fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

संस्कृत कविता के भाषिक कौतुक

डॉ. विऋम जीत
संस्कृत कविता की चमत्कृति भिन्न विषय है, जिसकी ओर संकेत करते हुए अभियुक्तों द्वारा शाकुन्तलं सेव्यताम्1 इत्यादि कहा गया है और संस्कृत भाषा का चमत्कार तद्भिन्न वस्तु है, जिसकी ओर इंगित करते हुए दण्डी इत्यादि के द्वारा संस्कृतं नाम दैवी वागन्वाख्याता महर्षिभिः2 तथा भाषासु मधुरा मुख्या दिव्या गीर्वाणभारती3 इत्यादि कथन किया गया है। किन्तु इस लेख का विषय न तो संस्कृतकाव्य-चमत्कार है और न ही संस्कृतभाषा-चमत्कार है, प्रत्युत इन दोनों विषयों से सम्पृक्त संस्कृत-काव्यगत भाषिक वैचित्र्य का विमर्श ही इस लेख का लक्ष्य है। पुनः इस भाषिक वैचित्र्य के भी केवल एक आयाम चित्रकाव्य की ही चर्चा यहाँ है।
चित्रकाव्य समृद्ध और सावकाश जीवनशैली में विकसित भारतीय मनीषा के उस कला-कौशल का स्मारक है, जहाँ एकाधिक ललितकलाओं - नृत्य-संगीत, नृत्य-चित्र, संगीत-काव्य, चित्र-काव्य इत्यादि की युति से सौन्दर्य-भावना का सर्जन होता था। चित्रकाव्य भी आलंकारिकों द्वारा बुद्धिविलास और मनोविनोद के लिए प्रयुक्त एक विशिष्ट शिल्प है। भारवि, माघ इत्यादि संस्कृत कवियों ने अपनी काव्यकला में इसे विकसाया और भोजदेव जैसे आचार्यों ने अपने शास्त्रों में इसे अनल्प गौरव प्रदान किया। हिन्दी साहित्य में भी रीतिकाल की प्रवृत्ति चमत्कारोत्पादन की थी, अतः कतिपय हिन्दी कवियों-आचार्यों यथा केशवदास, भिखारीदास इत्यादि की रुचि चित्रकाव्य-प्रणयन में विशेष रही।
चित्र शब्द अनेकार्थक है, परन्तु चित्रकाव्य का तात्पर्य सामान्यतः आश्चर्य-जनक या चमत्कारोत्पादक (Wonderful or Exciting Wonder) रचना से है। इसमें प्रायः वर्णसाम्य या वर्णावृत्ति का ही प्राधान्य रहता है, जैसे सम्पूर्ण छन्द में किसी एक ही व्यञ्जन या स्वर का प्रयोग (इसी कारण कुछ लोगों ने चित्र को अनुप्रास अथवा यमक की ही कोटि में गिना है) अथवा पद्य के चरणों की रचना इस युक्ति के साथ करना कि उन चरणों को किसी विशिष्ट क्रम में रखे जाने पर पद्म, खड्ग, रथ, वाद्य आदि की आकृति बन जाए, एक विजुअल पैटर्न नजर आए। नानाविध प्रहेलिका, द्व्यर्थकादि काव्य या सन्धानकाव्य की गणना चित्रविधा के अन्तर्गत होता है। कुल मिलाकर, चित्रकाव्य में चमत्कार की ही प्रधानता होती है, जो सामान्य जन का विशेष रंजन करती है।
किन्तु काव्यक्षेत्र में ध्वनि के प्रचार के अनन्तर रसभावुक साहित्य-प्रणेताओं का चित्रशैली के प्रति आकर्षण उत्तरोत्तर प्रक्षीण होता गया और उन्होंने रसधारा के तारतम्य के आधार पर काव्य के स्तर का निर्धारण करना शुरू किया। चित्रकाव्य का अर्थ संस्कृत् पठन से अवगत नहीं होता, अतः अर्थबोध के लिए एकैक पद्य का पौनःपुन्येन अनुशीलन करना पडता है। क्वचित् तो टीका के बिना अर्थावगम होता ही नहीं। अर्थावगति के अभाव में काव्य-पठन-श्रवण के साथ अनुस्यूत होकर बहती हुई रसधारा का विच्छेद अवश्यम्भावी हो जाता है। अतः काव्यमर्मज्ञों ने चित्रशैली को रसभङ्ग का कारण मानते हुए इसे अप्रशस्त मान लिया। इसलिए ध्वनिकार आनन्दवर्धनाचार्य का अनुसरण करते हुए ध्वनिप्रतिष्ठापक परमाचार्य मम्मट ने स्फुट (स्पष्ट) प्रतीयमानार्थ (व्यंग्यार्थ) से रहित शब्दचित्र और अर्थचित्र को अवर काव्य बताया है।