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कविता का कर्मयोगी त्रिलोचन

विनोद शाही
जो कवि अपनी अभिव्यक्ति के लिए माकूल शब्दों को खोजने में खुद को जितना अधिक असमर्थ पाता है, वह उतना ही बडा होता है। कविता, भाषा की अपर्याप्तता को, सर्वाधिक बेनकाब करने वाली विधा है। हर कवि अपने अपने तरीके से भाषा को अपदस्थ करता है और पीछे मौजूद यथार्थ और उसके सत्य को खुद अपने तौर पर बोलने लायक बनाता है। कवि की मौलिकता एवं अद्वितीयता को इस पैमाने पर जाँचना परखना, उसकी साहित्यिकता के मर्म तक पहुँचने में हमारी मदद करता है। कवि का अनुभव संसार नितांत उसी का अपना अनुभव संसार होता है। वह उसमें कितनी गहराई में उतरा है और कितनी दूर तक देख पाया है, यह बात हमें उसके भाषा संसार की काव्यात्मकता के वैशिष्ट्य को जानने लायक बनाती है। परंतु कविता को, कविता के भीतर से अभिव्यक्त होते जीवन के माध्यम से ही समझना पडता है, न कि कवि के जीवन से, हालांकि दोनों में तत्वतः कोई भेद नहीं होता। परंतु स्वरूपतः इन दोनों में बहुत भिन्नता हो सकती है। इस भिन्नता की खबर कवि की कविता प्रायः ही दिया करती है। कई दफा तो यह इस हद तक भी हो सकती है कि जो कवि के जीवन में नहीं होता, कविता उसकी अभावपूर्ति करती दिखाई देने लगती है। जैसे त्रिलोचन के संदर्भ में उनका मुक्तिबोध की ओर झुकाव है। इन दोनों कवियों को हम, एक दूसरे के काव्य संसार में जो नही है, उसकी अभावपूर्ति करने की तरह भी पढ सकते हैं। इसे समझना इसलिए जरूरी है, क्योंकि ऐसा करते हुए हम त्रिलोचन के महत्त्व को ही नहीं, उसकी सीमाओं को भी समझ पाने लायक हो सकते हैं।
त्रिलोचन भाषा को अपदस्थ करने के लिए, कर्म की भाषा को बोलने लायक बनाते हैं। यह उनके काव्य के व्यक्तित्व की विशिष्टता को समझने का निर्धारक पक्ष है। यह उसी तरह की बात है, जैसे मुक्तिबोध, सामान्य भाषा को अपदस्थ करके, समाज के दमित हो गये सामूहिक अवचेतन को किसी विद्रोही की तरह बोलने लायक बनाते हैं।
त्रिलोचन और मुक्तिबोध के संदर्भ में कहा जा सकता है कि उनका संबंध मनुष्य के सचेतन और अवचेतन संसारों को मुखरित करने वाली दो नयी काव्य रीतियों से हैं। वे सतह पर एक-दूसरे के उलट खडी दिखायी देती हैं, परंतु गहराई में वे परस्पर विरोधी न हो कर, परस्पर पूरक हैं।
मुक्तिबोध की कविता सामूहिक अवचेतन की सकर्मकता की छटपटाहट है, तो त्रिलोचन की कविता सकर्मकता के सामूहिक अवचेतन की उदासी से भरी खोज है।
इन दोनों कवियों की तुलना करने का प्रयोजन इस बात के परोक्ष सूत्रों को खोलने से जुडा है कि वह क्या था जो त्रिलोचन को सागर के मुक्तिबोध सृजन पीठ तक ले गया। वह घटना इन दोनों के कवि कर्म से बाहर की दुनिया का हिस्सा है। तथापि कुछ तो होता है, जो दो कवियों को एक दूसरे की ओर खींचता है। इन दोनों को आपस में जोडने वाली कडी है, सहस्रदल और अरुण कमल, जो इनके काव्य की परम अभिव्यक्ति का पर्याय हो गयी है। तथापि यह भी सच है कि दोनों कवि अपने अपने कमल तक अलग अलग दिशाओ से यात्राएँ करते हुए पहुँचे हैं। इन कवियों की इन दोनों कविताओं के अंश नीचे दिये जा रहे हैं, ताकि इन्हें आमने-सामने रखते हुए हम इनकी परस्पर पूरकता और दिशामूलक भिन्नता को स्पष्टतया देख सकें -
1. त्रिलोचन- सहस्रदल कमल
बाढ में
आँखों के आँसू बहा करेंगे,

किन्तु जल थिराने पर,
कमल भी खिलेंगे
सहस्रदल।
2. मुक्तिबोध -
अंधेरे में
भूमि के भीतर पाताल-तल में
खिले हुए कबसे भेजते हैं संकेत
सुझाव-सन्देश भेजते रहते!!
