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मधुमती पत्रिका और हिन्दी-रचनाशीलता

शशिभूषण मिश्र
(सन्दर्भ- अप्रैल 2019 से मार्च 2020 के अंक)

मधुमती हिन्दी-रचनाशीलता के लिए प्रतिबद्ध, एक ऐसी पत्रिका है जिसने न केवल अपने प्रकाशन के साठवें वर्ष में प्रवेश किया है, बल्कि साहित्यिक पत्रिकाओं की परंपरा में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। समूचे भारत में किसी भी राज्य की साहित्य अकादमी से निकलने वाली यह अकेली ऐसी हिन्दी पत्रिका है जिसने अपने मासिक प्रकाशन को बरकरार रखते हुए गुणवत्तायुक्त सामग्री की निरंतरता को बनाए रखा है। इस गुणात्मक निरंतरता को बनाए रखने में तत्पर संपादकीय टीम और प्रबंधकीय टीम की जितनी सराहना की जाए, कम है। आज मधुमती देश की अग्रणी साहित्यिक पत्रिका के रूप में स्थापित हो चुकी है और इसकी पाठक संख्या में भी लगातार बढोतरी हुई है वरना विभिन्न राज्यों की अकादमियों से निकलने वाली ऐसी कई पत्रिकाएँ हैं जिनका पाठक वर्ग गिने-चुने लोगों तक सीमित हो चुका है।

मैं अपनी बात अप्रैल 2019 से मार्च 2020 तक प्रकाशित अंकों पर केन्द्रित रखते हुए यह देखने की कोशिश करूंगा कि मधुमती की सामग्री में क्या खास है! आप देखेंगे कि ब्रजरतन जोशी के संपादक बनने के बाद पत्रिका के स्वरूप में तो बदलाव आया ही है, नए प्रयोग शुरू हुए हैं। उनके इसी प्रयोग और उद्यमशीलता के कारण हमें एक वर्ष के भीतर अपनी साहित्यिक परम्परा के कालजयी रचनाकारों पर केन्द्रित विशेष स्मरण शीर्षक से कई महत्त्वपूर्ण स्मृति-लेख पढने को मिले। मधुमती की सामग्री में यह सन्देश निहित है कि अपनी विरासत को न केवल याद करना बल्कि उसे समृद्ध करना हमारी जिम्मेदारी है। इसी क्रम में नामवर सिंह,कृष्णा सोबती, मुक्तिबोध,नेमिचंद्र जैन, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, विजयदेवनारायण साही, कन्हैयालाल सेठिया, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, विद्यानिवास मिश्र, स्वयंप्रकाश, गीतकार प्रदीप, भवानीप्रसाद मिश्र, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, पानू खोलिया, निर्मल वर्मा और गिरिराज किशोर के रचनाकर्म पर इतनी व्यवस्थित और मानीखेज सामग्री के माध्यम से एक बडी रेखा खीचने की कोशिश की गयी है। इस क्रम में रघुवीर सहाय को याद करते हुए प्रयाग शुक्ल दर्ज करते हैं कि- गद्य, कविता के लिए कितना जरूरी है और गद्य के लिए कविता, यह वे कभी नहीं भूलते। आज इस दृष्टि की प्रासंगिकता को हम तब और अधिक समझ पाते हैं, जब यह देखते हैं कि चाहे सोशल मीडिया हो, प्रिंट मीडिया या एलेक्ट्रानिक मीडिया,वहाँ यह दृष्टि प्रायः गायब है। इसीलिए यहाँ सनसनी, उत्तेजना और बौखलाहट का वातावरण बन गया है। वाकई इस अर्थ में रघुवीर सहाय के लेखक और पत्रकार से बहुत सीखने की जरूरत है। एक अन्य लेख में कमल कुमार ने भवानी प्रसाद मिश्र के रचनात्मक आशयों को उभारते हुए उनके कवि-सरोकारों की पहचान की है। वह भवानीप्रसाद मिश्र को जीवन-राग और भारतीयता का समग्र कवि मानते हैं। कथाकार पानू खोलिया के रचनाकार पर बात करते हुए आलोचक शम्भु गुप्त स्थापना देते हैं कि, पानू खोलिया यथार्थ को जस्टीफाई नहीं करते अपितु उसका अतिक्रमण कर एक नया यथार्थ,नयी जीवन संभावना अपने लेखन में उकेरते दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ आलोचक ज्योतिष जोशी ने नेमिचंद्र जैन को याद किया है वहीं दूसरी ओर रमेश ऋषिकल्प ने सर्वेश्वरदयाल सक्सेना को। ज्योतिषजी जहाँ नेमिचंद्र जैन के कवि को जीवन की अंतःक्रिया का रचनाकार मानते हैं वहीं रमेश ऋषिकल्प सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता-दृष्टि को मानव जीवन के मार्मिक पलों के संवेदनात्मक आकलन का रचनाकार।

