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गाँधी का उच्च शिक्षा संबंधी चिन्तन

अम्बरीश त्रिपाठी
जिस प्रकार एक पौधा वट वृक्ष की तरह विशाल तभी बनता है जब उसकी जडें जमीन को भेदते हुए गहरे धँसते जाए पैठते जाए। ठीक उसी प्रकार जैसे जैसे गाँधी भारतीय संस्कृति, परंपरा एवं जीवन मूल्यों को आत्मसात करते गए, भौगोलिक सीमाओं को पार करते गए उनका सामान्य व्यक्तित्व विराट होता गया। उन्होंने न केवल भारत अपितु विश्व समुदाय से मानव मात्र के लिए उपयोगी मूल्यों का समाहार किया। इसीलिए पृथ्वी के दिक-दिगंत तक आज भी गाँधी आदरणीय और अनुकरणीय हैं।
अपने अत्यंत सक्रिय और व्यापक जीवन यापन के दौरान उन्होंने मनुष्य एवं मनुष्यतर के जीवन के लगभग सभी आयामों पर गहन चिंतन किया है। मातृभाषा में अध्ययन हो चाहे प्राथमिक शिक्षण या युवाओं से संबंधित उच्च शिक्षा के विभिन्न आयाम मसलन-नए विश्वविद्यालय, स्वावलंबी शिक्षा,स्त्रियों की शिक्षा, सहशिक्षा, अध्यापक एवं पाठ्यक्रम इत्यादि इन सब मुद्दों पर गाँधीजी का विशद चिंतन मिलता है।
उच्च शिक्षा पर गाँधीजी ने हरिजन, हिंदी नवजीवन एवं यंग इंडिया के संपादकीय में विचार किया है। इन पत्र-पत्रिकाओं में तथा सच्ची शिक्षा नामक लेख एवं रचनात्मक कार्यक्रम के अंतर्गत उच्च शिक्षा से संबंधित महात्मा गाँधी के विचार उच्च शिक्षा की एक मुकम्मल तस्वीर पेश करते हैं।
गाँधी चिंतन के आलोक में आज जब हम उच्च शिक्षा पर विचार कर रहे हैं तो हमें वर्तमान समय में अकादमिक जगत की चुनौतियों को मोटे तौर पर देखना समीचीन होगा । माता-पिता के लिए जहाँ आर्थिक उपार्जन प्रमुख है, वहीं शिक्षकों के लिए विवेकवान एवं ज्ञान-विज्ञान संपन्न व्यक्ति बनाना है । समाज और देश के लिए शिक्षा का उद्देश्य, बच्चे के एक लोकतांत्रिक नागरिक के तौर पर विकसित होने की दरकार में निहित है। इन चुनौतियों को हम मुख्य रूप से चार वर्गों में रेखांकित कर सकते हैं-
पहली चुनौती युवाओं के व्यक्तित्व निर्माण की है। किस प्रकार युवा अध्ययन के द्वारा अपने स्वतंत्र एवं स्वायत्त व्यक्तित्व को बना पाएँ। दूसरी चुनौती, पहले से ही जुडी है। किस प्रकार औद्योगिक जगत युवाओं की शिक्षा में सहभागी बने और देश के युवाओं को ऐसी शिक्षा मिले ताकि उद्योगों के नियोजन में वे अपना समुचित योगदान दे सकें। तीसरी चुनौती, शिक्षित युवा के सजग नागरिक बन देश और समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने हेतु तैयार करने की है । चौथी चुनौती, समाज में ज्ञान की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने की है। किस प्रकार ज्ञान को कर्म से जोडा जाए और प्रत्येक कर्म के महत्त्व को प्रतिष्ठित किया जाए। आजादी के इतने सालों बाद भी इन मानकों पर हम कहीं नहीं ठहरते। असल में, इनकी जडें औपनिवेशिक शासन के 200 वर्षों में गहरे धँसी हुई हैं। उनको समझने के लिए उस पृष्ठभूमि के साथ साथ उस काल के सबसे सक्रिय जननायक, प्रखर चिंतक और स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने वाले मोहनदास करमचंद गाँधी के उच्च शिक्षा संबंधी चिंतन को देखना बहुत जरूरी है।