त्रिलोचन वर्तमान के सचेतन यथार्थ जगत की पीडा से सीधे मुखातिब है। आँख के आँसू बाढ की तरह बह रहे हैं। कमल भविष्य में प्रकट हो सकने वाली उम्मीद की तरह है। मुक्तिबोध इस उम्मीद के मनुष्य की चेतना की भीतरी तहों में दमित हो कर पाताल पहुँच जाने की बेबसी से मुखातिब हैं। वे मनुष्य की चेतना के भीतरी संसार के सफर पर निकलते हैं और वहाँ से आने वाले संकेतों को सुनने का प्रयास करते हैं। इसलिए कमल भविष्य की संभावना नहीं, मनुष्य की अपने भीतर छिपी स्रोतमूलक चेतना की अभिव्यक्ति की पुकार है। उसे वे परम अभिव्यक्ति कहते हैं, जिसके लिए खतरे उठाने पडते हैं। त्रिलोचन उसे कर्मों की भाषा मं अभिव्यक्त करते हैं। कर्म मनुष्य को पीडा के प्रामाणिक अनुभवों से गुजर कर, ज्ञान की सकर्मक समझ तक ले जाते हैं। मुक्तिबोध के लिए वह सकर्मक प्रेममयता की समझ है। वह राग-विराग के अंतःसंघर्ष से उपजती है, इसलिए वह रागवर्ण अरुण कमल हो जाती है। त्रिलोचन उसे कर्मों के विविध बहुल संसार के माध्यम से पाते हैं, इसलिए वह अनेकमुखता के सत्य की तरह प्रकट होती है और मनुष्य की चेतना को सहस्रदल कमल की तरह खिला देती है। अब हम इस प्रक्रिया को उनकी कविताओं की मार्फत आसानी से पकड पाएँगे-
1. मुक्तिबोध, अंधेरे में -
अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे
उठाने ही होंगे।

तब कहीं देखने को मिलेंगी बाँहें
जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता
अरुण कमल एक

अत्यन्त उद्विग्न ज्ञान-तनाव वह
सकर्मक प्रेम की वह अतिशयता

हर एक आत्मा का इतिहास,
विवेक-प्रक्रिया, क्रियागत परिणति !!
खोजता हूँ पठार...पहाड...समुन्दर
जहाँ मिल सके मुझे
मेरी वह खोयी हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म-सम्भवा।
2. त्रिलोचन,
मैं कृतज्ञ हूँ
यदि मेरी बात मेरी भाषा के ओंठों को
पार नहीं कर पाती तो भी क्या बुरा है
कह-कहवाव से भी अलग
कभी-कभी बात होती है
कर्म की भाषा
यही महाकाल था
तुझ को जगा के गया
उत्तर जो देना हो
अब इस पृथिवी को दे
कर्मों की भाषा में
नगई महतो
देखते-सुनते और करते ज्ञान होता है
अपनी जब होती है समझ नयी होती है
ऐसा ही था
यह तुम ने कैसे कहा
सत्यं ह्येकं पन्था- पुनरस्य नैक-
सत्य यदि एक है तो अनेक पथों से कैसे
उस को प्राप्त किया जाता है
तुम्हारा एक मात्र सत्य
विखंडित हो चुका है

आज सत्य यात्री है
अपने क्रम में अनेक स्थानों पर ठहरता है
अब वह कुल-शील का विचार नहीं करता

भाषा की लहरों में जीवन की हलचल है
गति में क्रिया भरी है और क्रिया में बल है
स्पष्ट है कि त्रिलोचन और मुक्तिबोध, दोनों के लिए सत्य, भाषा के पार ले जाने वाली सकर्मकता या क्रियमाणता से मिलता है। भाषा के सामान्य ढाँचे का संबंध यथास्थिति से होता है। काव्यात्मकता का संबंध सृजन की मौलिकता से है। काव्य में मौलिकता का अर्थ यह नहीं होता कि अभिव्यक्ति स्वरूपतः मौलिक हो। इसकी बजाय वह भाषा में उपलब्ध अभिव्यक्ति रूपों के किसी ऐसे पक्ष में सेंध लगाने की कोशिश की तरह सामने आती है, जहाँ से उसके भीतर छिपे हुए यथार्थ के दमित रूपों तक पहुँचा जाता है, उनकी रुँधी आवाज को सुना जाता है, उनकी वेदना के हमसफर होने की हिम्मत जुटायी जाती है और ऐसा करके भाषा की मृत देह में प्राणों का नव संचार किया जाता है।
इस प्रक्रिया को मुक्तिबोध अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का नाम देते हैं और त्रिलोचन इसे कह-कहबा के परे की बात तक जाने की तरह देखते हैं। ऐसा करने के लिए वे जो रास्ता पकडते हैं, वह कर्मशीलता का रास्ता है।
जब हम किसी कवि के रचना संसार में दाखिल होते हैं, तो हमारे पास सिवाय काव्यभाषा के, और कुछ भी ऐसा नहीं होता, जो हमें उसके अर्थों तक ले जा सके। इसलिए इस संदर्भ में हमारे सामने जो सवाल अहम हो जाता है, वह यह है कि काव्यभाषा के तल पर कर्मशील होने का क्या मतलब है? क्या भाषा की कर्मशीलता का कर्म की भाषा से कोई रिश्ता होता है?
