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भावन : भारतीय कला दृष्टि की विरल व्यंजना

राजेश कुमार व्यास
भावन शब्द के सीधे-सादे अर्थ पर जाएँगे, तो पाएँगे, वह जो मन को प्रिय या भला लगे। आत्मीय। अर्थ के विस्तार में ध्यान, मनन और चिंतन के साथ इसमें गवेषणा को भी लिया जा सकता है। वामन शिवराम आप्टे के संस्कृत-हिन्दी कोश में भावन का अर्थ सिक्त करना, सराबोर करना, किसी सूखे चूर्ण को रस से भिगोना भी है। मुकुन्द लाठ की कृति भावन कहने को तो साहित्य और कलाओं का अनुशीलन है, पर मुझे यह उनके विचारों का आसव प्रतीत होती है जिसमें प्राचीन शास्त्र, कविताओं और जीवन से जुडे संदर्भों का आधुनिक लोक मथा है। इसमें प्राचीन ग्रंथों से संबद्ध उनकी अपनी मौलिक व्याख्याएँ, स्थापनाएँ हैं, टीकाओं के अनछुए पहलुओं के प्रति प्रश्नाकुलताओं के साथ स्वयं उनके तलाशे उत्तर हैं जिनसे विमर्श की एक नयी राह खुलती नजर आती है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, अभिनव की उसकी व्याख्या, आनन्दवर्द्धन के ध्वनिशास्त्र, पंडित जगन्नाथ आदि बहुतेरे ग्रंथकारों के संदर्भों के आलोक में भावन असल में मुकुन्द लाठ के कलाओं, प्राचीन साहित्य, शास्त्र के चिंतन और दर्शन का अनूठा भव है। इस भव में संवेदनाओं के उनके आकाश में प्राचीन साहित्य, शास्त्र और कलाओं की रसहीन होती जा रही परम्पराओं को हम जीवंत होते देख सकते हैं। मुकुन्दजी के लिखे में भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का बार-बार उल्लेख आता है। भरत द्वारा नाट्यशास्त्र को सर्वशिल्पप्रवर्तकम् कहे जाने के संदर्भ में, वह तमाम दूसरी कलाओं और भाव में रहते हुए भी भाव के तटस्थ रहकर भाव के अवलोकन से जैसे हमें साक्षात् कराते हैं। मुकुन्द जी लिखते हैं, किसी नाटक, कहानी या उपन्यास में हम भाव-चित्त में रहते हुए भी भव के दृष्टा भी होते हैं।
उनकी कृति भावन को पढते बारम्बार उनकी लिखी इन पंक्तियाँ पर ही ध्यान जाता है। इसलिए कि इसमें उन्होंने साहित्य, संस्कृति और कलाओं के साथ प्राचीन कविताओं में निहित रस-भाव में रहते हुए भी तटस्थ भाव का प्रतिष्ठापन किया है। उनका कहना भी है भावन व्यंजित भाव का भाव-चित्त में रहते हुए ही विमर्श-निमज्जन-अवगाहन-आलोडन-परीक्षण है। भाव के लिए कुछ विमर्श जैसा हो ही नहीं सकता, क्योंकि भाव जिस विषय में डूबा रहता है, उसे अपने में समोकर उससे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता-उसका द्रष्टा नहीं बन सकता। भावन में भाव विषय नहीं बनता, भाव ही रहता है। रस चिन्तकों के लिए भाव काव्य, कथा, नाटक... के माध्यम से व्यंजित होकर रस में निष्पन्न-या उन्नीत-होता है। भाव की पहचान शब्द से जोडकर नहीं देखी जा सकती।
मुझे लगता है, मुकुन्द लाठ के चिंतन में भावन की वह व्यापकता है जिसमें समय, समाज और कला-संस्कृति के उनके आत्मीय सरोकारों के साथ परम्परा के आधुनिकता में रूपान्तरण की खेचळ है, अर्थगर्भित व्यापकता है। नाट्यशास्त्र, न्यायशास्त्र के साथ ही दूसरे प्राचीन ग्रंथों को पढते उनके भाव के साथ शब्दों को जोडने की हमारी परम्परा पर भी वे प्रश्न करते हैं और कहते हैं कि भाव अर्थ रूप में ही जागता है। भावन उसका विमर्श करता है, जो भावन की आँख से ही होता है। भाषा में नहीं होता। इसीलिए वे अमूर्त कला का संदर्भ देते हुए एक स्थान पर कहते हैं कि वह आमतौर पर दुरूह लगती है और अक्सर उसके बारे में कहा जाता है कि ठीक से समझ में नहीं आती।
बहरहाल, मुकुन्दजी ने भरतमुनि के नाट्यशास्त्र को सर्वथा नवीन दृष्टि से व्याख्यायित किया है, तो कलाओं के इतिहास, संगीत, नृत्य और नाट्य का उनका चिंतन मौलिक स्थापनाओं में भारतीय दृष्टि की विरल व्यंजना है। यह महज संयोग ही नहीं है कि उन्हें पढते हुए परम्परा, आधुनिकता हमसे एक साथ संवाद करती है। उनके चिन्तन में कला, साहित्य और संस्कृति से जुडे सृजन की संभावनाओं का वैसा ही सहज विस्तार है, जैसा भारतीय रागदारी में होता है। वैसी ही बहुलता भी है। उन्हें पढते यह भी अनुभूत होता है कि किसी प्राचीन कृति को सूक्ष्म दृष्टि से कैसे मौलिकता में देखा, समझा ही नहीं जाता बल्कि अनुभूति की आँख में मौलिक रूप से अँवेरा भी जाता है। साहित्य और अन्य कलाओं के अनुशीलन में परम्परागत विचारों के जडत्व को तोडते उनके चिंतन में अनूठा उजास है। प्राचीन ग्रंथों, शास्त्र की उनके लिखे में सहज विवचना-व्याख्या ही नहीं है बल्कि उससे संबद्ध समस्त रहस्यमयी गूढ ग्रंथियों का मर्म भी खुलता नजर आता है। बहुत से स्तरों पर यह भी लगता है, साहित्य और कलाओं की उनकी दृष्टि की यह भी विशेषता है कि उसमें रचना को देखने और परखने की नयी दृष्टि ही नहीं मिलती, बल्कि उसे सांगोपांग फिर से पढने में भी सहायता मिलती है।