आज से लगभग 100 साल पहले गाँधीजी के उच्च शिक्षा चिंतन के केंद्र में भी कमोबेश यही चुनौतियाँ ही थीं। शिक्षा उनके लिए वह साधन था जो युवाओं में स्वतंत्र चेतना विकसित करें और उन्हें स्वावलंबी बनाकर देश के स्वाधीनता आंदोलन को गति दे सके। औपनिवेशिक भारत में ईसाई मिशनरियों ने अपने धर्म के प्रसार हेतु भारतीय ज्ञान परंपरा और उनके ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक समझा। उन्होंने भारतीय भाषाओं का अध्ययन किया,संस्कृत से अनेकों पौराणिक-दार्शनिक ग्रंथों का अनुवाद किया। अंग्रेजों ने भारतीयों पर लंबे समय तक शासन करने के उद्देश्य से भारत के इतिहास और संस्कृति पर अन्वेषण कार्य के साथ आधुनिक ढंग के स्कूल और कॉलेज भी खोले। उन्होंने भारतीयों को अंग्रेजी शासन का वफादार बनाने तथा निचले दर्जे के कर्मचारियों हेतु आवश्यक अंग्रेजी ढंग की शिक्षा देने की व्यवस्था शुरू की। इसकी पडताल करते हुए के. दामोदरन लिखते हैं कि शिक्षा एक ऐसा सूक्ष्म अस्त्र था, जिसे अंग्रेजों ने भारत में अपने प्रभुत्व को सुदृढ बनाने के लिए इस्तेमाल किया।यह एक साथ ही भारत के निवासियों को ब्रिटिश सम्राट के प्रति वफादारी में प्रशिक्षित करने और साथ ही जीवन के संबंध में पश्चिमी विचारों और पद्धतियों को प्रचारित करने की एक व्यवस्था की।अंग्रेजों ने सोचा कि अंग्रेजी शिक्षा की नई प्रणाली ,जिसके अंतर्गत साहित्य, इतिहास तथा विज्ञानों की शिक्षा देने की व्यवस्था थी, भारतवासियों में अपने ओछेपन की भावना को जागृत करेगी। और स्वयं अपनी संस्कृति तथा परंपराओं के प्रति उनमें घृणा पैदा करेगी, जो ब्रिटिश शासन के गौरव से जनता के मस्तिष्क को प्रभावित करने के लिए जरूरी है।(भारतीय चिंतन परंपरा,पृष्ठ 341)।
दरअसल 18 वीं सदी के शुरुआत से ही अंग्रेजी शासन भारतीय साहित्य, संस्कृति, इतिहास एवं दर्शन को तुच्छ और हेय साबित कर भारतीयों के साथ ही विश्व समुदाय में यह भ्रम फैला रहे थे कि हम भारत को सभ्य बनाने के लिए शासन कर रहे हैं। ब्रिटेन में अपनी पढाई के दौरान गाँधी ने इस औपनिवेशिक षडयंत्र को बारीकी से समझा। उन्होंने ये जाना की लार्ड मैकॉले 1834 के शिक्षा कार्यवृत्त में इस दासता की नींव रख रहा था। मैकॉले सर्वप्रथम भारतीय भाषा पर कुठाराघात करता है- यहाँ के देशी लोग जो बोलियाँ आम तौर से बोलते हैं, वे बहुत गयी-बीती और कर्कश है। समस्त भारतीय और अरबी साहित्य का अवमूल्यन कर वह यहाँ तक कहता है कि-एक अच्छी योरोपीय लाइब्रेरी की एक अलमारी ही भारत और अरब के समूचे देशी साहित्य के मुकाबले बहुत है।
मैकॉले अपने कार्यवृत्त में भारतीय ज्ञान परंपरा को उपयोगी ज्ञान से शून्य, झूठ से भरा इतिहास और झूठा धर्म, दर्शन बताकर अंतिम गद्यांश में अपना घृणित मंतव्य रखता है - हमें इस समय एक ऐसा वर्ग पैदा करने में पूरी शक्ति लगानी चाहिए, जो हमारे और उन लाखों लोगों के बीच, जिन पर हम शासन करते हैं, दुभाषिये का काम कर सके- ऐसे लोगों का एक वर्ग, जिनका रक्त और रंग भारतीय हो, किंतु जो रुचि, विचारों, नैतिकता और बुद्धि की दृष्टि से अंग्रेज हों। (मैकॉले-प्रोज एंड पोयट्री, पृ.724-29)