जहाँ तक कर्म की भाषा का सवाल है, उस में सभी अपनी अपनी तरह से बोलते हैं, चाहे उन के पास कोई ऐसी भाषा हो या न हो, जिसे कर्मशील भाषा कहा जा सके। कोई श्रमिक, गृहिणी, अध्यापक या दफ्तर का बाबू अपने अपने दायरे में कर्मशील होते हैं। पर उनकी बात काव्य होने लायक तब बनती है, जब कोई कवि भाषा में कर्मशील होने की हद तक जाता है। यहाँ हम जिन दो कवियों को अपने विवेचन का विषय बना रहे हैं, वे दोनों बार-बार अभिव्यक्ति के मामले में ऐसे अर्थों को अधिक मुखर बनाते है, जिन्हें कुछ करते हुए ही पाया जा सकता है।
त्रिलोचन का नगई मेहरा, एक पात्र के रूप में, भाषा की सकर्मक अर्थ मीमांसा के जीवंत रूपक की तरह उपस्थित हुआ है। उसके जीवन दर्शन का सार है कि देखते-सुनते और करते ही ज्ञान होता है। त्रिलोचन दूरदर्शन को दिये अपने एक साक्षात्कार में अपने कवि बनने के एक प्रसंग की बात करते हैं। वे कहते हैं कि अपने लेखन के आरंभिक दौर में उन्होंने सूर्य पर एक कविता लिखी, जिसे सुनकर उनके गाँव के एक किसान ने कहा, इसमें नया क्या है? खेतों में हल चलाते वक्त हम जिस सूरज को देखते हैं, वह हमारा सूरज है। ऐसी कविता लिखो जिसे हम हल चलाते हुए सूरज की ओर देख कर गुनगुना सकें। यह एक ऐसी काव्यभाषा की बात है, जिसके अर्थ देखते-सुनते और करते हुए खुलते हैं। तब उससे वह समझ पैदा होती है, जिसे अपनी समझ कहा जा सकता है। वह समझ, अलग तरह की समझ होती है, इसलिए उसे नगई नयी समझ कहता है।
त्रिलोचन के काव्य में कर्म और ज्ञान के बीच कोई बुनियादी फर्क नहीं है। वे खुद को जनपद का कवि कहते हैं। जनपदों में पूँजी और सत्ता की मनुष्य विरोधी भूमिका का हस्तक्षेप इतना गहन नहीं होता कि कर्म और ज्ञान, एक दूसरे से अलहदा दिखायी देने लगें। इसलिए वहाँ कर्म के ऐसे पारंपरिक रूप अपनी गँवई सहजता के साथ अपनी चाल में चलते दिखाई देते रहते हैं, जिनसे सामान्य जन अपनी अपनी तरह के सच को पाने लायक बना रहता है।
त्रिलोचन की कविता, अपने सहज भाषा विधान के साथ, उस सच की अभिव्यक्ति के विविध रूपों की ओर यात्रा करती रहती है। यह सच, सीमित और अपर्याप्त चेतना के सामाजिक रूपों के उस सच की तरह होता है, जो अपनी अपर्याप्तता पर शर्मिंदा होने की बजाय, उसे ही जीवन और जगत के वास्तविक सच की तरह जीने लायक बनाता रहता है। वह इस अपर्याप्तता का महिमामंडन नहीं करता, अपितु उसे सहज जीवन बोध की तरह ग्रहण करता है। वह इससे इसलिए असंतुष्ट नहीं होता, क्योंकि उसके कर्म और ज्ञान विवेक के बीच ऐसा कोई अंतर्विरोध नहीं होता, जो उसकी जमीन हिला दे और उसे अपने सच को बचाने के लिए संघर्ष के रास्ते पर धकेल दे।
यह जो अंतर्विरोधग्रस्त स्थितियों में अपनी नष्ट कर्मशीलता और दमित हो गयी ज्ञान वस्तु को बचाने के लिए आत्मसंघर्ष के रास्ते पर चलने वाला मार्ग है, वह हमें मुक्तिबोध में दिखायी देता है।
इस तरह हम देख सकते हैं कि सकर्मकता के प्रस्थान बिंदु के साझे होने के बावजूद, यह दोनों कवि अपनी सच की खोज और अभिव्यक्ति की जद्दोजहद में एक-दूसरे से बहुत अलग ही नहीं, विरोधी दिशाओं में जाते भी दिखाई देने लगते हैं।
