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दस कविताएँ

अमित कल्ला
चित्रकार प्रभाकर कोलते की कोल्तेस्क्यु प्रदर्शनी के चित्र देखते हुए...
1

नामुमकिन
लगता
उन्हें
समझ पाना
शब्दश-
अनुभव
ही
किया
जा सकता जिसे
वही मर्म समूचा
समझना जहाँ एक
नासमझी है।

2

बूँद-बूँद झरते रंग
बहा देते
फिसल जाती दृष्टियाँ
किन्ही
अहसासों का
निकटतम अस्तित्व
बनाकर
बेखबर
छिपी रेखाओं के
रिश्तों की
बुनावटों से
जहाँ गहरे विचार में डूबे
अक्षर झरते हैं
निर्झर।

3

वापस
लौटने का
अनुनय है उनमें,
भीतर
झाँककर देखने का
एक निमंत्रण,
रंगों की अलिप्तता में,
सहभाग का
संतुलित
संतोष
है।

4

स्याही
से कोरा गया
चित्र
स्वयं ही
उदीप्त होता है
अपने जुडावों के साथ
दिशाओं को भी खींच लेता
समय साकार होकर
उडेलता
खोजता नेपथ्य
प्रकाश के
प्रारंभ की तलाश में।

5

सिर्फ देखना ही
सीखना है जहाँ
संदेहों से
मुक्त होकर
अपनी ठौर को
तलाश लेना
साँस दर साँस
स्वयं को
जानकार
धुँधलकों पार
रंग अंतर में
भूल
जाना है।

6

पूरा का पूरा
संसार
उभर आता
एकांत के
इन लंबे
संवादों में
झलकता है
फ्रेम दर फ्रेम
आकाश को निहारता निश्चय
दृष्टि का ठहरना जहाँ
किसी बिम्ब पर
यथासंभव
स्वीकृति भाव संग
भीतर उतरना है।

7

नीला
अपनी अनंत गहरायी में
समा लेता
परस्पर
काला
बाँध लेता है
मौजूदा
समय स्वभाव
परत दर परत
विजन में डूबी
आकृतियाँ झाँकती हैं
यथासंभव
अलिप्त रेखाओं का सहारा ले
थिर हो जाती
चित्र कविता में।

8
शब्दश-
पढ लेता
इस्तेमाल इबारतें
आशय भी
जान लेता
उनके वहाँ होने का
नाता जोडकर
संबोधित मन
साथ बह निकलता है
सामानांतर
अनुभव स्वीकृत
दृश्य संकल्पनाओं संग।

9

उनकी
रंग संज्ञा
दृश्य संवेदना में
उतार देती है
हृदय
स्थिरता तलाशता
रचना से
मुखातिब
चारों तरफ फैले
अमूर्तन
उजास में।

10

अवश्य ही
ऋषि है वह
विषयों से मुक्त करता
पारदर्शी
सादृश्य
अनुभव संसार रचने वाला
प्रक्रिया सम्मत ऋ षि का अनुयायी
मौजूदा उदित किसी सूर्य जैसा
चमकदार
चिर ध्वनियां
सुनते सुनाते
रंगों को
निर्बाध बरतने वाला
अक्षरश-
दृश्यमयी
उपनिषदों को रचने वाला
ऋषि ही है वह।

सम्पर्क - 43, जोशी कॉलोनी, गली नं. 15,
आदर्श बाजार, टोंक फाटक,
जयपुर- 302015, मो. 9413692123