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क्षमाप्रार्थी - मिलान कुन्देरा

कुणाल सिंह
एलेन के नाभि-विषयक विचार
जून का महीना। सूरज मानो बादलों की कोख से अभी-अभी उपजा हो। पेरिस की एक नामालूम-सी सडक पर एलेन धीमी चाल से चल रहा था कि उसने गौर किया। एलेन ने गौर किया कि कम उम्र की जो लडकियाँ हैं, अमूमन सभी आजकल कुछ ऐसे कपडे पहनने लगी हैं - टीशर्ट काफी ऊँची और जींस अथवा स्कर्ट कुछ इस कदर नीचे- कि उनकी नाभि दिखती रहती है। इस खयाल ने एकबारगी उसे अपनी जद में ले लिया और वह सोचने लगा। एलेन सोचने लगा कि क्या स्त्रियों की देह में कामोत्तेजन का केन्द्र, जो कभी उनकी जाँघें, नितम्ब अथवा उरोज हुआ करते थे, अब स्थानान्तरित होकर देह के मध्य भाग पर अवस्थित उस छोटी-सी गडही में सिमट गया है!
इस खयाल ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर कोई व्यक्ति (या सम्पूर्ण युग) स्त्री-देह की कमनीयता के आगार के रूप में उसकी जाँघों को देखता है तो उस व्यक्ति (अथवा युग) की कामुकता के इस रुझान को किन शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है! उसने तत्काल इसका जो जवाब सोचा, वह यों है- जाँघों की सुचिक्कन लम्बाई काम-निष्पत्ति की सुदीर्घता का प्रतीक है (कदाचित् इसीलिए स्त्रियों की लम्बवत् जाँघें पुरुषों के लिए वांछनीय होती हैं)। एलेन ने सोचा कि यह कदली जाँघों की लम्बाई ही होती है, जो सम्भोग में अगम्यता के रोमांच का योग करती है।
यदि कोई व्यक्ति (अथवा युग) स्त्री-देह की कमनीयता के आगार के रूप में उसके नितम्बों को देखता है, तो उसकी कामुकता के इस रुझान का वैशिष्ट्य क्या हो? एलेन ने सोचा- निठुराई, उत्तेजना का उत्कर्ष, लक्ष्य-प्राप्ति का संक्षिप्ततम और किंचित् अवैधानिक मार्ग, ऐसा लक्ष्य जो द्विगुणिता की अधीर अभीप्सा से तप रहा हो।
और यदि कोई व्यक्ति (अथवा युग) स्त्री की कमनीयता के आगार के रूप में उसके स्तनों को देखता हो? एलेन ने सोचा- शुचिता। जीसस को स्तनपान कराती वर्जिन मेरी। स्त्री-शक्ति की उदात्तता के सम्मुख नत पौरुष की वश्य प्रस्तुति।
लेकिन उस व्यक्ति (अथवा युग) की कामुकता के रुझान को कैसे परिभाषित किया जा सकता है, जो स्त्री की कमनीयता के आगार के रूप में उसकी नाभि को देखता हो?
मन्थर गति से चलता हुआ एलेन सोचता रहा, बिना इसकी परवाह किये कि बारहाँ वह अपने खयालों को दुहरा रहा है। या शायद ऐसा वह जानते-बूझते कर रहा था, क्योंकि नाभि ने उसके मस्तिष्क में एक दूरस्थ स्मृति को जगा दिया था- अपनी माँ के साथ उसकी आखिरी मुलाकात की स्मृति।
तब उसकी उम्र दस वर्ष के आसपास थी। छुट्टियाँ बिताने वह अपने पिता के साथ कहीं बाहर गया हुआ था। उन्होंने एक कोठी किराये पर ली थी, जिसमें बागीचा तो था ही, एक छोटा-सा तरण ताल भी था। कई वर्षों के अन्तराल के बाद वह आयी थीं, बाप-बेटे के साथ छुट्टियाँ बिताने की गरज से पहली बार। वे अपने भूतपूर्व पति, यानी एलेन के पिता के साथ कोठी के भीतरी हिस्से में थीं। उनके भीतर होने से फिजा में दमघोंटू उमस तारी थी। कितनी देर के लिए दोनों एक साथ भीतर रहे? घंटे-दो घंटे से ज्यादा नहीं। तब तक एलेन ताल में तैरता रहा था। थोडी देर बाद वह ताल की सीढियों पर चढा और पानी में छलाँग लगाने ही वाला था कि माँ पर नजर पडी। वह अकेली थीं, पिता नहीं थे। वह जा रही थीं, जाने से पेश्तर विदा लेने आयी थीं। कोठी के भीतर दोनों में क्या बातें हुईं, उन्होंने क्या तय किया, वह नहीं जानता। उसे सिर्फ इतना याद है कि माँ बागीचे की कुर्सी पर बैठी हैं और वह, भीगे जाँघिये में उनके सामने खडा है। माँ ने क्या कहा, अब याद नहीं, स्मृति में