त्रिलोचन की कविताओं के दो महत्त्वपूर्ण पात्रों की मानसिक बुनावट से जुडी अभिव्यक्तियों को अपने सामने रखेंगे, तो जनपदों के अंतः यथार्थ में उतरना आसान हो जाएगा। यह दो पात्र हैं, चंपा और नगई। चंपा एक बच्ची है, जिसे कवि पढने लिखने को कहता है, पर वह साफ इन्कार कर देती है। वह इसे अच्छी बात नहीं मानती। दलील दी जाती है कि गाँधी बाबा भी पढने को कहते हैं, तो उसे शक होता है कि गाँधी बाबा अच्छे आदमी हैं भी या नहीं। जब कहा जाता है कि उसके बडे होने पर जब उसका बालम नौकरी के लिए कलकत्ता जाएगा, तो वह उसे चिट्ठी कैसे लिखेगी, तो वह कहती है कि वह उसे जाने ही नहीं देगी। अब उसका सहज विवेक प्रतिरोध की भूमिका में आ जाता है और वह कहती है, ऐसे कलकत्ते पर बजर गिरे। इसे हम पूँजीवादी विकास की मानव विरोधी हो रही भूमिका की आलोचना की तरह भी देख सकते हैं, परंतु यह स्थिति चंपा की सामान्य कर्मशीलता और उसके ज्ञान विवेक के बीच कोई फाँक पैदा नहीं करती। वह अपनी सामान्य स्थिति से संतुष्ट है। अपनी अपर्याप्तता तक का उसे कोई बोध नहीं है। इसलिए खुद को बचाने के लिए उसे किसी गहन आत्मसंघर्ष से जूझने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती। हालांकि यह विकास विरोधी यथास्थितिवाद भी नहीं है, क्योंकि हमारा जनपदीय यथार्थ अभी तक मनुष्य को इतनी कर्मशीलता के अवसर तो देता ही है कि वे पारंपरिक ज्ञान विवेक को अपनी खुद की नयी समझ की तरह पुनरुपलब्ध कर सकें।
नगई की कर्मशील चेतना, इस संदर्भ में हमें, इस जनपदीय यथार्थ को और करीब से जानने का मौका देती है। नगई जैसे कर्मशील व्यक्तियों के भीतर सहज रूप में उपजने वाले उनके आत्मविवेक को उस युगबोधक मानसिकता का अंग मान सकते है, जिसका प्रतिनिधित्व गाँधी करते हैं। वे एक अर्थ में उस परंपरा के पोषक दिखाई दे सकते है, जिसे बहुत से लोग अवैज्ञानिक और यथास्थितिवादी मानते हैं। परंतु एक अन्य नजरिये से देखने पर वही गाँधी अपने परंपरागत स्रोतों से पाये उसी सहज आत्म विवेक की मदद से विश्व के सब से बडे साम्राज्यवाद को चुनौती देकर उसे उखाड फेंकने की हद तक कर्मवीर होने का सुबूत देते हैं।
सतही रूप में नगई की गाँधी की तुलना बेमानी साबित होगी, परंतु अगर हम अपने जनपदीय यथार्थ की मनो-सांस्कृतिक संरचनाओं से उपजने वाले पात्रों की प्रकृति को समझना चाहते है, तो गाँधी, नगई और चंपा जैसे असंख्य जन एक ही बगिया में खिलने वाले अनेकानेक कोटियों के फूलों जैसे प्रतीत होंगे। सबकी अपनी अलग संभावनाएँ हैं, सच का अपना-अपना अनुभव लोक है और सभी गहरे में मानव केंद्रित सच होने के कारण अर्थपूर्ण हैं। परंतु हम उन्हें युगगत सत्य नहीं कह सकते। इसलिए वे एक तरह से यथार्थ के जटिल परिदृश्य का मानव केंद्रित सरलीकरण करते हैं। पर उन्हें युगगत यथार्थ के विरोध में खडे सच के विविध रूप नहीं कहा जा सकता। वे यथार्थ की जटिलता का सरलीकरण करने से तब तक यथास्थिति के पोषक बने रहते हैं, जब तक कि यथास्थिति के मानव विरोधी होने की स्थिति खुद उन के अपने उस सत्य विवेक को झूठ साबित नहीं करने लगती।
इस बात को नगई के संदर्भ में अधिक स्पष्टता से अभिव्यक्त होते देखा जा सकता है। नगई के निजी मानवीय विवेक का सच उसे अपने छोटे भाई की सास को अपने घर बिठाने के ऐसे आचरण तक ले जाता है, जिसे परंपरागत सामाजिक नैतिकता और मर्यादा को तोडने वाला कहा जा सकता है। इससे लोकापवाद पैदा होता है और पंचायत उस पर दंड लगा देती है। दंड को वह हाथ जोड कर स्वीकार करता हैऔर पूरे गाँव को भोज खिलाता है। उसके दंड भुगतने पर गाँव उन दोनों को पति-पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेता है।
नगई ने अपने सगे भाई की सास को
घर में बैठाया था
