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नयी दृष्टि नया स्वरूप

आशाराम भार्गव
आकांक्षा पारे काशिव के इस संग्रह से पूर्व तीन सहेलियाँ तीन प्रेमी कहानी संग्रह और एक टुकडा आसमान कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कथा साहित्य के क्षेत्र में रमाकांत स्मृति कहानी सम्मान, युवा कथा सम्मान, हंस कथा सम्मान आदि अनेक कथा सम्मान प्राप्त आकांक्षा पारे का यह कहानी संग्रह समाज की विद्रूपताओं के साथ स्त्रियों के नए स्वरूप और नई दृष्टि का चित्रण करता है। आकांक्षा ने अपनी लेखकीय दृष्टि को स्पष्ट करते हुए लिखा है हर कहानी ज्यों की त्यों कहना बिलकुल जरूरी नहीं। कुछ कहानियों को उनका रूप बदलकर कहा जाए तो ही वे जिन्दगी की कहानियाँ लगती है.. अगर कहानीकार के पास कल्पना ही न हो तो फिर वह किस बात का कहानीकार। (पृ.115) आकांक्षा के विचार आलोचना की उस मान्यता का समर्थन है जो रचनाकार की कल्पना और संप्रेषण शक्ति को कहानी के लिए आवश्यक मानती है। आकांक्षा पारे की कहानियाँ कल्पनाशीलता, संप्रेषणीयता और जीवनानुभव से युक्त है इसी कारण जिन्दगी की कहानियाँ है।
पिघली हुई लडकी कहानी संग्रह में कुल बारह कहानियाँ हैं। अधिकांश कहानियों के केंद्र में स्त्रियाँ हैं। इस संग्रह में जहाँ एक तरफ महिलाओं के शोषण और पीडा की कहानियाँ है तो दूसरी तरफ उनकी शक्ति और आत्मनिर्भर होने की कहानियाँ है। इस कहानी संग्रह में प्रेम की कोमल भावनाओं और समाज की विद्रूपताओं का चित्रण किया गया है।
मणिकर्णिका, एम.ई एक्सप्रेस महिलाओं के आत्मनिर्भर होने की कहानियाँ हैं, तो पिघली हुई लडकी और सुरक्षा चक्र कहानियाँ उनके उत्पीडन, शोषण और पीडा की कहानियाँ हैं। तीन तथा हर शाख को हरियाली का हक है कहानियों में दो तरह के स्त्री पात्र हैं एक तरफ भयग्रस्त और अनिर्णय की स्थिति वाली, पलायनवादी और दूसरी तरफ अपना जीवन जीने वाली, आत्मनिर्भर। हाँ, इन कहानियों में भी अंत में भयग्रस्त और पलायनवादी स्त्री पात्र भय को दूर कर अपना जीवन जीने की स्थिति में, आत्मनिर्भर होने की स्थिति में आ जाती है। कहा जा सकता है कि ये पात्र आत्मनिर्भर बनने की प्रक्रिया में है।
एम ई एक्सप्रेस कहानी में एम ई एक्सप्रेस मंजुला ईश्वरन नाम की एक साठ वर्षीय स्त्री को कहा गया है। उसके पति की मृत्यु पर उसका बेटा अमेरिका से नहीं आ पाता और उसे सारे इंतजाम खुद करने पडते हैं। वह एकाकी रह गई है। उसके सामने दो रास्ते थे या तो एकाकीपन के कारण खुद को समाप्त कर लेना या फिर उसी एकाकीपन को अपनी ताकत बना लेना। उसने दूसरा रास्ता चुना स्वयं को आत्मनिर्भर बना लिया और दूसरों के एकाकीपन को भी दूर करने लगी। जीत कौर नाम की स्त्री कहती है कि पाँच कमरों के मकान में अकेली रहती है पर मजाल जो अकेलापन फटक कर उसके पास आ जाए .. मंजुला घर किराए दिलाने से लेकर अकेले रह गए बूढे बूढियों से बात करने तक का काम करती है । (पृ. 