बस एक दृश्य हमेशा के लिए टँका रह गया, बीता हुआ वह ठोस पल, तीखा और पैने नकूश वाला, कि वह एलेन की नाभि को एकटुक देख रही हैं। कभी-कभी उनकी नजरों की सुइयों को वह अब भी अपने पेट की तराई में महसूस करता है। ऐसी दृष्टि, जिसे दो-टूक समझना मुश्किल था, दया और अवहेलना से सनी हुई एक अव्याख्येय दृष्टि। इसके बाद माँ के होठों पर धीरे-धीरे एक मुस्कराहट ने आकार पाना शुरू किया था (फिर वही, मेहरबानी और उपेक्षा से लिथडी हुई मुस्कराहट)। फिर, कुर्सी पर बैठे-बैठे वे झुकीं और अपनी तर्जनी से एलेन की नाभि का स्पर्श किया। फौरन तभी वे उठ खडी हुईं, उन्होंने उसके गालों को चूमा (क्या वाकई उनके चूमने में प्यार का परस था, शायद हो, ठीक-ठीक वह नहीं जान पाया), और चली गयीं। उसने फिर उन्हें दुबारे कभी नहीं देखा।
एक औरत का कार से बाहर आना
नदी के किनारे-किनारे लेटी दुबली सडक पर एक छोटी-सी कार चल रही है। शहर का यह बाहरी इलाका- जिसके बाद देहात शुरू हो जाता है- इस चिलचिलाती धूप और हवा में और भी अनाथ व अनाकर्षक लग रहा है। कहीं-कहीं इक्के-दुक्के घर दिखते थे, लेकिन लोगबाग नहीं। सडक के किनारे कार रुकती है और उसमें से एक औरत बाहर निकलती है- जवान और निहायत खूबसूरत। निकलने के बाद उसने कार के दरवाजे को इतनी लापरवाही से बन्द किया कि शायद वह लॉक भी न हुआ हो। आजकल के जमाने में ऐसी लापरवाही! इस लापरवाही का सबब क्या है, ऐसी अवहेलना का अर्थ क्या है? क्या वह अपने खयालों में इतनी खोयी-बझी हुई है?
नहीं, वह किसी भी प्रकार से चिन्तित और परेशान नहीं लगती, बल्कि उसके चेहरे पर एक किस्म का ढीठ आत्मविश्वास है। यह औरत बखूबी जानती है कि उसे क्या चाहिए। सडक के किनारे-किनारे कोई सौ गज चलने के बाद एक छोटा पुल है जो नदी के दूसरे सिरे को जोडता है। थोडा ऊँचा, सँकरा पैदल-पुल, जिस पर किसी किस्म का वाहन वर्जित है। वह पुल पर चढती है और दृढ कदमों से चलने लगती है। चलते हुए वह बारहाँ इधर-उधर देखती है, इस तरह नहीं कि कोई उसका इन्तजार करता हो, बल्कि इस तरह कि कहीं कोई आसपास तो नहीं। पुल के बीचोंबीच पहुँचकर वह रुक जाती है। पहली नजर में ऐसा लगता है मानो वह हिचक रही हो, लेकिन नहीं, यह हिचक या झिझक नहीं, बल्कि एकाग्रता से पेश्तर पल-भर की विरति है, अपने इरादों को इस्पाती स्पर्श प्रदान करने का क्रम है। इरादा? साफ-साफ कहें तो इरादा नहीं, नफरत। हाँ, हिचक की तरह दिखने वाला वह ठहराव वस्तुतः अपने भीतर के तमाम नफरतों के आवाहन का यत्न था, कि इस पल वे उसका साथ न छोडें, इस पल उनकी तिक्तता व रुक्षता कम न हो, वे और घनीभूत होकर उमडें।
वह पुल की रेलिग के ऊपर चढी और बेदर्दी से अपने-आपको नीचे ढकेल लिया। जल के स्थिर सतह पर उसकी देह एक झन्नाटे के साथ टकराई और फिर उसने जो सबसे पहली अनुभूति हुई, वह थी पानी की बर्फीली ठंडक। दूसरे ही पल उसने अपना मुँह निकाला, और चूँकि उसे तैरना आता था, उसकी स्वाभाविक वृत्तियाँ आत्महत्या के उसके निश्चय की खिलाफत में आने लगीं। उसने फिर से अपना मुँह पानी में गोत दिया, ताकि साँसों की आवाजाही अवरुद्ध हो। अचानक उसे एक चीख सुनाई पडी। नदी के दूसरे किनारे से उठकर आयी एक चीख। किसी ने उसे देख लिया था। वह समझ गयी कि उसका मरना अब निर्विघ्न नहीं। एक तो तैरना आना उसका दुश्मन बन रहा था, और अब यह दूसरी आफत, जिसे छलाँग लगाने से पहले वह देख न सकी थी। लेकिन उसे हार नहीं माननी, किसी तरह से अपनी मृत्यु को सलामत और सुनिश्चित रखना है।
वह हत्या करती है