4 तत्पश्चात् तो बहुत से आलोचक ऐसा कहने लगे कि चित्रकाव्य तो शुद्ध शब्दाडम्बर है, यह तो कोरी शाब्दी क्रीडा है, यह तो केवल शब्दगुम्फनात्मक वाक्केली है, यह तो विदग्धगोष्ठियों में उत्पादित कष्टकल्पनाश्रित विस्मयपूर्ण कुतूहल मात्र है। उनका तात्पर्य यही है कि काव्यरचना का यह प्रकार कवि के भावाकुल अन्तःकरण से प्रेरित नहीं है, अपितु यह तो महज वैचिर्त्र्यमूलक कुतूहलवृत्ति जन्य है और अन्ततः भाषायी खिलवाड में पर्यवसित होता है; अतः कवि-हृदय की भावसम्पत्ति से उद्भूत सहज विलास का उन्मेष यहाँ नहीं दिखाई देता।
उपर्युक्त आक्षेप वितथ नहीं है, तथापि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि चित्रकाव्य में अद्भुतत्व या विस्मयावेश या चमत्कार नाम का तत्त्व तो असंन्दिग्ध रूप से रहता है। पुनश्च, काव्य में चमत्कार की महिमा भी सर्वस्वीकृत है। नारायण पण्डित के हवाले से चमत्कार को रससार5 बताया गया है और अद्भुत को ही एकमात्र रस तक बता दिया गया है।6 पण्डित विश्वनाथ कविराज ने अलौकिक चमत्कार को रस का प्राण बताया है।7 पण्डितराज जगन्नाथ ने भी अपने काव्यलक्षण का परिष्कार करते हुए चमत्कार को ही काव्य के लिए आवश्यक माना है।8 यानी अनेक काव्यशास्त्री चमत्कार को ही नमस्कार कर रहे हैं और चित्रकाव्य भी चमत्कारप्रधान ही होते हैं। यद्यपि ये आचार्य वरकाव्य-स्वरूप-नियामक के रूप में जिस चमत्कार का उल्लेख कर रहे हैं, वह व्यंग्यार्थ का चमत्कार है जो कि चित्रकाव्य में सामान्यतः नहीं रहता। पर उससे क्या? व्यंग्य-रहित होते हुए भी कोई कविता चारु हो सकती है और उसी को चित्र कहा गया है - यदव्यंग्यमपि चारु तच्चित्रम्।9 चित्रकाव्य की गणना अवर अथवा अवरावर काव्य में ही सही। पर इन काव्यों के प्रणयन में अपूर्व प्रतिभा, काव्यकौशल और शिल्पनैपुण्य अपेक्षित होता है तथा ये काव्य रुचिविशेषशाली सहृदयों के चित्तापहारक होते हैं। लोकाभिरुचि के अनुरोध पर ही महाकवियों ने भी अपने प्रबन्धो में इस चित्र कविता का यथास्थान उपादान किया है, क्योंकि बहुत लोग ऐसे भी होते हैं जो रसधारा में निमज्जन के लिए उद्युक्त नहीं होते और चमत्कृति में ही जिनकी आसक्ति होती है। शक्ति, व्युत्पत्ति और अभ्यास की त्रयी के बिना सर्वथा असाध्य ऐसे काव्यों की महनीयता अवश्य ही अङ्गीकरणीय है। भले ही परवर्ती आचार्यों ने इन काव्यों के लिए कष्टकाव्य,10 और गडुभूत11 (यानी रसास्वादन में गाँठ के समान) जैसे अभिधान का प्रयोग किया हो तथा इन्हें रस का परिपन्थी (विरोधी) बताया हो, किन्तु ऐसे विलक्षण काव्य और शताब्दियों से ऐसे काव्यों की सृष्टि करने वाली भाषा - ये दोनों गौरवास्पद हैं। इसलिए अग्निपुराण की यह उद्घोषणा उचित ही है कि ये दुष्कर कष्टकाव्य चाहे नीरस हों, परन्तु ये कवि के सामर्थ्य के सूचक तो हैं ही, साथ ही विद्वज्जन के लिए तो उत्सव के समान आनन्दकारी हैं -
