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संस्कारों का सींचन करती रोचक कहानियाँ

प्रीति प्रवीण खरे
बच्चों का मन इतना चंचल और कल्पनाएँ, इतनी तेज होती हैं कि किन्हीं निश्चित नियमों में बँधा हुआ साहित्य उनके लिए लिखा ही नहीं जा सकता। हिंदी में बालसाहित्य रचना के सम्बन्ध में गम्भीरता से विचार करने वाले विद्वानों में कविवर सोहललाल द्विवेदी का नाम शीर्ष स्थान पर है। उन्होंने अपने मधुर गीतों द्वारा बालसाहित्य का भण्डार भी भरा है और उसकी श्रीवृद्धि के लिए सतत् प्रयत्नशील रहे हैं। उनका विचार है-सफल बालसाहित्य वही है जिसे बच्चे सरलता से अपना सकें और भाव ऐसे हों,जो बच्चों के मन को भायें। यों तो अनेक साहित्यकार बालकों के लिए लिखते रहते हैं,किंतु सचमुच जो बालकों के मन की बात,बालकों की भाषा में लिख दे,वही सफल बालसाहित्यकार है।
बच्चों की जरूरतें थोडे-थोडे अन्तराल से बदलती रहती हैं। छोटे बच्चों के लिए चित्रमय दृश्य रचनाओं की आवश्यकता होती है। उससे थोडे बडे बच्चों के लिए वन्य जीव-जंतुओं और पशु-पक्षियों की कथाओं की आवश्यकता होती है,कल्पना की उडान भरने वाले साहित्य की जरूरत होती है,और यहीं से साहित्य के उस बुनियाद की जरूरत महसूस होती है जो बच्चों में विवेक,सत्य-असत्य की पहचान, निडरता, ईमानदारी आदि सार्वभौमिक मानवीय गुणों के प्रति वैज्ञानिक ढंग से आस्था उपजा सके।जीवन के अनेक पहलुओं से जुडी हुई वैज्ञानिक जानकरियाँ दे सके,आगे बढते हुए दिनों की एक झाँकी प्रस्तुत कर सके,विषयवार बच्चों की रुचियों-अभिरुचियों और मनोरंजन के संस्कार को स्वस्थ दिशा दे सके।
बाल कविता बचपन का प्रतिरूप है। बचपन को चाहिए अपना स्वर, अपना भावबोध, अपनी प्रफुल्ल चंचल अनुभूतियाँ। बाल कविता एक जीवंत बच्चा है,जो मचलता है, चुलबुलाता है, हठ करता है,खिलखिलाता है,लडता, झगडता और गिरता-पडता है। खेल-खेल में कभी प्रश्नातुर तो कभी जिज्ञासु दिखाई देता है। बालपन के यही रंग कविता के इंद्रधनुषी रंग हैं।
वाकई बालपन की मासूमियत इंद्रधनुषी रंगों में विचरण करती है। साहित्य के संवर्धन की दिशा में अन्य भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी में काफी कुछ काम हो रहा है।आवश्यकता तो इस बात है कि बाल साहित्य बच्चों तक हर हाल में पहुँचे।आज असली आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी बालसाहित्य में आई इस जागरूकता को रचनाकार बराबर आगे बढाएँ और कम पैसे में ऐसे स्वस्थ बाल साहित्य उपलब्ध कराने में हिस्सेदारी लें।
बाल साहित्य का आधार बालमनोविज्ञान माना गया है।आज बालसाहित्य का अर्थ केवल बच्चों का मनोरंजन करना और उनकी ज्ञानपिपासा को शांत करना नहीं है,बल्कि उन्हें आधुनिक जीवन और समाज के मूल्यों से जोडना भी है।बच्चों में कल्पनाशीलता को बढावा देने वाले गुणों को पोषित करना हम बालसाहित्यकारों की महती जिम्मेदारी है।
देश के भावी कर्णधारों के खोते बचपन को बचाना हमारी महती जिम्मेदारी है।
