fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

मुकुन्द लाठ का दार्शनिक अवदान

कमलनयन
आचार्य मुकुंद लाठ आज के वैचारिक एवं कला विश्व की एक बेमिसाल विभूति हैं, वे दार्शनिक हैं, भारतीय मनीषा के ज्ञाता व व्याख्याकार हैं, विभिन्न कलाओं व काव्यों व उनके शास्त्रों की परम्पराओं के मर्मज्ञ व उद्भट विद्वान ही नहीं, इतिहासकार भी हैं, वे सौन्दर्यशास्त्री हैं, संगीताचार्य, कवि, चित्रकार और गायक हैं। जो बात उन्हें अन्य विचारकों से भिन्न करती है, वह है उनकी भारतीय दृष्टि। यही उनके वैविध्यपूर्ण कर्तृत्व को, एकसूत्रता में बाँधने वाला सूत्र है या यूँ कहें, कि उनके वैविध्यपूर्ण कर्तृत्व की प्रसृति और गहराई उनकी भारतीय दृष्टि की अभिव्यक्ति है।
वे अब हमारे बीच नहीं हैं। क्या वास्तव में वे हमारे बीच नहीं हैं? किसी का होना क्या होता है? वे सशरीर हमारे बीच नहीं हैं। किन्तु वे सशरीर कितनों के बीच थे? और उनके परिजनों को छोडकर, जिनके बीच वे सशरीर थे, उन सबके बीच उनका होने का क्या अर्थ था? हम सब जो उनके व्यक्तिगत संफ में थे, उन्हें किस रूप में जानते हैं? वे किसी के पुत्र थे, किसी के भाई थे, किसी के पति थे, किसी के पिता, किसी के मित्र, किसी के शिष्य, किसी के गुरु। ये सब, और, और भी बहुतेरे, जो उनके संफ में रहे थे, एक दिन स्वयं भी सशरीर नहीं होंगे। उस समय क्या मुकुंदजी होंगे? यह कोई भी नहीं कहेगा कि नहीं होंगे। वास्तव में किसी का होना उसके कर्तृत्व से होता है। वह अपने कर्तृत्व से ही जाना व पहचाना जाता है। उनका कर्तृत्व हमारे बीच है, हमारे बाद भी रहेगा। इसलिए, मुकुंदजी हैं और रहते रहेंगे, उन कृतियों के माध्यम से जिनमें वे अभिव्यक्त हुए हैं। उनकी कृतियों के नाम दे रहा हूँ - अ स्टडी आफ दत्तिलम् : द हिंदी पदावली आफ नामदेव (वीनांत कालावार्त के सहलेखन में); ट्रांसफर्मेशन एज क्रिएशन; हाफ अ टेल (यह सन् 1641 में एक जैन कवि बनारसीदास की आत्मकथा, अर्द्धकथानक, का मुकुंदजी द्वारा अंग्रेजी भाषा में किया गया पुनर्कथन है। यह संभवतः भारतीय परम्परा में लिखी गई एकमात्र आत्मकथा है।) संगीत एवं चिंतन : दर्शन और संस्कृति का संगीत परक विमर्श; धर्म-संकट; कर्म-चेतना के आयाम; क्या है क्या नहीं है, एक दार्शनिक संवाद; तिर रही वन की गंध : वाक्पतिराज का प्रकृति काव्य मुकुंद लाठ के छंदों में) संगीत और संस्कृति- संगीत, नृत्त, नाट्य पर विमर्श लेख; गगनवट (संस्कृत मुक्तकों का स्वीकरण); भावन - साहित्य व अन्य कलाओं का अनुशीलन; अनरहनी रहने दो (कविता संग्रह)। इनके अतिरिक्त अभी हाल ही में उनके द्वारा किया गया पृथ्वीसूक्त का अनुवाद, रजा फाउंडेशन, नई दिल्ली के प्रकाशनाधीन है। मुकुंदजी जाने से पहले ऋग्वेद के सौ सूक्तों का मुक्त-छंदों में अनुवाद कर चुके थे।
यह आरम्भ में ही कह देना समीचीन होगा कि मुकुंदजी के कर्तृत्व को, उनकी रचनाओं को अनन्य बनाने वाला तत्त्व उनकी लेखन शैली है। उनका लिखना ऐसा है मानो वे पाठक के साथ संवाद कर रहे हों। इस संवाद को स्थापित करने का उनका ढंग अनूठा है। वे विषय को समस्त युक्ति-विमर्श के साथ रखते हुए भी ऐसे प्रतिपादित करते हैं मानो कहानी कह रहे हों। विषय कितना भी गूढ-दुर्बोध-जटिल क्यों न हो, उसकी स्थापना, उसका प्रतिपादन, उसका विस्तार, यह सब, वे इस प्रकार करते हैं कि वह कहानी का रूप ले लेता है। किन्तु यह कहानी होती विचार की है, किसी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों की नहीं। उनकी लेखन शैली की एक विशिष्टता यह भी है कि वे विषय को प्रश्नों के माध्यम से आगे बढाते हैं। वे विषय रखते हैं। फिर उसे खोलने के लिए प्रश्न उठाते हैं, इन प्रश्नों का उत्तर देते आगे बढते हैं, फिर नये प्रश्न उठाते हैं। उनका उत्तर देते हैं। इस प्रकार यह प्रश्नोत्तर का सिलसिला आगे बढता है, विमर्श आगे बढता है, बात आगे बढती है, विषय खुलता जाता है। मुकुंदजी को पढते, मैंने सदैव यह पाया कि उन विषयों को भी, जिनसे मेरा परिचय भी नहीं था, या यूँ कहें कि घोर अपरिचय था, इस तरह के विषय नितांत टेक्निकल भी होते थे, ऐसे विषयों पर किये गए प्रतिपादन किसी भी अदीक्षित के लिए सामान्यतः दुर्बोध ही होते हैं, उन्हें भी मैंने कभी दुर्बोध नहीं पाया। इसका कारण मेरी कोई विशिष्ट योग्यता नहीं, अपितु मुकुंदजी की अभिव्यक्ति का ढंग है। यह उनके अभिव्यक्ति की विशिष्टता रही है कि वे अपने प्रतिपादित विषयों के साथ पाठक का परिचय कुछ ऐसे करवाते हैं कि पाठक की विषय के साथ अंतरंगता स्थापित हो जाती है, विषय को समझने में पाठक की अज्ञानता अथवा अनजानापन आडे नहीं आता, मिट जाता है और विषय अपनी समस्त जटिलताओं के रहते भी दुर्बोध नहीं रहता। मुकुंदजी की प्रतिपादन की शैली को अभिहित करते हुए दार्शनिक यशदेव शल्य, मुकुंदजी की कृति धर्म-संकट की भूमिका में, कहते हैं - ...उनकी लेखन शैली निराली है, बहुत कुछ एक विदग्ध कथावाचक के जैसी। किन्तु कथा यहाँ विचार की ही है, व्यक्तियों की नहीं।
