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श्रद्धांजलि : आचार्य मुकुन्द लाठ

पीयूष दईया
अथर्व विचित्र वेद है। उसमें एक ओर जहाँ टोने, टोटके, वीर्यवर्धन, वशीकरण आदि के मन्त्र हैं, वहीं उपनिषद् और दार्शनिक भावना से पूरित सूक्त भी कम नहीं हैं।

उदाहरण से ही बात का साक्षात् हो सकता है। इसलिए ऐसे दो सूक्त यहाँ दे रहा हूँ।

पहला मनुष्यसूक्त है, दूसरा स्कम्भसूक्त।

अथर्व का प्रचलिततम रूप शौनक संहिता में मिलता है। शौनक संहिता सुगठित पर लम्बा ग्रन्थ है। उसमें ५९८७ मन्त्र हैं जो ७३१ सूक्तों में बँटे हैं। मन्त्रों का बडा भाग शान्तिक और पौष्टिक कर्म से सम्बन्ध रखता है-एक शब्द में अभ्युदय से, लौकिक श्री-वृद्धि से। शान्ति कर्म भूत-प्रेत आदि के आवेश को दूर करने के लिए है। और पौष्टिक कर्म श्री-लाभ के लिए-परस्पर-सांमनस्कता, शत्रुनाश, प्रायश्चित्त, राजकर्म-राष्ट्र को निरापद और उन्नत रखने के लिए। इसके अलावा गर्भाधान आदि के मन्त्र भी हैं यहाँ।

पर संहिता में उपनिषद्-भाव रखते आध्यात्मिक और दार्शनिक सूक्त भी कम नहीं हैं। पृथिवीसूक्त हम देख आए हैं। दो और सूक्तों का मैंने नाम लिया है-एक, पुरुषसूक्त (जिसे मनुष्यसूक्त भी कहा जा सकता है) और दूसरा, स्कम्भसूक्त। स्कम्भ उस देवता का नाम है जो सृष्टि के पहले था, सब देवों के, ब्रह्म के भी पहले। इसकी आध्यात्मिक गहनता है लक्ष्य। ये दो सूक्त यहाँ दे रहा हूँ।

दार्शनिक सूक्तों में कामसूक्त और प्राणसूक्त को भी रखा जा सकता है। ब्रह्मचर्यसूक्त को भी इनके साथ जोडा जा सकता है। इस सूक्त में ब्रह्मचारी की महिमा का गान है-मनुष्य का गौरव यहाँ देवताओं से भी ऊपर उठता दिखता है।

ऊपर की बातों से स्पष्ट अथर्व में एक गहरी लौकिकता का प्रकाश है। कह सकते हैं कि उसमें हम वैदिक ज्ञान-भाव-कर्म का आठपहरी-रोजमर्रा में बहता-चलता-रूप देख सकते हैं-वैदिक संस्कृति का साधारण जीवन।

पुरुषसूक्त

सायण कहते हैं : इस सूक्त में पुरुष के, अर्थात् मनुष्य के माहात्म्य का वर्णन है। मनुष्य में भिन्न-भिन्न अवयव हैं। किस देवता ने बनाये? ऐसे प्रश्नों और उनके उत्तर के रूप में यह वर्णन किया गया है।

केन पार्ष्णी आभृते पूरुषस्य केन मांसं संभृतं केन गुल्फौ।।

केनाङ ् गुलीः पेशनीः केन खानि केनोच्छलङ् खौ मध्यतः कः प्रतिष्ठाम्।।१।।

किसने एडियाँ बनायीं पुरुष की, किसने इसे मांस-पूरित किया, किसने टखनियाँ बनायीं?

उँगलियाँ किसने बनायीं, किसने पेशनी, किसने इन्द्रियाँ, किसने मध्य में दो उच्छलङ् ख (१) बनाये (मध्य को दोनों ओर से उच्छल-ऊँचा-किया)।

कस्मान्नु गुल्फावधरावकृण्वन्नष्ठीवन्नष्ठीवन्तावुत्तरौ पूरुषस्य। 8

जङ् घे निर्गत्य न्यदधुः क्व स्विज्जानुनोः संधी क उ तच्चिकेत।। २।।

टखने कहाँ से आए पुरुष के, नीचे-ऊपर के अधर किसने अखण्ड बनाये? दोनों जाँघों को पूरा का पूरा रखा, उनकी सन्धियाँ बनायीं। कौन जानता है किसने?