उसी घर में माँ-बेटी
जेठानी-देवरानी थीं
सम्बन्धों की छीछालेदार
घर में ना हो गाँव-भर में होती थी
बाप दादों का कुटका
बछैया छोडकर नगई ने छोड दिया
मँडई डाल ली चिरानीपट्टी में आकर

इज्जत मैं क्या दुँगा
फिर भी दसों नँह जोडे
खडा ही मिलूँगा
सेवक हूँ और सेवा करना मेरा काम है

पंचों ने कहा, दस रुपये की डाँड है, भात देना होगा
यह भी मंजूर है
फिर महरिन जल लायी, सबको दिया पीने को
नगई ने हुक्का पिया और बारी-बारी सबको दिया
पंचों ने हुक्म दिया अब तुम दोनों साथ रहो
पंचायत तो मानो पंचपरमेसर है
नगई यहाँ परंपरागत नैतिकता को तोड रहा है। उसे सामाजिक स्वीकृति दिलाने के लिए परंपरागत व्यवस्था के आगे हाथ बाँध कर खडा हो जाता है। पंचों में ईश्वर चद च का निवास है, यह उसकी लोक प्रचलित आस्था पर आधारित धारणा है। चूंकि उसकी इस आस्था पर कोई आँच नहीं आती, इसलिए उसे विद्रोही होने की जरूरत नहीं पडती। परंतु जटिल युगगत यथार्थ में इस तरह की जनपदीय आस्थाओं का मानवीय आधार वाला ताना बाना बिखर गया है।
मुक्तिबोध की काव्य स्थितियाँ युगगत बिखराव की वजह से, अपनी मानव केंद्रित चेतना की जमीन से उखड गयी है। इसलिए वे व्यवस्था के खिलाफ खडे होने के लिए बाध्य दिखाई देते हैं। प्रतिरोध मूलक विद्रोह के अलावा उनके पास कोई विकल्प बचा दिखाई नहीं देता। इस तरह वे, अपने घटित युगगत यथार्थ के अंतः सामंजस्य के लिए, परम अभिव्यक्ति को खोजने निकल पडते है। वही उन्हें इस नये युग के नये सत्य का बोध करा सकती है।
अब हम देख सकते हैं कि युग का सत्य, जनपदीय सत्य की तरह अनेकता बोधक नहीं होता। जनपद मनुष्य केंद्रित जीवन जीने की मोहलत देते है, इसलिए सब के अपने अपने सच हो सकते है। इस कसौटी के आधार पर त्रिलोचन कह सकते हैं कि जिसे युग का एकमात्र सत्य कहा जाता है, वह विखंडित हो गया है। अगर सच को पाने के पंथ बहुत से हो सकते हैं, तो सत्य भी अनेक होने चाहिये। परंतु मुक्तिबोध ऐसा नहीं कह सकते। उनकी सत् चित् वेदना युग की सामूहिक अनुभूति है। इसलिए उनका अरुण कमल, एकान्वित आलोक की परम अभिव्यक्ति का पर्याय है। त्रिलोचन की तरह सहस्रदल होने के कारण अनेकानेक सत्यों का रूपक नहीं।
मेरी दृष्टि में, अपनी सत्य संबंधी खोज में मुक्तिबोध, त्रिलोचन की तुलना में अधिक गहराई मे गये हैं। त्रिलोचन का महत्त्व इस बात में है कि वे स्वानुभूत सत्य को सप्राण बनाते हैं, जिससे वह जीने लायक हो जाता है और अपनी विविधता व अनेकमुखता के कारण उत्सवधर्मी प्रतीत होता है।
मौजूदा दौर में जनपदीय चेतना संसार ध्वस्त हो रहे हैं और निजता की आजादी को आधार बना कर विविधतामूलक व अनेकमुखी सत्यों के उत्पाद प्रकट होने लगे हैं। वह काव्य संसार, जो त्रिलोचन में जनपदीय आधार के कारण प्राकृतिक मालूम पडता है, वह एक चेतना उत्पाद में बदल दिये जाने के कारण, प्रकृति की आभासी दुनिया को वास्तविक बनाने में लग गया है।
ऐसे में त्रिलोचन की प्राकृतिक काव्य वस्तु बचाने लायक लगती है। परंतु अब यह तभी हो सकेगा, अगर मुक्तिबोध की परम अभिव्यक्ति को जनपदीय आधार प्रदान कर जीने लायक बनाया जा सके और उसे अपनी आंतरिक संभावनाओं को अपनी विविधताओं के साथ प्रकट होने लायक बनाया जा सके। इस लिहाज से त्रिलोचन और मुक्तिबोध को एक-दूसरे का पूरक कहा जा सकता है।
