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कोलाहल के जवाब में मौन

राजीव रंजन गिरि
हिंसा के आधार पर बना हुआ समाज भी विशारदों द्वारा ही चलता है। हम एक नये समाज का निर्माण सत्य और अहिंसा के आधार पर करना चाहते हैं। उनका शास्त्र बनाने के लिए हमें विशारदों की जरूरत है। जिस तरह से आज जगत चल रहा है, वह हिंसा और अहिंसा का मिश्रण है । जगत का बाह्य रूप उसकी भीतरी हालत का प्रतीक है..... हिंसा का मार्ग पुराना और रूढ है। उसमें खोज करना इतना कठिन नहीं है, अहिंसा का रास्ता नया है, अहिंसा का शास्त्र अभी बन रहा है। हम उसके सारे अंग नहीं जानते। इसमें खोज और प्रयोग का विशाल क्षेत्र पडा है। आप अपनी सारी बुद्धि लगा सकते हैं।
- महात्मा गाँधी (गाँधीवाद रहे ना रहे पृष्ठ 14-15)

सन 1940 मलिकांदा (पश्चिम बंगाल) में पद्मा नदी के किनारे गाँधी सेवा संघ छठवाँ अधिवेशन हुआ था। गाँधीजी अपने लोगों के, गाँधीजनों के, बीच थे। 20 फरवरी को इसके उद्घाटन में गाँधीजी ने भाषण किया, फिर 21 फरवरी की सुबह और शाम तथा 22 फरवरी की सुबह और शाम भी। उपर्युक्त उद्धरण इसी भाषण से लिया गया है। करीब आठ दशक पूर्व गाँधीजी द्वारा जाहिर की गई चिंता आज भी बनी हुई है। क्या यह कहने की जरूरत है कि संसार भर में, आज भी, विद्या-विशारदों का बहुलांश हिंसा की संरचना से जुडे विभिन्न आयामों से सम्बद्ध है। अहिंसा और हिंसा के सम्बंध में, जीवन-जगत से जुडे, ज्ञान के हर अनुशासन में चिंतन मनन होता है; इसमें बोलबाला हिंसा का है। विचार की दुनिया में कोई विचार - प्रत्यय इसलिए कमजोर नहीं माना जा सकता है क्योंकि उसके विपरीत विचार को ज्यादा समर्थन हासिल है; या सबसे शक्तिशाली समूह संस्थानों या संगठन की संरचना उसके विपरीत है। कहना तो यह होगा कि अल्प समूहों का समर्थन पाकर भी कोई भी विचार- प्रत्यय ज्यादा महत्त्वपूर्ण, जरूरी और सत्य के निकट हो सकता है। गाँधीजी ने मलिकांदा सम्मेलन में कहा था कि जर्मनी जैसा मुल्क, जो हिंसा को ईश्वर मानता है, रात-दिन उसी के विकास में लगा है, उसी को सुशोभित करने में लगा हुआ है। जिस दौर में गाँधीजी यह कह रहे थे, उस दौर को जेहन में रखने पर इसका आशय स्पष्ट हो जाता है। उस दौर में जर्मनी की हैसियत, उसके वैचारिक मार्ग के बारे में सोचते हुए हिंसा के साथ उसके अंतर्संबंध पता चल जाता है। कहना होगा कि पिछले आठ दशकों में दुनिया के सभी देशों ने वही रास्ता अख्तियार किया है। दिलचस्प यह है भी है कि जर्मनी की फासीवादी विचारधारा का विरोध करने वाले कतिपय विचारधाराओं में भी हिंसा को तवज्जो दी गई है। हिंसा, सर्व सत्तावाद और नस्ली भेद के समुच्चय से जर्मनी के नाजी विचारधारा निर्मित हुई थी। क्या यह कहने की जरूरत है कि इस दर्शन का विकल्प अहिंसा, विकेंद्रीकरण और समता के साथ अभेद दृष्टि वाला दर्शन ही रच सकता है। गाँधी दृष्टि इसी प्रस्थान बिंदु से ऐसी तमाम विचारधाराओं के विकल्प के रूप में दिखती है; शोर और कोलाहल के जवाब में मौन की तरह।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से 21वीं सदी की चौथाई के दौरान जितनी विचारधाराएँ सामने आईं हैं, अपवाद स्वरूप ही अहिंसा की आधार भूमि पर अपना वितान खडा करती है। बावजूद इसके अहिंसा का स्रोत सुदूर अतीत में दिखता है और इसकी छवियाँ हर देश -काल में दिखती हैं। येन-केन- प्रकारेण हिंसा का समर्थन करने वाली विचारधाराओं के शोर में भी, भले ही बिखरे और असंगठित रूप में।