मुकुंदजी की विचार यात्रा पर चर्चा से पहले विचार की, अभिव्यक्ति की माध्यम भाषा को लेकर उनकी सोच, उनके दृष्टिकोण के विषय में कुछ बात करना अस्थाने न होगा। उन्होंने अपने अंग्रेजी में लिखे गए निबंध संग्रह ट्रांसफर्मेशन एज क्रिएशन की भूमिका में लिखा था कि वे संगीत पर अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में विचार करते रहे हैं। वे यह भी महसूस करते थे कि उनके इस वैचारिक उपक्रम में इन दोनों भाषाओं में उनका चिंतन सहगामी व परस्पर पूरक धाराएँ हैं। साथ ही यह भी कि उन्होंने दोनों भाषाओं में अपने कर्तृत्व को, सुविधा की दृष्टि से एक ही एक ही ग्रन्थ के दो खण्डो के रूप में साथ रखा है। अंग्रेजी वाला यह निबंध अथवा लेख संग्रह 1998 में छपा था। उस समय उन्हें यह आशा थी कि वे अपने हिंदी में लिखे लेख भी जल्द ही प्रकाशित करवा पाएँगे। किन्तु उन्हें प्रकाशित करने में सोलह बरस लग गए। हिंदी में उनके लेखों का संग्रह, संगीत एवं संस्कृति - दर्शन और संस्कृति का संगीत परक विमर्श के नाम से 2014 में सोलह बरस बाद जाकर प्रकाशित हुआ। और इस बीच उनके लेखन ने एक दूसरी दिशा ले ली, वे दर्शन की ओर मुड गए। हालांकि वे इस अंतराल में वे संगीत, नृत्त आदि पर भी लिखते रहे, किन्तु इस समय उनके विमर्श के अभिनिवेश में एक गहरा अंतर परिलक्षित होने लगता है। जिसे विचार की या विचार के आत्मबोध की - प्रधानता कहा जा सकता है। मेरे सोचने-लिखने का मार्ग दर्शन की ओर मुडा है (जिस पर मैं हिन्दी में ही लिखता रहा हूँ), और इसका प्रभाव या छाया-संग्रह के कुछ लेखों में भी देखी जा सकती है- विशेषकर अंतिम लेखों में। अपने लेखन के दर्शन (फिलॉसॉफी) की ओर, मुड जाने की बात कहकर वे विचार और लेखन की भाषा पर आते हैं। हालांकि वे अब भी कहते हैं कि उन्होंने अपने हिंदी और अंग्रेजी के लेखन को एक दूसरे का पूरक कहा था, और अब भी कहूँगा। किन्तु आगे वे, विचार की, विमर्श की, भाषा कौन-सी हो, इस विषयक जो प्रतिपादन करते हैं, उससे उनके इस कथन का समर्थन नहीं होता। और वे हिंदी की ओर झुकते दिखाई पडते हैं। उनकी दृष्टि गहराई में भारतीयता है, उनके विमर्श की कोटियाँ, प्रत्यय व पदावली सब भारतीय हैं। वे, यशदेव शल्य और गोविन्द चन्द्र पांडे जैसे विरले भारतीय विचारकों में से एक हैं जिनके चिंतन की देह और आत्मा पूर्णतः भारतीय है। शायद यही कारण है कि उनका परवर्ती चिंतन, जो मूलतः दार्शनिक चिंतन ही है, हिंदी ही में हुआ है। इस अंतराल में जो कुछ उन्होंने अंग्रेजी में लिखा-छापा है, उसे अपवाद कहना ही उचित होगा।
अब हम उनके चिन्तन और भाषा के बीच सम्बन्ध पर विचार अथवा दृष्टिकोण और उनके स्वानुभव पर आते हैं। वे कहते हैं - हर भाषा का एक विचार-जगत् होता है जिससे उस भाषा में सोचने और लिखने वाला अछूता नहीं रह सकता। विचार को सामान्यतः सार्वभौम माना जाता है, मुकुंदजी भी मानते हैं। विचार स्वभावतः होता ही सार्वभौम है। किन्तु यह सार्वभौम होने के साथ किसी भाषा में होता है, और भाषा किसी संस्कृति की वाहक और अभिव्यक्ति का माध्यम होती है। भाषा और संस्कृति दोनों एक-दूसरे में गुँथे रह कर विचार की सार्वभौमता को एक विशेष रूप और स्वभाव में ढालते हैं- इससे विचार की सार्वभौमता पर आँच नहीं आती, पर उसमें एक विशेष स्पंद आ जाता है जिसके बिना विचार सार्थक, जीवंत रूप नहीं लेता... विचार भाषा में होता है और भाषा संस्कृति को बनाती हुए उससे बनती चलती है; भाषा संस्कृति को अपने साथ, अपने भीतर लिये चलती है। मुकुंदजी आगे कहते हैं कि उन्होंने कहा था कि वे अंग्रेजी और हिंदी में सामान भाव से सोचते-लिखते रहे हैं, ऐसा कहने में एक पते की - एक बडी अत्मीय बात - अनकही रह जाती है। दोनों भाषाओं में सोचने का बोध - उसकी आंतरिक प्रतीति - एक-सी नहीं होती। अंग्रेजी में एक विचित्र-सा परायापन बना रहता है - हिंदी के साथ जो अपनेपन का भाव होता है, उसे एक स्वाच्छन्द्य का अनुभव भी कह सकते हैं।
यही कारण है कि हिंदी में उनके लेखन में उनके विमर्श के अभिनिवेश में, उनके विमर्श की प्रकृति में एक गहरा अंतर दिखाई पडता है। इसका कारण उनके विमर्श के क्षेत्र का भारतीय सांस्कृतिक परिवेश का अंग होना है। यह विमर्श जिन विषयों पर केन्द्रित है, उन विषयों का निर्धारण जिस भाषा में हुआ हुआ है, जिस भाषा में इन विषयों ने रूपाकार ग्रहण किया है, अभिव्यक्त हुए हैं, जो भाषा उन विषयों पर विमर्श की वाहक है, वह एक भारतीय भाषा है। यह भाषा उस सांस्कृतिक मानस से आकारित होने वाली और उस मानस को आकार देने वाली भाषा है, जिस मानस की ऊहापोह की उपज यह विमर्श है।
