fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

गाँधी विचार का नाट्य रूपान्तरण

दूलाराम सहारण
भविष्य की नींव इतिहास पर टिकी हुई रहती है। परंतु वह नींव मजबूत तभी होगी जब भविष्य इतिहास की घटनाओं, व्यक्तियों, गलतियों और उपलब्धियों से कुछ सीखने-समझने की कोशिश करे। अगर भविष्य अपने इतिहास के प्रति विश्लेषणात्मक दृष्टि न रखते हुए उसे अपना गौरव समझकर महिमा-मंडित करे और खामियों को दबाए रखने का प्रयास करेगा तब वह भविष्य वर्तमान की बौखलाहट बनकर रह जाएगा। इतिहास न पूजने की वस्तु है और न ही महिमा-मंडन की। वह तो निरंतर शिक्षा एवं शोध का एक विषय मात्र होता है। इसी परिप्रेक्ष्य में हम भारतीय इतिहास के दृष्टिकोण को देखें तो हमने अपनी ऐतिहासिक घटनाओं, व्यक्तियों के प्रति विवेचनात्मकता की बजाय पूज्य भाव अधिक बनाए रखा। यहाँ हम केवल तथ्यात्मक इतिहास की चर्चा कर रहे हैं। किसी कवि या उपन्यासकार द्वारा रचित और निर्मित काल्पनिक पात्रों या कथाओं का नहीं।
सामंती काल से लेकर राष्ट्रीय आंदोलन तक भारतीय घटना-परिदृश्य में अनेक महान व्यक्तित्व हुए। ऐसा नहीं है कि महान व्यक्ति हमेशा सही ही करता है गलतियाँ उनसे भी होती हैं। और उन गलतियों की आँच भविष्य पर भी जाती है। परंतु वही गलती भविष्य को सावधान और सचेत रखने का बडा काम करती है। कोई भी व्यक्ति इसलिए महान नहीं होता कि उसने हमेशा श्रेष्ठ किया हो। ऐसा नहीं होता। वह इसलिए महान होता है कि अपनी गलतियों, भूलों और गलत धारणाओं का सार्वजनिक रूप से विश्लेषण-विवेचन करता है। और सार्वजनिक रूप से ही अपनी कमजोरियों को स्वीकारता है। निजत्व से ऊपर उठकर सोचना ही उसकी महानता है। वह संग्रहण की बजाय विकेंद्रीकरण को अपनाता है। आदेश, निर्देश, उपदेश की बजाय करने में अधिक विश्वास रखता है। समाज की बजाय अपने जीवन को प्रयोगशाला बनाता है। अपने आत्म की रक्षा करते हुए भी स्वयं को दूसरों के लिए समर्पित कर देता है। समाज एवं देश-दुनिया के प्रति अपने-आप को सौंप देने के बावजूद भी वह एक व्यक्ति ही होता है और व्यक्ति का निजत्व भी बना रहता है। जो अपने आत्मसम्मान, परिवार के दायित्व एवं व्यवस्था के मानव-कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर सकता, वह दुनिया को क्या दे सकेगा? वह महान व्यक्ति जितना दुनिया का होता है उतना ही स्वयं का भी
किसी विवेचनात्मक दृष्टिकोण से जब भारतीय महान प्रतिभाओं का जिक्र होता है तो जहन में पहला नाम मोहनदास करमचंद गाँधी का आता है। इस व्यक्ति के जीवन पर बृहद् स्तर पर शोध हुए हैं, हो रहे हैं तथा भविष्य में और भी अधिक होने हैं। क्योंकि वर्तमाान वैश्विक परिदृश्य में सत्ताओं की बौखलाहट, धार्मिक मतान्धता के मध्य-नजर जो नफरत और द्वेष का माहौल बनता जा रहा है, वह गाँधी के विचारों की पूरजोर मांग कर रहा है। गाँधी-विचार केवल भारत को ही नहीं, पूरे विश्व को कुछ अच्छा