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परम्परा में मील के प्रस्तर

अन्नाराम शर्मा
किसी भी कृतिकार की दो भिन्न कृतियों से गुजरना एक अनुभूति के विविध रूपों से भी गुजरना होता है। संवेदना के संतरण के साथ अनुभव का परियाक कृतिकार के हर अनुभव को एक अद्वितीय अनुभव में परिवर्तित कर देता है।
हरिराम आचार्य के सृजन संसार से इन दो समीक्ष्य पुस्तकों के जरीये गुजरना मेरे लिए सुखद प्रतीती है। कह सकता ह कि इन पुस्तकों से गुजरने की यात्रा कालिदास की परम्परा से लेकर खलील जिब्रान की परम्परा तक की ध्वनियों का एहसास हमें कराती है जो हमारे अनुभव के भव में न केवल जोडती है लेकिन हमारे आत्म को भीपूरी तरह प्ररित कर नवोन्मेष की ओर ले जाती है। हमारी रचनात्मकता का पसारा बढाती है।
डॉ. हरिराम आचार्य विरचित अनुपमेय कवि कालिदास एक श्रेष्ठ जीवनीपरक महाकाव्य है। इस कृति में आचार्य ने कविकुलगुरू कालिदास की रचनाओं में वर्णित पात्रों एवं घटनाओं को आधार पर उनके व्यक्तित्व को किंवदंतियों से मुक्त कर एक ठोस, व्यवस्थित एवं पूर्ण सम्भाव्य जीवन-प्रासाद की रचना की है। कालिदास भारत के संस्कृति-पुरूष है, जिन्होंने देवाधिदेव महादेव शिव के विराट चरित्र को मानवता के दिव्य रूप में अभिव्यक्त कर अखिल जगती का आदर्श बना दिया। उनके काव्य एवं नाटकों में भारत की आत्मा एवं भूगोल प्रतिबिंबित होते है। यहाँ की नदियाँ, पर्वत, वनस्पति, पशु-पक्षी, पर्व, लोक संस्कार, धर्म, अध्यात्म एवं लौकिक जीवन का जितना विषद् चित्रण कालिदास की रचनाओं में हुआ है उतना शायद ही किसी अन्य रचनाकार के साहित्य में हुआ है। ऐसे काव्यर्षि की काव्यात्मक जीवनी रच कर कवि ने समकालीन सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के बरक्स भारतीय संस्कृति एवं काव्य मूल्यों की श्रेष्ठता प्रतिपादित की है।
पूरा गं*थ 27 सर्गों में विभक्त है। प्रारम्भ के दो सर्गों (पूर्व पीठिका, मंगल प्रभात) में मालव जनपद के ऐतिहासिक-सांस्कृतिक गौरव, नगरों, नदियों, पर्वतों एवं प्रभात के आह्लादकारी चित्रण के पश्चात् कवि ने शिप्रा की वारिधारा में डुबकी लगाकर निकले युवक कालिदास को संस्कृति सूर्य के रूप में देखा है - प्रकृति जल से वह युवामुख/उगा संस्कृति सूर्य जैसा/दनुज भावों पर मनुजगण/की विजय के तूर्य जैसा। (पृ.-11) तदन्तर दो सर्ग (सूर्योदय गीत, रवि स्तवन गीत) कवि की सूर्योपासना के उच्छ्वास है। इसके पश्चातवर्ती सर्गों में कालिदास के आवास, लेखन कक्ष, जन्म स्थान, जन्म दिवस, परिजन बिछोह, सांदीपनि आश्रम में आश्रय, विद्यार्जन आदि के वर्णन से उनके जीवनकाल की प्रारम्भिक घटनाओं का तानाबाना बुना है। गुप्त मंत्रणा, शक विजय एवं अवन्तीष विक्रमादित्य शीर्षक सर्गों में राष्ट्र पर शकों के आक्रमण, उसके विरूद्ध कवि कालिदास, गुरू सान्दीपन एवं नृप विक्रम की गुप्त मंत्रणा, बौद्धों एवं जैन कालकाचार्य के राष्ट्रद्रोही कृत्यों, मालव सैनिकों को कालिदास के उद्बोधन, युद्ध में कवि द्वारा भूमक को मार गिराने, विक्रम