अहिंसा की चर्चा होने पर निकट अतीत के, जिस व्यक्ति का नाम जेहन में सबसे पहले आता है, वे महात्मा गाँधी हैं। गाँधीजी को भली-भाँति एहसास था कि सत्य और अहिंसा उतने ही पुराने हैं जितने पर्वत। फिर भी वे इस मार्ग को नया मानते थे ताकि इसके शास्त्र - निर्माण पर विद्या - विशारदों का ध्यान जाए। गाँधीजी ने अपना यह मत कई बार जाहिर किया है। गाँधीजी का यह विचार अनुचिंतनमूलक धारणा माना गया। इसलिए आवश्यक था कि कोई विद्या - विशारद अहिंसा के स्रोत की तलाश ज्ञान -विज्ञान के विभिन्न अंग -उपांगों में करें; ताकि इसे महज धारणा न मानी जाए; बल्कि प्रमाण के साथ और वैज्ञानिक आधार पर इसका पक्ष स्पष्ट किया जा सके।
नंदकिशोर आचार्य ने यह बीडा उठाया है। इन्होंने अहिंसा विश्वकोश का संपादन भी किया है, जिसका प्रकाशन 2010 में प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर से हुआ। अहिंसा विश्वकोश में आचार्य ने एक लंबी भूमिका लिखी है, सुचिंतित एवं सारगर्भित। इस विश्वकोश के प्रकाशन के आठ साल बाद अहिंसा की संस्कृति नामक पुस्तक छपी; रजा पुस्तक माला के अंतर्गत राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली से। अहिंसा की संस्कृति पुस्तक अहिंसा विश्वकोश में जीवन का नियम है अहिंसा शीर्षक से प्रकाशित पुरोवाक का परिवर्धित रूप है। अहिंसा की संस्कृति में अहिंसा के आधार की खोज की गई है, साथ ही इसके विभिन्न आयामों का विश्लेषण भी किया गया है। यह पुस्तक आठ अध्यायों में विभक्त है- अहिंसा जीवन का धर्म, अहिंसा की तत्त्व मीमांसा- धर्म दर्शन, अहिंसा की तत्त्व मीमांसा-विज्ञान, अहिंसा की तत्त्व मीमांसा इतिहास, अहिंसा की तत्त्व मीमांसा मनोविज्ञान, अहिंसा की व्यावहारिकता, अहिंसा का आर्थिक आयाम, अहिंसा का राजनीतिक आयाम और अहिंसा का सांस्कृतिक आयाम। अहिंसा की संस्कृति के अध्ययन के शीर्षक से स्पष्ट है कि तत्त्व मीमांसा के लिए चार अध्याय हैं। इसके अंतर्गत धर्म- दर्शन, विज्ञान, इतिहास और मनोविज्ञान में अहिंसा की तत्त्व मीमांसा की गई है। तत्त्व मीमांसा के अंतर्गत ये चारों अध्याय अहिंसा के स्रोत की तलाश करते हैं; साथ ही, ज्ञान के इन अनुशासनों में अहिंसा संबंधित हुए चिंतन- मनन का विवेचन विश्लेषण भी करते हैं। इसके बाद के अध्यायों में अहिंसा की व्यावहार्यता के अतिरिक्त राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आयामों की पडताल की गई है। कहना होगा कि ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों और जीवन- जगत के विभिन्न क्षेत्रों में अहिंसा की उपस्थिति एवं अहमियत की तलाश इसलिए आवश्यक है कि हिंसा को खारिज करने का प्रयास होता रहता है, अव्यावहारिक एवं असंभव बताकर। इस समीक्षात्मक निबन्ध में नंदकिशोर आचार्य की इस पुस्तक का विश्लेषण किया गया है ताकि न सिर्फ इस पुस्तक में निहित विचारों के आलोक में अहिंसा की अनिवार्यता एवं श्रेष्ठता साबित हो सके; बल्कि विभिन्न अनुशासनों में इसके स्रोत का भी उत्खनन किया जा सके।