मैकॉले के लगभग 70 साल बाद गाँधी भारतीय शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा करते हुए हिन्द स्वराज में लिखते हैं कि मैकॉले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी। हालांकि गाँधी मैकॉले के प्रति थोडी उदारता दिखाते हुए कहते हैं कि उसने इसी इरादे से अपनी योजना बनाई थी, ऐसा मैं सुझाना नहीं चाहता। लेकिन उसके काम का नतीजा यही निकला है। (पृष्ठ74-75)। गाँधी जानते थे कि किसी भी देश का वर्तमान एवं भविष्य उसका युवा वर्ग होता है। वे यह देख रहे थे कि इस अंग्रेजी शिक्षा नीति के कारण हमारे ग्रैजुएट अधिकतर निकम्मे, कम*ाोर, निरुत्साही, रोगी और कोरे नकलची बन जाते हैं। उनमें खोज की शक्ति, विचार करने की ताकत ,साहस, धीरज, बहादुरी ,निडरता आदि गुण बहुत क्षीण हो जाते हैं। (सच्ची शिक्षा प्रक.2,पृ.11)
इसीलिए आगे चलकर यंग इंडिया के संपादकीय (27-4-21) में वो बिल्कुल साफ लिखते हैं कि शिक्षा-प्रणाली इस शासन-प्रणाली का सबसे दोषयुक्त अंग है।
शिक्षा पर विचार करते हुए गाँधीजी ने विदेशी भाषा के विकास और देशी भाषाओं की उपेक्षा को भारत का सबसे बडा दुर्भाग्य माना। हिंदी नवजीवन में 2 सितंबर 1921 को लिखते हैं विदेशी माध्यम ने हमारे बालकों को अपने ही घर में पूरा विदेशी बना दिया है।यह वर्तमान शिक्षा प्रणाली का सबसे बडा करुण पहलू है। विदेशी माध्यम ने हमारी देशी भाषाओं की प्रगति और विकास को रोक दिया है। 1928 में हिंदी नवजीवन में ही उन्होंने ऐसे लोगों की उन मान्यताओं को खारिज किया है की उच्च शिक्षा में ज्ञान केवल विदेशी भाषा में ही प्राप्त किया जा सकता है या यह कि वैज्ञानिक विचार स्वतंत्रता की चेतना आदि विदेशी भाषा से ही संभव है। गाँधी स्पष्ट रूप से लिखते हैं कि भाषा तो अपने बोलने वालों के चरित्र और विकास का सच्चा प्रतिबिंब है। विदेशी शासन के अनेक दोषों में देश के नौजवानों पर डाला गया विदेशी भाषा के माध्यम का घातक बोझ इतिहास में एक सबसे बडा दोष माना जाएगा। इस माध्यम ने राष्ट्र की शक्ति हर ली है विद्यार्थियों की आयु घटा दी है उन्हें आम जनता से दूर कर दिया है और शिक्षा को बिना कारण खर्चीला बना दिया है।
शिक्षा गाँधीजी के लिए व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम थी। उनका मानना था की बच्चे के शरीर को शिक्षित करने में शारीरिक शिक्षा(योग,कसरत आदि), बुद्धि को अक्षर ज्ञान अर्थात बौद्धिक कसरत की आवश्यकता है। इसके साथ ही गाँधी आत्मा की शिक्षा की आवश्यकता पर बहुत बल देते हैं।आत्मिक शिक्षा किस प्रकार दी जाए इसे लेकर गाँधीजी विभिन्न तरीकों को आजमाते हैं- बालकों से भजन गवाकर, नीति की पुस्तकें पढवाकर, पर उन्हें इन तरीकों से वांछित परिणाम नहीं मिला। अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आत्मा की शिक्षा आत्मिक कसरत द्वारा ही दी जा सकती है । अपनी आत्मकथा के आत्मिक शिक्षा पाठ में वे एक बहुत महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचते हैं । लिखते हैं- आत्मा की कसरत शिक्षक के आचरण द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। अतएव युवक हाजिर हों चाहे ना हो शिक्षक को सावधान रहना चाहिए । लंका में बैठा हुआ शिक्षक भी अपने आचरण द्वारा अपने शिष्यों की आत्मा को हिला सकता है। मैं स्वयं झूठ बोलूँ और अपने शिष्यों को सच्चा बनाने का प्रयत्न करूँ, तो वह व्यर्थ ही होगा। डरपोक शिक्षक शिष्यों को वीरता नहीं सिखा सकता । व्यभिचारी शिक्षक शिष्यों को संयम किस प्रकार सिखाएगा? इसके साथ ही गाँधीजी विद्याध्ययन हेतु विद्यार्थियों के उम्र के आधार पर तीन चरण का उल्लेख करते हैं। भिन्न चरणों में अलग-अलग कार्यों का सीखना भी निर्धारित करते हैं। गाँधीजी की प्रगतिशील दृष्टि तीसरे काल में देखी जा सकती है, जो सोलह से पचीस वर्ष का समय है। उनके अनुसार इस काल में प्रत्येक युवक और युवती को उसकी इच्छा और स्थिति के अनुसार शिक्षा मिले।