ऐसा नहीं है कि उनके अंग्रेजी के लेखन में प्रांजलता का अभाव है। इसके उदाहरण के रूप में एक पश्चिमी म्यूजिकोलॉजिस्ट नाइजेन्युइस द्वारा की गई मुकुंदजी के अ स्टडी आफ दत्तिलम् की समीक्षा से एक कथन उद्धृत करूँगा - लाठ की पुस्तक के दस परिचयात्मक अध्याय, जो पुस्तक का लगभग आधा भाग हैं, जो इस विषय से अपरिचित पाठक को, विद्वत्तापूर्ण किन्तु सुपाठ्य शैली में भारतीय संगीत से सम्बंधित सावधिक महत्त्वपूर्ण पूर्ण प्रश्नों को समझने की अंतर्दृष्टि देते हैं।... उनके द्वारा किया गया मूल पाठ का अनुवाद प्रांजल है, सुस्पष्ट है। किन्तु यह नाइजेन्युइस का यह कथन मुकुंदजी द्वारा दत्तिलम के मूलपाठ के अनुवाद तक सीमित नहीं है, मूलपाठ की व्याख्या पर भी लागू होता है। उनके, ट्रांसफर्मेशन एज क्रिएशन में संकलित अंग्रेजी निबंध भी उनके इस भाषा पर अधिकार के प्रमाण हैं। किन्तु बात वही है जो मुकुंदजी ने अंग्रेजी और हिंदी में सोचने-लिखने को लेकर स्वयं कही है- दोनों भाषाओं में सोचने का बोध- उसकी आंतरिक प्रतीति - एक-सी नहीं होती।
आगे बढने से पहले मुकुंदजी के चिंतन की एक विशिष्टता का उल्लेख कर देना आवश्यक समझता हूँ कि वे किसी भी विषय पर विचार करें, विमर्श करें, उनका विमर्श मात्र उस विषय तक सीमित नहीं रहता। वे विमर्शान्तर्गत विषय को एक बृहत्तर सांस्कृतिक परिप्रक्ष्य में रखते हुए बढते हैं। संगीतशास्त्र हो अथवा नृत्तशास्त्र अथवा कोई और विषय, वे इन पर विमर्श विभिन्न सांस्कृतिक क्षेत्रों की कलाओं और विचार की शास्त्रीय परम्पराओं में हुए अथवा हो रहे विकास को विमर्श का अंग बनाकर करते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण सांस्कृतिक परिवेश उनके विमर्श का विषय बन जाता है। उनकी इस दृष्टि का आधार मुझे यह उनकी यह मान्यता दिखाई पडती है कि प्रत्येक विषय, उसका क्षेत्र, एक बृहत्तर सांस्कृतिक मानस की अभिव्यक्ति है। वे संस्कृति को एक अंगी और सांस्कृतिक विषयों को उसके अंगों, उसके अवयवों के रूप में देखते हैं। वे संस्कृति को एक ऐसे मनो-दैहिक अवयवी के रूप में देखते प्रतीत होते हैं, जिसके सभी अंग-अवयव परस्पर एक अन्तर्निहित एकता के सूत्र से बँधे हैं। यद्यपि उन्होंने अपना संस्कृति-दर्शन का प्रतिपादित नहीं किया, किन्तु उनके संस्कृति विषयक विचार के सूत्र उनकी रचनाओं में स्थान-स्थान पर मिलते हैं।
मुकुंदजी एक दार्शनिक-इतिहासकार हैं। उनके विमर्श के विषय सदैव परम्परा के अंग के रूप में विमर्शित होते हैं और परम्पराएँ इतिहास-गर्भ होती ही हैं। एक संस्कृति के भीतर पलती इन परम्पराओं पर विमर्श के दौरान वे उनके एतिहासिक विकास को भी दिखाते चलते हैं।
अब उनकी कृति संगीत एवं चिंतन पर संक्षिप्त चर्चा के माध्यम से मुकुंदजी की उपर्युक्त विशिष्टताओं को दिखाने का प्रयास करूँगा। हालांकि सम्पूर्ण कृति पर चर्चा यहाँ संभव नहीं है।
सन् 1994 में उनके स.ही. वात्स्यायन अज्ञेयजी द्वारा स्थापित वत्सल निधि द्वारा आयोजित डा. हीरानंद शास्त्री स्मारक माला की बारहवीं कडी के रूप में दिए गए व्याख्यानों व्याख्यान पुस्तक रूप में संगीत एवं चिंतन नाम से प्रकाशित हुए थे। उनकी यह पुस्तक संगीत और विचार के क्षेत्र में मील का पत्थर कही जा सकती है। इस पुस्तक में चिंतन पर, चिंतन के स्वरुप पर, संगीत की दृष्टि से विमर्श हुआ है। यही इस विमर्श की अपूर्वता है। ऐसा विमर्श इससे पहले अथवा इसके बाद, जहां तक हमारी जानकारी है, (आजतक) नहीं हुआ। स्वयं मुकुंदजी कहते हैं कि इन व्याख्यानों में विमर्श का यह अछूता या अनहोना द्वार खोलने की चेष्टा है। इस द्वार से हम चिंतन के मर्म में प्रवेश करें, तो उसे एक नयी दृष्टि से देख पाते हैं। देख पाते हैं कि चिंतन भी राग संगीत की तरह आलाप के निरंतर नए उन्मेष की साधना है। उसकी प्रेरणा में भी सृजन की वैसी ही संभावनाओं का सहज विस्तार है जैसा रागदारी में। वैसी ही बहुलता भी है। चिंतन के स्वभाव या उद्देश्य में ऐसा कोई निहित आग्रह नहीं कि वह किसी एक सत्य के ज्ञान की साधना का साधन मात्र हो - जैसा कि अक्सर माना जाता है। उन्होंने संगीत के कुछ पदों/शब्दों - धुन, राग और आलाप - को फैलाव देते हुए, संगीत के क्षेत्र के बाहर विचार की, विमर्श की, प्रक्रिया को समझने के उद्देश्य से विचार का अंग बनाया है। ताकि ये पद विचार के आत्मबोध का साधन बन सकें।
हालांकि हम धुन, राग और आलाप, इन पदों से परिचित हैं। किन्तु इनके अर्थ ठीक से जान लेना उचित होगा। धुन सामान्यतः ऐसी बँधी-बँधाई स्वर-रचना को कहते हैं जो जब-जब भी प्रस्तुत की जाती है, उसे गाया बजाया जाता है, उसकी मूल स्वर-रचना को, मूल स्वर-क्रम को ही दोहराया जाता है, ताकि उसका रूप एक ही रहे। बँधा-बँधाया होना ही धुन की पहचान है। धुन की विशिष्टता यह है कि इसके मूल रूप के ज्यों के त्यों निर्वाह पर आग्रह रहता है। मुकुंदजी, वेद को धुनमार्गी कहते हैं। वहाँ (ऋग्वेद को लेकर) आग्रह वर्णानुक्रमी (वर्णों के क्रम को) को, जिस रूप में इसका साक्षात्कार ऋषियों द्वारा किया गया, उसी रूप में संरक्षित किये जाने पर है। दूसरे शब्दों में, वर्णानुक्रमी अथवा वर्णानुपूर्वी, जिसमें वेद अभिव्यक्त हुए उसे