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हम ही हम तो खेलें

जयप्रकाश मानस
21 मार्च, 2020
सोचा किसने था!
यह लगभग कल्पना से परे था : कि एकबारगी किसी दिन सारे के सारे देश- सारी की सारी मानव बस्तियाँ- उसके सारे के सारे निवासी, एक साथ एकबारगी किसी अदृश्य शत्रु से युद्ध के लिए विवश हो उठेंगे!
सोचा किसने था कि मनुष्य जाति अपने-अपने घरों या आश्रय स्थलों की चारदीवारी के भीतर न चाहते हुए भी खौफ से भरे एकांतवास वाले नायाब कैदी में बदल जाएगा और सारा संसार कोरोना (कोबिड-19) नामक वायरस वाली आतंककारी महामारी के लिए बिना दीवाल वाली खुली जेल की तरह... ।
आज की कडवी वास्तविकता यही है, यही अनचाहा यथार्थ है। अप्रिय सचाई यही कि 80 साल पहले, दूसरा विश्व युद्ध जहाँ महज 70 देशों के बीच लडा गया था, वहीं कोरोना से आज पूरी दुनिया जंग लड रही है।
पौराणिक इतिहास के सहारे कोरोना के विस्तार और उससे जूझने के विश्वव्यापी संघर्ष को मैं सुरसा राक्षसी और हनुमानजी के बीच की घटना की तरह देखता हूँ - जस जस सुरसा बदनु बढावाए तासु दून कपि रूप देखावा। सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा, अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा। सच्चाई भी तो यही है कि कोराना वायरस ज्यों-ज्यों अपना रफ्तार बढा रहा है, त्यों-त्यों विश्व की प्रत्येक व्यवस्था या तंत्र द्वारा सारे संभावित उपायों, रणनीतियों, प्रयासों के साथ उसका रास्ता रोकने का जद्दोजहद किया जा रहा है।

कहाँ जाकर थमेगा यह युद्ध...
29 मार्च, 2020
कोरोना काल : एक अनुभव
यह एकांतवास नहीं, भुनी हुई मूँगफली का ठोंगा है।
मूँगफली को उत्प्रेक्षा में कहें तो-स्मृति।
बाहर से रूपहीन। भीतर से रसदार। छिलके उतारकर फेंकते चलें शून्य की झाडियों में।
हथेलियों पर साबूत ललिहर-ललिहर दाने।
फिर अन्यमस्कता में देर तक दाँतों से काटते रहने का आदिम अभ्यास। किसी असभ्य और उदंड बच्चे की तरह । ऐसी असभ्यताएँ जिसमें अनाहूत उकताहट की कालावधि को भी चबा जाने का हुनर शामिल है ।
ऊपर से जीभ का थोडा-सा नमक हो तो फिर क्या कहने !
वैसे जितना चबाएँगे, उतनी ही पाचन शक्ति और फिर पौष्टिकता का उपहार।
याद रखें - अनुपस्थित जिगरी दोस्तों की भी काल्पनिक उपस्थिति मानकर उन्हें लुत्फ के कुछ दाने जरूर देते चले जाएँ ।
और चलते-भटकते थक जाएँ, तो टँगे हुए छिलकों को उतार लें।
याद रहे - मन के पिछवाडे वाली माटी में उन्हें दबाना न भूलें ।

4 अप्रैल, 2020
एक कवि का अर्थ- दूसरे कवि की कविता में
दिल्ली विश्वविद्यालय में रीडर, डॉ. विनय विश्वासजी यूँ तो पुराने युवा कवि और आलोचक हैं, लेकिन इसी सप्ताह हम दोनों एक दूसरे के नये-नये मित्र बने हैं। फेसबुक पर। कोरोना-काल में। उनकी एक बेहद पठनीय आलोचनात्मक किताब भी है- आज की कविता । अब तक उसके 2-2 संस्करण आ चुके हैं- राजकमल से। बहरहाल...