देने की क्षमता रखते हैं। यही कारण रहा कि गाँधी के जीवन, विचार, कार्य पद्धति पर पूरे विश्व में विश्लेषणात्मक कार्य हुए हैं। शायद भारत से भी पहले, शायद भारत से भी अधिक अन्य देशों में गाँधी-विचारों पर यथार्थवादी दृष्टिकोण से लिखा और पढा गया है। लिखने-पढने के साथ-साथ गाँधी को देखने-समझने एवं जीवन में उतारने का प्रयास भी अन्य देशों में अधिक हुआ है। हाँ, भारत में भी हुआ। परंतु कुछेक प्रयासों को छोड दें तो या तो बहुत अधिक महिमा-मंडित किया गया या फिर नकारने का प्रयास किया गया। मूर्ति बनाकर पूजने के बाद तो गाँधी व्यक्ति नहीं, अवतार हो गए और उनके सरल विचारों का भारीपन केवल विद्वानों की पूँजी बनकर रह गया। जो व्यक्ति आजीवन सामान्यजन के लिए जीया, वह उससे छीन लिया गया और सत्ता के तमाशबीनों ने गाँधी को धर्मध्वजा के नीचे ला बैठाया।
विद्वानों की जटिल शब्दावली में फँसे गाँधी को समझने के लिए बहुत-सी सरल एवं सहज पुस्तकें भी हैं। उन्हीं पुस्तकों में एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक का नाम है- गाँधी हॉलाला। हंगेरियन रचनाकार नेमेथ लास्लो द्वारा रचित यह नाटक है। इस नाटक का गाँधी की मृत्यु नाम से गिरधर राठी एवं मारगित कोवैश ने हिंदी अनुवाद किया है। फ्रांसीस एवं हंगारी साहित्य के मेधावी छात्र नेमेथ लास्लो ने गाँधी का विशद् अध्ययन किया। गाँधी की आत्मकथा, रोम्याँ रोलां द्वारा संकलित गाँधी के निबंधों का भी अध्ययन किया। हंगेरियन विद्वान एरविन बॉक्ताइ एवं नेहरू की आत्मकथा के साथ-साथ अन्य भाषाओं के विद्वानों को पढा। जब गाँधी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सत्याग्रह एवं अहिंसा का प्रयोग कर रहे थे तब नेमेथ लास्लो उमडते हुए जोश वाले युवा थे। चोरीचोरा वाली घटना के वक्त वे बीस वर्ष के नौजवान थे।
बुदापैश्ता विश्वविद्यालय से चिकित्सा शास्त्र में अध्ययन करने वाले नेमेथ लास्लो पेशे से दंत चिकित्सक थे। और वे समकालीन राजनीति का परिमार्जन भी चिकित्सकीय दृष्टिकोण से करने की सोचते तब उनकी नजर सर्वप्रथम गाँधी के राजनीतिक दृष्टिकोण पर जा टिकती। उन्होंने सन 1924 में फ्रांसीसी भाषा में गाँधी के लेख पढे। तभी से वे गाँधी में रुचि रखने लगे। फासीवाद का प्रसार और हंगरी पर जर्मन आधिपत्य से गुजरते हुए उनके अंदर ‘गाँधी होलाला’ की रचना प्रत्रि*या शुरू हो गई।
नेमेथ लास्लो ने यह नाटक बडे निरपेक्ष भाव से लिखा है। महत्त्वपूर्ण यह है कि वे पूर्वाग्रह रहित होकर एक ऐसे व्यक्ति को खोज रहे हैं जो तीस करोड लोगों सहित देश की राजनीति को पावन कर देना चाहता है। दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुई एक यात्रा में सत्याग्रह के अनेक अध्याय जुडते गए। इस नाटक की शुरूआत बडे सहज तरीके से हुई है।
