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रामचंद्र शुक्ल का उपन्यास-चिंतन

आनंद पांडेय
रामचंद्र शुक्ल काव्य, विशेषरूप से महाकाव्य के आलोचक हैं। उनकी पद्मावत, रामचरितमानस और सूरसागर जैसे महाकाव्यों की आलोचनाएँ प्रसिद्ध हैं। अपनी आलोचना में वे बार-बार महाकाव्य या प्रबंधकाव्य को मुक्तक से श्रेष्ठ काव्य-रूप सिद्ध करते हैं। एक स्थल पर प्रबंध-काव्य को मुक्तक-काव्य से महत्त्वपूर्ण सिद्ध करते हुए वे लिखते हैं, यदि कोई इसके विचार का आग्रह करे कि प्रबन्ध और मुक्तक इन दोनों क्षेत्रों में कौन क्षेत्र अधिक महत्त्व का है, किस क्षेत्र में कवि की सहृदयता और भावुकता की पूरी परख हो सकती है, तो हम बार बार वही बात कहेंगे जो गोस्वामीजी की आलोचना में कह आए हैं अर्थात् प्रबंध के भीतर आई हुई मानवजीवन की भिन्न-भिन्न दशाओं के साथ जो अपने हृदय का पूर्ण सामंजस्य दिखा सके, वही पूरा और सच्चा कवि है।1 एक अन्य स्थल पर वे लिखते हैं, रससंचार से आगे बढने पर हम काव्य की उस उच्च भूमि में पहुँचते हैं, जहाँ मनोविकार अपने क्षणिक रूप में न दिखायी देकर जीवनव्यापी रूप में दिखायी पडते हैं। इसी स्थायित्व की प्रतिष्ठा द्वारा शीलनिरूपण और पात्रों का चरित्र-चित्रण होता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उच्च भूमि में आने पर फुटकरिये कवि पीछे छूट जाते हैं; केवल प्रबंधकुशल कवि ही दिखायी पडते हैं।2 जीवनव्यापी का अर्थ है मनुष्य के जीवन और उसके समाज का सर्वांगीण चित्रण। प्रबंध का रूप कथात्मक होता था। वस्तुतः, उनकी रुचि जीवन के विविध पक्षों और नाना व्यापारों को जानने में रही इसलिए वे महाकाव्य को अधिक पसंद करते हैं। कहना न होगा, जीवन और समाज को उसकी विविधता और विशदता में पहले महाकाव्य और अब उपन्यास ही चित्रित करते हैं। शुक्ल की प्रबंधप्रियता का यही कारण है।
आधुनिक काल में वे उपन्यास को अपनी इसी प्रबंधप्रियता अर्थात् कथाप्रियता के कारण पसंद करते हैं। वे न केवल उपन्यास की शक्ति और भूमिका को पहचानते हैं* बल्कि उसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा भी करते हैं। उन्होंने उपन्यास के विभिन्न पक्षों पर विचार किया है। वे उपन्यास की व्यवस्थित समझ रखनेवाले हिंदी के पहले आलोचक हैं। हिन्दी साहित्य का इतिहास में उन्होंने हिन्दी उपन्यास और हिन्दी में अनूदित उपन्यास साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास लिखा है। इसके अतिरिक्त उन्होंने उपन्यास नाम से उपन्यास पर एक सैद्धांतिक लेख भी लिखा है। हालांकि, यह निबंध कविता पर उनके निबंध कविता क्या है?, जिसे रामविलास शर्मा कविता ही नहीं, बल्कि सभी विधाओं पर लागू होता पाते हैं, जैसा व्यवस्थित और पर्याप्त नहीं है; न ही यह उपन्यास पर समग्रता में विचार करता है, जैसा कि कविता पर उक्त निबंध में किया गया है, फिर भी यह उनके उपन्यास-चिंतन को सामने लाने के कारण महत्त्वपूर्ण है। हिन्दी साहित्य का इतिहास के उपन्यास संबंधी अंशों के साथ मिलाकर इस निबंध को पढने पर स्पष्ट होता है कि उनका उपन्यास-चिंतन न केवल मौलिक है, बल्कि व्यवस्थित भी है। कहना न होगा, उपन्यास जैसी लोकप्रिय और सार्वदेशिक विधा पर सैद्धांतिक आलोचना की पश्चिमी परंपरा के सामने रामचंद्र शुक्ल का लेखन कोई बडा हस्तक्षेप नहीं है और न ही इसे उपन्यास-आलोचना और उपन्यास- सैद्धांतिकी के क्षेत्र में कोई कालजयी योगदान है, फिर भी इसका हिंदी में उपन्यास-आलोचना में आधारभूत, कालजयी और ऐतिहासिक महत्त्व है। यद्यपि शुक्ल के उपन्यास-चिंतन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है और हिन्दी में उपन्यास आलोचना की देशज समझ और विवेक के विकास में उनके उपन्यास-चिंतन की भूमिका का कोई अध्ययन भी नहीं हुआ है। यह कहने में कोई समस्या नहीं है कि जैसे साहित्य, आलोचना और साहित्येतिहास-लेखन के क्षेत्र में उनका योगदान आज भी मार्गदर्शक का काम कर रहा है वैसे ही उनका उपन्यास-चिंतन भी महत्त्वपूर्ण है। न केवल उपन्यासकारों के लिए उसमें बहुत कुछ सीखने योग्य है बल्कि उपन्यास के सिद्धांतकारों और विमर्शकारों के लिए भी वह सैद्धांतिक आधार का काम कर सकता है। इसके आधार पर हिंदी में उपन्यास की सैद्धांतिक-समीक्षा की दरिद्रता को दूर करने के सफल प्रयास किये जा सकते हैं।
यही नहीं, वे उपन्यास के पहले व्यवस्थित और प्रामाणिक आलोचक हैं। उनके पहले उपन्यास पर बालकृष्ण भट्ट (उपन्यास निबंध, 1983), काशीप्रसाद जायसवाल (हिंदी उपन्यास लेखकों को उलाहना, 1899), चन्द्रधर शर्मा गुलेरी (हिंदी के उपन्यास लेखकों के नाम, 1905) जैसे कुछ आलोचकों ने लेख लिखे हैं, लेकिन हिंदी में उपन्यास की सैद्धांतिकी निर्माण की व्यवस्थित शुरुआत इसी लेख से मानी जानी चाहिए। इस दृष्टि से यह हिंदी उपन्यास आलोचना का आदि सैद्धांतिक निबंध है और शुक्ल उपन्यास के आदि आलोचक-सिद्धांतकार हैं। उपन्यास नामक लेख का उपन्यास-आलोचना के क्षेत्र में वही महत्त्व है जो नाट्य-आलोचना में भारतेंदु हरिश्चंद के नाटक निबंध का और काव्य-आलोचना में स्वयं उनके कविता क्या है? का है।
रामचंद्र शुक्ल की आलोचना में जो स्थान महाकाव्य का है, वही उपन्यास का नहीं है। लेकिन इस तथ्य से उनकी मान्यता और प्राथमिकता का निष्कर्ष निकालना भ्रामक होगा। वे उपन्यास को महाकाव्य की तुलना में हीन मानते हों और आधुनिक काल में भी वे महाकाव्य को उपन्यास से उपयोगी और समर्थ साहित्य-रूप मानते हों, इसलिए महाकव्य उनकी आलोचना के केंद्र में है और उपन्यास उनकी आलोचना के केन्द्र में नहीं है; ऐसा नहीं है। ऐसे तुलनात्मक निष्कर्ष निकालने का अवसर उनकी आलोचना नहीं देती है। उनके उपन्यास-चिंतन, हिन्दी में उपन्यास साहित्य की दशा और दिशा सम्बन्धी उनकी चिंता और हिन्दी में उपन्यास के फलते-फूलते संसार को देखने की उनकी उत्कट लालसा को देखकर ऐसा मानना तर्कसंगत नहीं है। इसके कुछ व्यावहारिक कारण हो सकते हैं। इसका एक व्यावहारिक कारण बताते हुए नामवर सिंह ने लिखा है, आचार्य शुक्ल मूलतः काव्य के समीक्षक थे। यों इतिहास में उपन्यास, कहानी, नाटक आदि अन्य अंगों पर भी विचार किया गया है, परन्तु इन सबके विवेचन में उनका मन रमा नहीं। बात यह है कि उन्होंने उपन्यास आदि बहुत कम पढा था और शुक्लजी समीक्षा पढकर समीक्षा करने वाले व्यक्ति न थे, जैसा कि आजकल का चलन है।3 नामवर सिंह के इस आरोप को उपर्युक्त विवेचन के प्रकाश में यदि केवल उपन्यास तक ही सीमित रखकर देखें तो पाएँगे कि काव्य केन्द्रित साहित्यिक अभिरुचि रामचंद्र शुक्ल की उपन्यास-आलोचना की सीमा नहीं बनी है। जिस प्रबंधप्रियता और सशक्त उपस्थिति के कारण वे उपन्यास की ओर आकर्षित होते हैं और उस पर विचार करते हैं, उससे यह अनुमान करना अनुचित न होगा कि यदि उन्हें और उम्र मिली होती, तो हिंदी साहित्य के आधुनिक काल को गद्यकाल कहने वाले आलोचक गद्य की सर्वश्रेष्ठ विधा उपन्यास को अवश्य अपनी आलोचना का केन्द्रीय विषय बनाते।
महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि काव्य उनकी आलोचना के केन्द्र में है क्योंकि वे काव्य को उपन्यास से सशक्त विधा मानते थे, बल्कि महत्त्वपूर्ण यह है कि वे उपन्यास की क्षमता और प्रासंगिकता का आकलन कैसे करते हैं। आधुनिक काल के लिए वे किस विधा को चुनते हैं और प्रासंगिक मानते हैं। जब हम इस दृष्टि से देखते हैं, तो पाते हैं कि वे उपन्यास को आधुनिक काल के लिए महाकाव्य से अधिक प्रासंगिक और समर्थ साहित्य-रूप मानते हैं। वे लिखते हैं, वर्तमान जगत् में उपन्यासों की बडी शक्ति है। समाज जो रूप पकड रहा है, उसके भिन्न भिन्न वर्गों में जो प्रवृत्तियाँ उत्पन्न हो रही हैं, उपन्यास उनका विस्तृत प्रत्यक्षीकरण ही नहीं करते, आवश्यकतानुसार उनके ठीक विन्यास, सुधार अथवा निराकरण की प्रवृत्ति भी उत्पन्न कर सकते हैं।4
