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वे हमारे बीच हैं न

ओम थानवी
मुकुंद लाठ नहीं रहे। अस्वस्थ चल रहे थे। अचानक चले गए। शायद अचानक भी नहीं।
मैंने बहुमुखी प्रतिभा के ऐसे महापुरुष कम ही देखे होंगे। महापुरुष सोच-समझ कर कह रहा हूँ। वे विद्वान थे। मगर उनके ज्ञान में अहंकार नहीं था, जिसका विलय सिद्ध पुरुषों के ही बस में होता है। उनकी मुसकान दिव्य थी, कुछ पुलकित कुछ रुकी-रुकी-सी। स्नेह और करुणा उनकी आँखें प्रकट करती थीं, शब्द नहीं। सौम्य भी। सौजन्य भी। न उनमें स्वार्थ देखा, न उठक-पछाड भरी महत्त्वाकांक्षा।
मुकुंदजी के किन-किन पक्षों की बात करूँ। वे संस्कृत और प्राकृत के विद्वान थे। शोध और विवेचन की किताबें भले अंगरेजी में लिखीं। पर बाद में हिंदी के हो रहे। वे हिंदी के कवि ही नहीं थे। शिक्षक और विचारक थे। इतिहासकार थे। दार्शनिक और सौंदर्यशास्त्री थे। कलाकार और संगीतज्ञ थे; पंडित जसराज - जो मुकुंदजी के पीछे-पीछे दुनिया छोड गए - से गुरु-शिष्य परम्परा में उन्होंने शास्त्रीय गायन की दीक्षा ली थी। संगीत के अध्ययन के चलते उन्होंने पंडितजी के साथ समूचे उत्तराखंड की पदयात्रा भी की थी।
उनकी कविताएँ अच्छी थीं, पर मैं उनके गद्य का कायल रहा। गहन विषयों पर, या संगीत और कला जैसे सहज विषयों पर, उनकी भाषा अपेक्षया सरल और आत्मीय रहती थी। कभी-कभी उनमें में वे बातचीत की मुद्रा भी अपना लेते थे। लय तो, शायद संगीत से चलकर, उनके व्यक्तित्व में ढलते हुए गद्य-पद्य से लेकत वाच्य तक सब में समा गई थी।
कला के वे गहरे पारखी थे। खासकर चित्रकला के। उनका घर - घर का नाम उन्होंने घर ही रखा - कला का अनूठा संग्रहालय बन गया। यामिनी रॉय और गणेश पाइन के वे खास मुरीद थे। दोनों की अनेकानेक कृतियाँ उनके यहाँ शोभित थीं। वास्तुकला से होते हुए वस्त्रविन्यास तक भी उनकी रुचियाँ बडी प्रत्यक्ष थीं। सिर से पाँव तक वे बौद्धिक और कलाकार एक साथ लगते थे।
उनसे पहले-पहल परिचय अस्सी के दशक में हुआ। वे राजस्थान विश्वविद्यालय के भारतीय इतिहास और संस्कृति विभाग में जैन अध्ययन केंद्र के प्रभारी थे। कोलकाता से प्रो. दयाकृष्ण के बुलावे पर आए थे। छत्तीस की उम्र थी। उस वक्त गोविंदचंद्र पांडे राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति थे, जिनसे दयाजी की घनिष्ठता थी। उनके सुझाव पर पांडेजी ने डॉ लाठ को अपने साथ जोडा।
मुकुंदजी का पठन-पाठन शुरू से रोचक रहा। यादवपुर विश्वविद्यालय से अँगरेजी में बीए किया। संस्कृत में एमए। संगीत-ग्रंथ दत्तिलम पर शोध। और इतिहास-संस्कृति विभाग में अध्यापन। लेकिन मन सबसे *यादा रमा रस-मीमांसा में। साहित्य, संगीत, नाट्य, कला आदि पर उनके निबंध जयपुर में लिखे गए।