कः सप्त खानि वि ततर्द शीर्षणि कर्णाविमो नासिके चक्षणी मुखम्।।8।।

येषां पुरुत्रा विजयस्य मह्मनि चतुष्पादो द्विपदो यन्ति यामम्।। ६।।

किसने सिर में सात छेद किये-दो कान, दो नाक, दो आँखें और मुख। इनसे पुरुष को विजय मिली है-वह चतुष्पाद हो कर भी द्विपद के मार्ग चलता है।

हन्वोहि जिह्वामदधात् पुरूचीमधा महीमधि शिश्राय वाचम्। 8।।

स आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तरपो वसानः क उ तच्चिकेत।। ७।।

किसने जबडों के बीच लम्बी जीभ रखी, जिसकी धरती वाक (वाणी) को सहारा देती है। यह प्राणधारी पुरुष (तभी) समस्त लोकों में स्थिति रखता है। कौन यह जानता है?

मस्तिष्कमस्य यतमो ललाटे ककाटिकां प्रथमो यः कपालम्। 8।।

चित्वा चित्यं हन्वोः पूरुषस्य दिवं रुरोह कतमः स देवः।। ८।।

कहीं ललाट में, इसके मस्तिष्क में, वह हड्डी लगायी जो इसका पहला कपाल है। जबडों के बीच चित्त को लाकर किस देव ने पुरुष को द्यौस् का आरोहण कराया?

प्रियाप्रियाणि बहुला स्वप्नं संबाधतन्द्र्यः।।००००

आनन्दानुग्रो नन्दांश्च कस्मात् वहति पूरुषः।। ९।।

बहुल प्रिय और अप्रिय, और स्वप्न जो नींद को बाधित करता है, और तीव्र आनन्द और प्रमोद, इन्हें कहाँ से वहन करता है यह पुरुष।

आर्तिरवति समृद्धिर्निर्गतिः कुतो नु पुरुषेमतिः।।10।।

अभावः राद्धिः समृद्धिरव्यृद्धिर्मतिरुदितयः कुतः।। १०।।

आर्ति, निर्धनता, समृद्धि, दुरवस्था, अमति, ये कहाँ से आये पुरुष में। और गद्धि, समृद्धि, महावृद्धि, मति, अभ्युदय-ये कहाँ से?

को अस्मिन् रूपमदधात् को मह्मानं च नाम च।।10।।

गातुं को अस्मिन् कः केतुं कश्चरित्राणि पूरुषे।। १३।।

किसने इसे रूप दिया किसने महिमा दी, नाम दिया। कौन इसे चरिष्णु रखता है, कौन ज्ञान देता है, कौन विभिन्न चरित्र देता है? अथर्वा ने इसके मस्तिष्क को बाँधा, और हृदय को। मस्तिष्क से ऊर्ध्व इसे पवमान ने प्रेरित किया (ऊपर और ऊपर) शीर्ष तक।

ऊर्धो नु सृष्टाऽस्तिर्यङ् नु सृष्टाःऽ सर्वा दिशः पुरुष आ बभूवाँऽ। 28।।

पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते।। २८।।

ऊर्ध्व में सृष्ट हुआ, तिर्यक सृष्ट हुआ, सारी दिशाएँ पुरुष में आ रहीं। पुरुष ब्रह्म की पुरी को जानता है, वहीं का कहलाता है।

कहना न होगा, सूक्त में पुरुष की महिमा उदात्त है। प्रकट है। पर यह आज जैसा मानवतावाद या मानववाद नहीं है, जहाँ मनुष्य अपनी आत्मंभरिता में अपने आप को सृष्टि के केन्द्र में रखता है, मानो वह है तो जगत् है। सूक्त में मनुष्य महिम है, पर जगत्-गत है। जगत् का एक अंग, एक प्रधान अंग भी कह सकते हैं। पर आज की तरह जगत् उसका नहीं, वह जगत् का है।

स्कम्भसूक्त

पुरुषसूक्त के बाद का ही सूक्त है, स्कम्भसूक्त । सायण कहते हैं-‘स्कम्भ’ इस वेद में उस सनातन देव का नाम है जो ब्रह्म से भी पहले है। इसीलिए उसे ज्येष्ठ ब्रह्म भी कहा जाता है। जो कुछ अस्तित्व में है, उसी में रहता है, सब कुछ उससे आविष्ट है। विराट् भी उसमें समाहित है। देव आदि भी उसी में समाविष्ट हैं।

सूक्त में अध्यात्म तत्व का अनुपम उभार देखें।

कस्मिन्नङ्गे तपो अस्याधि तिष्ठति कस्मिन्नङ्ग गतमस्याहितम्।।1।।

क्व व्रतं क्व श्रद्धास्य तिष्ठति कस्मिन्नङ्ग सत्यमस्य प्रतिष्ठितम्।। १।।

इसके किस अङ्ग में तपस् रहता है, किस अङ्ग में गत का वास है? व्रत कहाँ रहता है इसमें, और सत्य किस अङ्ग में प्रतिष्ठित है?