31) मंजुला ईश्वरन स्व उत्थान और उसके बाद दूसरों के उत्थान के लिए प्रयास करती हुई स्त्री है। इस कहानी में उस पुरातन सोच पर व्यंग्य है जिसके अनुसार स्त्री को जीवन भर पुरुष के सहारे की जरूरत होती है और उसे जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में पिता, पति और पुत्र के अधीन या सान्निध्य में रहना चाहिए। लेखिका ने मंजुला के माध्यम से इस मान्यता का विरोध किया है,साथ ही वृद्धों के अकेलेपन की पीडा का भी चित्रण किया है।
मणिकर्णिका भी आत्मनिर्भर स्त्री पात्रों की कहानी है। कच्ची बस्ती में रहने वाली शोभा, शीतल, रूपाली और निर्मला जो फैक्ट्री वर्कर, सिक्योरिटी गार्ड और आया का काम करती हैं। घर और बाहर पुरुषों द्वारा परेशान की जाती है ।घर में भाई द्वारा दूध बिखेर देने और तेल में पानी डाल देने जैसे ऋोध को भी सहन करती हैं पर ये परेशानियाँ उनके आत्मविश्वास को नहीं तोड पाती। वे मोटरसाइकिल चलाना सीखती हैं और कहानी के अंत में बिना डरे परेशान करने वाले मोटरसाइकिल सवार लडकों को सबक सिखाती है। ये लडकियाँ आत्मनिर्भर होने की प्रक्रिया में है। ये अबला नहीं है, परिवार का पोषण करने वाली, घरों के बाहर कदम बढा कर आसमान छूने वाली और मणिकर्णिका (लक्ष्मीबाई) की तरह आत्मविश्वास से लबरेज परिस्थितियों का मुकाबला करने वाली लडकियाँ हैं।
तीन कहानी में जहाँ एक तरफ मुख्य पात्र मैं के जीवन में तीनअवस्थाओं पर आई हुई स्त्रियाँ हैं । उसकी बुआ पुष्पा, सहेली निशा और घर पर खाना बनाने वाली धनवती। दूसरी तरफ धनवती के साथ उसकी दो देवरानियाँ भी है जो एक साथ ही घर से भागती है वे भी तीन ही हैं। ये स्त्रियाँ देह से तीन थी पर आत्मा से एक थी यह कथन स्त्रियों के साथ होने वाले शोषण की एकरूपता का आख्यान है।
इस कहानी में भी दो तरह के पात्र हैं मैं और उसकी माँ भयग्रस्त, फैसला न ले सकने वाली और पलायनवादी पात्र हैं जबकि पुष्पा बुआ, निशा, धनवती और उसकी दो देवरानियाँ शोषण का विरोध करने वाली साहसी पात्र हैं। पुष्पा बुआ, निशा और धनवती के संदर्भ में एक सवाल जो मैं और उसकी माँ सोचती है कि समाज से टकराने वाली ये स्त्रियाँ समाज और उसके नियम के बीच इतनी बार आवाजाही कैसे कर लेती हैं। समाज का वह नियम जो पति को परमेश्वर मानने, पति द्वारा शोषण को कर्मफल मानने और प्रताडना सहन करने को ही स्त्री का धर्म मानता है।
पुष्पा नाम की उस लडकी की शादी जब हुई तो वह खिली हुई दुल्हन थी और लौटी तो मुरझाई पत्नी बनकर फिर बाद में विद्रोही अप्सरा में बदल गई। (पृ. 37) धनवती अपनी पीडा बताते हुए कहती है कि उस घर में कोई भी किसी की पत्नी को ठेलकर अपने कमरे में ले जा सकता था, पूरा दिन काम और रात में उनकी सेवा।(पृ. 40) धनवती के ससुराल में उसका ससुर, पति और दो देवर सभी परस्पर उन तीनों स्त्रियों का शोषण करते हैं। मगर ये स्त्रियाँ शोषण को सहन करना जरूरी नहीं समझती।