वे मध्यकालीन महाकाव्यों के आलोचक हैं, लेकिन अपने समय के लिए वे उपन्यास की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हैं, जबकि महाकाव्य को अप्रासंगिक और चुकी हुई विधा मानते हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिन्दी निबंध में वे लिखते हैं, पद्य में जायसी, सूर, तुलसी आदि के आख्यान काव्यों का समय एक प्रकार से बीत चुका था।5 उन्होंने भारतेंदु को इस बात का श्रेय दिया है कि हिन्दी साहित्य जो जीवन से कटकर पीछे रह गया था, उसे उन्होंने फिर से जीवन से जोड दिया और ...इतिहास, विज्ञान, उपन्यास, पुरावृत्त इत्यादि अनेक समयानुकूल विषयों की ओर हिन्दी को दौडा दिया।6 इन दोनों कथनों को एक साथ पढने से और स्पष्ट होता है कि आधुनिक काल के लिए वे महाकाव्य को एक चुका हुआ रूप-बंध मानते हैं तो उपन्यास को प्रासंगिक और संभावनाशील। उनके लिए आख्यान-काव्यों का समय बीत चुका है, तो उपन्यास समयानुकूल है। संभवतः इसीलिए उन्होंने अपने समकालीन महाकाव्यों की आलोचना नहीं की है। यह महत्त्वपूर्ण है कि जहाँ एक ओर वे महाकाव्य को एक चुका हुआ रूप-बंध मानते हैं और आधुनिक काल के किसी महाकाव्य को अपनी आलोचना का विषय नहीं बनाते हैं वहीं दूसरी ओर वे उपन्यास को एक प्रासंगिक विधा के रूप पहचानते हैं और हिन्दी में उसके फलने-फूलने की उत्कट आकांक्षा प्रकट करते हैं।
इसके अतिरिक्त, दुनियाभर के अधिकांश उपन्यास-आलोचक महाकाव्य का स्मरण किये बिना उपन्यास पर कोई चर्चा नहीं पूरी कर पाते। वे तरह-तरह से उपन्यास को महाकाव्य का उत्तराधिकारी सिद्ध करते हैं। लेकिन, रामचंद्र शुक्ल उपन्यास पर बात करते समय महाकाव्य का नाम तक नहीं लेते। दोनों की तुलना तो दूर की बात है। आलोचकीय विवेक इसे मात्र संयोग नहीं मान सकता। ये तथ्य हमें किस निष्कर्ष की ओर ले जाते हैं? स्पष्ट है, उन्होंने आधुनिक काल में उपन्यास को महाकाव्य से अधिक प्रासंगिक विधा के रूप में लिया है, बावजूद इसके कि उन्होंने काव्य केन्द्रित आलोचना लिखी है। उनके लिए महाकाव्य से उपन्यास की दूरी इतनी अधिक है कि वे उपन्यास को महाकाव्य का उत्तराधिकारी घोषित करना, जो कि आलोचना की एक रूढि है, आवश्यक नहीं समझते। यह उपन्यास की नवलता और अपूर्वता का दृढ स्वीकार है।
स्मरण रहे कि उनकी काव्य-केन्द्रीयता के पीछे एक आचार्य के रूप में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी छात्रों के लिए पाठ्यसामग्री के निर्माण की बाध्यकारी भूमिका का भी बडा हाथ है। जिसे उनकी अभिरुचि का साक्ष्य मान लिया गया है, वह उनके अध्यापक-धर्म के निर्वाह का साक्ष्य भी है। यह भी एक व्यावहारिक कारण है उनकी काव्य-केन्द्रित आलोचना का।
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उपनिवेशवाद की सांस्कृतिक विरासत और अनौपनिवेशीकरण के संदर्भ में साहित्य-रूपों, विशेषरूप से उपन्यास की भारतीयता का प्रश्न सामने आता रहा है। स्पष्ट है, उपन्यास एक विदेशी साहित्य-रूप है। इससे भी अधिक एक औपनिवेशिक साहित्य-रूप। निर्मल वर्मा जैसे कई भारतीय लेखकों और आलोचकों ने यह कहा है कि उपन्यास एक विदेशी साहित्य-रूप होने के कारण भारतीय आवश्यकताओं के साथ न्याय नहीं कर सकता है। नामवर सिंह ने भी अंग्रेजी ढंग का नावेल के समानांतर भारतीय उपन्यास के अस्तित्व को रेखांकित किया है और किंचित दुख के साथ लिखा है कि भारतीय लेखकों ने यदि अंग्रेजी ढंग का नावेल लिखने के स्थान पर भारतीय ढंग के उपन्यास-लेखन की देशज परंपरा को आगे बढाया होता तो बेहतर होता। वे उपन्यास को एक उपनिवेशवादी साहित्य-रूप मानते हैं और उपनिवेशवाद के तिरस्कार के लिए उपन्यास के अंग्रेजी-रूप के तिरस्कार को आवश्यक मानते हैं। वे कहते हैं, अंग्रेजी ढंग के नावेल का तिरस्कार करके ही बंकिमचंद्र के रोमांसधर्मी उपन्यासों ने भारतीय राष्ट्र के भारतीय उपन्यास की अपनी पहचान बनाने में पहल की। अंग्रेजी ढंग के नावेल का तिरस्कार वस्तुतः उपनिवेशवाद का तिरस्कार है। भारत से पहले अंग्रेजी ढंग के नावेल को उत्तरी अमेरिका ने अस्वीकार कर इस ढंग के नावेल का अनुकरण नहीं किया।7
नामवर सिंह ने उक्त भाषण में जिस अंग्रेजी ढंग का नावेल वाक्यांश का प्रयोग किया है, वह वास्तव में रामचंद्र शुक्ल का है। हिंदी साहित्य का इतिहास में लाला श्रीनिवासदास पर लिखते हुए उनके परीक्षागुरु को उन्होंने अंग्रेजी ढंग का हिन्दी का पहला मौलिक उपन्यास कहा। शुक्ल उपन्यास के पश्चिमी ढाँचे में कोई समस्या नहीं देखते हैं। इसलिए, उन्होंने न इसकी आलोचना की है, न विरोध किया है और न इसे उपनिवेशवाद के तिरस्कार से जोडकर देखा है। वे इसके भारतीयकरण को संभव मानते हैं। उदाहरण देकर वे समझाते हैं कि उपन्यास का ऐसा भारतीयकरण हुआ है कि यह समझना कठिन है कि यह एक आरोपित विधा रहा है। वे लिखते हैं, जिसे बहुत ही सुंदर ढंग से बंकिमचंद्र, रमेशचंद्र आदि ने भारतीय साहित्य में लिया- ऐसे सुंदर ढंग से कि यह जान ही न पडा कि वह कहीं बाहर से आया है।8
नामवर सिंह ने बंकिमचंद्र के उपन्यासों को अंग्रेजी ढंग के नावेल के बरक्स देशी परम्परा के उपन्यास कहा है। रामचंद्र शुक्ल इन उपन्यासों को विशुद्ध भारतीय नहीं मानते बल्कि यूरोपीय उपन्यास का पुराना रूप मानते हैं। उनके अनुसार इनमें काव्यात्मकता, रसात्मकता और नाटकीयता होती थी। इस प्रवृत्ति के कारण ये भारतीय कथात्मक गद्य प्रबंध के निकट पडते थे। वे लिखते हैं, उपन्यास के पुराने ढाँचे के संबंध में मैं एक बात कहना चाहता हूँ। वह यह कि वह कुछ बुरा न था। उसमें हमारे भारतीय कथात्मक गद्य प्रबंध के स्वरूप का भी आभास रहता था!9
इसका यह अर्थ नहीं है कि वे, निर्मल वर्मा की तरह, उपन्यास को भारतीय आवश्यकताओं के लिए अपर्याप्त मानते थे। वे उपन्यास के पश्चिमी ढाँचे को अपनाने का नहीं बल्कि उसकी शैली, अंतर्वस्तु और मूल्यबोध को अपनाने का विरोध करते हैं। उनकी स्पष्ट मान्यता है, इसमें तो कोई संदेह नहीं कि उपन्यास और छोटी कहानी दोनों के ढाँचे हमने पश्चिम से लिए हैं। हैं भी ये ढाँचे बडे सुन्दर। हम समझते हैं कि ढाँचों तक ही रहना चाहिए।10 रामचंद्र शुक्ल नामवर सिंह की तरह न तो उपनिवेशवाद के विरोध के लिए अंग्रेजी ढंग के नावेल के विरोध को आवश्यक मानते हैं और न ही निर्मल वर्मा की तरह उसे अपर्याप्त पाते हैं, बल्कि इनके विपरीत वे उपनिवेशवादी संस्कृति के प्रतिकार के लिए उपन्यास को एक सशक्त अस्त्र के रूप में देखते हैं। वे पश्चिम की संस्कृति की नकल को पश्चिम के ही सांस्कृतिक अस्त्र से दूर करने में कोई नैतिक और वैचारिक समस्या नहीं देखते हैं। वे उपन्यास के उपनिवेशवाद विरोधी रूप को पहचानते हैं तथा आवश्यकतानुसार उसके उपयोग पर बल देते हैं। वे लिखते हैं, समाज के बीच खानपान के व्यवहार तक में जो भद्दी नकल होने लगी है- गर्मी के दिनों में भी सूटबूट कसकर टेबुलों पर जो प्रीतिभोज होने लगा है- उसको हँसकर उडाने की सामर्थ्य उपन्यासों में ही है।11 यहाँ यह जोड देना अवांतर न होगा कि पश्चिमी शिल्प को अपनाने के बावजूद रामचंद्र शुक्ल का उपन्यास-सिद्धांत उसकी आत्मा को भारतीय बनाने पर बल देता है जबकि निर्मल वर्मा के उपन्यास उनके उपन्यास-सिद्धांत का अतिऋमण करते हुए देह और आत्मा दोनों से पश्चिमी हैं।