उसी दौर में जयपुर में दार्शनिक यशदेव शल्य भी बहुत सक्रिय थे। मैंने बीकानेर से जयपुर आकर इतवारी पत्रिका में काम शुरू किया। यशदेव शल्य जी से लिखवाने में मुझे सफलता मिली। हालांकि अखबार के लिहाज से उनका लेखन गरिष्ठ था। पर हमारे साप्ताहिक की खूबी यही थी कि राजनीतिक घटनाक्रम और सांस्कृतिक परिदृश्य दोनों का संतुलन बिठा लेते थे।
शल्यजी दर्शन प्रतिष्ठान की पत्रिका उन्मीलन का संपादन करते थे। मुकुंदजी शल्य के साथ पत्रिका के संपादन से जुड गए।
दयाजी, शल्यजी और मुकुंदजी की त्रयी ने शहर में बौद्धिक परिवेश को खास गरिमा दी। यों प्रकृति और विद्वत्ता में डॉ पांडे इस समूह से एकाकार होते, पर कुलपति पद को सम्भालते समूह की गतिविधियों से उनका शायद राब्ता नहीं बैठा। दयाकृष्णजी के नेतृत्व में जयपुर संवाद का सिलसिला चलता था। वे प्रचार के लिए किए जाने वाले छिटपुट आयोजन नहीं थे। गंभीर और सुदीर्घ संवाद। दयाजी के साथ मुकुंदजी के लम्बे वार्तालाप का स्मरण है। वह शायद पुस्तक-रूप में छपा था।
(दयाजी के साथ) मुकुंदजी के प्रति मेरे मन में आदर का एक संबंध अज्ञेयजी के कारण भी जुडता था। मुकुंदजी भी अज्ञेय की कविताओं के मुरीद थे। शायद दयाजी ने उन्हें अज्ञेय से जोडा हो। अज्ञेय से दयाजी के करीबी रिश्ते थे। अज्ञेय राजस्थान विश्वविद्यालय के अतिथि गृह में रुकते, जहाँ सामने ही दयाजी का घर था।
दयाकृष्णजी और मुकुंदजी ने अज्ञेय को साहित्य के संदर्भ में काल और दिक पर विश्वविद्यालय में व्याख्यानों की एक श्ाृंखला के लिए राजी किया। शायद चार व्याख्यानों में अज्ञेय ने अपनी बात पूरी की। प्रो. एजी स्टॉक की स्मृति में वे व्याख्यान अँगरेजी में थे। ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय प्रकाशन से वे व्याख्यान छपे; बाद में संवत्सर नाम से आई अज्ञेय की कृति उन्हीं व्याख्यानों का विस्तार थी।
अज्ञेयजी से मेरा भी निजी संबंध जयपुर में रहते पनपा। नंदकिशोर आचार्य ने लखनऊ में आयोजित पहले वत्सल निधि शिविर के लिए मेरा नाम प्रस्तावित किया था। जयपुर से संजीव मिश्र भी गए, जो बाद में इतवारी में मेरे सहयोगी हुए। कुछ समय बाद जयपुर में वत्सल निधि के आयोजन हीरानंद शास्त्री व्याख्यानमाला में डॉ आनंद कृष्ण बोले। कृपाल सिंह शेखावत और प्रेमचंद विजयवर्गीय अतिथि थे। सूचना केंद्र में उस कार्यक्रम की स्थानीय देखरेख नीरजा लाठ ने की थी। आगे के निधि द्वारा शिमला में आयोजित एक शिविर में मुकुंदजी ने शिरकत की। उन्होंने अज्ञेय की कविताओं पर भी विस्तार से लिखा है।
संगीत और संस्कृति मेरी पसंदीदा किताब है, जो संगीत नाटक अकादमी ने प्रकाशित की थी। उनकी इच्छा थी कि रामकुमार की कोई कलाकृति आवरण पर रहे। प्रयागजी ने बात की। रामकुमारजी ने खुशी-खुशी एक कृति का चित्र दिया। उनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ रहीं, कर्म-चेतना के आयाम, धर्म-संकट, क्या है क्या नहीं है। प्राकृत से उन्होंने कल्पसूत्र का अँगरेजी में अनुवाद किया। ट्रांसफॉरमेशन ऐज क्रिएशन और द हिंदी पदावली ऑफ नामदेव (कालावार्त के साथ सहलेखन) भी प्रशंसित कृतियाँ हैं। पर सबसे चर्चित काम रहा हिंदी की संभवतः सबसे पुरानी आत्मकथा, व्यवसायी बनारसीदास की अर्धकथानक का विवेचन हाफ अ टेल। इस कृति के रेखांकन गणेश पाइन ने किए थे। पुस्तक की रूपसज्जा भी अद्भुत थी, जिसे अनूठे ग्राफकि कलाकार विनय जैन ने अंजाम दिया था।
