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कुँवर नारायण : एक तीसरा इतिहास भी है

पुष्पेन्द्र कुमार
जब-जब कोई देश किन्हीं तीव्र ऐतिहासिक परिवर्तनों का केंद्र बना है अथवा उसे गंभीर सांस्कृतिक चुनौतियों का सामना करना पडा है, विभिन्न अनुशासनों ने अतीत के पुनरावलोकन के माध्यम से इसे समझने का प्रयास किया है। उस देश का साहित्य भी इन ऐतिहासिक परिवर्तनों और सांस्कृतिक चुनौतियों से सीधा प्रभावित होता है। ऐसे में सजग साहित्यकारों का इतिहास की ओर लौटना स्वाभाविक है। अतीत के इस पुनरावलोकन में विभिन्न अनुशासनों की अपनी एक गंभीर अकादमिक प्रक्रिया और परिधि होती है। इतिहास-अनुशासन जो पूर्णतः तथ्यों, संदर्भों, आँकडों के वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित है, वहाँ भी इतिहासकार की इतिहास-दृष्टि का सतत निरीक्षण चलता रहता है।
तो क्या भिन्न अनुशासन होने के कारण साहित्यकार का अतीत अवलोकन किसी नितांत भिन्न प्रक्रिया की माँग करता है? क्या साहित्यकार की इतिहास-दृष्टि नितांत भिन्न अवस्था या स्थिति है? नहीं, किसी साहित्यकार की इतिहास-दृष्टि, इतिहासकार की ही भाँति अपने समय, समाज और संस्कार की उपज होती है। साहित्य में इतिहास के तथ्यों, संदर्भों और आँकडों को नजरअंदाज करने अथवा उन्मुक्त प्रयोग करने की छूट को लेकर आरंभ से ही मतभेद रहा है। पाश्चात्य साहित्य में ऐसे कई विद्वान् हैं, जो अतीत के साहित्यिक अतिक्रमण को उचित नहीं मानते। अतः उनके अध्ययन के केंद्र में इतिहास-लेखन की अनुशासनिक चिंताएँ शुरू से रही हैं। हिंदी साहित्य में ऐसे कम ही रचनाकार हुए हैं जिन्होंने इतिहास दृष्टि और इतिहास लेखन की आवश्यकताओं, समस्याओं एवं सीमाओं को समझने की कोशिश की है। इतिहास केन्द्रित लेखन एवं उसकी प्रस्तुति की यह चिंता कुँवर नारायण के यहाँ गहरे अर्थों में मौजूद है। कुँवर नारायण उन गिने-चुने भारतीय लेखकों में हैं, जिन्होंने प्रदत्त इतिहास के बरक्स वैकल्पिक इतिहास की आवश्यकता और उसकी प्रकृति पर गंभीर चिंतन किया है।
कुँवर नारायण अपनी इतिहास दृष्टि को लेकर बिलकुल स्पष्ट हैं। वे लिखते हैं- अपनी कविताओं में मैंने इतिहास को राजाओं के इतिहास या विजेताओं के इतिहास की तरह नहीं देखा है। पहली बार एक साधारण आदमी की तरह कोशिश की है कि इतिहास की गलियों में घुसूँ, उन प्रतीकों के माध्यम से या उन चिन्हों के माध्यम से जो आज भी मुझे अपने चारों ओर दिखाई देते हैं। ये जरुरी नहीं कि ये प्रतीक और चिह्न किसी खंडहर या इमारत के ही हों। कभी-कभी मुझे आदमी की मानसिकता में भी वे चिह्न दिखाई देते हैं, जिनका की बहुत पुराना इतिहास हो सकता है, जैसे तानाशाही को ले या सौहार्द विनम्रता को ले। ये कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं जो आज भी हैं और आज से पहले की भी। इनका भी इतिहास है और इनके कारण भी इतिहास में बडी-बडी घटनाएँ हुई हैं। तो इस तरह की चीजों को मैंने कविताओं में पकडने की कोशिश की है और उसके साथ ही यह दृष्टि भी रही है कि वे सही-सही हमारे समय की समस्याओं को या कठिनाइयों को चित्रित भी कर सकें। इस अर्थ में इतिहास मेरे लिए पलायन नहीं रहा, एक बहुत सशक्त यथार्थ रहा है, जिसे मैंने कभी अपने समय में ला के देखा है, कभी अपने समय को इतिहास में ले जा कर देखा है।
कुँवर नारायण इतिहास को लेकर नितांत गंभीर हैं। उनकी सबसे बडी आपत्ति इतिहास दृष्टि को लेकर है, जो अधिकांशतः पूर्वनिर्धारित रही है। मसलन अतीत के किसी घटना अथवा संदर्भ के अध्ययन से दृष्टि का विकास होना चाहिए न कि दृष्टि के अनुरूप इतिहास-लेखन अथवा रचना का विकास। ऐसे में वह हर घटना अथवा संदर्भ को भिन्न अर्थों में देखने की कोशिश करते हैं-
किसी टूटे हुए खंजर की मूठ हाथों में लिए
सोच रहा हूँ-
खंजरों के बारे में
उन्हें चलाने वाले हाथों के बारे में
कातिलों और हमलों के बारे में
हजारों वर्षों के बारे में
और एक पल में अचानक
किसी अन्धी गली में खो जानेवाली
चीख के बारे में.....
