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इब्राहीम अल्काजी का रंगमंचीय संसार

देवेन्द्र राज अंकुर
4 अगस्त, 2020 को इब्राहीम अल्काजी साहब ने 94 बरस से ऊपर की एक लम्बी कला यात्रा पूरी करने के बाद इस दुनिया को अलविदा कह दिया। वह काफी लम्बे अरसे से अस्वस्थ चल रहे थे, लेकिन उनका यूँ चले जाना हम सब को भीतर से एकदम खाली कर गया। अभी चार-पाँच साल पहले ही उन्होंने अपने जीवन के 90 बरस पूरे किए थे। इस अवसर पर उनकी बेटी अमाल अल्लाना, दामाद निसार अल्लाना और बेटे फैजल अल्काजी ने उनके सभी पुराने छात्रों को उनसे रूबरू होने के लिए आमंत्रित किया था-1962 से लेकर 97 के बीच जितने भी छात्र राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षण लेकर बाहर आए, उनमें से *यादातर लोग उस दिन वहाँ मौजूद थे। सभी लोग ने उनके बारे में बहुत कुछ कहा अल्काजी साहब भी वहाँ साहब भी वहाँ उपस्थित थे-एक व्हीलचेयर में बैठे हुए बिलकुल खामोश लेवि जब-जब अपने छात्रों कें आन्तरिक उद्गारों वह भीतर से उद्वेलित होते थे, तो वे भाव उनके चेहरे पर साफ दीख जाते थे, जबकि सच्चाई यह थी कि वह शायद ही किसी छात्र को पहचानने की स्थिति में रहे हों। क्या यह नियति की क्रूर विडम्बना नहीं है कि जो शख्स जिन्दगी भर इतना सक्रिय, ऊर्जा से भरपूर रहा हो, वह कुछ आखिरी वर्षों में आकर इतना अकेला हो जाए?
आज अल्काजी साहब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके साथ जुडी इतनी यादें, इतने किस्से और इतने प्रसंग मौजूद हैं कि एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है। फिर भी मैं कोशिश करूँगा कि उनके विषय में जितना कुछ सम्भव हो, उसकी चर्चा की जाए। मैं 1969-72 तक रा.ना.वि. रंगमंडल का एक सदस्य था। इन सबसे पहले और उसके बाद भी एक लम्बे अरसे तक उनसे मेल मुलाकात और उनके काम को देखने के मौके मिलते रहे। अतः यह स्वाभाविक है कि मैं उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व पर समग्र रूप से बात करूँ।
जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, वह 1962 से 1977 तक विद्यालय के निदेशक रहे। इतने लम्बे समय तक और कोई विद्यालय का निदेशक नहीं रहा। शायद बहुत कम लोगों के मालूम है कि जब 1959 में संगीत नाटक अका. के अधीन नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा एंड एशिया थियेटर इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई तो उसके निदेशक के रूप में पहले अल्काजी को ही आमंत्रित किया गया था, लेकिन उन्होंने यह कहकर कि अभी वह इतनी बडी जिम्मेंदारी उठाने के लिए तैयार नहीं है उस आमंत्रण को ठुकरा दिया था। दरअसल कुछ ही साल पहले वह रॉचल अकेदमी ऑफ ड्रेमेटिक आर्ट, लंदन से प्रशिक्षित होकर भारत लौटे थे और बम्बई (अब मुम्बई) में अपनी नाट्य मंडली के अन्तर्गत ही उन्होंने विधिवत नाट्य प्रशिक्षण की दिशा में व्यावहारिक रूप से काम करना शुरू किया था। शायद वह अपने लिए प्रशिक्षा की एक ठोस जमीन तैयार करना चाहते थे और हुआ भी ऐसा ही।