समकालीन कविता पर उनकी इस मौलिक स्थापना से दुनिया में इन दिनों का कोई भी संपूर्ण और सिद्धहस्त कवि सहमत न हो- मैं तो सहमत हूँ पूरी तरह और जिम्मेदारी के साथ भी :
समकालीन कविता का स्वरूप कुछ ऐसा है कि एक कवि की पंक्तियों का अर्थ दूसरे कवि की पंक्तियों से जुडकर खुलता है । सशक्त होता है । एक कविता की अनुभूति दूसरी कविता की अनुभूति से मिलकर अपने समय की एक समर्थ काव्यानुभूति का निर्माण करती है। बहुत सारी कविताएँ एक साथ पढी जाएँ, तो अधिकांश एक-दूसरे को पूरा करती नजर आती हैं।

5 अप्रैलए 2020
भगवान का अपना बगीचा
हमारे ब्लॉक की छत हमें नीले आसमान से ले जोडती है और बालकनी सीधे *ामीन से। छत-आसमान के नीचे-नीचे उडने वाली पक्षियों से मिलाने का ठीहा और खिडकी- धरती के ऊपर-ऊपर फुदकने वाली पक्षियों से जुडने का। बावजूद इसके मुझे याद नहीं आता- कब इन पक्षियों को मनभर पूरे इत्मीनान से निहारने का मौका मिला था! भीतर ही भीतर बतियाने का भी!
कोरोना काल ने जैसे सौगात ही लिख दी है - छत और खिडकी के द्वार से अपनी भूली-बिसरी दुनिया से जुडने की।
***
तो आज छत और बालकनी का जरूरी कोर्स पूरा कर चुका हूँ । लेकिन अब...
अब क्या घर, क्या कॉलोनी-कहीं से बाहर नहीं निकलना है। घर के बाहर से सरकारी आदेश। घर के भीतर से असरकारी आदेश।
एक पति जितना भी मनमौजी हो - पत्नी और बाल-बच्चों के सामने धीरे-धीरे मनमारू ही बन जाता है - खिडकी के सामने कुर्सी लगाकर बैठा हूँ । जहाँ तक नजर जाती है कॉलोनी की सडक वहाँ तक चमचमाती नजर आ रही है । पहली दफे । न आवाजाही - न चहल-पहल। जैसे राजधानी की कॉलोनी न हो-बचपन वाला गाँव ही हो अपना!
गाँव के बारे में सोच रहा हूँ, तो आँखों में धीरे-धीरे पूर्वोत्तर का मावल्यान्नाँग गाँव उभर रहा है। मैंने शायद लिखा भी कहीं उसकी स्मृतियों के बारे में -
भगवान हो, न हो- मतभेद हो सकता है लेकिन धरती पर एक ऐसा गाँव भी है जिसे बिना किसी मतभेद के कहा जाता रहा है-भगवान का अपना बगीचा।
मेघालय में शिलांग से 90 किलोमीटर, बांग्लादेश सीमा के करीब बसा गाँव- मावल्यान्नाँग !
मावल्यान्नाँग यानी एशिया का सबसे साफ-सुथरा गाँव । मात्र 95 परिवारों वाले इस गाँव के सभी लोग पढे-लिखे हैं। *यादातर लोग अँगरेजी में ही बात करते हैं। आजीविका का मुख्य साधन के नाम पर केवल सुपारी की खेती।
तो इस बगीचे वाले गाँव की सबसे बडी खासियत यह कि पिछले लगभग 100 सालों से इस गाँव की सारी सफाई ग्रामवासी स्वयं करते है, न वे नगरपालिका अधिकारी या किसी पार्षद का मुँह ताकते हैं, न वे अपने किसी प्रधानमंत्री के कहने पर ऐसा करते हैं ।
चाहे महिला हो- पुरुष हो या चाहे बच्चा हो- चाहे बूढा, जिसे जहाँ गन्दगी न*ार आती है, सफाई पर लग जाता है फिर चाहे वो सुबह का वक्त हो, दोपहर का या शाम का और अपने ध्येय से इतना प्यार कि मजाल है सडक पर चलते हुए किसी ग्रामवासी को कोई कचरा दिख जाए और वह सबसे पहले उसे उठाकर डस्टबिन में न डाले ।
मेरी यह खुशनसीबी ही मैं भगवान से नहीं लेकिन इस गाँव के न्यारे लोगों से मिल चुका हूँ- यही कोई चार साल पहले 2016 में !