यह कविता परंपरागत इतिहास दृष्टि पर कडा प्रहार है। जहाँ इतिहास भग्नावशेषों, ऐतिहासिक नायकों-प्रतिनायकों, युद्धों और कालों की व्याख्या बनकर रह गया है, वहाँ कवि उन मजलूमों को देखना चाहता है, जिसका इतिहास आज भी नगण्य है। कवि को यहाँ उस मनुष्य की चिंता है, जो इतिहास में आज भी नदारद है। कवि को उस जिजीविषा की तलाश है, जिसने उन्हें हजारों वर्षों तक आगे बढने की प्रेरणा दी। कवि वह सभी घटनाएँ और दृश्य देखना चाहता है, जो उन हत्याओं से इतर मनुष्य को अंततः मनुष्य होने को बाध्य करता रहा।
कुँवर नारायण ने अपनी इतिहास दृष्टि को एक व्यापक आयाम दिया क्योंकि वह इतिहास को किसी एक परिधि में रखकर नहीं देखना चाहते थे। उनके अनुसार साहित्य, संस्कृति और कलाएँ अपना इतिहास अलग बनाती हैं। विजेताओं, सम्राटों और राजनीतिज्ञों के इतिहास से अलग। जिसे आज हम एलिजाबेथ का शासन काल कहते हैं वह उनसे कहीं अधिक शेक्सपीयर का रचना काल था, भले ही एलिजाबेथ के समय में शेक्सपीयर की हैसियत एक मामूली नाटककार से अधिक न रही हो। आज हम जब उस विडम्बना पर विचार करते हैं, तो एक लेखक के अमर वैभव के सामने एक साम्राज्ञी के उद्धत दर्प पर हँसी आती है। यह लिखने की ऊर्जा आखिर कुँवर नारायण को कहाँ से मिली? वास्तव में यह कला और संस्कृति की उस प्रतिरोधात्मक शक्ति की ऊर्जा है जो एक राष्ट्राध्यक्ष के दर्प को हँस सकता है। उसके अहंकार को चुनौती दे सकता है। यही कारण है कि इनकी इतिहास केन्द्रित कविताओं में कला और संस्कृति गहरे अर्थों में व्याप्त है।
कुँवर नारायण ने साहित्यकारों एवं कलाकारों को संस्कृति निर्माता के रूप में देखा है। युद्धों के आतंक और ध्वस्त होते साम्राज्यों के बीच, बनती-उजडती बादशाहतों और उनके अत्याचारों के बीच, यह कलाकार ही है जो उदात मूल्यों, निर्दोष संस्कारों, आजाद ख्यालों और मानवीय सौहार्द का संवाहक और संरक्षक होता है।
भूल जाना मेरे बच्चे कि खुसरो दरबारी था।
वह एक ख्वाब था-
जो कभी संगीत,
कभी कविता,
कभी भाषा,
कभी दर्शन से बनता था।
वह एक नृशंस युग की सबसे जटिल पहेली था
जिसे साथ बादशाहों ने बूझने की कोशिश की!