त्रिलोचन के काव्य का सर्वाधिक सशक्त पक्ष यह है कि वे अपने अनेकताधर्मी सत्य की अभिव्यक्ति के लिए भाषा को सप्राण और जीवंत बनाते हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि उनकी निगाह में भाषा काव्य की त्वचा की तरह है। जैसे आप त्वचा को देह से अलग नहीं कर सकते, उसी तरह भाषा उनके काव्य की अंतर्वस्तु से अभिन्न है। त्वचा का संबंध स्पर्श से है। त्रिलोचन का काव्य उसी प्रकार अपनी भाषा से पाठक को छूने का प्रयास करता है। किसी का छूना आत्मीयता का लक्षण होता है। इसलिए त्रिलोचन के काव्य से हमारा रिश्ता सहज स्थापित होने लगता है। परंतु उसका अर्थ हमारी कर्मशीलता से खुलता है। वह आस्वाद का नहीं, जीवन को कविता की तरह जीने का एक आधार प्रदान करता है। इस प्रक्रिया को हम नगई के रामायण को सुनने समझने के निम्न प्रसंग की व्यंजना की तरह देख सकते हैं -
फिर नगई ने पूछा
रमायन बाँच लेते हो
हाँ, अटक अटककर
सुन कर हँसा नगई खुलकर बोला
बाँचना अटक अटक कर
और इसे बूझना बूझने की बात है

जनक सुता के आगे ठाढ भएउ कर जोरि
पढकर मैं रुका प्रति दोहे पर जैसे
वैसे ही उसने इस दोहे पर
भक्ति भाव से कहा
सियाबर रामचन्द्र की जय
धारणा बेकार में बोझ ढोना ही नहीं है
आदमी बात से व्यवहार से
पहचाना जाता है
समझ ही
आदमी को आदमी से जोडती है।
यहाँ काव्य को जीने का मतलब है, काव्य में अटक अटक कर उस समझ तक पहुँचना, जो आदमी को आदमी से जोडती है। परंतु यह समझ पैदा कैसे होती है? इसके लिए भाषा की त्वचा के भीतर दौडते प्राणों की गतिशील ध्वनियों को सुनना पडता है। पर वह तभी मुमकिन है , जब शब्द खुद बोलने की बजाय, उस वस्तु को बोलने देते हैं, जिनके लिए वे बने हैं। और जब वे वस्तुएँ बोलती हैं, तो शब्द बेकार हो जाते हैं-
हवा डोली
घास बोली
आज मैंने
गाँठ खोली
फूल, तुम खिल-
कर झरोगे
शब्दों से कभी-कभी काम नहीं चलता
इसे हम काव्यभाषा की प्राकृतिक अंतर्भूमि कह सकते हैं। त्रिलोचन जनपदीय परिवेश में, साधनहीन, वंचित और दुखी लोगों को भी, अपनी इस अंतः प्रकृति के साथ संबंध बना कर, उसे जीते हुए देखते हैं। अपनी अभावग्रस्त स्थितियों के कारण वे उदासीन मनःस्थिति का शिकार तो होते हैं, पर कभी अलगाव से ग्रस्त नहीं होते।
उदासीनता हमारे जनपदों की सहज वैराग्य भूमि है, परंतु वह आधुनिक उत्तर आधुनिक मनुष्यों की तरह उन्हें अलगाव या अजनबीयत में जाने से बचाती रहती है। अलगाव का संबंध पूँजीवाद की यांत्रिक और उच्च तकनीकी वाली उत्पादन पद्धतियों से है, जो श्रम को मुनाफे के सिद्धांत में बदलती हैं और इस तरह उसे सृजन और उसके आनंद से जुदा कर देती हैं। जनपदों में श्रम और उत्पादन के ऐसे हालात हैं, जो उन्हें अभावग्रस्त तो बनाते हैं, पर उन्हें मुनाफावादी बना कर एक दूसरे से अलगाव में नहीं ले जाते। अभावों के बावजूद वहाँ एक अलग तरह की उदासीन भाव वाली मानवीयता होती है, जो आदमी को आदमी से जोडे रखती है। त्रिलोचन इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं-
मैं उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा है
नंगा है अनजान है कला नहीं जानता
वह उदासीन बिल्कुल
अपने से अपने समाज से है
दुनिया को अपने से अलग नहीं मानता
त्रिलोचन दुनिया से अपनी तरह जुडने को, नव आत्भबोध को उपलब्ध करने का मार्ग मानते हैं। अपनी तरह से दुनिया से जुडे, उस उदासीन मानवीय भाव के साथ जीना, मनुष्य को अकेला तो करता है, अलहदा नहीं करता। अकेले अकेले मनुष्य जैसे अन्यों की तरह दुनिया के जीवन प्रवाह में बहते चले जाते हैं। जैसे ही वे खुद को इस प्रवाह के हवाले करते हैं, उन्हें लगता है, वह प्रवाह उनका आश्रय हो गया है-