अहिंसा के बारे में पहली बात कही जाती है कि यह एक निषेधात्मक विचार - प्रत्यय है। इतना ही नहीं, इसे महज भाववादी प्रत्यय के अन्तर्गत इस तरह से पेश किया जाता है कि इसका वस्तुगत धरातल मुमकिन नहीं। जाहिर है, ऐसा कहने वाले मानकर चलते हैं कि भाववाद से बेहतर भौतिकवाद है।
अहिंसा को निषेधात्मक मानने वाले इस शब्द में अ उपसर्ग पर जोर देते प्रतीत होते हैं। अ निषेध यानी नहीं के लिए प्रयुक्त होता है। जाहिर है ऐसा मानने वाले हिंसा को मूल तत्त्व मानते हैं। ऊपरी तौर पर देखने पर ऐसा प्रतीत होता भी है। हिंसा का निषेध अहिंसा है, तो क्या अहिंसा को निषेधात्मक माना जाना चाहिए? इस प्रश्न का जवाब देने से पूर्व पूछना होना होगा कि हिंसा क्या है? अगर निषेधात्मक अ उपसर्ग के प्रयोग से निर्मित अहिंसा निषेधात्मकता की वाचक है, तो हिंसा एक सकारात्मक विचार मानी जाएगी। प्रत्यक्ष रूप से भले ही ऐसा ना कहा जाता हो, पर परोक्ष तौर पर हिंसा को सकारात्मक सिद्ध करने की वृत्ति ही इसका कारक है। वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति से लेकर न्यायी हत्यारे की धारणा इसी विचार से उत्पन्न हुई है। आचार्य जोहन गाल्तुंग की रचना वायलेंस एंड इट्स कॉजेज के हवाले से बताते हैं, मानवीय आत्मसिद्धि में कोई भी निवारणीय अवरोध हिंसा है। गाल्तुंग का यह कथन हिंसा को सकारात्मक नहीं मानता। हिंसा अवरोध है। मूल स्वभाव से विपरीत है। लिहाजा स्वाभाविक कर्म भी नहीं। आचार्य अपना विश्लेषण यहीं तक सीमित नहीं रखते; बताते हैं कि कुछ शब्द रूप निषेधात्मक होते हुए भी सकारात्मक भाव का द्योतक होते हैं, मसलन अमरता या अमृतत्त्व। वे बताते हैं कि हिंसा पद की व्याख्या करने पर भी अहिंसा पद भावात्मक और नैतिक स्तर पर एक सकारात्मक भाव ही प्रेरित करता है।..... अहिंसा अपनी सकारात्मकता के कारण केवल भाव नहीं, बल्कि क्रिया अथवा आचरण भी है और इस भाव की सिद्धि भी भावात्मक के साथ - साथ आचरणगत ही हो सकती है। अहिंसा के बारे में कहा जाता है कि यह व्यक्तिगत स्तर पर तो संभव है इससे इतर नहीं। गाल्तुंग की परिभाषा में हिंसा को अवरोध कहा गया है; साथ ही उसे निवारणीय भी माना गया है। यह सर्वथा उचित भी है। इस परिभाषा को विश्लेषित करते हुए आचार्य ने ठीक ही कहा है कि संस्कृति मानव जाति के अनवरत आत्म सृजन की प्रक्रिया है। अपनी सृजनात्मकता का निरंतर उत्कर्ष ही मानवीय आत्मसिद्धि है और उसके मार्ग में उत्पन्न अनेक निवारणीय अवरोधों को दूर करना ही व्यक्ति ही नहीं संस्थानिक तथा सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक संस्थानों का लक्ष्य होना चाहिए।
