fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

दार्शनिक कवि और चित्रकार : मुकुंद लाठ (मूल : शैल मायाराम)

ज्योतिका एलहेंस
दार्शनिक, कवि, चित्रकार मुकुंद लाठ (अक्टूबर 8, 1937 - अगस्त 6, 2020) अब हमारे बीच नहीं रहे। वे मेरे लिए एक मित्र, भाई और शिक्षक की तरह रहे हैं, परन्तु व्यापक तौर पर उनकी पहचान उस से भी बढकर एक विशिष्ट इंसान के रूप में होती रही है । आज के बौद्धिक प्रचंडता तथा स्वहित के लिए मेल-जोल रखने वाली दुनिया में, उनकी पहचान एक अत्यंत ही प्रतिभाशाली, उदार ह्रदय, विनम्र तथा संकोची स्वाभाव के व्यक्ति वाली थी । जैसा कि कुछ मित्रों ने मुझे याद दिलाया, एक समय में वे शानदार तेज गेंदबाज भी रह चुके थे !
उनके नैतिक विचार सम्बंधित लेखन से, भारतीय परम्पराओं में निहित अवधारणाओं तथा कोटियों को किस प्रकार से सर्वव्यापी बनाया जा सकता है, यह मैंने उनसे ही सीखा है। उनकी पुस्तक धर्म संकट, आनृशंस्य अर्थात् गैर-क्रूरता की अवधारणा को एक नैतिक आदर्श के रूप में प्रस्तुत करती है ।
गाँधीजी के साथ संवाद करते हुए मुकुंदजी स्पष्ट करते हैं कि अहिंसा निवृत्ति मार्ग का धर्म है, जो कि संन्यासी के लिए उपयुक्त है। क्योंकि गृहस्थ जीवन में कुछ हिंसा तो निहित होती है। आनृशंस्य प्रवृत्ति मार्ग का धर्म है।
महाभारत में आनृशंस्य की कई कहानियाँ हैं । व्याद्य एक धार्मिक कसाई है जो ब्राह्मण को शिक्षा देता है कि प्राणी हिंसा उसकी जीविका से जुडी है, लेकिन वह उसमें आनंद नहीं लेता और अपने स्वधर्म का पालन करता है।
एक कहानी तोते की है जो उस मुरझाए पेड को नहीं छोडता क्योंकि उस पेड ने हमेशा उसको शरण दी थी और अंत में इंद्रदेव से उसके लिए वरदान माँगता है जिस के फलस्वरूप वह पुनःहरा-भरा हो जाता है।
यक्ष धर्म के रूप में जो पाण्डवों से प्रश्न करते हैं। युधिष्ठिर कहते हैं आनृशंस्य परोधर्मः और सब सवालों का गहन अर्थ जिसके बदले में यक्ष उनको वरदान देते हैं सो वे माद्री पुत्र नकुल को जिंदा करने की बात रखते हैं। इसको वे अपना स्वधर्म मानते हैं। क्योंकि कुंती ने माद्री से कहा था कि उसके बेटों की रक्षा वह करेगी। आनृशंस्य हमारे भी स्वधर्म बन सकता है।
आनृशंस्यता के नकारात्मक अभिप्रायों से आगे बढ कर जो अर्थ हमारे समक्ष आता है , वह है भातृत्व, सद्भाव , दूसरे के प्रति गहरी आस्था। अनुक्रोश के साथ अक्सर इसका प्रयोग किया जाता है जिसका अर्थ है, दूसरे के दर्द को महसूस करना, दूसरे के दर्द में स्वयं दुखी होना।
आनृशंस्य तथा अभ्युदय दोनों परस्पर जुडे हुए हैं, अर्थात सभीकी समृद्धि, सभी की खुशहाली।
