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सोच का ताप

कश्मीर उप्पल
(श्री गिरधर राठी की चर्चित पुस्तकों कविता का फिलहाल एवं सोच-विचार पर एकाग्र)
गिरधर राठी को हम उनके सरोकारों के लिए पढते हैं, जो अन्तरधाराओं में ही सुगठित और अनूदित नहीं लगते। गिरधर के यहाँ भारतीय इतिहास, मिथक, पुराण, परम्पराएँ भी धडकते रहते हैं। वह अपनी सोच में सतत सावधान कुछ ऐसा तत्व कि अपने लेखन के भीतर पसरी किसी संयोजित दुनिया में से तलाश लाने के लिए स्वयं को अपने को तलाशते हों।
कृष्णा सोबती का अपनी पुस्तक हम हशमत-3 में गिरधर राठी के इस मूल्याँकन को हम उनकी पुस्तकों से गुजरते हुए भी पाते हैं। इस वर्ष उनकी दस पुस्तकें एक साथ सामने आई हैं, हम इन पुस्तकों में गिरधर राठी की सोच का ताप महसूस करते हैं। उनकी विश्वव्यापी नजर से हम तक उनका ताप पहुँचता है और इस ताप के साथ कविता का फिलहाल गिरधर राठी के कविता पर एकाग्र लेखों का संकलन हैं। इसके बारे में अशोक वाजपेयी पुस्तक के फ्लेप कहते हैं कि बहुत तेजी से बदलते समय में यह आग्रह इस पर है कि कविता कभी समय से पिछडती नहीं है और आत्म और समय को यथार्थ और कल्पना को रूपायित करते हुए समय की सीमाओं से मुक्त भी करती चलती है। सारी कविता नहीं वह कविता जो ध्यान देने योग्य होती है और जिसे, गिरधर राठी ने अपने दृष्टिकोण से निरखा-परखा है। उनका यह संकलन यह याद भी दिलाएगा कि हम नितान्त समसामयिकता के शिकंजे से छुडाकर कविता को निरन्तरता में देख सकना चाहिए ; हमें इस मुक्ति की जरुरत है।
कविता का फिलहाल में गिरधर राठी के 44 लेख हैं, परन्तु इनमें प्रारंभिक छह विस्तृत लेख कविता पर उनके दस्तावेजी काम हैं। इनमें पहला आलेख भारतीय कविता का आधुनिकीकरण शीर्षक 64 पृष्ठों में फैला एक व्याख्यान है, जो कविता पर अपने आप एक पुस्तक होने की संभावना रखता है।
इस व्याख्यान में गिरधर राठी कहते हैं कि एक तरह से देखें तो भारतीय कविता का आधुनिकीकरण उस युग में शुरु हो चुका था जिसमें देश के विभिन्न भागों में, बोलचाल की नयी-नयी भाषाओं में सृजन हुआ। चाहें तो इस तिथि को चर्यापदों यानी ईस्वी 900-1000 तक खींच ले जा सकते हैं। वह आगे कहते हैं - हम यह न भूलें कि यूरोप में जो अंधकार युग था, वह युग कविता और कई कलाओं, दर्शन आदि के मामले में भारत में सृजनशीलता का उत्कर्ष दौर था।
आधुनिकीकरण के संबंध में उनका मत है कि संस्कृत की जगह कन्नड, मराठी, अवधि आदि भाषाएँ काव्य-भाषा में बदलाव लाने में समर्थ हुईं। जीवनानन्द दास और रवीन्द्रनाथ ने बांग्ला में लिखते हुए काव्यभाषा बदल दी थी। लेकिन वर्तमान उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में आधुनिक होने के लिए समझा गया था अंग्रेजी में लिखें। वही भूत फिर सवारी गाँठ रहा है।
गिरधर राठी अनेक उदाहरणों और तर्कों के बाद कहते हैं - आधुनिक, आधुनिकता, आधुनिकवाद और आधुनिकीकरण आदि शब्द अब उतने सरल और बोधगम्य नहीं रहे, जैसे वे शायद शुरू में रहे होंगे।
वे बताते हैं भारत में आधुनिकीकरण का पहला औजार शायद प्रिन्टिंग प्रेस ही था। सेरामपुर मिशन प्रेस 1800 ईसवीं में लगा और कई भाषाओं में पठन सामग्री छपने लगी। फलतः कविता के सम्प्रेषण के पारम्परिक माध्यम नष्ट होने लगे।
