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साहित्यिक परिदृश्य

राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति

मनाएगी हीरक जयन्ती



राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति 1 जनवरी, 2021 को अपने स्थापना के साठवें वर्ष में प्रवेश करेगी। हीरक जयन्ती के इस मौके पर वर्ष भर कार्यऋम आयोजित किए जाएंगे। शनिवार को आयोजित कार्यकारिणी की बैठक में निर्णय लिया गया कि हीरक वर्ष में भाषा, साहित्य, संस्कृति, कला, इतिहास व शोध से जुडे सेमिनार, संगोष्ठियां, कवि सम्मलन, प्रतियोगिताएं, कार्यशालाएं व संवाद कार्यऋम आयोजित किए जाएंगे। इस अवसर पर स्मारिका प्रकाशन के अलावा स्ववित्त पोषित योजनान्तर्गत हिन्दी व राजस्थानी की विभिन्न विधाओं की मौलिक साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन एवं राजस्थान के लेखकों की एड्रेस डायरेक्ट्री भी प्रकाशित की जाएगी।

शिक्षा, साहित्य, संस्कृति व कला के विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय अवदान के लिए चयनित विद्वानों व कलाकारों को सम्मानित किया जाएगा। भाषा, सामाजिक सरोकारों व इतिहास से जुडे व्यक्तित्वों को भी वर्ष के दौरान अलंकरणों से अलंकृत किया जाएगा। संस्था भवन की साज सज्जा करवाने का भी निर्णय लिया गया। राजस्थान के विभिन्न अंचलों में संस्था द्वारा समारोह आयोजित भी किए जाएंगे। इस बैठक के दौरान संस्था की गतिविधियों का ब्रोशर लोकार्पित किया गया द्य



स्वतन्त्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना स्मृति सम्मान के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित

चित्तौडगढ 17 जून। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत संस्थान संभावना ने अपने संरक्षक और सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना के नाम पर दिए जाने वाले वार्षिक सम्मान के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित की हैं। ।

संभावना संस्थान के अध्यक्ष डॉ के सी शर्मा ने बताया कि राष्ट्रीय स्तर के इस सम्मान में स्वतंत्रता आंदोलन,प्राच्य विद्या या भारतीय मध्यकालीन साहित्य से सम्बंधित किसी एक कृति को चुना जाएगा। सम्मान के लिए तीन निर्णायकों की एक समिति बनाई गई है जो प्राप्त प्रस्तावों पर विचार कर किसी एक कृति का चुनाव करेगी। आयोजन चित्तौडगढ में संभावना द्वारा किया जाएगा। सम्मान में ग्यारह हजार रुपये, प्रशस्ति पत्र और शॉल भेंट किये जाते हैं।

कनक जैन

9413641775



शाइरा डॉ. मंजू कछावा अना के चार गजल संग्रहों

का हुआ ऑनलाईन विमोचन

अंतर मैत्री समूह के बैनर तले प्रख्यात शाइरा डॉ. मंजू कछावा अना के चार गजल संग्रहों का ऑनलाईन विमोचन दो जुलाई की शाम बीकानेर में किया गया। डॉ. मंजु कछावा अना के चार संग्रह, मुसल्सल सफर में, यकीन होने तक, सीपियों की कैद में, यकीन होने तक तथा ख्वाब का चर्चा का विमोचन ऑनलाईन किया गया। प्रथम गजल संग्रह मुसल्सल सफर में का विमोचन भारत के प्रसिद्ध शाइर और गजलगो नामक प्रसिद्ध वेबसाईट के संचालक श्री शिज्जु शकूर (रायपुर, छत्तीसगढ) ने किया। इस पुस्तक पर पत्रवाचन करते हुए युवा शाइर श्री अमित गोस्वामी (बीकानेर) ने किया। द्वितीय संग्रह यकीन होने तक का विमोचन देश के सुप्रसिद्ध उर्दू साहित्यकार श्री सैयद खुशनूद अहमद समर कबीर (उज्जैन) ने किया। इस पुस्तक पर पत्रवाचन शाइर श्री अखिलेश तिवारी (जयपुर) ने किया। तृतीय संग्रह सीपियों की कैद में का विमोचन राष्ट्रीय स्तर पर उर्दू के उस्ताद शाइर श्री कुंवर कुसुमेश (लखनऊ) ने किया। इस पुस्तक पर पर्चा युवा शाइर श्री देवेन्द्र मांझी (दिल्ली) ने प्रेषित किया जिसका वाचन डॉ. असित गोस्वामी (बीकानेर) ने किया। चौथे संग्रह ख्वाब का चर्चा का विमोचन गीत, नवगीत एवं साहित्य की अन्य विधाओं में समान रूप से सक्रिय श्रीमती राजेश कुमारी राज (देहरादून) ने किया। इस पुस्तक पर पत्रवाचन गीतकार व शाइर श्री रवि शुक्ल ने किया।

इस मौके पर इन चारों पुस्तकों में संकलित गजलों में से चुनिन्दा गजलों की प्रस्तुति शाइरा डॉ. मंजू कछावा अना ने प्रस्तुत की। इससे पूर्व युवा साहित्यकार संजय पुरोहित ने ऑनलाईन विमोचन के दौरान भारत भर से जुडे साहित्यकारों का स्वागत किया। डॉ.मंजु कछावा अना का परिचय युवा रंगकर्मी एवं फिल्म आलोचक नवल किशोर व्यास ने दिया। अतिथि शाइरों व पत्रवाचकों का परिचय व कार्यऋम का संचालन श्री रवि शुक्ल ने किया।

