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कला और आपदा

स्कन्द शुक्ल
वह सन् 1665 की गर्मी थी, जब प्लेग कैम्ब्रिज में फैलने लगा था। उसी समय एक तरुण ने विश्वविद्यालय एवं शहर छोडा और पचास मील उत्तर लिकन्शर में अपने गाँव चला आया। आपदा के व्यापक प्रभाव के कारण चूँकि कैम्ब्रिज-विश्व-विद्यालय बन्द था, इसलिए युवक को वहाँ लगभग डेढ वर्ष रहना पडा। लेकिन इन डेढ सालों में युवक ने जो कुछ किया, उससे भौतिक विज्ञान और संसार को सदैव के लिए बदल कर रख दिया।
गाँव की ओर प्रतिविस्थापित वह तरुण सुख्यात वैज्ञानिक आइ*ोक न्यूटन थे। सन् 1665-66 को उनके एनुलस मिराबिलिस अर्थात् विलक्षण वर्ष के रूप में वर्णित किया जाता रहा है। यही वह समय था, जब न्यूटन ने गुरुत्व के नियम को प्रतिपादित किया था। पृथ्वी पर गिरते सेब का सम्बन्ध उन्होंने पृथ्वी की परिक्रमा करते चन्द्रमा से एक ही नियम के अन्तर्गत की थी - इस तरह से जिन नियमों से पार्थिवता संचालित थी, उन्हीं से चान्द्र स्वर्गीयता का भी संचालन उन्होंने पाया था।
आज हम न्यूटन के उस नियम के चारों ओर एक रोचक प्रसंग गढ कर उसे सुनते-सुनाते हैं। हम यह जानते हैं कि आइ*ोक न्यूटन के सिर पर एक सेब गिरा था, जब वे गाँव के किसी सेब-वृक्ष के नीचे सुस्ता रहे थे। सेब का आघात झेलने के बाद ही उन्हें गुरुत्व-नियम को सोचने और प्रतिपादित करने की प्रेरणा मिली। उन्होंने हमें बताया कि जिस तरह सेब पृथ्वी पर गिरता है, उसी तरह चन्द्रमा भी पृथ्वी की ओर गिर रहा है। जिस आकर्षण-बल से सेब और पृथ्वी जुडे हुए हैं, उसी से चन्द्रमा और पृथ्वी भी सम्बद्ध हैं। उस समय के लोगों के लिए यह बात झकझोरने वाली थी, जो सोचते थे कि आसमानी पिण्डों के नियम धरती पर मौजूद पिण्डों के नियमों से भिन्न हैं। पार्थिव नियमों की स्वर्गीय नियमों से भला क्या बराबरी! लेकिन न्यूटन ने एक गणितीय सूत्र द्वारा सेब से चन्द्रमा तक पृथ्वी से अन्तरिक्ष तक की दूरी मेट दी थी।
न्यूटन के सिर पर सेब का गिरना सम्भवतः एक किंवदन्ती ही है। किन्तु ऐसी किंवदन्तियों को घटनाओं के इर्द-गिर्द उगने से हम नहीं रोक सकते। रोकना चाहिए भी नहीं। संसार में ढेरों घटनाओं का कहानी में ढाला जाना उन्हें आगामी पीढियों के लिए सरस-सप्राण रखने का प्रयास है। जिन घटनाओं का कथाकरण नहीं हो पाता, वे बडी दुर्भाग्यशाली होती हैं। किसी विचार को समझने के लिए हम उसे निर्देही आत्मा मान सकते हैं ; कथा-रूपी शरीर को पाकर ही वह सदेह-सरूप होकर अपना सामाजिक योगदान भली-भाँति दे पाता है।
कला और आपदा को हम आम तौर पर बेर-केर के सम्बन्ध के रूप में समझा करते हैं। एक जब अपने रस-संग डोलती है, तब दूसरे के अंग फटने ही लगते हैं। आपदा का दौर प्राथमिकताओं के सही निर्धारण का समय माना जाता है। कलाओं को प्राथमिकता मानते ही नहीं, उनका महत्त्व तो हमारे द्वारा सामान्यतः द्वितीयक-तृतीयक समझा जाता है। आपात्-काल में जब समस्या सामने हो, तब जीवन की रक्षा सबसे महत्त्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में कलाधर्मिता-कलाजीविता पर ध्यान जाए तो कैसे जाए भला!