गिरधर राठी के अनुसार बीसवीं सदी की शुरुआत में आधुनिकीकरण का दूसरा दौर देखा जा सकता है जब प्रायः हर भाषा में रोमांटिक काव्यधारा का वर्चस्व कायम होने लगा था। इसके उपरान्त वे अत्यंत विस्तार पूर्वक आज के आधुनिकता के तीसरे चरण की व्याख्या करते हैं।
वे आधुनिकतावाद को विष्वव्यापी पडताल करते हुए कई उलझनों को सामने लाते हैं। आधुनिकीकरण की बहस में उत्तर-आधुनिकता की बहस को शामिल करना वे जरुरी मानते हैं। इसके बाद वे उत्तर-आधुनिकता के मैदान में चल रही गतिविधियों की ओर हमें ले जाते हैं। इस आलेख के अन्त में दी गई संदर्भ सूची महत्त्वपूर्ण है।
इस संदर्भ में दूसरा आलेख देखना भी जरुरी है। आजादी के पहले और आजादी के बाद में वे एक महत्त्वपूर्ण प्रस्तावना रखते हैं - हिन्दी कविता के संदर्भ कविताएँ ही रहीं, वे सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियाँ नहीं जो यहाँ मौजूद थीं। बल्कि भारत ने अपने समानान्तर परिस्थितियों वाले देशों की ओर देखना भी गवारा नहीं किया। मसलन, लातीनी अमरीका या अफ्रीका के देश, जहाँ न केवल कविता बल्कि चित्रकला, स्थापत्य और संगीत तक गहरे अर्थ में सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक संदर्भ से जुडे थे। लातीनी अमरीका कविता के आधुनिकतावाद में और भारत की कविता के आधुनिकतावाद में यही बुनियादी फर्क है।
अगले लेख हिन्दी कविता का फिलहालः कुछ नोट्स में वे मानते हैं कि निजी राय के तौर पर ही सही, फिलहाल यह कहना गलत नहीं होगा कि मुक्तिबोध एक ऐसे पडाव हैं जहाँ आकर रुकना और सोचना, आगे-पीछे देखना अनिवार्य हो जाता है। उन्होंने काव्यानुभव और भाषा-प्रयोग के प्रति हिन्दी कविता को अतिरिक्त रूप से सजग किया है। इस आलेख के अंत में वह हिन्दी आलोचना की बात करते कहते हैं- आलोचक के सामने अपार सामग्री है, अब भी वह पिछड गया, तो हिन्दी आलोचना कोई नहीं बचा सकेगा ! कवि का रास्ता अगरचे हमेशा की तरह मुश्किल है।
गिरधर राठी अपने लेख समाज में कविता में कविता की एक नई परिभाषा ही रचते हैं - लेकिन बात व्यापक और गहरे अर्थ में कविता की है, जहाँ वह दृष्टि है, जीवन-जगत को जानने-समझने का एक बुनियादी, आन्तरिक मानव-सुलभ औजार है, जो ज्ञात जीवन-जगत में सिर्फ मनुष्य को प्राप्त है - भाषा, हंसी, स्मृति, बुद्धि और चेतना की ही तरह, जो किसी ज्ञात प्राणी में ऐसे नहीं मिलते। एक ऐसा औजार, जो बुद्धि, तर्क, इन्द्रिय-सम्वेदन और प्रत्यक्ष प्रयोग जैसे औजार की ही तरह सत्य और यथार्थ को पहचानने, परिभाषित करने और बदलने में समर्थ है।
इसी लेख में वे कहते हैं कि हर व्यक्ति कवि नहीं होता पर हरेक में कविता होती है। परिपूर्ण मनुष्य का यह प्रकृति दत्त गुण है जिसे खोकर वह अधूरा रह जाता है। इसके साथ ही आगे चलकर एक मजेदार और गंभीर टिप्पणी करते हैं - कविता कुछ सिरफिरे लोगों की शरण में है क्योंकि कविता के बिना ये सिरफिरे अपना जीवन व्यर्थ समझते हैं।
शब्द की शक्ति पर अविश्वास लेख में गिरधर राठी अत्याधुनिक इलेक्ट्रानिक - मीडिया के युग में कविता देखने की चीज बनायी जा रही है सुनने की बहुत कम। कविता शब्द पर आधारित विद्या है। शब्द में ध्वनि और अर्थ ये दोनों औजार उसे प्राप्त हैं। देखने में कविता के ये औजार लुप्त हो जाते हैं।