समाज में किसी भी विचार - प्रत्यय की मौजूदगी का अंदाजा उस उस विचार से संबंधित शब्दों के प्रचलन से भी लगता है। किसी देश- काल में कोई विचार एक समाज में केंद्रीय स्थान में रहता है, तो दूसरे समाज ने केंद्र से दूर परिधि पर भी। अहिंसा का विचार (भारत के संदर्भ में) जैन दर्शन के केंद्र में रहा है। यही वजह है कि जैन ग्रंथ प्रश्न व्याकरण सूत्र में अहिंसा के साठ पर्याय मौजूद हैं। जो समाज जिस विचार, व्यवसाय, भूगोल या अबोहवा में जीता है उसमें, अपने से संबंधित के लिए, सूक्ष्म स्तर पर फर्क के साथ, अनेक शब्दों को गढता और प्रयुक्त करता है। एस्किमो जाति के उदाहरण से यह बात समझी जा सकती है। बर्फ के साथ जीवन-बसर करने वाले लोगों के पास बर्फ की विभिन्न अवस्थाओं के बीसियों शब्द हैं।
अहिंसा के विचार को खारिज करने वाले लोग अन्यचिंतनात्मक दार्शनिक प्रणालियों और तर्क निर्धारित आर्थिक प्रणालियों में फर्क करते हुए अहिंसा को अनुचिंतात्मक दार्शनिक प्रणाली से सम्बद्ध मानते हैं। इसलिए नंदकिशोर आचार्य ने पुस्तक में, अहिंसा की तत्त्व मीमांसा की पडताल करते हुए, यह दिखाया है कि अनुचिंतनात्मक दार्शनिक प्रणालियाँ और विज्ञान सम्मत तर्क निर्धारित दार्शनिक प्रणालियाँ ज्ञान मीमांसात्मक आधारों से प्रसूत तत्त्व मीमांसाओं के आधार पर अहिंसा को मानव अस्तित्त्व के नियम (या कहें कि धर्म के) रूप में कैसे प्रस्तावित करती है। विभिन्न धर्म दर्शनों में तत्त्व मीमांसा में भले ही भिन्नता दिखती हो, परंतु उन सब की नैतिकी का अध्ययन कर आचार्य ने समानता की तलाश की है। सभी धर्म- दर्शनों ने मनुष्यों से आचरण की जो कामना की है, वह समान है। इस आचरण की कसौटी अहिंसा है। इसे प्रेम, करुणा, दया, क्षमा आदि विभिन्न नामों से व्यंजित किया गया है। एक प्रश्न पूछा जा सकता है कि धर्म में अहिंसा का विचार खोजने का क्या अभिप्राय है? धर्म दार्शनिक विचार के तौर पर और अनुपालन के रूप में एक- दूसरे से दूर भी दिखते हैं। धर्म जब संगठित धर्म यानी मजहब या रिलीजन में तब्दील हो जाता है, तो उसमें काफी अंतर आ जाता है। कई बार तो यह भी दिखता है कि धर्म जिस नैतिक संहिता की प्रस्तावना करता है उसे मानने वाले उससे उल्ट आचरण करते हैं। बावजूद इसके दार्शनिक रूप में धर्म की भूमिका कम नहीं हो जाती। नंदकिशोर आचार्य ने एम.एन. राय को उद्धृत कर बताया है कि किसी दार्शनिक उद्देश्य की पूर्ति करने तक धर्म भी एक बौद्धिक और नैतिक आवश्यकता है। धर्म का दार्शनिक मूल उसके तर्क बुद्धिवादी बीजकोष में है.... अति प्राकृतिक में विश्वास के लिए विवश करने वाली परिस्थिति गत प्रतिकूल ताओं में उभरते ही मनुष्य विचार की धार्मिक पद्धति का अतिक्रमण करने को बाध्य है।
हिंदी क्षेत्र में नंदकिशोर आचार्य अहिंसा दर्शन के समर्थक विद्वानों में अनन्य हैं। इस पुस्तक में उन्होंने अहिंसा के पक्ष में अपनी बातें सीधे - सीधे कहने की बजाय उससे संबंधित विद्वानों के जरीये अपनी बातें कही हैं। अहिंसा के विरोध में जो तर्क दिए जाते हैं, उसके प्रतिपक्ष में अहिंसा के समर्थन में जो तार्किक बातें इस विषय पर चिंतन- मनन करने वाले विद्वानों ने कही है, उन्हें उद्धृत कर, उसकी व्याख्या के जरीये अपनी बात समझाई है। इस पुस्तक के केंद्र में है आचार्य की अभेद - दृष्टि। वे इस पुस्तक में अभेद - दृष्टि के पक्ष में चिंतकों दार्शनिकों का प्रयोग बखूबी करते हैं। इस लिहाज से अगर चिंतकों- दार्शनिकों में दो मोटा विभाजन करना हो, तो कहा जा सकता है कि