कस्मिन्नङ्गे तिष्ठति भूमिरस्य कस्मिन्नङ्गे तिष्ठत्यन्तरिक्षम्।।3।।

कस्मिन्नङ्गे तिष्ठत्याहिता द्यौः कस्मिन्नङ्गे तिष्ठत्युत्तरं दिवः।। ३।।

किस अङ्ग में भूमि का वास है, किस अङ्ग में अन्तरिक्ष का? किस अङ्ग में द्यौस् आहित है, किस अङ्ग में ऊपर का दिव लोक?

यस्मिन्त्स्तब्ध्वा प्रजापतिर्लोकान्सर्वां अधारयत् ।।7।।

स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः।। ७।।

जिसमें स्थिर रह कर प्रजापति सारे लोकों का धारण करते हैं उसे स्कम्भ कहते हैं। कौन है वह?

यत्रामृतं च मृत्युश्च पुरुषे समाहितः।।15।।

समुद्रो यस्य नाड्यः पुरुषेधि समाहिताः स्कम्भं तं ।।15।।

ब्रूहि कतमः स्विदेव सः।। १५।।

जहाँ अमृत और मृत्यु पुरुष में समाहित हैं, समुद्र जिसकी नाडियाँ जो पुरुष में बहती हैं, वह स्कम्भ है। कौन है वह?

ब्रह्मचारीसूक्त

ब्रह्मचारीष्णंशचरति रोदसी उभे तस्मिन् तपसा पिपर्ति ।।1।।

देवा समनसो भवन्ति।।1।।

स दाधार पृथिवीं दिवं च आचार्यं तपसा पिपर्ति।। १।।

ब्रह्मचारी (जो वेदात्मक ब्रह्म में अध्ययनशील रहता हुआ विचरण करता है), वह पृथ्वी और द्यौस् में इच्छानुसार व्याप्त होता है। सारे देवता उसके सनमस्क हैं। वह पृथ्वी और द्यौस् का धारण करता है। अपने तपस् से अपने आचार्य का पालन करता है।

आचार्य उपनयमाना ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः। 3।।

तं रात्रिस्तिस्रः उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति देवाः।। ३।।

(मानव) ब्रह्मचारी को आचार्य अपने पास लाता है। उसके अन्तः (विद्याशरीर में) गर्भ का आधान करता है। उसे तीन रात उदर में रखता है। उसके जन्म लेने पर देवता उसके आगे आ खडे होते हैं।

ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोकं प्रजापतिं परमेष्ठिनं विराजम्। 7।।

गर्भो भूत्वामृतस्य योनाविन्द्रो ह भूत्वासुरांस्ततर्ह।। ७।।

ब्रह्मचारी ब्राह्मण को, नदियों को, लोक को, प्रजापति को, परमेष्ठी को जन्म देता है। अमृत की योनि में गर्भ बन कर, इन्द्र बन कर, वह असुरों का हनन करता है।

यत्रादित्याश्च रुद्राश्च वसवश्च समाहिताः।।22।।

भूतं च यत्र भव्यं च सर्वे लोकाः प्रतिष्ठिताः।।22।।

स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः।। २२।।

जहाँ आदित्य, रुद्रगण और वसुगण और देवगण सब समाहित हैं, जहाँ भूत और भविष्य हैं, जहाँ समस्त लोक प्रतिष्ठित हैं, उसे स्कम्भ कहते हैं। कौन है वह?

ब्रह्मचारी ब्रह्म भ्राजद् बिभर्ति तस्मिन् देवा अपि विश्वे समोताः।। 24।।

प्राणापानौ जनयन्नाद् व्यानं वाचं मनो हृदयं ब्रह्म मेधाम्।। २४।।

दीप्यमान ब्रह्मचारी ब्रह्म का धारण करता है। उसका सब देवताओं से सम्बन्ध है। वह सब प्राणियों में प्राण और अपान वायु को जन्म दे वास करता है। वह वाक, मन, हृदय, ब्रह्म और मेधा को जन्म देता है।

अब वरुणसूक्त लीजिए। इसमें वर्षा का वर्णन वैदिक साहित्य का एक रत्न है। पूरा सूक्त दे रहा हूँ।