गिरधर राठी शीतयुद्ध की समाप्ति पर कविता में लिखते हैं कि सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप कवियों का एक समूह ऐसा था जिनके लिए सरकार द्वारा हर तरह की विशेष सुविधा सुलभ करा दी जाती थी। पर वहीं कवियों को दूसरा समूह ऐसा था जो निर्वासन, कारागार, सामाजिक बहिष्कार और मौत के लायक समझा जाता था। अनेक कवियों के दारुण जीवन की व्यथ बताते हुए हमारे देश की परिस्थितियों की तुलना करते कहते हैं- भारत में आपातस्थिति में इसका कुछ-कुछ आभास बहुत से लेखकों को मिला थ, या फिर नक्सलवादी लेखकों-कवियों को लें जिन्हें बिना आपातकाल के भी कारागार और यातनाएँ मिलती रहीं हैं, अब भी मिल रही हैं।
हमारे देश में निर्वासन, कारागार, आपातकाल में यातनाएँ झेल चुके लेखकों, कवियों के बारे में बहुत कम लिखा जाता है। आजकल नक्सलवादी लेखकों और कवियों की यातनाओं को लेकर जिस तरह की चुप्पी है वह कविता की आत्मा की चुप्पी बन गई है।
कविता का फिलहाल में गिरधर राठी के 38 समीक्षात्मक लेख है जिनमें में वे रघुवीर सहाय, नागार्जुन, त्रिलोचन, विजयदेव नारायण साही, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण मलयज, नन्दकिशोर आचार्य, विनोद भारद्वाज, पाश, सीताकांत महापात्र, असद जैदी सहित विश्व के दो कवियों का गहनता से मूल्याँकन करते हैं।
रघुवीर सहाय की आधुनिक हंगारी कविता के अनुवाद के बहाने गिरधर राठी हमें हंगरी देश के जीवन के विस्तार में ले जाते हैं। इस केरल जैसे देश की भाषा जो भोजपुरी की लय, ध्वनि और संगीत की याद दिलाये और व्याकरण में संस्कृत की नियम-बहुलता की। एक देश जो लगभग 45 साल कम्युनिस्ट रहने के बाद अब एक बहुदलीय लोकतंत्र में परिणत हो गया है। इससे स्पष्ट होता है कि किसी देश की कविता पर बात करने के साथ उस देश की सांस्कृतिक विरासत को भी समझना कितना जरुरी है।
हंगरी की कविता के संदर्भ में गिरधर राठी उस देश की नियति के बारे में बताते हैं जिस समाजवाद का उसने वरण किया था, वह न केवल छलावा और त्याज्य निकला, बल्कि शोषण-उत्पीडन-पाखण्ड का भी वह वाहक बना। नया रास्ता अगर पूँजीवाद का है, तो उसकी कमियों और उसके अन्याय तो सौ-डेढ सौ साल से जग-जाहिर हैं। समाजवाद का साम्यवादी रूप भी मर्ज की दवा नहीं था। पर मर्ज तो है - अन्याय, विषमता, अत्याचार, प्रदूषण, शस्त्रास्त्र, विनाश यह मर्ज हर देश में व्याप्त है पर कविता इस तरफ कम देखती है।
विजयदेव नारायण साही सच्चे अर्थों में अप्रितम और अद्वितीय कवि हैं। गिरधर राठी लिखते हैं साही के अपने खास रंग की कविता ऐसी है जैसी हिन्दी में किसी भी कवि ने नहीं लिखी- निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय, रघुवीर सहाय और अनेक पीढियों के समर्थ कवि इनमें शामिल हैं। वह आगे स्पष्ट भी करते हैं - यह कहना इनमें से किसी की भी कविता की या इतिहास में इनके योगदान की अवमानना नहीं है।
अपनी बात की पुष्टि में वे साही की कविता लकीर की समाप्ति पर एक आदमी शीर्षक कविता और उसकी पंक्तियाँ उद्धृत करते हैं -
जहाँ तक निशान बनता है,
जमीन पुरानी पडती जाती है।
लेकिन जहाँ वह खडा होता है
उसके आगे सिर्फ एक शून्य रहता है
जो पैर पडते ही
जमीन में बदल जाता है।
गिरधर राठी का मानना है कि ये पंक्तियाँ ऐसी है जो अन्यत्र कहीं नहीं मिलेंगी - इनसे मिलती-जुलती भी नहीं। इस संदर्भ में पूरी कविता को बल्कि पूरे संग्रह साखी - को पढने का आग्रह करते हैं। वे यह भी कहते हैं साही की कविता कारखाने में बनने वाला थोक माल नहीं है। इस अर्थ में साही की कविता आधुनिक औद्योगिक-सभ्यता का उत्पादन नहीं है - उस पर एक अटल प्रश्नचिन्ह है।