एक श्रेणी में वे लोग आएँगे, जो अभेद- दृष्टि वाले हैं और दूसरे में भेद- दृष्टि वाले। अपनी इस दृष्टि के पक्ष में आचार्य पुस्तक के प्रारंभ में ही, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ रामकृष्णन की स्थापना का सहारा लेते हैं। विभिन्न धर्मों, दार्शनिक विचारों में अपने-अपने पक्ष को सत्य या विश्वजनीन मानने का प्रचलन मिलता है। इतिहास गवाह है की अपनी मान्यता को सत्य मानने के क्रम में दूसरों के सत्य का कितना हनन हुआ है। आचार्य द्विवेदी इसमें भी अभेद दृष्टि की प्रस्तावना करते हैं। वे कहते हैं संपूर्ण सत्य अविरोधी होता है। इसकी व्याख्या करते हुए वे लिखते हैं कि प्रत्येक देश या धर्म या जाति आदि अपनी विशेष परिस्थिति में कुछ प्रयत्न करते हैं, लेकिन प्रत्येक प्रयत्न एक - दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि पूरक होता है क्योंकि प्रत्येक प्रयत्न का प्रयोजन और सार्थकता इसमें है वह मनुष्य के सर्वोत्तम को किस हद तक प्रकाशित कर सकता है। धर्म -दर्शन भी मनुष्य का सर्वोत्तम प्रकाशित करने की प्रक्रिया के परिणाम है। दर्शन जीव- जगत को देखने का नजरिया देता है। इस नजरिये में ऊपरी भेद होना मुमकिन है; पर गहरे स्तर पर जाएँ, तो इनमें भी अपृथक भिन्नता ही मिलेगी। वेद निष्ठ धर्म हो या वेदेतर, दार्शनिक स्तर पर उपरी भेद दिखाई देते हैं, पर जैसा कि डाक्टर राधाकृष्णन ने कहा है विभिन्न दर्शन विभिन्न दृष्टिकोण हैं और उनका एक - दूसरे के प्रतिकूल होना आवश्यक नहीं है। वे आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर संकेत चिह्न हैं। यदि धार्मिक सत्य भिन्न - भिन्न वर्गों को भिन्न - भिन्न रूपों में दिखाई पडता है, तो इसका मतलब अंतिम सत्य के एक होने से इंकार नहीं है। यदि उच्चतर धर्मों में समानताएँ हैं, तो अनेक अवसरों पर अनेक रूपों में ईश्वर की रहस्यमयी भावना के कार्यान्वयन की इन अभिव्यक्तियों का, जो पूर्ण इकाई में सबको बाँध कर रखती है, स्वागत किया जाना चाहिए। आचार्य बताते हैं कि हिन्दू धर्म के पौराणिक रूप में अहिंसा को धर्म घोषित किया गया है। महाभारत में अहिंसा को कहीं परम धर्म तो कहीं सकल धर्म की संज्ञा दी गई है। शांतिपर्व में सत्य के तेरह रूपों का उल्लेख है। इसमें से एक अहिंसा है। गौरतलब तथ्य यह भी है कि यह सभी रूप अहिंसा की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। ये बताते हैं कि सूक्ष्म स्तर पर अहिंसा और सत्य एक हो गए हैं। वेदेतर धर्मों में भी अहिंसा की केंद्रीयता दिखती है। इनसे इतर मसीही धर्म मसलन- यहूदी, ईसाई और इस्लाम की नैतिकी में भी अहिंसा और उसकी समानार्थी अवधारणाओं को केंद्रीय स्थान प्राप्त है।