प्रवाह जैसे सरि के स्वरूप में
अनेक जीवाश्रय हो गया
यहाँ अनेकता ही नव आत्मबोध है
सबके द्वारा अपने अपने एकांतिक संघर्ष से जिन सत्यों को पाया जाता है, उनका सह-अस्तित्व वास्तविक आत्मबोध है। यहाँ हम देख सकते हैं कि त्रिलोचन विविध सत्यों की अनेकता की तो बात करते हैं, परंतु उनका यह आत्मबोध अनेकता मूलक नहीं होता। आत्मबोध में सभी अनेकताएँ समाहित हो जाती हैं।
तब सवाल उठता है कि इस आत्मबोध को, जो सत्यों की अनेकता के सह अस्तित्व के बोध का पर्याय है, किस तरह का है ये? यहाँ उनकी कही एक बात उद्धृत करने लायक है। वे कहते हैं, अनेकता का संबंध हमारे आत्मबल से है। उस बल से युक्त आत्मा ही सर्वात्मा है। आत्मा क्षण को खिडकी बना कर आकाश में छलाँग लगाने से उपलब्ध होती है और सर्वात्मा, क्षण की बजाय, सीधे समय के प्रवाह का हिस्सा हो जाने की अंतश्चेतना है। दोनों के बीच अनुक्रम मूलक रिश्ता है। पहले आत्मा का बोध होता है, फिर वह सर्वात्मा के बोध में ले जाता है। यहाँ यह बात विचारणीय हो जाती है कि जिसे त्रिलोचन सर्वात्मा कहते हैं, वह कोई अमूर्त वस्तु न होकर, वास्तविक इतिहास बोध है और वह उस इतिहास से भिन्न है, जिसे अनेकतावादी नुक्तेनिगाह से अपना अपना इतिहास कहा जाता है-
इतिहास ऐसा ही था
कैसा
नए-नए इतिहास रचे जाया करते हैं
बल दे कर कहते हैं भाषा में अपनी अपनी सभी लोग
इतिहास ऐसा ही था
लोग जब बल देकर कहते हैं कि इतिहास ऐसा ही था, तो वे अपने नुक्तेनिगाह से नये इतिहास रच रहे होते हैं। अस्मिताओं के उभारकाल में अब हम इसे और स्पष्ट रूप में देख पा रहे हैं। परंतु वास्तविक इतिहास जनेतिहास होता है, जो सबका साझा इतिहास होता है। उसे हर व्यक्ति अपने जीवन में अपने नुक्तेनिगाह से पुनः उपलब्ध कर सकता है, बशर्ते बात इतिहास पर काबिज होने की न हो। अनेकतावादी लोग, अपने नुक्तेनिगाह से इतिहास इसलिए रचते हैं, ताकि वह नया हो सके। पर वे यह नहीं कहते कि इतिहास ऐसा ही था। इन दोनों बातों में फर्क किये बिना, त्रिलोचन की आत्मा और सर्वात्म को रचने वाले इतिहास बोध का अर्थ समझ नहीं आ सकता। त्रिलोचन इस फर्क को स्पष्ट करने के लिए खुद को उस इतिहास से प्रतिबद्ध करते हैं, जिसमें बस तुम्हारी बात है, और वह भी ऐसी, जो पीढियाँ लाँघ कर हम तक पहुँचती है। जहाँ प्रेम का ऐसा आत्मीय अतिरेक है, वहाँ वह इतिहास अर्थहीन हो जाता है, जिस पर लोग काबिज होना चाहते हैं।
आज तो तुम्हारी बातें हैं बस
बातें जो पीढियों की कालवधि लाँघ कर
मेरे पास आई हैं
यहाँ आकर बात विमर्श से दर्शन की ओर मुड जाती है । इतिहास संबंधी विवेचन विमर्श की वस्तु है, जबकि आत्मा और सर्वात्मा की बात दार्शनिक है। हर बडा कवि अपनी गहराई में एक दार्शनिक को मौजूद पाता है, भले ही उसके काव्य में उसके उस दर्शन की विधिवत सैद्धांतिक व्याख्या अभिव्यक्त न होती हो। पर उसे फिर भी खोजा जा सकता है। आलोचना का काम तब तक अधूरा रहता है, जब तक कि वह वहाँ उस गहराई में नहीं उतरती, जहा पूर्व उपलब्ध दर्शन परंपराएँ, किसी कवि की मार्फत अपने रचनात्मक नव विकास को जीने लायक बनाने के लिए कुलबुलाया करती हैं।
इस संदर्भ में यह सवाल अर्थपूर्ण हो जाता हो कि त्रिलोचन का सर्वात्मवाद किस प्रकार का है? हालांकि उनके सर्वात्मवाद का जनपदीय स्वरूप भक्तिमूलक है, परंतु ज्ञानमीमांसा के धरातल पर वह बौद्धों के उस सर्वात्मवाद के निकट मालूम पडता है, जिसकी आधारभूमि प्रतीत्यसमुत्पाद में है। उनकी कुछ पंक्तियां देखिये-