कला और आपदा को विलोम-वृत्ति का समझने के पीछे हमारा कला और आपदा, दोनों ही का संकीर्ण बोध होना है। हम कला को व्यापक अर्थ में बूझ ही नहीं पाते, न आपदा की विनष्टिकारिणी प्रवृत्ति को ठीक से जान पाते हैं। कला के दायरे में हमारे लिए केवल साहित्य-संगीत-चित्रकारिता-मूर्तिकारिता जैसे चुनिन्दा विषय आते हैं ; इनके अलावा ढेरों अन्य क्षेत्रों के लोगों को हम कलाकार मानते ही नहीं। हमें नहीं लगता कि ये अन्य लोग भी किसी तरह कोई कला-बोध रखते हैं अथवा कुछ कलात्मक सर्जना कर रहे हैं। इस तरह से संकीर्ण परिभाषा में जकडी कला को हम भरे पेट के लोगों का वाग्बुद्धिकर्म-विलास मानकर उसके तिरस्कारोपहास से तुष्टि पा लेते हैं।
प्रकृति के हर अवयव को मस्तिष्क के प्रयोग से बूझना और उससे जीवन को बेहतर बनाना कलात्मकता है। हर वह व्यक्ति जो प्रकृति से जीवन निखारता है और जीवन से प्रकृति में निखार लाता है, कलाकार है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस विस्तृत और उदार परिभाषा के प्रयोग के बाद यह तय करना असम्भव हो जाएगा कि कौन कलाकार नहीं है। इसके बाद यह कह सकना भी नामुमकिन होगा कि किसे कला न कहा जाए। बल्कि इस उदारता के बाद कलाकारिता और कलाकारत्व पर मनुष्य का एकाधिकार नहीं रह जाएगा; तमाम जीव-जन्तु और पेड-पौधे भी इन भाववाचक संज्ञाओं से शोभन पा जाएँगे।
इसी तरह आपदाओं के दौरान तय की जा रही प्राथमिकताओं और प्रबन्धनों में हम कला नहीं देख पाते हैं। आपदा नित्य नवीन चुनौतियों को मनुष्य के सामने रखती है, जिसके कारण वह उनसे निबटने के लिए नयी-नयी युक्तियाँ गढने लगता है। आपत्ति-उद्धारक इन सभी युक्तियों, तरकीबों, सामग्रियों को बिना कलात्मकता के भला कैसे रचा जा सकता है? और क्या यह सम्भव है कि आपदा के दौरान उभर कर आयी कलाकारिता और सामान्य समय की कलाकारिता में कुछ भिन्नता हो?
ऐसा सम्भव हो भी सकता है और नहीं भी। आपदा के दौर में मनुष्य की कलात्मकता दो धाराओं में बँट कर आगे बढती है। पहली धारा वह है जो आपदा के प्रभाव के कारण विकसित हुई है। यही वह धारा है, जिसके लिए आवश्यकता आविष्कार की जननी है की सूक्ति रची गयी है। आपदा चुनौती प्रस्तुत करती है, साहसी और समर्थ उस चुनौती की कलात्मक प्रतिक्रिया सामने रख देते हैं। लेकिन फिर कलात्मकता की एक दूसरी धारा भी है - वह धारा जिसका आपदा से कोई सरोकार नहीं होता। आपदा खाली समय मुहैया कराती है, व्यक्ति उसका सकारात्मक प्रयोग करता है। इस प्रयोग के फलस्वरूप वह किसी नूतन कलाकृति-कलाभाव को जन्म देता है।
प्लेग के कारण न्यूटन का गुरुत्व के नियम तक पहुँचना प्लेग के लिए किसी तरह उपयोगी न था। प्लेग की बीमारी अगर आवश्यकता थी, तो उसके लिए आविष्कार किसी दवा अथवा टीके के रूप में होना चाहिए था। लेकिन फिर भी हम यह नहीं कह सकते कि प्लेग के दौरान संसार के सामने गुरुत्व का नियम सामने रखकर न्यूटन ने कोई अनावश्यक कार्य किया। यह कहना भी नादानी होगी कि न्यूटन द्वारा गुरुत्व के ऐसे नियम का प्रतिपादन जो पृथ्वी और अन्तरिक्ष के बीच के नियम-विभेद को मेट देता है, कलात्मक कार्य नहीं था। *ााहिर है कि हमें कला की समझ को संकीर्ण परिभाषाओं से मुक्त करने की महती आवश्यकता है।
अब एक दूसरा उदाहरण लेकर बात को समझते हैं। आइ*ोक न्यूटन की तरह प्रसिद्ध नाटककार विलियम शेक्सपीयर को भी प्लेग-रूपी आपदा का अनेक बार सामना करना पडा था। लन्दन में नाटकों का मंचन रोक दिया गया था और नाटक-मण्डलियों को निर्देश दिए गये थे कि वे अपना काम-काज स्थगित कर दें अथवा नाटकों के मंचन के लिए गाँवों का रुख करें। यही वह समय था, जब शेक्सपीयर ने किंग लियर, मैकबेथ और एंटनी एण्ड क्लियोपैट्रा जैसी कृतियों को खाली समय पाकर जन्म दिया था।