वैसे संस्कृत तो उनकी दुनिया थी ही, उनका आत्यंतिक लगाव हिंदी साहित्य से भी कम नहीं था। उन्होंने लिखा भले *यादा नहीं, पर प्रेमचंद से लेकर युवा लेखकों तक को तन्मय होकर पढा। अज्ञेय के अलावा निराला, निर्मल वर्मा, यशदेव शल्य, रमेशचंद्र शाह आदि पर विस्तार से लिखा है।
जनसत्ता में रहते मुझे भी उनकी लिखी समीक्षाएँ प्रकाशित करने का अवसर मिला। उन्होंने धर्म और अध्यात्म पर भी लिखा है। बीकानेर में डॉ छगन मोहता से इस पर उनकी लम्बी बात भी हुई थी। पर अनौपचारिक रूप में ही। डॉ मोहता की स्मृति में उन्होंने मार्गी और देशी संगीत परंपरा पर व्याख्यान दिया।
अशोक वाजपेयी के संपादन में पूर्वग्रह में उन्होंने नृत्त, नाट्य, काव्य, रससिद्धांत आदि पर अनेक लेख लिखे। भारत भवन भी आते-जाते रहे। वाजपेयीजी से उनका संबंध अंत तक बना रहा। मुझे स्मरण है कि स्वास्थ्य के उतार-चढाव के बीच भी रजा न्यास की बडी संगोष्ठी में वे दिल्ली आए थे। निधन की खबर शाया होने पर न्यास के सदस्य-सचिव संजीव चौबे ने आयोजन के संभागियों की एक तस्वीर मुझे भेजी है।
रजा न्यास प्रसिद्ध कलाकार सैयद हैदर रजा के नाम से अशोकजी और मित्रों ने स्थापित किया। न्यास के लिए आखरिी दम तक रजा साहब ने चित्र बनाए। कुमार गंधर्व की स्मृति में एक व्याख्यानमाला शुरू हुई। उसका पहला व्याख्यान मुकुंदजी ने दिया, हमारी परम्परा हमारी आधुनिकता विषय पर। उस आयोजन में रजा साहब स्वयं मौजूद थे। मुकुंदजी द्वारा हिंदी में पुनर्रचित संस्कृत मुक्तकों के संग्रह स्वीकरण को गगनवट नाम से न्यास ने फिर से प्रकाशित करवाया। रजा पुस्तक माला में प्रकाशित भावन तो उनका संक्षिप्त समग्र ही है।
मेरे मित्र डॉ कमल नयन (शल्यजी के पुत्र) ने बताया कि अंतिम दिनों वे ऋग्वेद की ऋचाओं के भावानुवाद को पूरा कर रहे थे। अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त का अनुवाद वे पूरा कर चुके थे, जो प्रकाशक को दे दिया गया था।
असल विचारक वह होता है जो आपकी दृष्टि को आयाम दे। मुझे कई मामलों में मुकुंदजी के लेखन और वक्तव्यों से उलझी हुई धारणाएँ सुलझाने का मौका मिला है। एक उदाहरण देना मुनासिब होगा। कला पर लिखते हुए एक दफा सोचने लगा कि हम रटी-रटाई शब्दावली में कुछ जुमले प्रयोग करते चलते हैं। कुछ आयात किए हुए हैं, जिनके अटपटे हिंदी रूप गढ लिए गए हैं। मूर्त और अमूर्त अच्छे शब्द हैं। पर धारणाएँ अटपटी हैं। अमूर्त कला में क्या कोई मूरत नहीं बनती? जैसे रामकुमार के चित्र। तैयब हुसेन, हुसेन साहब या कृशन खन्ना के मूर्तिमान चित्र क्या भाव में अमूर्त का संचार नहीं करते?
