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एक अद्भुत यात्रा

सीरज सक्सेना
दिल्ली में साइकिल चलाते हुए अब आठ बरस हो गए हैं और दिल्ली में रहते हुए बीस साल। पहले खुद के ही रहने की जगह नहीं थी तो साइकिल संभालना कैसे सम्भव हो पाता? दिल्ली आने के पहले भोपाल और उससे पहले इंदौर में कभी साइकिल का साथ नहीं छोडा। यहाँ तक कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ साइकिल से देख लिया है। अब दिल्ली देख रहा हूँ। आकाश और नवीन से दोस्ती साइकिल चलाते हुए सडक पर ही हुई हैं। और सडक पर हुई दोस्ती की रफ्तार सधी हुई और उम्र लम्बी होती है। एक शाम अपनी साइकिल सैर के दौरान चाणक्यपुरी के गोल चक्कर पर साइकिल सहित हरी घास पर कुछ देर सुस्ताने बैठे। नवीन और आकाश हाल ही में (2016) कश्मीर से कन्याकुमारी तक साइकिल यात्रा संपन्न कर के लौटे ही थे। अब वे उत्तर पूर्व की साइकिल यात्रा की योजना बना रहे हैं। उनके बहुत आग्रह के बावजूद भी मैं उनकी पिछली रोमांचक व लम्बी साइकिल यात्रा में न जा सका। इसका मुझे अफसोस अब तक है। चाणक्यपुरी के गोल चक्कर के बीच हम चारों (नवीन, आकाश,अंकुर और मैं) देर तक बैठे रहे और आकाश और नवीन ने मिल कर मुझसे उनके साथ उत्तरपूर्व साइकिल पर साथ चलने का वचन लिया। उनके प्रेम दवाब और उनके साथ पिछली बार न जा सकने के पश्चातापवश मैंने भी सोच समझ कर उन्हें वचन दिया कि हम साथ चलेंगे। घर आकर मैंने देर तक सोचा और अपने इस निर्णय पर खुद को खूब शाबाशी दी कि खुद के लिए अगर चार हफ्ते दे दिए तो क्या आफत आ जाएगी। जीवन चक्र यूँ ही चलता रहेगा। घर परिवार भी यूँ ही फलता- फूलता रहेगा। पर इस यात्रा के बाद जो आत्मविश्वास, अनुभव और जो उपलब्धि हासिल होगी वह बहुमूल्य होगी। जीवन में इस यात्रा से कुछ न कुछ जरूर सकारात्मक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बदलाव आएगा। देश के एक सुन्दर हिस्से को नजदीक से देखने का मौका कोई कला संस्था नहीं देने वाली। हम लोगों ने गुवाहाटी के कलाक्षेत्र से अपनी साइकिल यात्रा शुरू की, पूरा गोवाहाटी देखा फिर मझोली (विश्व का सबसे बडा नदी द्वीप), बोकाघाट, काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान नवागाँव, शिलाँग, चेरापूंजी, लिविंग रुट ब्रिज देखते हुए पुनः गुवाहाटी में अपनी साइकिल यात्रा संपन्न की। हमारी साइकिल सुरक्षित गुवाहटी से दिल्ली ट्रैन में लद कर आयीं। और हम प्लेन में।
दिवगंत कलिता जो हमारे साथ पूरी यात्रा में रहे। अब हमारे बीच नहीं हैं। यह यात्रा डायरी मै उन्हें ही समर्पित कर रहा हूँ।
जब यह लॉकडाउन खुल जाएगा फिर हम छत्तीसगढ की ओर अपनी साइकिल से रुख करेंगें।
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छुक छुक गाडी की स्पीड में हमारी नॉर्थ ईस्ट एक्सप्रेस गाडी चल रही है, जलपाईगुडी अभी आया। बचपन से ऐसा ही सुन रहे हैं तो जैसा चलन में है वैसा ही लिख दिया हालांकि ट्रैन यहाँ अब आयी है। जलपाईगुडी तो शुरू से ही अपनी जगह स्थिर है। उत्तरप्रदेश के टुण्डला शहर से कानपुर तक बडे मामाजी ने अपने साथ के साथ हमारी इस यात्रा में पहले साथी की भूमिका निभाई और मामा जी दीदी के हाथ की बनी, कढाई में तली पूडी व आलू और भिण्डी की सब्जी के साथ थर्मस में गरमागरम चाय आदि खाने व पीने की सामग्री एक थैले में रखकर लाए। सफेद पोशाक में मामा जी, मामा कम व देवदूत अधिक लग रहे थे। मामा जी अमूमन सफेद कपडे ही पहनते हैं यहाँ तक कि जूते भी सफेद पहनने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती। मैंने अपने जीवन में बहुत कम लोगों को सफेद जूते पहने देखा है। स्कूली बच्चों की तरह मैंने भी सफेद केनवास के जूते स्कूल में ही पहने हैं। आकाश मामा की बातों और बातों में बहकर आ रहे प्रेम व अपनेपन पर मुग्ध है। पारिवारिक तौर पर आकाश के मम्मी पापा और मेरे मामाजी ने हमें विदा किया। आकाश के घर से आए आलू व पराठे के साथ जोधपुर की मिठाई व राजस्थानी मिर्च का अचार ट्रेन में हमने दो बार से अधिक खाया।