जिस तरफ से आवाज आई थी, उसने देखा। उसे बचाने की गरज से एक आदमी नदी में कूद चुका है और तैरता हुआ उसी की तरफ आ रहा है। उसने मन ही मन हिसाब लगाया कि उसके यहाँ तक पहुँचने से पहले उसका पूरी तरह डूबकर मर जाना सम्भव है कि नहीं! यदि वह पूरी तरह नहीं मरती तो, अधमरी अवस्था में तो वह उसके साथ जो चाहे, कर सकता है। मसलन, वह उसे आसानी से खींचकर बाहर निकाल सकता है, दबाव देकर उसके शरीर में पैठे अनचाहे पानी को निकाल सकता है, किसी तरह उसकी बिसरती साँसों को लौटाल सकता है, बचाव-दल या फिर पुलिस को बुला सकता है, और नतीजतन उसे बचा लिया जाएगा और उसकी यह कोशिश ताउम्र एक भद्दा संस्मरण बनकर रह जाएगी।
रुक जाओ! रुक जाओ! वह आदमी चिल्ला रहा था।
पल-भर में सबकुछ पलट गया। कहाँ तो वह खुद को पानी के अतल अँधेरे में गुरुब कर रही थी, कहाँ वह चमकीले सतह को भेदती हुई ऊपर आयी और जोर-जोर से साँस लेने लगी ताकि हाथ-पैर हिलाने का सामर्थ्य लौटे। वह आदमी अब तक एकदम सामने चला आया था। एक जवान छोकरा, दुनियादारी में नौसिखुआ, जिसे कुछ भला करने और प्रसिद्ध होने, अखबार में अपना फोटो छपवाने की पडी थी। वह अब भी चिल्ला रहा था, रुक जाओ! रुक जाओ! चिल्लाते हुए ही उसने अपना हाथ बढाया तो औरत ने बगैर किसी न-नुकर के उसे थाम लिया। फिर अचानक उसका थामना, पकडने और फिर पकडना, दबोचने में तब्दील हो गया। उसने छोकरे को नीचे पानी की गहराई में दबा दिया। वह जैसे गिडगिडा रहा था, रुक जाओ! मानो आज के दिन ये ही चन्द शब्द बदे थे, जो उसे कहने हों। लेकिन बहुत जल्द उसका कुछ भी कहना बन्द हो जाएगा। उसने अब भी उसकी बाँह पकड रखी थी, उसे पानी में धसोडते हुए वह ऊपर से उसके पूरे शरीर पर छा गयी ताकि वह अपना मुँह बाहर न निकाल सके। वह छटपटाया, उसने हाथ-पैर मारने की भरपूर कोशिश की, औरत को चोट पहुँचाने, किसी तरह निकल जाने की कोशिश, लेकिन वह उसे पकडे रही, उसे दबाये रही, उसके ऊपर लेटी धीरे-धीरे उसकी स्थिर होती जा रही तमाम गतियों को महसूस करती रही। बहुत धीरे-धीरे करके वह पूरी तरह निस्पन्द पड गया। उसके मर जाने के बाद भी वह उसे नीचे दबाये रही, मानो इस संघर्ष से अब तक पूरी तरह थक चुकी अब वह दम ले रही हो। फिर वह अचानक पलटी और जल्दी-जल्दी उस दिशा में तैरने लगी जिधर से वह आयी थी। वह भाग रही थी, ताकि अब तक जो हुआ उसकी परछाईं भी उसके अन्तर्मन को छू न सके। वह तैरते हुए भाग रही थी। वह यहाँ किसलिए आई थी, अब तक पूरी तरह बिसार चुकी थी। उसका मरना स्थगित हो चुका था और उसे इसकी भनक तक न थी। उसका मरना क्या इसलिए मुमकिन न हो सका, कि उसे मरने से बचाने आया शख्स खुद मर चुका था? अब तो उसके मरने की राह में कोई रोडा न था, फिर उसे जिन्दा भागने की यह क्या सूझी?
जिन्दगी इस तरह खुद ही अपने सदमों से उबर जाया करती है कि चीजें पहले-सी तयशुदा नहीं रह जातीं। मरने के लिए जरूरी हौसला अब उसमें न बचा। वह काँप रही थी, किसी भी प्रकार के हौसले और हिम्मत से पूर्णतः खाली।
वह अपने घर लौटती है
तैरते हुए वह किनारे तक पहुँची। वह बमुश्किल खडी हुई। उसके पैरों में जूते नहीं थे। और उसमें अब इतनी ताकत न बची थी कि अपने जूतों को खोजे।
दूसरी बार मिली यह दुनिया उसे असत्कारशील लगी। सहसा इस खयाल ने उसे दबोच लिया कि जूतों के साथ-साथ कार की चाबी भी गुम है। उसका हाथ अपने-आप पैरों से रपटे हुए स्कर्ट की तरफ चला गया, लेकिन स्कर्ट में तो कोई जेबी ही न थी।
जब हम अपनी मौत की तरफ बढ रहे होते हैं, इस पर कतई गौर नहीं करते कि रास्ते में हमने क्या-क्या खो दिया। जब वह अपनी कार से निकली थी, उसके सामने कोई भविष्य न था। उसके पास किसी से कुछ छिपाने को न था। जबकि अब, अचानक, उसके पास छिपाने को बहुत-कुछ चला आया। कहीं कोई सुराग न बचे। उसकी बेताबी बढती ही गयी। चाबी कहाँ हो सकती है? घर कैसे जाया जाए?