यह सब मैं सोचता था, पर खुद पर इतना आत्मविश्वास नहीं जुटता था कि यह बात पुरजोर कह सकूँ। एक बार मुकुंदजी का एक निबंध पढा- कला में अमूर्त की भारतीय धारणा और परम्परा। मुहावरे में कहूँ तो उसने मेरी आँखें खोल दीं। मैं *यादा साफ और भरोसे के साथ सोचने लगा। एक लेखक या चिंतक आपको और क्या दे सकता है? निबंध का प्रासंगिक अंश देखिए-
अँगरेजी के ऐब्सट्रैक्ट और नॉन-फिगरेटिव शब्द दो भिन्न अभिप्राय रखते दिखते हैं। हिंदी का अमूर्त दोनों शब्दों का अकेला अनुवाद है ... यों देखें तो एब्स्ट्रेक्ट और नॉन फिगरेटिव दोनों का अर्थ अमूर्त में आ जाता है। पर शब्द के सीधे अर्थ को, अभिधा को ध्यान में रखें तो नॉन फिगरेटिव - और उसके साथ ही अमूर्त भी - चित्र के संदर्भ में अनुपयुक्त ही नहीं, भ्रांत कहलाएगा। मूर्ति या आकृति ऐसे रूप को कहा जाता है जो इन्द्रिय-गम्य हो। चित्र कभी अमूर्त - मूर्तिहीन, आकृतिहीन - नहीं होता। उलटे चित्र की साधना ही आकृति की साधना है। अरूप की नहीं। ... सच पूछें तो कला में एक ही कला अमूर्त होती हैर्‍ काव्य। या साहित्य। काव्य का माध्यम शब्द अर्थ के बिना नहीं बनता और अर्थ, इन्द्रिय-गम्य नहीं, बुद्धिगम्य होता है। तभी दृष्टांत है कि रोटी के अर्थ को न देखा जा सकता है, न छुआ जा सकता है, खा सकने की तो बात ही क्या!
गए वर्ष पत्रकारिता विश्वविद्यालय शुरू करने दिल्ली से (बत्तीस साल बाद) जयपुर लौट आया, तो सबसे पहले मुकुंदजी और नीरजाजी से ही मिलने गया। अजमेर रोड पर विश्वामित्र मार्ग स्थित उनके नए घर में। अच्छे-खासे आकार का घर। दो भूखंडों को जोडकर बनाया हुआ। कला की महक से सराबोर। हालांकि वह घर मेरे लिए ही नया था। वे तो बरसों पहले यहाँ बस चुके थे। अब खचाखच हुई बस्ती तब शहर से दूर लगती थी। मुकुंदजीने हँसते हुए कहा कि एक मित्र ने तो कहा इतनी दूर आने का सोच लिया, तो आगे अजमेर ही जा बसते?