नवीन घुटने में दर्द की वजह से नहीं आ सके। उनके न होने का मलाल उन्हें भी है और यहाँ हमें भी उनकी अनुपस्थिति खल रही है। हमारी साइकिलें इसी ट्रेन के पिछले डब्बे में हैं। आकाश को साइकिल पार्सल करने में बडी मशक्कत करनी पडी है, उन्हें तीन बार आनन्द-विहार स्टेशन के पार्सल विभाग आना पडा। हद तो यह हुई कि कल रात के 2 बजे उन्हें विभाग के बाबू ने अपने परिचय-पत्र की फोटोकॉपी देने की माँग की और वे उसी वक्त अपने घर से फोटोकापी कराकर लाए और करीब साढे तीन बजे हम आखिरकार साइकिल पार्सल की रसीद प्राप्त कर पाए।
सुबह साढे पाँच बजे वे तय समय के मुताबिक मुझे लेने आए हैं। मैं बस नहाकर बाथरूम से निकला ही था। पत्नी और कुन्थू सो रहे थे। अगेशजी (मेरी इकलौती पत्नी) को उठाकर उनसे विदा ली और आनन्द-विहार रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर तीन के एक छोर पर हम अपनी-अपनी साइकिल के पास खडे हो गए। पूरी कोशिश करते रहे कि हम अपनी आँखों के सामने साइकिलों को डब्बे में सकुशल रखवा सकें पर सरकारी तंत्र के आगे विफल हुए और हमारी यह दिली व छोटी इच्छा पूरी न हो सकी। सरकारी तंत्र के काम करने के तरीके नीरस, उबाऊ और उत्साहहीन, निराशाजनक अनुभव ही देते हैं। कभी-कभी ही चमत्कारिक रूप से काम जल्दी व आसानी से हो जाता है।
अभी हमारी ट्रेन करीब साढे तीन घंटे विलंब से चल रही है। आगे इस समय में वृद्धि होने की पूरी संभावना है। और इस अतिरिक्त सफर का कोई पैसा भी हमें भारतीय रेल को नहीं देना है। सारस क्रेन(सारस पक्षी) के कई जोडे हमने उत्तर प्रदेश में देखे यही बडा और सुन्दर पक्षी जो हमेशा जोडे में ही नजर आता है उत्तरप्रदेश राज्य का राजकीय पक्षी है, यह बात इस पक्षी की तरह प्रदेश के बहुत ही कम नागरिक जानते हैं। अमूमन पक्षियों और राज्य के नागरिकों को राज्य के इस पक्षी प्रेम की खबर नहीं होती हैं। हर प्रदेश का अपना राजकीय पक्षी होता हैं। जैसे मध्यप्रदेश का राजकीय पक्षी है दुधराज (Asian Paradise Flycatcher), दिल्ली का राजकीय पक्षी हैं गौरैया। अब चाय बगान हमारी खिडकी के बाहर पसरे पसरे खिलखिला रहे हैं। भाषा और भोजन का स्वाद बदल गया है। बंगाली लिखावट के घुमाव में स्त्रीत्व (श्ाृंगार) नजर आता है। हमारे साथी यात्री मेघालय के युवक-युवतियाँ हैं। आकाश की उन सभी से अब अच्छी मित्रता हो गयी है। आकाश की पारदर्शिता, सहजता, सरलता व उत्साही प्रवृत्ति उन्हें कम समय में अधिक प्रिय बना देती है। वे युवा हैं और उत्साह व उमंग से भरे हैं। बेटी बचाओ, बेटी पढाओ हमारी इस साइकिल यात्रा का सन्देश है। हालांकि यह बात मैं जनता हूँ कि दक्षिण पूर्वी राज्यों में महिलाओं की स्थिति मैदानी राज्यों से भिन्न हैं और बेहतर भी।
प्रकृति के बीच अपने आप को सौंपने का यह मौका बहुत दिनों बाद मिला। देखना चाहता हूँ उत्तर-पूर्व की प्राकृतिक, सांस्कृतिक सुन्दरता और सौन्दर्य, भाषा का बहाव व रस, लय, कामरूप की मादकता। यहाँ साइकिल चलाना आसान न होगा पर स्वयं को दर्द और अनिश्चितता के लिए तैयार कर रहा हूँ। आई एम प्रिपेयर्ड,यह बार बार दोहराता हूँ। हर दिन एक नया अनजाना दिन होगा। हर नई जगह एक नई सुबह नए लोगों के बीच, कई लोग इस सफर में छोटे- छोटे समयों में मिलेंगे, छूटेंगे और इनमें से कुछ साथ ही रह जाएँगे और कुछ छूट जाएँगे।

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पूरे देश में इस वक्त आलू ही आलू बिखरे हैं। वृंदावन से बंगाल तक किसानों को अपनी लागत निकालना भी कठिन हो रहा है। इतने आलू को स्टोर करना असंभव है अर्थात आलुओं को सँभाल कर सुरक्षित रखने में हमारा खाद्य विभाग अक्षम है। बल्कि इन सब आलूओं से चिप्स और पापड बनाने की एक बडी सरकारी फैक्ट्री हर राज्य में होनी चाहिए। चिप्स ही क्यों पापड भी तो सरकार बना सकती है क्योंकि पापडों को बाहर भी भेजा जा सकता है। और अपने पडोसी मुल्क भारतीय आलू के पापड खा कर खुश भी बहुत होंगे। पापड और चिप्स बनाने का ठेका सिर्फ गृहणियों के लिए ही है यह तो कोई नियम भी नहीं हैं। मण्डी में जब किसान आलू भरे ट्रैक्टर या ट्रक को तौलाता है, तो वहाँ भी सही तौल उसे नहीं मिलता। हर बार बताए जाने वाले वजन से अधिक ही आलूओं का वजन होता है। किसान अपनी उदारता की गरिमा का ख्याल रखते हुए कभी इसकी शिकायत नहीं करता। और अपने आलू कम दाम में बेचने की बजाय वहीं छोड आता है। आलू की अपार उपज, खेतों में मेहनत से आलुओं को निकालते स्त्री-पुरुष किसान,आलुओं को बोरों में भरते किसान अपना समय, पैसा और श्रम लगा कर आलू उगाते हैं और बदले में उन्हें जो कुछ मिलता है वह बहुत कम होता है। जहाँ इस वक्त हर क्षेत्र में आय की वृद्धि और अवसर बढ रहे हैं वहीं किसान प्रधान हमारे देश में किसानों की हालत दयनीय है।