स्वतंत्र व्यक्तित्व निर्माण के साथ ही गाँधीजी स्वायत्त या आत्मनिर्भर व्यक्तित्व की प्राप्ति कराना भी शिक्षा का कार्य मानते थे। इसके लिए वो शिक्षा को श्रम से जोडने की जोरदार वकालत करते थे। गाँधीजी ने औपचारिक शिक्षा को मनुष्य की शिक्षा के कई साधनों में से केवल एक साधन माना। वह शिक्षा को उत्पादन के साधन के रूप में ही देखते हैं। वह कहते हैं कि जिस देश में लाखों आदमी भूख से मरते हैं, वहाँ बुद्धिपूर्वक किया जाने वाला श्रम ही सच्ची प्राथमिक शिक्षा या प्रौढ शिक्षा है। इसीलिए गुजरात में विद्यापीठ की स्थापना के समय सन 1920 के भाषण में वो कहते हैं- इसकी स्थापना का हेतु केवल विद्यादान या विद्या देना नहीं है।विद्यार्थी के लिए गुजारे का साधन जुटाना भी एक उद्देश्य है।
गाँधीजी तत्कालीन भारत की परिस्थितियों को समझ रहे थे। वे देख रहे थे कि आर्थिक रूप से शोषित भारत की निर्धन जनता शिक्षा पर खर्च करने में समर्थ नहीं है। इसीलिए वे मानते थे कि अगर शिक्षा को अनिवार्य या लडके-लडकियों के लिए सुलभ बनाना हो तो स्कूल-कॉलेजों को प्रायः स्वावलंबी होना होगा। वे यंग इंडिया (2/8/28) में लिखते हैं कि हम गरीब विद्यार्थियों को फीस की माफी आदि की सुविधा दें, उससे क्या यह *यादा अच्छा नहीं होगा कि हम उनके लिए ऐसा कोई काम दें जिसे करके वे अपना खुद खर्च निकाल लें? गाँधीजी अमेरिका और ब्रिटेन के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का उदाहरण देते हुए यह भी रेखांकित करते हैं कि श्रम या काम कमतर या श्रेष्ठतर नहीं होता है। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि सैद्धान्तिक ज्ञान का व्यावहारिक ज्ञान से प्रत्यक्ष संबंध हो। स्नातक विद्यार्थी,अपने पैरों पर खडा हो सके ऐसी शिक्षा होनी चाहिए।
गाँधी देश को गुलाम बनाये रखने वाली मैकॉलीय चाल समझ रहे थे। कल के भारत को लेकर उनकी दृष्टि बहुत साफ थी। देशी भाषा की बात करने के साथ ही वो 31 जुलाई 37 को हरिजन में लिखते हैं- मैं कॉलेज की शिक्षा में कायापलट करके उसे राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुकूल बनाऊँगा। यंत्रविद्या के तथा अन्य इंजीनियरों के लिए डिग्रियाँ होंगी। वे भिन्न-भिन्न उद्योगों के साथ जोड दिए जाएँगे और उन उद्योगों को जिन स्नातकों की जरूरत होगी उनके प्रशिक्षण का खर्च वे उद्योग ही देंगे। इनके विचारानुकूल देश की आजादी के बाद टाटा- बिडला ने ऐसी इंजीनियरिंग संस्थान खोले भी जिसमें कम से कम पैसे में भारतीय प्रतिभाओं का पल्लवन हुआ। लेकिन यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि हिन्द स्वराज में गाँधी ने जिस तरह तकनीकी केंद्रित सभ्यता की आलोचना की थी उसी प्रकार बाद तक भी वे तकनीकी केंद्रित शिक्षा को भी प्राप्य नहीं मानते थे।1944 में नेहरू को लिखे एक पत्र में यूरोप और अमेरिका वाली आधुनिक तकनीकी आधारित शिक्षा पर टिप्पणी करते हुए गाँधी कहते हैं कि हमें भारत को ब्रिटेन, अमेरिका का 5वाँ, 6वाँ edition(संस्करण) नहीं बनाना है।