वरिष्ठ कवि-आलोचक गिरधर राठी ने विजयदेव नारायण साही से जुडी स्मृतियों को साझा किया है। इस स्मरण-लेख में यदि आप साही जी के रचनाकार को जानना चाहेंगे तो निराशा हाथ लगेगी। और ठीक यही निराशा आफ हाथ तब आएगी जब आप धर्मवीर भारती पर गंगाशरण सिंह को पढेंगे। उपन्यास विधा में गुनाहों का देवता,सूरज का सातवाँ घोडा; अँधायुग जैसे कालजयी काव्य नाटक; धर्मयुग के संपादक, कहानीकार, कवि,यात्राकार,आलोचक को सिर्फ सूचनात्मक जानकारियों के हवाले निबटा देना अखरता है। स्मृति-लेख में अंतरग और बहिरंग जीवन की साझा छवियाँ उभरें तो इससे व्यक्तित्व का पूरा अक्श उभरता है। इस बारे मन से तारीफ करनी होगी ओम निश्छल की जिन्होंने कृष्णा सोबती को याद करते हुए उनके जीवन और साहित्य को बहुत ही गहराई के साथ देखने-परखने का श्रमपरक कार्य किया है। और कुछ इसी अंदाज में विद्यानिवास मिश्र को आलोचक चितरंजन मिश्र ने याद किया है। उनके अवदान को रेखांकित करते हुए चितरंजन मिश्र लिखते हैं कि विद्यानिवासजी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की परम्परा के होते हुए भी, केवल मनुष्य को साहित्य का लक्ष्य नहीं मानते, बल्कि प्रकृति को भी साहित्य का अनिवार्य लक्ष्य मानते हैं। स्मृति लेखों की श्ा*ृंखला में पल्लव ने नामवरजी की वैचारिकी, लेखनी और जीवनी, तीनों आयामों पर बात रखी है। दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, बुलाकी शर्मा और सरल विशारद द्वारा लिखे स्मृति-लेख उल्लेखनीय हैं। सवाल पूछा जाना चाहिए कि हिन्दी की कौन-सी ऐसी पत्रिका है जिसने एक साल के भीतर इतने रचनाकारों को याद किया है?

मधुमती के अलग-अलग अंकों में गाँधीजी पर जिस तरह की बहुस्तरीय सामग्री पढने को मिली वह विरल है। शायद ही हिन्दी की किसी साहित्यिक पत्रिका ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की जीवन-दृष्टि पर इतने आयामों से लेख प्रकाशित किए हों वो भी सुधीर चन्द्र, रामचंद्र गुहा,कुमार प्रशांत, पवन कुमार गुप्त, मंगलेश डबराल, नन्दकिशोर आचार्य से लेकर वरुण कुमार,शम्भु जोशी, पुरंदर दास, राजीव रंजन गिरि, मिथिलेश जैसे चिंतकों/लेखकों के मार्फत। यह वा*ाब नहीं होगा कि मधुमती के योगदान को रेखांकित करते हुए हिन्दी की अन्य हस्तक्षेपकारी पत्रिकाओं को न*ारअंदाज किया जाए, बल्कि इन सभी के साथ यह जरूर देखा जाए कि बडे सांस्थानिक पहचान रखने वाले केन्द्रों-संस्थानों से निकलने वाली अधिकाँश पत्रिकाएँ चर्चा से बाहर क्यों हैं; उनके पास न तो धन की कमी है,न प्रसार की और न लेखकों की, पर उनके अंक उठा लीजिए तो आप पाएँगे कि उनमें सम्पादकीय श्रम और नवोन्मेष का कितन टोटा है! इनमें सम्पादकीय के नाम पर भी आपको औपचारिक और उकताऊ शब्दावली से भरे एक दो पैराग्राफ मिल जाएंगे। मधुमती पत्रिका की साहित्यिक सक्रियता और रचनात्मक उपक्रमशीलता से सीखना चाहिए। इसी के साथ मधुमती को भी अपने को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए।

