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भरे-पूरे जीवन का वैभव

चंद्रकुमार

ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पडता
एक ही शख्स था जहान में क्या
- जौन एलिया
कहने को कहा जा सकता है कि किसी के जाने से क्या फर्क पडता है, लेकिन अगर आपने मुकुन्द लाठ को जाना है, तो आप जौन एलिया के कहे से यहाँ पर पूरी तरह असहमत होंगे। और असहमत होना भी चाहिए क्योंकि हमने मुकुन्द लाठ को खोया है। वे कला, साहित्य, संगीत, नृत्य, नाट्य-शास्त्र, सौन्दर्यशास्त्र सहित संस्कृत-प्राकृत भाषाओं के प्रखर अध्येता और भारतीय दर्शन व संस्कृति के बडे विचारकों की परम्परा में शामिल एक मनीषी व्यक्ति थे। भारतीय परम्परा में जिन्हें विद्वान माना जाता है वे दरअसल अनेक ज्ञानानुशासनों के उद्भट साधक होते हैं। इन अर्थों में मुकुन्द लाठ हमारे समय के ऐसे विद्वान हैं जिन्होंने एक सच्चे साधक के रूप में, ज्ञान के अनेक अनुशासनों में समान रूप से विद्वत्ता हासिल की, और अपने समय को समझने-बूझने में उन सभी रास्तों से होकर, हम तक वह सब पहुँचाया, जो अन्यथा दुष्कर होता। मुकुन्द लाठ एक ऐसे सहृदय विद्वान के रूप में जाने जाते हैं जो कला-जगत की समकालीन आपाधापी और गैरजरूरी शोर से एकदम परे, उस एकान्त में रहते-रचते-बसते रहे हैं, जहाँ उनकी साधना में सृजन और विचार की ज्ञात-अज्ञात- बहुधा अलक्षित-सी, परम्पराओं का सुरम्य गान उनका सहचर था। विविध ज्ञानानुशासनों पर समान अधिकार प्राप्त करने हेतु संभवतः वह एकान्त उन्होंने खुद रचा हो, तभी वह अपनी पूरी ऊर्जा से संस्कृति, भारतीय दर्शन और ज्ञान-परम्परा, संगीत व सौन्दर्यशास्त्र सहित अनेक विधाओं में गंभीर चिन्तन व अध्ययन का अपना दीर्घकालिक उद्देश्य पूरा कर सके। और शायद इसी एकान्त का सादृश्य प्रतिफल - उनका कविरूप, हमारे सामने आया है।
मुकुन्द लाठ के काव्य-मर्म को समझने के लिए हमें संस्कृत काव्य-परम्परा की ओर देखना होगा। उनकी शिक्षा-दीक्षा में संस्कृत भाषा और संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन और विवेचन मुख्य भूमिका में रहा है। अतः यह स्वाभाविक है कि उनकी काव्य-रचना में उन्हीं अवयवों से रस समाहित हुआ होगा। संस्कृत काव्य, खासकर मुक्तकों का मुहावरा निःसन्देह हिन्दी कविता के आज के प्रचलित मुहावरे से भिन्न है। मुक्तकों में जो रागात्मक लय प्रचुरता में मौजूद है, वह उन्हें कंठस्थ करने का ही कोई उपाय रहा हो, जबकि आज की हिन्दी कविता में छन्द की जगह कहन का चलन अधिक है। जितना कसा हुआ शिल्प, उतना ही गहन कविता का कहन। चूँकि उनका काव्य-कर्म अपना मूल बीज संस्कृत काव्य-परम्परा से पोषित होता है, अतः यह स्वाभाविक है कि उनकी कविता का मुहावरा संस्कृत काव्य के सन्निकट होगा। तब यह मानना जायज ही होगा कि इस भिन्न मुहावरे के कारण ही हिन्दी कविता संसार में उनके काव्य-कर्म की तरफ *यादा गंभीर ध्यान नहीं गया हो, और उस पर जितना चिन्तन होना चाहिए, वह नहीं हुआ है। हालांकि इससे उनके काव्य-सृजन की महत्ता कम हो जाती है, ऐसा बिल्कुल नहीं है। बल्कि अपनी कविताओं के सुगठित-सघन भावों को शब्दों की तरलता से सहज ही अभिव्यक्त कर एक तरह से संस्कृत काव्य-परम्परा और हिन्दी काव्य-परम्परा के बीच एक जीवन्त सेतु-सा कार्य किया है। संस्कृत काव्य जितना मुखर तो नहीं, फिर भी उनकी रचनाओं में शब्द एक अदृश्य ताल पर लय साधते दिखते हैं। एक बानगी उनकी कविता एक चुप से -
अंधेरा चुप
कभी जब रात रहता है