वह कार तक पहुँची। उसने दरवाजा खोला, जो खुला हुआ ही था, लेकिन उसके लिए बगैर चाबी के दरवाजे का खुल जाना अचम्भे की तरह था। चाबी अन्दर थी, डैशबोर्ड पर उपेक्षित-सी पडी हुई। बैठने के बाद उसने अपने नंगे पैरों को अन्दर समेट लिया। वह अब भी काँप रही थी। पानी से निकलने के बाद अब उसे ठंड भी लग रही थी। उसकी कमीज, उसका स्कर्ट नदी के गँदले पानी से भीगकर उसके शरीर से चिपका हुआ था। उसने चाबी लगाई और गाडी स्टार्ट कर दी।
वह आदमी जो उसे बचाने चला था, डूबकर मर चुका था और वह जिसे वह अपने गर्भ में ही मारने चली थी, अब भी जीवित है। आत्महत्या का विचार अब हमेशा के लिए विदा ले चुका था। अब शायद ही वह लौटे। वह छोकरा मर चुका है और यह बच्चा अब तक जिन्दा है। जो हुआ, उसे छिपाने की गरज से उससे जो बन पडेगा, वह करेगी। वह काँप रही थी और उसका जज्बा लौट रहा था। वह सिर्फ और सिर्फ अपने निकट भविष्य का सोच रही थी। कैसे घर पहुँच जाए कि इस हालत में कोई उसे न देख सके। घर पहुँचकर कार से कैसे निकलेगी? इन भीगे कपडों में गेटकीपर की नजरों में धूल झोंकते हुए कैसे अन्दर तक पहुँचेगी।
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अचानक एलेन को कन्धे पर एक जोरदार धक्का लगा। देखकर नहीं चल सकते, उल्लू!
उसने पलटकर देखा कि ठीक उसके बगल से एक लडकी गुजर गयी- तेज और तीक्ष्ण गति से।
क्षमा चाहता हूँ। उसने पीछे से (निर्बल स्वर में) कहा।
गधा कहीं का! बगैर पीछे मुडे उस लडकी ने (ठोस आवाज में) कहा।
क्षमाप्रार्थी
दो दिन बाद अपने अपार्टमेंट में अकेले बैठे एलेन ने महसूस किया कि उसका कन्धा अब भी दुख रहा है। उसने सोचा कि रास्ते पर चलते हुए इतनी तेज टक्कर अमूमन नहीं होती, जब तक कि कोई जान-बूझकर न टकराये। उसे उल्लू कहती हुई उस लडकी की आवाज भुलाये नहीं भूलती। उसी के बरक्स अपनी रिरियाती-सी आवाज भी उसे याद आई, क्षमा चाहता हूँ! फिर उस लडकी की धौंस से भरी आवाज, गधा कहीं का! एक बार फिर उसने बिना किसी गलती के माफी माँगी थी। उसके साथ हमेशा ऐसा क्यों होता आया है कि वह खुद को ही कठघरे में खडा पाता है, माफी माँगता हुआ। अतीत में भी ऐसा कई बार हुआ है। एक बार फिर से वह यह सब याद करना नहीं चाहता था। उसने सोचा, किसी से बात की जाए, जी बहल जाएगा। उसने अपनी प्रेमिका मैडलीन को फोन किया। वह फिलहाल पेरिस से बाहर है। उसका फोन नहीं लगा। सो उसने अपने दोस्त चार्ल्स का नम्बर मिलाया। और जैसे ही उसने चार्ल्स की आवाज सुनी, एक बार फिर से माफी माँगते हुए बोला, यार, बेवक्त फोन किया, इसलिए भडकना मत। दरअसल मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था, इसलिए सोचा तुमसे बात कर लूँ।
अपना मिजाज भी कुछ ऐं-वैं ही है। बता, क्या हुआ तुझे?
कुछ खास नहीं यार, बस मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा है। मेरे साथ ऐसा क्यों होता है कि मैं हमेशा खुद को ही अपराधी मानने लगता हूँ?
अगर ऐसा है भी, तो क्या बुरा है!
अपने को कसूरवार मानना अथवा न मानना- मेरा खयाल है, यही असल मसला है। जीवन सबका, सबसे संघर्ष का ही नाम है, यह तो जानी हुई बात है। लेकिन एक सभ्य और सुसंस्कृत समाज में यह संघर्ष किस रूप में काम करता है? संघर्ष का मतलब यह तो नहीं कि हम जिसे भी पायें, उस पर हमला कर दें। सो, इसकी बजाय लोग एक-दूसरे पर अभियोगों का आरोपण करते हैं। इसमें जो आदमी, दूसरे को कसूरवार ठहराने में कामयाब हो गया, वह जीत गया और जिसने अपराध कबूल कर लिया, उसकी हार हुई। तुम एक सडक पर चल रहे हो, धीमी चाल से, किसी खयाल में डूबे हुए। अचानक एक लडकी आती है, ऐसे मानो दुनिया में सडक पर वही इकलौती चल रही हो, सो उसे न दायें देखने की जरूरत है और न बायें। वह सीधा आती है और तुमसे टकरा जाती है। और वही निर्णायक क्षण होता है, जब एक, दूसरे को गाली दे देता है और दूसरा, सिर नवाये माफी माँगने लगता है। गौर करने की बात है कि दोनों ही एक-दूसरे से टकराये, देखा जाए तो दोनों एक-दूसरे को टक्कर देने वाले भी कहे जा सकते हैं और एक-दूसरे से टक्कर खाने वाले भी। इसके बावजूद उनमें से एक ऐसा होता है जो हमेशा फौरन से पेश्तर खुद को टक्कर देने वाला कबूल कर लेता है और खुद की निगाह में भी गलत ठहर जाता है, माफी माँगने पर उतारू हो जाता है। ठीक इसका उलटा भी है, कि उनमें से एक ऐसा होता है जो हमेशा फौरन से पेश्तर खुद को टक्कर खाने वाला मान बैठता है और तुरन्त ही माफी माँग रहे उस मुजरिम को गाली देने, दंडित करने लगता है। अगर मैं तुमसे जानना चाहूँ कि ऐसी किसी स्थिति में तुम अपने को किस जगह देखोगे- माफी माँगते हुए या गाली देते हुए?