बच्चों के लिए साहित्य रचना उतना आसान नहीं है,जितना लोग समझते हैं।एक बाल साहित्यकार को बाल साहित्य रचने के लिए परकाया प्रवेश करना पडता है,बच्चे के मनोविज्ञान को समझना पडता है,उसकी अभिरुचियों का संज्ञान होना,भाषा शैली पर विचार करना बहुत आवश्यक होता है।इसके अलावा किस आयु वर्ग के लिए लिखा जा रहा है,उससे संम्बंधित विषयों के चयन को ध्यान में रखना महत्त्वपूर्ण है।
जब हम बहुत छोटे बच्चों के लिए लिखते हैं उसमें चित्ररात्मकता, गेयता,सहजता-सरलता, छोटे वाक्य विन्यास आदि बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
बच्चों को उपदेश दिया जाए,ये उनको पसंद नहीं।हमें सीधे-सीधे उपदेश न देखकर उदाहरण के रूप में बताने का प्रयास करना चाहिए।हमें बच्चे की जिज्ञासा और प्रश्नाकुलता को जेहन में रखकर लिखना होगा।
बच्चों में साहित्य का संस्कार,नैतिक मूल्यों का ज्ञान घर-परिवार से रोपित करने का प्रयास करना चाहिए। प्रथम गुरु के रूप में उसका सामना सबसे पहले माँ तथा घर के अन्य सदस्यों से होता है। बच्चे का स्वभाव अनुकरण करने वाला होता है,उसपर परिवार के आचार-विचार का प्रभाव सबसे पहले पडता है। एक कुम्हार जिस प्रकार कच्ची मिट्टी को भली-भाँति पकाकर बर्तन बनाने के लिए तैयार करता है,ठीक उसी पर अभिभावक, शिक्षक, समाज को जुटना होगा।
आज कल कई साहित्यकार बाल साहित्य के नाम पर बच्चों के लिए कुछ भी लिख कर उसे बाल साहित्य में खपाना चाहते हैं, और खपा भी रहे हैं। इस ओर भी ध्यान देना होगा।
दरसल बाल साहित्य एवं साहित्यकारों को आज भी वो मुकाम हासिल नहीं है जो अन्य साहित्य एवं साहित्यकारों को है। बाल साहित्यकार को हीन दृष्टि से देखा जाता है। कई बडे साहित्यकार बाल साहित्य लिखने से कतराते हैं। बाल सहित को दोयम दरजे का साहित्य माना जाता है। ऐसा नहीं है की सभी साहित्यकार ऐसा कर रहे हैं। कई बाल साहित्यकार सार्थक सृजन कर रहे हैं वो पसंद भी किया जा रहा है, लेकिन उनकी संख्या काफी कम है।
अंग्रेजी के प्रभाव से भी हिंदी बाल साहित्य को जूझना पड रहा है। मल्टीमीडिया के सुखद परिणाम हैं तो वहीं दुशप्रभाव भी हैं। कहते हैं कि अति सर्वत्र वर्जिते, किसी भी चीज की अधिकता बुरी होती है। रोटी की जद्दोजहद में हम बच्चों को ध्यान नहीं दे पा रहे हैं,उस पर एकल परिवार के कारण बच्चा या तो काम वाली बाई के साथ रहने को विवश है! उससे संस्कार और नैतिक मूल्य क्या सीखेगा! हम महँगे उपकरण तो ला देते हैं,उन गैजेट्स में बच्चा न देखने वाली चीजे भी देख रहा है, इस प्रकार बचपन खोता बच्चा असमय बडा हो रहा है।आज दादी नानी की कहानी से संस्कार और नैतिक मूल्य का संज्ञान बच्चों को नहीं मिल पा रहा है।
समय के साथ कदमताल बिठाते हुए हमें लेखन में भी परिवर्तन करना होगा। आज के बच्चे की पसंद ना पसंद को ध्यान में रखते हुए लिखना होगा। आज बच्चा काल्पनिक दुनियाँ से ऊपर उठ गया है,उसे प्रैक्टिकल करके दिखाना होगा। पुरानी चीजों को नए संदर्भों में प्रस्तुत करना होगा।
आज मशीनी युग में संवेदनाएँ खतम होती जा रहीं हैं, उस पर ध्यान देना होगा। हमें कथनी और करनी के अंतर को समझना होगा। हम चाहते हैं कि हमारा बच्चा सुसंस्कारी बने तो हमें भी उन संस्कारों को अपनाना होगा। हम स्वयं जडों से दूर हो रहे हैं तो बच्चों को कैसे जोडेंगे? जो बच्चा देखेगा वही तो अनुसरण करेगा। हमें बच्चे के कोमल मन को समझना होगा।