कलेजे चुभ
किसी की साँस का जब साथ रहता है

कही अनकही
कितनी बात कहता है

यही जड कलेवर।
इसी तरह एक और छोटी कविता - धीरे से -
हल्की-सी
थपकी दी

नाव गई
बीच भँवर।
मुकुन्द लाठ के काव्य-कर्म के दो महत्त्वपूर्ण सोपान स्वीकरण और अनरहनी रहने दो है। स्वीकरण में जहाँ संस्कृत के मुक्तकों का स्वीकरण किया गया है वहीं अनरहनी रहने दो उनका, हिन्दी प्रतिमानों के नजरिये से, इकलौता काव्य-संग्रह है जिसमें 1970 से 2012 (काव्य-संग्रह के प्रकाशन) तक लगभग चार दशकों की कविताएँ सम्मिलित हैं। अक्सर कलाकार किसी कविता या गद्यांश से प्रेरित हो कोई कलाकृति रचता है। इसी तरह, किसी कलाकृति से प्रभावित हो कवि किसी कविता की रचना करता है। कहने में वह किसी प्रेरणा के प्रभाव में जरूर है, लेकिन आखिरकार वह एक स्वतंत्र कला-रूप भी है। मुकुन्द लाठ ने संस्कृत मुक्तकों को आधार बना कर कुछ कविताएँ कही है। लेकिन उन्होंने संस्कृत मुक्तकों का महज काव्यानुवाद हिन्दी में नहीं किया है बल्कि मुक्तकों को आधार बना, स्वतंत्र रचनाएँ की हैं। उन्होंने बहुत साफगोई से इसे स्वीकरण मानते हुए उन मुक्तकों को भी कविता के साथ प्रस्तुत किया है। हालांकि उन सभी कविताओं का स्वयं का अपना आलोक है, लेकिन संस्कृत काव्य-परम्परा की रीति-नीति निभाते हुए उन्होंने इसे स्वीकरण कहा है जिसे संस्कृत काव्याचार्य राजशेखर ने किसी पुरानी रचना को अपने उपाय-कौशल द्वारा अपना लेना और मूल भाव को अक्षुण्ण रखते हुए नयी कविता बनाने का एक युक्ति-संगत तरीका बताया है। इसकी पूरी विवेचना स्वीकरण में अनुवचन नाम से प्रकाशित भी की है। वे चाहते तो स्वीकरण की स्वीकारोक्ति बिना भी उन्हें प्रकाशित कर सकते थे, क्योंकि सभी रचनाएँ अपने आप में नयी और स्वतंत्र रचनाएँ हैं, लेकिन जिस परम्परा के ज्ञानार्जन और तत्पश्चात् साधना में उन्होंने अपना जीवन लगाया, उसे निभाना भी वे बखूबी जानते थे और उसी का परिणाम स्वीकरण है जिसे हाल ही में रजा पुस्तक माला द्वारा गगनवट शीर्षक से पुनर्प्रकाशित किया गया है।