हर-एक पत्रिका की प्रस्तुति का कोई न कोई क्षेत्र अन्य पत्रिकाओं की तुलना में मजबूत होता है, तो कोई क्षेत्र अन्य की तुलना में कमजोर। इस सन्दर्भ में मधुमती के लेखों का कोई *ावाब नहीं। ये लेख मधुमती की यूएसपी हैं। साल भर में छपे लेखों का जायजा लें तो पाएँगे कि कई लेख अपनी विषयवस्तु, प्रस्तुतीकरण और गुणात्मकता में अव्वल हैं। कवि व्यक्तित्वों और उनकी कविताई पर केन्द्रित लेखों की बात करें, तो डॉ.राजेश कुमार व्यास ऋतुराज की कविताओं पर संदर्भवान चिंतन करते हुए स्थापना देते हैं कि, हिन्दी कविता में छंद,लय और तान को अनुभूत करना हो, तो ऋतुराज को पढ संपन्न हो सकते हैं...यहाँ बडी घटनाओं, प्रसंगों और दिखावे की कोई गंभीर मुद्राएँ नहीं हैं,पर पँक्ति दर पँक्ति जीवनानुभूतियों का राग-अनुराग है। इसी तरह रणजीत की कविताओं का नवलकिशोर; गिरिजाकुमार माथुर की कविताओं का ओम निश्चल; शिवमंगल सिंह सुमन का सुरेन्द्र अग्निहोत्री और हेमंत शेष की कविताई का राजाराम भादू ने बहुत बारीकी के निचोड प्रस्तुत किया है। समग्र लेखकीय मूल्यांकन के अंतर्गत राजेश जोशी पर छबिल कुमार मेहेर और नन्द चतुर्वेदी पर पल्लव ने सारगर्भित चर्चा की है। नन्द चतुर्वेदी पर पल्लव लिखते हैं कि, संस्मरणों में नन्द चतुर्वेदी का गद्य-वैभव अपने उरूज पर है...वैचारिक निबन्धों के समानान्तर यहाँ जीवन के राग-विराग अधिक संलग्नता से आए हैं। यह जीवन संघर्षों की धीमी और कष्टपूर्ण आँच पर निखरा गद्य है जिसमें कवि ने पिछली शताब्दी के अँधेरे में भी अम्लान रोशनी की तलाश नहीं छोडी है। रणजीत के रचनाकार व्यक्तिव्य का निचोड प्रस्तुत करते हुए नन्द चतुर्वेदी स्थापना देते हैं कि रणजीत, विचारधारात्मक संकल्पनाओं और स्थापित साम्यवादी सत्ताओं से मिली भग्न प्रत्याशाओ के कवि हैं। हेमंत शेष के बहाने राजाराम भादू की इस चिंता को रेखांकित किया जाना चाहिए कि, कला और साहित्य की दुनिया में महत्ता का आकलन न हो तो सृजन अपनी तार्किक परिणति तक नहीं पहुँचता। अक्सर तीखे शिकायती तेवर में यह कहा जाता है कि हिन्दी में मूल्यांकन के लिए रचनाकार को मरना पडता है..जाहिर है, आरम्भ से अब तक उनके रचनाकर्म को व्यापक स्वीकृति मिली है, लेकिन इसे तरीके से पहचान नहीं मिली है।

