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सभा अधूरी है.....

श्रीलाल मोहता
जीवन एक अनंत लीलाभूमि है। लीलाभूमि की असंख्य लीलाएँ हमें रह-रह कर उन विशिष्ट पलों, व्यक्तित्वों और घटनाओं की तरफ आकृष्ट करती हैं, जिनकी छाप मन-मस्तिष्क पर सदैव ही बनी रहती हैं। हर व्यक्ति के जीवन में कुछ ऐसे व्यक्तित्वों का आगमन होता है जिनकी कार्य साधना का प्रभाव सम्पूर्ण जीवन पर पडता है। मेरे जीवन में मुकुन्द लाठ ऐसे ही व्यक्तित्वों में अग्रणी हैं। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी मुकुन्दलाठ अपनी सक्रियता, सजगता के चलते अपने-आप में एक संस्था थे। एक ऐसी संस्था जो जीवन भर सीखने, देखने और परखने में लगी हो। आज विश्वास नहीं हो रहा है कि मुकुन्दजी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृतियाँ और उनके साथ बिताए पलों के साथ उनके परिपक्व विचार हमें हरा कर देते हैं।
यादें और बातें तो बहुत-सी है, पर आयु के इस सोपान पर स्मृति की सहायता से कुछ ऐसे प्रसंग साझा करने की कोशिश कर रहा हूँ जो बडे जीवन और व्यक्तित्वों के साधारण पक्षों के वैशिष्ट्य पर भी हमारा ध्यान ले जा सकते हैं।
सन् 1984 अगस्त के महीने का एक दिन। बीकानेर में अगस्त के महीने में प्रायः बरसात होती रहती है। ऐसे सुहावने मौसम में बीकानेर के सांस्कृतिक केन्द्र आनन्द निकेतन में कला, संस्कृति और दर्शन पर आयोजित एक गोष्ठी में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के साथ मुकुन्द लाठ भी आए हुए थे। डॉ. अब छगन मोहता और नन्दकिशोर आचार्य तो थे ही, क्योंकि गोष्ठी बीकानेर में आयोजित थी। अज्ञेयजी डॉ. छगन मोहता के निवास मोहता भवन में ठहरे हए थे और मुकुन्द लाठ बीकानेर के सर्किट हाऊस में।
गोष्ठी दोपहर के भोज से पहले सम्पन्न हो चुकी थी। चारों विद्वतजन का लंच मोहता भवन में डॉ. छगन मोहता के कक्ष में हुआ और प्रायः जैसा कि विद्वत मण्डली के साथ होता है। उस मण्डली में साहित्य, संगीत, दर्शन, नृत्य आदि पर अनौपचारिक चर्चा होने लगी। इन विषयों पर सभी की अपनी-अपनी मान्यताएँ थीं और मान्यताओं की स्थापना के अपने-अपने तर्क भी। मैं उनकी चर्चा में एक सुधीश्रोता के रूप में अपने पिता डॉ. छगन मोहता के पीछे लगी कुर्सी पर बैठा हुआ इस कला उपनिषद का आनन्द ले रहा था।
डॉ. मुकुन्द लाठ को रात्रि आठ बजे की ट्रेन पकड कर जयपुर जाना था और अभी शाम के छह बजने वाले थे। अन्दर विद्वानों में गहन चर्चा हो रही थी और बाहर मानसून के बादल उमड-घुमड कर आए और तेज वर्षा होने लगी। कुछ क्षणों पश्चात सबका ध्यान वर्षा की ओर गया। सही समय पर बरसात होने का अपना एक अलग ही आनन्द होता है।
चिन्तक नन्दकिशोर आचार्य की चेतना में गंभीरता के साथ व्यावहारिकता भी है। उन्होंने लाठ की ओर मुखातिब होते हुए उनसे कहा भी और पूछा भी कि इस भारी बरसात •े बीच आप सर्किट हाऊस कैसे जा पाएँगें मुकुन्दजी ?