मुकुंद का शोध-कार्य दत्तिलम पर है, जो प्राचीन भारत के पावन संगीत पर आधारित ग्रन्थ है। उनका शोध कार्य इतना सघन था कि जब उनके एक परीक्षक को दिल का दौरा पडा, तो हम उन से यह कह कर मजाक करते थे कि संभवतः इसका कारण उनकी थीसस का वजनदार होना है। वे मेरे माता-पिता,फ्रैन्सीन तथा दयाकृष्ण के काफी करीबी थे सो उन्होंने उन के लेखन की तारीफ की जी. सी. पांडेय से, जिन्होंने उनके लिए राजस्थान विश्वविद्यालय के इतिहास और संस्कृति विभाग के जैन स्टडीज सेंटर में एक पदस्थापित करवाया था। उनके जयपुर स्थानांतरित होने के परिणामस्वरूप ही उनके द्वारा किये गए दो प्रमुख अंग्रेजी अनुवाद, कल्पसूत्र तथा अर्धकथानक - एक अधूरी दास्ताँ/हाफअ टेल, हमारे सामने आये, जो दोनों ही बेहद खूबसूरती के साथ चित्रित तथा निर्मित हैं। अर्धकथानक, सत्रहवीं शताब्दी के आगरा निवासी, बनारसीदास नामक जैन व्यापारी द्वारा लिखित अब तक की पहली भारतीय आत्मकथा है।
विचारों की दुनिया उन्हें सम्मोहित करती थी तथा उन्होंने अपने लेखों के लिए संसाधन संस्कृत, प्राकृत और अन्य भारतीय भाषाओं से तथा पंडित मनीराम और पंडित जसराज से सीखा शास्त्रीय गायन से लिए थे।
दयाकृष्ण ने मानवशास्त्री एलैन बैब को लिखा, वास्तव में, मुकुंद ने एक बहुत ही उम्दा लेख लिखा है । यह संगीत पर आधारित है जो राग की एक विशिष्ट पहचान तलाशने के साथ-साथ नाटक के पात्रों की तुलनात्मक व्याख्या करता है तथा उन सभी अवधारणाओं का विवेचन करता है जो आने वाले तमाम विचारकों के हाथों निरंतर बदलती रहती हैं, लेकिन अपना मूलरूप नहीं खोतीं। राग का आलाप विचार के प्रकट होने की प्रक्रिया के सामान है। बाद में इस लेख के विस्तार कर संगीत और संस्कृति पुस्तक को जन्म दिया।
सन 1980 में वे दयाकृष्ण तथा एम. पी. रेगे द्वारा आरम्भ किये गए संवाद परियोजना में सम्मिलित हुए। मुकुंद तथा अरिंदमचक्रवर्ती के पारस्परिक सहयोग को अरिंदम जीवन पर्यन्त संवादात्मक दार्शनिक रोमांच के नाम से सम्बोधित करते हैं।
मुकुंद ने जयपुर साहित्य सम्मलेन में, हमारे द्वारा आयोजित एक पैनल के मंच से - पारम्परिक दार्शनिक तथा पश्चिम के ज्ञान में प्रशिक्षित दार्शनिकों के मध्य संवाद को एक आन्दोलन का रूप देने की बात कही, जैसा कि दयाजी भी चाहते थे। उन्होंने फैंरेन्सीन और दया कृष्णा के साथ मिलकर भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद् द्वारा प्रकाशित भक्ति पर एक बेहतरीन संवाद ग्रन्थ को सह-सम्पादित किया। फैंरैन्सीन और मुकुंद दोनों को रोमांचकारी साहित्य में दिलचस्पी थी खासकर पी. डी.जेम्स और कोलिन डेक्सटर के लेखन में और कई पुस्तकों का आदान-प्रदान होता।
कुछ जयपुर से जुडे दार्शनिक एक अन्य परियोजना में भी तल्लीन थे, जो पहले उन्मीलन का समूह बना और फिर हिंदी में मानसिक स्वराज की पत्रिका निकलने लगी जिसका खर्चा मुकुंद के अपने लाठ सर्वोदय ट्रस्ट से आता। इसके अन्य सम्पादक थे जी. सी. पाण्डे, दया कृष्ण और शदेव शल्य ।
मुकुंद दोनों अंग्रेजी और हिंदी में लिखा करते, किंतु उनके लेखन की गति धीमी थी। प्रारम्भ में कुछ मुठ्ठी भर विवेकशील लोगों के अलावा उन्हें कोई खास पहचान नहीं मिल पायी। परन्तु उनका लेखन सहज तथा लयबद्ध था । उन्होंने यशदेव शल्य जैसे प्रखर बुद्धिजीवी के गूढ दर्शन की प्रस्तावना लिख कर उसे अत्यंत सुबोध व सरल बना दिया ।