ही वैसा ही बनाकर रखा जाना अभीष्ट है। यदि यह वर्णानुपूर्वी नहीं रहे, तो वेद वेद नहीं रहेगा। ऋषि ने जो सुना था वह शब्द में होकर भी एक वर्णानुपूर्वी थी। अर्थानुपूर्वी नहीं। यह बात अवधेय है। अर्थ वही रहे, पर वर्णानुपूर्वी बदल जाये, तो चाहे दूसरे शब्दों में वही बात कही गई हो, फिर भी वही (बात) नहीं कहलायेगी। मन्त्र नहीं रहेगी? और यों वेद भी नहीं रहेगी। एक बँधी-बँधाई, नियत वर्णानुपूर्वी ही वेद है। वेदाध्ययन में (वेद को कंठस्थ करने में) उसी का संरक्षण साधा जाता है। इसी प्रकार, साम भी मन्त्र ही हैं। अक्षरों के स्थान पर स्वर हैं। ये भी श्रुति हैं, वेद हैं। यों तो ये ऋग्वेद के मन्त्रों पर गाये जाते हैं, पर इनका स्वर-रूप ही साम है जो अपने आप में स्वतंत्र मन्त्र होता है। फिर यह भी है कि साम को बिना शब्दों के भी गाया जा सकता है।... यही नहीं ऋग्वेद की एक ही ऋचा पर अलग-अलग ऋषियों द्वारा श्रुत भिन्न-भिन्न साम भी गाये जाते थे। यों साम-मन्त्र गान-रूपी स्वतंत्र मन्त्र हैं। और मन्त्र होने के कारण साम की स्वरानुक्रमी भी उतनी ही नियत है जितनी शब्दों में रचित मन्त्रों की वर्णानुक्रमी।
शब्द-रूपी मन्त्रों की तरह ही स्वर-रुपी मन्त्रों को भी यों का यों बनाये रखने की पूरी चेष्टा की गई थी, शब्द-मन्त्रों की तरह ही बिना लिखे। इसी प्रकार, साम में, जिसे भारतीय संगीत का स्रोत माना जाता है, जो वेद का गेय रूप है, स्वरानुक्रमी को ज्यों का त्यों रखे जाने पर आग्रह है। वेद अपौरुषेय हैं, दिव्य हैं, अतिलौकिक हैं। इस कारण मनुष्य द्वारा उनमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन अक्षम्य है। परम्परा में उन्हें, शताब्दियों, लगभग एक सहस्राब्दी तक अनन्य रूप से, वाचिक परम्परा में, और बाद में उनके लिपिबद्ध हो जाने के बाद भी, वाचिक परम्परा के माध्यम से उनके, ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत रूप में आजतक उन्हें संरक्षित रखा गया है। इस प्रकार, मुकुंदजी के अनुसार वेद धुनमार्गी हैं।
धुन के बाद अब राग। राग एक विशिष्ट स्वर-योजना को कहा जाता है। जिसकी परिधि के भीतर रहते हुए आलाप के द्वारा नये-नए स्वर-संयोजनों का निर्माण करते हुए, जिसे बढत अथवा उपज कहा जाता है, राग का निरूपण किया किया जाता है। राग को निर्धारित करने वाली स्वर-योजना अवश्य पूर्व-निर्धारित होती है, किन्तु राग के निभाव में, निरूपण में इस मूल को रखते हुए ही बढा जाता है। राग के निभाव में सदैव यह अपेक्षित रहता है कि गाने/बजाने वाला राग पर अपना आलाप करे, उसके अन्तर्निहित अर्थों का अवगाहन करे। इस प्रकार राग में साम की स्वरानुपूर्वी के ज्यों के त्यों दुहराव पर आग्रह अब राग में व्यंजित भाव अथवा अर्थ को रखते हुए उसकी की व्यंजना ले लेती है।
आलाप राग के प्रस्तुतीकरण के, निभाव के, माध्यम को कहा जाता है। मुकुंदजी के अनुसार, आलाप का अर्थ है बदल-बदल के बढना, स्वरों के नये-नये बनाव, नयी उपज, नये विस्तार, चलने के नये रास्ते- इन पर चलना। राग को वही बनाये रखना कुछ ऐसा ही है, जैसा वर्ण की जगह अर्थ को वही बनाये रखना। बात को यों कहना कि बात वही रहे। ऐसा करने में शब्द वह नहीं रहते। बात चरिष्णु हो जाती है, बढती चलती है, विस्तार के नये रास्ते बनाने लगती है।
अब उनके राग-संगीत के माध्यम से किये गए संस्कृति-विमर्श पर आता हूँ। हालांकि उनके विमर्श का केंद्र संगीत ही है, किन्तु वे संगीतेतर सांस्कृतिक विषयों को भी अपने विमर्श की परिधि में ले आते हैं।
आज का जो राग संगीत है उसे गान्धर्व से निसृत हुआ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि वैदिकोत्तर काल में एक नए संगीत ने जन्म लिया। यह संगीत गान्धर्व कहलाता है। वैदिक काल का संगीत साम था। मुकुंदजी कहते हैं, उस समय संगीत के और भी रूप लोक में थे, जिनके साक्ष्य भी मिलते है। इन्हीं में से किन्हीं रूपों से गान्धर्व का जन्म हुआ। शायद बुद्ध के समय के आसपास, यही समय महावीर का भी है। यही वह समय है जब शैव और वैष्णव मत भी अस्तित्त्व में आ गए थे। रामायण और महाभारत जैसे ग्रन्थ भी रूप ग्रहण कर रहे थे। वैदिक चरण, जो वैदिक काल से शिक्षा के केंद्र रहते चले आये थे, उनके साथ-साथ वेदों से इतर विषयों की शिक्षा के केंद्र भी अस्तित्व में आ चुके थे। बुद्ध और महावीर के समय में शिक्षा के एक बडे केंद्र के रूप में स्थापित हो चुके तक्षशिला में अनेक शिक्षकों-गुरुओं की पीठों के अस्तित्त्व का पता चलता है, ये, वैदिक चरणों से स्वतन्त्र शिक्षक थे। यही समय उपनिषदों का भी है। स्पष्ट ही, इस समय वर्णानुक्रम और स्वरानुक्रम को, जिस रूप में वैदिक ऋषियों ने उनका साक्षात्कार किया था, उसी को उसके मूलरूप में, रखने के आग्रह का स्थान उनके अर्थ को वही रखने का आग्रह लेने लगता है। यह भारतीय सांस्कृतिक मानस में एक गहरे परिवर्तन का काल है।