इन अंकों में कथा-चिंतन पर चार पाँच आलेख हैं। नैरेटिव टेक्नीक और हिन्दी कहानी पर साहिल कैरो का लेख बेहतरीन है। आशुतोष ने अनिल यादव की कहानी नगर वधुएँ अखबार नहीं पढतीं सत्यनारायण पटेल की लाल छींट वाली लूँगडी का सपना और अरुण कुमार असफल की पाँच का सिक्का के बहाने बहुत रोचक विवेचन किया है। तुलनात्मक अध्ययन का यह एक बढिया तरीका है। ऐसा ही व्यवस्थित विवेचन गौरव भारती ने स्वयं प्रकाश की कहानियों का किया है। असीम अग्रवाल ने शैलेश मटियानी के कथा संसार को भीतर तक खंगाला है और राजीव कुमार ने कथा की सैद्धांतिकी को। हिन्दी कथा साहित्य और यौन विकलांग विमर्श पर राजेन्द्र सिंह गहलोत के माध्यम से नयी सामग्री पढने को मिली।

साहित्यिक मीमांसा के सन्दर्भ में मध्यकालीन भाषा-समाज और तुलसीदास विषय पर पंकज पराशर ने रोचक विश्लेषण किया है, पर उनकी इस मान्यता से सहमत होना कठिन है कि तुलसी अपनी भाषा,तेवर और अपनी भक्ति के तौर-तरीकों के कारण रामायण या अध्यात्म रामायण की परम्परा के नहीं; फक्कड और मस्त मौला कवि कबीर की परंपरा के कवि हैं। क्या वाकई तुलसी की भक्ति का तौर तरीका कबीराई है? रही बात भाषा की तो तुलसी भावपक्ष के साथ कलापक्ष को भी बराबर साधते हैं, लेकिन कबीर भाव के आगे कला को नकार देते हैं। क्या यह एक तरह का सरलीकरण नहीं हैं! आलोचक माधव हाडा का लेख भारतीय प्रांगण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की परम्परा का अन्वेषण करते हुए मध्यकालीन सांस्कृतिक आधारों और मुद्दों के हवाले से सवाल करता है कि, अभिव्यक्ति की इस पारम्परिक बहुवचन की मौजूदगी वर्तमान भारतीय परिदृश्य पर बहुत मुखर और ध्यानाकर्षक क्यों नहीं है या अभिव्यक्ति के स्थगन और उस पर रोक-टोक की घटनाओं का कोलाहल ही दृश्य पर इतना प्रमुख क्यों है? यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है जिस पर आज सोचने की बहुत जरूरत है।

मणि मधुकर के भाषाई अस्तित्व पर कृष्णा जाखड, आदिवासी सौन्दर्यबोध पर हरिराम मीणा, अज्ञेय के काव्य में प्रेम की अवधारणा पर श्रीप्रकाश मिश्र का,संजीव के मानपत्र पर विवेक श्रीवास्तव, बाल साहित्य पर ओमप्रकाश कश्यप का,हिन्दी वर्तनी की समस्याओं पर बृजेन्द्र त्रिपाठी का, फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्य में गाँधी विचार पर निशा गुप्ता का, दलित आन्दोलन की वैचारिकी पर अभय कुमार दुबे का, छायावादी गद्य पर हेतु भारद्वाज का, आदिवासी कथा लेखक एलिस एक्का पर पुनीता जैन आदि के विश्लेषण-विवेचन बेहद पठनीय हैं। कुछ लेखों में अकादमिकता का आग्रह है, तो कुछ में मौलिक पर्यवेक्षण; कुछ समीक्षकीय शिल्प में हैं, तो कुछ आलोचना के तेवर से लबालब और कुछ शोध पत्र की विशेषताएँ लिए हुए। इस सन्दर्भ में बात करें, तो अभय कुमार दुबे के पास साहित्य और समाजशास्त्र की साझी वैचारिकी है जिसके बल पर उन्होंने हिन्दी में बहुमूल्य योगदान दिया है। उनका यह लेख दलित आन्दोलन को नए सन्दर्भों में देखने-समझने की दृष्टि देता है। श्रद्धाराम फिल्लौरी और हिन्दी नवजागरण विषयक महत्त्वपूर्ण लेख में विनोद शाही लिखते हैं कि, श्रद्धाराम फुल्लौरी ने हिन्दी भाषा को सांस्कृतिक क्षेत्रों व उनकी संस्थाओं के मार्फत जन व्यवहार के लिए अनिवार्य जातीय स्मृतियों का हिस्सा बनाने में मदद की। डिजिटल दुनिया और मार्कसवाद एक तरह का डिजिटल यथार्थ संबंधी वैश्विक साहित्यिक सर्वेक्षण है जिसमें दर्जनों पुस्तकों को आधार बनाकर एक जरूरी विमर्श को आगे बढाया गया है। हिन्दी आलोचना के संभ्रम और अंतर्बाधाओं पर माधव हाडा का लेख बेबाकी के साथ अपने मंतव्यों को रखते हुए उन दिक्कतों से मुठभेड करता है जिनका चलन आजकल की हिन्दी आलोचना में देखा जा सकता है। रंगमंच और हमारा समय पर भानु भारती को, नवजागरण और प्रेमचंद के सेवासदन पर जीवन सिंह को और गाँधी और हिन्दी साहित्य पर रेणु व्यास को पढना स्वयं को कई कोणों से समृद्ध करना है। सुप्रिया पाठक का साहित्यिक रचनाओं में नागरिक स्त्री और राष्ट्र के अंतर्संबंध पर आधारित एक उम्दा लेख तैयार किया है। लेखों पर बातचीत की गुंजाइश बहुत है।