गाँधीजी इसी तरह वाणिज्य-व्यवसाय वालों को अपना कॉलेज चलाने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि डॉक्टरी के कॉलेज प्रामाणिक अस्पतालों के साथ जोड दिए जाएंगे क्योंकि यह धनवानों में लोकप्रिय हैं। इसलिए उनसे आशा रखी जाती है कि वे स्वेच्छा से दान देकर डॉक्टरी के कॉलेजों को चलाएंगे। और कृषि कॉलेज तो अपने नाम को सार्थक करने के लिए स्वावलंबी होने ही चाहिए। गाँधीजी कला कॉलेज सरकार द्वारा चलाए जाने के खिलाफ थे उनका मानना था कि जो खानगी कला कॉलेज स्वाबलंबी है वह तो चलें, लेकिन सरकार ऐसे कला कॉलेजों का खर्च वहन करें यह उचित नहीं है। उनका साफ मानना था कि भारत जैसे देश में अभी कला और साहित्य की इतनी आवश्यकता नहीं है । नए प्रांतों में नए विश्वविद्यालयों को कायम करने के वह खिलाफ थे। वह कहते थे कि आज हर राज्य वाले जैसे गुजरात गुजराती के लिए महाराष्ट्र मराठी के लिए कर्नाटक कन्नड के लिए उडीसा उडिया के लिए और आसाम आसामी के लिए विश्वविद्यालय चाहता है । उनका मानना था कि यह बहुत अनुचित और जल्दबाजी भरा कदम है। नए विश्वविद्यालयों के लिए उचित पृष्ठभूमि होनी चाहिए। विश्वविद्यालय हो उसके पहले उनका पोषण करने वाले स्कूल और कॉलेज होने चाहिए जहाँ अपनी अपनी प्रांतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा दी जाए। विश्वविद्यालयों के पास शिक्षकों का एक बडा भंडार होना चाहिए। उसके संस्थापक दूरदर्शी होने चाहिए।
धार्मिक शिक्षा अध्ययन अध्यापन को लेकर भी गाँधी ने विशद विचार किया है। वो कहते हैं कि सरकारी स्कूल कॉलेजों से निकले हुए अधिकतर लडके धार्मिक शिक्षण से कोरे ही होते हैं इसमें कोई शक नहीं है। मैं जानता हूँ कि इस विचार वाले लोग भी हैं कि सार्वजनिक स्कूलों में सिर्फ अपने अपने विषयों की ही शिक्षा देनी चाहिए। मैं यह भी जानता हूँ कि हिंदुस्तान जैसे देश में जहाँ पर संसार के अधिकतर धर्मों के अनुयाई मिलते हैं और जहाँ एक ही धर्म के इतने भेद और उपभेद हैं धार्मिक शिक्षण का प्रबंध करना कठिन होगा लेकिन अगर हिंदुस्तान को आध्यात्मिकता का दिवाला नहीं निकालना है, तो उसे धार्मिक शिक्षा को भी विषयों के शिक्षण के बराबर ही महत्त्व देना पडेगा। गाँधीजी का स्पष्ट मानना है के धार्मिक शिक्षा को पाठ्यक्रम के निर्माण में इस तरह शामिल करना चाहिए कि दूसरे धर्मों के सिद्धांतों का अध्ययन भी शामिल हो। इसके लिए विद्यार्थियों को ऐसी तालीम दी जानी चाहिए जिससे वे संसार के विभिन्न महान धर्मों के सिद्धांतों को आदर और उदारता पूर्वक सहनशीलता की भावना रखकर समझने और उनकी कदर करने की आदत डालें। लेकिन गाँधी जी को इस धार्मिक शिक्षा देने में आने वाली कठिनाइयों और चुनौतियों का भी ध्यान था इसीलिए वह सावधान करते हुए कहते हैं कि परंतु एक नियम ऐसा है जिसे सब महान धर्मों का अध्ययन करते समय हमेशा ध्यान में रखना चाहिए और वह यह है कि अलग-अलग धर्मों का अध्ययन उनके माने हुए भक्तों की रचनाओं के द्वारा ही करना चाहिए। अर्थात गाँधीजी सहृदय भक्त या कवियों की रचनाओं को ही धार्मिक शिक्षा के मेरुदंड ग्रंथ के रूप में शामिल करने को सर्वथा उचित मानते हैं। वे जानते थे की सहृदय भक्त और कवि ही सभी धर्मों के मूल में स्थित दया करुणा प्रेम क्षमा और मानवता के लिए यथोचित मूल्यों को सक्षम रूप से प्रस्तुत करने में समर्थ हैं। इसीलिए वह किसी ज्ञानी विद्वान या कट्टर धार्मिक वर्ग के ग्रंथों को पाठ्यक्रम में शामिल करने के प्रति सचेत करते हैं।