मैं जो समाधान से नहीं समस्याओं से प्रेम करती हूँ, मेरे लिए अनिर्णय की स्थिति ही निर्णय है, मैं फैसला नहीं लेती। जब जैसा हो जाता है तब उसी में जी लिया करती हूँ। जब भी मुझसे मदद माँगी गई है, मैंने पलायन की योजनाएँ बनाई है। (पृ. 34) वह अंत में आत्मविश्वास से भरकर उन तीनों स्त्रियों और अपनी सहेली निशा को घर बुलाती है, बुआ को भी खोजती है। यहाँ वह अपने भय से लडकर उनका सहारा बनती है।इस कहानी को स्त्री सशक्तिकरण की कहानी कहा जा सकता है।
हर शाख को हरियाली का हक है स्त्री चेतना की कहानी है। समाज की पुरानी सोच से भिन्न इस कहानी में स्त्री अपनी जीवन की स्वयं मालिक है। इस कहानी में भी दो प्रकार के स्त्री पात्र है एक तरफ मैं जो पलायनवादी है। जिसे लिफ्ट का इंतजार, ग्यारहवीं मंजिल तक पहुँचने में लगने वाला वक्त सब यातना की तरह लगता था, जो परिस्थितियों का सामना नहीं करती और कहती है कि डर लगता है प्रश्नों से। मैं लोगों से नजर नहीं मिला सकती कि दोस्ती हो और लोग सवाल पूछे।(पृ. 103)जबकि दूसरी तरफ ऐसी पात्र है जो अविवाहित माँ है। उस अविवाहित माँ को इस बात का कोई मलाल भी नहीं है। वह स्त्री साफ शब्दों में कहती है कि मुझे नहीं पता कि अतीत क्या था लेकिन भविष्य सवालों की बलि नहीं चढना चाहिए। उसका यह कथन मैं को भय से मुक्त कर आत्मविश्वास से भर देता है। इस कहानी में बीती हुई बात को भूलकर आगे बढने और नई जिंदगी की उम्मीद है क्योंकि हर शाख को हरियाली का हक है।
इस संग्रह के शीर्षक की कहानी पिघली हुई लडकी तेजाब के हमले का शिकार हुई राखी की कहानी है। राखी और रति हालांकि कच्ची बस्ती में रहने वाली लडकियाँ हैं मगर ऐसी लडकियाँ हमारे समाज में हर जगह देखी जा सकती हैं। जिनका डर और बेबसी से निरंतर सामना होता है, जिन्हें स्कूल जाते, सिलाई सीखने जाते समय लडकों द्वारा परेशान किया जाता है। पढाई बंद किए जाने के डर से वे अपने घर वालों से कुछ नहीं कह सकती। पूरा परिवार खुले आँगन में सोता है,उन्हें भरी गर्मी में बंद कमरों में सोने को बाध्य किया जाता है क्योंकि उनको खतरा है। किसी लडके के तथाकथित प्रेम को अस्वीकार करने का दंड चेहरे पर तेजाब फेंकने के रूप में मिलता है। उसकी सहेली रति जो इस लगातार होने वाली प्रताडना की साक्षी भी है और सहभागी भी, को उसकी बहन उस लडके का नाम बताने से मना करती है। स्त्री जीवन की पीडा और समस्याओं का यथार्थ चित्रण किया गया है।
सुरक्षा चक्र देश-दुनिया में हो रहे बलात्कार और हत्या पर लिखी गई कहानी है। आत्मा की अमरता के सिद्धांत को आधार मानकर आत्माओं की चर्चा दिखाकर लेखिका ने यह बताया है कि बलात्कार और शोषण की घटनाओं में कहीं कोई कमी नहीं आई है, सतत जारी है। यह शोषण घर परिवार और परिचितों द्वारा भी होता है, यहाँ तक कि सुरक्षा के तमाम उपकरण के बावजूद प्रेम के छलावे और विश्वासघात द्वारा भी हो सकता है। लेखिका ने इस कहानी में यह भी बताया है कि ऐसे दुष्कर्म और हत्याओं को कुछ संगठन सुर्खियों में आने का अवसर मानते हैं। बलात्कार पीडित मृत लडकियों की आत्माएँ समाज की सोच बताती है कि अब हम विमला, कमला, सरला,तरला या अबला नहीं बस मामला है। (पृ. 88) एक मामला जो अवसरवादियों के लिए लाइमलाइट में आने का अवसर है।