नई दिल्ली की भंगी बस्ती में गाँधी का आवास है। पृष्ठभूमि में एक साधारण-सा घर, हरिजनों के घर और बच्चे। न्यूयार्क हेरल्ड से पत्रकार फिशर का गाँधी के पास आना और टैक्सी ड्राईवर का आभिजात्य गुरूर। बडी सहजता से सभी की मानसिकता व्यक्त होती है। ऐसी शुरूआत वाला यह नाटक दो खंडों एवं तेरह दृश्यों में विभाजित किया गया है। बृहद् विषय को नाटकीय कथा-सूत्रों के माध्यम से रोचक दृश्याँकनों से बाँधा गया है। गाँधी जैसे विषय को एक निश्चित समय-सीमा में बाँधना नाटककार की क्षमता को दर्शाता है। नाटक में पात्रों की अधिकता होते हुए भी इसे एक सामान्य मंच पर दर्शाया जा सकता है। नाटक में सामान्य-सा घर या घर के किसी कमरे का दृश्य बना रहा है। प्रार्थना सभा और नोआखली की यात्रा आदि को नाटककार ने बडे ही सहज तरीके से मंचीय प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए रचा है।
गाँधी के राजनीतिक-सामाजिक जीवन में जिन पात्रों की भागीदारी रही, उनके समायोजन में बडी सावधानी बरती गई है। गाँधी के निजी सहयोगी प्यारेलाल, आभा, मनु आदि लगभग बदलते सभी दृश्यों में बने रहे हैं। और इनके बिना गाँधी-जीवन का दृश्याँकन शायद ही पूर्ण हो पाता। चूंकि नाटक गाँधी-जीवन के अंतिम पडाव या कहें कि भारत की गुलामी के अंतिम पडाव से शुरू होता है। अतः परिजन पात्र श्ाृंखला में नहीं जोडे गए। गाँधी के सबसे छोटे पुत्र देवदास एक दृश्य में जरूर आते हैं और इस महामानव के परिवार ने जो पीडा झेली है, उसका कुछ नमूना-भर व्यक्त हो जाता है, अनायास ही।
गाँधी के राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन में तो अनेक पात्र आए, परंतु कुछ पात्र राष्ट्रीय आंदोलन के चरम से होकर गुजरते हुए मुक्ति की साँस तक उससे भी आगे गाँधी-मृत्यु तक संवेदनात्मक रूप से गाँधी के साथ रहे। वे पात्र नाटक में सबसे बडी भूमिका निभाते हैं। गाँधी का बनना उन पात्रों के बिना अधूरा ही होगा।
नेहरू, पटेल, कृपलानी, राजगोपालाचारी, बिडला, लाडॅ माउंटबेटन, सुहरावर्दी, डॉ. जाकिर हुसैन, जिन्ना आदि पात्र गाँधी के राजनीतिक जीवन की पाठशाला से गुजरते हैं। वैचारिक मतभेदों के साथ नेहरू सबसे अधिक करीब बने रहे हैं। नेहरू ने किसी भी विचार को तब तक स्वीकार नहीं किया, जब तक वे उस पर पूर्णतया मनन नहीं कर लेते हैं। गाँधी-नेहरू में खूब बहस होती। दोनों के अपने-अपने विचार। और अपना-अपना तरीका। परंतु मंजिल एक। अच्छे और बुरे विचारों पर एक समान हां-जी, हां-जी करने वाले लोग गाँधी को पसंद भी नहीं। क्योंकि व्यक्ति अपने विचारों को साकार न कर सके तो नवनिर्माण कैसे कर सकेगा। तभी तो गाँधी ने पटेल जैसे आज्ञाकारी की बजाय नेहरू को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुना- नेहरूः जी हाँ! पटेल गाँधीजी के यस-मैन थे और मैं नो-मैन। और तब भी उन्होंने मुझे अपना वारिस नामजद किया। मेरा ख्याल है कि उनकी चमत्कारी अन्तरदृष्टि से ही ऐसा हुआ होगा, क्योंकि नये जमाने के लिए ऐसी खूबियाँ दरकार थीं जो कि किसी बूढे नेता में स्वभावतः ही नहीं पाटी जा सकती। ......गाँधीः जो कुछ हुआ उसके बावजूद मैं अपने चयन को सही मानता हूँ। (पृष्ठ-129)