देर रात जब हमारी ट्रेन गुवाहाटी पहुँची, तब तक शहर सो चुका था। प्लेटफार्म पर उतरते ही हम अपनी अपनी साइकिल लेने ट्रेन के पीछे लगे सामान डिब्बे के पास पहुँचे। अपनी अपनी साइकिल उतारी कुछ औपचारिकताएँ पूरी की। अपना सामान पीठ पर लादा और साइकिल के साथ बाहर निकले। सबसे पहले गुवाहाटी स्टेशन के बाहर हम दोनों ने अपनी अपनी साइकिल के साथ एक तस्वीर ली। स्टेशन के आस-पास कुछ होटल, पान की दुकानें खुली थीं। डीजू को हमारे शहर आगमन की फोन पर सुचना दी। उनसे कलाक्षेत्र पहुँचने का रास्ता पूछा। रात में डीजू के कई फोन आए। उन्हें हमारे कलाक्षेत्र सकुशल पहुँचने की फिक्र थी। एक सीधी सडक पर तीन पुल पार कर बायीं और मुडकर कुछ ही दूर स्थित कलाक्षेत्र के द्वार पर दो साइकिल सवार पहुँचे समय लगभग रात्रि के एक के आसपास का है। यहाँ हमारा रूम बुक है। कलाकार होने की कुछ सुविधाएँ कभी-कभी ही मिल पाती हैं। यहाँ कलाकार मित्र चन्दन ने हमारे ठहरने का प्रबंध किया है।
रात अच्छी नींद आयी, कलाक्षेत्र की शांति में, कोने में बनी इस इमारत के भूतल पर बने रूम नं. 5 में अपनी-अपनी साइकिल के साथ रूम में मच्छरदानी लगे दो बिस्तर पर हम सोए। छोटे कमरे में दो बंद खिडकियाँ और सादा छोटा स्नानागार। कई दिनों बाद अगली सुबह ठंडे पानी से नहाया। गरम पानी से नहाने की मेरी आदत कब मेरी कमजोरी बन गई पता ही नहीं चला। नाश्ता चन्दन के बचपन के कलाकार मित्र राहंग के साथ स्टाफ कैंटीन में हुआ, रोटी और मटर की सब्जी के साथ कडक चाय। राहंग एक लोक गायक हैं और असमिया लोक संगीत की उनकी अपनी एक टोली है।
चल पडी गुवाहाटी की सडक पर साइकिल, पता पूछते-पूछते कामाख्या मंदिर पहुँचे फिर भी तीन किलोमीटर आगे तक पहुँच गए। 6 कि. मी. अधिक चलकर कामाख्या मंदिर के गेट नंबर 1 से मुख्य द्वार के भीतर पहुँचे। चढाई शुरु हुई और गंतव्य तक पहुँच कर ही रुके। पहले कभी मैंने इतनी ऊंचाई पर साइकिल बिना उतरे नहीं चलाई है। देहरादून से मसूरी तक साइकिल से जाने की तमन्ना पिछले चार सालों से है। इन चार सालों में करीब चालीस बार देहरादून जा चुका हूँ और कई बार साइकिल भी लेकर गया हूँ पर देहरादून के बाहर साइकिल नहीं चलाई। रास्ते में पहाड की ऊँचाई पर खडे होकर गुवाहाटी शहर को देखा। जाती हुई रेलगाडी वक्राकार रेखा बना रही थी। ऊपर चढती हुई साइकिल के लिए उत्साह, संयम और संतुलन की जरुरत थी। पहाड की घुमावदार सडक की ढलान पर अपने संयम, दिमाग,उत्साह और संतुलन का मिश्रण अच्छा रहा। चढाई पर साइकिल चलाने के लिए पैरों में डैम और ढलान पर साइकिल से उतरते वक्त धैर्य और संतुलन का मेल होना अति आवश्यक होता है।
उतरने से पहले एक छोटी सी चाय की टपरी में चाय पीने रुके। एक वरिष्ठ महिला सफेद नीली पट्टी रंगीन साडी पहने खुश चेहरे के साथ चाय बना रही थी। चाय देने के बाद उन्होंने कुछ खाने का भी आग्रह किया। हालांकि उनके पास बिस्किट, रस (टोस्ट), चॉकलेट छोटे नमकीन के पैकेट ही थे। पर उनके आग्रह का सम्मान करते हुए एक नमकीन का पैकेट लिया और दो चाय पीने के बाद ढलाऊ सडक पर अपनी अपनी साइकिल पर सवार हो चल पडे।
कामाख्या से अब उमानंद मंदिर की ओर जाना है। यह दोनों ही मंदिर प्राचीन और प्रसिद्ध हैं। मुख्य सडक पर इस वक्त अच्छा ट्रैफिक है। बसें, टेम्पो, कारें इत्यादि सभी दफ्तर से छूटे लोगों को अपनी -अपनी मंजल पर पहुँचा रही हैं। कुछ बसों का शेप भिन्न है गोलाई में बस की फूली हुई बॉडी गैंडे की याद दिलाती है। उमानन्द मंदिर ब्रह्मपुत्र नद के विशाल पाटों के मध्य एक छोटे टापू पर है। नद के दूसरी ओर नॉर्थ गुवाहाटी है, यहाँ से वहाँ आने-जाने के लिए लोग छोटी बडी इंजन से चलने वाली नाव का सहारा लेते हैं। मोटर साइकिल, साइकिल आदि हर तरह के दुपहिया वाहन बोट की छत पर रख नद पार करते हैं। यह यहाँ प्रचलित यातायात साधन है। जैसा कि नाम से ही अहसास होता है कि ब्रह्मपुत्र गंगा, कावेरी, नर्मदा, यमुना की तरह नदी नहीं बल्कि नद है। अर्थात मेल (नर) है।