मैं? ऐसी स्थिति हो तो निश्चित रूप से मैं माफी माँगने वाला होऊँगा।
ओह, तो तुम भी मेरी तरह ही निकले! तुम्हें क्या लगता है, अपने इस माफीनामे से तुम सामने वाले को ठंडा कर सकोगे कभी?
बिल्कुल।
तो तुम गलत हो। जो आदमी माफी माँग रहा होता है, वह खुद को कसूरवार ठहरा रहा होता है। और अगर एक बार तुमने अपने आपको कसूरवार मानना शुरू कर दिया तो फिर तो यह एक तरह से सामने वाले को बढावा देना हुआ कि वह तुम्हें और-से-और अपमानित करे, हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हें खुलेआम दोषी ठहराता फिरे। यह सब बस इसलिए कि तुमने पहली बार उससे माफी माँग ली थी। पहली बार के माफी माँगने का यह अनिवार्य नतीजा है।
शायद तुम ठीक कह रहे हो, हमें तुरत-फुरत किसी से माफी नहीं माँगने लगना चाहिए। लेकिन फिर भी अगर मुझे चुनना पडे तो अपने रहने के लिए मैं उसी दुनिया को चुनूँगा जहाँ सबका, सबसे माफी माँगने की रवायत हो। बिना किसी बात के, बिना किसी अपवाद के और बिना किसी हिचक के। एक ऐसी दुनिया जहाँ माफी माँगना कमतर होना न हो, जहाँ के बाशिन्दे माँगी गयी और माँगी जाने वाली माफियों की बोझ तले दबे हों।’’
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एलेन ने फिर से मैडलीन का नम्बर डायल किया। घंटी जाती रही, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। जैसा कि अक्सर वह किया करता है, ऐसे में उसने अपना ध्यान दीवार पर टँगी तस्वीर पर केन्द्रित कर दिया। अपार्टमेंट में और कोई तस्वीर न थी, सिवाय उस तस्वीर के जिसमें एक औरत का चेहरा था- उसकी माँ का चेहरा।
एलेन के जन्म के कुछ महीनों के बाद ही वह अपने पति- एलेन के पिता- को छोडकर चली गयीं। एक ऐसे आदमी को, जिसने शायद ही कभी उनके साथ गलत व्यवहार किया हो। एलेन के पिता निहायत ही जहीन और शाइस्ता आदमी थे। इतने भद्र कि एलेन तब समझ न सका था कि ऐसे आदमी को कोई औरत क्योंकर छोड सकती है। एलेन तब यह भी कहाँ समझ सका था कि कोई औरत अपने पति को छोडे तो छोडे, अपने दूधमुँहे बच्चे को भला कैसे छोडकर जा सकती है!
वह कहाँ रहती हैं? उसने अपने पिता से पूछा था।
अमेरिका में, शायद।
शायद?
मैं ठीक-ठीक उनका पता नहीं जानता।
लेकिन उनका फर्ज बनता था कि आपको बतायें।
मेरे प्रति उनका कोई फर्ज नहीं बनता था।
और मेरे प्रति? क्या उन्होंने कभी मेरी खबर लेने की जरूरत नहीं समझी? क्या उन्होंने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि मैं कैसा हूँ? कि मैं उनके बारे में क्या सोचता हूँ?
एक दिन उसके पिता से रहा न गया- तुम जानना ही चाहते हो तो तुम्हें सब बताता हूँ। तुम्हारी माँ कभी नहीं चाहती थीं कि तुम्हारा जन्म हो। नहीं चाहती थीं कि तुम हमारी जिन्दगी में होओ। इस दुनिया में, इस घर में या जिस आरामकुर्सी पर अभी तुम बैठे हो, वहाँ। नहीं चाहती थीं कि तुम होओ, कहीं भी। समझे तुम?
