fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

समकालीन विदेशी कविता

लालटू (अंग्रेजी से हिन्दी रूपान्तर)
1. औरत कमाल
माया ऐंजलू

क्या है जादू मुझमें
हसीनाएँ सोचें
न मैं प्यारी लगती
न फैशन मॉडल जैसी
जो मैं कुछ बोलूँ
वो सोचें मैं हूँ झूठी

सुनो
जादू
मेरी खुली बाँहों में है
मेरे फूले कूल्हों में है
तेज-तेज कदमों में है
मेरे तिरछे होंठों में है
मैं हूँ औरत कमाल
मैं कमाल की औरत हूँ
जान लो।

मैं कमरे में आऊँ
कितना कूल दिख जाऊँ
तो मरद-मरद उठ जाएँ
या घुटनों पर गिर जाएँ

ये शहद ढूँढते भौंरे
चार तरफ मँडराएँ
सुनो
जादू
मेरे नैनों की लपट में है
दाँतों की चमक में हैं
कमर की लचक में
पैरों की थपक में है
कि मैं हूँ औरत कमाल
मैं कमाल की औरत हूँ
जान लो।

मर्द भी न जानें
क्या जादू है मुझमें
कोशिश में हैं हर पल
पर कभी न जान पाएँ
मेरे रूह की गहराई कभी न छूने पाएँ
जो मैं खुल कर भी आऊँ
तब भी न देख पाएँ

सुनो
जादू
मेरे पीठ की बलखान में है
धूप-सी मुस्कान में है
छाती की चढान में है
मेरे नाज-ओ-अंदाज में है
कि मैं हूँ औरत कमाल
मैं कमाल की औरत हूँ
जान लो।

जान लो
कि माथा मेरा झुका क्यों नहीं
मैं उछलती-चिल्लाती नहीं
जोर से बतियाती नहीं
गुजर जाऊँ मैं पास से
तो देखो मुझे नाज से
तो अब सुनो
जादू
मेरी एडियों की थापों में है
घुँघराते बालों में है

हाथ की हथेली में है
हसरतों परवाजों में है

कि मैं हूँ औरत कमाल
मैं कमाल की औरत हूँ
जान लो।

2. एक खास शख्स को नसीहतें
ऐन सेक्सटन

सत्ता से बचकर रहना
इसकी धसान तुम्हें दबोच लेगी
बर्फ, चारों ओर बर्फ तुम्हारी चट्टान को तबाह कर डालेगी।

नफरत से बचकर रहना
उसका मुँह खुला कि तुम पल भर में कोढी बनकर
अपनी टाँग निगलने को उडते रह जाओगे,

दोस्तों का ध्यान रखना
उनसे धोखा किया तो
और तुमने तो करना ही है
वे अपने माथे टॉयलेट में डाल देंगे
और फ्लश का पानी उन्हें बहा ले जाएगा

काबिलियत पर गौर करना
इसे क्या नहीं पता और फिर भी कुछ नहीं पता
यह तुम्हें उल्टा लटका छोडेगी
जब तुम्हारा जिगर फूटने को होगा
वह ज्ञान परोस रही होगी
ध्यान रखना खेल पर, अदाकार के छल पर,
सोची हुई, जानी हुई, तैयार की गई तकरीर पर
सब जान जाएँगे तुम्हें
और तुम एक नंगे बच्चे की तरह
अपने बच्चों वाला बिस्तर गीला करते खडे रह जाओगे

प्यार से बचना
(बशर्ते कि वह सच्चा न हो,
और पैरों की उँगलियों तक तुम्हारा जिस्म चीखता न हो कि यही है सच)
वह तुम्हें मिस्र की ममी की तरह लपेट लेगा
किसी को तुम्हारी चीखें सुनाई न देंगी
और तुम्हारी दौडभाग कहीं नहीं पहुँचेगी।