क्या इन शेक्सपीयरीय कृतियों को यह कहकर खारिज किया जा सकता है कि वे प्लेग-काल में पर्याप्त समस्या-उन्मुखी नहीं हैं? क्या शेक्सपीयर पर प्लेग के समय किया गया समयोपयोग दुरुपयोग की श्रेणी में रखा जा सकता है? कहने की आवश्यकता नहीं कि आपात्-काल में प्रत्येक व्यक्ति की कलात्मकता अलग-अलग प्रतिक्रिया प्रदर्शित करती है। यह प्रतिक्रिया अलग-अलग प्रकार और भिन्न-भिन्न कोटि की हो सकती है। हममें से हर व्यक्ति न न्यूटन और शेक्सपीयर-जैसों की सर्जना-शक्ति से सम्पन्न है और न एक ही ढंग से उसे निखार कर प्रदर्शित ही कर सकता है।
न्यूटन और शेक्सपीयर जैसे कला-सम्पन्नों को देखकर एक प्रश्न मन में स्वभावतः उठता है। शोध बताते हैं कि इन-जैसे महानुभावों के मस्तिष्कों की तन्त्रिकाओं का जाल सामान्य (अर्थात् कम कलात्मक) लोगों की तुलना से भिन्न होता है। इस भिन्नता के कारण ऐसे अत्यधिक प्रतिभाशाली लोग बेहद अलग विचारों को जन्म दे पाते हैं और फिर उनका क्रियान्वयन भी तय कर पाते हैं। सामान्य लोग विचारों के जनन-क्रियान्वयन के मामले में इतने नूतन नहीं होते, फिर भी ढेरों लोगों के भीतर आपदा की झकझोर से कुछ-न-कुछ कलात्मक जन्म ले सकता और ले लेता ही है।
वर्तमान समय में मानव-प्रजाति एक वैश्विक महामारी से जूझ रही है, जिसका कारण एक विषाणु है। कोविड-19 ने दुनिया-भर के शक्तिशाली और कम*ाोर, धनी और निर्धन, सम्पन्न और विपन्न जनसंख्याओं को एक ऐसी बडी समस्या में डाल दिया है, जिसके कारण उनका जीवन तरह-तरह से अस्तव्यस्त हो चला है। आधुनिक मनुष्य के जीवन का शायद ही कोई ऐसा आयाम हो, जिसपर कोविड ने अपनी छाप न छोडी हो। स्कूल, दफ्तर, अस्पताल, बा*ाार, आमोद-प्रमोद, विवाह, उत्सव, यात्रा, मृत्यु - हर कर्म अब पिछले वर्ष-सा नहीं रह गया है। लेकिन इसी आपदा के कारण मनुष्य को जो चुनौती झेलनी पड रही है, उसने उसकी कलाधर्मिता को नयी युक्तियों के लिए अभिप्रेरित भी किया है। इस तरह से देखने पर कोरोनाकाल हमें कला-शमनक नहीं, कला-उत्प्रेरक जान पडता है।
कलाधर्मिता को जब हम पारम्परिक ढंग से व्याख्यायित करते हैं, तब उसमें तकनीकी से पर्याप्त दूरी बना लेते हैं। जो कुछ भी तकनीकी-निर्मित है अथवा जिसमें भी तकनीकी का योगदान है, वह कला से दूर और उसका विरोधी है- ऐसा मान लिया जाता है। हम सोचते हैं कि कलाजीवी होने के लिए प्रकृतिस्थ होना आवश्यक है और प्रकृति का अर्थ केवल पेड-पौधे-जीव-जन्तु ही है। जबकि सत्य तो यह है कि हम और जो कुछ भी हमारे इर्द-गिर्द है, सभी कुछ प्रकृति के ही अलग-अलग अनुभाग-अवयव हैं। इस तरह से सोचने पर कुछ भी प्रकृति से इतर है ही नहीं, हो ही नहीं सकता।
तो फिर परम्परागत कलाकार-कलाजीवी को तकनीकी से इतना विरोध क्यों है? और अगर यह विरोध है भी, तो क्या यह गलत है? नहीं होना चाहिए? ध्यान से देखेंगे तो हम पाएँगे कि कलाकार-कलाजीवी का विरोध मनुष्य की उस प्रवृत्ति से है, जिसके अन्तर्गत वह प्रकृति के साथ विवेकहीन हस्तक्षेप करता है, उसे तोडता-फोडता है। कलाकार-वृत्ति दरअसल एक अहिंसक विवेकपूर्ण तटस्थता की माँग करती है - वह चाहती है कि यथासम्भव प्रकृति-प्रवाह में अहस्तक्षेपीय विवेकी भाव से बहते चला जाए ! लेकिन फिर हममें से अधिकांश लोग प्रकृति के साथ अहस्तक्षेपीय क्यों नहीं रह पाते? प्रकृति के प्रति अहिंसक विवेकपूर्ण तटस्थता क्या इतना मुश्किल भाव है?