6 अप्रैल, 2020
महामारी में कविता
नींद है कि उचटी.उचटी । सारे उपायों के बाद अपनी जिद पर अडी हुईं हैं आँखें। दूसरे पहर का संकेत देकर कुत्ते भी गली में कहीं गायब हो चुके हैं । मुख्य मार्ग पर दूर कहीं पुलिस वैन का सायरन अपने धीमे शक्ल में मौजूद ही है ।
फेसबुक पर कुछ ताजी कविताएँ तलाशने लगता हूँ । कुछ खास नहीं मिलतीं। जो हैं कागजी फूल की तरह। जबकि कविता की बाढ-सी उमड पडी है इधर कोरोना काल में...। भला ही हो कोरोना का- उसने लगभग सभी पढे- लिखे को कवि बना दिया है ।
मेरा ओडिया मन कहता है द-जरा और देख लूँ - ओडिया के कवि कैसे अनुभव कर रहे हैं इस विपदा को... । कोरोना पर विगत 25 मार्च को लिखी गई ओडिआ भाषा के समृद्ध कवि हरप्रसाददास जी की समृद्ध कविता। समृद्ध यानी भाषा, बिम्ब, वस्तुविधान, छंद और बौद्धिक सरोकार के मध्य परस्पर संगति बिठाने में मामले भी समृद्ध। समृद्ध यानी केवल नाम से नहीं बल्कि काम से समृद्ध। मूल ओडिया से राधु मिश्र द्वारा अनूदित। दोहराने लगता हूँ-
इक्कीस रातों तक बंद रहेगा नक्षत्र लोक
इक्कीस रातों तक बंद रहेगा
स्वर्ग की सीढी का काम
इक्कीस रातों तक बढना बंद करेंगी
लताओं की लौकियाँ
इक्कीस रातों तक न बढेंगे उँगलियों में नाखून,
न सर में बाल
न बहेगा आँखों का छलछलाता पानी।
एक दिन पगडंडी से उठा कर
मैले रंग के कोलाहल को
रख जाएगा कोई सन्नाटे का
उदास-सा बना कर तार सप्तक पर
गणित में कम*ाोर कोई कृष्ण पक्ष का चाँद
गलती से
पाँव धर देगा आदमी की छाती पर
और चौंक कर कहेगा आरूहा...।

खाँसना मना है इस त्रस्त माहौल में,
हँसना या रोना भी मना है
बुखार तो मना है, इस राहू काल में
बुढापा भी मना है
गृहवंदिनी परियों की शापमुक्ति का समय है
यह संधिकाल
शेष नाग पर सोए हुए की
करवट बदलने की बेला है।
रात गहरी, वीरान सडक ऐसे में
निकल पडा हूँ धरती का भाग्य बदलने
एक हाथ में डंडा लिए, दूसरे में लालटेन
हृदय में भारत माता, तालाबंदी माथे पर।
लौटूँगा मैं बहुत ही जल्द सारे विषाणुओं को
समेट कर
कविता में, बिंब में मारने के लिए
किसी घुप्प अंधेरे में
देखकर अमृत बेला शुक्ल त्रयोदशी के दिन।
मरे तो मर जाए मेरी कविता इस महामारी के संग
धरती पर खुली हवा में जीवित रहे आदमी।

14 अप्रैल, 2020
कोरोना काल के इस सुप्रभात में कबीर भला कैसे याद न आएँ
हम ही सिद्ध समाधि हम ही, हम मौनी हम बोले
रूप सरूप अरूप दिखा के, हम ही हम तो खेलें।
15 अप्रैल, 2020
कोरोना काल : अनुभूतियों का छिटपुट
अवकाश ही अवकाश है लेकिन किसी अतिरिक्त अछोर वाले गुफा की तरह। इधर-उधर टटोलने की कोशिश में पैरों पर केवल किसी अज्ञात अपराध के दंडस्वरूप पहनायी गयी बेडियाँ। महसूसने की कोशिश में केवल नथूनों पर अनचीन्हे प्रजाति के चमगादडों की गंधाती हुई बीट।
संगीत की किसी पुरानी जमीन की ओर चलूँ तों उल्टे पाँव लौटना पडता है - गोया वहाँ आठवाँ सुर बेजाकब्जा किये किसी लठैत की तरह गुर्राता बैठा हुआ हो।
थक-हारकर खिडकी के पास चला जाता हूँ ... व्हाया रायपुर जंक्शन, मुंबई से चलकर हाबडा तक जानेवाली मेल पकडने की कल्पना करके...