वरुणसूक्त

समुत्पतन्तु प्रदिशो नभस्वतीः समभ्राणि वातजूतानि यन्तु। 1।।

महगषभस्य नदता नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु।। १।।

आकाश की सारी दिशाएँ वायु से युक्त हो जल-पूरित हवा के वेग से आ बरसें। महान् गषभ की तरह गरजती वायु के साथ सनसनाते मेघ जल की वर्षा से पृथ्वी का तर्पण करें।

समीक्षयन्तु तविषाः सुदानवोपां रसा ओषधीभिः सचन्ताम्। 2।।

वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमि पृथग् जायन्तामोषधयो विश्वरूपाः।। २।।

महत् शोभन वायु वर्षा के साथ प्रकट हो। जल का रस वनस्पतियों का सेचन करे। वर्षा की धारा पृथ्वी का समादर करे। सारी वनस्पतियाँ अपने अलग-अलग रूपों में जन्म लें।

समीक्षयस्व गायतो नभांस्यपां वेगासः पृथगुद् विजन्ताम्। 3।।

वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमि पृथग् जायन्तां वीरुधो विश्वरूपाः।। ३।।

हे मरुद्गण हम तुम्हारा स्तुतिगान करते हैं। मेघों के साथ आओ। तुम्हारा प्रवाह अलग-अलग बहे। वर्षा की धाराएँ भूमि का आदर करें। वृक्षों की सारी जातियाँ अलग-अलग पनपें।

गणास्त्वोप गायन्तु मारुताः पर्जन्य घोषिणः पृथक। 4।।

सर्गा वर्षस्य वर्षतो वर्षन्तु पृथिवीमनु।। ४।।

हे (वर्षा के देवता) पर्जन्य, मरुत्-गण तुम्हारा स्तुति-गान करें। वृष्टि-जल की धाराएँ कई तरह से बनती हुई पृथ्वी पर बरसें, उसे सींचें।

उदीरयतः मरुतः समुद्रतस्त्वेषो अर्को नभ उत् पातयाथ। 5।।

महगषभस्य नदतो नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु।। ५।।

हे मरुत्-गण, समुद्र से उठा कर बरसात के पानी से भरे मेघ बलवत् गषभ की तरह गरजते हुए धरती पर बरसाओ।

अभि क्रन्द स्तनयार्दयोदधि भूमि पर्जन्य पयसा समङ् ध। रुद्भिः 6।।

त्वया सृष्टिं बहुलमैतु वर्षमाशारैषी कृशगुरेत्वस्तम्।। ६।।

पर्जन्य, तुम मेघों को साथ लेकर घोष करो। समुद्र से बलात् जल का आहरण करो। तुम्हारे उठा कर लाये हुए घने, जल-भरे मेघ यहाँ आएँ। सूर्य चाहता है तुम मूसलाधार बरसो-उसकी किरणें मन्द पड गयी हैं, अस्त हो रही हैं।

सं वोवन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत। 7।।

मरुद्भिः प्र*युता मेघा वर्षन्तु पृथिवीमनु।। ७।।

ये वर्षा-दान करते मरुत्-गण हमें तृप्ति दें। वायु-प्रेरित मेघ अजगर जैसी बडी, स्थूल धाराओं में जल पृथ्वी पर बरसे।

आशामाशां वि द्योततां वाता वान्तु दिशोदिशः। 8।।

मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः सं यन्तु पृथिवीमनु।। ८।।

दिशा-दिशा में विद्युत दमक उठे। दिशा-दिशा में वायु बह चले। मरुत्-गण-प्रेरित मेघ धरती पर आ गिरें।

आपो विद्युदभ्रं वर्षं सं वोवन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत। 9।।

मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः प्रावन्तु पृथिवीमनु।। ९।।

हे शोभन-दानशील मरुत्-गण, जल, विद्युत, मेघ, वर्षा-ये अजगर जैसे वारि-प्रवाह के साथ जगत् का तर्पण करें। मारुत-प्रेरित मेघ पृथ्वी को प्लावित कर दे।

अपामग्निस्तनूभिः संविदानो य ओछधीनामधिपा बभूव। 10।।

स वर्षं वनुतां जातवेदाः प्राणं प्रजाभ्यो अमृतं दिवस्परि।। १०।।

मेघों के बीच एक मेघ से दूसरे में विचरती विद्युत-अग्नि वनस्पति उपजाती है। नभ में अमृत रूप यह अग्नि मनुष्य का प्राण है। हमें वर्षा दे।