दुःखेन कृतमत्यर्थं कविसामर्थ्यसूचकम्।
दुष्करं नीरसत्वेऽपि विदग्धानां महोत्सवः।।12
चित्रकाव्य के नाना भेदों का निरूपण संस्कृत तथा हिन्दी के अनेक आचार्यों यथा दण्डी (काव्यादर्श), रुद्रट (काव्यालंकार), अग्निपुराणकार, भोज (सरस्वतीकण्ठाभरण), मम्मट (काव्यप्रकाश), रुय्यक (अलंकारसर्वस्व), हेमचन्द्र (काव्यानुशासन), जयदेव (चन्द्रालोक), विद्याधर (एकावली), धर्मदास (विदग्धमुखमण्डन), विश्वेश्वर पण्डित (कवीन्द्रकर्णाभरण), केशवदास (कविप्रिया), भिखारीदास (काव्यनिर्णय), काशिराज (चित्रचन्द्रिका), डॉ रामशंकर शुक्ल रसाल (अलंकार पीयूष) इत्यादि ने किया है; पर यदि किसी एक आचार्य की बात करें, तो धारेश भोजदेव ने सरस्वतीकण्ठाभरण में जैसा व्यवस्थित निरूपण किया है, वैसा किसी अन्य ने नहीं किया; न तो भोज से पूर्व और न ही पश्चात्। हाँ, भोज के परवर्तियों में कलिकाल सर्वज्ञ जैनाचार्य हेमचन्द्र ने किया है, पर वह अधिकांश में भोज का अनुसरण ही है। भोजराज ने चित्र के भेदोपभेद का सविस्तर, सोदाहरण विवेचन करते हुए प्रथमतः छह भेद गिनाए हैं - 1. वर्णचित्र (व्यञ्जन चित्र) 2. स्थानचित्र 3. स्वरचित्र 4. आकारचित्र 5. गतिचित्र 6. बन्धचित्र।13 पुनः इन छह भेदों के अनेक उपभेद हो जाते हैं।
वर्णचित्र का तात्पर्य ऐसे काव्य से है, जहाँ एक छन्द में मात्र एक, दो, तीन या चार ही व्यञ्जनों का प्रयोग हुआ हो। दण्डी ने इनके लिए चतुरक्षर, र्त्यक्षर, द्व्यक्षर तथा एकाक्षर चित्र संज्ञा का प्रयोग किया है, तो भोज ने इन्हें चतुर्व्यञ्जन, त्रिव्यञ्जन, द्विव्यञ्जन तथा एकव्यञ्जन चित्र कहा है।
छठी शताब्दी के कवि भारवि ने यों तो अपने महाकाव्य का एक समग्र सर्ग (पन्द्रहवाँ सर्ग) ही चित्रकाव्य को समर्पित कर दिया है, किन्तु उसमें भी उनका यह एकाक्षरी श्लोक तो विलक्षण है, जिसमें मात्र नकार व्यञ्जन का प्रयोग हुआ है। शिवगणों को सम्बोधित करके अर्जुन कहता है -
न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्।।14
(अर्थात् हे नानानन (नाना मुख वालो)! वह निश्चित ही मनुष्य नहीं है, जो अपने से कमजोर से भी पराजित हो जाए और वह भी मनुष्य नहीं है, जो अपने से कमजोर को मारे। जिसका नेता पराजित न हुआ हो, वह हार जाने के बाद भी अपराजित है। जो पूर्णतः पराजित को भी मार देता है, वह पापरहित नहीं है।)
एक ही अक्षर में कवि ने कितना अनूठा अर्थ भर दिया है! भारवि द्वारा प्रवृत्त भाषिक चमत्कार की यह परम्परा परवर्ती कवियों के लिए प्रतिभा की कसौटी बन गयी और माघ (शिशुपालवधम्?) में जाकर वह चरमोत्कर्ष पर पहुँची। भारवि की टक्कर में माघ कवि का यह एकाक्षरी भी द्रष्टव्य है, जिसमें उन्होंने कलात्मकता को शिखर पर पहुँचा दिया है -
दाददो दुद्ददुद्दादी दाददो दूददीददोः।
दुद्दादं दददे दुद्दे दादाददददोऽददः।।15
(अर्थात् दान करने वाले, दुष्टों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, परिताप देने वाले दुष्टों के नाशक बाहु वाले और दाताओं तथा अदाताओं दोनों को देने वाले श्रीकृष्णभगवान् ने दुद्द (दुःखदायी-शत्रु) पर दुःखदायी बाण को (चला) दिया।)