हम जिस बोट में बैठे वह बोट हमें ठीक नदी के दूसरी पार ले गयी, जबकि हमें नाड के बीच टापू पर बने शिव मंदिर जाना था। हम गलत बोट में बैठे। पर पंद्रह बीस मिनट की यह यात्रा सुखद रही। उमानन्द नेटापू को आते जाते वक्त नजदीक से देखा। अब शाम हो चली है। बोट के नीचे ब्रह्मपुत्र में शाम का पानी बह रहा है और उसके ऊपर बहती हवा गालों को छू रही है। हम पुनः नद के शहरी छोर पर आ गए। उमानन्द जाने वाली बोट अब बंद कर दी गयी है। इस शाम को अब रात अपने आगोश में ले रही है। तय यह हुआ कि नवग्रह मंदिर और उमानन्द मंदिर हम कल देखेंगे। पर ब्रह्मपुत्र की यह छोटी यात्रा अच्छी रही।
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पिछली बार 18 साल पहले गुवाहाटी अपनी दो समूह कला प्रदर्शनी व एक कला शिविर के लिए आया था। यहीं कला क्षेत्र में ही रुकना हुआ था। जयन्त कालिता,मोहन, देवाशीष, पार्थो आदि मेरे असमिया कलाकार मित्रों के साथ अच्छा प्रवास रहा था। यह मेरी पहली लंबी ट्रेन यात्रा थी जो भोपाल स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर चार से शुरू हुई थी। कलाकार मित्र जयन्त कलीता के घर ही हम रुके थे। यहाँ पिताजी को देवता कहते हैं। यह शब्द पापा से कहीं बेहतर और सारगर्भित है। हालाकिं बच्चों के लिए पापा बोलना सीखना अधिक सरल है। देवता बडे होने पर पिता को कहा जा सकता है।
मैं इतने सालों बाद यहाँ पुनः आया हूँ और मन में जयन्त के माता- पिता से मिलने की ख्वाहिश है। अगले दिन उमानन्द मंदिर नहीं जा पाए और हम अब जयन्त के घर की ओर बढ चले। बी.बरुआ कैंसर हॉस्पिटल पर जयन्त के भाई डीजू (जिनका जक्र पहले हो चुका है) अपनी स्कूटी पर हमें लेने आए। यहाँ हमारी साइकिल उनके स्कूटर से लंबा सफर तय कर उनसे जल्दी पहुँची है।
जयन्त कुछ सालों से दिल्ली में ही हैं। डीजू पहले हमें अपने छोटे भाई ..सीमान्त के टेक अवे छोटे रेस्तरां में ले गए। वेज कटलेट से हमारा स्वागत किया गया। इस कटलेट की फिलिंग बहुत अच्छी है। तेल में तला तेल में सराबोर यह पकोडा स्वादिष्ट तो है, पर अधिक नहीं खा सका।
यहाँ से हम जयंत के घर पहुँचे। जयन्त का यह नया घर है अच्छा खासा बडा और अभी बन ही रहा है। जयन्त की मम्मी, भाभी व बच्चों से मिला। मम्मी ने घर में ही ऊपर बने मन्दिर देखने का आग्रह किया। मन्दिर में बडे बडे मंजीरे हाथ में लिए देवता पूजा कर रहे थे। मंजीरे की गूँज वातावरण में सध्या पूजा का संगीत फैला रहे थी। मम्मी ने कहा ये सुबह-शाम दोनों वक्त पूजा करते हैं। देवता सिरेमिक इंजीनियर हैं। और अपने रिटायरमेंट के बाद शांति से अपना जीवन गुजार रहे हैं। मम्मी ने असमिया गमछा ओढा कर बिदाई दी।
यहाँ से डीजू की स्कूटी के पीछे पीछे चलते हुए उनके कमरे पहुँचे। वे यहाँ अकेले रहते हैं पढते और लिखते हैं। इस छोटे से कमरे में बहुत सारी पुस्तकें देख हम दोनों दंग रह गए, बातों का सिलसिला यूँ चला कि 11.30 तक हम बातें ही करते रहे।
लौटते हुए डीजू ने हमें यहीं उनके छोटे से रुम में रुकने को भी कहा पर हम नहीं रुक पाए। हुआ यह कि डीजू भी अपना स्लीपिंग बैग अपनी स्कूटी पर रख हमारे साथ चल पडे। डीजू जिस रास्ते से हमें ले जा रहे हैं वो रास्ता हमारे लिए नया और घुमावदार है।
रात के करीब 11.30 बजे हैं जारी हैं हमारी मंजल अभी कुछ दूर है कि अचानक आकाश ने डीजू को रोका और अपनी साइकिल उन्हें थमा दी और उनकी एक्टिवा खुद ले ली। डीजू के लिए साइकिल की सीट नीचे की गयी पर फिर भी वे ठीक से नहीं बैठ पा रहे थे। हम लोग साइकिल पर दौडाने के बाद ही उसकी सीट पर बैठते ह और बाकी साइकिल सवार खडे होकर ही सीट पर बैठने को ठीक समझते हैं, साइकिल की गति धीमी थी। डीजू को अपना संतुलन बनाने में कठिनाई हो रही थी वे हैंडल को काबू नहीं कर पा रहे थे। हैंडल स्थिर नहीं कर पा रहे थे। ज्यूं ज्यूं गति बढ रही थी साइकिल की थिरकन भी बढ रही थी। ये बढती हुई थिरकन आते-जाते झोंके का रूप ले चुकी थी। अब इन बडे-बडे झोंकों का विस्तार चरम पर था। मानो साइकिल और इन झोंको के बीच कोई स्पर्धा हो रही हो। और डीजू अनचाहे ही इस स्पर्धा का हिस्सा बन रहे हैं। डीजू के लिए इन झोकों को नियंत्रित करना अब असंभव था। जैसे कोई जिद्दी बैल के सिंग पकड कर उस पर सवारी कर रहा हो और बैल अपना सिर घुमा घुमाकर अपने उपर बैठे सवार के हाथों को सिंग से छिटकाना चाहता हो ठीक वैसे ही आकाश की साइकिल जिद्दी बेलगाम, आक्रामक बैल का रूप ले चुकी थी। अपनी आँखों के सामने यह दृश्य बना और अब अपने चरम पर स्खलित होने को है। मैं डीजू को चाहते हुए भी ना रोक सका और न ही वे स्वयं को ही रोक पा रहे हैं और अंततः सूनी सडक पर सडक की रोशनी में डीजू लहराती हुई साइकिल से गिर गए।