वर्तमान समय में हम शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण के बढते प्रभावों को देख सकते हैं। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक उद्योग एवं व्यापारिक घराने व्यापक रूप से शैक्षणिक संस्थानों का संचालन कर रहे हैं। पर यह संचालन गाँधी के विचारों से कोसों दूर व्यक्तिगत स्वार्थ और पूँजी कमाने की लालसा पर आधारित है। शुद्ध मुनाफा केंद्रित वर्तमान निजीकरण वाली शिक्षा व्यवस्था कला और मानविकी विषयों को छोडकर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का ही संचालन कर रही हैं। इस तरह से कला विषयों को अनुपयोगी समझने की गाँधी वाली भूल फिर दोहराई जा रही है। आज हम इस बात को सहजता से समझ रहे हैं कि साहित्य कला और सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र पर समुचित ध्यान न देने के कारण ही हम प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भले विकास किये हों पर सामाजिक-वैचारिक क्षेत्र में पिछडते जा रहे हैं।
विश्वद्यालयों और कॉलेजों की संख्या दिनों-दिन बढती जा रही है पर शिक्षा की गुणवत्ता क्षीण होती जा रही है। प्रायः शोध कार्यों का अपने समय, स्थान और समस्याओं से संबंध टूटता जा रहा है। संस्थाएँ डिग्रियाँ बाँटने वाली एजेंसी बनती जा रही हैं। और इन डिग्रियों का अवमूल्यन बहुत तेजी से हो रहा है।
पाठ्यक्रमों में धार्मिक शिक्षा को लेकर आज बहुत बडी चुनौती खडी हो गयी है। गाँधी जिन खतरों के प्रति सचेत किये थे वे आज रक्तबीज बन चुके हैं। पंथनिरपेक्षता सदी का सबसे विवादित पद बन चुका है।
गाँधी के उच्च शिक्षा संबंधी विचारों की कुछ अन्य सीमाएँ भी हैं जिन पर विचार करना भी समीचीन है। गाँधीजी कभी कबीर की तरह अनुभूत सत्य को मानते हैं तो कभी वैज्ञानिक की तरह स्वयं प्रयोग करके किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। उच्च शिक्षा के संबंध में भी उन्होंने खूब प्रयोग किये। दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स आश्रम हो या टॉलस्टॉय आश्रम में मिस्टर पोलाक के सहयोग से लडके -लडकी के सहशिक्षा संबंधी प्रयोग हो या स्त्रियों की शिक्षा संबंधी प्रयोग या विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण संबंधी प्रयोग।उनका प्रयोग सतत जारी रहा। भारत आने पर शांतिनिकेतन की यात्रा में भी उन्होंने शिक्षक और विद्यार्थियों द्वारा मिलकर स्वयं छात्रावास की रसोई चलाने और भोजन तैयार करने संबंधी प्रयोग किया। अपने जीवन या परंपरा से प्राप्त ज्ञान या अनुभव के बारे में उनके प्रयोग तो प्रायः सफल ही हुए। पर चरों या सैम्पल(वेरिएबल्स) की संख्या कम होने या बहुत अल्प समयावधि तक प्रयोग के पश्चात ही किसी निर्णय तक पहुँच जाने की अवैज्ञानिक प्रविधि के