीवन दर्शन बौद्ध दर्शन से अनुप्राणित है। कुँवर नारायण के काव्य में मृत्यु विषयक विवेचन की वजह से अस्तित्ववाद का भी प्रभाव दीखता है। मुमुक्षु नचिकेता अथवा संघर्षरत कुमारजीव के यहाँ अस्तित्व के प्रश्नों की गहरी जाँच पडताल है और यहीं अस्तित्ववादी दर्शन के वे सूत्र खुलते हैं जो इनकी कविताओं को वैचारिक स्वरूप प्रदान करते हैं। स्त्रोत, मुक्ति और त्राण यह सभी आदमी के अंदर ही हैं जिन्हें वह बाहरी दुनिया में तलाशता है। अतः सबसे प्रमुख स्वयं का अस्तित्व है जो कि सारे रहस्यों के सूत्रों को समाहित किए है, इस अस्तित्वबोध के बिना बृहत्तर प्रश्नों का समाधान संभव नहीं। कवि की सुचिंतित दृष्टि किसी तरह के धार्मिक निष्कर्षों का सहारा लेने के बजाय पूरी तरह दार्शनिक आशयों से जीवन मृत्यु सम्बन्धी गुत्थियों को सुलझाने का यत्न करती है। कुँवर नारायण अपनी रचनाओं में लगातार दार्शनिक प्रश्नों से जूझते रहे हैं, वे अपनी रचनाओं में दार्शनिक प्रश्नों के माध्यम से कथ्य रूप में विचार, उन विचारों के पीछे चिंतन, और उससे जुडे व्यक्तिगत प्रश्नाकुलता से मनुष्य के अस्तित्व की शाश्वत समस्याओं से सम्बद्ध हैं।
कुँवर नारायण अपनी पहली ही कृति चक्रव्यूह में वैचारिक सघनता और आत्ममुक्ति के लिए कविमन की बेचैनी का संकेत दे देते हैं।
यही चाहा प्रश्न हो संसार
जिसका एक अपने ढंग का मैं बन सकूँ उत्तर
खंडहरों-सी पितर इतिहास की लोना लगी काया
ग्रहण कर पुर्णतः अपनी परिस्थिति में
उसे फिर दे सकूँ
कोई नया आकार
इसी प्रश्नाकुलता का विकास बाद में उनके खंडकाव्यों आत्मजयी, वाजश्रवा के बहाने और कुमारजीव में दिखाई पडता है। ये रचनाएँ भौतिकता के बरक्स आत्मवत्ता को स्थापित करती हैं। रचनाकार हरेक घटना को अपने युग सापेक्ष देखने में विश्वास करता है जिसकी कोई अर्थवत्ता हो। वह अपने अकेलेपन को भी एक नया संदर्भ देता है।
हर व्यक्ति
अपनी सृष्टि के सारांश में
अणुवत अकेला है
उसे संदर्भ देना है।
कुँवर नारायण की कविताओं में विचारों की एक लोकतांत्रीकरण है। वे कई बार परम्परावादी भी लग सकते हैं, तो आधुनिक भी। वे माक्र्सवादी विचारों के विरोधी भी हो सकते हैं, तो कई जगह उसके समर्थक भी। प्रायः उन्हें माक्र्सवाद विरोधी और अस्तित्ववादी दर्शन के समर्थक के रूप में देखा गया है, लेकिन वे हर बार इन सीमाओं को तोड देते हैं। विचारधारा के संदर्भ में उनकी एक पुस्तक और कविता दोनों का शीर्षक है तट पर हूँ तटस्थ नहीं तब हम समझ सकते हैं कि वे विचार के प्रति कितने प्रतिबद्ध हैं। उनकी वैचारिक आवाजाही हो न सीमायें न दूरियों के खाँचे में ही देखा जा सकता है। उनके दर्शन सम्बन्धी विचार को अरुंधति सुब्रमण्यम को दिए गये साक्षात्कार में देख सकते हैं। गाँधी दर्शन में मुझे एक सक्रिय नैतिक क्रांति दिखाई देती है। बुद्ध के विश्व दर्शन और गाँधीवादी विचार व्यव्हार में काफी समानताएँ हैं। क्रांति के हिंसक साधन अनगढ भावोतेजनाओं की खूनी विस्फोट हैं। अहिंसक क्रांति एक अटल और दृढ नैतिक बल की माँग करती है और इसका सर्वोत्तम दृष्टान्त हमें ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध गाँधी के प्रतिरोध में देखने को मिलता है। बौद्ध दर्शन जैसा की आप मेरी कविताओं में पाएंगे, आस्था के कारण