राष्ट्रीय आंदोलन के अंतिम पडाव में जहाँ भारत आजादी की साँस लेने जा रहा था वहीं विभाजन का संकट और कट्टर धार्मिक मतांधता की हिंसा ने गाँधी को अपने सबसे बडे शस्त्र के बारे में पुनः सोचने को विवश कर दिया। विभाजन की त्रासदी और मनुष्य में सुप्तावस्था में पडी नफरत की इतनी वीभत्सव अभिव्यक्ति से गाँधी व्यथित होते हैं और कह उठते हैं- ‘‘गाँधीः नोआखली के जंगलों में भटकते हुए मुझे समझ में आया कि मुझसे क्या भूल हुई। मैं जिसको सत्याग्रह मानता था- यानी एक ताकतवर का सत्य से मोह- वह लाखों लोगों का निष्त्रि*य प्रतिरोध मात्र था, और कमजोरों की वह हिकमत उस वक्त तुरंत कायराना पशु-बल में तब्दील हो गयी जब उन्हें लगा कि वे काफी ताकतवर हो गये हैं।’’ (पृष्ठ-128)
गाँधी का भारत तो प्रेम का भारत था। जिसमें धर्म की नहीं, मानवता की बात होनी थी, परंतु कमी तो कहीं रह ही गई होगी। तभी तो कुछ मुट्ठी-भर लोग अपनी हिंसा को इतना विस्तार दे पाए। शायद वही विस्तार अभी तक रह-रहकर उठता है, कभी सीमा के इस पार और कभी उस पार। गाँधी समझा रहे थे- मुझे आप हिंदू के तौर पर मत देखिए जो आफ हितों पर चोट करने आया है। बेशक मैं हिंदू हूं, लेकिन मैं मुसलमान भी हूँ। (पृष्ठ-48) परंतु यह बात समझाने में शायद वे सफल नहीं हो पाए और परिणाम वर्तमान भारत की गोद में है।
जो गाँधी पूरे भारत को एक माला में पिराये हुए आजादी की लडाई लड रहे थे, अंग्रेजों की ताकत को अपनी लाठी से तौल रहे थे, वही गाँधी अपने ही देश की नफरत, हिंसा के आगे बेबस और लाचार नजर आ रहे थे। भारत की इस करतूत पर वे शर्मिंदा थे- ‘‘नोआखली के लिए बिहार, फिर बिहार के लिए पंजाब! कहां रुकेगा यह सिलसिला- थू थू करती दुनिया के आगे हम समूचे मुल्क को खून में डूबो दें। और तब उन तीन बडी ताकतों में से कोई भी- अंग्रेज या फ्रांसीसी या अमेरिकी- उन में से किसी को भी हक मिल जाएगा कि वो आएं और हमें कुचल दें। (पृष्ठ-52), और आज हम अमेरिका आदि की दादागिरी देख ही रहे हैं!
दरअसल गाँधी भारत के लिए एक व्यक्ति नहीं, एक विचार है। उस विचार की दरकार तब भी थी तथा आज भी है। और आज तो तब से भी अधिक महसूस हो रही है। केवल भारत ही क्यों, उस विचार की दरकार तो समय-समय पर पूरे विश्व को हुई है। विश्व ने गाँधी को अपनाया भी है। अफसोस तो इस बात का है कि भारत में गाँधी को केवल एक व्यक्ति के रूप में अपनाया है। विचार के रूप में उस तरह नहीं, जिस तरह अपनाना चाहिए था, शायद। नेमेथ लास्लो इस नाटक में गाँधी को उसी विचार रूप में स्वीकारते हैं और उस विचार को सांस्कृतिक अवस्थिति के आधार पर प्रवर्तित करने का सपना पालते हैं। गाँधी न हथियार है और न समझौता, गाँधी न ही तो राजनीतिक दांव-पेंच का मोहरा है और न ही पूज्य भाव के फूल