गगनवट (और उसके पहले का स्वरूप - स्वीकरण) में एक अनूठी बात यह भी है कि इसमें रचनाकार स्वयं उन रचनाओं के जन्म, स्वीकरण की प्रक्रिया, भाषा की नवीनता, बिम्बों के प्रयोग और कुछ हद तक मुक्तक आधारित रचनाओं की संक्षिप्त व्याख्या भी करते दिखते हैं। चूँकि हिन्दी में ऐसे प्रयोग कम होते हैं, इसलिए उन्होंने इसे विस्तार से व्याख्यायित करते हुए पूरी प्रक्रिया सामने रखी है। यह उनके सृजन का ही एक आयाम है कि वे अपने पाठक के लिए इतनी मेहनत कर सब कुछ खोल कर रखते हैं। उनकी कविताओं में उनके प्रिय विषयों के सूत्र भी आसानी से मिल जाते हैं - चाहे वह संगीत हो, नृत्य हो या सौन्दर्यशास्त्र। लेकिन यह साधना बहुत लम्बे समय से चली आ रही है जिन्हें कविताओं के माध्यम से मुकुन्दजी ने साझा किया है। उनके काव्य-संग्रह अनरहनी रहने दो की भूमिका में अशोक वाजपेयी कहते हैं - कविता अगर एक स्तर पर सार्थक होने के लिए एक समूचे जीवन को उसकी जटिलता और सूक्ष्मता में प्रकट करती है और एक ऐसी मानवीय गरमाहट और हमआहंगी देती है जो अन्यथा सम्भव नहीं है, तो मुकुन्द लाठ की कविता भरी-पूरी जीवन कविता है। उसका आस्वाद जिजीविषा, जिज्ञासा और विचार के लिए उत्साह बढाता है।
गगनवट में शामिल उनकी रचनाएँ, जिसे उन्होंने स्वीकरण माना है, अपने स्वतन्त्र आलोक में, उनके काव्य-संसार का विस्तार प्रस्तुत करती हैं। किसी मुक्तक के मूल-भाव को अक्षुण्ण रखते हुए उसे अपने शब्दों में भाव-पूर्ण अर्थ देना, दरअसल एक साधक ही कर सकता है जिसके पास मौलिक दृष्टि और विचार के साथ ही अपने नये अनुभव को संप्रेषित करने के लिए अथाह शब्द-सागर हो। उनकी रचनाओं में आये शब्द सहज जरूर है, लेकिन वे सामान्य भाषा से परे उस विपुल संस्कृति से बरामद हुए हैं, जिन्हें सहजता से कहना या प्रयोग में लाना किसी सिद्धहस्त कवि के लिए ही संभव है, ताकि नयी रचना में लक्षित लय, भाव और तारतम्यता बरकरार रहे। लेकिन उन्होंने अपने को वहीं बाँधा नहीं है। मुक्तकों के मूल स्वर को साधते हुए वे अपने भाव-विचार भी सहजता से व्यक्त करते दिखते हैं, जहाँ उन्होंने पूरी स्वतंत्रता ले कर नयी रचनाएँ कही।
यह मरुथल है रचना का एक कवितांश देखें -
जानते नहीं यह मरुथल है
यहाँ हवा
नाक के आगे रहती है
अपनी ही साँसों की.....