वर्णचित्र के ही एक उपभेद के रूप में भोज ने क्रमस्थसर्वव्यञ्जनचित्र का उदाहरण दिया है। अंग्रेजी में इस चित्र को पैंग्रेम (Pangram) कहते हैं, जिसमें किसी भाषा की वर्णमाला (Alphabet) के सभी वर्ण एक ही वाक्य में समाहित हो जाएँ। प्रायः सभी भाषाओं में पैंग्रेम्स मिलते हैं। अंग्रेजी का ऐसा ही एक पैंग्रेम सर्वज्ञात और बहुश्रुत है, जिसका तकरीबन 19वीं शताब्दी से प्रयोग होता आ रहा है और इधर कतिपय कम्प्यूटर प्रोग्रेम्स में भी जो व्यवहृत हुआ है; वह है - The quick brown fox jumps over the lazy dog. अब इस पैंग्रेम के बरअक्स कम से कम 11वीं शताब्दी से चले आ रहे संस्कृत के इस क्रमस्थसर्वव्यञ्जनचित्र को देखिये -
कः खगौघाङचिच्छौजा झाञ्ज्ञोऽटौठीडडण्ढणः।
तथोदधीन्पफर्बाभीर्मयोऽरिल्वाशिषां सहः।।16
(अर्थात् कौन (कः) है जो पक्षिसमूह (खगौघ) को इकट्ठा करता है, जो चित् यानी संवित् को नष्ट करने के सामर्थ्य से रहित (अचिच्छौज) है, जो परबलभक्षक (झान्) विद्वान् (ज्ञः) है, जो अटों यानी (रणांगण में भ्रमणशील) सुभटों के हन्ताओं का ईड् यानी स्वामी (अटौठीड्) है, जो अचपल या स्थिर (अडण्ढण) है, जो भयरहित (अभीः) है तथा जिसने समुद्रों को (उदधीन्) पूरित कर दिया (पफर्ब) है। (अब अन्त में इस प्रश्न का उत्तर है कि) वह शत्रुनाशक (अरिलु) आशीर्वचनों के (आशिषां) योग्य (सहः) मय नामक दैत्यराज है।)
इस एक ही पद्य में वर्णमाला के (क से ह तक) सभी व्यञ्जन आ गये हैं और आश्चर्यजनक बात यह कि यहाँ वर्णक्रम में किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं हुआ और फिर भी यह कोई निरर्थक वर्णसमूह न होकर प्रश्नोत्तर शैली से युक्त एक सार्थक वाक्य है। यह है संस्कृत का भाषिक वैशिष्ट्य! क्या किसी अन्य भाषा में इसका कोई साम्य है?
स्थानचित्र का तात्पर्य ऐसी रचना से है, जिसमें कुछ पूर्वनिश्चित उच्चारणस्थानों से उच्चार्य वर्णों का ही प्रयोग हुआ हो। इसके चार भेद हैं- चतुःस्थानचित्र, त्रिस्थानचित्र, द्विस्थानचित्र और एकस्थानचित्र। पुनः इनके अवान्तर भेद भी किए जाते हैं। जैसे, चतुःस्थानचित्र निष्कण्ठ्य के इस उदाहरण में कण्ठ्य वर्णों (अ, क, ख, ग, घ, ङ, ह, विसर्ग) को छोडकर शेष चार स्थानों (तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ) से उच्चार्य वर्णों का ही प्रयोग हुआ है -
भूरिभूतिं पृथुप्रीतिमुरुमूर्तिं पुरुस्थितिम्।
विरिञ्चिं सूचिरुचिधीः शुचिभिर्नुतिभिर्धिनु।।17
स्थानचित्र के अन्तर्गत निरोष्ठ्यचित्र का एक अनूठा उदाहरण दण्डी ने दशकुमारचरित में प्रस्तुत किया है, जहाँ एक पूरा उच्छ्वास (अध्याय) ही ओष्ठ्यवर्ण-रहित है और खास बात यह भी कि इस उच्छ्वास की कथा में ओष्ठ्यवर्णों के अप्रयोग की जो वजह कवि ने बतायी है, वह भी मजेदार है। वस्तुतः इस नायक की प्रिया ने पिछली रात रतिक्रीडा के समय जल्दबाजी में नायक के अधर पर दन्तक्षत कर दिया था, तो अब वह क्षत-अधर से ओष्ठ्य वर्णों (उ, प, फ, ब, भ, म) को कैसे उच्चारें! इसलिए प्रिया-दष्ट अपने विह्वल अधर को लज्जावश कुछ छुपाते हुए और ओष्ठ्य वर्णों के प्रयोग से पूरी तरह बचते हुए कुमार मन्त्रगुप्त अपनी कथा सुनाने लगता है।18