रामचंद्र शुक्ल उपन्यास के पश्चिमी ढाँचे तक ही सीमित रहने के अपने सिद्धांत का कडाई से पालन करते हैं और उपन्यास की पश्चिमी शैली, प्रवृत्ति और संस्कृति की नकल करने का विरोध करते हैं। यही नहीं, वे इसे उपन्यास-आलोचना के एक आवश्यक प्रतिमान के रूप में स्थापित करते हैं। लेकिन, वे पश्चिम के अंधविरोधी नहीं हैं। साहित्यिक और सांस्कृतिक मामलों में वे न देशी कट्टरता को उचित मानते हैं और न ही पश्चिम के अंधानुकारण को। इस सम्बन्ध में उनकी साहित्य-दृष्टि संतुलित और विवेकसम्मत है। वे लिखते हैं, हमारा यह तात्पर्य नहीं कि योरप के साहित्यक्षेत्र में उठी हुई बातों की चर्चा हमारे यहाँ न हो। यदि हमें वर्तमान जगत् के बीच से अपना रास्ता निकालना है, तो वहाँ के अनेक वादों और प्रवृत्तियों तथा उन्हें उत्पन्न करनेवाली परिस्थितियों का पूरा परिचय हमें होना चाहिए। उन वादों की चर्चा अच्छी तरह हो, उन पर पूरा विचार हो और उनके भीतर जो थोडा बहुत सत्य छिपा हो, उसका ध्यान अपने साहित्य के विकास में रखा जाय।12 इसी साहित्य और संस्कृति विवेक के साथ वे उपन्यास के ढाँचे को अपनाने की बात करते हैं और साथ ही ढाँचे तक ही सीमित रहने की हिदायत भी देते हैं।
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शुक्ल ने उपन्यास को एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में देखा है। लेकिन, वे उपन्यास को राजनीति का अनुगामी नहीं बनने देना चाहते। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके लिए उपन्यास अराजनीतिक रूप है और वे राजनीति के साथ उपन्यास को खडा नहीं होने देना चाहते। वे उपन्यास को राजनीति के साथ खडा होने, उसके साथ सहानुभूति दिखाने, उसकी सहायता करने, उससे सहयोग करने और उसका वर्णन करने में कोई समस्या नहीं देखते। वे उपन्यास की राजनीतिक भूमिका को समझते हैं और उसे स्वीकर भी करते हैं। उनके अनुसार उपन्यास यह भूमिका अपने ढंग से निभाता है। उपन्यास के शिल्प को राजनीतिक अस्त्र के रूप में लेने में उन्हें कोई समस्या नहीं दिखती है। उनके अनुसार समस्या तब उत्पन्न होती है जब उपन्यास अपने विवेक को भूलकर राजनीति को केवल राजनीतिक दलों की दृष्टि से देखने लगता है, जब वह सदा राजनीति के इशारों पर नाचने लगता है। वे उपन्यास को राजनीति से ऊपर और आगे चलता हुआ देखना चाहते हैं। उपन्यास की राजनीतिक भूमिका और राजनीति से उसके संबंध को परिभाषित करते हुए वे लिखते हैं, कहने का तात्पर्य यह कि हमारे उपन्यासकारों को देश के वर्तमान जीवन के भीतर अपनी दृष्टि गडाकर देखना चाहिए, केवल राजनीतिक दलों की बातों को लेकर ही न चलना चाहिए। साहित्य को राजनीति के ऊपर रहना चाहिए; सदा उसके इशारों पर ही न नाचना चाहिए।13
साहित्य और राजनीति का स्वभाव अलग-अलग है। एक ही उद्देश्य से, एक ही समस्या पर दोनों अपने-अपने ढंग से आगे बढते हैं। जब साहित्य राजनीति का अनुगमन करने लगता है तब वह अपने स्वभाव से दूर होकर प्रोपगैंडा में बदल जाता है। शुक्ल ने उपन्यास के स्वभाव को सुरक्षित रखने के लिए उसे प्रोपेगेंडा का माध्यम बनाने की प्रवृत्ति का विरोध किया। उन्होंने अपने प्रिय उपन्यासकार प्रेमचंद की भी इसीलिए आलोचना की क्योंकि उनके उपन्यासों में कहीं-कहीं राजनीतिक प्रोपेगैंडा की प्रवृत्ति दिखायी देती है। वे उपन्यास में सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ के चित्रण पर बल देते हैं। इसे वे उपन्यास की एक भूमिका के रूप में लेते हैं। लेकिन, वे उपन्यास को प्रोपेगैंडा बनाने के विरोधी थे। उनके अनुसार राजनीतिक और सामाजिक आन्दोलनों के चित्रण मात्र से कोई उपन्यास प्रोपेगैंडा नहीं हो जाता है, बल्कि कलात्मक अपरिपक्वता और दक्षता के अभाव के कारण उपन्यास प्रोपेगैंडा बन जाता है। इस तरह हम देखते हैं कि वे उपन्यासकार से एक कलात्मक संतुलन की अपेक्षा करते हैं। उपन्यास को प्रोपेगैंडा से अलग करते हुए वे लिखते हैं, सामाजिक और राजनीतिक सुधारों के जो आंदोलन देश में चल रहे हैं उनका आभास भी बहुत से उपन्यासों में मिलता है। प्रवीण उपन्यासकार उनका समावेश और बहुत सी बातों के बीच कौशल से करते हैं। प्रेमचंदजी के उपन्यासों और कहानियों में भी ऐसे आंदोलन का आभास प्रायः मिलता है। पर उनमें भी जहाँ राजनीतिक उद्धार या समाज सुधार का लक्ष्य बहुत स्पष्ट हो गया है वहाँ उपन्यासकार का रुख छिप गया है प्रचारक (प्रोपेगैंडिस्ट) का रूप ऊपर आ गया है।14 यहाँ उन्होंने न केवल अपनी उपन्यास की उत्कृष्ट समझ का परिचय दिया है बल्कि यह शिक्षा भी दी है कि उपन्यासकार कैसे सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर प्रोपेगैंडा से बचते हुए अच्छे उपन्यास लिख सकते हैं। यह मान्यता इस बात का प्रमाण भी है कि मध्यकालीन कविता, इतिहास और साहित्यशास्त्र पर केन्द्रित रहने के बावजूद वे अपने समकालीन उपन्यास पर कैसी पैनी दृष्टि रखते थे और उसकी निर्मम आलोचना भी करते थे।
शुक्ल के अनुसार उपन्यासकार की भूमिका समाज सुधारक और प्रचारक से भिन्न है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वे उपन्यासकार को यथार्थ-चित्रण के खूंटे से बाँध देने के हिमायती हैं। उनके अनुसार उसे स्वप्न और दर्शन के साथ-साथ दृष्टि प्रस्तुत करने का अधिकार है। शुक्ल यहाँ भी अतिरेक पर नहीं गए हैं बल्कि उनके अनुसार प्रत्यक्षीकरण के साथ-साथ कभी कभी निस्तार का मार्ग भी प्रत्यक्ष करना उपन्यासों का काम है। इसके अलावा आवश्यकतानुसार उनके ठीक विन्यास, सुधार अथवा निराकरण की प्रवृत्ति भी उत्पन्न कर सकते हैं। यहाँ भी उनकी चेतावनी याद रखनी ही चाहिए कि यह सब प्रवीण उपन्यासकार की तरह ही करना चाहिए।
रामचंद्र शुक्ल के उपन्यास-चिंतन का केन्द्रीय विषय ऐतिहासिक उपन्यास है। वे ऐतिहासिक उपन्यास की आवश्यकता पर बहुत बल देते हैं। हिन्दी साहित्य का इतिहास और उपन्यास नामक लेख दोनों में उन्होंने ऐतिहासिक उपन्यास पर और उसके विविध पक्षों पर विशेष रूप से विचार किया है। एक अच्छे ऐतिहासिक उपन्यास में कौन-कौन से गुण होने चाहिए, इसे उन्होंने सविस्तार स्पष्ट किया है। इस क्रम में ऐतिहासिक उपन्यास को परिभाषित करने के साथ-साथ उन्होंने उपन्यास और इतिहास को भी परिभाषित किया है। इन जटिल विषयों को उन्होंने सुबोध बनाकर प्रस्तुत किया है। यह उनकी सारग्राही और तीक्ष्ण प्रतिभा का परिचायक है। उपन्यास और इतिहास में अंतर करते हुए शुक्ल लिखते हैं, इतिहास कभी उन बहुत से सूक्ष्म व्यापारों के लिए जिनसे जीवन का तार बँधा है एक सांकेतिक व्यापार का व्यवहार करके काम चला लेता है, पर उपन्यास का संतोष इस प्रकार नहीं हो सकता। इतिहास कहीं यह कहकर छुट्टी पा जायगा कि अमुक राजा ने बडा अत्याचार किया। अब इस अत्याचार शब्द के अंतर्गत बहुत से व्यापार आ सकते हैं। इससे उपन्यास इन व्यापारों में से किसी किसी को प्रत्यक्ष करने में लग जायगा।15
यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि शुक्ल के अनुसार ऐतिहासिक उपन्यास और इतिहास में अंतर उद्देश्य, संवेदना और ऐतिहासिक यथार्थ का नहीं बल्कि वर्णन-पद्धति का है। ऐतिहासिक उपन्यास संबंधी शुक्ल की मान्यताओं के विश्लेषण से यह भी पता चलता है कि वे उपन्यास को इतिहास का पूरक मानते हैं, जिन छोटे-छोटे अंशों को इतिहास छलाँग मारता हुआ छोड जाता है, कवि अपने सत्यमूलक अनुमान के बल पर उनकी एक लडी जोडकर जीवन का एक चित्र पूरा करके खडा करता है।16 और, ठीक इसीलिए इतिहास और इतिहासबोध संपन्न समाज को भी ऐतिहासिक उपन्यास की आवश्यकता होती है। उनके साक्ष्य पर हम कह सकते हैं कि किसी भी समाज के लिए इतिहास और इतिहास-बोध के साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास और उपन्यास के इतिहास-बोध भी आवश्यक होते हैं। जिस तर्क से इतिहास महत्त्वपूर्ण होता है उसी तर्क से ऐतिहासिक उपन्यास भी।
शुक्ल के लिए ऐतिहासिक उपन्यास एक यथार्थवादी साहित्य-रूप है। उसमें इतिहास से विचलन के लिए कोई अवकाश नहीं है। उनके अनुसार इसे इतिहास-सम्मत होना चाहिए, इतिहास-असम्मत नहीं। उपन्यासकार जिस कालावधि की घटना, चरित्र इत्यादि को उपन्यास का वर्ण्य-विषय बनाता है, उसका उसे पूरी तरह से ज्ञान होना चाहिए, एक इतिहासकार की तरह प्रामाणिक ज्ञान।