मुझे लगता है चन्द मिनिटों में यह बारिश मद्धम पड जाएगी और फिर मैं आसानी से सर्किट हाऊस पहुँच सकता हूँ और वाकई थोडी देर बाद तेज वर्षा का दौर भी समाप्त हुआ, पर बूँदा-बाँदी और टिप-टिप का दौर चल रहा था। डॉ. लाठ सर्किट हाऊस जाने के लिए उठ खडे हुए। अज्ञेयजी ने कहा, मुकुन्द भीग जाएगा।
मुकुन्दजी ने जवाब दिया कि टिप-टिप में भीगने का आनन्द ही कुछ और है।
इस बीच भाईजी (डॉ. छगन मोहता) ने मुझसे कहा कि जा अपनी माँ से छाता लेकर आ। माँ को हम सभी भाई बहिन भौजी कहा करते थे और हमारी मित्र भी मंडली उन्हें इसी नाम से पुकारती थी। मैं भौजी से छाता लेकर आया। भाईजी ने उसे मुकुन्दजी के हाथों में सौंपा । मैं सर्किट हाऊस तक मुकुन्दजी को छोडने गया और उनसे विदा लेकर मोहता भवन लौट आया। अन्दर आते ही भौजी ने कहा कि छाता कहाँ है? मैं सकपका गया। मैंने कहा वह तो मुकुन्द लाठजी के पास ही रह गया। भौजी का मुँह उतर गया। मध्यम वर्ग की औरतों की कोई सामान्य चीज भी खो जाए, तो उन्हें बहुत दुःख होता है और फिर यह तो भौजी का छाता था। खैर ! बात आयी गई हो गई।
एक दिन वात्स्यायनजी का डॉ. छगन मोहता के पास किसी काम से फोन आया। काफी देर तक बात होती रही। जब डॉ.मोहता को लगा कि अज्ञेयजी फोन रखने ही वाले हैं, तो उन्होंने कहा वात्स्यायनजी उस दिन जब बारिश हो रही थी, तो श्रीलाल की माँ ने मुकुन्द को बारिश की टिप-टिप से बचने के लिए छाता दिया था। वह उसने आज तक लौटाया नहीं। वात्स्यायनजी डॉ. मोहता का निश्छल, बालसुलभ तकाजा सुनकर हँसने लगे। उन्होंने हँसते हुए कहा कि मैं मुकुन्द को इस हेतु तकाजा भी करूँगा और उसे ओलभा भी दूँगा। डॉ. साहब ने कहा ठीक है और उन्होंने फोन रख दिया।
अब मुकुन्द और वात्स्यायनजी की जब भी भेंट होती, वात्स्यायनजी उनसे छाते का तकाजा अवश्य करते। इस इस तकाजे की बात का पता नन्दकिशोर आचार्य को भी लग गया और फिर मुकुन्द लाठ को उस बारिश ने तो उतना भीगोया नहीं जितना छाते के तकाजे की बारिश में भिगो दिया। मुकुन्दजी भी अज्ञेयजी और नन्दकिशोरजी के छाते के तकाजे का भरपूर आनंद लिया करते थे। एक दिन मैं किसी कार्य से जयपुर गया हुआ था। जाहिर था मैं उनसे मिला। छाते के लिए नहीं किसी और काम से - मैं जब उनसे मिलकर निकलने ही लगा था कि उन्होंने मुझसे कहा भाई श्रीलाल बीकानेर जाते समय मेरी और से एक छाता खरीद कर भौजी को लौटा देना। ताकि कुछ विद्वतजन के इस संबंध में तकाजे बंद हों। मैंने भी विनोद में उनसे कहा लाठ साहब हमारे मारवाडी समाज में कहा गया है कि तकाजे की लीक हमेशा खुली रहनी चाहिए।
यह तो विदित ही है कि मुकुन्द लाठ और पं. जसराज में परस्पर अत्यधिक निकटता थी। मुकुन्दलाठ और पं. जसराज आपस में एक तरह से गुरूभाई भी थे और गुरूशिष्य भी। लाठ बचपन में उनके ननिहाल पं.जसराजजी के बडे भाई पं.मणिराज के कोलाकाता स्थित उनके निवास पर मुकुन्दजी के नाना को संगीत की शिक्षा देने आते थे। उस समय पं.जसराज और मुकुन्द लाठ चुपचाप उनके शिक्षण को सुनते भी थे और देखते भी थे। बाद में दोनों ने पं. मणिराज को अपना गुरू बना लिया। दोनों की प्रारंभिक संगीत शिक्षा पं.मणिराज की देख-रेख में ही हुई। पं. जसराज ने सात वर्ष की वय में तबला वादन और गायन में महारत हासिल की। मुकुन्दजी ने इन क्षेत्रों में शैक्षणिक क्षेत्र चुना और आगे चल कर उन्होंने संगीत, सौन्दर्यशास्त्र, दर्शन, संस्कृत-प्राकृत और अंग्रेजी में विशिष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। 1973 से सेवानिवृत्ति तक उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय के इतिहास और संस्कृति विभाग में अध्यापन का कार्य किया।