वे एक मारवाडी परिवार में जन्मे थे, परन्तु उनके परिवार वालों को बहुत पहले ही इसका अहसास हो गया था कि व्यापार उनके बस की बात नहीं है । हस्तलिपियों का एक छोटा-सा निजी संग्रह उनको भक्ति की गहराइयों में ले गया और उन्होंने महाराष्ट्र के 14वीं सदी के सुविख्यात संत-कवि नामदेव की हिन्दी पदावली का अनुवाद किया। तथापि उनको विरासत में कला का एक बेहतरीन संकलन प्राप्त हुआ । वे एक गहन विचारक थे जो कला में अत्यंत माहिर थे । जब उनका स्वास्थ्य बिगडने लगा, तब भी उनका पूरा रुझान कला के प्रति ही समर्पित रहा।
उनके अधिकांश विचार वाचिक परंपरा से ही जुडे रहेंगे, क्योंकि इस एकांतप्रिय विचारक का स्वभाव ही कुछ ऐसा था । रात्रि के भोज पर कई ऐसे ही विचार-विमर्श याद आते हैं जैसे गणिका तथा ब्राह्मण के मध्य संवाद तथा एक संस्कृत ग्रन्थ, जिसमें ब्राह्मण-गणिका के बीच के वैमनस्य को रसिकों द्वारा उस समय सुलझाया जाता है, जब गणिका अपना पैर ब्राह्मण के सर पर रख देती है। आखिर गणिका ही तो स्वतंत्रा स्त्री जैसी की उनके एक सुप्रसिद्ध लेख का शीर्षक था।
हम भारत के उन प्राचीन शहरों तथा वहाँ पर रहने वाले सम्प्रदायों के गहन बौद्धिक जीवन के विषयों पर विचार-विमर्श किया करते थे । जयंत भट्ट के नौवीं शताब्दी के संस्कृत नाटक आगमडम्बर, जो प्रारम्भ होता है बौद्ध, वैष्णव तथा न्यायायिकों के परस्पर वैमनस्य से, जहाँ वे अंततः उद्घोषणा करते हैं जिसमें न्याय को सही तथा बौद्ध को गलत ठहराते हैं, परन्तु साथ-साथ सभी सम्प्रदायों की परंपरा को सम्मानित रखने का भी समर्थन करते हैं, यहाँ तक कि शैव आगम के सत्य की भी। इन में एक मात्र अपवाद थे तो वे पथभृष्ट शैव्य जन।
अन्य संवाद ग्रुप की भाँति मुकुंद भी तर्क विद्या के अनुयायी थे तथा अंध परम्परावाद के कट्टर आलोचक भी । उस सुप्रसिद्ध कथा में जहाँ शंकर का सामना एक चांडाल से होता है, जो वास्तव में शिव बतलाये जाते हैं, उनका कहना था कि यदि चांडाल के भेष में शिव नहीं होते और वे चार श्वान चार वेदों का प्रतिरूप नहीं होते, तो क्या होता? शंकर का तत्वविज्ञान मौलिक है, परन्तु उनके सामाजिक विचार इससे पूर्णतः विपरीत हैं, क्योंकि वे धर्मशास्त्रों तथा स्मृति ग्रंथों का सहारा लेते हैं। अतः यह सर्वव्यापी होने के स्थान पर तर्कविहीन हो जाता है ।
अद्वैत के सिद्धांतों के अनुसार तो प्रत्येक जीव में आत्मन का निवास होता है, तथापि भारतीय समाज ने सदियों से चली आ रही धार्मिक असमानता व छुआ-छूत को न सिर्फ अपने समाज में संस्थापित किया, अपितु उन्हें सामाजिक स्तर पर धर्मशास्त्रों द्वारा वैद्यता भी प्रदान की है। अतः इस कथानक को हागिओग्राफी अथवा मात्र काल्पनिक कथा कह कर दरकिनार नहीं कर सकते । जैसा कि जी. सी. पांडेय इंगित करते हैं, शंकर दंतकथा में इसे मान्यता मिली है, इस तथ्य का महत्त्व कुछ कम नहीं है।