नीरो का संगीत प्रेम, शाहनामा आदि ऐसी ही कविताएँ हैं जो सत्ता और कला के द्वंद्व और संघर्ष को चित्रित करती हैं। वर्तमान और इतिहास में ये कविताएँ एक यकीन की गवाहियाँ ढूँढती हैं, आदमी के विवेक और सदाशयत में, उसके साहित्य और कलाओं में, कि आदमी में फिर भी शायद उजाडने से कहीं ज्यादा बडी ताकत रचने में हैं।
सांस्कृतिक इतिहास संबंधी अपनी दृष्टि को स्पष्ट करते हुए कुँवर नारायण कहते हैं कि- मैंने भारतीय इतिहास और संस्कृति में भी बाहरी या विदेशी प्रभावों को कभी भी इस तरह नहीं लिया कि मानो उन्हें बिलकुल अलग करके किसी विशुद्ध भारतीय अतीत या संस्कृति की कल्पना की जा सकती है! ईरानी, ग्रीक, मुस्लिम, अंग्रेजी- इन सभी प्रभावों ने अपनी तरह भारतीय संस्कृति को प्रभावित किया और उससे प्रभावित हुए। इन प्रभावों को आरोपित न मानकर म्यूटेशनल मानना शायद ज्यादा ठीक होगा। इससे भारतीयता की पहचान खोती नहीं, और समृद्ध होती है।
अतीत में झाँकना इतिहास की परिवर्तनकारी घटनाओं, युद्धों और राजनीति को देखना भर नहीं होता, अपितु अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा और अपने धरोहरों को जानना, समझना और उसे संजोना भी होता है। कुँवर नारायण की कई कविताएँ इतिहासपरक न होकर उनके अतीत का हिस्सा भर हैं। परन्तु वह स्वयं से जुडे समय को ही अतीत का हिस्सा नहीं मानते वरन् वह हर व्यक्ति, समय अथवा घटना जो उनके चेतन मन से जुडा है उनका अतीत बन उठता है। इस अतीत में क्या नहीं है? ऐतिहासिक स्थल हैं, ऐतिहासिक पात्र है, युद्धों के संयुक्त रूपक और उनकी अनुगूँज है, संस्कृति और परंपराएँ हैं, कला और कलाकार हैं.... और इसी में उनके समानधर्मी पुरखे हैं, जिसे कवि बारंबार याद करता है। भर्तृहरी, आदिकवि वाल्मीकि, तुलसी और कबीर तो जैसे उनकी प्राणवायु हैं। भिन्न परिदृश्यों, भिन्न परिस्थितियों, भिन्न अर्थों, भिन्न उद्देश्यों में बार-बार इनका उल्लेख होता है। इसका एक बेजोड उदाहरण उनकी कविता आजकल कबीरदास है। पंद्रहवीं सदी के इस महान कवि-संत की विचारधारा को लेकर आज की समस्याओं और चिंताओं पर ऐसा तीक्ष्ण प्रहार अन्यत्र दुर्लभ है। यह कविता समकालीन समाज के लगभग सभी संदर्भों का आलोचनात्मक विश्लेषण है-
आजकल कबीरदास-
यदाकदा दिख जाते फकीरों के भेस में
कभी अनमने-से साहित्य-समाज में र्‍
सह नहीं सके जब
जग की उलटबासी,
छोड दिया कासी....
कुँवर नारायण स्वयं को भारतीय अनुभव तक सीमित नहीं रखते। उनकी कविताएँ सम्पूर्ण विश्व को अपने जद में लेती हैं। अतीत केन्द्रित इन कविताओं में विदेशी भूगोल, ऐतिहासिक पात्रों और रचनाकारों(अमीर खुसरो, फिरदौसी, नाजिम हिकमत, पाल्बो नेरूदा) को विभिन्न भारतीय संदर्भों से जोडा गया है। उनके अनुसार सम्पूर्ण विश्व भिन्न रूपों में लगभग एक ही समस्याओं से जूझता है। यहाँ जातीय और वर्गीय भेद नगण्य है। वह कलाओं, संस्कृतियों और परंपराओं को एकांगी रूप में नहीं देखते वरन् इसे एक दूसरे से प्रभावित और संयुक्त मानते हैं।
ट्यूनीशिया में एक कुआँ है
कहते हैं उसका पानी
धरती के अन्दर ही अन्दर
उस पवित्र कुएँ से जुडा है
जो मक्का में है।
मैंने तो यह भी सुना है
कि धरती के अंदर ही अंदर
हर कुएँ का पानी
हर कुएँ से जुडा है
अतीत से जुडी उनकी कविताएँ एक टाइम ट्रेवल की भाँति है, जहाँ वह वर्तमान संदर्भों को लेकर मौजूद रहते हैं। यह कविताएँ एक हिस्टोरिकल मीट हैं। वह कई समयों में कई बार जाते हैं। हर बार उनकी यात्रा अलग होती है। टाइम और स्पेस का गैप यहाँ बहुत संकरा हो उठता है। आखिर इसका कारण क्या है? एक भारतीय को अपनी परिधि के बाहर की चिंता क्यों? इतिहास और अतीत को लेकर इतनी रुचि क्यों? वास्तव में यह मात्र सांस्कृतिक-वैचारिक और ऐतिहासिक आदान-प्रदान नहीं है वरन् इसके पीछे है उन परिस्थितियों का एक होना, उस जीवन का एक होना जो भिन्न अर्थों में समान है। यहाँ न कोई सीमा है और न ही कोई दूरी। समाज, साहित्य, कला और संस्कृति के इस संयोग द्वारा आधुनिक समय की विसंगतियों और चिंताओं का ऐसा सरल और सटीक हल अन्यत्र दुर्लभ है।
दूरियों का भूगोल नहीं, उनका समय बदलता है।
कितना ऐतिहासिक लगता है आज, तुमसे मिलना उस दिन!