जैसा कि हमने पीछे कहा, माना जाता है कि गान्धर्व साम से उद्भूत हुआ था। वास्तव में यह, अपनी परम्परा में स्वयं को रखते हुए, उसकी अक्षुण्णता बनाए रखने के प्रति सचेत रहते हुए, उसकी निरंतरता में आगे बढने की प्रवृत्ति का लक्षण है और यह भारत की सांस्कृतिक विशिष्टता भी है। किन्तु, मुकुंदजी गान्धर्व को साम से नहीं, अपितु वैदिक काल में ही प्रचलित सामेतर संगीत रूपों से निकला हुआ मानते हैं। आगे वे कहते हैं कि, भले ही गान्धर्व को साम की तरह अतिलौकिक माना जाता था - स्वयं ब्रह्मा द्वारा निर्मित, और देवलोक से अवतरित। हमारे इस मनुष्य-लोक में उसे दोहराया भर जाता था, उसकी अनुवृत्ति की जाती थी, उसकी रचना नहीं। यों तो वह श्रुति का ही एक रूप था। पर फिर भी उसमें एक नई, विलक्षण बात थी। अतिलौकिक अर्थ में चाहे वह श्रुति हो, एक और गहरे तात्त्विक अर्थ में गान्धर्व साम से बिलकुल भिन्न था। साम को हमने धुन कहा है। गान्धर्व धुन नहीं, राग-जातीय था। उसके रूप में राग का मर्म स्पष्ट था। गान्धर्व की स्वर-रचनाएँ, जो जाति कहलाती थीं, राग के निकट भी मानी जाती थीं, इन्हें गान्धर्व शास्त्र में राग का बीज कहा भी गया है। गान्धर्व की जातियों की साम से भिन्न विशिष्टता यह थी कि जातियाँ, साम की बँधी हुई, अपरिवर्तनीय, स्वरानुपूर्वी के स्थान पर खुली हुई स्वर-योजनायें थीं। जिन्हें जाति-लक्षण कहा गया है, जिनका उद्देश्य जातियों को विवेचन-वर्णन के माध्यम से सांगोपांग प्रकट करने के लिए बने हैं, पर ये स्वरलिपि नहीं, स्वर-योजना निर्माण के नियम हैं। बहुत कुछ वैसे ही नियम हैं जैसे आज की रागों के होते हैं - राग-लक्ष्ण इन नियमों की नींव पर बने भी हैं। ये नियम ऐसे किसी पहले-से-नियत रूप का विधान नहीं करते जो स्वरलिपि को बाँध सकें, उलटे ये नई-नई स्वरलिपियों की संभावनाएँ खोलते हैं। नियम इस अर्थ में हैं कि इन संभावनाओं की एक मर्यादा बाँधते हैं। मर्यादा के भीतर ही नई-नई स्वरलिपियों की रचना की असंख्य संभावनाओं के लिए आकाश रहता है। इस प्रकार, जातियों के साथ भारतीय संगीत एक नई दिशा लेता दिखाई पडता है, धुन-मार्ग से राग-मार्ग की ओर। कुछ वैसा ही जैसा वैष्णव, शैव, बौद्ध और जैन आगमों में लिया गया था। हालांकि बौद्धों और जैनों की तरह वैष्णव और शैव स्वयं को वेदों की परम्परा से अलग नहीं करते, किन्तु मार्ग वेद-भिन्न ही लेते हैं। गान्धर्व ने साम से अलग एक नया रास्ता लिया। साम स्वरानुपूर्वी में बँधा हुआ संगीत था, वहीं गान्धर्व में खुलापन था। गान्धर्व की जातियों के प्रारूप पर बनी रागों के हर राग का अपना एक विशेष रूप भी होता है- उसकी अपनी एक निर्मिति होती है, स्वर-सम्बन्ध-योजना होती है, चलन होता है जो उसे निर्धारित व्यक्ति-रूप सत्ता देता है। फिर, राग स्वरूप से एक नहीं अनेक हैं। और ऐसे अनेक में एक-एक का अलग लक्षण स्वाभाविक है। राग विशेष का अपना लक्षण होता ही है। पर रागों के प्रकार भी होते हैं, भिन्न रागों में एक-दूसरे से कम-*यादा समानता भी होती है। तभी उनकी निर्मिति और निभाव में केवल उनके व्यक्तिगत स्वरूप-स्वभाव को ही नहीं देखा जाता, अन्य रागों से उन्हें व्यावृत्त भी किया जाता है। यह उनके बनाव का अभिन्न अंग है। इससे उनका विशेष होना और भी अधिक प्रकट है। साथ ही यह भी स्फुट है कि कोई भी राग किसी कृती विशेष की कृति नहीं रह सकता। उसकी एक अपनी सत्ता होती है, जिसमें एक सार्वजनीन भाव होता है। कोई भी कृती उसकी पहचान बनाये रखते हुए उसे अपना सा रूप दे सकता है। वैसे राग को लेकर यह चर्चा एक अन्य प्रसंग में अन्यत्र करते हैं, किन्तु यह हमारे वर्तमान सन्दर्भ में भी समीचीन है। वे एक उदाहरण देते हुए अपनी बात कहते हैं - एक राग है... सब उसे गाते सुनते हैं - दरबारी कान्हडा। राग पुराना भी है। कृती विशेष की कृति भी है। अकबर के दरबार में तानसेन ने इसे रचा था। (राग) दरबारी तानसेन की कृति कहलाती ही है, पर ना तो यह जानने की चेष्टा की जाती है कि तानसेन ने स्वयं उसे कैसे गाया-निभाया और न ही यह कि कि तानसेन की तरह उसे गाया जाए। यह बोध रहता है कि दरबारी तानसेन की है और उसकी अपनी एक पहचान है जो तानसेन की दी हुई है - दूसरे कान्हडों से अलग है और अपनी विशिष्ट स्वर योजना के कारण उनसे करुण-भव्य-सौम्य है। (किन्तु) उसके इस भाव और रूप के पीछे तानसेन की प्रतिभा स्वीकृत है, पर दरबारी के हर प्रयोग में अपेक्षा यह रहती है कि संगीतकार दरबारी को अपनी तरह से निभाये। हम अमीरखान की या बडे गुलाम अली की या पण्डित जसराज... की दरबारी सुनना चाहते हैं, तानसेन की नहीं। यहाँ देखने-समझने की बात यह है कि राग के आद्य साक्षात्कार को स्वीकार करते हुए, उसी दरबारी पर नए-नए आलाप करते हुए उसके अवगाहन के गायकों द्वारा नए रास्ते पकडना-बनाना अभीष्ट है।