प्रकृति के प्रति अहिंसक तटस्थता के मूल में सन्तोष का भाव है और सन्तोष और लोभ के बीच द्वन्द्व के लिए हमारा पूरा जीवन बीतता जाता है। कितनी आवश्यकता सचमुच आवश्यक और कितनी में लोभ की मिलावट हो चुकी है, यह व्यक्तिगत अन्तःअन्वेषण के बाद ही तय किया जा सकता है। इस तरह के अन्तःअन्वेषणों के लिए बाहरी समाज से जितने इशारे प्राप्त होते हैं, उससे कहीं अधिक इशारे भीतर से मिलते हैं। पर भोगवादी वृत्ति जब बाहर हर ओर से इंगित की जा रही हो, तब क्या भीतरी इशारों को महसूसने-समझने के लिए कितने लोगों के पास समय है?
बात यह भी मन में उठती है कि क्या ऐसी कलाभावी-कलाजीवी की तटस्थता से समाज का भौतिक विकास हो सकता है? कहीं इस तरह की निष्क्रियता समाज के लिए प्रतिकूल तो नहीं? पर फिर यह भी सोचना आवश्यक है कि समाज के भौतिक विकास के दायरे को चहुँ ओर फैलाते जाना ही क्या समझदारी है? क्या यह तय नहीं किया जाना चाहिए कि भौतिक विकास के लिए आवश्यक कलाधर्मिता को हर दिशा, हर क्षेत्र में लोभ से संचालित होकर बेलगाम न छोड दिया जाए? यह सच है कि मनुष्य की भौतिक समस्याएँ अनेक हैं, जिनका समाधान *ारूरी है। पर क्या यह सच नहीं कि ढेरों ऐसे भौतिक क्षेत्रों में अनावश्यक विकास किया जा रहा है, जहाँ उसका ईमानदारी से कोई जन-सरोकार है ही नहीं।
आज जब हम एक पैंडेमिक से जूझ रहे हैं, तब कलाजीविता-कलाधर्मिता का यह विभेद एक और ढंग से समझा जा सकता है। आपदा हमें यह भी प्रश्न कर रही है कि मानव का बेहतर भविष्य परस्पर साहचर्य को सुधारने से अधिक सम्भव है अथवा तकनीकी-सम्बन्धी विकास से? भविष्य में हम कलाकारिता की कौन-सी धारा में बहें? विज्ञान-तकनीकी के कलाकारों पर अधिक निर्भर हों अथवा मानव-सम्बन्धों की बात करने वाले कलाकारों पर? ध्यान रहे कि इन्हीं विज्ञान-तकनीकी के कलाकारों को ही हम वैज्ञानिक और इंजीनियर कहते हैं। बिना कलात्मक हुए, सर्जना का भाव मन में जन्म ले नहीं सकता। बिना सर्जक हुए, न कोई वैज्ञानिक खोज हो सकती है और न कोई इंजीनियरिंग-निर्माण। दूसरी ओर मानव-सम्बन्धों को ध्वनियों-रंगों-शब्दों से प्रकट करने वाले कलाकार हमारे पारम्परिक कलाधर्मी हैं। ये वे लोग हैं, जिन्हें हम संगीतकार, चित्रकार, कवि-कथाकार के रूप में जानते-पहचानते हैं। आम तौर पर जब भी कलाजीविता-कलाधर्मिता की बात होती है, तब हमारे मन में इन्हीं की छवि उभरती है, किसी वैज्ञानिक-इंजीनियर-डॉक्टर की नहीं।
ऐसा क्यों है कि हम किसी वैज्ञानिक को कलाकार नहीं मानते? किसलिए हमारी दृष्टि में कोई इंजीनियर कलाधर्मी नहीं है? डॉक्टरों की स्थिति थोडी भिन्न मान ली जाती है - उन्हें वैज्ञानिकों-इंजीनियरों से अधिक किन्तु कवि-कथाकार से कम कलाजीवी समझ लिया जाता है। लेकिन ऐसा विभेद क्यों कि हम विज्ञानक्षेत्री कलाजीवियों को मानविकीक्षेत्री कलाजीवियों से भिन्न और अलग ढंग का मानते रहते हैं?
