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आयोजन का मर्म

ब्रजरतन जोशी
भारतीय काव्य परम्परा में गद्य को कवियों का निकष कहा है। यह सूत्र वाक्य हमें इस पर चिन्तन करने को अग्रसर करता है कि कविता और गद्य का परस्पर रिश्ता क्या है? क्या हर कवि के लिए यह जरूरी है कि वह गद्य के निकष पर स्वयं को कसे? क्या गद्यकार के लिए कवि होना आवश्यक है? आज का परिवेश, अनुभव की अभिव्यक्ति के किस रूप की माँग करता है? क्या कविता को बिना गद्य के समझा और समझाया जा सकता है? फ्राँसीसी चिन्तक पॉल वैलरी ने गद्य और पद्य का अन्तर करते हुए इसे चलने और नाचने उदाहरण से समझाया है। चलना एक गतिमान प्रक्रिया है और नाचना एक निश्चित स्पेश में ही चलना है। यही सूक्ष्म अन्तर गद्य-पद्य में भी है। यहाँ चलना गद्य और नाचना कविता है। हम यह भी देखते हैं कि जीवन के अधिकांश कर्म गद्य के रूप में ही चल रहे हैं। कवि भी इसी जीवन का हिस्सा है। वह अपनी संवेदना, अनुभूतियाँ और उनका संचरण इसी परिवेश में प्राप्त करता है। कई बार वह अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति से सन्तुष्ट नहीं होता, बहुधा वह अपनी काव्य कला की विविध व्याख्याओं से भी सहमत नहीं होता, तब वह अपने मत की पुष्टि के लिए दृष्टि के विस्तार, विभिन्न पहलुओं और आधारों को भली-भाँति सम्प्रेषित करने के लिए गद्य की ओर उन्मुख होता है। क्योंकि हमारी परम्परा में काव्य एक ऐसा तत्त्व है कि जिसकी परिधि बहुत विशाल है। अतः वहाँ सब कुछ काव्य के ही अन्तर्गत है, उससे बाहर नहीं। गद्य और पद्य भी। वैसे भी गद्य और पद्य भाषा के रूप हैं काव्य के नहीं। हमने अपनी समझ की सुविधा के लिए ज्ञान को जिस तरह विभिन्न अनुशासनों में बाँटकर परिभाषित करना एवं समझना आरम्भ किया, ठीक वैसे ही काव्य के क्षेत्र में भी ऐसे प्रयासों से भाषा के गद्य और पद्य रूप व उनकी विधाओं का निरूपण हुआ। उदाहरण के लिए जब हिन्दी परिसर में ही छायावाद को भली-भाँति नहीं समझा गया, तब छायावादी कवियों ने इसी गद्य के माध्यम से अपना पक्ष हमारे सामने रखा। यहीं से ही हमें वह प्रवेश द्वार मिलता है कि जहाँ से हम जान सकते हैं कि कैसे एक रचनाकार के संसार को समझा व देखा जाए। कविवर पंत ने पल्लव की भूमिका, अज्ञेय ने तार सप्तक की भूमिका आदि से यही काम किया। उन्हें अपना पक्ष रखने के लिए गद्य का माध्यम आवश्यक रूप से चुनना पडा। इन्हीं कारणों से प्रायः समीक्षक-आलोचक यह कहते देखे जा सकते हैं कि एक अच्छी कविता अच्छा गद्य भी होती है और अच्छा गद्य अच्छी कविता। गद्य के पक्ष में एक और ठोस तर्क यह है कि गद्य को गद्य से ही समझा जा सकता है जबकि कविता को समझाने, उसके मर्म का उद्घाटन करने और उसके अर्थ का सरलीकरण करने के लिए गद्य की आवश्यकता रहती है। हिन्दी में कवियों द्वारा लिखा गया गद्य और आलोचना इसकी साक्षी है कि कवियों द्वारा लिखे गद्य का आस्वाद केवल गद्यकारों द्वारा लिखे गद्य की तुलना में कुछ अधिक रसमय है। हाँ, यह हो सकता है कि कोई गद्यकार जिसका गद्य हमें अत्यन्त रसमय अनुभूति देता है, वह कवि पहले हो और गद्यकार बाद में। पर यह तय है