संगीत की धुनमार्गी और रागमार्गी प्रवृत्तियों पर विमर्श करते हुए वे इन्हीं प्रवृत्तियों को वेद (वेद की धुनमार्गी होने की चर्चा हम पीछे कर ही आए हैं) व आगमों में दिखाते हैं। हम यह जानते ही हैं कि उत्तर वैदिक काल का अवसान होते-होते आगमिक सम्प्रदायों का उदय होने लगता है। यही समय बुद्ध और महावीर का भी है और उपनिषदों का भी। बौद्ध और जैन मत वेद को नहीं मानते और स्वयं को अवैदिक घोषित करते हैं, किन्तु शैव, वैष्णव, शाक्त आदि समप्रदाय वेद को श्रुति मानते हैं, पर इनके लिए प्रधान इनके अपने आगम हैं। फिर भी इन सम्प्रदायों की मान्यता रही है कि इनके आगम वेद से उद्भूत हैं। वेद का सार या मर्म हैं, या उसी ईश्वर की वाणी हैं जिसने वेद कहे हैं। इस कारण वैष्णव और शैव अपने को वैदिक कहते हैं, किन्तु अपने आगमों को वेद से ऊपर रखते हैं।
मुकुन्दजी आगम और वेद में अंतर करते हुए कहते हैं -आगम और वेद में वही भेद है जो साम और गान्धर्व में है। (आगम किसी धर्मं, मत अथवा परम्परा के अलौकिक आदि ग्रंथों को कहा जाता है। ये भी वेदों की तरह ही अपौरुषेय माने जाते हैं।) आगम में वर्णानुक्रमी बनाये रखने का आग्रह नहीं है। इनका आग्रह अर्थ की और ही झुकता है,...। इनकी परम्परा में वैदिक परम्परा की तरह किसी पूर्वसिद्ध वर्ण-समुदाय की आनुपूर्वी को बनाए रखने का भीम प्रयत्न भी नहीं किया गया। नये शब्द नए शब्द-क्रम भी प्रमाणिक मान लिए जा सकते हैं, अगर अर्थ वही रहे। नए आगम तक बन जा सकते हैं। (वैष्णवों के) पाँचरात्र आगमों में कुछ ऐसे हैं, जो नए माने ही गए हैं। इन्हें पुरानो की उपज या बढत उपबृंहण कहा गया है- उसी अर्थ का विस्तार। पाँचरात्र की प्राचीन मानी जाने वाली सात्वत-संहिता के भाष्य में अलशिंग भट्ट ने ईश्वर-संहिता के बारे में ऐसी ही परम्परा का उल्लेख किया है। ईश्वर-संहिता बाद की मानी जाती है और उसे सात्वत-संहिता का उपबृहंण कहा गया है... इतना ही नहीं। पाँचरात्र की कई संहिताएँ हैं। ये सारी की सारी संहिताएँ किसी अर्थ में वेद की एकायन नाम की श्रुति का उपबृहंण मानी गई हैं... एकायन नाम की कोई श्रुति थी भी या नहीं इसमें संदेह है, पर इससे भी बात का सार नहीं बदलता। पुराण भी इसी अर्थ में वेद के उपबृहंण कहे ही गए हैं - वेद के मर्म की उपज, बढत दूसरे शब्दों में, आलाप से किया गया विस्तार। महायान के आगम भी एक प्रकार से पुराने बौद्ध आगम के उपबृंहण ही हैं।
इसी प्रकार, मुकुंदजी संस्कृत के व्याकरण की परम्परा और नृत्तशास्त्र की परम्पराओं का विवेचन-निरूपण करते हुए उनके उनमें धुनमार्गी और रागमार्गी प्रवृत्तियों को सामने लाते हैं। उनके अनुसार राग का मार्ग, जो आलापचारी का मार्ग है, आद्य प्रातिभ साक्षात्कार के उपबृहंण का, विस्तार का, मार्ग है। राग का मार्ग सर्जनात्मक नवीकरण का मार्ग है। यह हम अपनी सांस्कृतिक परम्परा में लगातार होते देखते हैं।
सम्पूर्ण भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। बहुत-से विचारक मानते हैं कि संस्कृतियाँ, उनकी परम्पराएँ भी इसी प्रकार बनती-बढती हैं। कोई भी संस्कृति किसी आद्य दृष्टि की व्याख्या की परम्परा होती है। दृष्टि की व्याख्या अनेक रास्ते लेती है। यह कलाओं में, ज्ञान के प्रस्थानों में, समाज की संरचना में, मनुष्य के पुरुषार्थ के क्षेत्रों में अंतर्निहित रहती है। यदि हम भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं को देखें, तो पाते हैं कि वे बौद्धों और जैनों को छोडकर सभी, वैदिक ऋषियों की दृष्टि को बिना नकारे, अपने रास्ते लेती हैं। वैदिक-दृष्टि, जो विभिन्न आगमों में खुलती है और विविध मत-सम्प्रदायों शैव, वैष्णव, शाक्त आदि के रूप में आकार लेती है, वही दृष्टि विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदायों, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत, भेदाभेद, आदि के रूप में व्याख्यायित होती है। इन्हीं मत-सम्प्रदायों की परिधि के भीतर भी नयी-नयी व्याख्याएँ, नये-नये आलाप उभरते रहते हैं, जो उन्हें नवोत्कर्ष देकर रूढिग्रस्त होने से बचाते हुए नये क्षितिजों की ओर ले जाते हैं। वेद के धुनमार्गी रह जाने के कारण, उसे ज्यों-का-त्यों रखने के आग्रह के कारण उसमें नवोत्कर्ष की नए आलाप की संभावना ही नहीं रही। आज भी वेद को दोहराने का सिलसिला ही बदस्तूर जारी है। हाँ, यह अवश्य है कि 19वीं शताब्दी में ऋग्वेद पर नया भाष्य करके स्वामी दयानंद ने उसे आर्यसमाज आन्दोलन के आगम के रूप में स्थापित किया था। किन्तु वैदिक दृष्टि का मर्म जैसा उपनिषदों में और कालान्तर में बादरायण के वेदान्तसूत्रों में अभिव्यक्त हुआ उसने व्याख्या के, आलाप के, नए मार्ग प्रशस्त किये। यही वेदांत-दृष्टि भारतीय संस्कृति का उत्स, उसका मूलाधार बन गयी। इसी प्रकार का विकास संगीत के क्षेत्र में मुकुंदजी ने दिखाया है। वेदान्त की तरह ही संगीत के क्षेत्र में गान्धर्व ने नए दिगन्त खोले, यही (गान्धर्व ही) भारतीय शास्त्रीय संगीत का उत्स है। दूसरी और बौद्ध और जैन आदि अवैदिक परम्पराएँ भी बुद्ध और महावीर के प्रतिभ-साक्षात्कार की विविध व्याख्याएँ हैं। यदि मुकुंदजी शब्दों में कहें, तो आलापचारियाँ हैं।