यह गौर करने की बात है कि हमारे यहाँ कला संस्कृति से संगीत में पृथक चिन्तन अत्यल्प हुआ है। इस दृष्टि से मुकुन्द लाठ के संगीत चिंतन पर जाते हैं, तो लगता है, परम्परागत अवधारणाओं की बजाय वहाँ विचार की बढत है। राग, धुन, आलाप की संगीत शब्दावली के सैद्धान्तिक पक्ष की बजाय वह उसके वैचारिक अंतर्लोक में जाकर नया आलोक देते हैं। भावन असल में उनके समय-समय पर लिखे निबन्धों, व्याख्यानों और कुछ महत्ती कृतियों की भूमिकाओं का ही संकलित रूप है, परन्तु मुझे लगता है-मुकुन्दजी के चिंतन को समग्र रूप में इसमें एक ही स्थान पर संजोने का महत्ती कार्य रजा न्यास ने किया है। इसके प्राचीन साहित्य से प्रेरित लेखन, साहित्य कलाओं के स्वरूप-विचार और कृति-विचार खंडो में मुकुन्दजी की साहित्य और कलाओं की सूक्ष्म सूझ को गहरे से संजोया गया है। भावन के संगीत और रस-सिद्धान्तः एक समस्या, भाव और संगीत, संगीत का भावलोक, स्वर और शब्द, कला में अमूर्त की भारतीय अवधारणा और परम्परा आदि निबन्धों में संगीत, नृत्य और नाट्य पर गहन विमर्श ही नहीं है, बल्कि अब तक के विचारों का एक तरह से नवोन्मेष है। संगीत से जुडी उनकी स्थापनाएँ भारतीय संगीत की रूढ और जड होती चिंतन परम्परा से हमें मुक्त करती है। वे लिखते हैं, सामगान हमारा सबसे प्राचीन संगीत ही नहीं, परवर्ती राग-संगीत का जनक भी है। पर साम धुन है, और राग धुन से बिल्कुल अलग। इसी तरह धुन की उनकी व्याख्या में सिरजे से जुडे संस्कारों का अनुपम आलोक है। ऐसे ही आलाप की उनकी व्याख्या देखें, आलाप का अर्थ है बदल-बदल कर बढना। स्वरों के नये नये बनाव, नई उपज, नये विस्तार, चलने के नये रास्ते, इन पर चलना। आलाप की इस व्याख्या के साथ ही वे स्वरों की संगति में संगीत की तलाश करते हैं। लिखते हैं, स्वरों की अपनी संगति में, संगीत की अपनी मर्यादाओं और संभावनाओं में, हम औचित्य की कसौटियों की खोज कर सकते हैं।
यह सही है, संगीत सुनते तो उसे गुना गया है, परन्तु चिन्तन में संगीत कहीं नहीं दिखता। मुकुन्दजी का लिखा संगीत का मौलिक चिंतन ही नहीं है, बल्कि कला इतिहास की वह भारतीयता है जिसे पश्चिम की इतिहास परम्परा में अपने को देखने के आदि होते हमने बिसरा दिया है। वे अपने चिंतन में संगीत को परम्परागत सैद्धान्तिक दायरों से बाहर निकाल उसमें विचार का नव उन्मेष जगाते हैं।
भावन में एक स्थान पर वह लिखते हैं दूसरी कलाओं की तरह राग-संगीत में भी व्युत्पति की रूढियाँ हमें नये से एक सीमा तक रोकती है। राग-संगीत जैसी परम्पराओं में रूढि शास्त्र नहीं बाँधता-गुरू, सम्प्रदाय, घराने बाँधते हैं। वे जब यह लिखते हैं, तो कलाओं के इतिहास को, उसके अतीत को, संघर्षों को सहज जाना जा सकता है। विचार के स्वरूप को पहले पहल संगीत की दृष्टि से देखते वे बेहद महत्त्वपूर्ण अवधारणाएँ भी दते हैं। मसलन संगीत संस्कृति विशेष की परिधि के भीतर ही बनता और पनपता है क्योंकि शब्द का अनुवाद हो सकता है, पर स्वर का नहीं। यह भी कि चिंतन भाषा के माध्यम से होता है, संगीत स्वर के माध्यम से। और यह भी कि संगीत की हर समृद्ध परम्परा अपना अलग आधुनिक बनाती है जिसमें दूसरे का प्रवेश कु-साध्य होता है।
उन्हें पढते भारतीय संगीत के संबंध में बने बहुत से पूर्वाग्रह टूटते भी हैं। वह कहते हैं, चिंतन के साथ संगीत बज नहीं सकता, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इनकी किसी भी तरह जुगलबन्दी नहीं हो सकती। राग, धुन, आलाप जैसी शब्दावली के अपने चिन्तन में मुकुन्द लाठ का संगीत चिन्तन लीक तोडती परम्पराओं की एक तरह से नयी दीठ है।
भावन का उनका एक महत्त्वपूर्ण निबन्ध साहित्य से मुझे क्या मिलता है? है। इसमें भरत द्वारा नाट्य को लोक का अनुकरण कहने की बजाय अभिनव द्वारा उसे स्वतंत्र कहते हुए अनुव्यवसाय जैसी संज्ञा पर ध्यान दिलाते हैं। मुकुन्दजी न्यायदर्शन में प्रयुक्त अनुव्यवसाय शब्द केले जाते हुए स्पष्ट करते हैं अनुव्यवसाय, ज्ञान का ज्ञान में दोहराव है और इस दोहराव की गिनती बढती चली जा सकती है-मैं कुछ जानने के जानने को जानता हूँ। अभिनव के बरते अनुव्यवसाय शब्द के आलोक में भरत के नाट्यशास्त्र का सांगोपांग विश्लेषण ही मुकुन्दजी ने नहीं किया है, बल्कि नाट्यशास्त्र से जुडे कला सराकारों की भी विरल व्याख्या एक तरह से की है। मुझे लगता है, भरत के नाट्यशास्त्र के साथ अभिनव की व्याख्या में स्वयं मुकुन्दजी की स्थापना का भी महत्ती स्थान है। उन्होंने भरत की स्थापनाओं की अभिनव द्वारा की गयी व्याख्या और नवीनता के संदर्भों को व्यवहार में अपने तईं गुना और बुना ही नहीं है, बल्कि पाठकों को भी वह स्पेस दिया है जिसमें विमर्श के नये रास्ते खुलते नजर आते हैं। उनके लिखे की बडी विशेषता यह भी है कि उन्होंने साहित्य और कलाओं के रस की विरल मीमांसा की है।