इतिहास के अज्ञान के बावजूद ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रवृत्ति और सिद्धांत के वे विरोधी थे। इतिहास देश और काल की वैज्ञानिक जानकारी देता है। यदि कोई ऐतिहासिक उपन्यास देश और काल की भ्रामक जानकारी देता है तो उसकी ऐतिहासिकता संदिग्ध ही मानी जाएगी। वे लिखते हैं, अब किसी ऐतिहासिक उपन्यास में यदि बाबर के सामने हुक्का रखा जायगा, गुप्तकाल में गुलाबी और फिरोजी रंग की साडियाँ, इत्र, मेज पर सजे गुलदस्ते, झाडफानूस लाए जायँगे, सभा के बीच खडे होकर व्याख्यान दिए जायँगे और उन पर करतल ध्वनि होगी, बात-बात में धन्यवाद, सहानुभूति ऐसे शब्द तथा सार्वजनिक कार्यों में भाग लेना, ऐसे फिकरे पाए जायँगे तो काफी हँसनेवाले और नाक भौं सिकोडने वाले मिलेंगे।17
इस तरह हम देखते हैं कि शुक्ल ऐतिहासिक उपन्यास लेखन के लिए ऐतिहासिकता पर अत्यधिक बल देते हैं और उससे किसी प्रकार के समझौते का विरोध करते हैं। लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं है कि वे उपन्यासकार को इतिहास के उसी अनुशासन से बाँधना चाहते हैं, जिससे इतिहासकार बँधा होता है। यह संभव भी नहीं है। इसलिए, वे उपन्यासकार की कल्पना और रचनात्मकता के लिए पूरा अवकाश रखते हैं; जिसके बिना इतिहास की साहित्यिक-औपन्यासिक प्रस्तुति संभव ही नहीं हो सकती। इसके लिए वे इतिहासकार के विपरीत उपन्यासकार को कल्पना, जिसे वे अनुमान कहना पसंद करते हैं, का अधिकार देते हैं। उनके अनुसार यह अनुमान सत्य कहने के लिए किया जाता है इसलिए इसके सहारे उपन्यास में रचित घटना या चरित्र असत्य नहीं होते हैं। कहना न होगा, इसी कारण कभी-कभी उपन्यास को असत्य के सहारे सत्य रचनेवाली विधा कहा जाता है।
उनकी इस स्थापना का सार यह है कि इतिहास से जो ज्ञान और संवेदना मिले उसी के आधार पर अनुमान करके उपन्यास लिखा जाना चाहिए। इस तरह के तथ्य या इतिहास आधारित अनुमान को वे सत्यमूलक अनुमान कहते हैं। यह अनुमान कैसे काम करता है, इसको वे इस उदाहरण से समझाते हैं, कैकेयी का कोपभवन में जाना तो इतिहास ने बतलाया पर उसने जो चुटीली बातें राजा दशरथ को कही उन्हें भिन्न भिन्न कवियों ने अपने अनुमान के अनुसार जोडा है।18
यही नहीं, वे उपन्यासकार को इतिहास की संगति में काल्पनिक पात्रों और उनके व्यवहारों को भी निरूपित करने का अधिकार देते हैं। वे लिखते हैं, ऐतिहासिक उपन्यासों के बीच जो पात्र और व्यवहार ऊपर से लाए जाते हैं और कल्पित कहे जाते हैं यदि वे उस समय की सामाजिक स्थिति के सर्वथा अनुकूल हों तो उन्हें ठीक मान लेना कोई बडी भारी भूल नहीं है। क्योंकि उनके अनुमान करने का साधन तो हमारे पास है पर खंडन करने का एक भी नहीं।19 कहना न होगा, इस शक्ति का उपयोग प्रवीण उपन्यासकार करते आए हैं। इसके बिना ऐतिहासिक उपन्यास लिखना टेढी खीर है। लेकिन शुक्ल इतिहास और ऐतिहासिक यथार्थ के प्रति इतना अधिक प्रतिबद्ध थे कि उपन्यासकारों की इस शक्ति की सीमा-रेखा खींचना नहीं भूलते। वे लिखते हैं, यहाँ पर यह भी समझ रखना चाहिए कि ऐतिहासिक उपन्यासकर्ताओं के अधिकार की भी सीमा है। यह उन्हीं छोटी-छोटी घटनाओं को ऊपर से ला सकता है जो किसी ऐतिहासिक घटना के अंतर्गत अनुमान की जा सके, अथवा संसार की गति और समाज की तत्कालीन अवस्था की अंग समझी जा सके। न वह किसी विख्यात घटना में उलटफेर कर सकता है और ऐसी बातों को ठूँस सकता है जिनका अनुमान उस समय की अवस्था को देखते नहीं हो सकता।20
शुक्ल के अनुसार पुरातत्वविद् राखालदास वंद्योपाध्याय आदर्श ऐतिहासिक उपन्यासकार हैं। उनके उपन्यासों-करुणा, शशांक, और धर्मपाल-को उन्होंने उपन्यासकारों के लिए दृष्टांत के रूप में प्रस्तुत किया है। इनमें से शशांक का उन्होंने हिंदी में अनुवाद भी किया है। अनुवाद करते समय उन्होंने ऐतिहासिक स्रोतों और तद्युगीन इतिहास की गहरी छानबीन की। जहाँ उन्हें ऐतिहासिकता के साथ समझौता होता दिखा वहाँ उन्होंने उसे इतिहास सम्मत बनाया। यही नहीं उन्होंने उपन्यास के अंत में दो अध्याय अपनी ओर से जोडे। इससे शशांक दुखांत से सुखांत उपन्यास हो गया। उपन्यास की ऐतिहासिकता को वे कितनी गंभीरता से लेते थे इसका सबसे बडा उदाहरण यह अनुवाद है। इसके अतिरिक्त जो अनुवादक राखालदास वंद्योपाध्याय जैसे पहुँचे हुए इतिहासकार और पुरातत्त्वविद के उपन्यासों को ठीक करता है उसकी इतिहास की जानकारी और अनुशासन का सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है। इस दृष्टि से उन्होंने वृंदाबनलाल वर्मा के भी ऐतिहासिक उपन्यासों की प्रशंसा की है।
इस तरह हम देखते हैं कि शुक्ल की ऐतिहासिक उपन्यास संबंधी मान्यताएँ ऐतिहासिकता और औपन्यासिकता दोनों की प्रकृति को बचाने पर बल देती हैं। वे इतिहास की औपन्यासिकता को जितना आवश्यक मानते हैं उतना ही उपन्यास की ऐतिहासिकता पर बल भी देते हैं। रामविलास शर्मा ने रामचंद्र शुक्ल की ऐतिहासिक उपन्यास संबंधी मान्यताओं की प्रशंसा करते हुए ठीक ही लिखा है,शुक्लजी ने ऐतिहासिक उपन्यासों को रोमांटिक कल्पना का खेल नहीं माना, वे अतीत को सही गलत ढंग से रंग चुन कर पेश करने का साधन न बनने चाहिए।21
इतिहास के साहित्यिक और कलात्मक रूपांतरण प्रायः विवाद का विषय बनते रहे हैं। इसका एक कारण इतिहासबोध की कमी है, तो दूसरा प्रमुख कारण है कलाकार-उपन्यासकार की अनुमान-शक्ति की सीमा का उल्लंघन। शुक्ल की ऐतिहासिक उपन्यास संबंधी मान्यताएँ उपन्यास पर ही नहीं बल्कि अन्य साहित्य और कला-रूपों के संदर्भ में भी महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं। यदि इतिहास के साहित्यिक और कलात्मक रूपांतरण के समय उपन्यासकार-कलाकार ध्यान में रखें तो अनावश्यक विवाद से बच सकते हैं।
शुक्ल की इतिहास और उपन्यास (आख्यान) सम्बन्धी स्थापनाओं और मान्यताओं का महत्त्व हमें तब और समझ में आता है जब उत्तर-आधुनिकता के इतिहास और आख्यान सम्बन्धी स्थापनाओं पर विचार करते हैं। उत्तर आधुनिकता इतिहास को आख्यान मानती है। इतिहास पहले भी आख्यान कहलाता रहा है, लेकिन उत्तर आधुनिकता ने इतिहास को उपन्यास जैसे आख्यान के समतुल्य बना दिया। मैनेजर पाण्डेय ने इस प्रसंग में उचित ही लिखा है, इतिहास-लेखन आख्यानपरक तो पहले भी था, लेकिन उत्तर आधुनिक मोड के बाद अब वह ऐसा आख्यान है जो यथार्थवाद से एकदम मुक्त है। इस स्थिति में इतिहास-लेखन उपन्यास-लेखन के समानधर्मा हो गया है। वह उपन्यास की राह पर चल रहा है।22 स्पष्ट है, उत्तर आधुनिकतावाद न इतिहास को इतिहास रहने देता है और न ही आख्यायान को आख्यान। ऐसे में एक साहित्य-विधा के रूप में ऐतिहासिक उपन्यास का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। उत्तर आधुनिकता के प्रभावों के बावजूद न इतिहास का अंत हुआ है न इतिहास आख्यान मात्र रह गया, बल्कि पूरी दुनिया में इतिहास-लेखन भी हो रहा है और एक विशिष्ट आख्यान के रूप में उपन्यास-लेखन भी। और, इस इतिहास के आधार पर उपन्यास भी लिखा जा रहा है। इस तरह उत्तर आधुनिकता की आँधी के बावजूद इतिहास, आख्यान, ऐतिहासिक उपन्यास इत्यादि न केवल बने हुए हैं, बल्कि जनता और लेखकों के प्रिय भी बने हुए हैं। ऐसे में रामचंद्र शुक्ल की इतिहास, उपन्यास और ऐतिहासिक उपन्यास सम्बन्धी मान्यताएँ उचित रूप से हमारा मार्गदर्शन करती रहेंगी; जहाँ इतिहास इतिहास है, उपन्यास उपन्यास और दोनों का संकर रूप ऐतिहासिक उपन्यास भी।
इतिहास, चाहे वह पुराण के रूप में हो या स्मृति तथा मिथक के रूप में, सदा से ही साहित्य और कलाओं का विषय बनता रहा है। उपन्यास भी इतिहास को अपने ढंग से लिखता और प्रस्तुत करता रहा है। संसार का शायद ही कोई ऐसा समाज हो जिसमें उपन्यास तो हो, लेकिन ऐतिहासिक उपन्यास न हो। ऐतिहासिक उपन्यास, उपन्यास का एक सार्वभौम प्रकार है। इसलिए, रामचंद्र शुक्ल का उपन्यास पर विचार करते समय ऐतिहासिक उपन्यास पर ध्यान देना स्वाभाविक है, लेकिन इसके एक केन्द्रीय विषय बनने से यह प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है कि उन्होंने इस पर इतना बल क्यों दिया है?