संवत् के प्रचलन एवं कवि को कविकुलगुरू उपाधि प्रदान करने का रोमांचक चित्रण हुआ है। संध्या आरती एवं नीराजन गीत में शांत रस की निबंधना है। मदन महोत्सव, काम गायत्री एवं मधुराका में श्रृंगार सरिता प्रवाहित हैं। इस सर्गों में बसंत ऋतु के मादक प्रभाव, विदर्भ कन्या प्रियंगुमंजरी से कालिदास की प्रथम भेंट, पाणिग्रहण एवं मधुरजनी का हृदयस्पर्शी चित्रण हुआ है। कालिदास एवं प्रियंगुमंजरी की रति क्रीडा का चित्र स्पृहणीय है- यह विभक्ति लोप देहयुग्म के समास का / चरम श्रृंग कामभाव के रमण विलास का/ हुए मुक्तबंध (पृ.72) धर्मसभा में कुमारसम्भव के अष्टम सर्ग के पाठ पर धर्माध्यक्ष द्वारा अश्लीलता के आरोप एवं कवि के एक वर्ष के निर्वासन की घोषणा है। निर्वासन काल में कवि कालिदास द्वारा भारत के सांस्कृतिक भ्रमण (भारत दर्शन), मेघदूत की रचना, (मेघदूत) राज्याज्ञा से उज्जयिनी लौटने (पुनरागमन) एवं पत्नी के देहान्त (निधन मंजरी का) से उत्पन्न कवि के हृदय की मर्मान्तक व्यथा के चित्रण में करूण वियोग श्ाृंगार का प्रकर्श है। गुरू सांदीपनि के नीति वचनों (गुरू उपदेश) से शोकमुक्त हो कर कवि पुनः काव्य सृजन में प्रवृत्त होता है। इसी मध्य महाशिवरात्रि महोत्सव का भी वर्णन है। अंत के तीन सर्गों में रघुवश एवं अभिज्ञानषाकुंतलम् की रचना-पृष्ठभूमि, उनके वैशिष्टय एवं काव्य प्रशस्ति का अवतरण हुआ है।
कुल मिलाकर अनुपमेय कवि कालिदास भारतीय महाकाव्यों की परम्परा में मील का प्रस्तर है। कृति की रस योजना, भाषिक सौंदर्य एवं शैली विधान महाकाव्योचित गरिमा से सम्पन्न है। नायक धीर ललित श्रेणी का है, जो भारतीय काव्यादर्षों एवं जीवन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है। कालिदास का यह जीवनाख्यान युवा पीढी में राष्ट्र के उदात्त जीवनादर्शों के प्रति निष्ठा एवं समर्पण भाव जागृत करेगा-ऐसा विश्वास है।
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अन्तर्यात्रा लेबनान के प्रसिद्ध अरबी-अंग्रेजी कवि खलील जिब्रान की अंग्रेजी कविताओं का हिन्दी में काव्यानुवाद है। इसके अनुवादक है- हिन्दी संस्कृत के यशस्वी कवि डॉ. हरिराम आचार्य। इस संग्रह में कुल 14 कविताएँ संकलित हैं, जिनमें कवि एवं कवि-कर्म, प्रेम, करूणा, सौंदर्य, अध्यात्म, मृत्यु एवं युगीन विडंबनाओं - विसंगतियों का मार्मिक चित्रण हुआ है। लगभग सभी रचनाओं में प्रेम, करूणा एवं वेदना की त्रिवेणी प्रवाहित है। खलील जिब्रान के जीवन में व्याप्त आर्थिक संघर्ष, अनिश्चितता, परिजन मृत्यु एवं समकालीन पादरियों और अधिकारी वर्ग के कोप से उत्पन्न कठिनाइयों की छाप उनकी कविताओं में संवेदनात्मक रूप में अभिव्यक्त हुई है।
संग्रह की पहली कविता कवि में कवि को आगत और अनागत परम्परा का संधि बोध एवं तमः शत्रु से अपराजेय देदीप्यमान रत्नदीप बताते हुए उसकी लोकमंगलकारी भूमिका को उभारा गया है-
कवि वप्ता है/
जो निज उर के बीज/
स्नेह के उर्वर क्षेत्रों में बोता है/
जिसकी पकी फसल/
मानवता स्वयं काटती/
अपनी शिथिल देह