चढाने वाली मूरत। गाँधी भूतकाल के मुंह से निकला वह सवाल है, जो वर्तमाना की मतांधता पर अंकित है। मनुष्य के भीतर बैठी नफरत न उस दिन कम थी और न आज ही कम है। उसी नफरत की गोली से वह बूढा शरीर ढेर हो गया था और उसी नफरत के वहशीपन में आज उस बूढे शरीर का भारत सवालों के घेरे में हैं। इन सवालों के जवाब तो भारत को स्वयं में ही खोजने हैं। गाँधी बडी उम्मीद से अपने भारत को कह रहा है- ‘‘चरखे का ये अर्थ बरकरार है कि हिंदुस्तान के सात सौ हजार गांव आत्मसजग और कर्मठ हो उठे हैं, और वे अपनी समस्याओं का खुद अपनी चेतना से हल निकालेंगे।’’ (पृष्ठ-31)
नेमेथे लास्लो का यह नाटक गाँधी को, गाँधी के विचार को तथा उम्मीद को नए तजरबे एवं नए दृष्टिकोण में व्यक्त करता है। गाँधी की मृत्यु विश्व के सामने टंगा हुआ वह सवाल है जो रह-रहकर पूछता है कि तुम्हें सीमाओं से घिरा हुआ जमीन का एक टुकडा चाहिए या फिर मानवता के प्रेम से सींची हुई भूमि, सामाजिक समरसता में बहती हुई नदी या संकीर्ण राष्ट्रीयता से मुक्त खुला राष्ट्र। गाँधी ने अपना सब दे दिया। अब चुनाव वर्तमान का है।
हंगेरिया नाटक का हिंदी में अनुवाद करते वक्त गिरधर राठी और मारगित कोवैश ने उन मूल भावों को बनाए रखा है जो नाटक के प्राण हैं। यह बेहतर अनुवाद एक लंबी साधना का परिणाम है जो कि नेमेथ लास्लो के उद्देश्यों को पूर्ण भी करता है। रजा फाउण्डेशन की महत्त्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत प्रकाशित ऐसी कृति का निःसंदेह स्वागत किया जाना चाहिए।
जो तुम कहो प्रशांत वी. श्रीवास्तव की काव्य कृति है। गीत, गजल, शेरो-शायरी से सजी यह पुस्तक बडी सुंदर और आकर्षक सज्जा में बंधी है। पुस्तक के सभी गीत या नज्मों से गुजरते हुए कहीं टटकेपन का आभास कहीं नहीं होता। पढते हुए हर बार लगता है कि यह शब्द, यह लय, प्रेम की यह पुकार इससे पहले भी हमने इसी रूप में सुनी है, परंतु कहाँ? और यह कहाँ हमें सोचने पर विवश करता है। कवि की प्रेम-पींग में इस सवाल का जवाब ढूंढने उतरा हुआ पाठक उस आशिक से मिलता है जो प्रेमी की एक झलक-मात्र पाने के लिए घंटों गली में भटकता है। वही पुरानी ठहरी हुई चिरोरी- मैं जमीं पे चाँद उतार दूँ/मैं आफताब बुझा दूं/मैं दो जहाँ की नेमतें/तेरे कदमों में झुका दूं/इस जमाने में आज से बस वो हो/जो तुम कहो, जो तुम कहो। (पृष्ठ-9)
रीतिकाल का वह सौंदर्य आसमान से उतरकर जमीन को रौशन कर रहा है। शायद कवि भागमभाग के इस जीवन में रीतिकाल का वही सौंदर्य जीवन में भर लेना चाहता है- कमर का छूती जुल्फों ने/दिशा बदल दी राहों की/जो देखे वो आह भरे/नींद उडी है निगाहों की/धूप के साये सी आँखें/आँखों में सुरूर है/तुम फकत कोई परी नहीं हो/कुछ खास तो जरूर है। (पृष्ठ- 37)