इसका पहला कारण यह दीखता है कि ऐतिहासिक उपन्यास, उपन्यास का एक लोकप्रिय प्रकार है। उपन्यास पर विचार करते समय किसी भी आलोचक के लिए ऐतिहासिक उपन्यास पर रूककर सोचना स्वाभाविक है। इसलिए, यदि शुक्ल ने इस पर विस्तार से विचार किया तो इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। दूसरा कारण है, स्वयं इतिहास से उपन्यास का सम्बन्ध। उपन्यास सामाजिक और ऐतिहासिक मनुष्य की कहानी कहता है न कि मिथकीय, पौराणिक और दैवीय चरित्रों की। संभवतः इसीलिए हेनरी फील्डिंग और सैमुअल रिचर्ड्सन जैसे उपन्यासकारों ने अपने उपन्यासों को उपन्यास की बजाय इतिहास कहा है। (टेरी इग्लटन, हिस्ट्री ऑफ इंग्लिश नॉवेल)। शुक्ल उपन्यास के इस मर्म को समझते थे इसलिए भी हो सकता है कि उन्होंने ऐतिहासिक उपन्यासों पर बल दिया। एक तीसरा कारण इतिहास में उनकी गहरी रूचि हो सकता है। जिसकी ओर रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली के संपादक ओमप्रकाश सिंह ने हमारा ध्यान खींचा है, शुक्लजी की इतिहास में गहरी दिलचस्पी थी। उन्होंने इतिहास को अव्यक्त की अभिव्यक्ति कहा है। अनायास नहीं है कि उनके लेखन का प्रारंभ ऐतिहासिक लेखों से हुआ है। शुक्लजी ने इतिहास के कुछ कालखंडों को चुनकर उस पर जम कर लिखा था। ऐतिहासिक लेख, ऐतिहासिक उपन्यास और ऐतिहासिक नाटकों में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। यही दिलचस्पी उन्हें साहित्येतिहास की तरफ खींच ले गई। इसमें कोई दो राय नहीं कि शुक्ल जी यदि साहित्य की तरफ न आते, तो वे अपने समय के बडे इतिहासकार होते।23 चौथा कारण यह हो सकता है कि वे भारत के प्राचीन इतिहास की औपन्यासिक प्रस्तुति के माध्यम से भारत के अतीत के गौरव को पुनस्र्थापित करना चाहते रहे हों। स्मरण रहे कि वे नवजागरण के एक प्रतिनिधि आलोचक और बुद्धिजीवी हैं। इस दृष्टि से उन्हें जयशंकर प्रसाद से विशेष आशा थी। कहना न होगा कि प्रसाद पर हिन्दू पुनरुत्थानवादी का आरोप लगता रहा है। यहाँ इस आरोप की पुष्टि करना मेरा उद्देश्य नहीं है। उद्देश्य यह रेखांकित करना है कि जयशंकर प्रसाद की उपन्यास-दृष्टि के वे कायल थे। और, इससे किसी विशेष आवश्यकता की पूर्ति की आशा करते थे। हो सकता है कि इसका एक मात्र कारण प्रसाद की उपन्यास लिखते समय इतिहास के निर्वाह की प्रामाणिकता हो जिसके कि शुक्ल हामी थे।
रामचंद्र शुक्ल उपन्यास को सुधारकों, उपदेशकों की वाणी और नीतिज्ञों के नीति उपदेशों और आप्तवचनों से कहीं अधिक प्रभावशाली और परिवर्तनकारी मानते हैं। उनकी मान्यता है कि कोरे उपदेश से जीवन नहीं बदलता है। उपदेशक जनसाधारण को अज्ञानी और अविवेकी समझते हैं और स्वयं को ज्ञान-सागर इसलिए उनके उपदेश और आदेश में कोई अंतर नहीं रह जाता है। जबकि साहित्यकार साधारण जनता के व्यवहार को दिखाते हुए उनके ज्ञान-अज्ञान और बुद्धि-विवेक में अंतर करते हुए उसमें सदाचार की ओर आग्रह उत्पन्न करता है। उपन्यासकार जहाँ एक ओर जनतांत्रिक चेतना का परिचय देता है, वहीं उपदेशक अहं और श्रेष्ठता जैसे अलोकतांत्रिक मूल्यों से चालित होता है। वे लिखते हैं, कथा के मिस से मनुष्य जीवन के बीच भले और बुरे कर्मों की स्थिति दिखाकर जितना ये लेखक आँख खोल सकते हैं उतना अहंकार से भरे हुए नीति के कोरे उपदेश देनेवाले नहीं। चाणक्य, स्माइल्स आदि नीति छाँटनेवाले रुखे लेखक जनसाधारण से अपने को श्रेष्ठ समझ जिस ढब से आदेश चलाते हैं, वह मनुष्य की आत्माभिमान वृत्ति को अखर सकता है। ये लोग सदाचार का स्वाभाविक सौंदर्य नहीं दिखा सकते जिनकी ओर मनुष्य मोहित होकर आपसे आप ढल पडता है। अस्तु, चाणक्यनीति और स्माइल्स के कैरेक्टर आदि की अपेक्षा उत्तम श्रेणी के उपन्यासों का पढना आचरण पर कहीं बढकर प्रभाव डालता है।24 स्पष्ट है, रामचंद्र शुक्ल साहित्य, विशेष रूप से उपन्यास, को सामाजिक और वैचारिक परिवर्तन का सबसे प्रभावशाली माध्यम मानते हैं।
नीति और नैतिकता की गढन व्यवस्थापक की होती है। इनका उद्देश्य एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण और सञ्चालन होता है जो सत्तासमीकरण के अनुसार और अनुकूल हो और मनुष्य उनका पालन करे। नैतिकतावादी इसके प्रति प्रतिरोध का शमन और विकल्प की मानवीय इच्छा का दमन करना चाहते हैं। मनुष्य के पास कोई विकल्प नहीं होता सिवाय इसके अनुसरण के। यदि वह इसमें घुटता है, इसे बदलना चाहता है, तो सत्ता और नैतिकतावादी मिलकर उसे ठीक करते हैं। सत्ता इसे अपराध घोषित करती है, तो नैतिकता इसे अनैतिक कहकर निषिद्ध करती है। धर्म भी सत्ता और नैतिकता के मेलजोल से बना व्यवस्थापक ही है। यह तीनों अलग-अलग भी और एक साथ मिलकर भी मनुष्य की भावना, संवेदना और विचारशीलता को नियंत्रित और अनुकूलित करते हैं। उदाहरण के लिए विवाह और यौनिकता को लेकर इन तीनों की मान्यताएँ एक जैसी हैं। विवाह से बाहर मनुष्य की यौनिकता इनके लिए अपराध, अनैतिक और पाप है। यदि कोई स्त्री या पुरुष विवाह के बाहर जाकर यौन सम्बन्ध स्थापित करता है तो वह एक साथ अपराधी, अनैतिक और पापी होता है। इनके लिए मनुष्य की यौनिकता नहीं, सत्ता, नैतिकता और धर्म के विधान अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसलिए ये मनुष्य के साथ नहीं, व्यवस्था के साथ खडे होते हैं।
जबकि, साहित्य, विशेष रूप से उपन्यास, व्यवस्था के नहीं बल्कि मनुष्य के पक्ष में खडा होता है। उसकी चिंता मनुष्य की यौनिकता है क्योंकि इसके बिना उसके अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए, व्यवस्था से उपन्यास का झगडा है। वह व्यवस्था को अधिक-से-अधिक मनुष्य के अनुकूल करना चाहता है जबकि व्यवस्था मनुष्य को अपने अनुकूल बनाना चाहती है। एक उपन्यासकार के लिए विवाह और यौनिकता दोनों जटिल सत्ताएँ हैं। एक अच्छा उपन्यास मनुष्य और उसके जीवन के प्रति हमारी संवेदना और इन्द्रियों को सक्रिय और परिष्कृत करता है। उसके लिए विवाह और यौनिकता अच्छाई और बुराई, पुण्य और पाप की श्रेणियाँ नहीं हैं। नीति उपदेशकों के विपरीत वह नैतिकता को पूर्वनिर्धारित सूत्रों में नहीं देखता। नैतिकतावादियों और उपदेशकों की तरह उपन्यास न आदेश देता है, न उपदेश देता है बल्कि वह चेतना और संवेदना को जागृत करके सोचने और जीवन का पक्ष लेने की शक्ति और विवेक पैदा करता है।
उपन्यास की इसी शक्ति के कारण दुनिया भर में उपन्यास को आचरण बिगाडने वाली और पथभ्रष्ट करने वाली विधा के रूप में देखा गया। दुनिया भर में उपन्यास का जितना विरोध किया गया उतना और किसी साहित्य-रूप का नहीं। रामचंद्र शुक्ल को प्रायः नैतिकतावादी और मर्यादावादी बताया जाता रहता है। यह मान्यता निराधार और भ्रामक सिद्ध होती है जब हम शुक्ल को नैतिकतावादियों और उपदेशकों के नहीं बल्कि उपन्यास का पक्ष रखते और लेते हुए देखते हैं।