डीजू अपनी एक्टिवा की हेलमेट पहने थे। हाथों में दस्ताने भी थे। उनके हाथ छिल गए तारकोल की सडक पर उनका हाथ घिसा और छिल गया, कलाई में भी चोट आयी है। पर दिलेर डीजू तुरंत ही मुस्कुराते हुए उठ खडे हुए और पुनः अपनी एक्टिवा चलाते हुए कलाक्षेत्र पहुँचे। उनके गिरने की चोट का भार हमारे कंधे पर था। रह रह कर मैं आकाश को कह रहा था कि तुमने बिना जाने की डीजू साइकिल चला पाएंगे या नहीं उन्हें साइकिल दे दी। वैसे हम में से सिर्फ डीजू ही जानते थे कि वह साइकिल चला पाएंगे या नहीं। डीजू ने भी रह रह कर कह रहे थे कि मैंने बहुत सालों बाद साइकिल चलाई और वह भी आप लोगो की आधुनिक और गियर वाली साइकिल जिसका अभ्यास मुझे नहीं है। पर मैं जल्द ही साइकिल चलाना सीख लूँगा।
एक गद्दे का इंतजाम भी खुशकिस्मती से हो गया। हमारी भूख चुप थी पर लगी सभी को थी। बातें करते-करते संगीत सुनते-सुनते हम सो गए। सोने के पहले डीजू के दर्द का अहसास था।
माजुलि कहते हैं कि नदी का सबसे बडा टापू है यह एक जिला है। यहाँ ब्रह्मपुत्र नद(अब आगे इस लेख में नदी ही लिखूँगा) में बडी बोट चलती है जो कार, जीप, स्कूटर, मोटर साइकिल के साथ कई लोगों को एक बार में इस पार से उस पार छोड देती है। माजुलि टापू में हमें कल निमोनी घाट जाना है। वहाँ से जोरहाट साइकिल यात्रा है कम ही दूरी है लगभग 16-18 कि.मी.।
माजुलि में कई तालाब, केले के पेड, पक्षियों की कई प्रजातियाँ, सादा जीवन और अच्छे लोग हैं। राहंग अपने नृत्य समूह के साथ यहाँ आए हैं, तीस लोगों के इस नृत्य समूह का आज प्रोग्राम था। असम के अलावा भी कई अन्य राज्यों के लोक संगीत का यहाँ तीन दिनी संगीत महोत्सव चल रहा है। कुछ कि.मी. तो हमें रेत पर ही साइकिल चलानी पडी। इतनी रेत पर कभी साइकिल मैंने तो नहीं चलायी थी। ब्राह्मपुत्र की वृहत देह और विराट प्रवाह यहाँ नदी का प्रचंड व चमत्कृत कर देने वाला रूप गढता है। स्कूल से अभी छोटी-छोटी लडकियाँ मेखला चादर ओढे साइकिल चलाती देव कन्या की तरह लौट रही हैं। खुले बालों में उनके आत्मविश्वास की लहर पूरे वातावरण में बिखरी है। मौसम सुहाना है कल ही यहाँ जोरदार बारिश हुई है। हवा में धूल नहीं है। गरमुट एक छोटा-सा गाँव है पर यहाँ जरूरत की हर चीज है बैंक भी, गरमुट से ब्रह्मपुत्र का रास्ता 5-8 कि.मी का होगा। रास्ते में दोनों ओर जमीन से ऊँचे उठे हुए घर हैं, घरों के नीचे करघे लगे हैं जिन पर स्त्रियाँ ताना-बाना का खेल खेल रही हैं। मेखला चादर बना रही हैं और असमिया गमछे भी। बच्चे खेल रहे हैं, बच्चों में लडकियाँ अधिक हैं। लडकों की टोली कंचे खेलने में व्यस्त है। बडी बच्चियाँ अपनी गोद में अपने छोटे भाई को टाँगे खडी हैं। माथे पर सिंदूरी बिंदी यहाँ जैसे इस पृथ्वी को थामे हैं। स्त्रियों में अजीब-सा सुखद आत्मविश्वास और आकर्षण है जो उनकी चाल चलन से साफ नजर आया। यह स्त्री प्रधान देश है। समृद्ध है, सुखी भी। असमिया पोशाकों में जबरदस्त सरल सुंदरता व सहजता है। दो भागों में मेखला चादर साडी का ही एक रूप है। कभी देश में साडी के प्रकारों को भी जानने समझने का प्रयास करूँगा।
खाने में दाल, भात, प्याज, चटनी, कढी, पापड तो शाकाहारियों के लिए सामान्य है, पर मछली, मुर्गा, सुअर भी यहाँ आम है और अचार हर दिन ही खाया जाने वाला लोकप्रिय भोजन है।
नवग्रह मंदिर में तो पत्थर के नौ शिवलिंग हैं, बडे गुम्बद के नीचे गोलाई में इन नौ शिवलिंगों की पूजा होती है। यहाँ पहुँचने के लिए छोटा पर ऊँचा पहाड चढना होता है, मैं तो सीधी चढाई चढ ना सका साइकिल और खुद को धकेलते हुए चढाई चढी। हमारे आकाश बाबू साइकिल खडे होकर चलाते हुए इस कडी चढाई को साइकिल से ही चढे।