इस भिन्न मान्यता के भीतर पैठने के लिए हमें संसार को तीन भागों में बाँटकर देखने की आवश्यकता लगती है। जड जगत् जिसे हम प्राणहीन समझते हैं और चेतन जगत् जिसमें सभी जन्तु और पौधे आते हैं क्योंकि उनमें प्राण होते हैं। इसी चेतन जगत् का एक अलग और विशिष्ट प्राणी मनुष्य है। इस तरह से संसार जड-जीव-मनुष्य की त्रयी में वर्गीकृत है और हर सामान्य व्यक्ति इस त्रयी को जानता-पहचानता-मानता है।
कलाधर्मिता-कलाकारिता के मूल में केवल मानव का कल्याण नहीं सोचा जाता, उसमें जीव-मात्र का कल्याण भी सन्निहित रहा करता है। यहाँ तक कि कला की व्याप्ति इतनी अधिक होती है कि वह जड के प्रति भी तिरस्कार-भाव नहीं रख पाती। मानविकी-क्षेत्रों के पारम्परिक कलाधर्मियों-कलाजीवियों में यह अर्हता अवश्यम्भावी मानी जाती है कि वे समस्त मानवीय भावनाओं और आचारों को महसूस कर सकें; किसी नस्ल-धर्म-लिंग-जाति-क्षेत्र के दायरे में अगर उनकी अनुभूति परिसीमित है, तो उनकी कलाकारिता-कलाजीविता पंगु और रुग्ण मानी जाती है। यही नहीं मनुष्य-मात्र के प्रति सहृदयता रखने-भर से काम नहीं चलता; कला की वृहद् व्याप्ति में समस्त जीव-जन्तु-पेड-पौधों के साथ-साथ नदियों-पहाडों-शिलाओं-अग्नि-तारों-हवा-मिट्टी भी संजीव रूप में समा जाते हैं।
इस तरह से आदर्श रूप में संसार का सबसे बडा कलाकार कौन हुआ? वह जो सृष्टि के प्रत्येक भागानुभाग और अंग-प्रत्यंग के साथ पूरी तरह तादात्म्य स्थापित कर चुका है, वह जो सबके दुःख में रो पाता है और सभी के सुख में हँस सकता है। वह जिसके पोर-पोर में आनन्द-अवसाद की नाना अनुभूतियों का जाल बिछा हुआ है; वह जो समस्त चराचर में मानव को देख सकता और देख पाता है। कोई आश्चर्य नहीं कि संसार से लगभग सभी वास्तविक कलाकार इस वृहत्परिभाषा में कहीं-न-कहीं परिसीमित हो ही जाते हैं।
पर हमारा प्रश्न कुछ और था। वह इस बात पर केन्द्रित था कि पारम्परिक कलाकारिता-कलाजीविता की तरह हम वैज्ञानिकों-इंजीनियरों को कलाकारदृष्टि से क्यों नहीं देखते? साइंसदानों और अभियन्ताओं के प्रति हमारे मन में कलाकार-भाव क्यों नहीं जगता? इसका कारण जब हम समझने का प्रयास करते हैं, तब हम जड-जीव-मनुष्य की उसी त्रयी को देखने के दृष्टिकोण को व्यापक होने की बजाय संकीर्ण होता पाते हैं। वैज्ञानिकों की सूक्ष्म दृष्टि जड को तो जड मानती ही है, जीव को भी वह जड पदार्थ के ढेर के रूप में समझती है। यहाँ तक कि मुख्यधारा का विज्ञान मनुष्य में भी किसी ऐसी चेतना को नकारता रहा है, जो पदार्थ से अलग अस्तित्व रखती है। जो जीवित हैं, वे सभी अनेकानेक रसायनों की परस्पर क्रीडा के कारण जीवित जान पड रहे हैं। मनुष्य हो या कुत्ता, आम का पेड हो गुलाब की झाडी - सभी के मूल में रसायनों का परस्पर सम्फ ही तो है!
इस तरह से हम पाते हैं कि पारम्परिक कलाकार जहाँ मानवीय वृत्तियों को अन्य प्राणियों और जड-जगत् तक फैला कर देखते-बूझते हैं, वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक कलाकार मानवीय वृत्तियों से जड जगत् और अन्य प्राणियों के साथ-साथ मनुष्यों-तक को च्युत कर देते हैं। इस व्यवहार के कारण उनके सृष्टिबोध में एक किस्म की शुष्कता आ जाती है, जिसके कारण समाज उन्हें कलाजीवी-कलाधर्मी नहीं मान पाता। कला के सभी विशेषण समाज की दृष्टि में इतने सम्मान्य हैं कि उन्हें वह सहृदय और समानुभूत जनों को ही दे सकता है; ऐसे लोग जो आनुभूतिक रूप में अत्यधिक व्यापक हों। न कि उन्हें जो हर वस्तु और जीव का अन्वेषण-विश्लेषण करते हुए उन्हें जड-दृष्टि से देखते-बूझते हैं।
जड दृष्टि से हम डरते हैं क्योंकि उसमें हमें क्रूरता की झलक मिलती है। संसार को समझने वाला व्यक्ति यदि अतिक्रूर है, तो ऐसी समझ का भला क्या लाभ? बोध अगर हमें कोमल नहीं बनाता, तो ऐसा बोध निष्प्रयोज्य है। जानने का महत्त्व इसीलिए है कि जानने से हम बेहतर इंसान बन सकते हैं। किन्तु अगर जिज्ञासा की उंगली पकड कर हम क्रूर पथ पर चलते हुए विमानवीय हुए जाते हैं, तो ऐसी जिज्ञासा ध्वंसिका और विनाशिका ही सिद्ध हुई! यही कारण है कि हर वह विचार जो हमें चेतना की संकीर्णता की ओर खींचता है, असहज और भयावह लगता है।
मनुष्य को विज्ञान और मानविकी के दृष्टिकोण से देखिए - आपको दो अलग-अलग परिभाषाएँ मिलेंगी। विज्ञान का मनुष्य जीवन के अनेक प्रजातीय पडाव पार करता हुआ करोडों वर्षों में यहाँ तक पहुँचा है और आगे भी वह बदलता जाएगा। वह आज है, कल हो सकता है न रहे! प्रकृति के लिए मनुष्य कोई विशेष सन्तान नहीं! लेकिन मानविकी मानव को दुलराती है, उसे थपकियाँ देकर पैम्पर करती है। वह कहती है कि तुम विशिष्ट हो, तुम-सा कोई कहीं नहीं है। हर ओर इस असीमित ब्रह्माण्ड की ओर देखो तो सही! कहीं तुमसे बेहतर जीवन का कोई प्रारूप है भला न ! बडे भाग मानुष तन पावा!