इसी तरह चाँदनी का जाल रचना में वे कहते हैं -

पेडों के झुरमुट में
काला अंधेरा

पत्तों के जाल से
चाँद की किरणें
उतरी

अंधेरे को
पकड ले गयी

संग्रह की शीर्षक कविता गगनवट में सहज बिम्ब और उतनी ही सहज भाषा बरती गयी है -
आकाश बरगद-सा खडा
श्यामल घिरे बादल
घनेरे पात की जैसी छटा
बरसात की आ लगी
धरती पर झडी

जैसे जटा

छोटी-छोटी भाव-भंगिमाओं में अपने समय की विडम्बना कहने के लिए उन्होंने जिस तरह मुक्तकों के सहारे अपना दुख व्यक्त किया है, वह उनकी परम्परा से आधुनिकता को सींचने-पोषने के दृढ-संकल्प का ही प्रमाण है। उनकी कविता श्रेयस् में वे इसी ऊहापोह को सामने रखते हुए कहते हैं -
धधकती रेत में
झुलसती जडें

जिस देश में, दशा में
खडा है
जीते रहना ही श्रेयस् है
विकास की क्या सोचे अभी
चम्पा का पेड
संस्कृत काव्य-परम्परा को क्लासिक कहने-मानने की वजह से शायद हमने उसे लगभग अनदेखा कर दिया है। मुकुन्द लाठ ने उन्हीं क्लासिक कविताओं से सिंचित-पोषित कर अपना सुघड और सुदीर्घ काव्य-सृजन किया है। रजा फाउंडेशन द्वारा आयोजित पं.कुमार गन्धर्व स्मृति व्याख्यानमाला में बोलते हुए उन्होनें परम्परा और आधुनिकता पर बहुत स्पष्ट विचार रखा कि आधुनिकता भारतीय परम्परा द्वारा भी पोषित और सम्वर्द्धित होती है - इसे पश्चिम से आयातित विचार मानना अपने इतिहास, संस्कृति और परम्परा से विमुख होना होगा। हर शास्त्रीय कार्य-व्यापार पुराना ही माना जाए, इससे वे सन्तुष्ट नहीं दिखते। अपनी कविताओं में उन्होंने स्थापित भी किया कि हिन्दी काव्य-परम्परा में संस्कृत काव्य के सहारे भी आधुनिक कविता कही-गढी जा सकती है। वे अपनी कविताओं में ध्वनियों को एक महत्त्वपूर्ण अवयव मानते थे जो कि संस्कृत काव्य-परम्परा में आधार तत्त्व है। चूंकि उनकी अपनी काव्य यात्रा संस्कृत-काव्य से पोषित हुई है अतः उनकी कविता में नैतिकता- प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, केन्द्रीय मूल्य बन कर सामने आती है। यह मूल्य, दरअसल हर भाषा और युग के कवि का मूल मर्म रहा है, लेकिन उनकी मुखर कविताओं में इस ओर सहज ही ध्यान जाता है। दरअसल, उनकी छोटी कविताओं में अपने अनूठे शिल्प और सारगर्भित-संयमित कथ्य की बानगी लाजवाब है। उनकी एक छोटी कविता सौदा में इसे कुछ यों कहा गया है-
शब्दों का जाल
जिस जल में बिछाया है,
मछली पा जाओगे

बेचोगे किसे मगर?

अपने ही आपको मत
ग्राहक बना लेना
भाव
क्या बताओगे?

इसी तरह उडी कविता में वह कहते हैं-
मुड कर भी
नहीं देखा
इधर

क्यों
दिए मैंने
पंख।

एक और कविता देखें -
अरे
क्या लड मरे सब?
यों काकभुशुंडि जी उवाच

यम के बीहड में ठूँठ खडे
क्या ये ही लोग बचे हैं?

किसने सोचा था झूठ साँच
का झगडा चुक ही जाएगा
यों टाँय-टाँय फिस।

टोह शीर्षक कविता में उनका तेवर कुछ ऐसा है-
बात किसकी टोह में है
किधर है उसकी निराली चाँदमारी का ठिकाना
कौन जाने