इस कहानी में दोहरी मानसिकता रखने वाली स्त्रियों का भी चित्रण है जो खुद रात एक बजे घर आती हैं, लेकिन किसी लडकी से बलात्कार होने पर सोचती है कि रात को नौ बजे घर से बाहर क्या कर रही थी। टीवी पर बैठकर स्त्रियों के कपडों व उनके समय को नियंत्रित कर पुरातन सोच थोपने तथा धर्म के नाम पर अनुचित को भी उचित ठहराने वालों पर व्यंग्य है।
इस संग्रह में प्रेम की कोमल भावनाओं पर आधारित कहानियाँ भी है। कुछ इश्क था, कुछ हम थे, कुछ थी यायावरी कहानी दृष्टिकोण के परिवर्तन से सोच बदलने की कहानी है। अनिकेत माँ की मृत्यु के बाद अपने पिता को हमेशा गलत समझता है, उसे लगता है कि उसके पिता उसकी माँ से प्रेम नहीं करते थे क्योंकि माँ के सीढियों से गिरने के समय वे बाहर चौपड खेल रहे थे। उसे लगता है कि शायद वे रोए भी ना हो। मधु मैडम अनिकेत का दृष्टिकोण बदलती है कि मृत्यु पर रोना प्रेम का प्रमाण नहीं। फिर वह याद करता है कि उसकी माँ की मृत्यु के बाद पिता अक्सर साडियाँ अलमारी से निकालकर, सहलाकर वापस सहेज कर रख देते थे और उस घटना के बाद पिता ने चौपड खेलना ही बंद कर दिया। यह कहानी स्वयं को झूठी दिलासा देने वाले अनिकेत की कहानी है जो जहाँ एक तरफ अपने पिता को गलत समझता है वहीं दूसरी तरफ झूठा सहारा खोजने के लिए सुरंगमा नाम की लडकी के नाम से स्वयं को पत्र लिखता है जबकि खुद उस लडकी से कभी बात भी नहीं कर सका। जिन तन लागा सो तन जाना के भाव पर आधारित कहानी जिसमें स्वयं के लिए प्रेम की तलाश और दूसरे के प्रेम को न समझ सकने का चित्रण है। प्रेम का सूक्ष्म धागा जिसे समझने के लिए भी सूक्ष्म और सकारात्मक दृष्टि की आवश्यकता होती है।
यह कहानी कपोल कल्पनाओं से जिंदगी की सच्चाई की ओर ले जाती है जो नकली प्रेम पत्र और पिता के प्रति गलत दृष्टिकोण को अंत में सच्चे पत्र और पिता के प्रति सही दृष्टिकोण के रूप में बदलती है।
एक बात कहूँ प्रेम के आवेग के उतार चढाव की कहानी है। इसमें राजलक्ष्मी सोनवणे नामक दलित कवयित्री और उसके प्रशंसक अबीर मिश्रा की कथा है। अबीर का जातीय संस्कार उसे बार-बार रोकता है, वह द्वन्द्व ग्रस्त है। उसे लगता है कि उसे उस लडकी से प्यार हो गया है पर कहना नहीं चाहता। वह लडकी जिससे मिलने के लिए कल तक मैं बेताब था आज उससे दूर जा रहा हूँ । (पृ. 85) उसने इस बात को भी स्वीकारा है कि मेरा मिश्रा मन सोनवणे पर जाकर अटक गया। (पृ. 85)प्रेम बनाम जातीय द्वन्द्व की इस कहानी में नकली बुद्धिजीवी और फैशन के नाम पर किताब पढने वाले पुरानी सोच के लोगों पर व्यंग्य किया गया है। अबीर स्वयं को ऐसे लोगों से अलग मानता है। इस कहानी में प्रेम के लिए आवरणहीन सच्चे स्वरूप को समग्रता में जानने की आवश्यकता बताई गई है। राजलक्ष्मी अबीर से कहती है आप मेरे कवि स्वरूप को ही जानते हैं ..... जिसे सुबह-सुबह बिना नहाए, बिना ब्रश किए देखने पर भी अच्छा महसूस हो वही असली जीवन साथी है। (पृ. 