कारण उनके कुछ निष्कर्ष आज अनुपयोगी या निरर्थक साबित हुए। इस बात को स्त्रियों की शिक्षा के संदर्भ में गाँधी की उलझन, उनके रूढिवादी मन और प्रगतिशील दृष्टिकोण के द्वंद्व में समझा जा सकता है। वे लिखते हैं कि- स्त्रियों की विशेष शिक्षा कैसी हो और कहाँ से शुरू हो इसके विषय में मैं खुद निश्चय नहीं कर सका हूँ। लेकिन यह मेरा दृढ मत है कि जितनी सुविधा पुरुष को मिलती है उतनी ही स्त्री को भी मिलनी चाहिए। और जहाँ विशेष सुविधा की जरूरत हो, वहाँ विशेष सुविधा भी मिलनी चाहिए। वहीं एक अन्य जगह पर वो स्त्री को कौन-सी शिक्षा और कितनी शिक्षा तथा उस शिक्षा की उपयोगिता कितनी हो के बारे में भी दृढतापूर्वक कहते हैं- स्त्री शिक्षा की योजना बनाने वालों को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए- दंपति के बाहरी कामों में पुरुष सर्वोपरि है। बाहरी कामों का विशेष ज्ञान उसके लिए जरूरी है। भीतरी कामों में स्त्री की प्रधानता है। इसलिए गृह- व्यवस्था बच्चों की देखभाल उनकी शिक्षा वगैरा के बारे में स्त्री को विशेष ज्ञान होना चाहिए। यहाँ किसी को कोई भी ज्ञान प्राप्त करने से रोकने की कल्पना नहीं है। किंतु शिक्षा कार्यक्रम इन विचारों को ध्यान में रखकर न बनाया गया हो तो स्त्री-पुरुष दोनों को अपने-अपने क्षेत्र में पूर्णता प्राप्त करने का मौका नहीं मिलता। गाँधीजी स्त्री और पुरुष को पूरक के रूप में मानते हैं। अंग्रेजी भाषा को लेकर भी स्त्री और पुरुष के शिक्षा में भेद करते हैं। अंततः वह कहते हैं कि मैं नहीं मानता की स्त्रियों को नौकरी ढूँढने या व्यापार करने की झंझट में पडना चाहिए। इसलिए अंग्रेजी भाषा थोडी ही स्त्रियाँ सीखेंगी।
वास्तव में गाँधीजी के जीवन में भी इस मामले में विरोधाभास दिखता है। साउथ अफ्रीका प्रवास के दौरान उन्होंने स्वयं मिस डिक और मिस श्लेशिन नामक पढी लिखी महिलाओं को अंग्रेजी टाइपिंग हेतु नियुक्ति दी थी। श्रीमती एनी बेशेन्ट की खुले मन से तारीफ करते थे। मीरा बेन जैसी कई विदुषी महिलाएँ गाँधीजी के साथ रहती थीं। फिर भी उन्हें यह उचित नहीं लगता था कि भारतीय महिलाएँ उच्च शिक्षा प्राप्त करके बाहर के कामों को करें। हालांकि ये भी सत्य है कि गाँधी के नेतृत्व में ही भारतीय महिलाएँ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पहली बार बडे पैमाने पर घरों से बाहर निकलीं। चाहे वो धरने हों, सभाएँ या सरकार के खिलाफ जुलूस।
इसके पीछे एक कारण उनका लडके और लडकियों की सहशिक्षा संबंधी दृष्टिकोण भी था। साउथ अफ्रीका में इस संबंध में उन्होंने एक प्रयोग भी किया था। गाँधी अमृत बाजार पत्रिका 12 जनवरी 1935 में लिखते हैं वर्षों पहले मैंने उसका खुद प्रयोग किया था। और इस हद तक कि लडके और लडकियाँ उसी बरामदे में सोते थे। उनके बीच में कोई आड नहीं होती थी। अलबत्ता मैं और श्रीमती गाँधी भी उनके साथ उसी बरामदे में सोते थे। मुझे कहना चाहिए कि इस प्रयोग के परिणाम अच्छे नहीं आए। हालांकि बाद में सहशिक्षा संबंधी उनके विचारों में आमूलपरिवर्तन दिखते हैं। उन्होंने हरिजन सेवक पत्रिका में (9 /11 1947) को लिखा कि मेरे बच्चे अगर बुरे भी हैं, तो भी मैं उन्हें खतरे में पडने दूँगा। एक दिन हमें काम प्रवृत्ति को छोडना होगा। ट्रेनिंग स्कूलों में शिक्षक लायक और पवित्र हों। नई तालीम की भावना से भरे हो तो कोई खतरा नहीं। दुर्भाग्य से कुछ घटनाएँ ऐसी हो भी जाएँ, तो कोई परवाह नहीं। वे तो हर जगह होंगी। इस प्रकार हम देखते हैं कि उच्च शिक्षा से संबंधित इन तमाम विषयों पर गाँधी का चिंतन और उनकी लेखनी लगातार चलती रहती है।