स्थानचित्र का ऐसा ही एक अन्य उदाहरण देखने में आया। केरल के संस्कृत कवि मेलपत्तूर भट्टतिरि ने शूर्पणखा पर कूत्तु (मन्दिर के सभागृह में साभिनय प्रवचन) करने के लिए एक प्रबन्ध लिखा। क्योंकि राक्षसी की नासिका कट चुकी थी, अतः वह अनुनासिक वर्णों (ङ, ञ, ण, न, म) का उच्चारण नहीं कर सकती थी। इसलिए भट्टतिरि के शूर्पणखा विलाप19 नामक निरनुनासिक प्रबन्ध में किसी अनुनासिक वर्ण का प्रयोग नहीं है।
स्वरचित्र का तात्पर्य ऐसी रचना से है, जहाँ मात्र एक, दो, तीन या चार ही स्वरों का प्रयोग किया गया हो। चतुःस्वरचित्र, त्रिस्वरचित्र, द्विस्वरचित्र और एकस्वरचित्र - इन चार भेदों के भी उपभेद स्वर की ह्रस्वता या दीर्घता के आधार पर हो जाते हैं। भोजराज के ग्रन्थ से उद्धृत ह्रस्वैकस्वरचित्र का एक सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत है, जिसमें ह्रस्व उकार के अतिरिक्त अन्य किसी स्वर का प्रयोग नहीं हुआ है -
उरुगुं द्युगुरुं युत्सु चुक्रुशुस्तुष्टुवुः पुरु।
लुलुभुः पुपुषुर्मुत्सु मुमुहुर्नु मुहुर्मुहुः।।20
(देवगण (यह कर्तृपद अध्याहार्य है) उरुगं = विशद वाणी वाले, द्युगुरुं = स्वर्गाचार्य (बृहस्पति) को युत्सु = युद्ध के लिए चुक्रुशुः = जोर-जोर से पुकारने लगे, उनकी पुरु = नाना प्रकार से तुष्टुवुः = स्तुति करने लगे; क्यों कि मुत्सु = प्रमोद की अवस्था में वे लुलुभुः = प्रसन्न रहते थे, पुपुषुः = पुष्ट रहते थे, नु = और मुहुर्मुहुः = बार-बार मुमुहुः = मोहित होते थे।)
संस्कृत-कविता का अनुसरण करते हुए हिन्दी-कवियों ने भी चित्र रचे हैं, किन्तु हिन्दी के चित्र प्रायः सरल-सपाट ही अधिक हैं और इसीलिए उनमें शायद चमत्कार भी न्यूनतर है। जैसे कि अ, इ, उ - इन तीन स्वरों से युक्त सर्वलघु स्वरचित्र का यह काशिराज का श्रुतिमधुर उदाहरण है -
शशिरुचिमलिन ललितमुखनिरखत
नलिन नयन सरवर नहिं दरसिय ।
हसित लसित दुति तडति दलित छवि
मधुर अधिक रस अधर सुसरसिय।।21
आकारचित्र और बन्धचित्र में वस्तुतः कोई अन्तर नहीं है। जब कवि द्वारा रचित किसी छन्द के वर्णों का विन्यास इस प्रकार किया जाए कि उससे कमल, चक्र आदि की आकृति बन जाए, तो उसे आकारचित्र या बन्ध कहा जाता है। बन्धचित्रों में पद्मबन्ध (कमलबन्ध) संस्कृत-कवियों का प्रियतम बन्ध है, जिसके अनेक भेद चतुर्दलपद्म, अष्टदलपद्म, द्वादशदलपद्म, शोडशदलपद्म इत्यादि हैं। चक्रबन्ध के भी नाना भेद अरों के आधार पर चतुररचक्र, षडरचक्र, अष्टारचक्र आदि होते हैं। आयुधबन्धों में भी अनेक बन्ध खड्गबन्ध, धनुर्बन्ध, शरबन्ध, त्रिशूलबन्ध, कुठारबन्ध, मुसलबन्ध, नागपाशबन्ध आदि हैं। आभूषणबन्धों में हार, कंकण, कांची आदि बन्ध हैं तो वाद्ययन्त्रों में मुरजबन्ध आदि हैं। इसके अतिरिक्त गतिचित्र के अन्तर्गत गोमूत्रिका, सर्वतोभद्र इत्यादि आते हैं, जिन्हें