हमेशा शान्त और शिष्ट रहने वाले अपने पिता को पहली बार आपे से बाहर होता देखा था उसने। उनका संयम तब भी टूट गया होगा जब एलेन की माँ ने उसे इस दुनिया में लाने से मना कर दिया होगा, और तब शायद पहली बार वे अपनी पत्नी की मर्जी के खिलाफ उठ खडे हुए होंगे।
एलेन से उसकी माँ की आखिरी मुलाकात के बारे में मैं पाठकों को पहले ही बता चुका हूँ। छुट्टियों में जब वे बाहर गये थे, स्विमिंग पूल वाली बात। तब एलेन की उम्र दस वर्ष थी। एलेन जब सोलह साल का हुआ, उसके पिता चल बसे। पिता की अन्तिम क्रिया के बाद उसने एक फैमिली फोटो से माँ का चेहरा फाडकर उसे अलग से मढवाकर इस दीवार पर टाँग दिया। उसके अपार्टमेंट में उसके पिता की एक भी तस्वीर क्यों नहीं है, यह मैं नहीं जानता। क्या यह अजीब नहीं लगता? निश्चित रूप से। क्या यह अनुचित है? शायद। लेकिन अब जैसा भी है, ऐसा ही है कि उसके अपार्टमेंट में सिर्फ और सिर्फ एक ही तस्वीर टँगी है, उसकी माँ की, जिससे कभी-कभी वह बातें भी करता है।
क्षमाप्रार्थी की रचना-प्रक्रिया
आपने गर्भपात क्यों नहीं करवा लिया? क्या उन्होंने आपको रोका था?
टँगी हुई तस्वीर से उभरकर एक आवाज आई, तुम यह कभी नहीं जान पाओगे। मेरे बारे में तुम्हारी सोच, तुम्हारी कल्पनाएँ अन्ततः परीकथाएँ बनकर रह जाएँगी। लेकिन मुझे तुम्हारी ये परीकथाएँ भी पसन्द हैं। यहाँ तक कि जब तुम अपनी सोच में चलते-चलते मुझे वह हत्यारिन करार देते हो जो तुम्हें मारने की खातिर नदी में कूद पडी थी और जिसने उस छोकरे को डुबो कर मार दिया, तो भी। तो भी मुझे तुम्हारी कल्पनाएँ भाती हैं। तुम खुद को रोका न करो। चलो, कल्पना करो। कल्पना करो और मुझे सुनाओ। मैं सुन रही हूँ।
और एलेन कल्पना करने लगा। उसके पिता और उसकी माँ। साथ होने से पहले ही माँ चेता देती हैं, मैंने आज गोली नहीं ली, सावधानी से। उसके पिता उन्हें आश्वस्त करते हैं। वह आश्वस्ति उनके बीच एक-दूजे पर विश्वास और भरोसा पैदा करती है। और जैसे ही वह एलेन के पिता के चेहरे पर स्खलन-पूर्व के भावों को आकार लेता देखती हैं, सतर्क करती आवाज में कहती हैं, ध्यान से। पिता रुकते नहीं, तो वह उन्हें बरजने लगती हैं, नहीं-नहीं। रुक जाओ। मैं नहीं चाहती। मैं यह नहीं चाहती। लेकिन एलेन के पिता का चेहरा और-से-और रक्ताभ होता जाता है। वह मनाही का शाब्दिक आसरा छोड अब ऐंठने-सी लगती हैं, अपने शरीर के जोर से उनके शरीर के भारीपन को परे ढकेलना चाहती हैं। और तभी। तभी वे समझ जाती हैं कि एलेन के पिता का बर्ताव किसी आवेग का वशीभूत नहीं, बल्कि सोची-समझी मर्जी का क्रियान्वयन है। एलेन अपने पिता की उसी मर्जी से इस दुनिया में आया, जबकि माँ के लिए उसका जन्म, पिता की मर्जी के आगे घुटने टेकने की तरह था। एक ऐसी पराजय, जो अन्ततः घृणा को जन्म देती है।
यह पहली बार नहीं था कि एलेन ने अपने माता-पिता के बीच की अन्तरंगता की ऐसी कल्पना की हो। यह अन्तरंगता उसे अपनी ओर खींचती है। उसका मानना है कि दुनिया में हर आदमी ऐन वैसा होता है जैसी स्थिति और जैसे मनोभाव में उसकी माँ की कोख में उसके पिता का बीज गिरता है। वह खडा हुआ और आईने में देखकर जाँचने लगा कि उसके नकूश में क्या ऐसा है जो ऐन उस घृणा की शिनाख्तगी करते हों, जो उसके माता-पिता के मन में एक-दूसरे के प्रति था- शरीरिक रूप से सशक्त पिता के मन में माँ के प्रति, अपनी मर्जी का आरोपण करते हुए और अपेक्षाकृत कमजोर और इसलिए वेध्य माँ के मन में पिता के प्रति, उस सनातन पराजय को स्वीकार करते हुए।