विज्ञान के सामान्य दृष्टिकोण और मानविकी के विशिष्ट दृष्टिकोण, दोनों में कलाकारिता-कलाधर्मिता के गुण उपस्थित हैं। लेकिन दोनों दृष्टिकोणों के अपने-अपने हानि-लाभ भी हैं। स्वयं को सामान्य समझने से जहाँ हम मानव-निर्मित विषम सांस्कृतिक मान्यताओं और रूढियों के मोह से निकल पाते हैं, वहीं अनेक बार यह सामान्यता ही हमें मूल्यहीन बनने के लिए उकसाती है। इन्द्रियों का दासत्व जानवर किया करते हैं, वे नैतिक-अनैतिक के फेर में बहुधा नहीं पडते। जब हम पशुओं-से सामान्य हैं, तब हम पशुवत् आचरण क्यों न करें! समाज में फैली अपराधवृत्ति फिर कहाँ से गलत सिद्ध हुई? लेकिन विशिष्टता हमसे अपने कर्तव्यबोध का भी भान कराती है। वह कहती है कि हम पशु होकर भी हम अन्य पशुओं में सर्वाधिक उन्नत हैं, इसलिए हमें यथोचित आचरण करना चाहिए। किन्तु फिर इसी विशिष्टता के कारण सांस्कृतिक बहुलता और विषमता का जन्म होता है, जिसके कारण फिर मतभेद-संघर्ष-शोषण के बीज फूट पडते हैं।
महामारी का यह दौर मानव-से-मानव के सीधे सम्फ को घटाने और मशीन की उपयोगिता (और मध्यस्थता) बढाने का काम कर रहा है। विषाणु-प्रसार को रोकने के लिए स्पर्श की बलि देनी पड रही है और बढती अस्पृश्यता के बीच मशीनी कार्यकलाप का स्थापन हो रहा है। आभासी सम्पर्कों में वृद्धि दरअसल मशीन पर मानव की निर्भरता की प्रतीक है - जितना हम आभासी संसार में रमते जाएँगे, उतना हम अपने आसपास के वास्तविक मानवों के प्रति अस्पृश्य-अस्पर्शी होते जाएँगे। संक्रमण मनुष्य के मनुष्य सम्फ में आने से ही तो फैलते हैं, तो क्या यह उचित नहीं रहेगा कि मनुष्यों का परस्पर सम्फ ही यथासम्भव न्यूनतम कर दिया जाए?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का मानव-जीवन में बढता उपयोग इसी क्रम में ध्यान देने योग्य है। कृत्रिमता को हम कृत्रिमता इसीलिए तो कहते हैं क्योंकि उसमें प्राकृतिक व्यक्तिनिष्ठता का अभाव होता है। मशीनी श्रम से उत्पादित यह कृत्रिमता, प्राकृतिक विविधता से सर्वथा अयुक्त रहा करती है। लेकिन जब मनुष्य इतनी उन्नत मशीनें बनाने लगे, जो व्यक्तिनिष्ठता से युक्त हों, तब क्या इन्हें मानव-निर्मित अथवा कृत्रिम कहकर प्राकृतिक से कमतर आँकना सही होगा? जटिल से जटिलतर होती जाती ये मशीनें मनुष्य के प्रति सजीव व्यवहार प्रदर्शित करने योग्य होंगी। इस तरह से कि इनके माध्यम से हम अपने अधिकाधिक दैनन्दिन कार्य सम्पन्न करने लगेंगे। तब जीवन में किसलिए और क्यों हमें साथी-मानवों की आवश्यकता रह जाएगी?