इसका एक उदाहरण है प्रेमचंद पर नैतिकतावादियों और रुढिवादियों के निम्न स्तरीय आरोप और शुक्ल का प्रेमचंद की उपन्यास-दृष्टि का मूल्यांकन। श्रीनाथ सिंह, अवध उपाध्याय, नन्ददुलारे वाजपेयी जैसे कई लेखकों ने प्रेमचंद को घृणा का प्रचारक, ब्राह्मण-द्रोही, हिन्दू-द्रोही न जाने क्या-क्या कहा। यह हमला प्रेमचंद पर तो था ही वस्तुतः उपन्यास के विरुद्ध भी था। ऐसे वातावरण में रामचन्द्र शुक्ल ने उन्हें हिंदी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासकार के रूप में प्रशंसित किया। उनका एक वाक्य है, उपन्यास के क्षेत्र में देखिये तो एक ओर प्रेमचंद जैसे प्रतिभाशाली उपन्यासकार हिंदी की कीर्ति का देश भर में प्रसार कर रहे हैं, दूसरी ओर कोई उनकी भरपेट निंदा करके टालस्टाय का पापी के प्रति घृणा नहीं दया वाला सिद्धांत लेकर दौडता है। एक दूसरा आता है जो दयावाले सिद्धांत के विरुद्ध योरप का साम्यवादी सिद्धांत ला भिडाता है.. ।25 प्रेमचंद पर जो आक्रमण किये गए उनका प्रतिकार करने के लिए और प्रेमचंद की उपन्यास-कला के विवेचन के लिए जनार्दन प्रसाद झा द्विज ने प्रेमचंद की उपन्यास-कला नामक पुस्तक लिखी। रामचंद्र शुक्ल ने ऐसा तो नहीं किया, लेकिन हिंदी साहित्य का इतिहास में उपन्यास पर लिखते समय प्रेमचंद उनके मस्तिष्क में छाये रहे। इसमें दुनियाभर के उपन्यासकारों में सबसे अधिक बार प्रेमचंद का ही जिक्र हुआ है। जगह-जगह यह ध्वनित होता है कि द्विज की तरह ही वे प्रेमचंद का न केवल बचाव करते हैं बल्कि उनकी कला पर अभिभूत भी होते हैं। एक उद्धरण और देखने लायक है, प्रेमचंदजी के उपन्यासों में भी निम्न और माध्यम श्रेणी के गृहस्थों के जीवन का बहुत सच्चा रूप मिलता रहा।26 यहाँ लगता है कि उनके ध्यान में वे लोग हैं जो प्रेमचंद के उपन्यासों में अतिशय समसामयिकता और अखबारीपन देखते थे। जिस वर्णन को प्रेमचंद के विरोधी अखबारीपन और सामयिक कहकर हेठ सिद्ध करते थे उसी को शुक्ल ने इसे जीवन का सच्चा रूप कहा। इसे एक श्रेष्ठ उपन्यास-कला के गुण के रूप में निरुपित करते हुए वे एक जगह और लिखते हैं, प्रेमचंदजी के ही कुछ पात्रों में ऐसे स्वाभाविक ढाँचे की व्यक्तिगत विशेषताएँ मिलने लगीं जिन्हें सामने पाकर अधिकांश लोगों को यह भासित हो कि कुछ इसी ढंग की विशेषता वाले व्यक्ति हमने कहीं न कहीं देखे हैं।27 यही नहीं, उन्होंने प्रेमचंद के चरित्र-चित्रण, भाषा और जीवन-दृष्टि इत्यादि की भी प्रशंसा की। वे प्रेमचंद को हिंदी में पूर्ण विकसित और परिष्कृत उपन्यास लाने का श्रेय देते हैं, इस तृतीय उत्थान का आरंभ होते-होते हमारे हिंदी साहित्य के उपन्यास का यह पूर्ण विकसित और परिष्कृत रूप लेकर स्वर्गीय प्रेमचंदजी आये।28 उपन्यास-विरोधी वातावरण में प्रेमचंद का बचाव असल में उपन्यास का बचाव है और उनकी कला का विवेचन असल में उपन्यास की कला का विवेचन है। रामचंद्र शुक्ल ने ये दोनों काम किए। जिन्हें यह लगता है कि वे उपन्यास वगैरह ज्यादा नहीं पढे थे, उन्हें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि ऐसी परिपक्व उपन्यास-दृष्टि और समझ थोडे- से उपन्यास पढ लेने भर से नहीं आती! उपन्यास के व्यापक अध्ययन और मनन से आती है। उपन्यास के स्वभाव और संरचना की अंतर्दृष्टिपूर्ण समझ से आती है।
रामचन्द्र शुक्ल ने भी नवयुवकों पर उपन्यास के बुरे प्रभाव की आशंका व्यक्त की है। ऐसी आशंका वे उपन्यास-मात्र के प्रति नहीं बल्कि उन्हीं उपन्यासों को लेकर व्यक्त की है, जिनमें उच्च वासनाओं के स्थान पर निम्नकोटि की वासनाओं वाले दृश्य होते हैं। यहाँ हम देखते हैं कि नैतिकतावादियों और संकीर्णतावादियों के विपरीत उनकी चिंताएँ कितनी वैज्ञानिक और सर्वकालिक हैं। उन्होंने पंडित किशोरीलाल गोस्वामी के उपन्यासों पर विचार करते हुए लिखा है, उनके बहुत से उपन्यासों का प्रभाव नवयुवकों पर बुरा पड सकता है, उनमें उच्च वासनाएँ व्यक्त करनेवाले दृश्यों की अपेक्षा निम्नकोटि की वासनाएँ प्रकाशित करनेवाले दृश्य अधिक भी हैं और चटकीले भी।29 ध्यान देने की बात यह है कि उन्होंने यह आशंका भी अपवादस्वरुप केवल गोस्वामी के उपन्यासों, विशेषकर चपला के सन्दर्भ में व्यक्त की है। और, यह आशंका भी आशंका ही है; कोई अनिवार्य परिणति की दृढ मान्यता नहीं। उन्हें काम या रति के अन्तरंग वर्णन से कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि उसके चटकीले और सुरुचिविहीन वर्णन से है। उनके अनुसार रति-वर्णन उद्दात्त होना चाहिए, न कि चटकीला। यह आशंका साहित्य की स्पष्ट अवधारणा को समझने के कारण भी उन्होंने व्यक्त की है। स्पष्ट है, यह आशंका नैतिकता की रक्षा के लिए नहीं बल्कि उच्चतर साहित्य की रक्षा के लिए है। उनकी इस आशंका से आज भी शायद ही किसी को असहमति हो। असल में, उनके लिए उपन्यास केवल समय बिताने वाली और मनोरंजन करनेवाली चीज नहीं है। जैसे वे कविता का उद्देश्य मनबहलाव नहीं मानते हैं वैसे ही उपन्यास उनके लिए सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है।
रामचंद्र शुक्ल के उपन्यास-चिंतन में काव्यात्मकता और औपन्यासिकता का अंतःसम्बन्ध एक महत्त्वपूर्ण विषय के रूप में आया है। वे गद्य में काव्यात्मकता को पसंद करते हैं। उनको उपन्यास में काव्यात्मकता अत्यंत प्रिय है। उन्हें यह बात बहुत अखरती थी कि योरप में यथार्थवाद के दबाव में उपन्यासों और अन्य गद्य-रूपों से काव्यात्मकता को निष्कासित किया जा रहा था। और, योरप की देखादेखी भारत में भी ऐसा ही हो रहा था। इस बात की अभिव्यक्ति उन्होंने अनेकशः की है। अंग्रेजी के पुराने ढाँचे के उपन्यासों में वे इस काव्यात्मकता को देखते थे और उनकी सराहना भी करते थे। इन उपन्यासों की काव्यात्मकता के स्वरुप को स्पष्ट करते हुए में वे लिखते हैं, पुराने ढाँचे में काव्यत्व की मात्रा यथेष्ट रहती थी। परिच्छेदों के आरंभ में अच्छे अलंकृत दृश्य-वर्णन होते थे और पात्रों की बातचीत भी कहीं-कहीं रसात्मक होती थी।30
हमने देखा कि वे पश्चिम के पुराने ढंग के उपन्यासों को संस्कृत के कथात्मक गद्य-प्रबंध के निकट मानते थे। बँगला में जब उपन्यास-लेखन की शुरुआत हुई तब योरप में पुराना ढाँचा ही प्रचलन में था। उनके अनुसार बंकिमचंद्र, रमेशचंद्र दत्त जैसे बँगला के आरंभिक उपन्यासकारों ने अंग्रेजी के पुराने ढाँचे के आधार पर उपन्यास लिखे। जिस ढंग और कलात्मकता से इन उपन्यासकारों ने इसे अपनाया उसकी शुक्ल प्रशंसा करते हैं, ऐसे सुन्दर ढंग से कि यह जान ही न पडा कि वह कहीं बाहर से आया है।31 यह ढाँचा पहले अंग्रेजी से बँगला और फिर बंगला से हिंदी में आया। कादंबरी, हर्षचरित और दशकुमारचरित जैसे पुराने गद्य-काव्यात्मक गद्य कथा-प्रबंधों का आभास इस ढाँचे के उपन्यासों में मिलता है। वे भारतेंदु से लेकर प्रेमचंद तक के उपन्यासों को इसी ढाँचे के तहत मानते हैं।
हिंदी साहित्य का इतिहास में तृतीय उत्थान के उपन्यास पर विचार करते हुए वे लिखते हैं, उपन्यासों को काव्य के निकट रखनेवाला पुराना ढाँचा एकबारगी छोड नहीं दिया गया है। छोडा क्यों जाय? उसके भीतर हमारे भारतीय कथात्मक गद्य-प्रबंधों (जैसे कादंबरी, हर्षचरित) के स्वरूप की परंपरा छुपी हुई है। योरप उसे छोड रहा है, छोड दे।32 इसी तरह वे इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त करते हैं कि जयशंकर प्रसाद और हरिशंकर प्रेमी जैसे नाटककारों ने अपने नाटकों में काव्यात्मकता का निर्वाह किया और यथार्थवाद के दबाव में उनका निष्कासन नहीं किया।
काव्यात्मकता और औपन्यासिकता के सायास अलगाव की आलोचना करते हुए और दोनों के अंतःसंबंधों को रेखांकित करते हुए वे लिखते हैं, पर इस अत्यंत पार्थक्य का आधार प्रमाद के अतिरिक्त और कुछ नहीं। जगत और जीवन के नाना पक्षों को लेकर प्रकृति काव्य भी बराबर चलेगा और उपन्यास भी। एक चित्रण और भाव व्यंजना को प्रधान रखेगा, दूसरा घटनाओं के संचरण द्वारा विविध परिस्थितियों की उद्भावना को। उपन्यास न जाने कितनी ऐसी परिस्थितियों को सामने लाते हैं जो काव्यधारा के लिए प्रकृत मार्ग खोलती हैं।33 हम देखते हैं कि वे उपन्यास और काव्य के सहअस्तित्त्व को लेकर आश्वस्त हैं और स्वाभाविक रूप से एक दूसरे को प्रभावित करने की शक्ति को लेकर भी। इस प्रसंग में हम देखते हैं कि विधाओं के आत्यंतिक अलगाव का वे समर्थन नहीं करते। उपन्यास तो वैसे भी इस अलगाव का विरोधी है। उसमें संस्मरण, जीवनी, रेखाचित्र, आत्मकथा, यात्रावृत्तांत जैसे गद्य-रूपों की ही नहीं, बल्कि काव्य-रूपों की भी विशेषताएँ सहज ही अन्तर्निहित रहती हैं। वस्तुतः उपन्यास सभी साहित्य-रूपों की रचनात्मक-शक्ति और सम्भावना को निचोडकर अपनी जीवन-शक्ति में रूपांतरित करता है।