उसने सोचा, घृणा का यह द्विगुणित संघटन अन्ततः एक क्षमाप्रार्थी को ही जन्म दे सकता है। आईने में अपने पिता की तरह शिष्टता दिखी और माँ की तरह की अतिक्रमिता। प्रकृति के कठोर नियम के अनुसार जो व्यक्ति एक साथ निहायत भद्र और निहायत अवांछित दोनों हो, उसका जीवन-पर्यन्त अभियुक्त बने रहना, अभियुक्त बने रहकर क्षमा की याचना करते रहना स्वाभाविक है। उसने दीवार पर टँगी उस तस्वीर को देखा, और एक बार फिर से उसकी आँखों के सामने अन्तरंगता की रात उस स्त्री का हार जाना, उसका कार में बैठकर कहीं जाना, भीगे कपडों में गेटकीपर से बचते हुए लौटना, नंगे पैर सीढियाँ चढते हुए उस घर में तब तक के लिए रहना जब तक कि एक अवांछित जन्म न ले ले, और फिर उस घर से सदा के लिए निकल जाना घूम गया।
हव्वा का पेड
एलेन अपने अपार्टमेंट के फर्श पर बैठा था, दीवार से टेक लगाकर, सिर नवाये। शायद वह बैठे-बैठे सो गया था। वह सो गया था कि एक स्त्री-स्वर ने उसे जगा दिया।
‘‘तुमने मुझसे अब तक जो-जो कहा, अच्छा लगा। अच्छा लगा कि तुमने इन पहलुओं को छुआ। मुझे इसमें अपनी तरफ से कुछ जोडना-घटाना नहीं सिवाय उस नाभि वाले प्रकरण में किंचित् परिव्र्धन के। तुम्हारी सोच के मुताबिक सिर्फ परियाँ ही होती हैं, जिनकी देह नाभि-विहीन हुआ करती है। लेकिन मेरे हिसाब से यह सृष्टि की प्रथम स्त्री थी, जो नाभि-विहीन थी। उसका जन्म किसी उदर से नहीं, बल्कि एक आलोडन से, स्रष्टा की मर्जी से हुआ था। उसके भग से सृष्टि की पहली नाल निकली। बाइबिल की मानें तो दूसरी नालें भी वहीं से निकलीं, जिनके दूसरे सिरे से या तो कोई पुरुष सन्तान या फिर स्त्री सन्तान जुडे होते हैं। पुरुष का शरीर सातत्यविहीन होता है, साक्षात् उससे किसी का जन्म नहीं होता, वह निमित्त-मात्र भले हो। जबकि हर स्त्री की योनि से एक दूसरी नाल जुडी होती है और दूसरी से फिर तीसरी। इस तरह स्त्रियाँ ही इस सृष्टि की श्ाृंखला की वास्तविक कडियाँ हैं। परस्पर जुडतीं ये नालें ऊपर की ओर जाते-जाते किसी पेड की मानिन्द सृष्टि पर आच्छादित हैं, ऐसा पेड जो देहों की अनन्तता से अपना आकार सुगठित करता है। देहों का महाकाश, सोचो जरा! और इस विशालकाय पेड की जडें कहाँ हैं? सृष्टि की उस पहली स्त्री में जो नाभि-विहीन थी- हव्वा।
जब मैं गर्भवती हुई, मैंने स्वयं को उस विशालकाय पेड की एक अनिवार्य कडी के रूप में पाया। और तुम, तब तक अजन्मे तुम- मुझे लगा किया कि तुम शून्य में बह रहे हो, उस नाल से आबद्ध जिसकी जडें मेरी नाभि में धँसी थीं। और उन्हीं दिनों एक सपना मेरी नींद में बार-बार पैठने लगा- कोई एक हत्यारा सबसे नीचे लेटी उस नाभि-विहीन आदि-स्त्री का गला रेंत रहा है। एक गों-गों की अनवरत आवाज, कराह से मिलती-जुलती; और मुझे लगता कि किसी भी पल वह विशालकाय पेड अरराकर टूट पडेगा। उसकी अनन्त शाखाएँ-प्रशाखाएँ टूटकर गिर रही हैं जैसे बादल फट पडे हों। मुझे समझने की कोशिश करो- सपने में मुझे जो दिखा, वह प्रलय नहीं था जिसके बाद पूरी मानवता का नाश हो जाएगा, नहीं, मैं मानवता का नाश कतई नहीं चाहती थी। मैं चाहती थी कि मानवता का लोप हो जाए। मैं चाहती थी, दुनिया के सारे लोग कहीं चले जाएँ, अपने भूत और भविष्य के साथ, अपने आदि और अन्त के साथ, अपने पूरे अस्तित्व के साथ, स्मृति के साथ, नीरो से लगाकर नेपोलियन तक के साथ, बुद्ध से लेकर ईसा के साथ। मैं चाहती थी कि उस विकट वृक्ष का अस्तित्व हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाए जिसकी जडें उस कमअक्ल नाभि-विहीन स्त्री की देह से फूटी थीं। ऐसी कमअक्ल और कमजर्फ औरत जो नहीं जानती कि उसने क्या गुल खिलाये हैं और हमें इसकी वजह से क्या-क्या नहीं भुगतना पडता है!