परिपोषण करने को। (पृ. 5)
समाज द्वारा कवि और उसके कर्म की उपेक्षा का दंश कवि को सालता है- कवि ही है वह व्यक्ति/कि जिसको/जीवित रहने तक/इस जग की घोर उपेक्षा का भाजन/बनना पडता है/और मान्यता मिलती जिसको/तभी/कि जब वह इस जगती से /विदा मांग कर/सदा सदा को चल देता है। (पृ. 5) तरंग गीत कविता में सागर के प्रति लहर के समर्पण से प्रेम के चिन्मय, मृत्युंजय और अनंग रूप की व्यंजना हुई है। वर्षा गीत में पीडा और विषाद, सुमन गीत में ध्वंस और निर्माण, जीवन का ऋीडाक्षेत्र में उदात्त मूल्य चेतना, प्रणय गीत में प्रेम की प्रेरणाशक्ति एवं प्रणयजीवन में प्रेमियों के हृदय पर ऋतुओं के विविध प्रभावों का वर्णन हुआ है। प्रणयी की पुकार कविता में विरही के मनस्ताप एवं आकुलता के साथ प्रेम के ऊर्ध्वमुखी रूप की व्यंजना हुई है। संग्रह की मनुज जीवन कविता का प्रतिपाद्य पूर्णता की खोज हैं। प्राण गीत एक नव रहस्यवादी रचना है, जिसमें प्राणों की अतल गहराइयों में बजते शब्दहीन गीत को सुनने का प्रयास है- शब्दहीन नीरवता जिसे प्रकाशित करती/और कोलाहल जिसे तिरोहित कर देता है/सत्य जिसे आवेष्टित करता/सपने जिसको दोहराते हैं/ ढाई आखर जिसका बोध करा जाते है/जिसे जागरण सदा किया करता आच्छादित (पृ. 74) मुझ पर दया करो ओ मेरी आत्मा ! कविता में मन का भीतरी-बाहरी संघर्ष प्रधान है। मेरे निदंक मुझे छोड दो में कविता के औदार्य एवं विश्वव्यापी प्रभाव की व्यंजना हुई है। मरण सौंदर्य में मृत्यु के क्षणों में आत्मसाक्षात्कार एवं मृत्यु की भव्यता, शीतलता एवं शांति का रोमांचकारी चित्रण हुआ है।
कुल मिलाकर यह अनुवाद संग्रह पठनीय है। अनुवादक ने अपने विषद् भाषा ज्ञान और कल्पना शक्ति के बल पर मूल कृति के अधिकाधिक निकट पँहुच कर उसकी भाव सम्पदा, प्रतीक एवं बिंबों को हिन्दी पाठकों के लिए संवेद्य बना दिया है। पुनः सृजन की प्रक्रिया में रचना में स्थानिकता का भी समावेश हुआ है। हंस वाहिनी, श्राद्ध प्रक्रिया, या निषा सर्वभूतानां, गोमुख उद्गम, नैवेद्य, वसुधैवकुटुम्बकम् आदि सांस्कृतिक प्रयोग रचना को भारतीय संदर्भ प्रदान करने है। अनुवादक का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। भाषागत तत्समता, लालित्य, अंलकारिकता एवं लाक्षणिकता बरबस ध्यान आकर्षित करते हैं। माधुर्य एवं प्रसादगुणों की छटा सर्वत्र है। खलील जिब्रान का यह अनुवाद निश्चय ही हिन्दी जगत में समादृत होगा-ऐसा विश्वास है।

पुस्तक का नाम : अनुपमेय कवि कालिदास (महाकाव्य):
लेखक : डॉ0 हरिराम आचार्य
प्रकाशक : प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर
संस्करण : प्रथम संस्करण 2019
पृष्ठ : 154/-
मूल्य : 220/-

पुस्तक समीक्षा
पुस्तक का नाम : अन्तर्यात्रा (कवि खलील जिब्रान)
लेखक (काव्यानुवाद) : डॉ. हरिराम आचार्य
प्रकाशक : चिरमी प्रकाशन, जयपुर
संस्करण : प्रथम संस्करण 2018
पृष्ठ : 112
मूल्य : 300/-

सम्पर्क - तिरुपति अपार्टमेन्ट,
कोठारी अस्पताल के सामने,
सर्वादय बस्ती, बीकानेर-334001
मो-9829996906