अब अल्काजी ने मना कर दिया, तो शम्भु मित्र से पूछा गया, लेकिन उन्होंने भी व्यक्तिगत कारणों से मना कर दिया। सम्भवतः वह अपनी भाषा में ही काम करना चाहते थे। अंततः बंगाल से ही सातु सेन ने विद्यालय के पहले निदेशक के रूप में 1959 में कार्यभार सम्भाला। वह जर्मनी से प्रशिक्षण लेकर आए थे। यहाँ आने से पहले वह कलकत्ता (अब कोलकाता) में एक अभिकल्पक की हैसियत सें स्थापित हो चुके थे। उन दिनों निदेशक का कार्यकाल अनुबंध के तहत दो साल का हुआ करता था, जिसे आगे बढाया जा सकता था। लेकिन सातू सेन अपने दो वर्ष भी पूरे नहीं कर पाए क्योंकि अपनी अस्वस्थता के कारण उन्हें बीच में ही छोडकर जाना पडा। बीच में लगभग एक साल तक नेमिचन्द्र जैन कार्यकारी निदेशक रहे।
आरम्भ में विद्यालय का प्रशिक्षण काल दो वर्ष का हुआ करता था। अल्काजी से पूर्व के दो सत्रों के छात्र क्रमशः 1961 और 1962 में उत्तीर्ण हो गए थे। अल्काजी ने आते ही प्रशिक्षण को तीन साल का कर दिया और 1962 में उत्तीर्ण हुए छात्रों में से पहले तीन छात्रों को एक साल की विशिष्ट छात्रवृत्ति प्रदान की। ये तीन छात्र थे-ब.व. कारन्त, बी.एम. शाह और ज्योति व्यास। अल्काजी द्वारा 1977 में त्यागपत्र देने के बाद व.व. कारन्त 1977 से 1981 तक विद्यालय के तीसरे निदेशक और बी. एम.शाह 1985 में 1984 के बीच चौथे निदेशक बने।
अल्काजी साहब के विषय में आमधारणा यही है कि उन्होंने अपने पन्द्रह साल के कार्यकाल में यहाँ की प्रशिक्षण पद्धति को पूरी तरह से पश्चिमी ढाँचे में ढाल दिया। इसे एक मिथ अथवा अर्द्धसत्य ही कहा जा सकता है। ऐसी धारणा रखने वाले भूल जाते हैं कि विद्यालय और मंडली की अवधारणा में बहुत अन्तर हुआ करता है। विद्यालय में प्रशिक्षण के तौर पर हर तरह के नाटकों का मंचन करना अनिवार्य है। यदि हम रंगमंचीय इतिहास और सिद्धांतों के संदर्भ में भारतीय रंगमंच एशियायी रंगमंच और पाश्चात्य रंगमंच का अध्ययन करते हैं, तो उनके व्यावहारिक परीक्षण के लिए उनसे जुडे नाटकों का मंचन जरूरी होता है। फिर भी प्रमाण के लिए 1962 से 1977 के बीच विद्यालय में मंचित हुए भारतीय नाटकों की एक सूची प्रस्तुत कर रहा हूँ। जाहिर है कि यह किसी क्रम में नहीं है। हो सकता है बहुत-से नाटकों के नाम छूट भी गए हो, लेकिन फिर भी तुलनात्मक अध्ययन की दृष्टि से यह संख्या पर्याप्त है- आषाढ का एक दिन, अंधा युग, सुनो जनमेजय, लहरों के राजहंस, आधे अधूरे, भगवद्अज्जुकम्, जसमा ओडन, दाँत का अस्पताल, सूर्यमुख, एक सत्य हरिशचन्द्र, सूरज का सातवाँ घोडा, सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक, आठवाँ सर्ग, जाग उठा है रायगढ, तिलचट्टा, भीष्म विजय, मिट्टी की गाडी, तुगलक, रजिया सुल्तान, हिरोशिमा लैला मजनूँ, रस गन्धर्व, होरी और रक्त कल्याण। इनमें पहले सात रेखांकित नाटकों को अल्काजी ने स्वयं निर्देशित किया था और आठवें को उन्होंने 1992 में रंगमंडल के साथ किया था।