लौटते वक्त मंदिर के नीचे जब पहुँचे तो एक महिला राइडर मिली वे पेशे से वकील हैं और हफ्ते में दो तीन दिन साइकिल चलाती है। चार-पाँच किलोमीटर उनका साथ रहा फिर वे रिफाइनरी के पास तिराहे से अपनी राह चल पडी और हम दानों अपनी राह कला क्षेत्र गेस्टहाउस। गरपुट के केरल गाँव में बाँस के छोटे छोटे घरों की एक कतार है तीन छोटे घर यहाँ हैं सबसे आखिरी घर में हमने रात गुजारी। सुबह नींद जल्दी खुली, मौसम में बादल है। धूप का इंतजार है पर लग नहीं रहा कि आज सूर्य के दर्शन होंगे। रात जो कपडे धोये थे, वे अभी पूरी तरह नहीं सूखे हैं। ब्रह्मपुत्र के इस टापू पर कई छोटे-छोटे तालाब हैं।
यह यात्रा एक जीवन की तरह है, जितनी बाहर उससे अधिक भीतर विस्तार पा रही है। हर दिन नए लोग नए चेहरे, चेहरों पर मुस्कान, हर रात एक अनिश्चित मुकाम पर पडाव। यह अनिश्चितता हमारे वृहद रोमांच के लिए अनिवार्य है अनिश्चितता ही कहीं न कहीं रोमांच और रहस्य को अपने से बनाती है। यहाँ जीवन को, यहाँ के लोगों की दिनचर्या उनकी भंगिमाओं को देख लगता है कि यहाँ जीवन में अधिक वस्तुओं की जरूरत नहीं है। प्रकृति के बीच कितने साधारण तरीके से एक सुन्दर स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है। कितनी और तरह-तरह की चीजों से घिरे हैं हम मनुष्य। रंग बिरंगी चिडिया, तरह-तरह के मौसम उसकी खुशबू और फल-फूल सब्जियाँ, प्रकाश भी कितने तरह के हमें नसीब हैं। तारों भरा खुला साफ आकाश, इन सबके बारे में सोचना ,ध्यान करना इन सबको ठीक से नोटिस करना, हमें भीतरी खुशी व आत्मविश्वास देता है।
गुवाहाटी शहर भी एक गंध है, खुश्बू है वैसे तो हर शहर की अपनी गंध होती होगी पर गुवाहाटी की गंध में मुझे इस बारे में सचेत किया है। कई मिश्रित गंधों से मिलकर एक विशेष गंध बनती है। हर दिन के अलग अलग तीन चार पहरों में यह गंध भी चलती है। सुबह और शाम गंध में आ कर शामिल यह धूप की खुश्बू यहाँ है। कभी-कभी शंख व बडे मंजीरे की आवाज भी इस गंध में शामिल हो जाती है। संध्या के वक्त रसोई से कई तरह की गंध इस गंध में मिल जाती है। मछली कढाई में जब कडकती है तब वह भी गंध बनकर आसपास बिखर जाती है। और अंततः शहर की एक गंध की समग्रता में ठिठक जाती है। यहाँ फूलों का प्रचलन भी जीवन में शामिल है। तरह-तरह के फूल भी यहाँ हैं। बालों को बाँधने का तरीका भी भिन्न है और काजल इस तरह से आँखों को संवारता है कि आँखों की गहराई व गोलाई दोनों को वह बढाता है। इस गहराई का रहस्य काजल ही हमें महसूस कराता है। आँखों पर काजल की लकीर और भौहों के बीच सिंदूर से बनी गोल बिंदी मंत्रमुग्ध करती है। यह कामदेवता का नहीं देवियों का प्रदेश है। देवता इन देवियों का पिता है। एक ओर कामाख्या दूसरी ओर नवग्रहों को संचालित करता नवग्रह मंदिर वहीं शहर से कुछ दूर मदन कामदेव मंदिर से इस शहर का भूगोल बनता है। और बीच में तेज बहाव में बहती ब्रह्मपुत्र।
माजुलि में कई गाँव हैं इस टापू पर ट्रक बस जीप कार अनेकों तरह के दुपहिया वाहन के साथ साइकिल का भी चलन है। रात के अंधेरे में साइकिल सवार एक हाथ की मुठ्ठी से साइकिल का हैंडल व दूसरे हाथ में टॉर्च थामे रहते हैं। सडक के किनारे जुगनू भी रात को खिला रहे हैं। घास और बांसों से सराबोर इस द्वीप में घरों में बांस का प्रयोग बहुतायत में होता है। घरों की छतों पर घासों की छत पानी की एक बूँद भीतर नहीं आने देती। यहाँ नाश्ते में रोटी सब्जी का चलन है। बाकी दोनों समय के भोजन में दाल भात चटनी के साथ मछली अनिवार्य है।
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मेखला चादर बनाने वाली इन स्त्रियों को उनकी गृहस्थी के नीचे करघे पर तल्लीन देखना एक दिव्य अनुभव होना है। मेखला चादर बनाने को सबसे पहले उन्हें बुनने वाले अपने कपडे के आकार के मुताबिक कई धागों की सीधी-सीधी रेखाओं का एक साँचा बनाना होता है। हर धागे के बीच सही और अनुपात के हिसाब से बराबर जगह होना अनिवार्य है। दो धागों के बीच की दूरी तय करने या नापने के लिए उनके पास कोई स्केल या इंच टेप नहीं है, यह गणित परंपरा से उन स्त्रियों की माँ, नानी या दादी से उनके भीतर आया है। बच्चे आसपास हँसी-ठिठोली में खेल खेल रहे हैं। अपनी इस नयी दुनिया में रम रहे हैं और इधर यह मेखला चादर भी बनना शुरू हो चुकी है। ऊपर घर में शायद ही कोई पुरुष या अन्य सदस्य हो,सभी घर से बाहर अपने-अपने काम में लीन हैं। मेखला हो या पटका या गमछा उनके ऊपर बुनने वाले अलंकरण भी खास हैं। करघे की बंधी ताना बाना और दो बुनी हुई धागों की कतार को आपस में जोडने के लिए जिस अंदाज में एक सीधी पट्टी चलाई जाती है वह अद्भुत इस मायने में भी है कि ताना-बाना का यह खेल बेआवाज नाजुक है वहीं गुर्राता भी है।