सभ्यता की धारणा और भारत में नृत्त कला की स्वायत्ता का प्रत्यय निबन्ध में आज के इतिहास बोध की विलक्षणता को उसकी व्यापकता मानते हुए मुकुन्द जी सभ्यता और संस्कृति से जुडे प्रश्नों पर विमर्श की नई राह सुझाते हैं। वह लिखते हैं, सभ्यता और संस्कृति मूलतः एक ही धारणा के प्रत्यय हैं। पर सभ्यता और संस्कृति को अलग भी किया जाता है-संस्कृति अधिक व्यापक धारणा है, सभ्यता संस्कृति के अन्तर्गत है। संस्कृति मनुष्य मात्र को परिभाषित करती है। मनुष्य बिना संस्कृति के नहीं होता। संस्कृति मनुष्य का वह धर्म है जो उसे प्रकृति से अलग, उससे ऊर्ध्व और स्वतन्त्र करता है। पशु-भिन्न करता है-प्रकृति के कार्य-कारण प्रवाह से मुक्त कर उसे ज्ञातृत्व, भावयितृत्व, कर्तत्व की क्षमता देता है। संस्कृति को सभ्यता का पर्व बताते हुए वह सभ्यता समग्र के परिप्रेक्ष्य में कला के इतिहास की सूक्ष्म विवेचना करते हैं। उनका मानना है कि कला के इतिहास को हम वास्तु, मूर्ति और चित्र से ही आँकते हैं। इसका कारण यह है कि अपने आपको हम यूरोप के दर्पण में देखते आए हैं। इसीलिए कला के इतिहास को वह संगीत की हमारी वैदिक परम्पराओं से देख जाने, कला में अमूर्तन को लेकर पश्चिम की चली आ रही दृष्टि की बजाय हमें हमारी परम्परा, ज्ञान के मर्म और अन्तःदर्शन में समझे जाने और उस ओर बार-बार ले जाने का जतन अपने लिखे में करते हैं। भारत की संगीत और नृत्त परम्परा के इतिहास की ओर देखने का संकेत करते वह लिखते है ंकि इसमें हम अपने आपमें एक विलक्षण छवि उभरते देख सकते हैं। वह भरत के नाट्यशास्त्र को शुंग काल-द्वितीय से प्रथम सदी ईस्वी-पूर्व में रखे जाने और उसे कईं कलाओं के संगम रूप में देखे जाने के अपूर्व संकेत अपने लिखे में देते हैं। वह लिखते हैं, सभ्यता में कला का स्थान और महत्त्व आँकना चाहें, तो भरत ने संगीत और नृत्त पर जो समझा-सोचा है, उसे परिप्रेक्ष्य में रखना होगा और अपनी सभ्यता के कला-बोध के लिए तो यह अनिवार्य है। उनके लिखे में भरत द्वारा की गयी नृत्त, संगीत की सूक्ष्म व्याख्या का नवोन्मेष है, अभिनय के उसके भेद के साथ ही अभिनव द्वारा नृत्त को स्वयंप्रतिष्ठ कहने का मर्म भी है।
नाट्य के दूसरी कलाओं से सम्बन्ध पर मुकुन्द जी की स्थापना बेहद महत्त्वपूर्ण है। वह लिखते हैं, यह कहना ज्यादा सही नहीं होगा कि नाट्य अपने आप में अलग कला नहीं है-नाट्य बनता ही भिन्न कलाओं के मेल से है, तो फिर क्या नाट्य को स्वतन्त्र कहना ठीक भी है, और ठीक है तो किसी अर्थ में, उनके कहे में इन्हीं प्रश्नों को लेकर वह एक महत्त्वपूर्ण निबन्ध जब नाट्य अपना एक स्व-रूप साधता है भरतमुनि द्वारा नाट्य को सर्वशिल्पप्रर्वतकम् कहे जाने के आलोक में नाट्य, नृत्त, संगीत, अभिनय, वास्तु आदि तमाम कलाओं के अन्तःसम्बन्धों पर भी महत्ती विमर्श हमें सौंपते हैं। हरेक कला की अपनी स्वतन्त्रता पर भी इस परिप्रेक्ष्य में पाठक को बहुत कुछ महत्त्वपूर्ण मिलता है। वह लिखते हैं, किसी भी स्वतंत्र कला में ऐसा रूपान्तर साधा जा सकता है जिसे वह अन्य कला या कलाओं के मिलन के योग्य बनायी जा सके। भरत ने नृत्त के साथ यही किया था। उन्होंने गान्धर्व-संगीत के साथ भी यही किया था। गान्धर्व का नाट्य में यों का यों प्रयोग सम्भव नहीं था-वह नृत्त की तरह ही स्वतन्त्र कला थी। नाट्य के पूर्वरंग में गान्धर्व के ही गीत के साथ नृत्त का प्रयोग होता था-जहाँ अभिनव ने दोनों को स्वतन्त्र कहा है और उनके संगम को बाह्यधर्मी। ऐसा लिखते वह अभिनव द्वारा रस की चर्चा के साथ ही नृत्त में शोभा के स्वरूप की प्रस्तुति के संदर्भ में स्वयंप्रतिष्ठ कला के लक्षणों को भी गहरे से समझाया है। इसी संदर्भ में वह नृत्य कला की स्वतन्त्रता का उदाहरण देते हैं कि नृत्य कला इसलिए स्वतन्त्र है कि वह नाट्य की तरह लोक की ओर नहीं झाँकती, अपने भीतर झाँकती है। शरीर की स्थिति, गति में ही उसकी सार्थकता है और इसीलिए बाहर के किसी अर्थ को समोने की उसे जरूरत नहीं है। इसी तरह अन्य कलाओं की भी स्वतन्त्रता का उनका विवेचन तर्क के साथ प्रस्तुति की व्यावहारिकी में है।