जब काव्यतत्व को उपन्यास से यथार्थवाद, जिसे वे यथातथ्यवाद लिखते हैं, के दबाव में झूठी भावुकता कहकर हटाया जा रहा था, तो उन्होंने भावुकता का बचाव किया और उसे जीवन और साहित्य के अनिवार्य अंग के रूप में रेखांकित किया। उसकी आवश्यकता पर भी बल दिया। भावुकता भी जीवन का एक अंग है। साहित्य की किसी शाखा से हम उसे बिलकुल हटा तो सकते नहीं।34
काव्यात्मकता और भावुकता का जीवन और साहित्य में महत्त्व निरूपण करने और उपन्यास में उसके प्रयोग का बचाव करने के बाद भी एक दूरदर्शी साहित्यशास्त्री होने के नाते वे भावुकता और काव्यात्मकता के खतरों से परिचित थे। वे स्वीकार करते हैं कि यह साहित्य की व्याधि भी बन सकती है और जब व्याधि बने तो उसका इलाज जरुरी है, हाँ, यदि वह व्याधि के रूप में-फीलपाँव की तरह- बढने लगे, तो उसकी रोकथाम आवश्यक है।35 योरप में उपन्यास से काव्यत्व को बाहर निकालने के पीछे भी वह इस व्याधि को एक कारण मानते हैं। फ्रांस और इटली के कलावादियों को इसके लिए उत्तरदायी मानते हैं। वे कहते हैं कि काव्य को बेलबूटे की नक्काशी बनाकर जीवन से स्वतंत्र करने पर बल दिया, तो जीवन को ही लेकर चलने वाले उपन्यास से उसकी दूरी स्वाभाविक थी। पर, अंततः, यह दूरी एक प्रमाद का ही फल थी।
रामचन्द्र शुक्ल काव्यात्मक उपन्यासों को एक विशिष्ट ढाँचा मानते थे, लेकिन काव्यात्मकता को उपन्यास का कोई अन्तर्निहित गुण-धर्म नहीं मानते थे जिसके निकल जाने से उपन्यास का अंग-भंग हो जाता है। काव्यात्मक उपन्यासों का अंत उनके लिए उपन्यास का अंत नहीं है। काव्यात्मक उपन्यासों पर उनके बल को आत्यन्तिक रूप से सच मान लेनेवालों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस काव्यात्मकता को वे उपन्यास की विशिष्टता के विकास में अर्थात् उपन्यास के स्वतंत्र विकास में बाधक भी मानते थे। उनके अनुसार यथातथ्यवाद के आगमन के साथ काव्यात्मकता उपन्यास से अलग हुई और उपन्यास की निज की विशिष्टता निखरकर सामने आई। वे लिखते हैं, इससे उपन्यासकला की अपनी निज की विशिष्टता निखरकर झलकी, इसमें कोई संदेह नहीं।36 अपनी इसी गतिशील और रुचिमुक्त उपन्यास-दृष्टि के कारण वे काव्य मुक्त और यथातथ्यवादी’ उपन्यासों की प्रशंसा कर पाते हैं। उनके लिए हिंदी में जिसके प्रतिनिधि उपन्यासकार प्रेमचंद हैं, इस तृतीय उत्थान का आरंभ होते-होते हमारे हिंदी साहित्य के उपन्यास का यह पूर्ण और परिष्कृत स्वरुप लेकर प्रेमचंदजी आये।37 कहना न होगा कि हिंदी उपन्यास के पूर्ण और परिष्कृत रूप के विकास में यथार्थवाद की भूमिका देखते हैं।
रामचंद्र शुक्ल की उपन्यास-दृष्टि यथार्थवादी है। वे उपन्यासकारों से वस्तुस्थिति पर अपनी व्यापक दृष्टि डालने और देश के वर्तमान जीवन के भीतर दृष्टि गडाकर देखने की अपेक्षा रखते हैं, प्रेमचंद के उपन्यासों में जीवन का बहुत सच्चा स्वरूप देखकर उसकी प्रशंसा करते हैं, यथार्थवाद के कारण उपन्यासकला की अपनी निज की विशिष्टता को निखरती देखते हैं। इसके अतिरिक्त ऐतिहासिक उपन्यास में सामाजिक स्थिति के सूक्ष्म ब्यौरों को कल्पना के सहारे उद्घाटित करने पर बल देते हैं। ध्यान देने लायक है कि उपन्यास से पहले के मिथक, परीकथा और दास्तान जैसे कथा-रूपों को वे उपन्यास-विश्लेषण के समय संदर्भित नहीं करते हैं। इतिहास और वर्तमान का यथार्थ ही उनके लिए उपन्यास का क्षेत्र है। न कि ऐतिहासिक और सामाजिक यथार्थ-बोध से रहित वे पुराने और उनसे प्रेरित नये रूप। वे उपन्यास को जीवन और जगत के यथार्थ तथा सामाजिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया से जोडकर देखते हैं। वे साहित्य और उपन्यास को इससे स्वतंत्र और स्वायत्त नहीं मानते हैं। इसी दृष्टि के कारण उन्होंने कलावादियों, रहस्यवादियों और अध्यात्मवादियों की कडी आलोचना की। इससे स्पष्ट होता है कि शुक्ल की उपन्यास-दृष्टि यथार्थवादी है। वैसे भी उपन्यास का स्वभाव और चरित्र ऐसा है कि वह यथार्थ से पीछा नहीं छुडा सकता है। शुक्ल उपन्यास के इस स्वभाव को न केवल समझते हैं, बल्कि उसकी रक्षा भी करना चाहते हैं।
रामचंद्र शुक्ल ने बाह्य परिस्थितियों के यथार्थ के साथ-साथ मनुष्य के मानसिक और भावनात्मक यथार्थ के चित्रण पर भी बल दिया है। उनके लिए मानव अंतःकरण की सच्ची परख एक कसौटी की तरह है जिसपर खरा उतरकर ही कोई उपन्यास अच्छा बन सकता है। उनका साहित्य सिद्धांत मनोविकारों और भावों के वैज्ञानिक विवेचन-विश्लेषण पर आधारित है। वे हिंदी के अकेले आलोचक और आचार्य हैं जिन्होंने मनोविकारों और भावों पर स्वतंत्र रूप से लिखा है। उनके लिए यथार्थवादी उपन्यास की विशिष्टता यह है कि घटनाएँ और पात्रों के क्रियाकलाप भावों को बहुत कुछ व्यक्त कर दें। वे चरित्र-चित्रण को पात्रों के शीलवैचिर्त्य और स्वभाव की विशिष्टता के अनुरूप और मानवप्रकृति की व्यक्तिगत विशेषताओं के आधार पर उचित मानते हैं। अंतःप्रकृति और शील के उत्तरोत्तर उद्घाटन’ के कारण वे प्रेमचंद के चरित्र-निर्माण-कला की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। प्रसंगवश यह याद दिला देना अनुचित न होगा कि प्रेमचंद उपन्यास को मानव चरित्र का चित्र मात्र कहते हैं और स्वयं शुक्ल के लिए साहित्य जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब है। वे यह भी मानते हैं कि चित्तवृत्ति परिस्थितियों के अनुसार होती है। इससे स्पष्ट होता है कि उनके लिए उपन्यास परिस्थितियों से कटा हुआ व्यक्ति के मनोविकारों की उठा-पटक की कथा नहीं है। अतः वे केवल व्यक्ति के अन्तःस्तल में डूबे मात्र मनोविकार आधारित उपन्यासों को महत्त्व नहीं देते हैं।
विशिष्ट और छोटे-से वर्ग के यथार्थ से अधिक रामचंद्र शुक्ल सामान्य और साधारण जनता के यथार्थ को अभिव्यक्त करने पर बल देते हैं। अपने समय में उन्होंने देखा कि अंग्रेजी शिक्षा से एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ जो देश की सामान्य जनता की संस्कृति और सभ्यता से विछिन्न और पश्चिम की संस्कृति और सभ्यता के निकट था। बहुत-से उपन्यास इसी अल्पसंख्यक वर्ग को आधार बनाकर लिखे जा रहे थे। वे इससे चिंतित थे। इस वर्ग को भी भारतीय समाज का एक अंग मानने और उन पर उपन्यास लिखने की प्रवृत्ति को न्यायोचित मानने के बावजूद उनका मानना था कि इस वर्ग को ही उपन्यास का केंद्र बनाना उचित नहीं है। उनका मानना था कि इससे देश के सामान्य पक्ष के ओझल हो जाने का डर था। वे लिखते हैं, यह ठीक है कि अँगरेजी शिक्षा के दिन दिन बढते हुए प्रसार से देश के आधुनिक जीवन का यह भी एक पक्ष हो गया है, पर सामान्य पक्ष नहीं है। भारतीय रहन-सहन, खान-पान, रीति-व्यवहार प्रायः सारी जनता के बीच बने हुए हैं। देश के असली सामाजिक और घरेलू जीवन की दृष्टि से ओझल करना हम अच्छा नहीं समझते है।38 यहाँ हम देखते हैं कि वे उपन्यास की प्रतिनिधित्व की शक्ति से भली भाँति परिचित हैं। अगर उपन्यास केवल देश के चुने हुए पक्षों पर ही केन्द्रित रहता है तो वह उसी का प्रतिनिधित्व करता है। उपन्यास में अनुपस्थित जनता पाठक वर्ग और उससे प्रभावित जनमत और नीति-निर्माण में भी अनुपस्थित रहती है। जिससे न केवल उसके साथ अन्याय और सहानुभूति की कमी हो सकती है, बल्कि विशिष्ट वर्ग न केवल अनुचित लाभ उठा सकता है बल्कि सामान्य जनता के विरुद्ध अपने आग्रहों और हितों को लोकस्वीकृति भी दिला सकता है।