इतिहास संबंधी अपनी दृष्टि को लेकर कुँवर नारायण पक्षपाती नहीं होते। उन्होंने अनुशासन के रूप में इतिहास लेखन की चिंताओं को गंभीरता से लिया है। यही कारण है कि इतिहास लेखन की प्रक्रिया से वह तनिक भी समझौता नहीं करते। इतिहास लेखन की सबसे बडी जम्मेदारी उसकी प्रस्तुति अर्थात् व्याख्या को लेकर है। व्याख्या में थोडी भी चूक से ऐतिहासिक संदर्भ विपरीत रुख अख्तियार कर सकते हैं। संवेदनात्मक सम्प्रेषण की यह समस्या साहित्य के साथ भी रही है। विषय अगर इतिहास केन्द्रित हो तो जिम्मेदारी और बढ जाती है। इस संदर्भ में कुँवर नारायण सर्वाधिक सचेत और प्रयोगधर्मी रहे हैं। इनकी भाषा विशेष अर्थों में इतिहास सतर्क भाषा है। यही कारण है कि ऐतिहासिक प्रतीक, घटनाएँ या स्थल इन कविताओं के केंद्र में कभी नहीं रहे। वह उस ज्ञात इतिहास के अज्ञात ऐतिहासिक अनुभवों को खास शब्दों द्वारा उद्घाटित करते हैं। दिल्ली की तरफ कविता दृष्टव्य है-
जिधर घुडसवारों का रुख हो
उसी ओर घिसटकर जाते हुए
मैंने उसे कई बार पहले भी देखा है।
दोनों हाथ बँधे, मजबूरी में, फिर एक बार
कौन था वह? कह नहीं सकता
क्योंकि केवल दो बँधे हुए हाथ ही
दिल्ली पहुँचे थे।
किसी ऐतिहासिक प्रतीक के रूप में इस कविता की व्याख्या करना सही नहीं होगा। दिल्ली के उस तख्त को हासिल करने के लिए न जाने कितनी लडाइयाँ, कितने छल-प्रपंच हुए। यह अब भी थमा नहीं है! लेकिन कवि की चिंता और पीडा उन दो बँधे हाथ की ओर है। यह कविता किसी शासन और सत्ता से इतर उन शोषितों की ओर मुड जाती है, जिनपर हुए जुल्म और जिनकी आहें इतिहास के जद में आज तक न आ सकी। यह कविता उन लाखों बदनसीबों के अनुभव की कविता है। कुँवर नारायण के अनुसार मेरी कोशिश रहती है कि कविता की जरूरतों के हिसाब से ही उसको उसकी भाषा दे सकूँ। इतिहास-संबंधी कविताओं में मैंने इतिहास की घटनाओं और व्यक्तियों को केंद्र में न रखकर इतिहास के उन अनुभवों को केंद्र में रखा है जो आज भी प्रासंगिक हैं- इसे मैं एक तरह की विस्तारित प्रासंगिकता (एक्सपैंडेड कांटेक्सचुएलिटी) कहना चाहूँगा। मानो हो रहे और हो चुके के बीच हम उन शाब्दिक चिन्हों को खोज रहे हों जिनके द्वारा हम आदमी के सही व्यक्तित्व तक पहुँचेंगे।’
प्रसिद्ध इतिहासकार ई.एच.कार ने इतिहास को अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच संवाद माना है। कुँवर नारायण ने इतिहास को माध्यम बना कर जिन्दगी के मौजूदा यथार्थ के अनेक आयामों को उद्घाटित करने का प्रयत्न किया है। दरअसल वह समय के एक ज्यादा बडे फलक पर यथार्थ को विस्तृत करके देखने की एक कोशिश है। कुँवर नारायण की मुख्य चिंता मनुष्य और मानवता रही है। वह अपनी भाषा को अनुभव की भाषा कहते हैं। उनके अनुसार अनुभव से मेरा मतलब मनुष्य के उस व्यापक, भौतिक और मानसिक