तुम जहाँ भी जा रहोगे
आ लगेगा सर ठिकाना।

कलाओं में मूर्त-अमूर्त की बहसों के बीच वे बिल्कुल अलग दृष्टि के साथ अपना तर्क रखते हुए अपने एक आलेख - कला में अमूर्त की भारतीय धारणा और परंपरा में कहते हैं कि देखें तो एब्स्ट्रेक्ट और नॉन फिगरेटिव दोनों का अर्थ अमूर्त में आ जाता है। पर शब्द के सीधे अर्थ को, अभिधा को ध्यान में रखें तो नॉन फिगरेटिव - और उसके साथ ही अमूर्त भी - चित्र के संदर्भ में अनुपयुक्त ही नहीं, भ्रांत कहलाएगा। मूर्ति या आकृति ऐसे रूप को कहा जाता है जो इन्द्रिय-गम्य हो। इसी आलेख में वे आगे कहते हैं कि सच पूछें तो कला में एक ही कला अमूर्त होती है - काव्य। या साहित्य। काव्य का माध्यम - शब्द - अर्थ के बिना नहीं बनता और अर्थ, इन्द्रिय-गम्य नहीं, बुद्धिगम्य होता है। तभी दृष्टांत है कि रोटी के अर्थ को न देखा जा सकता है, न छुआ जा सकता है - खा सकने की तो बात ही क्या! रोटी शब्द किसी खास रोटी के लिए होता ही नहीं। प्रचलित प्रयोग और विचार की विडंबना है कि अमूर्त शब्द का चलन साहित्य के क्षेत्र में नहीं, ऐसी कलाओं के क्षेत्र में फैला है, जो स्वभाव से ही मूर्त होती हैं।
काव्य में अमूर्त की इस दृढ अवधारणा का परिणाम ही माने कि उनकी कविताएँ भी इसी मार्ग पर बढती दिखाई देती है। संस्कृति, दर्शन और ज्ञान-परम्परा से अर्जित दृष्टि जब उनकी कविता बन कर सामने आती है, तो वह बहुधा अमूर्तन की शक्ल में दृष्टिगोचर होती है। प्रचलन में हिन्दी काव्य में अमूर्तन भाषा का प्रयोग हालांकि नया नहीं है - नये-पुराने बहुत से रचनाकारों ने यह युक्ति अपनाई है, ताकि उनका अनुभव संप्रेषण एक अलग रूप में सामने आए, लेकिन अमूर्त भाषा का स्वच्छंद प्रयोग मुकुन्दजी के यहाँ बहुत सहज है। यहाँ भी वे, संस्कृत परम्परा के आग्रह के चलते, अपने पाठकों से सारे तार सुलझाने के लिए सामने रखते हैं। प्राचीन काल में यह अपेक्षा हुआ करती थी कि कवि सह्रदय हो और पाठक कवि-मन की थाह लेने वाला सज्जन पुरुष। दावे से तो नहीं कह सकता, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी काव्य-सर्जना की सघन, परत-दर-परत फैली अभिव्यक्ति अपने कई स्वरूप भारतीय परम्परा और संस्कृति से हासिल करती है, जो हिन्दी के प्रचलित प्रयोग और इसके मुहावरे से भिन्न है। शायद एक वजह यह भी रही हो कि उन की कविताओं पर हिन्दी समाज का उतना ध्यान नहीं गया, जितना देने की दरकार है।
कोई भी कला रूप, दरअसल मानवीय संवेदनाओं की साधना ही होता है। हालांकि जरूरी नहीं की उसका मर्म सादृश्य की परिधि में ही हो। कविता अपनी भाषा की परिधि में जरूर गढी जाती है, लेकिन अनुभव के विस्तार की वजह से उसका फलक अनन्त होता है। अर्थात् जो अभिव्यक्त है, वह भाषा के (स्थूल) शब्दों से परे भी अपना अर्थ बरामद करता है। जब अनुभव एक से अधिक ज्ञानानुशासनों से गुजरते हुए अर्जित किया जाता है, तो निश्चय ही वह अभिव्यक्ति के नये स्वरूप को भी अर्जित करता है। कविता के बारे में यह सर्वविदित है कि कविता कभी योजना बना कर नहीं लिखी जाती जैसा कि कथा, उपन्यास, कहानियों और नाटकों इत्यादि के लिए कहा जाता है। यह तो दरअसल उस अचानक कौंधे विचार-अनुभव के विस्मृत होने से पहले ही उसे कविता रूप दे कर हमेशा के लिए स्मृति में बसाने का एक नैसर्गिक कर्म है। यह भी सही है कि केवल कोई विचार कभी कविता नहीं हो सकता, उसमें अनुभव का भव भी उतना ही जरूरी है, जितना उसका शिल्प और कथ्य। मुकुन्द लाठ की कविताओं को पढते हुए महसूस होता है कि जब वे संस्कृति, दर्शन, ज्ञान-मीमांसा और परम्परा के अध्य्यन-विवेचन में कहीं गहरे खोये हुए हों और अचानक से अपने को उस घेरे से निकालना चाहते हो, तभी उन्होंने कविताएँ रची होंगी। उनकी कविताओं में वह छटपटाहट बहुत मुखर है। उनकी इस कविता निर्बीज में ऐसी ही स्थिति दिखती है
फक पडी थी घास
दबी पाँव तले, तिडक गई।

फुनगी से
उडा बीज
रेशम का फाहा था।

तैर गया कोमल
हवा की हथेली पर।
सूरज सहला रहा है
गिनता हर रोएँ को
काँप रही उँगलियों से
- टूटे ना।

मेरी आस्तीन
बीस सलवटों में खुरदरी है -
बीज वहाँ सीधा उड उत्सुक-सा आ बैठा
चिडिया ज्यों घोंसले में

अब मेरे ऊसर में
मिट रहेगा।

अपने एकान्त में जब वो निर्वाक की रचना करते हैं, तो भीड के बीहड की कल्पना से बार-बार लौटने की सोचते हैं।
आहट नहीं।
अब लौटती पदचाप का
सुनसान है।