कविता पर एकाग्र इस संकलन में कुँवर नारायण पर तीन लेख हैं। इनके तीन शीर्षकों में ही कुँवर नारायण होने का अर्थ निहित है - आदमी की तरह जिन्दा रहने की कोशिष, कट्टरता के खिलाफ क्लासिकी कविता, कवि की उपस्थिति। इस सिलसिले में कुँवर नारायण के शब्दों में ही बताते हैं - कवि मूलतः विचारक नहीं आवश्यक विचारक भी है। उसका काम हमें बौद्धिक बनाना नहीं, बुद्धिमत्ता के प्रति सम्वेदनशील बनाना है, हमारी समझ के उपकरणों को पैना रखना है ताकि हम वास्तविकता को बुद्धि, मन और प्रज्ञा के विभिन्न स्तरों पर साथ-साथ ग्रहण कर सकें।
आत्मजयी का उल्लेख करते हुए गिरधर राठी कहते हैं कुँवर नारायण की जिज्ञासाएँ, विशुद्ध दार्शनिक न होकर मानवीय, मानवीय जीवन और मानवीय संसार की जिज्ञासाएँ हैं। गिरधर राठी के अनुसार कुँवर नारायण की हाड-मांस के मनुष्य को भुलाकर किसी अति-मानव या परा-मानव की सत्ता में - उनकी दिलचस्पी नहीं है। एक तरह से भारतीय अर्थों में, उनके प्रश्न प्रज्ञा के नहीं बुद्धि के हैं और मन के हैं। वे आगे कहते हैं अगर कुँवर नारायण की कविता का घोषणा-पत्र एक पंक्ति में लिखना हो, तो कहा जा सकता है कि उनकी कविता अमानवीयकरण के विरुद्ध युद्ध है।
गिरधर राठी के अनुसार युद्ध कुँवर नारायण के रचना-संसार का केन्द्रीय रूपक है। यहाँ तक कि उनकी पहली कविता पुस्तक का नाम चऋव्यूह, एक दूसरी कृति का आत्मजयी और एक कविता संग्रह का आमने सामने। गिरधर राठी उनके कहानी संग्रह आकारों के आसपास में भी अनेक कहानियोँ के शीर्षकों में उपस्थित किसी युद्ध का उल्लेख भी करते चलते हैं। कुँवर नारायण के युद्ध उस अर्थ में युद्ध नहीं है जो किसी को पराजित करने, विजय प्राप्त कर आधिपत्य स्थापित करने के युद्ध होते हैं।
गिरधर राठी अपनी बात आगे बढाते हुए यह भी स्पष्ट करते हैं कि हजारों साल से आदमी की तरह जिन्दा रहने की कोशिश में लगा यह आदमी खुद आक्रामक नहीं है। उसमें थोडी-बहुत आक्रामकता अगर दिखती भी है तो बंधे शिकार की प्रतिहिंसा के रूप में। वह खुद विवशता में युद्धरत है। उसका युद्ध राजसत्ता की महत्त्वाकांक्षा से प्रेरित नहीं है।
गिरधर राठी अपने अगले लेख में कुँवर नारायण के कविता संग्रह इन दिनों की चर्चा करते हुए कहते हैं इन दिनों समाज और राजनीति में किस्म-किस्म की कट्टरताएँ फिर से जोर पकड रहीं है। ऐसे में हिन्दी का यह सौभाग्य है कि कुछ कवि अभी भी अपने बनाये रास्तों पर चल रहे हैं।
कुँवर नारायण पर तीसरा आलेख हिन्दी-साहित्य में व्याप्त आचार-विचार की खबर लेता और देता है। आम पाठक और लेखक जो साहित्य की अन्तरधाराओं को समझ नहीं पाते हैं के लिए यह आलेख एक पाठ-सा लगता है। गिरधर राठी बताते हैं कि लेखक संघों के मुखपत्रों समेत सैकडों पत्रिकाओं में कुँवर नारायण उन दसियों बडे लेखकों की श्रेणी में पाये जाते हैं जिनका नाम कोई भूले से भी नहीं लेता।.... तुलना में, सहमति में, असहमति में - या किसी भी बहाने। छिटपुट उदाहरणों को छोड भी दें तो कुँवर नारायण की उपस्थिति नोट करने वाले लेखकों में से अज्ञेय, साही, मलयज, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह जैसे दर्जनों नाम नदारद है। ध्यान रहे कि अज्ञेय के तीसरा-सप्तक में कुँवर नारायण मौजूद हैं, और अज्ञेय से कवि के संबंध अच्छे ही रहे होंगे। यह पढकर और जानकर एक पाठक को धक्का-सा लगता है कि साहित्य के ऊँचे-ऊँचे पर्वतों पर भी उन्मुक्त विचारों का सुखाड है।