उतना नहीं, जितना की लम्बे समय से स्वयं को अस्तित्व में बनाए रखने के कारण मुझे आकृष्ट करता है। इसके अस्तित्व की गहरी जडें बीहड संयम और समायोजन की इसकी क्षमता में निहित है न की इसकी रुढिवादी प्रवृति में। भारत और मध्य एशिया में विकसित और संवर्धित बौद्ध दर्शन के विभिन्न सम्प्रदायों पर एक सरसरी निगाह दौडाई जाए, तो हमें करुणा और संवेदना के इस दर्शन में एक अद्भुत लचीलापन देखने को मिलेगा। मानवतावाद वह विराट बिंदु है, जहाँ मानव कल्याण से जुडी तमाम विचारधाराएँ अक्सर मिलती हैं और अपनी कविताओं में मैंने इस बिंदु को हमेशा ध्यान में रखा है।
कुँवर नारायण की कविताओं की चिंता कविकर्म को मानवीय प्रयोजन से निरपेक्ष करके देखने की नहीं है। कल्पना, अनुभूति, संवेदना, विचार और भाषा के समस्त उपक्रम कवि की दृष्टि में मानव नियति के प्रति वैचारिक संवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं को रूप देने के साधन मात्र हैं। कवि का काव्य अनुभववाद से आगे दार्शनिक आधार पर टिका है, पर दार्शनिकता भी यहाँ ठोस मानवीय स्थितियों से ही जुडी हुई है। जो जीवन के प्रति विश्वास जगाती है और हर अगले कर्म के प्रति संकल्पित और आस्थावान बनती है इस आस्था और संकल्प को हम कुँवरजी कि निम्न पंक्तियों में देख सकते हैं-
अबकी अगर लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूँगा!
कुँवर नारायण के अन्य संग्रह इतना सब असमाप्त की भूमिका लिखते हुए कुँवरजी की पत्नी भारती नारायणजी ने कुँवर नारायण की कविताओं के स्वर और कुँवर नारायणजी की मनःस्थिति को ठीक ही लक्ष्य किया है। वे लिखती हैं-जैसे कि एक प्रेम-भाव की निरंतरता; बढती उम्र और मृत्यु के ख्याल; और बिगडते समाज की चिंता। इन सबके बीच से निकलती हुई एक दूरदृष्टि और दर्शन भी इन कविताओं में है। पूरे संकलन में एक खास तरह की प्रबुद्ध उदासी का भाव है। कुँवर नारायण हमेशा अपनी बात बहुत धीमे स्वर में, लेकिन पूरी स्पष्टता और साहस से कहते रहे हैं। उनके व्यक्तित्व में जो सादगी, संवेदनशीलता और सौम्यता है, वह उनकी कविताओं में भी परिलक्षित होती है।
कुँवर नारायण के काव्य में जिस दर्शन अथवा दूरदृष्टि को भारतीजी लक्षित कर रहीं हैं, वह किसी भारतीय दर्शन की स्थापनाओं का काव्यात्मक रूपंतारण नहीं है, दरअसल कुँवरजी अपनी कविता के फलक को इतना विस्तृत कर देते हैं कि वह कविता और दर्शन के बीच आवाजाही का एक माध्यम बन जाता है। कुँवर नारायण भारतीय और पाश्चात्य दर्शन के मूल्यों की स्थापना नहीं करते, बल्कि वे वहाँ से उन दार्शनिक स्थापनाओं के सत्व को लेकर कविता में पिरोते चलते हैं। कुँवरजी अक्सर कविता के लिए जो शिल्प लेते हैं वह बौद्ध विचार सरणी का और अंतर्वस्तु अमूमन अद्वैत विचार सरणी का होता है। यहाँ अद्वैत या बौद्ध दर्शन की स्थापनाओं का कविता में पुनर्प्रकटन नहीं एक कृतज्ञता बोध भर है। आत्मजयी अथवा वाजश्रवा के बहाने की चिंताओं में औपनिषदिक दर्शन की संरचना की वजह से अद्वैत की स्थापनाओं का और कुमारजीव में बौद्ध पृष्ठभूमि के वजह से इस बात को लक्षित किया जा सकता है, किन्तु उनके स्वतंत्र कविताओं में इस तरह के दार्शनिक स्थापनाओं को खोजना दुर्लभ है। इतना सब असमाप्त की दार्शनिक अभिव्यक्ति