मानव-जीवन में कृत्रिम बुद्धि के बढते हस्तक्षेप से हम फिर एक प्रश्न की ओर पहुँचते हैं कि मनुष्य को मनुष्य की आवश्यकता सर्वाधिक क्यों है। क्या इसलिए कि वह अपनी स्वार्थसिद्धि कर सके? उनके सहयोग से जीवन के अपने लक्ष्य साध सके? अपनी *ारूरतें पा सके? अथवा इसलिए कि वह अपना आत्मावलोकन कर सके? स्वयं में ईमानदारी से झाँक सके? स्वयं के भीतर देखकर स्वयं के नैतिक उत्थान को सुनिश्चित कर सके? मनुष्य को मनुष्य का साथ भौतिक *ारूरतों के लिए जितना अपेक्षित है, उससे कहीं अधिक वह इस साथ को जीवन के औचित्य को बूझने के लिए चाहता है। वह समाज में जीते समय समाज से कुछ लेता है, तो उसे कुछ देता भी है। इसलिए आदान-प्रदान के कारण ही उसका जीवन औचित्यपूर्ण सिद्ध होता है। फिर वह आसपास के तमाम लोगों को आधियों-व्याधियों से जूझते, संघर्ष करते, पैदा होते और फिर मर जाते देखा करता है। इन सभी असहज और दुःखदायी गतिविधियों को देखने पर भी उसे अपने भीतर पुनः झाँकना पडता है। इसी अन्तःअवलोकन के कारण वह अपने अस्तित्ववादी संकट से निकलने के प्रयास करता है और अनेक बार निकल भी पाता है।
जीवन जितना भौतिकता को केन्द्र में रखकर जिया जाएगा, उतना वह परफेक्शन की माँग करेगा। भौतिक इच्छाएँ अधूरेपन और अपूर्णता जैसी भाववाचक संज्ञाओं से घृणा करती हैं। ऐसे में त्रुटिहीन पूर्णता अगर मनुष्य न दे सके, तो मशीन ही सही! लेकिन त्रुटियों के साथ जीवन जीने में जो समझौते का भाव है, उसी में मनुष्य के गहनतम-जटिलतम प्रश्नों के समाधान मिल सकते हैं। अधूरेपन का अपना अद्भुत सौन्दर्य है, अपूर्णता-सा लावण्य भला कभी पूर्णता पा सकती है!
अन्य दैनन्दिन कार्यों की तरह पारम्परिक कलाकारिता के लिए भी कृत्रिम बुद्धि का प्रयोग किया जाने लगा है। कृत्रिम बुद्धि अनेकानेक कहानियाँ लिख रही है, अद्भुत चित्रकारी कर रही है। इन सभी सर्जनाओं को अ-मानवीय कहकर हम इनकी आलोचना कर सकते हैं। लेकिन क्या हम यह आरोप लगा सकते हैं कि उन्नत मशीन-निर्मित ये कलाकारिता किसी मानव-सृजित-कलाकारिता से कमतर है? क्या केवल मशीन के द्वारा बनाये या लिखे जाने से कोई रचना दोयम द*ोर् की मानी जा सकती है? या फिर हमें कृत्रिम बुद्धि निर्माताओं को भी कलाकारों की श्रेणी में सम्मिलित करना ही चाहिए जिनकी रचनाएँ इतनी श्रेयस्कर कलाधर्मिता-कलाजीविता का निर्वहन कर सकने में सक्षम हैं? कला-सर्जिका मशीनों का निर्माण करना क्या स्वयं में श्रेष्ठ कला नहीं है? अवश्य है ! बल्कि यह तो कला का सर्वश्रेष्ठ प्रकार कहा जा सकता है !
कलाधर्मिता-कलाकारिता-कलाजीविता को हमें पारम्परिक पहचानों से साथ मुक्त भी करने की आवश्यकता है। नरेश सक्सेना के शब्दों में जिस तरह चिडिया की उडान में शामिल होते हैं पेड को अगर और व्याप्ति दी जाए, तो चिडिया-रूपी कला की उडान को पेड, उस पर निर्मित नीड के साथ-साथ आसमान, बादल और हवा से भी अंशदान मिलना चाहिए। चिडिया की उडान में पेड-नीड के योगदान प्राथमिक तो हैं, किन्तु इकलौते नहीं। बल्कि पेड और नीड-मात्र से ही चिडिया की उडान का निर्माण यदि किया गया, तब वह उच्च और निरन्तर दोनों न हो सकेगा। कृ.बु की मानव-जीवन में बढते हस्तक्षेप को न तो कोसने से कुछ होगा और न हताश मन से स्वीकारने से। कृत्रिम बुद्धि के आगमन से कला नष्ट नहीं होगी, वह नये-नये कलेवर में हमारे सामने आएगी। हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं जिसने मानव-मशीन सहभागिता से कलाधर्मिता-कलाजीविता निभाएँगे और सर्जनाएँ जन्म लेंगी। ऐसे में मशीन यदि मानव से बेहतर कविता लिख रही है अथवा श्रेष्ठ चित्र बना रही है, तो मानव-कलाकार को इससे असुरक्षित नहीं महसूस करना चाहिए। हर मशीनी सर्जना के मूल में मानव-कलाकारिता ही तो है, जिसने ऐसी कलाजीवी-कलाधर्मी मशीनों का अस्तित्व सम्भव किया है!