कला में अमूर्त की भारतीय धारणा और परम्परा निबन्ध में वह ऐब्सट्रैक्ट की बनी-बनायी विचारधारा से ध्यान हटाते हुए अमूर्तन से जुडे बहुत से महत्त्वपूर्ण स्त्रोत हमें देते हैं। वह लिखते हैं, ऐब्सट्रैक्ट कृति बनाते हुए कलाकार लोक में उपलब्ध आकृतियों को नकारता नहीं है, उन्हें अपनी तरह से रूप देता है। कह सकते हैं कि कलाकार यहाँ सादृश्य की साक्षात् साधना से हटकर उपलब्ध का अपने माध्यम की संभावनाओं में उद्ग्रहण (ऐब्सट्रैशन) करता है। इसे उपलब्ध का कला-कृत रूपान्तर भी कह सकते हैं। भारतीय परम्परा का हवाला देते हुए वह कहते हैं कि कला के अनुकरण में उपलब्ध का उद्ग्रहीत होना या रूपान्तरित होना कोई नयी बात नहीं है, बल्कि कला का ऐब्सट्रैक्ट होना उसका स्वभाव ही है। कोई भी कला जब बाहर की-लोक की-प्रस्तुति करती है, उसे हू-ब-हू नहीं उतारती-और न उतार सकती है।
मुझे लगता है, मुकुन्द लाठ की वाग्मिता प्राचीन परम्पराओं, संस्कृति और आख्यानों में होते हुए भी जडत्व से मुक्त हैं। परम्परा बोध के आधुनिकीकरण में उन्होंने प्राचीन मान्यताओं, शास्त्र और लोक का अपने लेखन में जो मेल किया है, वह बेजोड है। प्राचीन गं*थों, पारम्परिक धारणाओं, मिथकों, पौराणिक आख्यानों और कथाओं के राग-अनुराग में वह सोच के दायरों का एक तरह से आधुनिकीकरण करते हैं। उन्होंने शास्त्र और साहित्य, संस्कृति की पुरानी हमारी जो धारणाएँ हैं, उन्हें समकालीनता के नवीन संदर्भों में व्याख्यायित किया है। वह लिखते भी हैं, परम्परा इतिहास में तभी प्रमाण हो सकती है जब दूसरे ठोस प्रमाणों के बल पर खडी हो। इसीलिए सुनी-सुनाई को, किंवदन्ती को सत्य के उद्घाटन में प्रमाण नहीं माना जा सकता। द्वारका की खोज और उसके रूप की अपनी चर्चा में मुकुन्दजी ने इसीलिए पुराण संदर्भों में अपने तईं विचार का मौलिक संधान किया है। नरेश मेहता के साथ की गयी यात्रा की दीक्षा में गंजी से हुई शुरूआत में पुरानी बस्तियों के गिनाए नामों के मूल में ले जाते वह द्वारका के अतीत और वर्तमान से होते हुए कृष्ण की द्वारका के संबंध में बहुत सारे अनछुए रहस्यों से अनायसास पर्दा हटाते हुए महाभारत और कृष्ण के चरित्र के उस मर्म में भी प्रवेश कराते हैं जिसके मूल में लोकतंत्र की हमारी अवधारणा के बीज हैं।
भावना में प्राचीन साहित्य से प्रेरित लेखन की बढत है, तो साहित्य और कलाओं के स्वरूप पर भी गहराई से विचार करते बहुत-सी नवीन स्थापनाएँ पाठक को मिलती हैं। ऐसी जिनमें उनके परम्परा के साथ आधुनिक बोध को गहरे से समझा जा सकता है। हमारी परम्परा और (हमारी) आधुनिकता निबन्ध में उन्होंने कहा भी है कि बडी समृद्ध, बडी व्यापक, बडी लम्बी परम्पराएँ हैं, हम उन परम्पराओं को केवल इतिहास के निस्संग अध्ययन का विषय बनाकर नहीं छोड सकते। विशेषकर विचार के क्षेत्र में। विचार में आत्मस्थ होने की आवश्यकता, या भावयित्री प्रतिभा की आवश्यकता कहिये, हमारी किसी भी परम्परा को सार्थक दृष्टि देने के मर्म में होती है। विचार में ही सभ्यता-संस्कृति आत्मावलोकन करती है। इसीलिए उन्होंने यह भी कहा है कि हम परम्परा में रहते हैं, इतिहास में नहीं। परम्परा सचमुच हमारी हो, तो आधुनिक भी हमारा होगा। असल में उनके लिखे में परम्परा और आधुनिकता के बहाने जड मूल्यों पर प्रहार है।
परम्परा और आधुनिकता के संदर्भ में एक स्थान पर वह अचरज जताते हैं कि हम बाहर, पश्चिम से आये घासलेटी से गाने-बजाने को भी अनायास आधुनिक का नाम देते हैं, पर कुमार गन्धर्व को नहीं! वे पारम्परिक ही कहलाते हैं। उनका कहना है, आत्मवीक्षा में पाएँगे कि आधुनिक हमारे लिए पश्चिम से नत्थी है-अनिवार्य-भाव से युगनद्ध है। पश्चिम के साथ आधुनिक का ऐसा एक-सा अद्वैत सम्बन्ध हमारे मन में बन गया है कि कुछ कलाएँ, जैसे संगीत और नृत्य, इनमें कितना ही नया हो, कितना ही सार्थक नया हो, ये हमारे लिए पारम्परिक ही बनी रहती हैं-अर्थ यह कि इनमें जो नया है वह भी अपने स्वभाव में, अपने मर्म में पुराना ही है। संगीत का इस संबंध में बाकायदा वह उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि आज के रूपों का पुराने रूपों से सम्बन्ध समस्या ही है, पर इतना तो तय है कि नये रूप पुराने रूपों की पुनरावृत्ति तो बिलकुल नहीं हैं। राग-संगीत तो हमारा बनता ही आलाप से है जिसमें नयापन घुट्टी में ही पडा रहता है। पर इनके साथ आधुनिक शब्द फिर भी नहीं जुड सकता। मुकुन्दजी इसीलिए इस बात की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि हमारा रहना और कुछ भी करना, चिन्तन करना, यह किसी न किसी परम्परा में ही होता है, आधुनिक शब्द के पश्चिमधर्मी प्रयोग की भी हमारे लिए अब परम्परा ही बन गयी है-बल्कि परम्परा नहीं रही, रूढि हो गयी है, वह भी हमारी नहीं, बाहर की, जिसे हमने ओढ रखा है।