मधुमती की कहानियाँ इसका सबसे कमजोर पक्ष है जबकि कविताओं के मामले में यह पक्ष मजबूत है। फिलहाल, बात कुछ पसंदीदा कविताओं की। लीलाधर जगूडी, लाल्टू, पवन करण, प्रभात, रणजीत, प्रयाग शुक्ल, राजकुमार कुम्भज, नंदकिशोर आचार्य, संतोष चतुर्वेदी, प्रेमशंकर शुक्ल, अरुण देव, प्रमोद पाठक, सुमन केशरी, जयप्रकाश मानस, जाबिर हुसैन, अमित कल्ला, नवनीत पांडे, इंदुशेखर तत्पुरुष, अनिरुद्ध उमट, पीयूष दईया, अशोक कुमार पाण्डेय, अमिताभ चौधरी जैसे हिन्दी कविता के कई महत्त्वपूर्ण कवियों की रचनाएँ इन अंकों की सर्जनात्मक समृद्धि का प्रमाण हैं। प्रेम शंकर शुक्ल की कविता की पंक्तियाँ उद्दृत हैं -हमारी आँखों में/हमारे आंसुओं के यात्रावृत्तांत लिखे हुए हैं / सब एक दिन में तय नहीं होता/लेकिन कभी कभी /एक क्षण ही तय कर देता है / अपने सब दिन.. अनिरुद्ध उमट की एक प्रेम कविता जिसकी अनुभूतियाँ अलहदा हैं, उसे साझा कर रहा हूँ- जिस शहर कभी गया ही नहीं था/उससे वापस लौटते मेरे कदम उदास हैं/ मैं लौटने में हर घर की दहलीज पर रह गया हूँ /हर घर तुम्हारा घर है,हर पेड, हर राह, हर मोड, सब तुम्हारे घर से हैं। संतोष चतुर्वेदी की ब्लैक बोर्ड और रेलवे क्रासिंग लाल्टू की टुकडे तस्वीर स्मृति में जुडने वाली कविताएँ हैं। पवन करण की स्त्री विषयक कविताएँ रेखांकनीय हैं। अमित कल्ला की कविताएँ अपने शिल्प में विशिष्ट हैं।

हिन्दी की अधिसंख्य पत्रिकाएँ अनुवाद के कॉलम नहीं निकालतीं, मानो अनुवाद कोई दोयम दर्जे का काम हो। सही बात तो यह है कि अनुवाद जैसे कालम को निभा पाना सबके बूते की बात नहीं है, हालांकि पहल जैसी पत्रिकाओं की इस दिशा में तारीफ की जानी चाहिए। अनुवाद जैसी सर्जनात्मक और श्रमसाध्य विधा पर मधुमती का नियमित कालम निकलना बहुत बडी बात है। यादवेन्द्र, सुशांत सुप्रिय, नीरज दईया, शीन फाक निजाम, तेजी ग्रोवर के अनुवाद न सिर्फ भाषा के स्तर पर बल्कि प्रस्तुति के स्तर पर भी उत्कृष्ट हैं।