कि जल्दी.जल्दी पीछे छूटते चले प्लेटफॉर्म...
कि अनगिनत पेड के ऊपर उडते अनगिनत चिडिया और पेड के नीचे चूल्हा सुलगाते अनगिनत दिहाडी कामगार।
अफसोस... कहीं नहीं जा पाता हूँ। कहीं से नहीं आ पाता हूँ। बैठा रहता हूँ । जैसे विनोद कुमार शुक्ल की दीवार में ही समा हो गयी हो खिडकी। जैसे स्टेशन के आऊटर पर खडी किसी रिजेक्टेट बोगी हो यह खिडकी!
समूचा घर जैसे हजारों वर्ष पुराने अवशेषों में बसा हुआ खंडहर... रूचि संपन्न मित्र पर्यटकों के मानचित्र में जिसका कोई भी अता-पता नहीं । चहल-पहल के नाम पर कुछ *ाल्दी-जल्दी बूढा होता हुआ केवल मैं - हर वक्त इधर से उधर टहलता... सबसे पुराना बांशिदा और चौकीदार भी केवल मैं ।
घर और बाहर के बीच लटकता हुआ एक ताला केवल....
22 अप्रैल, 2020
भयावहता की एक पुरानी कहानी
कोरोना काल ने एकबारगी चौवन-पचपन को भी बचपन की ओर मोड दिया है। मैं भी शायद पीछे मुडने लगा हूँ कुछ-कुछ। जब-जब आप आगे नहीं बढ सकते तब-तब पीछे ही मुडने लगते हैं। पत्थर या मृत पहाड की तरह यथास्थिति में मनुष्य रह भी कैसे सकता है! क्या जब-तब पीछे मुडकर देख-निहार लेना गतिहीनता है- शायद नहीं...
गाँव के मेरे बडे बुजुर्ग बेइंतहा याद आ रहे हैं आज। जो नहीं है आज। नानी भी। वह भी अब कहाँ!
जैसे मैं शाम ढले नानी के करीब ही जा बैठा हूँ । वह कहती चली जा रही है- मैं चुपचाप सुनता चला जा रहा हूँ :
उस दरमियान चारों और भयानक प्लेग रोग फैला था। हैजा एवं चेचक की महामारी से गाँव के गाँव खाली हो जाते थे। गलियाँ पूरी तरह सूनी। लोग गाँव छोडकर झोपडी तथा पेड के नीचे रहते थे। जब तक महामारी रोग समाप्त नहीं होता था कोई भी व्यक्ति गाँव में नहीं लौटता था। झोपडी में पूरा परिवार किसी तरह से 15 से 20 दिनों तक निशब्द पडा रहता था। रोग से बचाव के लिए सिर्फ गरम पानी पीते थे। किसी तरह की दवा नहीं थी। दवा के अभाव में काफी लोगों की मौत हो जाती थी। डर के मारे लोग कुएँ का पानी भी पीना छोड देते थे। प्लेग रोग में व्यक्ति के जाँघ में गिलटी होती थी। उसके दो-तीन दिनों बाद मौत हो जाती थी। दवा के नाम पर सिर्फ और सिर्फ गरम पानी और तुलसी का पत्तों का काढा या अधिक से अधिक दवा के रूप में अभ्रक और लौह भस्म...