अनुभव से है जो अपनी समग्रता में न केवल मनुष्य के प्रत्यक्ष और वर्तमान से जुडा होना है, बल्कि उसके इतिहास-बोध और उसके भविष्य की कल्पनाओं और आदर्शों से भी। अनुभव से मतलब किसी एक ही आदमी के तमाम अनुभवों से नहीं है, न तमाम आदमियों के कुछ आम ही अनुभवों से है। अनुभव को भाषा या शब्द के संदर्भ में देखने के मतलब हैं अनुभव के पूरे इतिहास और उसकी संभावनाओं को देखना। महाभारत, कोलंबस का जहाज, जंजीरा का किला, घुडसवार, आज भी कविता ऐसी ही कविताएँ हैं, जो वर्तमान और अतीत के माध्यम से भविष्य से संवाद है। परन्तु गोलकुंडा की एक शाम इस संवाद से आगे निकलकर वैकल्पिक इतिहास का रास्ता अख्तियार कर लेती है-
टैक्सी ड्राइवर रहमत अलीशाह
या गाइड मत्सराज के पूर्वजों के युद्धों से
कहीं ज्यादा कठिन है
वर्तमान से उन दोनों की लडाई,
उससे पराजित न होने के उनके मंसूबे....
बारूद में आग लगाने के इतिहासों से अलग
एक तीसरा इतिहास भी है
रहमतशाह की बीडियों और
मत्सराज की माचिस के बीच सुलहों का।
इतिहास-दृष्टि के संदर्भ में यह कविता कुँवर नारायण की सर्वोत्कृष्ट रचना है। इंसान को आज कई मोर्चों पर लडना है। यह उन सभी परिस्थितियों से मुठभेड है, जिससे वह लगातार लडते आया है और जो आज सबसे बुरे दौर में है। यह मनुष्य और उसके जिजीविषा की लडाई है। कवि मनुष्य के उस साहस का कायल है कि आदमी में उजाडने से कहीं ज्यादा ताकत रचने में है। यह कविता इतिहास को देखने के नजरिये का भी उदाहरण है। यह इतिहासकार की उस प्रक्रिया का भी उदाहरण है, जो उसके तथ्यों के चयन और उसकी व्याख्या से जुडा है। इन सब से कहीं आगे यह विकल्प की कविता है। यह ज्ञात और प्रदत्त इतिहास के बरक्स तीसरे इतिहास की कविता है।
ऐतिहासिक घटनाओं तथा उनकी प्रतिक्रियाओं से संबंधित कृतियों के दीवानों को कुँवर नारायण के यहाँ निराशा ही हाथ लगेगी। चिह्नित प्रतीकों, इतिहास नायकों, घटनाओं और युद्धों के प्रति जो इतिहाकारों अथवा रचनाकारों का रवैया रहा है, उससे इतर कुँवर नारायण ने एक नई जमीन तलाशी है। यह किसी अनुभवी लेखक की वैचारिक प्रस्तुति नहीं वरन् एक आम इंसान का भोग हुआ यथार्थ है। जिसने जीवन की क्षणभंगुरता और नश्वरता को गहरे अर्थों में समझा है। जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका को अपनी आँखों से देखा है। जो स्वयं उस विभीषिकीय वर्तमान का एक अंश रहा है, जो आज इतिहास बन चुका है। उन परिस्थितियों के भोक्ता होने के नाते उसे देखने-परखने के उनके यंत्र नितांत निजी न होकर सामूहिक बन उठते हैं।
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सम्पर्क - द्वारा श्री उपेन्द्र कुमार मिश्रा,
राम जानकी मंदिर के पीछे,
पाण्डे टोला, वार्ड नं 23,
नरकरियागंज- ८८५४५५
वेस्ट चम्पारन, बिहार
मो. ७८७८०३८७४६