जीवन चाहे क्षण की खिडकी पर आ जाये
पर वह क्षण के घेरे में घिरा नहीं
जैसे खिडकी के घेरे में आया आकाश
यहाँ हम देख सकते हैं कि त्रिलोचन क्षण को खिडकी बना कर समय के प्रवाह में उतरने की तैयारी में हैं। वे खिडकी से संतुष्ट नहीं। उन्हें चाहिये वहाँ मौजूद पूरा आकाश। बौद्ध दर्शन में इसे समग्रता मूलक दृष्टि कहा गया है। यह सामान्य दृष्टि से भिन्न होती है, जो किसी वस्तु पर केंद्रित रहती है। जब हम कुछ देखते हुए किसी खास वस्तु को नहीं देख रहे होते, तो हम समग्रता का आभास कराने वाली दृष्टि से देख रहे होते हैं। इसे अंधेरे में अचानक बिजली के कौंध जाने से दिखाई देने वाले पूरे परिदृश्य की अनुभूति की तरह व्याख्यायित किया जाता है। त्रिलोचन अपनी बात कहने के लिए इस सैद्धांतिक गहराई में नहीं जाते। तथापि उनका काव्य इस सर्वात्मवादी आकाश दृष्टि से यथार्थ को देखने समझने की ओर हमें ले जाता है।
सर्वात्मवादी बौद्ध दर्शन और जनपदीय भक्तिवादी आस्था में बहुत भिन्नता है, तथापि त्रिलोचन इन दोनों के बीच किसी तरह के विरोध को नहीं देखते।
वे विचार रह गये, नहीं हैं जिनको ढोता
चला जा रहा है वह अपने आँसू बोता
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण
पढ कर, जपता है नारायण नारायण
ऐसा प्रतीत होता है, जैसे भक्ति अभावों से उपजने वाली पीडा को सहने के संदर्भ में, अभाव की मनो-सांस्कृतिक पूर्ति करने वाला उपक्रम हो। लेकिन जब बात बर्दाश्त बाहर होती है, तो यही भक्ति संघर्ष की प्रेरणा का रूप भी ले लेती है।
लडो बंधु हे, जैसे रघु ने इंद्र से लडा
क्रूर देव सम्मुख मानव दृप्त खडा था
इसका अर्थ यह है कि त्रिलोचन अपने काव्य में भक्ति के जिस जनपदीय रूप को अभिव्यक्ति देते हैं, वह स्थितियों से पाये विवेक के आधार पर अपना अर्थ ग्रहण करती है। इसलिए उसे रूढ विचारों की शरण में ले जाने वाली अंध श्रद्धा नहीं कहा जा सकता। वह जीवन स्थितियों के आधार पर संस्कृति के रचनात्मक इस्तेमाल की हेतु अधिक प्रतीत होती है। यही वजह कि जब कोई व्यक्ति उदासीन होकर अपनी अस्तित्वमूलक गहराई में उतरता है, तो वह भक्ति को सहज भाव से पीछे छोडता हुआ सर्वात्मवाद तक पहुँच जाता है।
यह देख कर आश्चर्य होता है कि भारत से बौद्धों के वर्चस्व को भले ही कालांतर में रुख्सत कर दिया गया हो, पर अपनी तात्विक चेतना की तरह उसे भक्ति ने अपने कलेवर में आत्मसात करके, जैसे अपनी गहराइयों में छिपा कर रख लिया है। इसे देख कर यह बात समझी जा सकती है कि आदि शंकराचार्य किस अर्थ में प्रच्छन्न बौद्ध कहे जाते हैं और कैसे वे अपने अद्वैतवाद को भक्तिवादी पंचायत पूजा तक ले जाते हैं। हमारे दर्शनों ने सैद्धांतिक रूप में भले ही रचनात्मक अंतर्विकास करना का काम छोड दिया हो, परंतु यह बात यकीनन आश्वस्तिदायक है कि उस कमी को हमारा काव्य सहज रूप में अनजाने ही कुछ हद तक पूरा करता दिखाई देता है। निरासक्त होकर जगत की क्षणिकता के यथार्थ का त्रिलोचन में जिस सहज भाव से प्रतीत्य समुत्पाद होता है, वह देखने लायक है-
मैंने कब कहा था कविता की साँस मेरी साँस है
जानता हूँ मेरी साँस टूटेगी
और यह दुनिया जिसे बात करना चाहता हूँ
एक दिन छूटेगी

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