यह तो हुई भारतीय नाटकों की बात जब तक वह रहें, एशियन नाटक के अन्तर्गत चीन या जापान के नाटक, कक्षा में स्वयं पढाए और जापानी का बुकी नाटक इबारागी की प्रस्तुति के लिए जापान के निदेशक शोजो सातों को छात्रों के साथ काम करने के लिए आमंत्रित किया। उन्हीं के समय में शांता गाँधी ने पहले संस्कृत नाटक (भगवद्अज्जुकम्) और फिर लोकनाटक (जसमा ओडत) छात्रों के साथ मंचित किए। मुझे याद नहीं कि उनके जाने के बाद कभी कोई एशियन नाटक कक्षा में पढाया गया हो। इन सारे उपर्युक्त विवरणों के बाद पश्चिमी ढाँचे की चर्चा के क्या अर्थ रह जाते हैं। यह सही है कि उनकी शिक्षा-दीक्षा पाश्चात्य पद्धति से हुई थी। उन्हें परिवार आभिचात्य संस्कार मिले थे। निश्चित समय पर पूर्वाभ्यास के लिए आना और उस दिन के लिए जितना काम पहले से प्लान करके आए हैं, उसी समय सीमा में समाप्त करने यदि ये सारी बातें कुछ लोगों को पश्चिमी लगती हैं, तो ऐसा की सही। हाँ, कभी- कभी पूर्वाभ्यास के दौरान गुस्से में आकर छात्रों को गाली भी दे डालते थे। हम में से बहुत से छात्रों ने उनके इसी व्यवहार को शत-प्रतिशत अपने ऊपर ओर लिया और अल्काजी की महज एक कार्बनकॉपी होकर रह गए।
अल्काजी का भारतीय रंगमंच में सबसे बडा योगदान यही कहा जाएगा कि उन्होंने रंगमंच के विविध पक्षों के विधिवत प्रशिक्षण की नींव डाली। दूसरी कलाओं में तो प्रशिक्षण परम्परा और पद्धति पहले से उपस्थित थी, चाहे वह संगीत हो, नृत्य हो अथवा चित्रकला हो। कहीं यह पद्धति गुरू-शिष्य परम्परा के रूप में मौजूद थी और कहीं विद्यालयी या विश्व-विद्यालयी सिस्टम में शुरू हो चुकी थी। लेकिन रंगमंच की दृष्टि से ऐसी कोई पहल नहीं हो पाई थी। अभिनय, निर्देशन या दूसरे विषयों को लेकर जो कुछ भी सीखा जा सकता था, वह नाट्य मंडली के भीतर रखकर ही हो पाता था, जहाँ नए-नए लोग मंडली के वरिष्ठ सदस्यों के काम को देख-देखकर सीखते थे या उनके द्वारा नाटकों में काम करने के दौरान प्रशिक्षित किए जाते थे।
1958 में पहली बार यूनेस्को के सहयोग से भारतीय नाट्य संघ ने एशियन थियेटर इंस्टीट्यूट नाम से एक वर्षीय पाठ्यक्रम शुरू किया। शांता गाँधी, रेखा जैन, राजेन्द्र नाथ, देव महापात्र आदि उस पाठ्यक्रम के पहले छात्रों में थे। एक वर्ष के बाद इसी स्कूल को संगीत नाटक अकादमी के अन्तर्गत नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा एंड एशियन थियेटर इंस्टीट्यूट का नाम दिया गया। बाद में 1975 में स्कूल संगीत नाटक अकादमी से अलग होकर भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की एक स्वायत्त संस्था के रूप में रजिस्टर्ड हुआ। विद्यालय को इस स्वायत्त और स्वतन्त्र स्थिति तक पहुँचाने का पूरा श्रेय अल्काजी को जाता है।