87)वह कहती हैं कि विचार मिलने से सुन्दरता और पहनावा गौण हो जाते हैं। (पृ. 87)उसका मानना है कि अच्छा आलोचक और पाठक वह है जो कवि को जज करने में जल्दबाजी न करे। परोक्ष रूप से वह प्रेमी के लिए भी यही मानती हैं और एक दूसरे को जानने -समझने के लिए बातें करना चाहती है। वह कहती है पेट भरा हो तो खूब सारी बातें की जा सकती है और देर तक। राजलक्ष्मी अधिकारपूर्वक अबीर का बैग उसके कंधे से उतार कर अपने कंधे पर टांग लेती है और इंतजार करती है। अबीर मन ही मन उसका नाम बार-बार दोहराता है। पहले अबीर बात करना चाहता है, इंतजार करता है और अंत में राजलक्ष्मी बात करना चाहती है और इंतजार करती है। प्रेम की कोमल भावनाओं की मनोवैज्ञानिक कहानी है।
तुम्हारे जवाब के इंतजार में कहानी में प्रिया अपने सहपाठी -जो अब एक आई.ए.एस अधिकारी है- को एक लंबा मैसेज करती है कि वह उसके विद्यालय में आकर दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों को परीक्षा के भय से मुक्ति हेतु व्याख्यान दे। इस कहानी में परीक्षा को लेकर आज के बच्चों और बच्चों से ज्यादा उनके माँ बाप के तनाव को दर्शाया गया है। बच्चों पर परीक्षा के दबाव को कम करने के लिए अपने व्याख्यान में वह कहता है कि मेरिट में आकर हमेशा डरे रहना कि आगे क्या होगा से बेहतर है पास आने लायक नंबर लाकर बिंदास जीना।
प्रिया को अपने कॉलेज के दिन याद आते हैं कि वह अभावग्रस्त लडका अपनी पृष्ठभूमि और अपनी कमियों को छुपाता नहीं था, उसने अपने संघर्ष को जारी रखा, सादगी और अभाव में जी कर वह अधिकारी बना, जबकि आजकल के बच्चों में अपने ही परिवार के बुजुर्गों के संघर्षों और किस्सों के प्रति अरुचि व अपनी पृष्ठभूमि छिपाने की प्रवृत्ति है। अपने बच्चों का जिक्र करते हुए वह अधिकारी अपनी दोस्त प्रिया से कहता है कि मेरे किस्से में मेरे बच्चों को भी दिलचस्पी नहीं है, वह मेरे संघर्ष और हमेशा साफ कह देने की आदत को मूर्खता मानते हैं, उन्हें खराब लगता है जब उनके दादाजी का जिक्र आता है।(पृ.112)
इसी प्रकार जो प्रिया उसकी हाजिर जवाबी के कारण बात करने से डरती थी। सुमित श्रीवास्तव जिसने उसकी पृष्ठभूमि का मजाक उडाया था। अंत में उस अधिकारी ने सुमित श्रीवास्तव व प्रिया के गले में अपनी बाँहें डाल दीं जैसे कोई वर्षों बाद अपना मिला हो। प्रिया मैसेज में प्रिय लिख कर औपचारिकता नहीं करती, मैसेज का जवाब पाकर खुशी से उछल पडती है,जब मिलती है तो उसे ही देखती रहती है। पुरानी पीढी के अनौपचारिक संबंधों का और वर्तमान पीढी में तेजी से हो रहे परिवर्तन का चित्रण किया गया है। पढाई का दबाव, पृष्ठभूमि को छिपाने और औपचारिकता के संबंध में पुरानी पीढी और नई पीढी के अंतर का चित्रण किया गया है।