यहीं पर हम कलाधर्मिता-कलाजीविता के अन्तिम औचित्य-बिन्दु पर आ ठहरते हैं। कौशल में किसी भी कला के प्राण नहीं बसते, सहृदयी विवेक में बसते हैं। चूँकि मशीनों का इतिहास शक्तिशाली अविवेकी मनुष्यों के दासत्व का रहा है, इसलिए यह विचार सहज ही व्यथित-विह्वल करता है कि कृत्रिम बुद्धिके बढते हस्तक्षेप से कौशल-वृद्धि चाहे बढती चली जाए, सहृदयी विवेक कदाचित् उसी अनुपात में बढ न सकेगा। मशीन-विकास के पिछले सबक कम-से-कम हमें यही सच परोसते रहे हैं और आगे का कृत्रिम बुद्धि-भविष्य इससे भिन्न हो, ऐसा नहीं जान पडता। जीवन का यन्त्राधारित होना उसे भौतिक तौर पर जितना सरल-सहज-सुगम कर रहा है, उतना वह निर्विवेक-निष्ठुर-निर्भाव होता जा रहा है। इसी विवेक का लोप सदैव हमारी चिन्ता का विषय होना चाहिए, कौशल-प्रतिष्ठा तो हम मशीनों में करते ही जाएँगे। संसार की सबसे मौलिक और सर्वथा नवीन कला-सर्जना भी अगर समाज के लिए हितनिष्ठ नहीं, तो भला उसका क्या औचित्य !
इतालवी महाकवि दान्ते कला को ईश्वर की दौहित्री बताते हैं। ईश्वर प्रकृति का पिता है और कला प्रकृति की पुत्री - इस तरह से ईश्वर की पुत्री की पुत्री होने के कारण कला ईश्वर की दौहित्री हुई। प्रकृति के महत्त्वपूर्ण अंग हम-मनुष्य भी हैं और कलाकारिता-कलाजीविता-कलाधर्मिता के प्रति सम्मोहन में हमारी किसी अज्ञात-अबोध्य ईश्वरीय अनुकम्पा में आसक्ति भी है। हम ईश्रीय या दैवी कृपा से युक्त हैं- यह भाव हममें विशिष्टता-बोध भरता है। हम सर्जना कर सकते हैं , इस भाव से हमें किसी विधाता की प्रियता की अनुभूति मिलती है। सर्जक एक गिफ्ट है, हम-सभी गिफ्टेड होना और दिखना चाहते हैं।
मैंने अनेक समाजसेवी वर्गों में कलाकारिता के प्रति एक अद्भुत सम्मोहन पाया है। ढेरों कार्यशील लोग कलाकार कहलाना चाहते हैं, वे अपने कर्म और कर्तव्य को कला की संज्ञा से भूषित देखना चाहते हैं। लेकिन सभी समाजसेवी वर्गों का कलाकार संज्ञा के प्रति अनुराग नवीनता के प्रति आकर्षण-भर के लिए नहीं होना चाहिए। कला केवल मौलिकता के चिह्नों से पहचाने जाने वाला कर्म नहीं है; उसी अन्तिम पहचान व्यापक समाजोपयोगी कलेवर ही है और रहेगा। कल्याणभाव के बिना किया गया चंचल दृगोन्मेष को कलादृष्टि नहीं कहा जा सकता। कलावास तो उसी थिरे हुए दृगपात में है, जो अपने पीछे-पीछे कर्म-कल्याण को उत्प्रेरण देना कभी नहीं रोकता।
विवेकशून्य कलाधर्मिता-कलाकारिता-कलाजीविता आपदा का निराकरण नहीं करतीं, वे स्वयमेव आपदा कहलाया करती हैं।
(कला क्या है ? उसकी परिभाषा की संकीर्णता और विस्तृति के अर्थ क्या हैं? आपदा से कला-विकास का कैसा सम्बन्ध है? तकनीकी की आहट हमें अकलात्मक और कला-वैरी क्यों जान पडती है? कलात्मकता के लिए कौन-सा अवयव अधिक महत्त्व रखता है - नवीन-मौलिक प्रस्तुतीकरण अथवा विवेकशील समाजोपयोगिता? मशीन-निर्मित कला में क्या इनका समन्वय मिल सकेगा? क्या कला-निर्मात्री मशीनों के निर्माता कलाकारों को उच्चतम कलाकार कहा जा सकता है? यदि नहीं, तो क्यों? अन्त में विवेकशून्य कला के दुष्परिणाम क्या हो सकते हैं?)

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