इतने के बाद माँ मौन हो गयीं। और एलेन, दीवार से पीठ टिकाये, अपना सिर नवाये, फिर से सो गया।
मोटरसाइकिल पर संवाद
दूसरी सुबह, करीब ग्यारह बजे एलेन को अपने दोस्तों रामोन व कैलिबन से लक्जम्बर्ग गार्डन के पास वाले म्यूजियम के सामने मिलना था। अपार्टमेंट से निकलने से पहले उसने अपनी माँ की तस्वीर को गुडबाय कहा। सडक पर उतरकर अपनी मोटरसाइकिल की तरफ जाने लगा जो पास ही खडी थी।
जैसे ही वह मोटरसाइकिल पर सवार हुआ, उसे लगा कोई आकर पीछे बैठ गया हो। उसे मैडलीन की याद आई तो वह मुस्कराया। उसने मोटरसाइकिल स्टार्ट की। तभी उसके पीछे से आवाज आई, मुझे तुमसे कुछ और बातें करनी है।
निश्चित रूप से यह मैडलीन नहीं थी। वह अपनी माँ की आवाज को पहचान गया। ट्रैफिक न के बराबर थी। उसने सुना, मैं यह देखना चाहती थी कि मेरे और तुम्हारे बीच किसी तरह की कोई गलतफहमी तो नहीं।
उसे मोटरसाइकिल रोकनी पडी। एक आदमी रास्ता पार करने के लिए सडक पर उतर आया था। उसने एलेन को घूरती नजरों से देखा, मानो किसी कसूरवार को देखा।
साफ-साफ कहूँ तो मैंने हमेशा यह महसूस किया है कि किसी ऐसे को दुनिया में लाने का क्या औचित्य है जिसका आना खुद उसकी मर्जी से न हुआ हो।
जानता हूँ। एलेन ने कहा।
अपने आस-पास की दुनिया पर नजर डालो। दुनिया में जितने भी लोग हैं, क्या कोई यहाँ अपनी मर्जी से आया है? मैं जानती हूँ, जो मैं कह रही हूँ वह इतना साधारण और तुच्छ है कि शायद ही कोई इसे इस तरह देखता और समझता हो।
काफी देर वह एक कार और एक ट्रक के बीच चलता रहा, जो बार-बार उसे अपनी-अपनी दिशा से दबा रहे थे।
आजकल जिसे देखो वही मानवाधिकारों के बारे में भाषण झाडता रहता है। क्या मजाक है! आपका अस्तित्व ही किसी प्रकार के अधिकार से हीन है। मानवाधिकार के ये समर्थक तो आपको अपनी मर्जी से मरने की भी इजाजत नहीं देते।
ट्रैफिक की बत्ती के लाल होने पर वह रुक गया। दोनों तरफ के पैदल-यात्री सडक पार करने लगे।
माँ कहती रहीं, इन लोगों को देखो। देखो। इनमें से आधे से ज्यादा लोग किस कदर बदसूरत हैं! बदसूरती भी एक तरह का मानवाधिकार हो सकती है क्या? और क्या तुम्हें पता है कि जिन्दगी भर के लिए अपनी बदसूरती को ढोना कैसा लगता है? या फिर लडकी अथवा लडका होना। ये चुनने की आजादी कहाँ मिलती है? या फिर आपकी आँखों की पुतलियों की रंगत? या फिर वह समय जिसमें आपको इस धरती पर होना है? देश? या फिर वह माँ ही, जिससे आपको जनमना है। इनमें से किसी पर हमारा अख्तियार नहीं। आदमी के अधिकारों की जद में बहुत ही मामूली चीजें आती हैं, जिनके लिए आपस में लडने या हाय-तौबा मचाने की कोई जरूरत नहीं!
उसकी मोटरसाइकिल फिर से चल पडी है। माँ की आवाज में नर्मी बहाल होते उसने महसूस किया, तुम यहाँ हो, और ऐसे हो, क्योंकि मैं तब कमजोर पड गयी थी। यह मेरी गलती है। मुझे माफ कर दो।
एलेन थोडी देर चुप रहा। फिर ठंडी आवाज में बोला, इसमें तुम्हारी क्या गलती है! यह कि तुममें इतनी शक्ति न थी कि मुझे जन्म देने से खुद को रोक सको? या फिर यह कि मुझे जन्म देने के बाद मेरे होने से तुम कभी समझौता न कर सकी, और चूँकि यह अब हो ही गया तो क्या किया जा सकता है?
एक पल की चुप्पी के बाद वह बोलीं, शायद तुम ठीक हो। लेकिन इससे मेरा अपराध-बोध दुगुना हो जाता है।
माफी तो मुझे माँगनी चाहिए। एलेन ने कहा, मैं तुम्हारे जीवन में अनायास ही आ गया। मैंने तुम्हारा पीछा करना अमेरिका तक में न छोडा।
माफी माँगना छोडो। तुम मेरी जिन्दगी के बारे में जानते ही कितना हो गधू! मैंने तुम्हें गधा कहा, इसलिए गुस्सा मत हो जाना, लेकिन तुम पूरे गधे ही हो। और तुम्हें पता है, तुममें यह गधापन कहाँ से आता है? तुम्हारी अच्छाइयों से। हास्यास्पद बन जाने की सीमा छूती अच्छाई।
वह लक्जम्बर्ग गार्डन पहुँच गया। उसने मोटरसाइकिल खडी की।
रोकना मत, मुझे माफी माँग लेने दो। एलेन ने कहा, मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। तुमने मुझे इसी रूप में जन्मा है, तुमने और उन्होंने। और मैं अपने इसी रूप में खुश हूँ। मुझे अच्छा लगता है जब हम एक-दूसरे से माफी माँगते हैं- मैं और तुम। परस्पर माफी माँगते रहने से कितना सुकून मिलता है न!
इसके बाद दोनों म्यूजियम की तरफ बढ गये।
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