मधुमती ने कथेतर गद्य में जिस तरह की सामग्री पाठकों तक पहुँचाई है उस पर चर्चा जरूर होनी चाहिए क्योंकि कविताओं और कहानियों की उत्कृष्ट सामग्री देने के साथ हंस, पहल, कथादेश, तद्भव, बनास जन, पहल, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, लमही, पाखी, रचना समय, वसुधा, बया,नया पथ जैसी बेहद अहम पत्रिकाएँ हमारे बीच हैं। बहरहाल, राधावल्लभ त्रिपाठी को याद रह जाती है ; कमर मेवाडी का मेरे प्रेरणास्रोत थे शिवरतन थानवी ;अविनाश व्यास का करुणा की आँख का कवि हरीश भदानी; प्रकाश मनु का याद आते हैं मटियानी ; सूर्य प्रकाश जीनगर का नयी पौध के कुशल माली विजेंद्र ; मधु कांकरिया का वह हर साल अपनी माँ की खोज में भारत आती थी भीतर तक छूने की क्षमता से लबरेज संस्मरण हैं। इन अंकों में आप कुछ-एक उपन्यास अंश, डायरी अंश, निबंध भी पढ सकते हैं।

समीक्षा वह सीढी है जिससे गुजरकर आलोचना तक की राह तय होती है हालांकि हिन्दी में समीक्षा और आलोचना को लेकर बहुत घालमेल है। निश्चित तौर पर मधुमती समावेशी सोच में वृद्धि करने वाली विधा है- समीक्षा। इसमें मुझे संदेह नहीं कि हिन्दी की ज्यातर समीक्षाएँ पुस्तक के पक्ष में लिखा प्रशंसा पत्र होती हैं। लेकिन इसमें भी संदेह नहीं कि ज्यादातर लेखक अपनी आलोचना को पचा नहीं पाते, यह बात मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर ही कह रहा हूँ। कई बार तो फतवा तक जारी कर दिया जाता हैं कि इनकी क्या औकात कि मुझ जैसे बडे लेखक की रचना पर नकारात्मक टिप्पणी करें। यह एक गंभीर संकट है, बहुत ही गंभीर। समीक्षक की बहुत बडी जिम्मेदारी है कि वह रचना की संभावनाओं को जरूर उभारे, पर यदि उसे उसकी कुछ सीमाएँ दिखाई देती हैं तो उन्हें भी रेखांकित करे। मधुमती में प्रकशित समीक्षाओं की बात करें, तो असीम अग्रवाल की ऋतुराज की चीन डायरी पुस्तक पर, विज्ञानभूषण की प्रभात रंजन की पुस्तक पर,आशीष मिश्र की नागरी सभ्यता कहानी संग्रह पर, अनिता गोयल गीतांजलिश्री के उपन्यास रेत समाधि पर, शुभम मोंगा की नकोहस उपन्यास पर, जगदीश गिरी की सुधीश पचौरी की किताब तीसरी परंपरा की खोज पर, साहिल कैरो की रचनाकार का संकट पुस्तक पर,हरीश बी.शर्मा की गीता श्री के हसीनाबाद उपन्यास पर, लिखी समीक्षाएँ बेहतर कही जा सकती हैं।

कथेतर गद्य में मधुमती का विस्तार किए जाने की जरूरत है। कभी डायरी, कभी निबंध, कभी यात्रा वृत्तांत, कभी संस्मरण,कभी रिपोर्ताज,कभी फीचर और कभी पत्रकारिता तथा फिल्मों से जुडी सामग्री पर भी मधुमती को फोकस करना चाहिए। इसका रचनात्मक दायरा और बढे साथ ही इसमें छपी सामाग्री पर बहसें हों और लोगों का ध्यान इस ओर जाए, इसके लिए शुभकामनाएँ...।



सम्पर्क - सहायक प्रोफेसर-हिन्दी,

राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय,

बांदा,उ.प्र.,मो.9457815024