बच्चों तक साहित्य पहुँचाने के लिए घर में नियमित बाल पत्रिकाओं को मंगवाना,तथा बचपन से पढने के प्रति रुचि विकसित करना होगा। अभिभावक, शिक्षक बाल साहित्यकार, राजनेता एवं समाज आदि सभी को साथ मिलकर प्रयास करना होगा। हम भविष्य की चिंता में वर्तमान को नजर अन्दाज कर रहे हैं, जबकि वर्तमान युग के बच्चे ही तो भविष्य के कर्णधार बनेंगे। बाल कहानियाँ मात्र मनोरंजन के लिए ही नहीं होती, अपितु शिक्षा, नैतिकता एवं संदेश के साथ-साथ बच्चों में पढने की रुचि जागृत करती हैं।
इन्हीं बातों को आधार बनाकर सुधा रानी तैलंग ने सयानी मुनिया बाल कहानी संग्रह का सृजन किया। इसमें बच्चों को पढाई व अनुशासन का महत्त्व और बडों एवं बुजुर्गों के प्रति सम्मान की भावना को बडे रोचक ढंग से समझाने का प्रयास किया गया है।
प्रथम कहानी, नई दिशा में पुपुल की माँ का लडका-लडकी में भेदभाव करना पुपुल को नहीं सुहाता। इस कहानी में लेखिका महारानी लक्ष्मी बाई, रानी दुर्गा वती, रजया सुल्तान, सरोजिनी नायडू, किरण बेदी, सानिया मिर्जा, पी.टी उषा, मैरीकॉम, सुष्मिता सेन, ऐश्वर्या राय जैसी सशक्त महिलाओं के उदाहरण द्वारा बडी ही सफाई से इनकी तुलना करते हुए लडकियों को दक्ष बताया है। इसके अलावा वार्षिक उत्सव में पुपुल को खेल, तथा वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम लाकर लडकियों का उत्साहवर्धन किया है। लडका-लडकी में भेदभाव मिटाती कहानी प्रशंसनीय है।
दूसरी कहानी, सच्चा मित्र में राम और अमर की दोस्ती परिश्रम,खुशी,गलती पे माफी माँगने तथा अपना कार्य स्वयं करने जैसी भावनाओं की सीख मिलती है।
तीसरी कहानी, सबक में राहुल द्वारा चोरी करने के बाद पकडे जाने पर गलती मान लेना तथा मास्टर जी द्वारा सुधरने का मौका देना चाहते थे। वार्षिक परीक्षा में राहुल का पेन गिर जाने के बाद अन्य बच्चों ने उसे पेन नहीं दिया। वो क्लास में अकेला रह जाता है। यदि मास्टरजी समय पर उसे पेन नहीं देते तो वह पेपर हल नहीं कर पाता। मास्टरजी द्वारा पेन दिए जाने के बाद उसे पेन की सही कीमत समझ में आती है। वह घर से पूरा सामान लाकर मास्टरजी को देता है। मास्टरजी उसके पश्चाताप से खुश होते हैं। राहुल एक अच्छा लडका बनकर पढाई में ध्यान देता है। ये कहानी पाठकों को गलती सुधारकर सही दिशा में बढने हेतु प्रेरित जरती है।
चौथी कहानी, सयानी मुनिया जिसे पुस्तक का नाम दिया गया है। ये कहानी बेहद शरारती और चंचल गट्टू के इर्द-गिर्द घूमती है। इस कहानी में मुनिया की समझदारी को बडी ही कुशलता से दर्शाया है। लेखिका ने मुनिया द्वारा गट्टू को पेड-पौधों की देखभाल का दायित्व बोध करवाकर सकारात्मक मोड दिया है। इस प्रकार शैतान गट्टू शैतानी भूलकर पशु-पक्षियों और पेड-पौधों को कष्ट नहीं पहुँचाएगा, उनसे प्यार करेगा। ये भावनाएँ बच्चों में आलस को समाप्त कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं। मुनिया की जिम्मेदारी और समझदारी के गुण,जिसके द्वारा गट्टू के जीवन में बदलाव, इस कहानी को अति विशेष बनाते हैं। इस हेतु सुधा रानी तैलंग जी बधाई की हकदार हैं।