प्यार? वह मर्द हो या औरत
ऐसी लहर जरूर हो जिसमें तुम बह जाना चाहो
अपना जिस्म उसे दे दो, अपनी हँसी दे दो
जब पथरीली रेत तुम्हें लील जाए
जमीं को अपने आँसू दे दो। किसी और से प्यार करना
जैसे कोई प्रार्थना-सी है, और इसकी तैयारी नहीं की जा सकती
बस तुम इसमें डूब सकते हो क्योंकि तुम्हारी आस्था
तुम्हारी शंकाओं को उजागर कर देती है।
खास शख्स,
तुम्हारी जगह मैं होती तो मैं अपनी नसीहतों पर गौर न करती,
ये जो कुछ तुम्हारे और कुछ मेरे अल्फाज से बनी हैं
ये मिल-जुल कर बनी नसीहतें।

मुझे कुछेक को छोड कर अपनी कही किसी भी बात पर यकीन नहीं है
बस मैं तुम्हें एक ताजा पौधे सा मानती हूँ
जिस पर पत्ते चिपका दिए गए हैं और मैं जानती हूँ कि
तुम जड पकडोगे और असली हरापन उभर आएगा

छोड दो,
ऐ खास शख्स, हो सकता है कि तुम पत्ते हो,
तुम्हारा उन तक पहुँचना इस टाइपराइटर को पसंद है
पर यह चाहता है कि जब काला छिलका उखड गिरेगा
और तुम चारों ओर तरोताजा गुब्बारे सा तैरोगे
तब जश्न मनाते हुए यह तुम्हारे लिए काँच के ग्लास तोडे।

3. जो सबसे सख्त था
टेड ह्यूज

आँख को घुडसवारी में महारत थी
दृढ, गर्वीला और खूँखार।
उसने धरती के उन जलजलों पर लगाम लगाई, जो
सब कुछ सुन रहे थे,
उसने उसकी उभरी बंदनजरी को उकसाया।

पर जब बिजली आस्मान से गिरी
अपने बैंगनी खयालों में उछलती धरती मछली-सी अपनी बुनियाद से हिली
कसमसाती आँख को खोपडी में धकेला

वह बच गई
जबकि मंदिरों के कलश न बच पाए।

नारंगी काई के पास कहीं
आँख वापस लौट आई।
ऐसे में कान दूर तक फैल गए
जहाँ तमाम बाहरी अँधेरे की हँसी
खोपडी में अपने दाँत गडने की धमकियाँ दे रही थी
और मुँह ने जहन को पिघलाती धूप के टुकडों को चबाया।

प्याले में पानी पीते हुए, संजीदे संगत में संजीदा रहना,
समंदरों को अपनी सरहदों पर समझौते करने देना,
साफ चाँद, और तमाम बाहरी अँधेरा
जो कि अंदर सिमटा हुआ अँधेरा ही है

बेइंतहा रोने
और टापुओं का खत्म होते जाना देखना
क्योंकि और कुछ भी देखने का काम नहीं कर सकता
अकेले ही सवालों के भूत को
शक से भरे खौफ तक ले जाना -
आस्मां के खाली नक्शे में पढना कि तारे पत्ते की उम्मीद भरी रोशनी में मौजूद हैं।

4. परेशान एक दूसरे से पेश आते हुए
मार्ग*ेट ऐटवुड

परेशान एक दूसरे से पेश आते हुए
हम अपनी बातों को साफगोई कहते हैं
अपने पैने सच
सावधानी से चुन फेंकते हैं
निरपेक्ष मेज पार।

जो बातें हम कहते हैं, वे सच हैं
हमारे निशानों में ही होतीं तिकडमें
जिनसे वे खूँखार बन जाते हैं।

सच है कि तुम्हारे झूठ
ज्यादा खुशगवार हैं
हर बार नए जो ढूँढ लाते हो
तकलीफदेह और ऊबाऊ तुम्हारे सच
बार-बार कहे जाते हैं
शायद इसलिए कि उनमें से बहुत कम हैं
जिन्हें तुम मानते हो कि तुम्हारे हैं

सच जंदा तो है
पर इसका ऐसा इस्तेमाल
गलत है। मुझे प्यार है तुमसे

यह सच है या औजार?

इस तरह हिलते-डुलते
क्या शरीर झूठ बोलता है
ये स्पर्श, केश, यह गीला संगमरमर
जिसपर मेरी जीभ दौडती है
क्या ये झूठ हैं जिन्हें तुम कह रहे हो?