कुछ आचार्यों ने बन्धचित्र में ही परिगणित किया है। इन सबसे भिन्न भी अनेकानेक प्रकार के चित्रों के उदाहरण संस्कृत व हिन्दी के चित्रकाव्यों में मिलते हैं। इस सम्बन्ध में दक्षिण के एक कवि श्रीरामभद्राचार्य (18वीं शती) का एक काव्य उल्लेखनीय है, जिसका नाम ही चित्रकाव्यम् है, तथा जिसमें चित्र के प्रहेलिकादि नाना भेदों क अतीव रोचक उदाहरण प्राप्त होते हैं। यह काव्य कुछ वर्ष पूर्व ही चेन्नई से प्रकाशित हुआ है।
नाना बन्धचित्रों में से तुरगबन्ध नामक एक चित्र की चर्चा यहाँ करणीय है। किन्तु, उससे पूर्व चतुरङ्ग क्रीडा (शतरंज) की चर्चा करना प्रासंगिक है। शतरंज में घोडे की चाल को लेकर ्यठ्ठद्बद्दद्धह्ल*ह्य ह्लश्ाह्वह्म् श्चह्म्श्ाड्ढद्यद्गद्व नामक एक गणितीय समस्या चर्चित है। समस्या का स्वरूप यह है कि शतरंज में घोडे की चाल (दो घर आगे चलकर एक घर तिर्यक चलना) के अनुसार अखण्ड गति से चलते हुए प्रत्येक घर (वर्ग) को स्पर्श करते चलना है और किसी भी वर्ग को दो बार स्पर्श नहीं करना है। कहते हैं कि इस समस्या का समाधान सर्वप्रथम एक स्विस गणितज्ञ लियोनार्ड एलर ने सन् 1759 में किया था। एलर द्वारा खोजे गये नाइट्स ट्यूर प्रॉब्लम के इस परिहारोपाय को यहाँ चित्र क्र-1 में समझा जा सकता है, जहाँ क्रमाङ्क-1 से प्रारम्भ हुई यात्रा किसी भी वर्ग को दो बार न छूते हुए, किन्तु प्रत्येक वर्ग को अवश्य छूते हुए क्रमाङ्क 64 पर जाकर समाप्त होती है। इसमें संख्याएँ क्रमिक यात्रा को ज्ञापित करती हैं।







चित्र क्र.- 1
आज तो इस नाइट समस्या के परिहार के अनेक मार्ग उपलब्ध हैं। किन्तु आज से सहस्राधिक वर्ष पूर्व भारत में इसका समाधान संस्कृत के चित्रकाव्यों में उपलब्ध था। भले ही यह बात अविश्वसनीय लगे, पर सत्य है।
एलर से 4-5 सौ वर्ष पूर्व संस्कृत कवि वेदान्त देशिक (13वीं शती) के पादुकासहस्रम् नामक ग्रन्थ में प्राप्त तुरगबन्ध के पद्य-22 में इसका स्पष्ट समाधान मिलता है। यही नहीं, वेदान्त देशिक से भी कोई 4 सौ वर्ष पहले रुद्रट (9वीं शती) के इस तुरगबन्ध में नाइट्स ट्यूर की गुत्थी सुलझाई जा चुकी थी -
सेना लीलीलीना नाली लीनाना नानालीलीली।
नालीनालीले नालीना लीलीली नानानानाली।।23
(जो सत्यभाषी है, जिसके सैनिक शकट पर आरूढ हैं, जिसके सैनिक नाना प्रकार की पंक्तियों में स्थित हैं, जो सेवकादि का हितैषी हैं, जो नाना प्रकार के मनुष्यों से युक्त हैं, जिसकी लीला बुद्धिमान् पुरुषों के द्वारा आलिंगित हैं; वही पुरुष सेना को प्रसन्न कर सकता है।)
यह पद्य भारत में शतरंज की जडों का भी सूचक है और इस खेल में अश्वगति की समस्या का प्रथम समाधान भी है। तुरगबन्ध का अर्थ ही है ऐसा बन्ध, जिसमें अक्षर-विन्यास इस रीति से होता है कि अश्वगति (KnightO tour) की प्राप्ति हो जाती है। चित्र क्र. 2 व 3 में रुद्रट के पद्य के अनुसार शतरंज के अर्ध फलक (4 गुणा 8) पर नाइट समस्या का समाधान दर्शाया गया है। इसी प्रकार 8 गुणा 8 के पूर्ण फलक पर भी हो जाता है। यह भी संस्कृत के काव्य-कौतुक का एक नमूना है!