1962 से विद्यालय का पाठ्यक्रम तीन वर्ष का कर दिया गया। अतः जरूरी था कि पहले से चले आ रहे पाठ्यक्रम को भी संशोधित-परिवर्धित किया जाए। यहीं से अल्काजी द्वारा प्रस्तावित छात्र छात्रों को तैयार करने से पहले वह अपनी तैयारी करते थे। जब वह विद्यालय के निदेशक होकर आए, तो उन्हें हिन्दी बोलना या लिखना भी नहीं आता था। आते ही उन्होंने हिन्दी सीखने के लिए एक प्राध्यापक की सेवाएँ लेना शुरू कर दिया और छह महीने के अन्दर ही छात्रों के साथ पहली प्रस्तुति के रूप में मोहन राकेश के पहले नाटक आषाढ का एक दिन का मंचन किया। उन दिनों विद्यालय दक्षिणी दिशा की कैलाश कॉलोनी में एक किराए के घर में स्थित था। उसी के पिछवाडे उन्होंने खुले में एक अन्तरंग परिवेश में आषाढ का एक दिन के वातावरण की सृष्टि की। इस पूरी प्रक्रिया में ओम शिवपुरी लगातार उनके साथ थे। वह उस समय द्वितीय वर्ष के छात्र थे। बहुत कम लोगों को मालूम है कि ओम शिवपूरी ने विद्यालय से अभिनय में नहीं, निर्देशन में विशेषज्ञ हासिल की थी। यह अलग बात है कि उस समय की लगभग सभी प्रस्तुतियों में उनकी मुख्य भूमिका रहती थी। प्रशिक्षण के बाद हुए दीक्षांत समारोह में उन्हें डिसटिंक्शन इन एकटिंग का सम्मान दिया गया था, जिसे लेने से उन्होंने इनकार कर दिया।
अगले साल यानी 1963 में अल्काजी ने धर्मवीर भारती के काव्य नाटक अंधायुग की भव्य प्रस्तुति फिरोजशाह कोटला के खंडहरो में की, जिसका जोरदार स्वागत हुआ। इस प्रस्तुति में ओम शिवपुरी ने कोई भूमिका नहीं की थी। वह अल्काजी के साथ प्रस्तुति के सह-निर्देशक थे। इसके साथ-साथ उन्होंने कृष्णा के स्वर संवाद को अपना स्वर दिया था। नाटक में कृष्णा मंच पर नहीं आते, नेपथ्य से रिकार्डेड ध्वनि के रूप में यह संवाद दर्शकों को सुनाई देता है। शिवपुरी ने कृष्णा के संवाद को इतनी मार्मिकता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया था कि जैसे मंच पर कृष्णा ही साकार हो उठते थे। बाद में विद्यालय में अंधायुग की जितनी भी प्रस्तुतियाँ हुई, उनमें हमेशा शिवपुरी की इसी रिकार्डेड आवाज को प्रयोग में लाया गया।
ऐसा था ओम शिवपुरी की आवाज का जादू और उनके व्यक्तित्व का करिश्मा, जिसे अल्काजी ने आते ही पहचान लिया था। शिवपुरी विद्यालय में 1961 से 1967 तक रहे पहले एक छात्र के रूप में और फिर रंग मंडल के एक सदस्य के रूप में-इस दौर में अल्काजी ले जितनी भी प्रस्तुतियाँ कीं, उन सबके केन्द्र में शिवपुरी ही थे। किंग लियर, ईडीपस, फादर। इसके अलावा स्वयं शिवपूरी ने दो नाटक निर्देशित किए-मोहन राकेश का लहरों के राजहंस और गिरीश कारनाड का तुगलक। यहाँ इस तथ्य का उल्लेख भी अप्रासंगिक न होगा कि कन्नड नाटक तुगलक सबसे पहले विद्यालय द्वारा ही मंचित किया गया था। इसका हिन्दुस्तानी अनुवाद ब.व करान्त ने किया था ?