लैफ्ट ऑवर ऐसे पुरुष की कहानी है जो सैंतालीस वर्ष का अविवाहित है। उसकी शादी नहीं हुई क्योंकि वह न तो कमाता था और न ही समझौता करना चाहता था।उसे मोटी लडकी पसंद नहीं थी। इस कहानी में तनेजा बेकरी की तनेजा मैडम हर गुरुवार को केक- पेस्ट्री आदि सामान की लेफ्ट ओवर(बचे हुए) सेल लगाती है। लोग हफ्ते भर का बचाखुचा माल इस सेल में खरीद लेते हैं ।
तनेजा मैडम का कथन उस व्यक्ति के लिए भी प्रेरक है मैं समझौता करती हूँ इसलिए सब बिक जाता है। समझौता दोनों ओर से होता है। जो लोग समझौता नहीं करते वे उन्नीस बीस के अंतर की ही बडी कीमत चुकाते हैं।(पृ. 78) कहानी के अंत में कीर्ति मित्तल जो उस लडके की सहपाठी रही है, उसे कभी बहुत पसंद थी और अब विवाहित है, कहती है चाहे जितना भी सस्ता मिले मैं लेफ्ट ओवर्स नहीं खरीदती। इस वाक्य को सुनकर उस लडके को लगता है जैसे वह अब लेफ्ट ओवर होने से भी चूक गया है। इस कहानी के माध्यम से पुरुषों की समझौता न करने और चयनकर्ता संबंधी सोच पर व्यंग्य किया गया है।
नीम हकीम कहानी में पिता राकेश कुमार मिश्रा और पुत्र सात्त्विक कुमार मिश्रा के बीच पाखंड के व्यवसाय को लेकर प्रतिस्पर्धा है। बाप बेटे दोनों का लक्ष्य एक है, लोगों को मूर्ख बनाना। राकेश कुमार मिश्रा मंगलवार को भावनाओं से खेलते थे बाकी पाँच दिन अपने मनोरंजन के लिए लोगों की सेहत से खेलने लगे। पिता पर मंगलवार को देवी की सवारी आती है तो बेटा सोमवार को नाडी परीक्षण कैम्प लगाता है।
बेटा सात्त्विक सोशल मीडिया का इस्तेमाल करता है,लाईक और सब्सक्राइब करने की ताकीद करता है। पिता को बराबरी न कर पाने की खीझ है। कहानी के अंत में राकेश कुमार मिश्रा भी व्यापार वृद्धि के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल सीखता है। सात्त्विक मिश्रा पिता की तरह धर्मार्थ नहीं, धर्म के लिए काम करते हैं। धर्म के काम में बहुत पैसा है वह जान चुके हैं। (पृ. 25)अधूरी जानकारी से लोगों का इलाज करके उनका जीवन खतरे में डालने वाले नीम हकीमों व देवी की सवारी, टोने-टोटके से हर समस्या का समाधान करने वाले पाखंडी लोगों पर व्यंग्य किया है।
ठेकेदार की आत्मकथा कहानी रिश्वतखोरी की समस्या पर आधारित है। रेलवे के ठेकेदार को अपना काम चलाने के लिए कदम कदम पर रिश्वत देनी पडती है। वह दोबारा ठेका लेने से इंकार कर देता है तो साहब कहता है तूने सब सेट कर दिया है, बहुत बढिया काम किया है। एक सिस्टम बना दिया है। सब तेरे को पहचानते हैं। दूसरे टर्म में ही तो कमाएगा। (पृ.60) फिर भी वह ठेका नहीं लेता। देश की जडों में बस चुकी रिश्वतखोरी का चित्रण किया गया है।
आकांक्षा पारे की कहानियाँ विस्तृत कलेवर की कहानियाँ है। स्त्री शोषण, स्त्री सशक्तिकरण, उनके आत्मनिर्भर होने से लेकर प्रेम और सामाजिक यथार्थ की सशक्त कहानियाँ है।

पुस्तक का नाम : एक पिघली हुई लडकी
लेखक : आकांक्षा पारे कोशिव
प्रकाशक : राजपाल एण्ड संस, नई दिल्ली
मूल्य : 175/-
संस्करण : 2020

सम्पर्क - 72, संत कृपाल नगर,
कृपाल आश्रम के पास, श्रीगंगानगर (राजस्थान)
मो.