घर की गृहस्थी शांत है चरखे की आवाज यहाँ सख्त है। यह स्त्रियों का लोक है। यह आसाम की स्त्रियों का सृजन लोक है। यहाँ स्त्री आत्मनिर्भर है। वह अपनी आवाज खुद बुनती है। स्त्री रचनाकार है, इस स्त्री को सोचते हुए मुझे आसाम की कहानीकार व नृत्याँगनाएँ याद आ रही हैं।
रात हमने एक बाँस के घर में गुजारी। तालाब और खेतों के बीच चार बम्बो का हट हैं जिसमे से एक में हम दोनों हैं। हमारी साइकल हट के नीचे सुरक्षित खडी हैं। मच्छरदानी में बातें करते करते कब नींद लग गई पता ही नहीं चला। सुबह का नजारा बहुत सुन्दर है। हम दोनों बहुत खुश हैं। रसोई के बाहर बैठ चाय पीकर हमें एक अच्छा दिन शुरू किया। यह अब तक का हमारा सबसे सुन्दर स्टे है।
हम लोग अपनी साइकिल इस बडी बोट में रख माजुलि टापू को विदा कर रहे हैं। धीरे-धीरे बोट एक छपाक लहर के साथ बढ रही है और पीछे छूटता हुआ माजुलि का तट दृश्य में छोटा हो रहा है, फिर धीरे- धीरे दृश्य बदला और इस दृश्य में दोनों ओर तट पर रेत ही रेत है। किसी नदी पर मेरी यह पहली इतनी लंबी बोट यात्रा है करीब 90 मिनट की। मुंबई से अलीबाग का सफर भी तीन बार बोट से कर चुका हूँ और फोर्ट कोच्ची से कोच्चि भी बोट से आना जाना किया है। इस बोट में तीन कारें व करीब दस मोटर-साइकिल ह और लगभग 100 सवारी। हम लोग बोट की डेक पर हैं, अब धूप निकल आयी है। इस सन्नाटे में विराट ब्राह्मपुत्र को हम अपने चारो ओर से निहार रहे हैं। इतनी सीधी भूमध्य रेखा का दीदार कम ही होता है। कुछ बगुले और ग्रेट कारमोरेंट पानी के ऊपर व तट पर शिकार की तलाश में लीन हैं, जुगत लगा रहे हैं। नदी की रेत का इतना अंबार इससे पहले नहीं देखा। यहाँ से आज जोरहट की छोटी साइकिल यात्रा है वहाँ मेरे मूर्तिकार मित्र त्रिदिब दत्ता मिलने वाले हैं। पिछली बार उनसे फोर्ट कोच्चि (केरल) में अपनी एकल प्रदर्शनी के दौरान मुलाकात हुई थी। हम दोनों अपने -अपने परिवार के साथ वहाँ आए थे, कुन्थू उस वक्त तीन साल का रहा होगा और हर सुबह हम तीनों गरम दूध की तलाश में समुद्र के किनारे सैर पर जाते थे। केरल में जिस गेस्ट हाउस में हम रुके थे वहाँ रसोई नहीं थी। माजुलि में पर्यटक कम थे शायद यह मौसम छुट्टी का न हो। आसाम में ही कई आदिवासी जनजातियाँ हैं और हर आदिवासी शैली के अपने रीति -रिवाज, खान-पान व पहनावा भिन्न है। हाँ, यहाँ लोगों से बात करते हुए यह बात जरूर साफ हो गयी कि हर आदिवासी समाज में अनिवार्य रूप से माँसाहार व मदिरा परंपरा में शामिल है ।
नवीन से रहा नहीं गया वे आज सुबह की ही फ्लाइट से गुवाहाटी पहुँचे हैं और डीजू के साथ उनकी एक्टिवा चलाते हुए शाम तक जोरहाट पहुँच जाएँगे। फिर आगे की यात्रा संभवतः काजिरंगा राष्ट्रीय उद्यान की हो। डीजू भी इस रोमांचकारी अनुभव को किसी भी हाल में छोडना नहीं चाहते हैं। हाथ में प्लास्टर बंधे होने के बावजूद भी वे नवीन के साथ आ रहे हैं। नवीन के घुटने के दर्द और डीजू के हाथ में प्लास्टर होने के बावजूद भी दोनों ने उत्साह से इस रोमांचक यात्रा में शामिल होना तय किया है। दोनों के इस ज*बे को हम सलाम करते हैं। जोरहाट में उन दोनों से मिलने का उत्साह हम दोनों को भी है।
कल रात मुन्ना से बात हुई वे बर्मा के अपने लम्बे प्रवास से अपने शहर आ गए हैं और नौगाँव में हैं।नौगाँव एक छोटा सा कस्बा है। काजिरंगा राष्ट्रीय उद्यान के बाद हमें अब नौगाँव भी जाना है। नौगाँव से गुवाहाटी और फिर शिलोंग। मुन्ना जिनका नाम सिद्धार्थ शंकर बोरा है और गुवाहाटी और बडौदा कला महाविद्यालय के छात्र रहे हैं। 1999 में जब में पहली बार असम आया था तब उनसे अच्छी मित्रता हुई और फिर 2000 में हम लोग लगभग साथ ही दिल्ली पहुचे थे। वे इन दिनों बर्मा में कला अध्यापन कर रहे हैं। हम दोनों फिर आसाम में एक दूसरे से मिलने की रोमांचक मुलाकात की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जहाँ भी जाता हूँ वहाँ बस जाने का मन करता है, पर यह संभव नहीं, तो चलो जब तक जहाँ हैं उसे अपना मानकर यहाँ के होकर इसे एक सुखद अनुभव बनाएँ। वैसे भी सुन्दर घटनाएँ प्रकृति दोहराती नहीं। जीवन का रस संचारी भाव में बहता है स्थायी में नहीं।