गिरधर राठी की कविता का फिलहाल पुस्तक उस पर लिखते रहने को बाध्य करती है। पर हमें उनके कुछ लेखों की भंगीमा में समस्त का आस्वाद मिल जाता है। फिर भी हमारे देश में कविता के फिलहाल को देखते हुए क्यूबा किस्सा जानना-समझना जरुरी लगता है। क्यूबा के कवि नीकोलास गीयेन कुमारन को आशान पुरस्कार दिया गया था। चूंकि बीमार और बूढे गयेन केरल नहीं आ सके, इसलिए कविवर अय्यप पणिक्कर पुरस्कार भेंट करने क्यूबा गये। वहीं वे देखते क्या है कि कविवर गीयेन मंच पर विराजमान हैं और क्यूबा के सर्वेसर्वा फिदेल कास्त्रों खडे हैं। पूरे समारोह में कास्त्रों (मानो हाथ बांधे) खडे रहे।
इस तरह हम गिरधर राठी को पढते हुए न केवल कवि और कविता वरन् लोगों के बारे में भी जान पाते हैं जिनके लिए कविता लिखी जाती है। ठीक इससे उल्टा भी कविता की उस दुनिया की भीतरी दुनिया को समझ पाते हैं जिसमें कविता जन्म लेती है।
हम पाते हैं कि कवि और उसके पाठक दोनों की दुनिया बहुत जटिल है। हमारी दुनिया की तरह उनकी दुनिया में भी कई-कई भेद-विभेद हैं। हमारी दुनिया में हमारे दुःखों का कारण अगर अज्ञान है, तो जिसे हम साहित्य की दुनिया कहते हैं उसकी जटिलताएँ उसके ज्ञान से उपजती हैं। गिरधर राठी जैसा साहस और सत्य से भरा व्यक्ति ही अपनी हथेलियोँ पर रखकर दिखा सकता है - कविता का फिलहाल - लो ये रही कविता.....।
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वश चलता तो मैं उन्हीं किताबों में दिन-रात डूबा रहता जो हमें विचारों के अपरंपार संसार का साक्षात्कार कराती हैं। व्यक्ति, समाज, साहित्य-कला, दर्शन, विज्ञान, राजनीति...... कोई ऐसा विषय-क्षेत्र नहीं है, जिसमें आदिमकाल से अब तक हुए तर्क-वितर्क जो हमें अब किताबों के रूप में सुलभ हैं, अनेक भाषाओं और लिपियों में - रोमांचित करें।
गिरधर राठी अपनी पुस्तक सोच-विचार की प्रस्तावना में अपने उक्त विचार रखते हुए आगे कहते हैं - विचार कहीं से भी मिलें, अगर हमें रुचे तो बेशक हमें अपना ही लेना चाहिए। उनकी पुस्तक सोच-विचार के लेखों को पढते हुए हम उनसे सहमत हो जाते हैं। गिरधर राठी की इस पुस्तक में उनके 44 लेख हैं जो (अ) सोच-विचार 17 (ब) भाषा 15 और (स) नाटक सिनेमा 12 लेख हैं।
गिरधर राठी की पुस्तकें दोनों तरफ से जलने वाले दीपक की तरह होती हैं। उन्हें किसी भी सिरे से पढा जाए प्रकाश दीपदिपाता रहता है। सोच-विचार खण्ड का अंतिम लेख केनन तैयार है को सबसे पहले देखना विश्व संस्कृति और साहित्य के उस घटाटोप को समझना है जो किसी लेखक-पाठक पर छाया रहता है।
इस शब्द के बारे में गिरधर राठी कहते हैं कैनन शब्द दो हिज्जे, दो अर्थ लेकिन उच्चारण एक है। एक कैनन है - तोप। दूसरा कैनन है - बाइबल के उन भागों की सूची जिसे वेटिकन (रोम) से मान्यता प्राप्त हैं। कैनन शब्द अपनी परम्परा को पहचानने के अर्थ में प्रयोग आता है। किसी साहित्य का कैनन उस के रचनाकार ही बनाते हैं। इसमें परम्परा का आदि स्त्रोत खोजा जाता है फिर उसी परम्परा के नाम निर्धारित होते रहते हैं। गिरधर राठी कहते हैं - कैनन यह बताता है कि हमारे असली ग्रन्थ कौन-से हैं, हमारे असली लेखक कौन-कौन से हैं। और खींच लें, तो कहें हमारे कौन-से साहित्य सिद्धान्त कैनन में है, कौन बाहर।