प्रजापतिः सलिलादा समुद्रादाप ईरयन्नुदधिमर्दयार्ति। 11।।

प्र प्यायतां वृष्णो अश्वस्य रेतोर्वाङ्गेतेन स्तनयितनुनेहि।। ११।।

प्रजापति सूर्य जल-व्याप्त समुद्र से बलात् जल का आहरण करे। शक्तिशाली अश्व के रेतस्वत् वीर्य से पृथ्वी को भर दें। ऐसे वीर्य के साथ, मेघ, हमारी ओर आओ।

अपो निषिञ्चन्नसुरः पिता नः श्वसन्तु गर्गरा अपां 12।।

वरुणाव नीचीरपः सृज। 12।।

वदन्तु पृश्निवाहवो मण्डूका इरिणानु।। १२।।

हमारे प्राण-प्रद पिता सूर्य घर्घर शब्द के साथ उच्छवसित हों।

तुम भी, वरुण, झुकते हुए मेघ जगाओ। सूखी हुई धरती पर निष्प्राण से पडे मण्डूक शब्द कर उठें।

संवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः। 13।।

वाच पर्जन्यजिन्वितां प्र मण्डूका अवादिषुः।। १३।।

व्रतशील ब्राह्मण जो वर्ष भर शुष्क रहे, वर्षा से हर्षित मण्डूकों की तरह गा उठे।

उपप्रवद मण्डूकि वर्षमा वद तादुरि। 14।।

मध्ये हृदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुरः पदः।। १४।।

तू भी वर्षा के साथ बातें कर, मण्डूकी सरोवर के बीच अपने चारों पाँव पसार कर तैरती रह।

खण्वखाऽइ खैमखाऽइ मध्ये तदुरि। 15।।

वर्षं वनुध्वं पितरो मरुतां मन इच्छत।। १५।।

हृद में विचरती मण्डूकी, तुम घोष-करती वर्षा का वरण करो। पिता मारुत की ओर मन प्रेरित करो।

महान्तं कोशमुदचाभि षिञ्च सविद्युतं भवतु वातु वातः। 16।।

तन्वतां यज्ञं बहुधा विसृष्टा आनन्दनीरोषधयो भवन्तु।। १६।।

पर्जन्य, तुम समुद्र से आए घने मेघों से धरती को सींचो। अन्तरिक्ष में विद्युत दमक उठे। हवाएँ चल पडें। बार-बार बरसते मेघ यज्ञ का विस्तार करें। वनस्पतियाँ आनन्दमयी हो उठें।

हम देख ही रहे हैं कि अथर्व में ऊँच-नीच भरा वैचित्र्य है। स्पष्ट है। यहाँ अथर्व की तुलना पुराणों से की जा सकती है। वहाँ भी लौकिक और अलौकिक का ऐसा ही अनहोना मेल देखा जा सकता है।

अब पृथिवी-सूक्त को सामने रख कर कुछ कहना चाहता हूँ।

आज हमने जब पृथ्वी को विनाश के कगार पर ला खडा कर दिया है, पृथ्वी में रहते हुए हम पृथ्वी से खिलवाड नहीं कर सकते। यह बात हममें भीतर तक उतर रही है आज। हम भी अपने को पृथ्वीपुत्र कहने लगे हैं। पर बात बिल्कुल भी बनती नहीं दीखती। पृथ्वी हमारी माता हो, पर संयत्ता उसके हम ही हैं। वह हमारे आयत्त में है। हम ही उसके रक्षक हैं। वह अस्वतन्त्रा है। हम स्वतन्त्र हैं। सूक्त का स्वर इससे सर्वथा भिन्न है :