भक्ति के बहिर्लोक में जिल्द पर ही यह ज्ञापित किया जाता है कि क्या भक्ति अपने या किसी भी ईश्वर में आस्था के बिना संभव है? भक्ति का लक्षण क्या हैं? मुकुंद ने वृन्दावन के भक्ति समवाद में यही प्रश्न किया था।
मोनिका बोएम-टेट्लबाक, winand Callewaert तथा डेनियल रवे समेत कई ऐसे व्यक्ति हैं जो मुकुंद तथा उनके लेखन के प्रतिऋणी हैं। यहाँ मैं स्वयं अपना आभार दजर् करना चाहूँगी। मध्यकालीन भाषाओं में उनके कौशल ने मेवाती आख्यानों को समझने में मेरी बहुत सहायता की है। अपने शोध कार्य के दौरान हमारी इन विषयों पर गहन चर्चा होती थी। पाण्डु का कडा एक मेवाती महाभारत है जिसके रचियता, पात्र तथा दर्शक-गण सभी मुसलमान हैं। हमने पाया कि यह कथा दो विभिन्न सम्प्रदायों के बीच एक संवाद के रूप में है। एक ओर हैं नाथों के गुरु गोरखनाथ और दूसरी ओर हैं उन्हीं के शिष्य औघड, जो तांत्रिक विद्या का प्रतिनिधित्व करते हुए जाति, लिंगभेद तथा लैंगिकता जैसे अत्यंत ही मौलिक विषयों पर सवाल उठाते हैं।
पिछले वर्ष हमने ईशा उपनिषद जैसे ग्रन्थ का अध्ययन किया जो गाँधी व श्री अरविंद के लिए एक अद्भुत प्रेरणास्रोत्र था। यह श्री अनिर्वाण द्वारा आधुनिक टिप्पणियों के साथ संस्कृत भाषा में ही पढा गया जिसमें बांग्ला भी शामिल थी। मुकुंद लाठ के दर्शन (तथा काव्य ) का, 20 वीं सदी के आलोचनात्मक तथा सर्वव्यापी आध्यात्म से एक गहरा जुडाव था जिसमे शामिल थे श्री अरविंद तथा उन्हीं के नजदीकी अनुयायी श्री अनिर्वाण, जिनके वे स्वयं ही शिष्य रह चुके थे। इस प्रकार पूर्णता तथा शून्यता, और वैदिक तथा बौद्धिक परम्पराओं को संवाद में शामिल किया जा सका। पिछले वर्ष मुकुंद ने अथर्ववेद के एक अनुभाग, पृथ्वीसूक्त का अपना अनुवाद साझा किया जिसमें उन्होंने पृथ्वी को समर्पित उस गीति-काव्य के माध्यम से यह साबित कर दिया कि यह मात्र जादुई मन्त्रोंजाप से कहीं अधिक है। मुकुंद और नीरजा का घर (यह नाम बिज्जी, विजयदान देथा द्वारा दिया गया था), फैंरैन्सीन तथा दयाकृष्ण के जाने के पश्चात् जयपुर में मेरा अपना ही घर था । शुक्रवार को उनके दाह-संस्कार के उपरांत जब मैंने घर से प्रस्थान किया, तो गेट पर उनकी अनुपस्थिति बेहद खली।
जीवन के आखिरी क्षणों में उन्होंने, जो कष्ट भोगा वह बहुत पीडादायक था । हमारे साझा मित्र विवेक दत्ता को बनारसीदास के वृतांत से संथारा नामक जैन साधना के विषय में पता चला। क्या मुकुंद के भोजन से विरक्ति के पीछे यही कारण था? या उनका दृढ विश्वास कि यह शरीर एक केंचुली की तरह है जिसे एक सर्प की भाँति त्यागना ही पडता है, जैसाकि उन्होंने स्वयं अपनी कविता में व्यक्त किया था ।
***
सम्पर्क - 562, कानूनगो अपार्टमेन्टस्, 71 आई.पी.एक्सटेंशन, बाल्को मार्केट के पीछे, पटपडगंज- 110092
elhancejyotika@gmail.com
मो. 9818144832