आत्मजयी, वाजश्रवा के बहाने या कुमारजीव जैसी स्पष्ट नहीं है, बल्कि इन कविताओं की दार्शनिकता अन्तःप्रवाहित होने वाली चीज है, जो विचारों की दार्शनिकता है। इन सब में कुँवरजी दार्शनिक कवि नहीं, बल्कि कविता को दर्शन की धरातल पर ले जाने वाले कवि के तौर पर उभरते हैं। मेरा शुरू से मानना रहा है कि कुँवरजी अपनी परम्परा में ऐसी आधुनिकता के पक्षधर रहे हैं जो अपनी परम्परा से आधुनिकता के साथ करते रहे हैं, वे अपने सत्य की खोज में दर्शन तक जाते हैं, इसलिए वे दार्शनिक धरातल के कवि लगने लगते हैं। उनकी कविता में गाँधी, बुद्ध और कबीर की स्थिति निरंतर संवाद की स्थिति है। आत्यंतिक रूप से देखें, तो कुँवर नारायण का अद्वैत दो पीढियों के बीच परस्पर संवाद और उससे एक स्वस्थ संबंध बना कर उसके सामजस्य को साथ लेकर चलने का जद्दोजहद है। इतना सब असमाप्त की कविताएँ यही कोशिश करती हैं। इसे ठीक ही फ्लैप पर रेखांकित किया गया है, कुँवर नारायण किसी भी कीमत पर कविता की भूमिका को सीमित करके नहीं देखा। उन्होंने प्रतीकात्मक लहजे में कहा है कि मैं कभी भी अपनी कविताओं का अंत नहीं लाना चाहता। उस जीवंत नाते को बनाए रखना चाहता हूँ जिसे अंत समाप्त कर देता है। वे हमेशा अनंतिम कविताएँ लिखना चाहते थे, इसलिए अंतहीन भी अब इस स्वीकरोक्ति के आलोक में सम्पूर्ण भारतीय दर्शन परम्परा का रेखांकन को समझने की कोशिश कीजिए, जो नेति-नेति है और अनंतिम भी। आस्तिक दर्शन में भी और अनास्तिक दर्शन में दीये से दीये को जलते रहने की निरंतरता में भी इसकी व्याख्या समाहित है। अंत में कुँवर नारायण की दार्शनिकता उनकी कविता राग भटियाली से समझा जा सकता है। यह कविता न केवल राग भटियाली के स्वरूप को व्याख्यायित करता है, बल्कि मनुष्य के मुक्ति की बैचैनी को, कुँवर नारायण की काव्य जिजीविषा को और उनमें व्याप्त दार्शनिकता को भी स्थापित करती है। कविता के पूर्वार्ध में राग का स्वरूप है तो उत्तरार्ध में बेचैनी और मुक्ति की आकांक्षा का महाख्यान भी। कविता है-
एक राग है भटियाली
बाउल संगीत से जुडा हुआ
अनंतिम स्वर को खुला छोड दिया जाता है
वायुमंडल में लहराता हुआ
जैसे सम्पूर्ण जीवन राग से युक्त हुई एक ध्वनि
अनंत में विलीन हो गई...
वह शेष स्वरों को बाँधता नहीं
इसलिए अंत में भी
उनसे बँधता नहीं,
अनंतिम आह जैसा कुछ
एक अजीब तरह की मुक्ति का
एहसास देता है वह...

संदर्भ
महामहोपाध्याय गंगानाथ झा, कवि-रहस्य, पृ. 14.
वही, पृ. 15.
वही, पृ. 16.
वही पृ. 15.
वही पृ. 11.
काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेत्त्रक्षतये ।
सद्यः परनिर्वृतये कान्ता-सम्मितयोपदेशयुजे ।।
- आचार्य मम्मट
चतुर्वर्गफल-प्राप्तिः सुखावल्पधियामपि ।
काव्यादेव यतस्तेन तत्स्वरूपं निरूप्यते।।
-आचार्य विश्वनाथ कविराज
पक्षधर-18, सं. विनोद तिवारी, पृ.-22
वही, पृष्ठ सं.-24
वही, पृष्ठ सं.-24
कुँवर नारायण, कुँवर नारायण उपस्थिति, पृ.- 10.
कुँवर नारायण, आत्मजयी, पृ.- 12
कुँवर नारायण, आत्मजयी, पृ.- 12
कुँवर नारायण, तट पर हूँ तटस्थ नहीं, पृ.- 51
कुँवर नारायण, कोई दूसरा नहीं, पृ.-9
नारायण कुँवर, ‘सब इतना असमाप्त’, पृष्ठ 6
वही, फ्लैप से
वही, पृष्ठ 104

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