संगीत एवं चिंतन में राग और धुन, जिस पर मुकुंदजी के आलाप पर ऊपर चर्चा की, के साथ-साथ उन्होंने संगीत व चिंतन पर आगे के अध्यायों स्वर और शब्द एवं रस और सत्य, में किया है। जिस पर मैं, अपने लेख की सीमा को ध्यान में रखते हुए बहुत ही संक्षेप में कुछ अध्यायों पर कुछ अति-संक्षिप्त परिचयात्मक कहूँगा।
दूसरे अध्याय, स्वर और शब्द, में मुकुंदजी स्वर और शब्द को आधारभूत रूप से अभिव्यक्ति की दो परस्पर भिन्न कोटियों के रूप में स्थापित करते हैं। वे संगीत और विचार के बीच भेद को स्वर और शब्द के माध्यम से विमर्श करते हुए सामने लाते हैं। उनके अनुसार शब्द और स्वर दो मूलतः भिन्न लोकों की रचना के माध्यम हैं। शब्द वस्तु-लोक अथवा बाह्य-लोक की अनुरूपता में अर्थ-लोक रचता है। किन्तु स्वर किसी अर्थ-लोक को नहीं रचता। वह अपना, एक स्वतन्त्र भाव-लोक रचता है, जिसमे अर्थ नहीं, सार्थकता होती है। स्वर का भाव-लोक, शब्द के अर्थ-लोक की तरह, किसी अन्य लोक का, किसी स्व-बाहर बाह्य-लोक का आलंबन नहीं लेता। मुकुंदजी कहते हैं कि संगीत में हम लोक को एक ओर रखकर भावना की आँख से भावना का ही भावन कर पाते हैं। स्वर किसी बारे में नहीं होता, पर वह भावना-स्पंद में रहता हुआ भी भावना का स्वतन्त्र रूप से वहन कर सकता है। स्वर किसी बारे में नहीं होता ... (वह) संगीत का एक निभृत भाव-लोक बनाता है, जहाँ भावना अपने प्रति आत्मचेतन हो पाती है। संगीत भावना के स्वतन्त्र स्वसंवेद का माध्यम है लोक से अछूता रहकर स्वर हमारी भावना और उसके भावन के बीच संकेत की डोर बाँधता है। इस प्रकार, स्वर और शब्द, संगीत और विचार दो परस्पर भिन्न लोकों की अभिव्यक्ति के माध्यम हैं, पहला स्वालंब भावना का लोक है, तो दूसरा परालम्ब अर्थों का लोक।
तीसरे अध्याय रस और सत्य में मुकुंदजी ने लम्बे युक्ति-विमर्श के माध्यम से स्थापित किया है कि शब्द और स्वर के अवगाह्य विषय क्रमशः सत्य और रस हैं। शब्द सत्य की सिद्धि का माध्यम है और स्वर रस की निष्पत्ति का। किन्तु बाद में रस की निष्पत्ति को लेकर मुकुंदजी की सोच में स्पष्ट परिवर्तन आया। अब वे संगीत का लक्ष्य रस की निष्पत्ति नहीं, अपितु भाव की अभिव्यंजना मानते हैं। उनकी पुस्तक संगीत और संस्कृति में दो लेख हैं- संगीत का भावलोक (एक विचार यात्रा) और भावन, इन दोनों में संगीत ही नहीं, बल्कि अन्य अमूर्त्त कलाओं को भी भाव की अभिव्यंजना का माध्यम माना है। उनके अनुसार, संगीत रस की निष्पत्ति को नहीं, भाव की व्यंजना को लक्षित करता है।
सन् 2004 व 2009 के बीच मुकुंदजी ने मनुष्य के कर्म पर केन्द्रित दो पुस्तकें प्रकाशित कीं धर्मसंकट और कर्म-चेतना के आयाम। धर्मसंकट में उन्होंने धर्म के औचित्य-बोध के स्वरूप में अन्तर्निहित संकट को उभारा है। उन्होंने धर्म के स्वरूप पर विमर्श उन्होंने कृष्ण की धर्म-दृष्टि को सामने रख कर किया है। संगीत और चिंतन की तरह ही उनकी यह कृति भी अनन्य और असाधारण है। यह एक ओर धर्म-संकट को विषय बनाकर लिखी जाने वाली अकेली पुस्तक है, तो दूसरी ओर यह धर्मशास्त्र का, मनुष्य के सामाजिक-व्यवहार के शास्त्र का, विवेचन प्रस्तुत करते हुए धर्म-संकट पर विमर्श करती है और इसमें शास्त्र का प्रयोग इसमें व्यवहार के प्रमाण या निदर्श के रूप में हुआ है। धर्म-संकट की स्थितियों पर विमर्श करते हुए धर्म के तत्त्व को उभारने का प्रयास हुआ है। शास्त्र उनके इस धर्म-संकट विमर्श का एक अंग है। महत्त्व की बात यह है कि, जैसा शल्यजी ने धर्म-संकट की भूमिका में कहा है, इसमें भरपूर शास्त्र-चर्चा है..., किन्तु इसमें शास्त्र पर चर्चा नहीं है, बल्कि शास्त्र यहाँ लेखक के अपने विचार-क्रम का अंग बनकर आते है और एक नए सन्दर्भ में अपने अर्थ का नया मर्म देख पाते हैं। इस पुस्तक में धर्म, औचित्य-बोध से मर्यादित मनुष्य के सामाजिक-व्यवहार और पुरुषार्थ के क्षेत्रों के दायरों को समेटते हुए धर्म के स्वरूप पर विमर्श हुआ है। शल्यजी कहते हैं, इस धर्म-संकट पुस्तक के माध्यम से धर्म के लोक, या कहें अर्थ और काम, से समन्वित रूप की और धर्म से संतुलित रूप की बहुत गहरी और सुन्दर प्रस्तुति हुई है। कम से कम मेरी जानकारी में, धर्मविषयक इस प्रकार का लोक-जीवन की समेटता विचार अन्यत्र कहीं नहीं हुआ है।