पृथिवी माता है,

मैं पुत्र हूँ पृथिवी का।

पर्जन्य पिता हैं हमारे

हमारा भरण करें।

पृथ्वी हमें अन्न देती है, पर्जन्य-वर्षा के मेघ-उस अन्न को प्राणजल देते हैं। यों हमें पालते हैं, हमारा भरण-पोषण करते हैं। इस भाव का आज हममें अभाव है। हम ही अपने को पालते हैं, पनपते हैं-पृथ्वी हमारा उपकरण मात्र है। यह उपकरण हमारे हाथ से निकल गया है, अपना ही एक विभीषिकामय रूप ले रहा है। पर इसे वश में करना हमारा ही साहस-कर्म होगा, जौहर होगा-ऐसा विचार हममें जागा रहता है। हालांकि अब हम इस पर उतना भरोसा नहीं करते, पर दूसरी कोई प्रवृत्ति हममें जागी नहीं है। प्रवृत्ति का बदलना चेतना का बदलाव चाहता है। वह बदलाव नहीं है हममें। हममें साधारण-सी शान्ति का भी अभाव है। जब शान्ति की शर्त यह है कि हर देश के पास ब्रह्मास्त्र-परमाणु बम-हो तो फिर अशान्ति क्या! हम अपने आप को सभ्यता की चूडा पर रखते हैं, पर समष्टि-रूप से हम सभ्य नहीं रहे हैं, शिष्ट ही नहीं रहे हैं। हो भी कैसे सकते हैं, अगर हमारे होने की शर्त ही परमाणु बम हो। हम आपस में सदा से लडते रहे हैं, पर अब युद्ध ने एक नया आसुरी आयाम ले लिया है। यह हमारी पार्थिव-जड-जगत् पर विजय का फल है। दूसरी ओर हमारी इस विजय ने हमें अभूतपूर्व यन्त्र दिए हैं, और नित नये देता जा रहा है। इन यन्त्रों ने हमें अपना दास बना लिया है। हमें भोग-लिप्सा में गहरे से गहरे डुबाते जा रहे हैं। हम विवश हैं।

सूक्त का कवि कहता है-

निर्मल-करती

पृथिवी,



मैं तुम्हारे भीतर से

जो कुछ निकालता हूँ

सब फिर से भर जाए।



तुम्हारे मर्म पर,

हृदय पर,

कहीं चोट न लगे!

आज हम अपनी सुख-सुविधा के लिए बडे कौशल से पृथ्वी का दोहन करते हैं। इस दोहन को अपनी उपलब्धि, अपना अधिकार समझते हैं, क्योंकि हमने पृथ्वी पर विजय पा ली है। हम उसके संयत्ता हैं। कर्ता हैं हम, पृथ्वी हमारा कर्म है। अपने उपयोग-उपभोग के लिए उसका नियन्त्रण हमारा कर्तृत्व है। पर हम जितना पृथ्वी को वश में करते जाते हैं, उतना ही वह हमें विवश भी करती जा रही है। हमने उसे दूषित, पर्युषित कर दिया है। यह हमारी विभीषिकामय विडम्बना है कि हमारा जीवन, हमारा अस्तित्व ही, इससे दूषित हो रहा है। हवा, पानी, आकाश-जिनके बिना हम जी नहीं सकते, ये ही मैले-गँदले हो गये हैं, और दूषण बढता जा रहा है। हम सोचते थे कि विज्ञान से ऐसी समस्याएँ सुलझ जाएँगी। पर विज्ञान-और उससे जुडी टेक्नोलॉजी-ये समस्या को बढाते ही जा रहे हैं। हमने जो पार्थिव जगत्-जड जगत्-पर विजय पायी है, उस विजय ने हमें अणु-परमाणु बम दिए हैं। पर किस काम आते हैं ये-इन्होंने हमें अपने से ही पराजित कर दिया है। हमारे कौशल से इतने सक्षम हैं ये ब्रह्मास्त्र कि पृथ्वी का और उस पर पनपे समूचे जीवन का पल भर में सर्वनाश कर दें। पर हमारी अजीब पहेली यह है कि ऐसे ब्रह्मास्त्र हर देश, हर राष्ट्र चाहता है-आज इसके बिना देश की रक्षा ही सम्भव नहीं।

पृथिवी-सूक्त का कवि पृथ्वी को हमारी धारण करती देवी समझता है-वह हमारा, पशुओं का, पौधों का, सबका समानभाव से धारण करती है-

(४)

यहीं फैले थे

पहले के लोग



यहीं देवों ने

असुरों को जीता



गायों का,

घोडों का,

चिडियों का घर है



पृथिवी,

हमें श्री दो, तेज दो।



(१३)

ये मरणशील

दुपाये, चौपाये



जनमते हैं तुम पर

तुम पर विचरते हैं,

तुम इनका सहारा हो,

पृथिवी।



ये तुम्हारे पाँच मर्त्य मानव,

इन्हें उदीयमान सूर्य की किरणें

अमृत ज्योति देती हैं।

आज मानस यह है कि हम पृथ्वी पर रहते तो हैं, पर वह हमारा धारण नहीं करती, हम ही उसका धारण करते हैं-उसे सँभालते हैं। हाँ, उसका उपयोग करते हैं, इसमें हम सक्षम हैं, पर उसका रख-रखाव भी हम ही करते हैं। आज जब पृथ्वी हमारे बस में नहीं, हम जो करते हैं, उसे विकास नहीं, विकृति ही देता है, फिर भी हमारी सोच का मर्म यही है कि कर्ता तो हम ही हैं, पृथ्वी हमारा कर्म है-उसके लिए जो करना हो, हम ही कर सकते हैं।

