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आठ कविताएँ

राजुला शाह
1. रेत का समुद्र

रात नींद नहीं आई
रेत का समुद्र
लहर लेता रहा भीतर
बाहर उलट पलट रेखाएँ
इतस्ततः वितान

मरू का लहरिया
कंटीली गाँठों से दामन बचा
ओस की बूँद-बूँद बाँध
सुबह की कोमल धूप में
अपना बंधेज फहराएगा

रात नींद में
दोहराएगा रेगिस्तान
अपना भूला नाम

जो सुबह के स्वप्न-सा
फिर कल तक
बिसर जाएगा ।

2. सफेद कागज

नशा नहीं चढा
सफेद कागज पर मेरा
वह रहा आया
पहले-सा
कोरा

अपने खालीपन पे इतराता
अपने खोखली गूँजों में गर्क
अपने ही नशे में चूर
उन्मत्त अफीमची

कोरे का
गज भर
अजेय विस्तार


3. सुबह

तडाक!

हर बार की तरह
टूट गया तार

आकाश पास सरक आया
पृथ्वी हट गई परे
छुई मुई-सी
हर पकडन से दूर
गेंद की तरह लुढकती
दूर जा छिटकी खेल से।

सूरज का गोला
अलस्सुबह उठ
आकाश में रेंगता
पृथ्वी को अछूता छोड
उठ चला गुब्बारे-सा

मगन वह
कलाबाजयाँ देख सूरज की
अपने छोटे मोटे दुःखों पर
पाँव धरती
चढ गई
गगन की सीढियाँ।


4. प्रार्थना

अब फिर एक बार
सब कुछ
और कुछ नहीं
का नाम- तुम और मैं है।
सब कुछ से गुजरकर
गढी गई मैं की प्रतिमा
ढोल नगाडों की उत्सव थापों पर
सिराने लाई हूँ इस घाट
लौटालने
मिट्टी को मिट्टी में ।

जल को जल
पवन को पवन
अग्नि को अग्नि
आकाश को आकाश में
घुल जाने दो ।

नीला आकाश आँको अब
तुम सिर्फ नीला...
बहुत गहरा, डबडबान,
रोशन रूपहला

मैं होउँ
तो तुम होओ ।
तुम होओ
तो जग होवे
भासमान !


5. शायद कहीं कोई

घिसी-पिटी धरती पर
चिथडा-चिथडा आसमान ।

अपने पंख तौलती
एक अकेली अबाबील
टेरती
धरती की उदासी

टोहती
अनमनी पिपीलिका
के पग नेवर ।

शायद कहीं कोई
सुनता होगा ।
6. अपने घर

नए चमचमाते बाजार में
अपना प्राचीन आप ले
भटकती आत्मा की पुकार
रही अनसुनी

एक अनमनी शाम
वह बिना जले कटे गले
लौट आई
अपने घर
अजर
अमर


7. विरल कथा

इस कथा में है जैसा,
नहीं वैसा कहीं और
दीसे तुम्हें जहाँ जैसा,
यहाँ नहीं ठीक वैसा
यहाँ कैसा हो अन्त?
शुरू कैसा?

जैसे सूरज का फेरा
और सागर का घेरा
हो निरंजन का डेरा
ये घर तेरा ना मेरा

जहाँ बिछडे मिल जाएँ जुडे प्रीत
जहाँ पुरखे मिल गाएँ विदागीत
हो रीत तो मैं रोउँ नहीं मीत
हो हार, तो हो हार की ही जीत
8. ज्ञानी

मन में जो भी तुमने ठानी
होंगे उससे उलट ही मानी
मन डूबे तुम उबरो ध्यानी
संतो की उल्टी ही बानी

सम्पर्क - 4, निराला नगर, भदाभदा रोड, भोपाल-४६२००३
फोन नं. ०७५५२२७७-५३१४