धर्म के साथ-साथ साहित्य की राजनीति में भाकपा, माकपा और भाजपा आदि राजनीतिक दल और उनसे जुडे लेखक संगठन कैनन की अंधेरी गलियों में धकेले जा रहे हैं। लेख के अंत में गिरधर राठी की टिप्पणी उल्लेखनीय है - खैर, सिखाने वाला मैं या मेरे जैसा कोई और हो भी क्यों ? हम जिनसे मुखातिब हैं, वे सभी पढे-कढे समझदार व्यस्क हैं, कुछ तो हम जैसों के बुजुर्ग हैं, हर दृष्टि से। तर्क-वितर्क की गुंजाइश बनी रहे - और कुतर्क का जवाब दिया जा सके - इतना भर आकाश खुला रहे तो गनीमत है ! साहित्य के इस कैनन को समझने के बाद हर लेखक और हर पुस्तक को पढना सहज हो जाता है।
पश्चिमी यूरोप और अमरीका के विचारकों में आधुनिकता की अपेक्षा उत्तर आधुनिकता की सुगबुगाहट दूसरे विश्वयुद्ध के आसपास नजर आने लगी थी। अब हमारे देश में भी साहित्यिक बहसों में उत्तर-आधुनिकता घर करती जा रही है।
गिरधर राठी 1991 में लिखे अपने लेख में कहते हैं कि रघुवीर सहाय बहुत थोडे रचनाकारों में गिने जाएँगे जो इस दौर में भी आधुनिकता की बात करते थे। रघुवीर सहाय का अनेक सवालों में एक सबसे ज्वलन्त सवाल यह था कि हिन्दी भाषा और हिन्दी भाषी क्षेत्र, जिस पर कभी पूरा देश गर्व कर सकता था क्योंकि उसकी सोच हमेशा सार्वदेशिक हुआ करती थी, अचानक इतना संकीर्ण, साम्प्रदायिक और खूंखार क्यों हो उठा है ? हिन्दू धर्म, जिसकी सबसे बडी खूबी हमें यह रही है कि उसने सभी धर्मों, सम्प्रदायों और मतवादों को उदारता से देखा, समझा और सहजीवी बनाया है, जिसके प्रतीक जैसे राम - एक विराट मानवीय सहिष्णुता और मर्यादा के प्रतीक थे, आज सहसा हिंसक और शत्रु-अन्वेषक प्रतीक कैसे बन गये हैं।
रघुवीर सहाय के ये प्रश्न शाश्वत हमारे सामने और भी गहनता से हमारे सामने खडे हैं। गिरधर राठी हमारे समाज में निहित आधुनिकता की सर्वमान्य परिभाषा पश्चिमीकरण में देखते हैं। वे कहते हैं कि आधुनिकता की जो दूसरी छवि हमारे यहाँ साम्यवादी विचार प्रणालियों के माध्यम से आयी हैं।
गिरधर राठी आधुनिकत और उत्तर-आधुनिकता का श्रेष्ठ समन्वय रघुवीर सहाय में देखते हैं - आधुनिकता के अभिशाप-सन्त्रास, अकेलापन, असुरक्षा जैसी भावस्थितियाँ, जो कथित आधुनिक भारतीय साहित्यकारों में प्रायः पश्चिमी साहित्य की प्रतिच्छाया जैसी लगती हैं, रघुवीर सहाय के यहाँ भारत के ठोस प्रसंग-जगत में कुछ और ही अर्थ देती हैं। आधुनिकता की मार में अकेला पडता आदमी और औरत बच्चे रघुवीर सहाय के यहाँ कुछ अलग और अधिक विशसनीय जान पडते हैं।
अमृता शेरगिल में गिरधर राठी पूर्व-पश्चिम का टकराव, पुरुष प्रधान समाज में नारी का अपनी इयत्ता के लिए संघर्ष मानते हैं। वे अपने लेख आधुनिकता की शुरुआतः अमृत शेरगिल में कहते हैं अमृता शेरगिल ने भी कहा है कि वह भारत की गरीबी को अपने चित्रों में अंकित करना चाहती हैं। तत्कालीन भारतीय कला जगत में यह इच्छा अपने-आप में एक नयी उद्भावना थी।
गिरधर राठी आधुनिकता के संदर्भ में अमृता शेरगिल के चित्र भारत माँ का उल्लेख करते हुए कहते हैं यह चित्र अपनी संरचना और विषयवस्तु के लिहाज से काफी आलोचना का शिकार हुआ है।