कर्म-चेतना के आयाम में भी विमर्श कर्म पर ही केन्द्रित है। किन्तु एक अंतर के साथ। मुकुंदजी कहते हैं कि महाभारत में में आये एक धर्म-संकट के ही प्रसंग में जिस दृष्टि की उपस्थापना करते हैं, उसी दृष्टि को मुकुंदजी ने कर्म-चेतना के अवगाहन का आधार बनाया है। यह प्रसंग महाभारत का है, गीता का नहीं। वे कहते हैं कि गीता का प्रवचन भी अर्जुन के समक्ष एक घोर, असमाधेय-से धर्म-संकट उत्पन्न हो जाने पर दिया गया था। किन्तु अर्जुन को कर्म में निवृत्ति साधने की शिक्षा देते हुए कृष्ण अंततः कर्म को ही निवृत्ति की और ले जाते हैं। कर्म-चेतना की गहराई में उतर कर अंततः कर्म-संकल्प को परमात्मा के हाथ सौंप देना चाहती है।... पर जिस उपस्थापना की मैं बात कर रहा हूँ, वह हमारी साधारण कर्म-प्रवृत्ति को ही विषय बनाती है, और उसका लक्ष्य अभ्युदय है, निःश्रेयस नहीं। उस उपस्थापना को मेरे कुछ विस्तृत विचार का बीज कहा जा सकता है। कृष्ण की जिस उपस्थापना की मुकुंदजी बात कर रहे हैं, उसका प्रसंग महाभारत के युद्ध के समय का है जब युधिष्ठिर कर्ण के हाथों पराजित होकर अपने शिविर में लौटते हैं। कुछ देर में अर्जुन और कृष्ण भी आ जाते हैं। कर्ण के हाथों हुई अपनी दुर्दशा से झल्लाए युधिष्ठिर अर्जुन को कोसते हुए कहते हैं कि तुम अपना गांडीव किसी और को दे दो, तुम इसके अधिकारी नहीं। इस पर अर्जुन युधिष्ठिर की तरह ही आपे से बाहर हो जाते हैं और अपनी तलवार निकाल कर युधिष्ठिर को मारने पर आमादा हो जाते हैं। कृष्ण के रोकने पर अपनी उग्रता को उचित ठहराते हुए कहते हैं कि उन्होंने मन ही मन स्वयं को वचन दिया था कि जो गांडीव के विषय में ऐसी बात कहेगा, वो उसका वध कर देंगे। बात स्वयं को दिए वचन की है, इसलिए उन्हें युधिष्ठिर का वध करना ही होगा, चाहे फिर वे आत्महत्या ही क्यों न कर लें। कृष्ण समझाते हैं कि यह निरी मूर्खता है। अर्जुन प्रतिज्ञा के सत्य पालन की दुहाई देने लगते हैं। कृष्ण कहते हैं कि यह स्वयं के साथ की गई प्रतिज्ञा ही अनुचित है, बचपना है। वे कहते हैं कि अर्जुन सत्य की बात कर रहे हैं, किन्तु धर्म के सत्य को समझते नहीं हैं। धर्म का सत्य वचन में नहीं, करने में होता है, और कभी ऐसा भी होता है कि सत्य का अनुष्ठान, उसका करना, झूठ बोलने की अपेक्षा रखता हो। धर्म का काम है धारण करना। प्राण-रक्षा, अवध या अहिंसा और प्रभाव, जीवन का कल्याण, उन्नयन, अभ्युदय, ये धर्म के मर्म हैं। सच बोलो जैसे किसी नियम का कोरा पालन धर्म नहीं होता। कभी धर्म तोडकर ही धर्म का पालन संभव होता है। धर्म तर्क से या वेद से नहीं बनता, उसका रहस्य धर्मशील वृद्धों से ही सीखा जा सकता है, जिनमे धर्म की प्रज्ञा होती है। यह समझाने के लिए कृष्ण कौशिक नामक मुनि की कथा कहते हैं। जिनके सच बोलने से दस्युओं के हाथों निर्दोष व्यक्तियों की जान गई, जो कौशिक के आश्रम में आ छुपे थे। कौशिक ने दस्युओं को उनका पता सच-सच बता दिया। ऐसे सच को कृष्ण धर्म का सच मानने से इनकार करते हैं। वे कहते हैं कि यहाँ नियम ही काम कर रहा है, धर्म की प्रज्ञा नहीं, जिसकी दृष्टि मंय निर्दोष की प्राण-रक्षा ही लक्ष्य होना चाहिए था।
हालांकि मुकुंदजी का विमर्श कृष्ण की उस उपस्थापना के विवेचन का रूप नहीं लेता। वे तमाम युक्ति-विमर्श के बाद अंततः इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कर्म-चेतना के लिए औचित्य के नियम, युक्तियाँ आदि किसी ऊर्ध्वतर प्रज्ञा के संकेत के रूप में ही सार्थक हो सकते हैं। यह प्रज्ञा ऐसों से ही सीखी जा सकती है, जो इसके प्रयोक्ता हों। किन्तु मर्म की बात यह है कि बात किसी के चले हुए रास्ते पर चलने की नहीं है। बात तो उस दृष्टि के आँख में आ खुलने की है, जो रास्ता दिखाती-बनाती है।
सन् 2009 में ही मुकुंदजी की एक और पुस्तक प्रकाशित हुई क्या है, क्या नहीं है यह अस्तित्व विषयक एक दार्शनिक कृति है। इसकी विलक्षणता इस बात में है कि यह संवाद शैली में लिखी गई है। यद्यपि संवाद शैली में दार्शनिक प्रतिपादन कोई नई बात नहीं है, उपनिषदें और प्लेटो के ग्रन्थ संवाद शैली में ही लिखे गए थे। किन्तु मुकुंदजी की इस पुस्तक और अन्यों दार्शनिक संवादों में एक बडा अंतर है। जहाँ अन्य संवादों में केवल एक वक्ता और शेष उपस्थित लोग श्रोता हैं, वहीं मुकुंदजी के संवाद में शामिल पाँच व्यक्ति सामान रूप से वक्ता और श्रोता हैं। इन संवादों में मुकुंदजी ने अस्तित्व को दार्शनिक विमर्श का विषय बनाया है। इस विमर्श के विस्तार में यहाँ जा पाना संभव नहीं, लेख का विस्तार पहले ही बहुत हो गया है। अंत में इतना ही कहूँगा कि मुकुंदजी की यह कृति दर्शन के क्षेत्र में एक अनन्य असाधारण योगदान है।



सन्दर्भ-
लाठ, मुकुंद, धर्म-संकट, राका प्रकाशन, इलाहाबाद, 2004
लाठ, मुकुंद, संगीत और संस्कृति, संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली, पृ. 9-10।
वही पृ. 10
वही, पृ. 10
ई. नाइजेन्युइस, एथ्नोम्यिकॉलॉजी, सितम्बर, 1980, पृ 570।
लाठ, मुकुंद, संगीत एवं चिंतन, राका प्रकाशन 2007।
लाठ, मुकुंद, संगीत एवं चिंतन... पूर्वोद्धृत, पृ. 8।
वही, पृ 9।
वही, पृ 11-13
लाठ, मुकुंद, संगीत और संस्कृति, पूर्वोद्धृत. पृ. 19-20
वही
लाठ, मुकुंद, संगीत एवं चिंतन... पूर्वोद्धृत, पृ. 54।
लाठ. मुकुंद, धर्म-संकट... पूर्वोद्धृत
लाठ, मुकुंद, कर्म-चेतना के आयाम, राका प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009

***
सम्पर्क : पी-51, मधुबन पश्चिम, किसान मार्ग,
टोंक रोड, जयपुर - पिन ३०२०१०
मो. ९८२९१५४४६३