कहा जाता है कि अल्काजी ने ओम शिवपुरी की प्रतिभा को पहचाना और संवारा। पृथ्वी राज कपूर के बाद रंगमंच में एक स्टार अभिनेता के रूप में ओम शिवपुरी ने विद्यालय में वायस-स्पीच के प्राध्यापक पद के लिए आवेदन किया तो उन्हें साक्षात्कार के लिए भी नहीं बुलाया गया। शायद उनका चयन हो गया होता तो वह फिल्मों में न जाते और विद्यालय को उपर्युक्त विषय का बहुत अच्छे अनुभवी प्राध्यापक मिल गया होता।
अल्काजी के व्यक्तित्व के ये कुछ ऐसे विरोधाभास अथवा अन्तर्विरोध हैं जो अल्काजी से ध्यान खींचते हैं। नए से नए छात्रः प्रतिभा की तनिक-सी कौंध दिखाई दी नहीं कि उसे लगातार प्रोत्साहित किया। मोहन महर्षि अंतिम वर्ष के छात्र थे कि उन्हें सुनो जनमेजय के निर्देशन की जिम्मेदारी सौंप रंजीत कपूर और अनित चौधरी अभी पहले साल में ही थे कि उनसे अपनी प्रस्तुत मिट्टी की गाडी के लिए गीत लिखवा लिए। इन्हीं दोनों से इनके अंतिम वर्ष में क्रमशः बिच्छू और लैला मजनूँ का निर्देशन करवा लिया। इसी का दूसरा पक्ष यह भी है कि बलराज पंडित ने अंतिम वर्ष की डिपलोमा प्रस्तुत के लिए अपने लिखे नाटक को प्रस्तुत किया तो उसे फेल कर दिया। जब दूसरे प्रयास में वर उतीर्ण होकर विद्यालय से चले गए ता दो-तीन साल बाद उन्हें रंगमंडल में ले आए। पंडित ने पाँचवाँ सवार प्रस्तुत किया और वह हिन्दी रंगमंच की ऐतिहासिक प्रस्तुति सिद्ध हुई।
स्वयं मेरे साथ भी जो हुआ, वह कोई अपवाद नहीं। हिन्दी की पृष्ठभूमि के कारण थोडी साख अवश्य बन गई थी लेकिन इससे *यादा कुछ नहीं। 1972 में उतीर्ण होकर बाहर आया और 1974-75 में एक वर्ष के लिए रंगमंडल का सदस्य था। इस बीच कहानियों को अपने मूल फार्म में ही मंच पर लाने का विचार कहीं भीतर कौंध गया था। अल्काजी को निर्मल वर्मा की तीन कहानियों को तीन एकान्त नाम से रंगमंडल में मंचित करने का प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने तुरन्त स्वीकार कर लिया मुझे आज भी 1975 की जनवरी-फरवरी की वह दोपहर अच्छी तरह से याद है। रवीन्द्र भव में विद्यालय के मुक्ताकाशी मेद्यदूत थियेटर की सीढियों पर बैठकर मैंने उन्हें तीनों कहानियों पढकर सुनाई। वह आधुनिक हिन्दी साहित्य से भली भाँति परिचित थे, भले ही स्वयं हिन्दी न पढ पाते हों। एक बार वह मुझे कृष्णा बलदेव वैद का उपन्यास विमल उर्फ जाएँ कहाँ पढकर सुनाने के लिए अपने घर ले गए थे। उपन्यास तब तक प्रकाशित नहीं हुआ था। पांडुलिपि की प्रति उनके पास डाक द्वारा वैद साहब ने अमेरिका से भिजवाई थी।
निर्मल की कहानियाँ पर उन्होंने खुली राय जाहिर की कि डेढ इंच ऊपर को छोडकर बाकी दो कहानियाँ में नाटकीयता बिल्कुल भी नहीं है। इसके बावजूद प्रस्तुति के लिए ग्रीन सिगनल दे दिया। उसकें बाद 1 मई, 1975 को प्रस्तुत तीन एकान्त अब हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गया है। पैंतालीस साल से ऊपर हो गए देश-विदेश में अलग-अलग भाषाओं म पाँच सौ से ऊपर कहानियाँ मंचित कर चुका हूँ। कहानी का रंगमंच नाम से एक नई विधा का जन्म और विकास हो चुका है। मैं समझता हूँ कि इसका पूरा श्रेय अल्काजी को दिया जाना चाहिए।