पाँचवी कहानी,अनमोल उपहार में दीप द्वारा बाँसुरी सीखने के एवज में बनवारी को गुरुदक्षिणा देने की बात स्वीकार करता है। गुरुदक्षिणा के बदले बनवारी राधा को पढाने कहता है। इस कहानी से दो सीख मिलती है। पहला पढाई हेतु प्रोत्साहन,दूसरा कला सीखने के लिए गरीब-अमीर का फासला नहीं होता है। दीप का बनवारी से बाँसुरी सीखना एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत हुआ है।
छठवीं कहानी, मुनमुन की समझदारी में गाँव से दूर होते लोगों के लिए मिट्टी की महक आकर्षित करेगी। गरीब तबके के बच्चों के प्रति मुनमुन की संवेदना जागृत कर उनके पढाई की व्यवस्था कहीं न कहीं ऐसे बच्चों के प्रति लेखिका ने ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है।
सातवीं कहानी, दीप जगमगा उठे में स्वाभिमानी और ईमानदार किशन का गाने के बदले पैसे लेना तथा बच्चों को मेहनत का महत्त्व आदि गुणों को सिखाने का बढयिा प्रयास है।किशन के भजनों से ठाकुर साहब का स्वस्थ होना तथा इनका किशन को प्यार से अपनाना ये दर्शाता है,कुछ रिश्ते व्यवहार के कारण बनाए भी जा सकते हैं।किशन के ठाकुर साहब के घर पहुँचते ही हवेली स्नेह,प्यार और अपनेपन के संगीत के सुरों से जगमगा उठी।
आठवीं कहानी,खेल-खेल में लेखिका ने अच्छा विषय उठाया है। बच्चे अपने मित्रों की वस्तुओं से आकर्षित हो जाते हैं। जब उनकी पूर्ति नहीं होती तो वे गलत कदम उठा लेते हैं। बच्चों द्वारा खेल-खेल में कई बार ऐसी हरकत हो जाती हैं। जिसके लिए पछताने के सिवा कोई चारा नहीं होता है। पकडे जाने पर उन्हें सजा देने के बजाय नरमी और समझदारी से काम लेना आवश्यक हो जाता है। इस कहानी में सजा के रूप में इंजीनियरिंग की पढाई हेतु प्रोत्साहित करना प्रेरक है।
नवीं कहानी,उजाले के फूल पलक गाँव के झुग्गी,झोंपडी के बच्चों की दशा देखकर दुखी हो जाती है। शहर में मिली सारी सुविधा से और पटाखे,अनार व मिठाई के डिब्बों की गरीब बच्चों के साथ बाँटना चाहती है। बच्चों की पढाई हेतु भी रास्ता निकालती है।सारा सामान लेकर ब्रजपुर पहुँच जाती है। मिठाई,पटाखे पाकर बच्चे प्रसन्न हो जाते हैं।पूरे ब्रजपुर के बच्चों के चेहरे पे खुशियों के दीप जगमगा उठते हैं।काश पलक जैसे लोग गरीबों के घर में उजाले के फूल बिखेरते रहे तो हर दीपावली जगमगाने लगेगी।
दसवीं कहानी,परिवर्तन में वीरू लाड-प्यार में बिगड गया था। लडाकू वीरू के साथ बच्चे खेलने से डरते थे। एक दिन वो चलते-चलते रास्ता भटक जाता, डाकुओं के पास पहुँच जाता है। इनकी संगत में रहकर वो भी डाकू बन जाता है। कहने का तात्पर्य ये है कि बुरे लोगों की संगत का असर बुरा होता है। अंत में कई वर्षों बाद वो अपने ही घर डाका डालने पहुँचता है। बचपन की तस्वीर देख उसने होश उड जाते हैं। वीरू की जिद और उद्दंडता के माँ-बाप दुखी रहते हैं। सच्चाई पता चलने पर उसे गलती का आभास होता है। वो माता-पिता के सेवा का निर्णय लेता है। अब वही वीरू सबका चहेता बन जाता। बुराई को छोडकर अच्छाई अपनाकर खुशहाल जीवन जीना सार्थक होता है।