बडी मुश्किल से लगभग 70 साल पहले वाली कुछ सच्ची कहानियों के अंधेरे से निकलता हूँ ।
अब मैं बिलकुल अकेले हूँ अपने कमरे में। नानी भी नहीं। नानी थी भी कहाँ यहाँ!
3 मई, 2020
यही हैं वो बशीरभाई !
3 दिन की व्यस्तता के बाद मैं इस समय राजकोट, गुजरात से मेरे मित्र भगवान थावराणी का ईमेल पढ रहा हूँ - पढने के साथ-साथ सहेज कर भी रख लेना चाहता हूँ :
मानस जी, मेरे आराध्य कवि दिवंगत भगवत रावत से जुडी कुछ और स्मृतियों के साथ हूँ मैं। पिछली बार आपको जो बातें बताईं थीं उनमें यह बात छूट गई थी कि उनकी कविताएँ पहले पहल मैंने इंडिया टुडे के साहित्य विशेषांक में पढीं थीं। उस *ामाने में इनके बडे अच्छे विशेषांक रहते थे। पता नहीं, अब भी छपते हैं या नहीं? सात-आठ कविताएँ थी उनकी और सभी की सभी मर्मभेदी। उनकी कविताओं की विशेषता थी, रोजमर्रा की *ांदगी की बातें और उनकी इंसानों वाली भाषाए जो किसी प्रकार के अर्थघटन की कदापि मोहताज नहीं थी। हर कविताओं को पढते समय लगता रहता था कि अरे! ये तो मेरी या मेरे आसपास की ही बात है या यही तो मेरे दिल में भी था!
करुणा के अलावा एक और भी कविता थी उस विशेषांक में जो सीधी दिल में उतर गई थी
प्याज की एक गाँठ
चार रुपए किलो प्याज
आवाज लगाई
बशीर भाई ने
मैं चौंका
वे हँस कर बोले
ले जाइए साहब
हफ्ते भर बाद
यही भाव याद आएगा
अल्लाह जाने
यह सिलसिला
कहाँ तक जाएगा
जेब में हाथ डालते हुए
मैंने कहा
आधा किलो
सुन कर बशीर भाई कुछ बोले नहीं
और एक की जगह
आधा किलो तौलते हुए मेरे लिए
ऐसा लगा
जैसे कुछ मुश्किल में पड गए
उनकी तराजू का
भारी वाला पलडा
हमेशा की तुलना में
आज कुछ कम नीचे झुका
प्याज की एक गाँठ
और उतारें या न उतारें
इस सोच में
उनका हाथ
ग्राहक से रिश्ता तय करता था
एक क्षण को
हवा में रुका
और आखिरकार
बशीर भाई जीत गए !
मैं रास्ते भर
झोले में डाली
प्याज की उस एक गाँठ को
आँखों में लिए-लिए
घर लौटा ...
इस कविता का जिक्र इसलिये भी कर रहा हूँ कि जब मैं पहली बार उनसे मिलने 2003 में भागा-भागा भोपाल गया था तब वो मुझे एक बार उस सब्जी मंडी में ले गए थे जहाँ से वे हमेशा सब्जियाँ खरीदते थे। मैंने देखा, वो किसी भी सब्जी वाले से कोई मोल-तोल नहीं कर रहे थे और सब उनसे प्रसन्न भाव से मुस्कुरा कर बात कर रहे थे, जैसे उन्हें अच्छी तरह जानते हों! ऐसे में हम एक प्याज के गल्ले पर पहुँचे, तो उन्होंने मेरी ओर मुखातिब होकर कहा, प्याज की एक गाँठ याद है?