मिलान कुंदेरा ने लिखा है, आधुनिक काल के आरंभ से उपन्यास ने अविच्छिन्न रूप से निष्ठापूर्वक मनुष्य का साथ दिया है।39 शुक्ल चाहते हैं कि उपन्यास प्रत्येक मनुष्य और उसकी सामाजिकता का साथ दे, सबको छोडकर केवल कुछ को लेकर न चले। इसके अतिरिक्त उपन्यास से उनकी यह अपेक्षा उनकी साहित्य की अवधारणा का ही प्रतिफल है। स्मरण रहे कि साहित्य उनके लिए जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब है। उपन्यास लोकतान्त्रिक विधा है, शुक्ल द्वारा प्रभु वर्ग के स्थान पर जनता और निम्न वर्ग को केंद्र में रखने पर बल देना उपन्यास के चरित्र के अनुकूल ही है। शुक्ल के उपन्यास-दर्शन पर टिप्पणी करते हुए रामविलास शर्मा ने ठीक ही लिखा है, उन्होंने प्रेमचंद का आदर्श रखते हुए जनसाधारण के जीवन पर उपन्यास लिखना आवश्यक बतलाया है।40
रामचन्द्र शुक्ल ने उपन्यास लेखक के लिए वर्गीय यथार्थ और वर्ग-चेतना तथा समाज के आर्थिक पक्षों पर अपनी दृष्टि को पैनी करने पर विशेष रूप से बल दिया है। अपने समाज-विश्लेषण में वे वर्ग और श्रेणी जैसी अवधारणाओं का प्रयोग करते हैं। इससे लगता है कि वे समाज को वर्ग-विभाजित मानते हैं। नॉन कोऑपरेशन एंड द नॉन मर्कैंटाइल क्लासेज नामक उनका प्रसिद्ध निबंध भी इसका एक प्रमाण है। हिंदी साहित्य का इतिहास में उपन्यास पर लिखते हुए उन्होंने औपनिवेशिक भारत की आर्थिक दशा का विश्लेषण किया है। विषय उपन्यास है लेकिन यह आर्थिक विश्लेषण जितनी जगह लेता है उस हिसाब से उसे विस्तृत और सूक्ष्म कहना अनुचित न होगा। वे उपन्यास को आर्थिक और वर्गीय प्रश्नों से जोडकर देखने की हिमायत करते हैं। आर्थिक पक्ष उनके लिए कितना अहम था, इसका पता उनके इस कथन से चलता है, सामाजिक उपन्यासों में देश में चलनेवाले राष्ट*ीय तथा आर्थिक आंदोलनों का भी आभास बहुत कुछ रहता है।41 अर्थात् आर्थिक आन्दोलन उपन्यास का एक अनिवार्य अंग है। अंग्रेजी उपनिवेश के समय भारत की आर्थिक दशा के विश्लेषण में शुक्ल सिद्ध करते हैं कि किसानों और छोटे जमींदारों की स्थिति अत्यंत खराब थी। यह संयोग नहीं है कि भारतीय उपन्यास की स्वतंत्र पहचान किसान- जीवन के वर्णन से मिली।
रामचंद्र शुक्ल ने उपन्यासों के भेद-उप भेद किये हैं। वे उपन्यास के दो प्रमुख प्रकार मानते हैं- ऐतिहासिक और सामाजिक। इसके अतिरिक्त ढाँचे के आधार पर वे उपन्यास को तीन भागों में बाँटते हैं- कथा के रूप में, आत्मकथा के रूप में और चिट्ठी-पत्री के रूप में। कथावस्तु के स्वरूप और लक्ष्य के आधार पर हिंदी उपन्यासों को सात भेदों में विभाजित करते हैं- 1. घटनावैचित्यप्रधान अर्थात् केवल कुतूहलजनक, 2. मनुष्य के अनेक पारस्परिक की मार्मिकता पर प्रधान लक्ष्य रखनेवाले, 3. समाज के भिन्न भिन्न वर्गों की परस्पर स्थिति और उनके संस्कार चित्रित करनेवाले, 4. अंतर्वृत्ति अथवा शीलवैचित्य और उसका विकासक्रम अंकित करनेवाले, 5. भिन्न भिन्न जातियों और मतानुयायियों के बीच मनुष्यता के व्यापक संबंध पर जोर देनेवाले, 6. समाज के पाखंडपूर्ण कुत्सित पक्षों का उद्घाटन और चित्रण करनेवाले और 7. बाह्य और आभ्यंतर प्रकृति की रमणीयता का समन्वित रूप में चित्रण करनेवाले सुन्दर और अलंकृत पदविन्यासयुक्त उपन्यास।
उपन्यास केवल एक साहित्य-रूप नहीं है, बल्कि जीवन-दृष्टि और विश्व-दृष्टि भी है। वह लोकतान्त्रिक और मानवीय स्वाधीनता का पक्षधर है। वह सभी प्रकार की सत्ताओं का विपक्षी है। आधुनिक मानव को तमाम मानव-विरोधी सत्ताओं और उनसे उपजी मूल्य-व्यवस्थाओं से मुक्त और स्वतंत्र करनेवाला कथा-रूप है। यह अकारण नहीं है कि आलोचकों ने इसे मुक्तिकामी रूप कहा है। उपन्यास का कोई समर्थक उपन्यास के रूप में अन्तर्निहित जीवन-दृष्टि और विश्व-दृष्टि का विरोध करते हुए उसका समर्थक नहीं हो सकता। रामचंद्र शुक्ल ने उपन्यास की हृदय से प्रशंसा और मनोयोगपूर्वक विवेचन करके, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से, उसमें अन्तर्निहित दृष्टियों और मुक्तिकामी चेतना का समर्थन किया है और उनका विरोध किया जिनका विरोध उपन्यास करता है। कहना न होगा कि उनके उपन्यास चिंतन से न केवल उनके उपन्यास-दर्शन और उपन्यास मात्र के बारे में पता चलता है, बल्कि उनके भी जीवन-दर्शन का पता चलता है। उपन्यास को खोलने में स्वयं शुक्ल जितना खुलते-खिलते हैं, उतना महाकाव्यों को खोलने में नहीं। जाहिर है, उपन्यास उनका समकालीन है, सहयात्री है और महाकाव्य पूर्वज है, इतिहास है। एक जीवंत और गतिशील विचारक का जैसा और जो सम्बन्ध अपने समय से होता है, वैसा और वही सम्बन्ध अतीत से नहीं होता।
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सन्दर्भ सूची
1. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली, भाग-1,
संपादक- ओमप्रकाश सिंह, प्रकाशन संस्थान,
नयी दिल्ली, 2011, पृष्ठ 183।
2. वही, पृष्ठ 426।
3. हिंदी का गद्य पर्व, नामवर सिंह, राजकमल
प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2013, पृष्ट 116।
4. हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचन्द्र शुक्ल,
लोक भारती प्रकाशन, इलाहबाद, 2002, पृष्ठ
367।
5. ग्रंथावली-3, पृष्ठ 437।
6. ग्रंथावली-3, पृष्ठ 452।
7. भारतीय उपन्यास की अवधारणा और स्वरुप,
संपादक- आलोक गुप्त, राजपाल एण्ड संस,
दिल्ली, 2012, पृष्ठ 10।
8. ग्रंथावली-3, पृष्ठ 310।
9. वही, पृष्ठ 310।
10. हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 369।
11. वही, पृष्ठ 367।
12. वही, पृष्ठ 366।
13. हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 367।
14. वही, पृष्ठ 371।
15. ग्रंथावली-3, पृष्ठ 103।
16. वही, पृष्ठ 102।
17. हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 336।
18. ग्रंथावली-3, पृष्ठ 102।
19. वही, पृष्ठ 102।
20. वही, पृष्ट 103।
21. आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना,
रामविलास शर्मा, विनोद पुस्तक मन्दिर,
आगरा, 1956, पृष्ठ 228।
22. उपन्यास और लोकतंत्र, मैनेजर पाण्डेय, वाणी
प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2013, पृष्ठ 62।
23. ग्रंथावली-1, भूमिका, पृष्ठ- 36
24. ग्रंथावली-3, पृष्ठ 103-104।
25. हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 365-366।
26. वही, पृष्ठ 368।
27. वही, पृष्ठ 369।
28. वही, पृष्ठ 369।
29. वही, 343।
30. ग्रंथावली-3, पृष्ठ 310।
31. वही, पृष्ठ 310।
32. हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 370।
33. वही, पृष्ठ 370।
34. वही, 380।
35. वही, पृष्ठ 380।
36. वही, पृष्ठ 369।
37. वही, पृष्ठ 369।
38. वही, पृष्ठ 368।
39. आर्ट ऑफ नॉवेल, मिलान कुंदेरा, फेबर एण्ड
फेबर,क्रॉयडन, ब्रिटेन,2005,पृष्ठ 5।
40. आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना,
रामविलास शर्मा, विनोद पुस्तक मन्दिर,
आगरा, 1956, पृष्ठ 6।
41. हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 367।
42. वही, पृष्ठ 391।

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