यात्रा और द्वारका का संघराज का लेखन उन्होंने अज्ञेयजी के आग्रह पर भागवतभूमि यात्रा के प्रसंग में किया था, पर इसके बहाने उन्होंने कृष्ण द्वारा संघ राज्य की स्थापना के आलोक में लोकतांत्रिक व्यवस्था और उससे उत्पन्न होने वाली चुनौतियों, समस्याओं का भी विशद् विवेचन किया है। उन्होंने महाभारत के शान्तिपर्व के उस प्रसंग से अपनी बात को आगे बढाया है जिसमें श्री कृष्ण नारद के पास जाते हैं और द्वारका में अपने राज की शिकायत भरी समस्या बताते हैं। श्री कृष्ण की संघराज्य की समस्या के आलोक में ही पूरे लेख का ताना-बाना बुना गया है। मुकुन्दजी कृष्ण के कहे के संदर्भ में ले जाते हुए लिखते हैं कि द्वारका का राज्य संघ की प्रणाली पर चलता था। वह स्पष्ट करते हैं कि महाभारत में भले ही द्वारका के संघतंत्र का स्पष्ट ब्योरा सुसम्बद्ध रूप में नहीं है, परन्तु इतना स्पष्ट है कि यह संघतन्त्र, कुलतन्त्र था। कईं क्षत्रियों के कुल मिलकर राज्य चलाते थे। इन कुलों के प्रधान स्वाधीन रहते हुए भी एक जुट थे। इस एकजुटता में कृष्ण का बडा हाथ था। उन्होंने ही इसे पाला, वैभव दिया पर बाद में आपस में फूट, एक-दूसरे से आगे जाने की होड से बाद में देखते-देखते ही इस संघ ने अपने आपको मिटा भी डाला। कृष्ण की नारद के समक्ष शिकायत यही है कि द्वारका के कुल प्रधान स्वतंत्र, स्वाधीन प्रकृति के थे, उनके स्वभाव में उत्तेजना थी और ऐसे लोगों को स्वेच्छा से साथ रखना, संघबद्ध रखना कुशल संघ मुख्य के लिए भी सिरदर्द है। मुकुन्दजी स्थापित करते हैं कि द्वारका के संघराज्य की बडी बात यह भी थी कि वहाँ कृष्ण राजन्य थे, राजा नहीं थे। वह केवल कर्मेण संघमुख्य थे। महाभारत युद्ध में दुर्योधन को दी अपनी नारायणी सेना का संदर्भ देते वह स्पष्ट करते हैं कि द्वारका की समूची सेना नहीं थी, बल्कि कृष्ण की संघ प्रमुख रूप में अपनी स्वाधीन सेना थी। इसे और स्पष्ट करते उन्होंने लिखा है कि द्वारका के एक और राजन्य, कृतवर्मा पूरी तरह दुर्योधन के साथ थे-अपनी सेना के साथ वे स्वयं भी दुर्योधन की ओर से लडे। मुकुन्दजी ने महाभारत और दूसरे पुराणों के संदर्भ में अपने इस लेख में कृष्ण के उस चरित्र का भी विशद् वर्णन किया है जिसमें उन्होंने कंस को हटाकर मुट्ठी में आये राज्य को संघ राज्य बनाया। चाहते तो शक्ति से जीते उस राज्य के वह राजा हो सकते थे, परन्तु उन्होंने अपनी जीत के ऐश्वर्य को स्वेच्छा से संघ-राज्य बना बाँट दिया। द्वारका देश का इस दृष्टि से पहला गणराज्य था और कृष्ण ही वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने संघ के आदर्श की पहले-पहल स्थापना हमारे यहाँ की। मुकुन्दजी लिखते हैं, हमारा राजनीतिक चिन्तन भले ही गणराज्यों से विमुख हो गया, परन्तु कृष्ण से विमुख नहीं हुआ। मुकुन्दजी ने संघ राज्य प्रणाली की समस्याओं का तो द्वारका के संदर्भ में जिक्र किया है, परन्तु यह भी स्थापित किया है कि सारा दोष संघ प्रणाली का ही नहीं था, बल्कि मनुष्य के उन तमाम अवगुणों का था जो सर्वत्र व्याप्त हैं।
बहरहाल, महाभारत के संदर्भ में संघ गणराज्य की विचार बढत में मुकुन्दजी ने ही संभवतः पहले-पहल यह मौलिक स्थापना अपने तईं की है कि संघ आदर्श रूप में कृष्ण की द्वारका गणराज्य प्रणाली की नींव है। यात्रा और द्वारका का संघराज्य आलेख को पढते यह भी अनुभूत होता है कि मुकुन्द लाठ अपने लिखे में पुराणों, शास्त्रों और परम्पराओं में आए विचारों, स्थितियों और प्रकरणों को जस का तस स्वीकार नहीं करके चिंतन का नया आकाश रचते हैं। उनके लिखे में इसी तरह पाठ केन्द्रित बहुलार्थक भाष्य, टीका, रचना के आभ्यंतर की गहरी छानबीन है।
भारतीय चिंतन में विभिन्न स्तरों पर रस की मीमांसा अलग-अलग रूप में की गयी है। रस विमर्श में विभाव, अनुभाव और संचारी तीनों के संयोग से एक ऐसे ही रस की उत्त्पत्ति की बात कही गयी है जो अन्य रसों से भिन्न होगा और जिसकी समता दूसरे से न हो सकेगी। मुकुन्द लाठ ने अपने लेखन में भरत के रस-सूत्र की चर्चा करते हुए कहा है कि इसकी उद्भावना नाटक की रमणीयता को समझने के लिए ही की गयी थी। परवर्ती चिन्तन में इस सिद्धान्त को काव्य तक ही नहीं संगीत को भी परिधि में ला दिया गया। इसी संदर्भ में वह अपने आलेख संगीत और रस सिद्धान्तः एक समस्या में सवाल उठाते हैं कि संगीत में विभाव-अनुभाव-व्यभिचारी भाव की बात हम कैसे कर सकते हैं? और नहीं कर सकते तो रस-सूत्र को संगीत पर कैसे उतार सकते हैं? आप कहेंगे गेय पदों के माध्यम से। गेय पद काव्य होता है और उसके माध्यम से रस-सूत्र संगीत में व्याप्त हो सका है। मुकुन्दजी लिखते हैं, इससे बात नहीं बनती। संगीत की