पर कर हम कुछ नहीं पाते। हमारे किये का फल उलटा ही बैठता है। इसीलिए ऐसे भी लोग हैं जो मानते हैं-और इसके लिए आन्दोलन भी करते हैं कि पृथ्वी को, उसके जीवों को छेडा न जाए, हम पृथ्वी पर कतई हस्तक्षेप न करें। पृथ्वी के पक्ष में किया जाता यह आन्दोलन घोर हिसा पर भी उतर आता है। पर यह दिशा किसी सार्थक फल की ओर ले जाती नहीं दिखती-अन्धकार की ओर ही जाती दिखती है।

पृथ्वी को न छेडो यह भाव नया नहीं है। बिश्नोई सम्प्रदाय को ही लीजिए। पर बिश्नोइयों में यह एक कर्मकाण्ड जैसा ही है। दूसरे जो तद्वत् आचरण करते हैं, उनमें भी बात कर्मकाण्ड की-सी ही होती है-ऊपर ही ऊपर रहती है, क्योंकि चेतना वही बनी रहती है। सूक्त का स्वयं-सम्भूत, सहज, हृदय-दीप्त, अनायास भाव यहाँ नहीं है।

आज हम पृथ्वी का पूरा लेखा-जोखा लेने में समर्थ हैं। पृथ्वी में क्या है, क्या-क्या है, इसे हम जितना जानते हैं, पहले ऐसे ज्ञान का एकांश भी नहीं था। सूक्त के समय तो बिल्कुल नहीं। हमने पृथ्वी को तिल-तिल देख लिया है, उसके सूक्ष्म से सूक्ष्म में उतर कर उसे आँका है। इसे हम अपने विशुद्ध ज्ञान की उपज समझते हैं, जो ज्ञान-विज्ञान में रूप लेता है। पर यह विशुद्ध कहलाता ज्ञान, उपयोग-ज्ञान को साथ लिये रहता है-उससे युगनद्ध-सा रहता है। विज्ञान को टेक्नोलॉजी से अलग नहीं किया जा सकता। पृथ्वी के सूक्ष्म भाव जानना हमारे लिए उसके सूक्ष्म उपयोग का द्वार है।

फिर भी, इस ज्ञान के साथ हममें पृथ्वी का बोध बढा है जो टीवी, फिल्म जैसे माध्यमों से इसका साक्षात्-सा अनुभव भी आज प्रचुर उपलब्ध है। हमारी चेतना पर इसका प्रभाव पडा। और यह चेतना केवल ज्ञान की ओर ही नहीं, भाव की ओर भी उन्मुख होती है। इससे पृथ्वी के प्रति एक प्रीति का, स्निग्ध समादर का भाव भी जागता है। पर इस भाव में एक तटस्थता बनी रहती है-हम पृथ्वी के नहीं, पृथ्वी हमारी है, यह बोध बना रहता है। पृथ्वी गौण-सी ही रह जाती है। क्या हम हैं सूक्त के लिए पृथ्वी ही मुख्य है, हम गौण हैं।

सूक्त में भी यह भाव देखा जा सकता है कि हम पृथ्वी का धारण करते हैं। पर कैसे हम? वे हम जिनमें सत्य, तपस्, गत का बोध, ये जागते हैं।

(१)

सत्य

उग्र बृहत् गत



दीक्षा और तपस्

मन्त्र और यज्ञ



ये पृथिवी का धारण करते हैं।



धर्म इसका धारण करता है-







(१५)

सब की स्वामिनी,

ध्रुवा पृथिवी,

औषधि की माता,

धर्म इसका धारण करता है।

मधुर, मंगलमयी

इस पृथिवी पर



हम सदा, सब ओर

विचरण करें।



* श्री लाठ द्वारा यह भूमिका ररजा पुस्तक माला के अन्तर्गत सेतु प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक पृथ्वीसूक्त के लिए लिखी गई।
मुकुंद लाठ की दस कविताएँ
वैदिक काव्य का हिन्दी रूपान्तरण एवं रेखांकन
* १ *
सत्य
उग्र बृहत् ऋत
दीक्षा और तपस्
मन्त्र और यज्ञ
ये पृथिवी का धारण करते हैं।
पृथिवी,
विगत, अनागत की स्वामिनी,
हमारे लोक को विस्तार दो।

सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्मयज्ञः पृथिवीं धारयन्ति।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु।। १।।
पृथ्वीसूक्त । १७