इसी दौरान उन्होंने पं. जसराज को संगीत के क्षेत्र में अपना गुरू भी बनाया। उन्होंने पं.जसराज के अनेक देश -विदेश में आयोजित कार्यक्रमों में उनके साथ संगत भी की। अभी कुछ महीनों पहले की बात है जब पं.जसराज के गायन का एक कार्यक्रम 8 फरवरी को जयपुर सेन्ट्रल पार्क में था। मुकुन्दजी अक्सर उनके साथ संगत करते थे। मुकुन्द लाठ उन दिनों अस्वस्थ चल रहे थे। पं.जसराजजी को ये विदित था। कार्यक्रम का आगाज होने जा रहा था। पंण्डितजी अपना आसन ग्रहण कर चुके थे। आयोजकों ने स्वागत- सत्कार के पश्चात् पं.जसराजजी के आगे माईक रखा। उन्होंने देखा कि श्रोताओं की अग्रिम पंक्ति में एक व्यक्ति बैठा था। उसके श्वेतकेश, आँंखों पर मोटा चश्मा, होंठों पर स्मित हास्य। मुकुन्द लाठ का चेहरा पंडितजी की स्मृति में उभर आया होगा। उन्होंने गंभीर स्वरों में सम्बोधित किया अरे मुकुन्द बाबू तुम यह ? संगीत सभा में सन्नाटा पसर गया। मुझे मालूम है आज मुकुन्द मेरे साथ संगत में नहीं है। उन्होंने अवरूद्ध कण्ठ से कहा मुकुन्द के बिना यह कार्यक्रम और यह संगीत सभा अधूरी है।
भारतीय संगीत, नृत्य, सौन्दर्यशास्त्र और संस्कृति पर लेखन के लिए उनकी अलग ही पहचान थी। इसी मौलिक लेखन और पहचान के कारण उन्हें 2010 में भारतीय सरकार के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री अलंकरण से अलंकृत किया गया।
सम्मानित हने के कुछ दिनों पश्चात् वे कोलकात्ता आए हुए थे। मैं भी कोलकात्ता की एक सुप्रसिद्ध शैक्षणिक व सांस्कृतिक संस्था महिला परिषद के आयोजन में सपत्नीक भाग लेने के लिए गया हुआ था। मैं महिला परिषद की अध्यक्षा विदुषी श्रीमती विमला मोहता के निवास पर ठहरा हुआ था। श्रीमती विमला मोहता, जिन्हें हम आदरभाव से भाभी कहते थे। उन्होंने कहा कि आज सायं हमें ज्ञानमंच चलना है। वहाँ अभिनव भारती हाईस्कूल में स्थित ज्ञानमंच पर कार्यक्रम है। यहाँ मैं आपको बताना चाहता हूँ कि इस स्कूल और मंच की परिकल्पना मुकुन्दजी की मातृश्री ज्ञानवती लाठ की ही थी। कोलकात्ता में वे अपने क्रांतिकारी विचारों के लिए जान जाती थी। उन्होंने तत्कालीन मारवाडी समाज की कई सडी गली रूढियों पर चोट कर परिवर्तन की राह खोली थी। मुकुन्द लाठ से और उनके परिवार से भाभी विमला मोहता का पारिवारिक रिश्ता था।
हम समय पर पहुँचे। वहाँ पहुँचने पर मुझे विदित हुआ कि इस संस्था की वर्तमान अध्यक्ष श्रीमती सरोज बजाज है। सरोज बजाज बीकानेर नारी चेतना की उन्नायक श्रीमती रतनीदेवी दम्माणी की सुपुत्री हैं। चूंकि उनके परिवार से हमारा आत्मीय रिश्ता था। इसलिए हम सबसे मिलकर वह बहुत प्रसन्न हुईं।