कि उस गद्य की ताजगी, अर्थ-ध्वनियाँ, शब्दों का नवोन्मेष, तल्लीनता, खुलापन और प्रवाहमयता का ऐसा सुन्दर तालमेल अत्यन्त दुर्लभ होता है। हर कलाकार अपने आत्म के विस्तार के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहता है। उसकी इस यात्रा में मुहावरे, धारणाएँ, सौन्दर्यबोध उसके सहयात्री होते हैं। कई-कई बार तो कलाकार स्वयं को तोडने की अपनी प्रक्रिया में स्व के प्रति भी प्रतिक्रिया करता है। कविता और गद्य के रिश्ते को इसी रूप में देखा-समझा जाना चाहिए, न कि किसी अलगाव या विभाजनकारी प्रक्रिया के चरण के रूप में। किसी भी कवि के लिए गद्य पराक्रम का विस्तार भर नहीं, वरन् भाषा की अनन्त संभावनाओं के साथ एकाकार होने की सृजनात्मक चेष्टा भी है। कवि गद्य के माध्यम से सबके साथ, सबके समान होना चाहता है। यहाँ इस तथ्य पर भी गौर करना जरूरी होता है कि जीवन एक निरन्तर गतिमान प्रक्रिया है। साहित्य का केन्द्र जीवन है। इसलिए लेखक समय, देश-काल व परिस्थिति के अनुरूप अपनी अभिव्यक्ति की नई राहों का अन्वेषण करता रहता है। हर समय की अपनी माँग रहती है, हर संस्कृति का अपना एक सम्प्रेषण माध्यम होता है। इन्हीं के कारण एक रचनाकार अपने सृजनात्मक व्यवहार से अपनी संवेदनाओं को भिन्न-भिन्न विधाओं के जरीये भाषा के गद्य या पद्य रूप में व्यापक समाज के सामने रखता है। जीवन की जटिलताएँ, बहुलताएँ, अभिरूचियाँ व आवश्यकताएँ भी निरन्तर बदलती रही हैं। उसी के अनुरूप काल विशेष में रचनाकार भाषा के द्वारा विधा विशेष के माध्यम से अपनी अनुभूति के आकार को मूर्त रूप देने की कोशिश करता रहा है। सारतः जोसेफ ब्रॉडस्की ने अपने प्रसिद्ध निबन्ध कवि और गद्य में लिखा है कि एक गद्य लेखक कविता से क्या सीखता है? किसी एक दुनिया के विशिष्ट गुरुत्वाकर्षण के सन्दर्भ पर निर्भर रहने का तथ्य, एकाग्र चिन्तन, प्रत्यक्ष प्रमाणित को छोड सकने का प्रयत्न और वे खतरे जो मस्तिष्क की उत्थित अवस्था में छिपे रहते हैं। और एक कवि गद्य से क्या सीखता है? ज्यादा कुछ नहीं, ब्यौरों पर ध्यान देना, सामान्य बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल और कार्यालयीन कर्म और विरल उदाहरणों में संयोजन की थोडी बहुत जानकारी।
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आयोजन और मानव जीवन का साथ सदैव से ही रहा है। आयोजन जीवन के आकार का व्याकरण तय करते हैं। आयोजनों का महत्त्व इस अर्थ में भी है कि वे संस्कृति के चिर सहयात्री हैं। आदिकाल से लेकर अब तक और जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन का कोई भी कोना ऐसा न होगा, जहाँ जीवन ने अपने आकार का व्याकरण तय करने में आयोजन का सहारा नहीं लिया हो। हाँ, यह अवश्य ही हो सकता है कि वे लोकाधर्मी रहे हों अथवा शास्त्रीय रूप में। लेकिन इनकी उपस्थिति ने जीवन के स्थापत्य को समृद्ध किया है। आयोजनधर्मिता का गुण जहाँ एक ओर किसी भी मानव समूह को गतिशील, सक्रिय और संजीदा बनाता है, वहीं दूसरी ओर इस गुण से मानव के नैसर्गिक विकास को भी गति मिलती है। आयोजन अपनी प्रक्रिया में उदारता, नेतृत्व, विनयशीलता और सजगता का विकास करते हैं। इस अर्थ में आयोजन किसी स्वस्थ समाज की अक्षय ऊर्जा के स्रोत भी है। क्योंकि आयोजनों के अभाव में जहाँ समाज की सामूहिक ऊर्जा का रूपान्तरण नहीं हो पाता, वहीं व्यक्ति को व्यक्तित्व विकास के अवसर भी कम उपलब्ध होते हैं।