दुनिया में सर्वाधिक हिंसा धर्म के कारण हुई है या विज्ञान के, इसका ठीक-ठीक आकलन करना कठिन है। धर्म के नाम पर चाहे जितनी हिंसा हुई हो पर यह स्वीकार करने में किसी को शायद ही दिक्कत हो कि सैद्धांतिक तौर पर सभी धर्मों के केंद्र में अहिंसा की अवधारणा है। क्या यही बात विज्ञान के के बारे में भी कही जा सकती है? क्या विज्ञान की संहिता में अहिंसा की स्वीकृति है? क्या अहिंसा का कोई वैज्ञानिक आधार है? कुछ वैज्ञानिकों के व्यक्तिगत प्रयासों को नजरअंदाज कर दें और विज्ञान के बारे में, ज्ञान के एक अनुशासन के रूप में सोचें, तो अहिंसा के साथ इसका कैसा रिश्ता दिखता है? अहिंसा धर्म और नैतिकी के केंद्र में दिखती है; क्या यही बात विज्ञान के बारे में, उसी आत्मविश्वास के साथ, कही जा सकती है? चिंतन का विकास हमें धर्म और विज्ञान का अंतर सिखा चुका है। नंदकिशोर आचार्य भी इसे स्वीकार करते हैं; इसलिए, वे लिखते हैं कि धर्म और अनुचिंनात्मक दर्शनों का आधार कुछ अलौकिक-सी अनुभूति और तर्कबुद्धि होती है, लेकिन उनके सत्यापन अथवा वैज्ञानिक प्रामाणिकता पर संदेह बने रहना स्वाभाविक है- और यह भी कि जिन अनुभूतियों पर विभिन्न धर्म विकसित हुए हैं, उसमें भी भिन्नता और कभी-कभी विरोध भी देखने को मिल सकता है। परिणामस्वरूप उनकी नैतिकी के मानवीय औचित्य को स्वीकार करने के बावजूद उसे वैज्ञानिक आधार पर विकसित नहीं माना जा सकता। मनुष्य क्यों नैतिक हो और क्यों अहिंसक? क्या इसलिए कि धर्म ऐसा कहता है या ईश्वर ने अपने किसी पैगंबर के माध्यम से मनुष्य को नैतिक आचरण का आदेश दिया है? लेकिन सभी धर्म-- चाहे वे ईश्वर और आत्मा तक को न मानते हों -किसी- न- किसी अभौतिक सत्ता प्रक्रिया में विश्वास पर टिके हैं, जिसकी वैज्ञानिक प्रामाणिकता या सत्यापन संभव नहीं है। इसलिए आवश्यक है कि नैतिक आचरण का कुछ ना कुछ वैज्ञानिक आधार होना चाहिए क्योंकि तभी उसका उत्स मनुष्य के अपने विवेक में माना जा सकता है। यह इसलिए भी आवश्यक है, जैसा कि एम.एन. राय ने भी कहा है, कि एक मुक्त व्यक्ति अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह किसी विवशता के कारण या सामूहिक अहम के कठोर देवता के सम्मुख श्रद्धांजलि के रूप में नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्रता की चेतना से प्रसूत नैतिक आस्था के कारण करता है।..... निजी और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का आधार दंड संहिता और पुलिस है या धर्माधिकारी तो इनकी निगरानी के बिना तो मनुष्य हर जगह जंगलराज कायम कर देगा। इसलिए इस दुष्चऋ से निकलने का रास्ता उसी नैतिक दर्शन मिल सकता है जो अपने मूल्यों का आधार मानव प्राणी की विवेकशीलता में प्राप्त करता है। आज इस विवेकशीलता को भी एक विज्ञान- सम्मत जैविक- प्रक्रिया के रूप में देखना होगा क्योंकि तभी मनुष्य अपने आप में एक नैतिक संप्रभु हो सकता है।
अहिंसा की तत्त्व मीमांसा विज्ञान में तलाश करने और दिखाने के लिए आचार्य ने अभेद दृष्टि के जरीये पदार्थ और चेतन के पारस्परिक संबंधों पर बल दिया है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जेम्स लवलॉक द्वारा प्रतिपादित पृथ्वी सिद्धांत (गाया थियरी) और रूसी वैज्ञानिक व्लादीमीर इवानोविच वर्नातस्की के चेतना मंडल (नुस्फियार) के सिद्धांतों के सहारे समूची सृष्टि में समान जीवन तत्त्वों की मौजूदगी को साबित किया है। पारिस्थितिकी विज्ञान की अद्यतन खोजों से भी इस मानता की पुष्टि होती है। प्रसिद्ध दार्शनिक अर्नेनेस की गहन पारिस्थितिकी की अवधारणा समस्त जैवमंडल को अपने दायरे में लेती है। इससे भी जैव मंडलीय समता और वैविध्य के साथ अंतर्धारा की तरह मौजूद पारस्परिक संबंध साबित होता है। इसलिए बेहतर होगा यह कहना कि एकता और विविधता की संगति का स्वीकार अहिंसा है।