मुकुंदजी का स्वास्थ्य मुझे सुधार पर लगा। बातचीत में महसूस नहीं हुआ कि हमें मिले अरसा हो चला है। बाहर ही मिलते रहे। बहुत पहले कभी प्रयाग शुक्ल के साथ उनके घर आया, तब वह किराए का घर था। सिविल लाइंस की राह पर। नीरजाजी और उनकी बडी बहन आशा कलकत्ता (अब कोलकाता) में प्रयागजी की बहन चंद्रकिरण की सहेलियाँ थीं। उस घर में भी एक तहखाना था। मुकुंदजी हमें अपनी निजी कलादीर्घा में ले गए। इतनी बडी संख्या में सिद्ध कलाकारों के चित्र और रेखांकन देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। प्रयागजी तो डूबकर हैरान होते हैं। उनकी हैरान चुप्पी के बीच मुकुंदजी कुछ कलाकृतियों पर अपनी राय दी।
बहरहाल, लाठ दम्पती का नया घर वास्तुशिल्प में मुझे अनूठा लगा। उसमें मुकुंदजी की रुचियों की छाप साफ पहचानी जा सकती थी। उस रोज उनका बेटा अभिजीत भी कोलकाता से आया हुआ था। दिवाली का मौका था। बेटा और पुत्रवधू रीना दिल्ली और कोलकाता में आकार-प्रकार नाम से कलादीर्घा चलाते हैं। बेटे को मैंने कहा कि इतनी नायाब कलाकृतियाँ एक घर में पहले नहीं देखीं। बेटे का जवाब सुन तबीयत खुश हुई; उसने कहा - हम पेंटिंग का व्यापार इसीलिए करते हैं कि घर के लिए और कलाकृतियाँ खरीद सकें!
मुकुंदजी से मेरी घनिष्ठता नहीं थी। फिर भी दूर का सही, फिर भी निकटता का एक अहसास कई अनुभवों से बन जाता था।
एक दफा मद्रास (अब चेन्नई) के पीपीएसटी न्यास से एवी बालासुब्रह्मनियन पत्र मुझे मिला। 1988 की बात है। पत्र में लिखा था कि जयपुर से श्री मुकुंद लाठ ने राजस्थान के पारम्परिक जलसंग्रह स्रोतों पर मेरा एक लेख (सीएसई फैलोशिप के तहत तैयार लिखा गया) उन्हें भेजा है। मैन हैरान हुआ कि मुकुंदजी कहाँ-कहाँ की चीजें पढ लेते हैं। और मेरे जैसे युवतर पत्रकार के लिखे को दूसरों को पढवाने की भी सोच लेते हैं!
दिल्ली से जयपुर जो सामान लाया, उसमें चेन्नई वाला पत्र निकला तो मैंने वट्सऐप पर मुकुंदजी को भेज दिया, बताने को कि देखिए आफ हवाले को मैंने कितना संभाल कर रखा है। उन्होंने बदले में मेरा एक पत्र मुझे भेज दिया, जो मैंने उन्हें कई वर्ष पहले लिखा था! मानो कहा हो कि देखो, कुछ चीजें सम्भाल कर हम भी रखते हैं!
सात साल पहले 75 साल की उम्र में उनका पहला कविता संग्रह अनरहनी रहने दो आया था। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में उस पर एक चर्चा रखी गई। अशोक वाजपेयी जी के साथ बात अपनी बात कहने का मौका मुझे भी मिला। मुकुंदजी भी मंच पर रहे।
इसी साल आठ फरवरी को जयपुर के सेंट्रल पार्क में पंडित जसराज का गायन था। मुकुंदजी अक्सर उनके साथ संगत करते थे। उस रोज पंडितजी ने सामने की पंक्ति में किसी को देख हथेली आँखों पर की और बोले- मुकुंद बाबू आए हैं क्या? फिर कहा- शायद वे नहीं हैं। अच्छा ही किया। कितनी ठंड है।
मुकुंदजी के नासाज स्वास्थ्य के बारे में उन्हें मालूम रहा होगा। लेकिन इतने पुराने शागिर्द की याद अचानक उमड आना अस्वाभाविक नहीं था।
काश मुकुंदजी और जीते। भले वे चले गए। पर पंडित जसराज की तरह रह-रह कर यह अहसास हमें भी झकझोरता रहेगा कि वे हमारे बीच हैं न?
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सम्पर्क : 213, राजीव गाँधी विद्या भवन,
शिक्षा संकुल परिसर, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर 302015