कार्यक्रम के अंत में आभार डॉ. सतीश कछावा ने ज्ञापित किया। इस कार्यऋम में देशभर से साहित्यकार व साहित्यानुरागी भी जुडे।

संजय पुरोहित, बीकानेर



संवाद निरन्तर

मधुमतीः एक उत्कृष्ट साहित्यिक आयोजन - जाबिर हुसैन

कोरोना और लॉकडाउन की अस्त-व्यस्तता के बीच एक अपरिचित प्रकार के अनुभव से -गुजर रहा हूँ। एक ऐसा अनुभव, जिससे मैं क्या पूरा देश ही -गुजर रहा है। जिसने सामान्य जन-जीवन को -गंभीर दुश्चिंताओं से रू-ब-रू करा दिया है। आर्थिक दबाव और बेरोजगारी की मार के कारण जिस दुःस्वप्न से देश इस वक्त मुकाबला कर रहा है, उसकी कोई दूसरी मिसाल दे पाना कठिन है। एक अजीब तरह का अनिश्चय माहौल पर छाया है। हम और आप इस अँधेरे समय से बाहर निकलने की उम्मीद तो कर सकते हैं, पर इस उम्मीद के साकार होने के रास्ते क्या होंगे, इस बारे में अंतिम रूप से कोई मत जाहिर करना मुश्किल है।

कोरोना के इस घटाटोप ने पत्र-पत्रिकाओं की जीवंतता को भी -गंभीर खतरे में डाल दिया है। कई साहित्यिक पत्रिकाएँ अपना नियमित प्रकाशन नहीं कर पा रही हैं। कुछ ने अपना डिजिटल वर्जन निकाल कर सोशल मीडिया की मदद से पाठकों तक पहुँचने की कोशिश की है। संपादक-प्रकाशक अपनी जान जोखिम में डालकर किसी प्रकार पत्रिका प्रकाशित भी कर लें, तो डाक-व्यवस्था अनियमित और बाधित होने के कारण इसे पाठकों तक पहुँचाना एक असंभव काम है। डाक-व्यवस्था और कोरियर सेवा के शुरू होने के समाचार जहाँ से आ भी रहे हैं, वहाँ नागरिकों से एक लिखित जवाबदेही-पत्र पर हस्ताक्षर लिए जा रहे हैं। इस पत्र में पहले से यह लिखा होता है कि डाक इधर-उधर हो जाने या अत्यधिक विलंब होने की सारी जिम्मेदारी डाक भेजनेवाले की होगी। जाहिर है, ऐसा होने पर पत्रिकाएँ निर्बंधित डाक से भेजने का हौसला प्रकाशकों के मन से जाता रहेगा।

किसी को मालूम नहीं, यह व्यवस्था कब दोबारा पटरी पर आ सकेगी। आम नागरिकों को अपने अति-आवश्यक पत्राचार और संवाद-प्रेषण की सुविधओं से कब तक वंचित रहना पडेगा। सोशल मीडिया और नेट-सेवाओं की अपनी सीमाएँ होती हैं। एक तो ज्यादातर लोग इसके तकनीकी आयामों से अच्छी तरह परिचित नहीं होते। दूसरे इसकी पहुँच शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है। बिजली की टीपाटीपी, आवाजाही और टावरों की बदहाली अलग से परेशान करनेवाली हैं। मोबाइल या डेस्कटॉप पर ज्यादा देर तक नजरें गडाए रखने के अपने जोखिम हैं।

इस अस्त-व्यस्तता और अफरातफरी के समय में मेरी मेज पर आज भी जिन पत्रिकाओं के नए-पुराने अंक रखे हैं, उनमें राजस्थान साहित्य अकादमी की ख्यात पत्रिका मधुमती सबसे प्रमुख है। प्रकृति ने मुझे अवसर दिया है कि मैं इसके सभी अंकों को नए उत्साह और गहन दृष्टि से देख सकूँ।

पत्रिका की स्तरीयता, मानक और कलात्मक प्रस्तुति पहली नजर में ही हर पाठक को आकर्षित करती है। रचनाओं का वैविध्य, भाषा की साफ-सुथरी पहचान और सूक्ष्म संपादकीय दृष्टि इस पत्रिका की प्रमुख विशेषताएँ हैं। राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित इस पत्रिका में स्तरीय रचनाओं के चयन के पीछे संपादक की व्यापक दृष्टि और खुलापन इसे एक साहित्यिक प्रतिमान देता है।

यह प्रतिमान पत्रिका को विचार और दर्शन के विभिन्न आयामों से भी जोडता है। हमारी लोक-सांस्कृतिक विशिष्टता का तेज इसके लगभग सभी अंकों में साफ झलकता है। एक विराट मानवीय दृष्टि इसकी खास पहचान है। कई अर्थों में, यह पत्रिका देश की अत्यंत सुसंपादित साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं में अपना विशेष स्थान रखती है।

हिन्दी का विशाल पाठक वर्ग इस पत्रिका में अपनी साहित्यिक आकांक्षाओं की झलक पाता है। इस पत्रिका के संयोजन, संपादन और प्रकाशन से जुडी टीम विशेष बधाई की हकदार है। इसका सर्वाधिक श्रेय स्वयं संपादक को जाता है।

किसी सरकारी संस्थान से निकलनेवाली यह पत्रिका अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं को भी राह दिखाती है। यह उसका सबसे उज्ज्वल पक्ष है।



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