इतने में मुकुन्द लाठ भी वहाँ आ गए। सरोज बजाज उन्हें मंच पर ले गईं। ज्ञानमंच का सांस्कृतिक प्रेक्षागृह खचा-खच भरा हुआ था। स्वागत भाषण हुआ। मुकुन्दलाठ के सम्मान में नृत्य, संगीत व लघु नाटकों की प्रस्तुतियाँ हुईं। पश्चात् विभिन्न संस्थाओं द्वारा मुकुन्द लाठजी का अभिनंदन किया गया। मैंने भी उन्हें बीकानेर की सांस्कृतिक संस्था परम्परा की ओर से पुष्पगुच्छ भेंट किया। इस अवसर पर उन्होंने मुझसे कहा अच्छा श्रीलाल तुम भी इस षडयंत्र में शामिल हो । मैंने कहा षडयंत्र नहीं, आफ सम्मान और अभिनंदन में।
स्वागत सम्मान के पश्चात् उन्होंने अपने संक्षिप्त भाषण में कहा कोई भी सम्मान मिले, प्रसन्नता तो होती ही है, लेकिन जो सम्मान सुधीजन और आम आदमी से मिले, तो वह प्रसन्नता कुछ ओर ही होती है।
बीकानेर प्रौढ शिक्षण समिति, बीकानेर द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित डॉ. छगन मोहता स्मृति व्याख्यानमाला में जब उन्होंने व्याख्यान देने की सहमति दी, तो समिति के सभी सदस्यों को अतीव प्रसन्नता हुई। समिति एक लम्बे समय से यह प्रयास कर रही थी कि इस व्याख्यानमाला में डॉ.लाठ का व्याख्यान हो। कुछ अपने स्वास्थ्य के कारण व कुछ अपनी निजी व्यस्तताओं के कारण संयोग बन नहीं पा रहा था। इस हेतु उन्होंने मुझे जयपुर बुलाया। मैं गया और मैंने इस व्याख्यानमाला की पूरी पृष्ठभूमि बताई । मैंने कहा कि इसमें अब तक पन्द्रह विद्वानों के व्याख्यान हो चुके हैं जिनमें प्रमुख हैं - डॉ. धर्मपाल, अशोक वाजपेयी, रमेशचन्द्र शाह, डॉ. नन्दकिशोर आचार्य आदि। उन्होंने पलटा मारते हुए कहा कि इन विद्वानों की श्रेणी में मैं वर्जित स्वर हूँ। मैंने कहा नहीं मुकुन्दजी आपका स्वर लगने से इस व्याख्यानमाला में और माधुर्य आ जाएगा। मौन ! विषय क्या होगा? मैंने कहा कि हम यह व्याख्यान देने वाले पर ही छोडते हैं। वे विचार में पड गए। फिर बोले यूं तो बीकानेर डॉ. छगन मोहता, हरीश भादाणी, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, नन्दकिशोर आचार्य और शुभू पटवा का शहर है। मैं अपने द्वारा चयनित विषय पर बोलूं । मेरा ऐसा सोचना है कि मैं दो व्याख्यान दूँ । पहले व्याख्यान का शीर्षक होगा संस्कृति के सौपानः देसी और मार्गी तथा दूसरे व्याख्यान का शीर्षक होगाः संस्कृति के सोपानः मार्गी और देसी।
विषय चयन के पश्चात् मैंने उनसे आग्रह किया कि वे 18 व 19 अक्टूबर 2014 को समिति सभागार में अपना व्याख्यान देने के लिए पधारें। वे आए, उन्होंने डॉ. छगन मोहता को याद किया। नन्दकिशोर आचार्य व शुभू पटवा से आत्मीयता से मिले। अपने दो-दिन के व्याख्यान में उन्होंने नितान्त ही सम्प्रेषणीय भाषा में विषय की परत-दर-परत को खोलते हुए सार रूप में कहा देसी और मार्गी हमारी कलाओं के दो पैर हैं, जिन पर हम खडे हैं। देसी और मार्गी कलाओं को जोडने में लोक विश्वास का प्रमुख स्थान है। संगीत में देसी में धुन प्रधान होती है मार्गी में वहीं धुन राग का आलाप बन जाती है। मार्गी में आप निबद्ध होता है। देसी आलाप निबद्ध नहीं होता।
इस व्याख्यान की गूँज आज भी हमारे मन मस्तिष्क में है।
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सम्पर्क : ईशावस्य, नत्थूसर बास
कुएँ के पास, बीकानेर 334001, मो. 9413013003