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यहाँ की सुपारी भी कडक है वैसे तो पान और सुपारी का यहाँ चलन है। उसे सरोते से बडे टुकडों में काटकर पहले खाया जाता है फिर चूना लगा पान। सुपारी इतनी असरदार है कि कुछ और पान में डालने की जरूरत नहीं।
कल बाँस की कुटीया में लिखने के बाद लौटते ही नींद आ गयी। कल रात लोक नृत्य के कार्यक्रम से लौटते हुए 9.30 बज गए थे। लगभग सभी दुकानें बंद हो चुकी थीं। एक होटल पहुँचे, उसने आधे घंटे का समय लेने के बाद हमें दाल, राजमा, आलू, रोटी और चावल तैयार कर खिलाया।
यहाँ का खाना मसालेदार नहीं सादा और स्वच्छ है। ज्यादा मसाला न होने के कारण उसमें उस सब्जी की खुश्बू और स्वाद रहता है। करीब एक घंटे 30 मिनट में हमारी बोट जिसे फेरी कहते हैं मिमाटी तट पहुँची। यहाँ से 24 कि.मी. का खुबसूरत रास्ता तय कर हम जोरहाट पहुँचे। रास्ते में बडे स्टार्क, मूरहेन, बगुले पतली और सुंदर सडक के दोनों ओर मकानों के बीच धान के खेतों में अपनी दुनिया में मस्त हैं। छोटे-छोटे तालाब भी इन धान के खेतों के बीच हैं। कहीं बडे बडे बांसों का झुरमुट इतना घना कि दोनों ओर से झुके बांस की पत्तियाँ आपस में मिलकर एक बाँस गुफा बनाती है। इतना घना झुरमुट कि इस बीच से गुजरने पर थोडा अंधकार महसूस होता है।
पतले रास्ते के दोनों ओर पेडों की लंबी कतारें रास्ते को सुंदरता के साथ सुरक्षा भी प्रदान कर रही है। निमाटी घाट की रेती से शुरू होकर हम लोग जोरहाट शहर की हलचल में जा पहुँचे। शाम का वक्त है। हर शहर की तरह यहाँ भी इस वक्त हलचल अधिक है। कहीं गोल गप्पे के ठेले लगे हैं तो कहीं पार्क में बच्चे खेल रहे हैं। साडी वालों की दुकानों पर महिलाओं की भीड है उनके हाथों में झोले और झोलों से बाजार की रौनक को कनखियों से निहारते लौकी व कद्दू दिख रहे हैं। बाईक सवार लोग दफ्तर से घर पहुँचने की जल्दी में हैं।
मुख्य बाजार, बस स्टेशन और एक ब्रिज पार कर हम एक चौराहे पर पहुँचे। इस चौराहे के दाहिनी ओर एक छोटे से पार्क में शिल्पकार मित्र त्रिदिब दत्ता का एक बडा शिल्प ठीक पार्क के मध्य में स्थापित है। छोटे पुष्प से एक बडा आकार उभर रहा है। यह बडा आकार छोटे कुतुबमीनार की तरह है जिसकी गोल सतह पर कुछ कहानी अंकित है। यहीं एक एक चाय पीते हुए हम शहर की हलचल देख रहे हैं।
त्रिदिब भी हमारे चाय खत्म करने के पहले ही आ गए। हमारे साथ चाय पीकर अब हम त्रिदिब के साथ आदिवासी गेस्ट हाउस पहुँचे। आज हमारा ठिकाना यहीं है। कल सुबह जल्दी ही काजीरंगा के लिए रवाना होना है। करीब 120 कि.मी. की दूरी हम दिन भर में तय कर सकेंगे।
शाम का खाना आज त्रिदिब के घर ही है उनकी चित्रकार पत्नी ही हमारे लिए भोजन शायद पनीर ही बनाएगी।
पनीर, पापड, चावल ही था। साथ में रोटी भी हम सभी ने खूब खायी। शायद उनकी अपेक्षा से अधिक। आदिवासी गेस्ट हाउस में त्रिदिब अपनी कार से हमें लेने आए। बारिश थी हम साइकिल से नहीं जा पाए। पहले त्रिदिब अपने डिजाइनिंग स्टुडियो ले गए। वहाँ वे अपने मित्रों के साथ व्यस्त हो गए। समीरनजी को देखने के बाद मैं उन्हें पहचान गया। उनसे अपनी प्रथम व पिछली आसाम यात्रा में मुलाकात हुई थी। बहुत बातें भी हुईं थीं। उनसे नदियों पर बात हुई थी उस वक्त मैंने नर्मदा बचाओ आंदोलन के बारे में नजदीक से जाना ही था और नर्मदा यात्रा भी साइकिल से पूर्ण कर चुका था। नर्मदा नदी के बारे में उनसे खूब बाते हुईं और उन्होंने भी ब्रह्मपुत्र नदी और साल दर साल चौडे होते उसके पाटों के बारे में बताया और उन्होंने मुझे एक मंत्र भी बताया था जो आज भी मुझे कंठस्थ है-
गंगेशु जमुना शिव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिंधु कावेरी जलासन्नी हित भवः।।
मेरे पिता की उम्र के समीरन जी अब भी स्वस्थ व सक्रिय हैं। देर रात तक हम स्टुडियो में रहे। फिर त्रिदिब के घर की ओर रवाना हुए। जोरहाट छोटा शहर लगभग अब सो चुका है। सूनी सडकों से होते हुए हम त्रिदिब के घर पहुँचे।

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