चित्र क्र. - 2





चित्र क्र. - 3

संस्कृत की चित्रकाव्य-परम्परा में विलोमकाव्य या गतप्रत्यागत काव्य (palindrome) भी ऐसे लिखे गये हैं, जो बेमिसाल हैं। पण्डित माघ का यह पद्य देखिए-
वारणागगभीरा सा साराभीगगणारवा।
कारितारिवधा सेना नासेधावरितारिका।।24
(पर्वत के समान महदाकार वाले गजों से युक्त इस सैन्य का सम्मुखीकरण अतीव क्लेशकर है। भीत जनों का आक्रन्दन सुनाई दे रहा है। यह सैन्य विशाल है। इसने शत्रुओं का हरण कर लिया है।)
इस श्लोक के पूर्वार्द्ध व उत्तरार्द्ध की पंक्तियों को चाहे सीधा पढें या उलटा (विलोम) पढें, श्लोक अपरिवर्तित रहता है। माघ ने ऐसे अनेक पद्य लिखे हैं।
सूर्य कवि (15वीं शती) ने तो इस पद्धति से एक पूरा काव्य ही रच दिया- रामकृष्ण विलोमकाव्य। नमूने के तौर पर इसका एक पद्य द्रष्टव्य है, जिसकी खासियत यह है कि पूर्वार्द्ध के ही अक्षरों को विपरीत रूपेण पढने पर पद्य का उत्तरार्द्ध प्राप्त हो जाता है; यानी उत्तरार्द्ध पूर्वार्द्ध का ही प्रतिलोम पाठ है -
तं भूसुतामुक्तिमुदारहासं
वंदे यतो भव्यभवं दयाश्रीः।
श्रीयादवं भव्यभतोयदेवं
संहारदामुक्तिमुतासुभूतम्।।25
संस्कृत के इन विलोमकाव्यों का वैशिष्ट्य यह है कि इनमें कहीं पद्य के प्रत्येक पाद का, कहीं आधे पद्य का तो कहीं पूरे पद्य का अनुलोम-प्रतिलोम पाठ किया जा सकता है और फिर भी वह पाठ कहीं भी अनर्थक नहीं होता, बल्कि सदा सार्थक रहता है। जैसे कि उपर्युल्लिखित रामकृष्ण विलोमकाव्य के प्रत्येक पद्य के पूर्वार्द्ध में रामकथा चलती है, तो उत्तरार्द्ध में कृष्णकथा।
इसी प्रकार वेंकटाध्वरि (17वीं शती) के राघव-यादवीयम में किसी भी पद्य का अनुलोम पाठ करने पर वह रामकथापरक अर्थ देता है और उसी का प्रतिलोम पाठ करने पर एक नया पद्या मिलता है, जो कृष्णकथापरक अर्थ देता है। यह काव्य इन वर्षों में सोशल मीडिया पर खूब प्रसारित हो रहा है। रामचन्द्र (16वीं शती) का रसिक-रञ्जनम् भी ऐसा ही काव्य है, जिसमें श्लोक को सीधा पढने पर श्रृंगारपरक अर्थ निकलता है और उलटा पढने पर वैराग्यपरक।
विलोमकाव्यों से इतर भी संस्कृत में सन्धानकाव्य यानी अनेकार्थक काव्यों की विलक्षण परम्परा है। द्विसन्धान काव्य में दो कथाएँ साथ-साथ चलती हैं, तो त्रिसन्धान में तीन। राघव-नैषधीय (हरिदत्त सूरि), राघव-पाण्डवीय (धनञ्जय) आदि द्विसन्धान काव्य हैं तो यादव-राघव-पाण्डवीय (चिदम्बर सुमति) त्रिसन्धान है, जिसमें प्रत्येक पद्य में रामायण, महाभारत एवं भागवत की कथाएँ साथ-साथ चलती हैं। आचार्य हेमचन्द्र सूरि द्वारा रचित आदिम सप्तसन्धान काव्य की अनुपलब्धि से उत्पन्न खिन्नता को दूर करने के लिए मेघविजयगणि (17वीं शती) ने तो सप्तसन्धान नाम से एक नवसर्गात्मक महाकाव्य ही रच डाला जिसमें पाँच तीर्थंकरों ऋषभदेव, शान्तिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ, महावीर तथा राम व कृष्ण का चरित गुम्फित है। यह संस्कृत कवियों की अलोकसामान्य प्रतिभा और श्लेष-यमकादि के चमत्कार से समन्वित संस्कृत की भाषायी जादूगरी ही है, कि यहाँ सप्तसन्धान से भी आगे चतुर्विंशति सन्धान, शतार्थक तथा सहस्रार्थक काव्यों का सर्जन हुआ।