परिणामस्वरूप व्यक्ति मनुष्य मानव में विकसित नहीं हो पाता। आयोजन इस रूप में भी महत्त्वपूर्ण है कि वे देश, काल, वातावरण, विषम परिस्थितियों एवं प्राकृतिक आपदाओं के बरअक्स मनुष्य में व्याप्त अनंत ऊर्जा के अक्षय स्रोत से उसे जोडते भी हैं। जो आत्मविश्वास के रूप में उसके व्यक्तित्व में सामने आता है। यही आत्मविश्वास उसे समाज में व्याप्त नाना प्रकार की विसंगतियों, विद्रूपताओं और विकारों के विरूद्ध प्रतिरोध का स्वर मजबूत करने की ताकत देता है। आयोजनों के जरीये समाज में संस्कार हस्तांतरण की प्रक्रिया भी निरन्तर चलती रहती है। अपने इस रूप में आयोजन संस्कारों की पाठशाला भी साबित होते हैं।
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक लय में लीन है। जीवन के विविध आयाम अपनी बाह्य और आन्तरिक ऊर्जा के माध्यम से उस लय में अपनी लय मिलाना चाहते हैं। जीवन का विविधवर्णी संसार अपनी समग्रता में उस लय का हिस्सा होने की अविराम कोशिश करता है। आयोजन समाज की लय, गति को और गतिमान बनाते हैं ताकि जीवन की लय उस महालय के साथ एकाकार हो सके। इस अवस्था में कोई आयोजन केवल आयोजन भर नहीं रह जाता वरन् वह अनुष्ठान में बदल जाता है। अतः किसी भी सभ्य समाज के लिए उसके आयोजन आभूषण होते हैं। आयोजन जीवन की गति के साथ सौन्दर्य का विस्तार भी करते हैं। आयोजनों की विविधता संस्कृति की मौलिक अभिव्यक्ति है। दुर्भाग्य से हमारे समय में आयोजनों का स्वरूप संस्कृति की जडों से काटता जा रहा है। उसका मूल प्रेरक स्वर लुप्त होता जा रहा है। आयोजन को अनुष्ठानिक भावना से सम्पन्न करने की परम्परा मन्द पडती जा रही है। सभी प्रकार के आयोजन बस एक कोरम को पूरा करने की प्रविधि का रूप बन कर रह गए हैं। इससे संस्कृति का आत्म क्षत-विक्षत है। संवेदनील समाज हतप्रभ। कहा जाय का करि का मुहावरा चरितार्थ हो रहा है।
इस विकट होते जा रहे समय में आयोजन की अनुष्ठानिकता एक ऐसा विचारणीय प्रश्न है जिस पर समाज के विभिन्न पक्षों को एकजुट होकर गंभीर चिंतन करना है। क्योंकि इतिहास के तथ्यात्मक ज्ञान के अभाव में हम संस्कृति की समन्वयशीलता को कलुषित करने की राह पर हैं। हमें विचारना होगा कि हम किस राह पर हैं। हमें किस राह पर जाना है। हमें समन्वय की संस्कृति का विकास करने के लिए आयोजनों की भूमिका को स्वीकार कर, उसके माध्यम से स्वच्छ एवं स्वस्थ समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढना होगा।
यह भी ध्यान में रखना होगा कि आयोजनों का चरित्र व प्रक्रिया परम्परा से जुडे हों। आयोजनों की निरन्तरता, आयोजनों की निरन्तरता नहीं वरन् परम्परा का सातत्य है। इसे इस रूप में देखा, समझा और परखा जाना भी अधिक न्यायसंगत होगा। जिस समाज में जितने तरह के अयोजन और उत्सव होंगे, उस समाज की प्रगति का पथ उतना ही प्रशस्त होगा, बशर्ते समाज अपनी जडों से कटे नहीं, परम्पराओं से हटे नहीं और मौलिक अभिवृत्ति के साथ डटा रहे। अपने विविधवर्णी आयोजनों की श्ाृंखला से ही एक सभ्य समाज अपने चरित्र में ज्ञान-अनुष्ठानों की एक्यता का वह सूत्र प्राप्त करता है जिसे पाने की लालसा व्यक्ति को सदैव जिज्ञासु बनाए रखती है। यही आयोजन का मर्म है।