स्वतंत्र सत्ता को तिलांजलि देनी पडती है, उसके प्रभाव को अन्य सापेक्ष दूसरे का मुँह देखने वाला माननना पडता हैः यह मानना पडता है कि बिना पद के संगीत संगीत ही नहीं होता, उसका कोई अपना आस्वाद ही नहीं होता। इस बात को कैसे मान सकते हैं, हमारा बोध गवाही देता है कि संगीत का अपने आप में एक आस्वाद ही नहीं, पूरा का पूरा आस्वाद जगत होता है। संगीत की परिभाषा में पद या काव्य को शामिल कर लेने में एक कठिनाई और भी है। हमारे संगीत का जो परम ध्येय है-और सदियों से रहा है-वह है राग की सृष्टि। रस का, बल्कि रस विशेष का, सम्बन्ध भी राग से किया जाता है। पर राग का सम्बन्ध कभी पद से नहीं किया गया हैः राग को गाया भी जा सकता है, बजाया भी जा सकता है और बजाने में राग के रागत्व की कोई हानि नहीं होती है। कहना नहीं होगा कि ऐसी दशा में संगीत को रस-सूत्र के घेरे में खींच लाना कठिन समस्या का विषय हो जाता है।
रस-निष्पत्ति की चर्चा संगीत में नहीं होने के साथ ही अनुकृति प्रधान कलाओं जैसे नाटक, काव्य, चित्रकला पर रस की एक ही व्याख्या-पद्धति को पूरा उतार लेने पर भी वह प्रश्न करते हैं। संगीत को विशुद्ध ध्वनि बताते हुए वह नृत्त को विशुद्ध अंग संचार बताते हुए अभिनय और नृत्त के अंग-संचार भेद में भी पाठक को ले जाते हैं और आनन्दवर्धन के ध्वनि सिद्धान्त में इस चर्चा को नया मोड देने का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि उन्होंने संगीत में रस निष्पत्ति की समस्या को देखा तो था, परन्तु उसकी मीमांसा नहीं की। वह यदि संगीत में रस निष्पत्ति का चिन्तन करते तो रस-सूत्र से अलग अपनी एक नयी दिशा भी बनाते पर ऐसा हुआ नहीं। भरत द्वारा नृत्त को किसी अर्थ की अपेक्षा नही ंरखते हुए शोभा को जन्म देने और और उनके इस कहन में किसी तरह के सौंदर्य की मीमांसा का प्रयास नहीं करने पर भी वह कहते हैं कि शोभा है कहना और शोभा की मीमांसा करना इनमें बहुत अन्तर है। नृत्त में शोभा की निष्पत्ति कैसे हेाती है? शोभा के प्रकार क्या हैं, उनमें अन्तर क्या हैं?-भरत इन प्रश्नों की चर्चा ही नहीं करते। पर इनकी चर्चा वे करते, तो रस-चर्चा से इस चर्चा का वैषम्य उनसे छुपा नहीं रहता।
मुकुन्द लाठ ने संगीत और रस-सिद्धान्तः एक समस्या के बहाने असल में भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, आनन्दवर्द्धन के ध्वनि सिद्धान्त और अभिनव द्वारा नाट्यशास्त्र की की गयी टीका में उल्लेखित महारास की चर्चा को आगे बढाते हुए अलंकार शास्त्र के लम्बे इतिहास की अंतिम कडी कहे जाने वाले पंडित जगन्नाथ के उस कहे की खासतौर से याद दिलाते हैं, जिसमें उन्होंने इस बात को एक सिद्ध रूढि माना था कि संगीत में रस होता है। रस की मुकुन्द लाठ की चर्चा के साथ ही उठाए गए सवाल इस विषय को सांगोपांग ढंग से देखने के लिए गहरे से उकसाते हैं। यह विडम्बना ही है कि इस पर इधर कहीं कोई चिंतन या चिंतन के लिए किसी प्रकार की कोई उत्सुकता भी दिखायी नहीं देती है। रस के सम्बन्ध में मुकुन्द लाठ की चर्चा संगीत विमर्श से जुडे उनके गहरे सरोकारों का वह राग है जिससे हर कोई अनुराग कर सकता है। भरत के बताए रसों की अनूठी व्याख्या तो अपने लिखे में वह करते ही हैं, अभिनव, आनन्दवर्धन के साथ ही पंडित जगन्नाथ की काव्य परिभाषा से भी रसानुभूति को निरंतर तौलते हैं। अभिनव द्वारा अनेक रसों के लिए दिए एक शब्द महारास के आलेाक में वह उनसे यह कहते असहमति भी जताते हैं कि महारास में हमें ऐसी धारणा नहीं मिल सकती, जो कला मात्र पर खरी उतरे।
भावन के आरम्भ का महत्त्वपूर्ण निबन्ध स्वतन्त्रा स्त्री है। गणिकाओं के संसार, समृद्ध संस्कृति के साथ स्त्री स्वतंत्रता से जुडे मार्मिक प्रश्न इसमें है तो उनके उत्तर भी पाठक उनके लिखे के, उनके विमर्श में तलाश सकते हैं। धार के प्रतापी राजा भोज के उपन्यास अवन्तिसुन्दरी-कथा की नायिका गणिका के संदर्भ में मुकुन्दजी ने इस निबन्ध में पुरूषों के वर्गीकरण यथा उनके रंग-रूप, स्वभाव, चरित्र आदि के आधार पर अपने लिए उपयोगिता आधार पर चयन करने के आलोक में स्वतंत्रता स्त्री लोक की रहनी-करनी पर विशद् विवेचन किया है। महत्ती यह भी है कि गणिका को स्वतन्त्रा कहने के निष्कर्ष में उन्होनें यहाँ गणिका से जुडी बहुतेरी पहेलियों को सुलझाते हुए उसकी छवि का विशद् विवेचन करते स्त्री स्वतंत्रता के प्रश्नों का भी बहुतेरे स्तर पर समाधान किया है।