सर्वाधिक आश्चर्यकर तो यह है कि सांचौर (राजस्थान) में जन्मे जैन कवि महोपाध्याय समयसुन्दर (17वीं शती) ने तो मानवीय प्रतिभा की सब हदों को पार करते हुए तथा एगस्स सुत्तस्स अणन्तो अर्थाः को प्रमाणित करते हुए राजानो ददते सौख्यम् इस अष्टाक्षर-परिमित वाक्य के प्रत्येक अक्षर के एक-एक लाख अर्थ करते हुए अष्टलक्षी नामक अद्भुत ग्रन्थरत्न का प्रणयन कर दिया। कुल आठ अक्षरों वाली एक लघु पंक्ति के आठ लाख अर्थ! किमाश्चर्यम् अतः परम्! स्वयं लेखक ने ग्रन्थ के रचना-प्रसंग में लिखा है कि काश्मीर-विजय के प्रयाण-पथ में पडाव डाले हुए पातिशाह अकबर ने समयसुन्दर के मुख से इस रचना को सुना और हर्ष से गद्गद होकर इसकी प्रशंसा की। क्या विश्ववाङ्मय में कहीं भी, किसी भी अन्य भाषा में इस प्रकार की कोई रचना है? बौद्धिक विलास का ऐसा प्रतिफलन, कारयित्री प्रतिभा का ऐसा सामर्थ्य और वाक्कला का ऐसा कौतुक केवल संस्कृत में सम्भव है।
1. वासन्तं कुसुमं फलं च युगपद्ग*ीष्मस्य सर्वं च यत्,
यच्चान्यन्मनसो रसायनमतः सन्तर्पणं मोहनम्।
एकीभूतमभूतपूर्वमथवा स्वर्लोकभूलोकयोः,
ऐश्वर्यं यदि वाञ्छसि प्रियसखे शाकुन्तलं सेव्यताम्।।
- जर्मन् कवि गेटे की अभिज्ञानशाकुन्तलम् विषयक टिप्पणी का महामहोपाध्याय वासुदेव विष्णु मिराशी द्वारा कृत संस्कृत रूपान्तर।
2. काव्यादर्श 1/33
3. सुभाषितरत्नभाण्डागार
4. शब्दचित्रं वाच्यचित्रमव्यंग्यं त्ववरं स्मृतम्।
- काव्यप्रकाश, प्रथमोल्सास
5. रसे सारश्चमत्कारः सर्वत्राप्यनुभूयते।
- साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद
6. अद्भुतमेवाह कृती नारायणो रसम्।
- साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद
7. लोकोत्तर-चमत्कारप्राणः ...... आस्वाद्यते रसः।
- साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद
8. चमत्कारत्ववत्त्वमेव काव्यत्वम्।
- रसगङ्गाधर, प्रथमानन
9. चित्रमीमांसा (अप्पय दीक्षित),
ग्रन्थारम्भप्रकरण
10. कष्टकाव्यमेतदिति दिङ्मात्रं प्रदर्श्यते।
काव्यप्रकाश, नवमोल्लास
11. एतच्च काव्ये गडुभूतम्।
एकावली, सप्तमोन्मेष
काव्यान्तर्गडुभूततया तु नेह प्रपञ्च्यते।
-साहित्यदर्पण, दशमपरिच्छेद, चित्रालंकारवृत्ति
12. 343/32
13. वर्णस्थानस्वराकारगतिबन्धान्प्रतीह यः।
नियमस्तद्बुधैः षोढा चित्रमित्यभिधीयते।।
- सरस्वतीकण्ठाभरण 2/109
14. किरातार्जुनीय 15/14
15. शिशुपालवध 19/114
16. सरस्वतीकण्ठाभरण 2/263 वृत्तिश्लोक
17. सरस्वतीकण्ठाभरण 2/267 वृत्तिश्लोक
18. ललितवल्लभारभसदत्तदन्तक्षतव्यसनविह्वला-
धरमणिर्निरोष्ठ्यवर्णमात्म-चरितमाचचक्षे।
- दशकुमारचरित, सप्तमोच्छ्वास से पूर्व
अवतरणिका
19. यह एक चम्पू है जिसमें 8 श्लोक हैं तथा एक
सुदीर्घ गद्य है।
20. सरस्वतीकण्ठाभरण 2/276 वृत्तिश्लोक
21. चित्रचन्द्रिका 3/3
22. स्थिरागसां सदाराध्या विहताकततामता।
सत्पादुके सरासा मा रङ्गराजपदं नय।। - 929
23. काव्यालंकार 5/15
24. शिशुपालवध 19/44
25. पद्य क्र- 1

सह-आचार्य
राजकीय डूँगर महाविद्यालय, बीकानेर
E-mail: vkjdcb@gmail.com
मो. 9414604308