मैंने हामी भरी तो उन्होंने प्याज वाले सज्जन की ओर देख कर कहा, यही हैं वो बशीरभाई ! मैं अवाक ! धन्यभाव के अलावा महसूस भी क्या कर सकता था!
सामान्य लोगों, मजदूरों, रो*ा का कमाके रो*ा खाने वालों के प्रति उनमें एक *ाबरदस्त सहानुभूति थी जो मुझे हमेशा विरल लगती थी, तब भी और अब तो और भी।
कुछ और भी संस्मरण हैं। मानस जी, वह सब फिर कभी...
29 मई, 2020
चीटियों को ऊँची आवा*ा पसंद नहीं
माटी की सिपाही हैं चींटियाँ । गुड, गोरस या मिठाई, जो भी अतिरिक्त हों, एक दिन सब चट कर जाती हैं चींटियाँ । चींटियों का काम है धरती पर सब कुछ चट कर जाना। किन्हें? उन्हें, जो ठीक से संभाली जाती नहीं। उन्हें, जो खुली पडी रहती हैं कहीं भी। धरती पर अकारज। जैसे कंजूस की तिजौरी में उदास पडा धन।
चींटियाँ धरती पर सबसे बडी सफाई कामगार हैं। उन्हें कुछ भी इधर-उधर व्यर्थ पडा भाता नहीं । वे कभी किसी को नहीं रोकती । न टोकती । बस चिढती हैं कि इतना ना इकट्ठा करो कि वह न आफ काम आये और दूसरों को भी सताये।
बहुत लघु जीव है चींटियाँ परन्तु पर्वत भी ह*ाम कर जातीं हैं वे। उनकी दाँत बहुत ते*ा हैं। मनुष्य के लोभ और लाभ के नुकीले डाढों से कहीं अधिक धारदार। वे जड से फूल और मकरंद तक सब चाट जाती हैं।
चींटियों की पहुँच असीमित है। चींटिया हमसे पहले भी उपस्थित थीं। वे ही रहेंगी हमारे सौ-सौ जनमों के बाद। माटी के भीतर। माटी के संसार में। व्यर्थ को माटी में अर्थ देते रहने के लिए।
चींटियों को ऊँची आवाज पसंद नहीं। चींटियों को यूँ किसी की गरमी बर्दास्त नहीं। प्यार से उन्हें स्पर्श कर लें - लजा-लजा जाती हैं। मन ही मन गुनगुनाती हैं। कहतीं हैं जैसे- प्यार कोई मौन गीत है। बेआवा*ा संगीत है।
माटी की चींटियाँ सपनों को भी लपक लें, इससे पहले हम अपनी-अपनी नींदों को सहेज लें। समेट लें। फिर उन्हें कोई एतरा*ा नहीं।
31 मई, 2020
मन और आत्मा
कविता रचने के लिए नदी जैसा मन होना चाहिए - कवि बने रहने के लिए पहाड जैसी आत्मा।
कितना खाएँ-कितना बाँटे!
ऐसे ही दिनों गाँव से भतीजी से खबर आया करती थी :
काका, काका! कल यहाँ रहते तो मन भर देसी आम का मजा लेते। कल के आंधी-तूफान से घर कच्चे-फ आमों से पट गया है। कितना खाएँ-कितना बाँटे! आप लोग तो खरीद-खरीद कर रायपुर में....!
अब नहीं आती... शायद इसलिए कि भतीजी चली गई ससुराल! शायद इसलिए कि अब गाँव में आँधी ही न आ रही हो ! शायद इसलिए भी अब आम भी ठीक से न आते हों...
मन ही मन
क्या दुनिया पृथ्वी का पर्यायवाची है?