सन 1900 से लेकर 1947 तक लगातार वे इन मुद्दों पर विचार करते रहे। हालांकि तत्कालीन संदर्भों में सामाजिक विषमता के उन्मूलन में उच्च शिक्षा की भूमिका के बारे में गाँधीजी द्वारा विचार न किया जाना हतप्रभ करता है।
बहुत से विषयों और अपनी मान्यताओं को उन्होंने समय के साथ संशोधित - परिमार्जित भी किया। कहीं अपने विचार दुहराए, तो कहीं विचारों को बदला भी। और ये संशोधन उनके अन्य बहुत सारे विचारों में भी परिलक्षित होता है। स्वयं गाँधी का ही मानना था कि अध्ययन करते रहने से समय के साथ साथ आदमी के विचारों में परिवर्तन आना स्वाभाविक है। इसीलिए वो जोर देकर कहीं कहते हैं कि यदि पहले कही हुई मेरी किसी बात से बाद में उसी संबंध में कही गयी बात अलग है, तो बाद में कहे गए विचार को ही मेरा मत समझा जाए।
कुल मिलाकर ऊपर उल्लिखित गाँधी की कुछ सीमाओं को छोड दिया जाए तो उनके विचार काफी प्रगतिशील थे। राष्ट* निर्माण में उच्च शिक्षा और युवाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका को वे स्पष्ट देख रहे थे। आजादी मिलने के बाद 2 नवंबर1947 को उन्होंने हरिजन में लिखा-विश्वविद्यालय चोटी पर होता है। शानदार चोटी तभी कायम रह सकती है जब बुनियाद अच्छी हो।.. हम राजनीतिक दृष्टि से तो स्वतंत्र हो गए परंतु पश्चिम के सूक्ष्म प्रभाव से मुक्त नहीं हुए हैं। गाँधीजी स्वतंत्र चेतना वाले मेधा के निर्माण और विकास में उच्च शिक्षा एवं विश्वविद्यालय की महत्त्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते थे। आज आजादी के सत्तर साल बाद भी हमारे लिए गाँधी का चिंतन बेहद प्रासंगिक है। उच्च शिक्षा संबंधी उनके विचारों और प्रयोगों को आत्मसात कर हम आज भी मजबूत बुनियाद वाली विश्वविद्यालय की शानदार चोटी कायम कर सकते हैं। गाँधी ने बुनियाद मजबूत करने और पश्चिम के सूक्ष्म प्रभाव से मुक्त होने में सबसे कारगर मातृभाषा में दी जाने वाली शिक्षा को रेखांकित किया। पर अफसोस गाँधी की 150वीं जयंती मना रहा देश आज तक मातृभाषा की अपरिहार्यता नहीं स्वीकार कर सका। शिक्षा को श्रम से जोड कर स्वावलंबी और स्वायत्त शिक्षा प्रणाली का निर्माण आज भी हमारे समक्ष बडी चुनौती है। उम्मीद है कि नई शिक्षा नीति निर्माण में इन चुनौतियों का समाहार कर गाँधी के स्वप्न को साकार किया जाएगा।

सन्दर्भ सूची-
1- मो.क. गाँधी,सत्य के प्रयोग,नवजीवन ट्रस्ट(अनुवाद-काशिनाथ त्रिवेदी)1957
2.गाँधीजी,संग्राहक-आर.के.प्रभु, नवजीवन ट्रस्ट 1960
3.के. दामोदरन, भारतीय चिंतन परंपरा ,पी.पी.एच. नई दिल्ली, छठा संस्करण 2018
4. अनुपम मिश्र, अच्छे विचारों का अकाल, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली,2016
5. नॉटनल पर प्रकाशित गाँधी द्वारा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 4 फरवरी 1916 को दिया गया भाषण

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