एक अकाल वृद्ध युवती की गोद में चेहरे की उभरी हुई हड्डियों वाला शिशु और बगल में एक नन्हीं बालिका भारत की गरीबी और दैन्य का चित्रांकन हैं। गिरधर राठी आगे कहते हैं कि चूंकि उनका उद्देश्य यथातथ्य चित्रण न होकर एक विचार या अनुभूति की अभिव्यक्ति था, इस अर्थ में अगले चित्रों में ‘अमूर्तन’ बढता गया है। ब्रम्हचारी और वधू का शृंगार चित्रों में इस प्रसंग की परिपक्व अभिव्यक्ति हुई हैं।
गिरधर राठी सोच-विचार के इस ऋम को आगे बढाते हुए आधुनिकता की सीमाएँ: विपिन कुमार अग्रवाल का गहन और व्यापक मंथन करते हुए उत्तर-आधुनिकता के दायरे लेख तक पहुँचते हैं। वे कहते हैं -उत्तर-आधुनिकता के इस विराट परिदृश्य को देखते हुए यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि उत्तर-आधुनिकता में वही सब हो रहा है, जो आधुनिकता में होता रहा। दरअसल, उत्तर-आधुनिकता ने उन तमाम बुनियादी तात्विक-दार्शनिक मान्यताओं को चुनौती दी है, उनको बुरी तरह झकझोर दिया है, जिनके आधार पर आधुनिकता अभी तक हावी थी।
गिरधर राठी स्पष्ट करते हैं कि पर्यावरण आन्दोलन उत्तर-आधुनिकता की देन है, आधुनिकता की नहीं, आधुनिकता के तहत तो हम जंगल काट रहे थे और हम समझते थे कि विज्ञान के जरिये हम जो चाहें कर सकते हैं। वे आगे कहते हैं कि अतः एक प्रकार से उत्तर-आधुनिकता भी आज की अत्यंत जटिल और संश्लिष्ट परिस्थितियों को समझने का एक तरीका है, जो दरअसल, पुरानी यथार्थवादी पद्धतियों से पकड में नहीं आती।
सोच-विचार के पहले खंड में रमेशचन्द्र शाह, निर्मल वर्मा, अशोक वाजपेयी, गुलेरी और डोरिस लेसिंग आदि को उनके व्यापक संदर्भों की व्याख्या करते हैं।
सोच-विचार का दूसरा खंड भाषा के सवालों पर केन्द्रित है। इसमें हिन्दी, उर्दू, भाषा-बोली, शब्द और कर्म, अनुवाद और कला से विज्ञान तक शीर्षक लेख हैं। इन लेखों की गिरधर राठी विश्वकी भाषाओं में होने वाले रूप परिवर्तनों की विस्तार पूर्वक व्याख्याएँ करते हैं। वे कहते हैं बीसवीं सदी के इन अंतिम वर्षों में एक नयी हिन्दी जन्म ले रही है। इसे एशिया- अफ्र ीका-लातीनी अमरीका के कई देशों में प्रचलित पिजिन या त्रि*ओल जैसी गिट्टबिट्ट बोलियों के समकक्ष रखा जा सकता है। मोटे तौर पर ये बोलियाँ स्थानीय लोकभाषा में एक विदेशी (यूरोपीय) भाषा मिलने से बनी हैं।
शब्द और कर्म में गिरधर राठी कहते हैं कि कुछ शब्द हमारी भाषा से गायब से हो गये हैं। स्वराज की जगह अब एक महान, विकसित, गौरवशाली राष्ट्र बनाने की धुन सवार है। सत्याग्रह अब संघर्ष में बदल गया है। एक लेख अनुवाद के नट-बोल्ट वे मानते हैं कि सूचनाओं के विस्फोट से जो सबसे बडी दुर्घटना हुई है वह यह है कि भाषा एकार्थी होती जा रही है। हर चीज का जवाब आप कम्प्यूटर की भाषा में चाहते हैं और कम्प्यूटर हर चीज सरलतम, सुलझे हुए रूप में चाहता है।
नाटक, सिनेमा खंड में गिरधर राठी पृथीपाल सिंह वासुदेव, भारत में अंग्रेजी में लिखने वाले सशक्त लोगों में से एक माने जाने वाले का परिचय हिन्दी जगत से कराते हैं। फिल्म पटकथाएँ और नाटकों के बाद उनका हिन्दी में अनुदूतित एक नाटक रावण लंकाधिराज नाम से आया है। इसका हिन्दी अनुवाद हिन्दी गद्य के अनोखे शिल्पी अशोक सेकसरिया का है। नाटक लंकाधिराज राम और रावण की लडाई को सत् असत् की लडाई नहीं मानता, बल्कि दो सभ्यताओं आर्य और द्रविड के बीच का संघर्ष मानता है।