जबसे घर का चूल्हा बदला
बालकवि बैरागी जी को मैं प्रायमरी कक्षा से पढता चला आ रहा हूँ । अन्य बडे कवियों की तरह वे कभी बासी नहीं होते ।
सबसे अहम् यह कि निहायत सरल और चित-परिचित शब्दों में अपरिचित अर्थ दे जाते हैं । इतना ही नहीं, फट्ट से स्मृति के घर में स्थायी डेरा जमा लेने वाली पँक्तियाँ ।
साहित्य अमृत के जून, 2017 वाले अंक में उनकी एक कविता (गजल) प्रकाशित हुई थी। युग बीते । वहीं से दो-तीन शेर गुनगुनाते हुए :
युग बीते संवाद नहीं है।
कब बोले कुछ याद नहीं है ।
सूरज से पहले उठ जाना
मुरगे का अपराध नहीं है ।
और
जबसे घर का चूल्हा बदला
पहले जैसा स्वाद नहीं है ।
0
आज की नितांत नयी पीढी शायद इस पर विश्वास न करे किन्तु हमारे संघर्ष और उस विपत्ति पर विजय पाने की यही दुखद कहानी है । भविष्य की आगत पीढी भी कदाचित विश्वास नहीं करेगी कि आज किस तरह बडे से बडा, साधारण से साधारण और आम-जन किस तरह कोरोनों के आऋमणों और उससे उत्पन्न विपरीत और अवांछित परिस्थितियों से जूझकर अपनी जिजीविषा को साबित करने में शिद्दत से जूझ रहा है। क्या व्यापारी, क्या मजदूर- क्या अमीर, क्या गरीब- क्या घर क्या परदेश ! जो जहाँ है एक सर्वव्यापी युद्ध में शामिल है। संक्रमण होने से पहले ही स्वयं को निरापद रूप से बचा ले जाने के लिए। सबसे चिंता का सबब तो यह भी कि कोरोना जन्य परस्थितियों के हल के रूप में घरबंदी से अधिसंख्य जनता की समूची जीवन पद्धति ही आमूल चूल परिवर्तन की ओर अग्रसर है। यद्यपि इस भीषण काल में विकासशील अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य सुविधा वाले समाज के लिए यही रामबाण औधषि भी है।
11 मई, 2020
कविता की पढाई का नतीजा
कविता की पढाई-लिखाई पर आज सोचते-सोचते प्रतिष्ठित कवि-आलोचक-विचारक अशोक वाजपेयीजी के कहे पर भी सोचना जरूरी प्रतीत होता- झूठ कहाँ है यह, यही तो हो रहा :
विश्वविद्यालय स्तर पर कविता की पढाई का नतीजा यह है कि हिंदी साहित्य में प्रति वर्ष जो हजारों छात्र एम.ए. करके निकलते हैं उनमें से अधिकांश फिर जीवन भर साहित्य, खासकर कविता की ओर वापस नहीं आते।
*यादातर लोग, जिनमें स्वयं हिंदी अध्यापक शामिल हैं, पाठ्यपुस्तकों में विवश जो कविताएँ पढते हैं उनके अलावा जीवन-भर फिर कविताएँ नहीं पढते। इसके बावजूद कविताएँ लिखी जाती हैं. आदिवासी, दलित, गरीब, स्त्रियाँ यहाँ तक कि तालिबान तक कविता लिखते हैं।
हिंदी में हँसोड और भावुक-लिजलिजी कविता के हजारों श्रोता हैं और अच्छी कविता के बहुत कम। जाहिर है कि इन प्रवृत्तियों के पीछे कविता पढाने की दकियानूस और नीरस विधियों की बडी भूमिका है।
साँप-सीढी के खेल का वर्तमान स्वरूप 13वीं शताब्दी में कवि संत ज्ञानदेव द्वारा तैयार किया गया था।
ज्यादातर भारतीयों ने साँप-सीढी का खेल खेला ही होगा! यह सिर्फ एक खेल ही नहीं है, इसे देखते ही बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। स्कूल में पढाई के दौरान, गर्मियों की छुट्टी में जब सारे कजिन एक साथ मिलते तो, साँप-सीढी का खेल सबसे आम और खास भी होता।