संस्कृत सूक्तियों में बसे कविताओं के आकाश पर मुकुन्द लाठ ने जो कार्य किया, वह इस समय की उनकी सौंपी हमें विरल विरासत कही जा सकती है। सूक्ति में निहित चमत्कारिक भंगिमाओं और काव्य-सुलभ मोहक गुणों, शिल्प के प्रखरपन में रचते-बसते ही उन्होंने संस्कृत के सूक्ति-संग्रहों-विद्याकर के सुभाषितरत्नकोष, श्रीधरदास और वल्लभदेव की सुभाषितावलि आदि को अपनी मौलिक दीठ, रसिकता से कविता में रूपान्तरित ही नहीं किया है, बल्कि मूल की भंगिमाओं में अर्थ छवियों का एक नया व्याकरण भी रचा है। ऐसा करते उन्होंने संस्कृत सूक्त से जुडे सामान्य कथन को भी बहुत से स्तरों पर विशेषोक्ति में बदला है। माने संस्कृत की हमारी सूक्ति परम्परा के भावों को अपने तई सहेजते उन्होंने अनुवाद में तत्कालीन शब्द संदर्भों के अर्थ-अनर्थ और दो टूक में पाठक के समक्ष बिगडने वाली बातों को भी कविता की सुघडता में सँवारा है। जो कुछ प्रत्यक्ष का उन्मुक्त इस समय का खलने वाला सूक्ति भाव है, उसे पर्दे के पीछे करते सुक्तियेां में निहित अर्थगर्भित का नव्यकरण किया है।
बारहवीं सदी के काव्य विचारक राजशेखर की काव्यमीमांसा में आए स्वीकरण शब्द के आलोक में मुकुन्दजी ने संस्कृत कवियों की प्राचीन काव्य परम्परा में गहरे पैठ कर विवेचन किया है। उन्होंने लिखा है, कविता का अनुवाद एक ऐसा रूपान्तर होना चाहिए जो अपने आप में एक नयी कविता हो। पर अनुवाद का आधुनिक आदर्श एक और भी माँग करता है जो स्वीकरण से भिन्न है। अनुवाद एक विशेष प्रकार का स्वीकरण है जो अनुवाद के पुराने आदर्श पर एक नया बन्धन डालता है-रूपान्तर के स्वरूप को कस देना चाहता है। संस्कृत काव्य विमर्श की परम्परा में पुरानी कविता को नयी कर लेना और इस तरह उसे अपना बना लेने के लिए आए शब्द स्वीकरण और हरण में भेद का विश्लेषण किया है, तो यह भी स्थापित किया है कि स्वीकरण चोरी नहीं है बल्कि उसमें सृजन है, उत्पादन है। नयी रचना का अधिकार है। दूसरे की कविता को थोडी-सी ऊपरी हेराफेरी के साथ चला देना हरण है। हरण की हुई कविता नाम को ही कहला सकती है, सचमुच अपनी नहीं बन पाती। पर स्वीकरण की प्रक्रिया तो सचमुच अपना बना लेती है। नया कवि पुरानी कविता को नया रंग-रूप देता है, उसमें नया अनुभव देता है। पर इतना होने के बाद भी नयी कविता में पुरानी कविता पहचानी जा सकती है।
मुकुन्दजी ने संस्कृत सूक्त के किए अपने कार्य को इसी संदर्भ में स्वीकरण की संज्ञा दी है और इस बहाने उन्होंने संस्कृत की लम्बी, जीवंत काव्य परम्परा में निहित नयेपन के चमत्कार से ही पाठकों को साक्षात् नहीं कराया है, बल्कि संस्कृत काव्य के दृष्य रूपों, नाटकीयता और विरल व्यंजनाओं के साथ ही उसके शिल्प विधान की महत्ती परम्परा से भी पाठकों को अपने ‘स्वीकरण’ कहन से साक्षात् कराया है।
मुकुन्द लाठ ने कभी आठवी सदी के महाकवि वाक्पतिराज के महाकाव्य गउडवहो की कविताओं को आधुनिक संदर्भों और अपनी मौलिक काव्य दृष्टि में फिर से रचा था। तिर रही है वन की गन्ध शीर्षक से आए उनके इस कविता संग्रह की भूमिका को उन्होंने अनुवाद नहीं कह कर अनुवचन की संज्ञा दी थी। उनकी यह भूमिका भी भावन में संग्रहित उनका बेहद महत्त्वपूर्ण कार्य है। इस अर्थ में कि इसमें उन्होंने मूल, अनुवाद और पुराने की अनुवृत्ति, प्रतिरूप आदि शब्दों की विरल व्याख्या की है। अपने किए इस कार्य को उन्होंने मूलनिष्ठ तो कहा है, परन्तु साथ ही यह भी जोडा है कि उन्होंने मूल के स्वरूप-स्वभाव को रखने के साथ ही लय से भी कुछ और मिलने वाली लय अपने तई मिलायी है।
वाक्पतिराज के छन्दों के व्यापक, प्रकृति केन्द्रित अर्थों का नवोन्मेष करते उन्होंने उसमें निहित मर्म को गहरे से छूआ है। अनुवचन के उनके नवोन्मेष का मूल कारण मुझे यह भी लगता है कि वाक्पति की कविताओं में आए दृश्य चितराम में निहित संगीत, नृत्य और दूसरी कलाओं के भावों ने उन्हें मुग्ध किया है। यह है तभी तो वाक्पति के काव्य की विवेचना करते, उनके प्रकृति छन्दों में रमते उन्होंने लिखा है, कवि मानो हमारी दृष्टि की अगुवाई करता हमें प्रकृति में ले चलता है। हमारे देखने में जो अनदिखा रहता है, दिखाता है, एक नयी आँख जगाता है। यह आपात दृष्टि से ‘कोरा’ वर्णन भी करता जान पड सकता है, पर उसकी दृष्टि वर्ण्य की धमनी में अपना स्फुरण ढूँढती है, अपनी दीठ से हमें चमत्कृत करती चलती है। भाव जैसा कुछ व्यंजित करने का इरादा तो रखती नहीं जान पडती, पर उन्मुख फिर भी हमारी भावना की ओर ही होती है, बुद्धि की ओर नहीं। द्विजदेव के छह छन्दों के अपने से भावन में किए अनुवाद के आलोक में भी उनके कथन के इस आलोक को गहरे से समझा जा सकता है।