इसी प्रकार नन्दकिशोर आचार्य के नाटकों में एक सम्पूर्ण मनुष्य की भले ही विभिन्न पात्रों में उसे बाँट कर एक सम्पूर्ण मनुष्य की पहचान देखते हैं। हम अखबारों में रक्त की शुद्धता के सवालों पर कटने-मिटने वाले परिवारें की खबरें आज भी पढते हैं। नन्दकिशोर आचार्य के नाटक किमिदम् यक्षम्, हस्तिनापुर और गुलाम बादशाह में भी रक्त-संबंध को लेकर राजनीति और उत्तराधिकार के सवाल उठते हैं।
नन्दकिशोर आचार्य पर एक आलेख में गिरधर राठी कहते हैं - आचार्य जी मेरे मित्र हैं और मुझे विश्वास है कि वे भी मुझे अपना मित्र मानते हैं। ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर हम दोनों एकमत नहीं है। हमारी मित्रता की कसौटी शायद यही है कि जहाँ हम असहमत होते हैं, वहाँ स्पष्ट रूप से अपनी असहमति एक दूसरे को जता देते हैं।
भानु भारती का नाटक तमाशा न हुआ गिरधर राठी को इस तरह आगाह करता- सा दिखता है कि नाटक नाम की विधा के सामने चुनौतियों और दवाबों का विकराल अम्बार लगता जा रहा है। तमाशा न हुआ है में अभिनेता एकाएक केन्द्र में आते हैं और फिर दर्शकों में एक तरह से विलीन हो जाते हैं। गिरधर राठी कहते हैं- दर्शक जितना ही चिन्तनशील, संवेदनशील, प्रबुद्ध होगा, उतना ही उसके भीतर बहस का स्तर और बहस का दायरा बढता जायेगा।
इस खंड में फैजल अल्काजी यूरिपिडीज के नाटक मीडिया, कामूः न्यायी हत्यारे, योनोश हायः एक जिरह ईश्वर से, साहित्य और सिनेमा आदि महत्त्व के लेख हैं। इसमें गिरधर राठी का लेखन बहुत दूर तक जाता है और हमें आश्चर्य में बार-बार डालता है।
वे कहते हैं सिनेमा को हम सगुण और निर्गुण कलाओं के संदर्भ में देख सकते हैं। जैसे सगुण भक्ति बिम्ब, मूर्ति या प्रतीक पर, या उसकी कल्पना पर आधारित होती है ; निर्गुण भक्ति निराकार, अमूर्त और लगभग अज्ञेय शक्ति या बल की कल्पना के आधार पर होती है। वे आगे कहते हैं सिनेमा और साहित्य की परिणतियों में जबरदस्त फर्क नगर आता है...। सगुण बांधता है। निर्गुण मुक्त रखता है, भले ही मुक्त न करें। मुक्त शायद दोनों में से कोई भी नहीं करता। पर सिनेमा अपनी सगुणता के कारण बाँध देता है। वे याद दिलाते हैं कि गाब्रिएल गार्सिया ने अपने उपन्यास तन्हाई के सौ बरस पर फिल्म बनाने से मना किया था तो इसलिए कि नित्यसंभवा बहुरूपता, मुक्त साहचर्य से उत्पन्न वह रचनाशीलता और कल्पनाशीलता जो पुस्तक के हर पाठक को सुलभ है, फिल्म के दर्शक को सुलभ नहीं रहेगी।
सोच-विचार की यह विशेषता है कि इसमें दर्ज प्रतिस्थापनाएँ हमारे देश की समकालीन राजनीतिक व्यवस्था पर एक कठोर टिप्पणी की तरह चस्पा हो जाती है। गिरधर राठी की आलोचना/समीक्षा/विमर्श किसी विचारधारा के पक्ष में नहीं झुकता पर अपने-आप सहित अन्य को भी विचारों के कटघरे में रखता है। वे कहते हैं विचारधारा के अन्त की घोषणा जब पहले-पहल हुई थी तो बहुत साफ सामने आ गया था कि माक्र्सवाद, पूँजीवाद, समाजवाद या समाजवादी पद्धतियाँ बहुत अलग-अलग नहीं सब उद्योगवाद के ही पहलू हैं। इनके मूल आधार नहीं है, सिर्फ अपने मालिकाना रिश्तों को कुछ बदलने की चेष्टा की है।
* दोनों पुस्तकें संभावना प्रकाशन से प्रकाशित है।

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