* २ *

बढती हुई;
चढती हुई;
समतल फैली
पृथिवी।
मानव के लिए निर्बाध है
इसका मध्य।
कैसा वीर्य है
इसके पौधों में।
हमारे लिए
वर्धमान हो,
सिद्ध हो
पृथिवी।
असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्यां उद्वतः प्रवतःसमं बहु।
नाना वीर्या ओषधीर्या बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः।। २।।
पृथ्वीसूक्त । १९





* ३ *

जल है यहाँ
नदियाँ हैं
समुद्र है।
कृषि और अन्न का
जन्म है यहाँ।
यहाँ जीते हैं जीव
साँस लेते हैं,
विचरते हैं।
पृथिवी,
हमें हमारा पहला
पेय दो।

यस्यां समुद्र* उतसिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः
यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु।। ३।।
पृथ्वीसूक्त । २१

* ४ *

यहीं फैले थे
पहले के लोग
यहीं देवों ने
असुरों को जीता
गायों का,
घोडों का,
चिडियों का घर हो,
पृथिवी,
हमें श्री दो, तेज दो।

यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरानयवर्तयन्।
गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु।। ४।।
पृथ्वीसूक्त । २३
* ५ *

सब का भरण करती
मंगलमयी, ध्रुवा
हिरण्यवक्षा।
चञ्चल को अटल करती
अग्नि धारे, सर्वमयी,
इन्द्र वृषभ हैं तुहारे
पृथिवी,
हमें उदात्त धन दो।

विश्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठाहिरण्यवक्षा जगतो निवेशिनी।
वैश्वानरं बिभ्रती भूमिरग्निमिन्द्रऋषभा द्र*विणे नो दधातु।। ६।।
पृथ्वीसूक्त । २५

* ६ *

जागरूक,
अप्रमाद, देवता
इसकी रक्षा करते हैं।
सब-कुछ-बाँट-देती,
पृथिवी,
हमें मधु दो,
प्रिय दो।
और हम पर
वर्षा करो
वर्चस् की।

यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं देवा भू मि पृथिवीमप्रमादम्।
सा नो मधु प्रियं दुहामथो उक्षतु वर्चसा।। ७।।
पृथ्वीसूक्त । २७
* ७ *

समुद्र के सलिल में
डूबी थी
पहले यह पृथिवी।
अपनी माया से मनीषी इस पर विचरते थे।
परम व्योम में
अमृत है
इसका हृदय
सत्य की गोद में छुपा है।
यह भूमि
हमारे इस उत्तम राष्ट्र को
दीप्ति और शक्ति दे।

यार्णवेधि सलिलमग्न आसीत् यां मायाभिरन्वचरन् मनीषिणः।
यस्या हृदयं परमे व्योमिन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः।
सा नो भूमिस्त्वषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे।। ८।।
पृथ्वीसूक्त । २९
* ८ *

अश्विनों ने इसे नापा था।
यहीं
विष्णु ने विक्रम किया था।
शचीपति इन्द्र* ने
इसे शत्रुओं से शून्य किया
अपने लिए।
पृथिवी हमें
माँ की तरह
दूध दे।

यामश्विनावमिमातां विष्णुर्यस्यां विचक्रमे।
इन्द्र*ो यां चक्रआत्मनेनामित्रां शचिपतिः।
सा नो भूमिर्वि सृजतां माता पुत्राय मे पयः।। १०।।
पृथ्वीसूक्त । ३१
* ९ *

सरस हों
तुहारी पहाडियाँ
ये हिम-ढके पर्वत
ये अरण्य।
भूरी, लाल, श्यामला
पृथिवी, विश्वमयी,
ध्रुवा।
इन्द्र* इसकी रक्षा करते हैं।
मैं खडा हूँ इसी पर
अजित, अक्षत, अप्रतिहत।

गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तोरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु।
बभ*ुं कृष्णां रोहिणीं विश्वरूपां ध्रुवां पृथिवीमिन्द्र*गुप्ताम्।
अजीतोहतो अक्षतोध्यष्ठां पृथिवीमहम्।। ११।।
पृथ्वीसूक्त । ३३
* १० *

तुहारा मध्य,
तुहारी नाभि,

हे पृथिवी,
उत्स है ऊर्जा का।

वहीं हमें गोद दो,
पावन करो।

पृथिवी माता है,
मैं पुत्र हूँ पृथिवी का।
पर्जन्य पिता हैं हमारे
हमारा भरण करें।

यत् ते मध्यं पृथिवी यच्च नयं यास्त ऊर्जस्तन्वः संबभूवुः।
तासु नो धेह्यभि नः पवस्व माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः।
पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु।। १२।।
पृथ्वीसूक्त । ३५
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