ग्यारहवीं कहानी, संतोष धन में मोची के द्वारा थोडे में संतोष का वर्णन है। सेठजी की बीमारी ठीक हो जाती है। वे रामप्यारे को उसकी ईमानदारी से प्रसंग हो पुरस्कार स्वरूप झुग्गी के स्थान पर पक्का घर बनवा देते हैं। ये सब रामप्यारे के संतोष के गुण के कारण हो पाता है।
बारहवीं कहानी,बुआ की माँ में बुआ की माँ (दादी) से परियों के अलावा सत्यवादी हरिश्चंद्र, राम, कृष्ण, गाँधी,झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई की प्रेरक कहानियाँ सुनना बच्चों को संस्कारित करता है।आज के बच्चों को दिशा देने हेतु कहानियों की परंपरा को पुनः जीवित करने की आवश्यकता है।
तेरहवीं कहानी, कॉलोनी वाली अम्मा में बेहद उदार और ममतामयी अम्मा बच्चों को भगत सिंह तथा भगवान की कथाएँ,गीत कविताएँ सुनाती थीं। इस कहानी के ये किस्से कहीं न कहीं आज के जीवन में सकारात्मक रंग भरने हेतु महत्त्वपूर्ण रोल अदा करेंगे।
चौदहवीं कहानी,चीलक मौसी में पशु-पक्षियों का वर्णन प्रशंसनीय है। ऐसी कहानियाँ छोटे बच्चों को लुभाती हैं। कालिया कौआ अपने बच्चे का कहा मान चीलक के बच्चों को छोड देता है। इस कहानी में चील, कौआ, मोर, बकरी, उल्लू, गिद्द, तोता जैसे पशु-पक्षी से संवाद में बच्चे को खूब आनंद आएगा।
पन्द्रहवीं कहानी,नटखट टिंकू में बंदर के द्वारा रोचक कहानी बनने का प्रयास किया है। मदारी की कैद में फँसे शरारती व नटखट टिंकू बंदर को सारे दोस्त मिलकर छुडाते हैं। दोस्त यदि नहीं बचाते तो मदारी की कैद में रहना पडता। इस बात का अहसास होते ही टिंकू में बदलाव आता है। पूरे हीरक वन में खुशी का माहौल छा जाता है। सबके साथ मिलकर रहने से जीवन में खुशियाँ आती हैं।
सोलहवीं कहानी,स्मार्ट कौआ में खाने की बर्बादी नहीं करना चाहिए। हमारे लिए पानी बहुत आवश्यक है। कहीं पानी न मिलने पारकालिया को बोतल में थोडा सा पानी मिलता है। उसे पीने की जुगत लगाते हुए वो स्ट्राॅ लाता है,और अपनी प्यास बुझाता है। कालिया द्वारा सूझ-बूझ से काम लेना सिखाती कहानी बढिया है। बच्चों को पसंद आयेगी।
इस कहानी संग्रह की भाषा सरल और सहज है। सुधा रानी तैलंग बच्चों की जानी-मानी लेखिका हैं। वे बच्चों के मनोविज्ञान को भली-भाँति समझती हैं।
बाल सुलभ आवरण से सुसज्जित तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत द्वारा प्रकाशित इस संग्रह की सभी कहानियाँ बाल पाठकों को लुभाएँगी। इस कहानी संग्रह का सम्पादन करते हुए, संपादक- डॉ.ममता रानी जी ने स्वयं की कुशलता का बखूबी परिचय दिया है। साहित्य जगत में सयानी मुनिया का हृदय से स्वागत होगा। जीवन मूल्यों का संरक्षण करती, सुधा रानी तैलंग जी कहानियाँ बच्चों को प्रेरित करेंगी। लेखिका बाल साहित्य रचती रहें और नवाचार भी करें।

पुस्तक का नाम - सयानी मुनिया
लेखिका - सुधा रानी तैलंग
संपादक - डॉ.ममता रानी
प्रकाशक - सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार।
संस्करण - 2019
मूल्य - 205/-

सम्पर्क - 19, सुसिच नगर,
कोटरा सुल्तानाबाद, भोपा (म.प्र.)
पिन ४६२००३, मो. ९४२५०१४७१९