अहिंसा की तत्त्व मीमांसा इतिहास में तलाश करने के लिए आचार्य ने पूछा है कि क्या अहिंसा इतिहास सम्मत मूल्य है? मानव जाति का विकास हिंसा के माध्यम से हुआ है या अहिंसा के? इतिहास के अनुभव के आधार पर हम कैसा व्यक्ति और समाज चाहते हैं- हिंसक या अहिंसक? जाहिर है इतिहास में युद्ध के अनेक उदाहरण हैं; परंतु इसे मूल्य के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। मनुष्य जाति के विकास में हिंसा ने अवरोध का काम किया है। इतिहास में हुए युद्धों के साक्ष्य के आधार पर यह जोर देकर कहा जा सकता है कि हम अहिंसक व्यक्ति भी चाहते हैं और समाज भी। नंदकिशोर आचार्य ने इतिहास में हुए युद्धों को किसी व्यक्ति के भीतर की मनोवृत्ति को युद्ध के लिए जिम्मेदार नहीं माना है। इसकी पुष्टि के लिए इन्होंने मनोवैज्ञानिक फ्रायड द्वारा वैज्ञानिक आइंस्टीन को लिखे एक पत्र का उल्लेख किया है। फ्रायड ने अपने पत्र में मनुष्य में अंतर्निहित किसी विध्वंसात्मकता को युद्धों का कारण नहीं माना है। फ्रायड के मुताबिक युद्ध मनुष्य की अवचेतना की प्रवृत्तियों के कारण नहीं, यथार्थ परक विवादों या द्वंद्वों का समाधान निकाल पाने में विफलता की वजह से होते हैं। एरिक फ्रॉम की स्थापना फ्रायड के मत की पुष्टि करती है। फ्रॉम ने लिखा है कि जब हम मानवीय प्रवृत्ति को युद्ध के लिए जिम्मेदार मानते हैं, तो दरअसल सामाजिक परिस्थिति और महत्वाकांक्षी व्यक्तियों और निहित स्वार्थों की अनदेखी कर रहे होते हैं। आचार्य ने इसके आधार पर लिखा है कि अधिकतर युद्ध- महायुद्ध तक-आर्थिक स्वार्थों और हमारे उद्योगपतियों तथा राजनीतिक सैनिक नेतृत्व की महत्वाकांक्षा की वजह से हुए हैं। स्वार्थ केवल वैयक्तिक नहीं होता। वह सामूहिक होकर एक तरह के जातीय या राष्ट्रीय अथवा किसी प्रकार की मतवादी आत्मरति में बदल जाता है, जिसे एम.एन.रॉय सुपर ईगो कहते हैं, जिसमें व्यक्ति अपनी निजी अस्मिता और विवेक का विलय कर देता है और उसका परिणाम होता है अपने स्वार्थों के लिए अन्य आक्रामकता का विस्फोट, जो राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता या सैनिकवाद के रूप में प्रकट होता है।
इतिहास के इन अनुभवों के आधार पर हम कैसा भविष्य चाहते हैं? डॉक्टर राधाकृष्णन ने समाज की उन्नति को तीन सोपानों के जरीये समझाया है, इससे भविष्य के समाज का स्वप्न समझा जा सकता है। समाज के उन्नति - क्रम में तीन सोपान स्पष्ट दिखाई पडते हैं। पहला सोपान वह है, जिसमें जंगल का कानून प्रचलित रहता है, उसमें हमारे अंदर हिंसा और स्वार्थ भरा रहता है। दूसरा सोपान वह है, जिसमें अदालतों, पुलिस और जेलों के साथ कानून और निष्पक्ष न्याय का शासन रहता है। तीसरा सोपान वह है, जिसमें हमारे अंदर अहिंसा और निस्वार्थता आ जाती है, जिसमें प्रेम और कानून एक हो जाते हैं। मानव जाति तीसरे सोपान को प्राप्त करना चाहती है, तो अहिंसा को केंद्रीय समझना होगा और उसे अमल में लाना होगा।