वही हलचल, वही कोलाहल -
शिरा का सो रहा
षड्यंत्र
फिर सर उठाता है।

आततायी मन
वहीं फिर ले चला है
बुन रहा हूँ जहाँ
अपनी भीड का बीहड।

उधर फिर कान दोगे?
स्वर जहाँ
निर्वाक

यह छटपटाहट या कहें कि टीस, काव्य-संग्रह की शीर्षक कविता में अपने चरम पर है। काव्य-संग्रह का शीर्षक अनरहनी रहने दो अगर उन्होंने चुना है तो यह उनके सबसे करीब रही रचना ही होगी, जिसमें वे कहते हैं -
अरा-अरा बिखर रहा हूँ
रोम-रोम क्षुब्ध
अप्रतिष्ठ
भटकता
अराजक
इस चलने में
चक्र का त्रिशंकु
केन्द्र

पर यहीं इंगित है र्‍
चक्रचारी का है विलीन
अप्रतीक मर्म।

यही अनकही
रहने दो


इसी तरह का भाव उनकी एक और कविता में दिखाई देता है- बैठा ही तो
मैं यहीं
उन्मन कहीं
बैठा ही
तो रह जाता

किस अचानक कौंध ने
चंचल किया शरीर

मन अब बैठ नहीं पाता
उनकी बहुत-सी रचनाओं में उपसंहार जैसा दृश्य अवश्य दिखता है, तो इसके पीछे उनकी यह दीठ रही होगी जिसमें नाटक को दृश्य-काव्य की तरह परोट कर, वे अपनी हर रचना में एक संपूर्ण दृश्य पैदा करने की चेष्टा करते रहे। हर काव्य-रचना अनन्तः पाठक के मन में एक बिम्ब का निर्माण करती है, और वे उस बिम्ब में कुछ भी अधूरा नहीं छोडते - भले ही बहुत कम शब्दों में कविता कही गयी हो। यह उनकी कविता की समझ से *यादा, कविता के मर्म को समझने का ही प्रतिफल होगा कि उनकी छोटी रचनाएँ बडी या लम्बी कविताओं से *यादा मारक, *यादा कहन लिए है। कोई भी पाठक उनकी काव्य-यात्रा से रूबरू होने के बाद अशोक वाजपेयी की इस बात से पूरी तरह सहमत होगा कि उन जैसा अधीत विद्वान चुपचाप इतने बरसों से कविता लिख रहा है, उससे कम अचरज की बात यह भी नहीं है कि ये कविताएँ किसी भी काव्य-निकष या काव्य-रुचि के आधार पर कविताएँ हैं। वे अपने लिए किसी रियायत की माँग नहीं करतीं। वैसे तो किसी भी सर्जक के लिए कोई रियायत बरते बिना ही उसका विवेचन करना सही अर्थों में उसकी कला का सम्मान होगा, मुकुन्द लाठ के लिए तो ऐसा करना दरअसल कलाओं के मौलिक विचार और चिन्तन की उनकी परम्परा को सच्ची श्रद्धांजलि होगा।
अभी जब यह आलेख लिख ही रहा हूँ, तो अमेरिका से यह दुखद समाचार आया कि मुकुन्द लाठ के संगीत गुरू पंडित जसराज नहीं रहे। एक पखवाडे के भीतर गुरू-शिष्य का यों इस दुनिया से विदा लेना दुखदायी है। शायद वो किसी अगम-अगोचर में एक साथ फिर से लय साधने और जुगलबंदी करने के लिए ही हमसे बिछडे हैं। लेकिन उनकी कलाओं के अमिट हस्ताक्षर एक नाद बन कर हमेशा हमारा पथ प्रदीप्त करते रहेंगे। यों, कोई हमसे बिछड ही नहीं सकता जो मन की अतल गहराइयों में वास करता हो। मुकुन्द लाठ सरीखे विद्वान तो हृदय पर ही काबिज होते हैं, उनकी कमी जरूर खलेगी, लेकिन वे हमारे बीच, हमेशा उपस्थित रहेंगे - उन्हें, उनके किसी भी ज्ञान-अनुशासन में चित्त लगा कर बस, सुनने-गुनने की ही देर है।
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नंदपुरी अंडरपास, मालवीय नगर,
जयपुर- ३०२०१७
मो. ९९२८८-६१४७०