मुकन्दजी ने कभी बनारसीदास लिखित आत्मकथा अर्धकथानक का अनुवाद का कार्य तो किया ही था, परन्तु इसके बहाने उन्होंने आत्मकथा लेखन से जुडे विविध आयामों पर महत्ती विमर्श किया है। मुकुन्दजी ने आत्मकथा, परकथा और भारतीय परम्परा के अपने लिखे में आत्म के आत्मीय सम्बन्ध में आत्मा के विविध रूपों और मानसिक गुणों की चर्चा करते हुए आत्मकथा के दो स्तम्भः आत्म और कथा का विशद् विवेचन करते हुए स्थापित किया है, हमारे यहाँ आदर्श चित्तवृत्ति के निरोध का था, चित्तवृत्ति के स्वरूप को समझने का नहीं। किन परिस्थितियों में ये कैसा काम करती है, इसको आँकने-कूतने का नहीं। आत्मा के जिस धु*व, अटल, अविकल स्वरूप की भारत में कल्पना-धारणा रही है ऐसे काल, परिणाम के बन्धन से अछूते आत्मा की कथा नहीं हो सकती। इस संदर्भ में उन्होंने ग्रीस की आत्म विषयक धारणाओं, न्याय दर्शन, हजारीप्रसाद द्विवेदी की बाणभट्ट की आत्मकथा की चर्चा में आत्मकथा के मर्म को स्पर्श किया है। भरत के नाट्य को लोक, बल्कि त्रिलोक की अनुकृति कहन के आलोक में भी यहाँ उन्होंने लिखा है कि भरत के लोक का तात्पर्य हिन्दी के लोग या लोगों से ही है। नाटक मनुष्यलोक की कहानी हेाती है, मनुष्य के सुख, दुख, वासना, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न का इतिवृत्त, मनुष्य के एक-दूसरे से सम्बन्धों की कहानी। देवता की कहानी नहीं हो सकती, क्योंकि कहानी ऐसे ही प्राणी की बनती है जिसमें सुख, दुख, वासना हो और जिसको अपनी इच्छपूर्ति के लिए प्रयत्न करना पडे।
मुकन्द लाठ के चिंतन की मौलिकता को भावन में कृति-विचार खण्ड से और अधिक गहरे से जाना-समझा जा सकता है। निर्मल वर्मा के प्रबन्ध कला में सत्य की धारणा में उनके कहे की व्याख्या भर ही नहीं करते, बल्कि उसके आलोक में हम उनके स्वयं के चिंतन की बढत भी देखते हैं। राणा कुम्भा द्वारा संगीत के समर्थन में उसे मोक्ष का कवच और अध्यात्म के द्वार बताने की चर्चा करते वह यहाँ भक्ति के अध्यात्म में संगीत की स्वीकृति पर भी महत्ती जानकारियाँ साझा करते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति, धु*पद के आलाप आदि के संदर्भ देते उन्होंने निर्मल वर्मा के कहे को अपनी तरह से उभारा ही नहीं है, बल्कि प्रश्नाकुलता में कलाओं के स्वातन्त्र्य के साथ ही उसके खुलेपन पर महत्ती स्थापनाएँ हमें दी हैं। इसी तरह रमेशचन्द्र शाह के सोमराज गुप्त की लिखी पुस्तक द वर्ड स्पीक्स टू दि फॉउस्टियन मैन पर लिखे लेख को पढते मनुष्य की दर्शन, कला, अध्यात्म में चेतना के शिखर छूने की संभावनाओं पर विशद् विमर्श किया है, तो उनके नदी भागती आयी कविता संग्रह के बहाने स्मृति और नदी में उभरते दृश्य चित्रों की दार्शनिक व्याख्या की है। एक-एक कविता के भाव और आए संदर्भों के मर्म छुआते वह नदी में प्रतिभा, कुहक, जादू के साथ ही चेतना के उस स्पन्द की भी तलाश कराते हैं जो अपना होते हुए भी पराया है। कविता आलोचना में विचार और दर्शन का उनका प्रवाह अंदर तक मन को मथता है। उनके द्वारा ज्योत्सना मिलन, यशदेव शल्य के काव्य विमर्श की व्याख्याओं भी इन्हीं संदर्भों देखा जा सकता है।
अज्ञेय की कविता के एक विशेष भाव-वलय देना ही पाना है, पर उनकी विवेचना भी बेहद महत्त्वपूर्ण है। अज्ञेय की कविता के व्यापक, विराट पक्ष से चम्तकृत, अभिभूत होते हुए वह आत्म और इतर के भेद का मर्म समझाते हैं, तो उपनिषद् की पदावली के अध्यात्म अनुभवों के द्विपक्षी एक्य, सर्व खल्विदं ब्रह्म और अयामात्मा ब्रह्म इन दो महावाक्यों की चर्चा करते कवि मन की गहरे से थाह लेते हैं। निराला पर एक समीक्षा दृष्टि के अंतर्गत राम की शक्ति-पूजा में वह निराला की कविता के खटकते प्रयोगों की ओर भी ध्यान दिलाते हैं, तो कविता में कहानी के संदर्भों का उनका सूझभरा विश्लेषण और मौलिक व्याख्या भी पृथक से लुभाती है। वह राम की शक्ति-पूजा के संदर्भ में लिखते हैं कि राम के पुरूषोत्तम नवीन जैसी व्यंजना में पाठक को बराबर यह लगता है कि निराला नया कुछ कहना चाहते हैं, परन्तु मर्मतः वे निराला के प्रिय तुलसी के राम ही बने रहते हैं। जिस शक्ति की वह पूजा करते हैं, वे भी नयी कुछ नहीं उभरती। वह लिखते हैं, हमारी परम्परा में रामायण जैसी कहानियों के साथ नये आख्यान सदियों से जुडते चले आये हैं। एक नयी दृष्टि, नयी श्रद्धा ऐसा करती रही है। पर निराला की नयी दृष्टि क्या है, यह उनकी कविता में समझ में नहीं आती। देवी-माहात्मय जैसा ही उभरता दिखता है-जिसका रामायण से सामन्जस्य नहीं बैठता।
मुकुन्द लाठ का संपूर्ण चिंतन कला, संस्कृति और साहित्य की अनुभूति-अनुभव, रूप, कला-सौंदर्य की मौलिक दृष्टि है। सम्पर्क - शंकर विहार-ई, 28-ए, सिद्धार्थ नगर,
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जयपुर - 302017 (राजस्थान)
मोबाईल- 9829102862