आयोजन का रूप प्रबन्ध इस पर निर्भर करता है। प्रबन्ध की निपुणता या प्रबन्धकीय लाघव ही आयोजन को उत्कृष्ट या निम्न स्तर का बनाता है। अतः जब कोई संस्था या समूह अनुष्ठान की भावना से भरकर आयोजन करता है, तो उसी से उसकी गुणवता पर असर पडता है। आयोजन परम्परा का परिष्कार तो करते ही हैं, साथ ही नई सोच, दिशा और विचारों का संरक्षण भी करते हैं। आयोजन अपनी संरचना में सम्प्रेषण का चैनल भी विकसित करते हैं। इनके चलते समाज के विभिन्न वर्गों तक रचनात्मकता का विस्तार व प्रभाव पहुँचता है। यही प्रभाव व विस्तार समाज को संस्कारित करता है। आयोजनों के आयोजन से उपजा उल्लास मानवीय मूल्यों एवं गुणों को पोषित करता है। जिससे मानवता को विकसित होने के सुअवसर मिलते हैं और संस्कृति के विकास को दिशा और गति मिलती है।
मधुमती ने छह दशक की परिपक्व यात्रा न केवल तय ही की है बल्कि उस यात्रा को ऐतिहासिक बनाते हुए अपनी एक विशिष्ट पहचान भी बनाई है। विगत डेढ वर्ष में हमारे परिदृश्य के अनेक विद्वानों, कवियों, आलोचकों ने आगे बढकर कहा कि हमारा पहला लेख, पहली कविता या पहली समीक्षा मधुमती में ही छपी थी। मधुमती ने अपनी इस यात्रा से यह साबित करने की पहल की है कि न तो अच्छे, सुधी और गंभीर पाठकों का टोटा है और न ही श्रेष्ठ लेखन कर्म करने वालों का अकाल। मधुमती परिवार के प्रयासों से यह स्थापित हो रहा है कि सरकारी, संस्थागत प्रयास भी उतने ही संवेदनशील ढंग से संपादित किए जा सकते हैं जितने निजी।
आरम्भ से ही हमारा प्रयास रहा कि हम संवदना, मौलिक चिन्तन की साझी संभावनाओं के पथ पर आगे बढे, हमें आप से यह साझा करते हुए प्रसन्नता है कि देश के शीर्ष कवियों, विद्वानों, बुद्धिजीवियों, संपादकों और आलोचकों ने समय-समय पर हमारे काम की परख की है और हमारी दिशा को ठीक बताते हुए आगे के लिए कुछ कुछ सूत्र भी दिए हैं।
इसी कडी में आकलन शीर्षक के अन्तर्गत हमारे काम की दृष्टि सम्पन्न पडताल की है सजग, निष्ठावान, युवा अध्येता शशिभूषण मिश्र ने। उन्होंने पूरे वर्ष के अंकों को न केवल खंगाला ही वरन् प्रत्येक रचना एवं रचनाकार से तार्किक संवाद करने की भरपूर मेहनत की है। कई जगह उन्होंने हमारे कमजोर पक्षों की ओर साफ एवं स्पष्ट संकेत किया है। इस अध्ययन के लिए मधुमती परिवार कृतज्ञ है।
हमेशा की तरह सभी स्तंभों में आफ लिए रूचिकर एवं विचारोत्तेजक सामग्री का संचयन किया गया है। आशा है कि आप अंक पर अपनी विश्लेषणात्मक राय से अवगत कराएँगे। आपका सहयोग और मार्गदर्शन ही हमारा पथ प्रशस्त करता रहा है। इस संकटापन्न समय में आप अविचलित भाव से स्वस्थ रहें और कोरोना से बचाव के लिए राज्य एवं केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर जारी निर्देशों का पालन करते हुए जीवन विकास के पथ पर आगे बढें। शुभकामनाओं के साथ -