1967 के बाद अल्काजी की प्रस्तुतियों के केन्द्र में मनोहर सिंह, नसीरूद्धीन शाह, ओमपुरी, राज बब्बर, पंकज कपूर, अनुपम खेर, रघुवीर यादव, अगले दस वर्ष तक छाए रहे। फिर 1977 में अल्काजी ने त्याग पत्र दे दिया। देश में भी पहली बार केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनी। उन दिनों के छात्रों ने अल्काजी की कार्य पद्धति के विरोध में हडताल कर दी। पूरा छात्र समुदाय और प्राध्यापक वर्ग एक तरफ और अल्काजी अकेले-उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि जिन छात्रों को उन्होंने दिन रात मेहनत करके तैयार किया था, वे उनके विरोध में खडे थे। वह सब कुछ छोडकर यहाँ से चले गए। इस दुखद घटनाक्रम का सुखद पहलू यह है कि जब दस साल बाद 1987 के दीक्षान्त समारोह में अल्काजी मुख्य अतिथि के तौर पर लौटे, तो उन्हीं छात्रों ने उन्हें हाथों हाथ लिया और अपने किए की माफी माँगी।
चौदह वर्ष के वनवास के बाद अल्काजी पुनः रंगमंडल के साथ तीन प्रस्तुतियाँ करने के लिए लौटे, लेकिन एक लम्बा समय बीत चुका था। इस बीच विद्यालय में पाँच निदेशक आ चुके थे। कहाँ अकेले अल्काजी के पन्द्रह साल में पाँच निदेशक। परिणाम यह हुआ कि तीनों ही प्रस्तुतियाँ उस स्तर तक नहीं पहुँच सकीं जहाँ तक हम अल्काजी की प्रस्तुतियों को देखने के आदी थे।
इस सबके बावजूद भारतीय रंगमंच में अल्काजी के योगदान का हमेशा महत्त्व बना रहेगा। उन्होने रंगमंच जैसे माध्यम को समाज में स्वीकृति और सम्मान दिलाया, जो इससे पहले कभी नहीं मिला था। नाटक और रंगमंच के सही प्रशिक्षण की क्या दिशा होनी चाहिए, इसकी ठोस नींव रखी। रंगमंच नाटकों के मंचन से ही सम्बन्द्ध नहीं है, वह आफ जीवन का एक अनिवार्य अंग बन जाना चाहिए। आपकी सोच आपकी दृष्टि और आफ सम्पूर्ण व्यक्तित्व में अभूतपूर्व बदलाव लाता है रंगमंच।
आज अल्काजी हमारे बीच नहीं हैं। जब तक वह थे, तब भी उनके व्यवहार, उनकी सख्ती, उनके गुस्से और उनकी शिक्षा पद्धति की यदि जमकर प्रशंसा होती थी, तो उसी अनुपात में आलोचना भी। अब तो इस विषय में और खुलकर बहस होगी। हम मान लेते हैं कि उनकी शिक्षा पद्धति छात्रों के लिए बिलकुल भी सार्थक नहीं है, लेकिन इस तथ्य से कैसे इनकार किया जाएगा कि उसी शिक्षा पद्धति में से गुजर कर उनके सात छात्र ने बाहर आकर अपनी एक विशिष्ट पहचान स्थापित की और विद्यालय के निर्देशक होकर लौटे? अपने देश की तो छोडिए, विश्व के किसी देश में ऐसा उदाहरण हमें नहीं मिलेगा कि वहाँ के एक निदेशक के पढाए-सिखाए सात छात्र उसी संस्थान के निदेशक बने हों।
मुझे नहीं लगता कि अल्काजी के बारे में इससे *यादा सटीक टिप्पणी की जा सकती है।
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सम्पर्क : राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय
बहावलपुर हाउस, भगवानदास रोड,
नई दिल्ली-110001, मो. ९८१०१४३६०६