भारत में इसे मोक्षपातम्् या परम् पदम्् कहते थे। हिन्दू धर्म के मूल सिद्धान्तों की शिक्षा देने के लिये किया जाता था। अंग्रेजों ने इसे स्नेक्स् एण्ड लैडर्श् नाम दे दिया। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इसका आविष्कार तेरहवीं शती के सन्त ज्ञानेश्वर... नया मोक्षपथ का अर्थ है मोक्ष के लिए एक पथ, हिन्दू मान्यता के अनुसार जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म कर्म के ऊपर आधारित है । इस खेल की मुलाकात पश्चिमी सभ्यता से 1892 में हुई और इसका नाम शूट्स एंड लैडर Chutes and Ladders रख दिया गया।
कई जगहों पर इसे लीला नाम से भी जाना जाता था। लीला नाम होने के पीछे की वजह थी मनुष्य का धरती पर तब तक जन्म लेते रहना, जब तक वह अपने बुरे कर्मों को छोड नहीं देता।
पुराने समय में यह ज्ञान चौपड नाम से भी जाना जाता था। इसका अर्थ है ज्ञान का खेल। हिंदू अध्यात्म के अनुसार ज्ञान चौपड मोक्ष का रास्ता दिखाता है। यह बार-बार जन्म लेने की प्रक्रिया से मुक्ति दिलाता था।
प्रत्येक चौखाना गुण या अवगुण को दर्शाता हैं। उदाहरण के लिए, जिस चौखाने में सीढी होती वह गुण का है जो आपको आगे बढाता है। जबकि जिस चौखाने में साँप का फन होता है वह मौजूद बुराइयों को दर्शाता है। जिसकी वजह से आप हमेशा नीचे हो जाते हैं।
यह साँप-सीढी का खेल जैन, हिंदू और इस्लामिक रूपान्तरों को सहेज कर रखा गया है। पहले यह अक्सर, कपडों इत्यादि पर बना हुआ होता था। 18वीं शताब्दी के बाद यह बोर्ड पर बनने लगा। आज भी भारत में पला-सेना काल के समय के साँप-सीढी का बौद्धिक रूपांतर मौजूद है।
19वीं शताब्दी के दौरान, भारत में उपनिवेशकाल के समय यह खेल इंग्लैंड में जा पहुँचा था। अंग्रेज अपने साथ यह खेल अपने देश में भी लेकर गए। उन्होंने अपने हिसाब से इसमें थोडे फेरबदल कर दिए।
खेल में कुछ बदलावों के बाद नये नाम स्नेक एंड लैडरर्स से मशहूर हुआ। अंग्रेजों ने अब इसके पीछे के नैतिक और धार्मिक रूप से जुडे हुए विचार को हटा दिया था। अब इस खेल में साँप और सीढियों की संख्या भी बराबर हो चुकी थी। जितने साँप उतनी ही सीढियाँ।
इंग्लैंड के बाद यह खेल अब संयुक्त राज्य अमेरिका में भी जा पहुँचा। साल 1943 में यह अमेरिका में प्रचलन में आया। अमेरिका को इस साँप.सीढी के खेल से मिल्टन ब्रेडले ने परिचय करवाया वहाँ इस खेल का नाम अब हो गया था शूट बीनजम एंड लैडरर्स
इस खेल की खास बात यह है कि इसमें आप अपना दिमाग नहीं चला सकते हैं। यह पूर्ण रूप से किस्मत का भी खेल है।
बडे-बडे कर्मठ और कर्मवीरों इन दिनों भाग्यवादी और प्रकृतिवादी बताते नहीं थक रहे हैं। मैं भी कुछ।

एफ-3, आवासीय परिसर,
छत्तीसगढ माध्यमिक शिक्षा मंडल,
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छत्तीसगढ, पिन - 492001
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