तुम्हारा जिस्म कोई लफ्ज नहीं
यह झूठ नहीं कहता
सच भी नहीं कहता

बस मौजूद है यहाँ
या मौजूद नहीं है।

5. किनारा
शाना बुल्हान हेडॉक

लहरों
के पार

दूर
मैंने
दूर नजर फैलाई

रेतीले
किनारे पर
पत्थर
कोयले की तरह चमकते हैं

धूप
में गर्मी है

मुझे
नहीं एहसास
मुझे
तीखे कंकडों का भी नहीं एहसास
खडी
हूँ बस

जमीं
का विस्तार देखती हूँ।

6. वह और बाग
शाना बुल्हान हेडॉक

वतन उसका
वह गुलाबों का बाग
उसका जिस्म खडा है
लंबा, सीधा, स्थिर, साफ
हवा में
उसके बाल चमकते
कौन है वह?

नहीं जानती
मैंने दो बार देखा उसे
हमेशा वहीं होगी
गुलाबों के बाग में।



7. परी कब दिखती है?
शाना बुल्हान हेडॉक

वतन उसका
कभी जब अँधेरा होता है
जब सूरज छिप गया होता है
और चाँद आस्माँ में दिखता है
जब झींगुर की सरगम चलती है
और उल्लू हूकते हैं
जब भेडिए चीखते हैं
और बिल्ला मियाऊँ कहता है
जब हर ओर काला काला होता है
और शक्लें पहचान में नहीं आती हैं
तब दिखती है चाँदपरी।

8. मैं सोचती रहती
शाना बुल्हान हेडॉक

वे कोशिश करते और कुर्सी की सीट खींच ले जाते
और कहीं छिपा आते;
मैं अजीब खयालों में उनकी तेल चुपडी सुंदर चोटियों को काट डालना चाहती;
मैं सोचती रहती कि कब ऊपर जाऊँगी
उस घुटन भरे तहखाने से कब निकलूँगी;
और वे खुश हँसते, चीखते, चिल्लाते
और मैं अजीब चीजों के बारे में सोचती रहती
और जब दूसरे बच्चे खेलते
मैं ऊबाऊ उपन्यास लिखती रहती।







9. दंडित
शाना बुल्हान हेडॉक

सजा प्यार करने की
जीने की चाह की, मरने की चाह की
अपनी बात कहने की, जो हूँ वह होने की
अलग होने की, सुनने की
हाथ बढाने की, कोई होने की
दौडने की, दौडने की, दौडने की
सौ गोलियाँ निगलने की
सवाल करने की, खेल खेलने से मना करने की
देख पाने की चाह की, सीखने की चाह की, बढते रहने की चाह की
प्यार करने की चाह की, प्यार में होने की
अवसाद की, बिगडने की, टूटने की
अच्छा माने जाने की, सच/झूठ सब कहे जाने की

दंडित।

हल्के दर्द-सी, फूली ग्रंथि-सी
तस्वीर-सी, मुस्कान-सी, हँसी-सी, आँसू-सी
सपने-सी
जो नहीं, कभी नहीं परखा जाएगा
ऐसे सवाल-सी।
दंडित।

सजा जीने की चाह की,
न जानते हुए चाहने की
अनिश्चित होने की
कोई सुने यह चाहने की
रोने की, मुस्कराने की, हँसने की
गुम होते जाने की

दंडित।

सजा
जीने की चाह की।

10. सुबह
शाना बुल्हान हेडॉक

सुबह अंधेरे और उजाले
से मिल कर बना छल है
जैसे कोल्ड कोको होता है
और पीने पर
तीखा हो सकता है या मीठा भी
तुम्हें कोशिश कर जानना पडता है
और कभी कोई स्कूटर स्टार्ट होता है
हो सकता है कि बारिश हो रही हो
या धूप खिली हो
या कोई कुत्ता भौंक रहा हो
और हम नया-नवेला इंसान बन जागते हैं
और हो सकता है कि अब स्कूल जाना हो
या नहीं जाना हो
सुबह तो है
नई सुबह
जैसे किसी भी दिन होती है।


सम्पर्क - प्रो. एच.सिंह
इन्टरनेशनल इंस्ट्टियूट ऑफ
इन्फोरमेशन टेकजेलॉजी, गाची बावली,
हैदराबाद - ५०००३२, मो. ९९६६८७८०६३