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सात कविताएँ

नन्दकिशोर आचार्य
पगडंडी जब तक है
1. पुनर्नवा

वक्त सब वक्त
जन्म लेता और मरता रहता है
मुझ में
खुद तो मरता ही है
पर कबाड करता जाता है मुझे

कबाडखाना है सब इतिहास

वह कौन है लेकिन
जनमते-मरते
दो पलों के सूने उस अन्तराल में
कबाड होते जाते मुझ में
अपने को पुनर्नवा करता

2. कोई नहीं घर में

कोई नहीं घर में
सूना आँगन देख रहा है
दरवाजे की ओर
दरवाजा मुन्त*ार है
किसी थपकी की खातिर
खुल जाने को आतुर
गोखे बुला रहे आँखें
देखें जो उनके पार का आकाश
गर्द-से भरे फर्श में
बसे हैं सपने बुहारी के

मैं तो यहाँ हूँ लेकिन
कौन है निर्जन घर में
इन्तजार होता!

3. उसके बिना

बार-बार उतारता हूँ
पेड से उसे
और लाद कर ले चलता हूँ
अपने काँधे पर
हर बार लेकिन वह
किसी कथा में उलझा कर मुझको
उड जाता है वापस

कब तक यह जद्दो-जहद
क्यों न बना लूँ मैं
उसके पेड पर ही ठिकाना अपना
नहीं चलता जो मेरा काम
उसके बिना

4. बन्द था चाहे

खुद के अन्दर खुला
एक घर
लगता था यह शहर-
बन्द था चाहे फसील में अपनी

अब जब खुल गया है वह
हर कोई बन्द है उसमें
अपने अन्दर।

5. फिर भी

हरा अब नहीं होगा
जानता है वह
अँकुरा आयी है लेकिन
ठूँठ हो गई शाखों पर
दो-चार कोंपलें कहीं

बारिश का फिर भी
कृतज्ञ है पेड

6. प्रतिगूँज नहीं

प्रतिगूँज नहीं कोई
मेरी ही पुकार है वह
भटक कर लौट आती है
फिर मुझ तक

ठहरे कोई कहाँ
कुछ भी नहीं है जब
वहाँ

7. खला है वस्ल

बूँद-बूँद
इकट्ठा करता हूँ इक उम्र
लेकिन पूरा रीत जाता हूं
मिल कर तुम से
हर बार

खला है वस्ल
खुद में किसी को
खदा कर लेने

- सुथारों की बडी गवाड
बीकानेर - ३३४००५
मो. 9413381045