पूरे संग्रह में झलकता हुआ प्रेम है, सौंदर्य है, मर-मिट जाने वाला आशिक है, प्रेमी-प्रेमिका हैं, कल्पना का सुंदर संसार है, चारों तरफ खुशनुमा मौसम की बहार है, बस नहीं है तो केवल एक यथार्थ नहीं है। और पाठक को वर्तमान भागमभाग भरे जीवन में यर्थाथता की इस कटुता से निकलकर कल्पना के उस सुंदर उपवन में ले जाए, भले ही पल-भर के लिए क्यों न हो, परंतु यह उपकार तो है और बहुत बडा उपकार है।
प्रेम के जमाने तो हमेशा रहेंगे। भले ही चारों तरफ भूख का हाहाकार हो, या नफरतों का मंजर, प्रेमी तो हर हाल में प्रेम का गुल खिला ही लेते हैं। तभी तो वर्तमान वैश्विक परिदृश्य की धधकती आँधी में भी कवि प्रेम और सौंदर्य के शब्द चुन ही लेता है- वो गुलशन है, गुलजार है/वो मौसम है बहार है/क्या खूब हँसी वो लडकी है/जिससे मुझको प्यार है।/कोयल जो गाती है/वो गीत उसी का है/मौसम जो खिलते हैं/उसी से सीखा है।’’ (पृष्ठ-59)
प्रेम है तो संयोग है। और वियोग भी होगा ही। वियोग को भला कौन रोक पाया है? वियोग में याद और यादों में तडपन। तडपन पर तो कवियों का सदियों से अधिकार रहा है। बिछोह में प्रेम पकता है। निखरता है। तभी तो कवि वियोग में शुकून ढूँढता है- वो रुख्सत के पल आँखों में, आँसू ले आए थे/दिल चाहा रोक लें तुम्हें, पर रोक न पाए थे/है याद बिछडने का, वो आखिरी मंजर/दिल रो रहा था मेरा, भीगी थी सी नजर/दिल टूटा और रोया, तुम जो गए निकल/देंगे सहारा तुम्हें, ये तन्हाई में कल। (पृष्ठ-64)
पूरे संग्रह में कुछेक पल कवि का मन वर्तमान परिस्थितियों पर टिक जाता है। स्त्री के प्रति हो रही हिंसा की तरफ जब कवि की नजर जाती है तो पितृसत्ता से सवाल करता कवि कह उठता है- उसके मर्द होने का/सबको ही गुमान था/लेकिन यही धोखा था/के वो लगता इंसान था/अपने ही थे उसके जिन्होंने/उसे नामर्दी सिखाई थी/तालीम ऐसी ताकत की/उसने कहां से पाई थी। (पृष्ठ-67)
संग्रह का कवि मन पवित्र प्रेमी है। वह प्रेम को भावनाओं से छूना चाहता है। आँखों से पाना चाहता है। इस अशरीरी प्रेम में शरीर गौण रहता है। यह इस काव्य-संग्रह की उपलब्धि मानी जा सकती है। यह प्रेम के अल्फाजों की खासियत होती है कि वे सूक्ष्म धागों में बंधे मन को ठेस नहीं पहुँचाना चाहते हैं। पूरी पुस्तक से गुजरते हुए पाठक को कहीं भी प्रेम की सूक्ष्मता को ठेस पहुंचाने वाला एक शब्द भी नहीं मिलता।
कुल मिलाकर पुस्तक एक प्रेमी मन का दस्तावेज है। यहाँ जीवन-झंझावत तथा जगत गौण है। सब अच्छा ही अच्छा है। प्रेम में डूबे लोगों की शायरी की तरह। आईटी प्रोफेशनल युवा कवि का प्रस्फुटन है।
गाँधी की मृत्यु/नेमेथ लास्लो के हंगेरियन नाटक ‘गाँधी हॉलाला’ का हिंदी अनुवाद/अनुवादक- गिरधर राठी, मारगित कोवैश/प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली/संस्करण-2010/मूल्य-495 रुपये/पृष्ठ-167
.....
जो तुम कहो/कविता संग्रह/प्रशांत वी. श्रीवास्तव/नेशन प्रेस, चेन्नई/पृष्ठ-163, पेपरबैक/मूल्य-165 रुपये
....
सम्पर्क - दुलाराम सहारण, बडे पार्क के पास,
गाँधीनगर, चूरू-331001 राजस्थान