अहिंसा की तत्त्व मीमांसा मनोविज्ञान में मनोवैज्ञानिकों द्वारा मनुष्य के स्वभाव के अध्ययन का सहारा लिया है और निष्कर्ष के तौर पर कहा है कि हिंसा का सवाल जीव वैज्ञानिक नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक सवाल है। हमारी सामाजीकरण की प्रक्रिया अभी तक हिंसा के औचित्य या उसके द्वारा प्रदत्त बल का सम्मान करती अर्थात उसे वांछनीय मान लेती है। ब्रूस दि बोता के अध्ययन का उल्लेख करते हुए बताया है कि बोंता ने ऐसे सैंतालीस जनजातीय समाजों की खोज की है, जहाँ अत्यधिक पारंपरिक सामंजस्य तथा नगण्यतम हिंसा है। बोंता के इस अध्ययन को स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के तेईस मनोचिकित्सकों के अध्ययन निष्कर्ष के विकास के रूप में देखना होगा। इन मनोचिकित्सकों ने हिंसा के सवाल पर अपनी समिति की तरफ से निष्कर्ष निकाला है कि मानव स्वभाव के बारे में जितना हमारा ज्ञान है उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि हिंसा का युग समाप्त हो सकता है-- यदि हम दूसरे विकल्पों को अपनाने का निश्चय करें।
अहिंसा की इस गंभीर तत्त्वमीमांसा से अहिंसा की व्यवहार्यता और अनिवार्यता भी साबित होती है। पुस्तक के अगले अध्यायों- अहिंसा की व्यवहार्यता, आर्थिक आयाम, राजनीतिक आयाम और सांस्कृतिक आयाम- में अहिंसा संबंधी हुए अध्ययनों का उल्लेख कर आचार्य ने पूछा है कि हिंसक संरचनाएँ और तत्प्रेरित हिंसक व्यवहार मानव- जाति के भावी विकास के लिए वांछनीय है या एक अहिंसक विकल्प की तलाश और उसकी चरितार्थता की कोशिश? अहिंसा की संस्कृति पुस्तक उचित ही मानव जाति के विकास के लिए अहिंसा के विकल्प की तलाश प्रस्तावित करती है, साथ ही समाज के प्रत्येक क्षेत्र में इसकी अनिवार्यता का भी। नंदकिशोर आचार्य के इस प्रस्ताव पर विचार नहीं करने पर भावी समाज कैसा होगा, इसे कुमार अंबुज की क्रूरता शीर्षक कविता बयान करती है -
धीरे-धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा
प्रेम की आकांक्षा तो होगी
मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी
और खो देने की पीडा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे
तब आएगी क्रूरता
पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी
पहली मृत्यु से उपजे आँसू
पडोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा
तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी
हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा
वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि
किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो
वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा श्रृंगार
यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले
उसका आना।
क्या यह कहना उचित नहीं होगा कि गाँधीजी ने मलिकंदा सम्मेलन में विद्या - विशारदों से जो अपील की थी, उस दिशा में नंदकिशोर आचार्य की पुस्तक एक प्रस्थान बिंदु की तरह है।

सम्पर्क - हिंदी विभाग
राजधानी कॉलेज
(दिल्ली विश्वविद्यालय)
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