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राग-विराग-अवसाद

राकेश कुमार मिश्र
इस खंडहर मकान के देह के कोनों में शाम उतरने लगी है। शाम होते ही एक धुंध, एक थकान हावी हो जाती है। दिनभर घूमता ही रहा। लिखने का कोई खास मन नहीं कर रहा। पर लिखना अच्छा लग रहा है। सुबह उठते ही हिंदी की महत्त्वपूर्ण लेखिका लवलीनजी की डायरी पढी जो नया ज्ञनोदय के जनवरी-2009 के अंक में छपी है। पढते ही उन्हें पत्र लिखा। बिना संबोधन का शायद पहला पत्र। शाम पसरने लगी है। और भीतर की बेचैनी बढ रही है।
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शाम। धुंध। थकान। सडक। चुप्पी। इच्छा। सपनें। लोग। किताब। विचार। फैक्ट्री। सुबह। शाम। मौत। डर। कविता। मुक्ति। आशा। सवाल। दौड। दौडता मैं। हाँफता मैं। गिरता हूँ। फिर उठता हूँ। पर खुद को सँभाल नहीं पाता। कोई हँसता है मुझ पर। सार्त्र मेरे साथ खडे हैं। क्या मैं सार्त्र हूँ? या सार्त्र का कोई विचार? Other is hell. माँ बोल रही है। रोज बोलती है। आज ठण्ड कम है।
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गलती से चेखव की एक कहानी पढ ली है। आज का दिन इसी कहानी के पीछे गया। दिन तो खराब नहीं हुआ, पर मन बहुत बेचैन हो गया है। चेखव की प्रसिद्ध कहानी वार्ड न. 6। रघुजी के खजाने से ये कहानी मिली है। कुछ दिनों पहले भाई राजपाल लेकर आए थे। लम्बी कहानी है। पर बहुत ही दुखद और हैरत में डालने वाली। उनके गुरुदेव सत्यनारायणजी ने राजपाल को इस कहानी को पढने से मना किया था। पर वो आधा पढ गए थे। डर कर छोड दिया बीच में ही। अरे यार! लगा कि मैं भी पागल हो जाऊँगा...। निहायत ही बौद्धिक कहानी। पर बिल्कुल भी बोझिल नहीं। चेखव अपने समय के गहरे विचारक भी हैं, जो जीवन के भीतर बहुत गहराई तक जाते हैं। जिनकी आँखें उन जडों तक पहुँचती हैं जहाँ सिर्फ अंधेरा है। काला अंधेरा। कहानी के कई दृश्य बहुत निर्मम और कठोर हैं। दिल दहल जाता है। आप खुद सामान्य नहीं रह पाते। चींजों का प्रभाव अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग। दृश्यों का प्रभाव भी सभी पर एकदम भिन्न। इस कहानी में एक कोहराम है। जो घर में, घर के बाहर और देश में चल रहा है। पागल इवान डॉक्टर आंद्रे से पूछता है, तो, इस बीच बस्ती, देश-दुनिया में क्या हुआ। डॉक्टर आंद्रे जवाब देते हैं, बस्ती में पहले भी जीवन नीरस था और अब भी है। एक भी आदमी नहीं है, जिससे अपनी बात कही जा सके। या किसी को सुना जा सके। सबकुछ नीरस। इवान आगे पूछता है, और इन दिनों देश-दुनिया के पत्र-पत्रिकाओं में क्या छप रहा है? डॉक्टर आंद्रे जवाब देते हैं, सभी अपनी-अपनी विचारधारा को लेकर रूढ हैं। उसे ही अंतिम मानते हैं। डॉक्टर आंद्रे को बीस साल के अपने नौकरी में एक ही समझदार दोस्त मिला, जो उनके बौद्धिक स्तर का था। और वो दोस्त पागल इवान था। कहानी के अंत में डॉक्टर आंद्रे की मौत हो जाती है। डॉक्टर आंद्रे के मौत से पहले के दृश्य मुझे लगातार परेशान कर रहे हैं। ये कहानी मेरे बहुत करीब आकर खडी हो गई है। इस कहानी को पढने के बाद कहानी विधा से एक खास लगाव पैदा हो रहा है। खैर, फिलहाल घर में कलह शुरू हो गया है।
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कौन होता है ड्रीम मैन? सिर दर्द हो और जो भागकर केमिस्ट से गोलियाँ ले आए, वह लडकी का ड्रीम मैन होता है। तुम्हें देखा। पहले विस्मय फिर विभोर हो गई। जब प्यार हो तो हम एक बंद नगर में चले जाते हैं रहने के लिए। तुमने मेरी आत्मा को फूल की तरह खिला दिया। मेरी आँखों में बारिश में भीगा पेड उग आया। जी चाहता गरुड बन जाऊं, पंखों में शक्ति भर आसमान के आखिरी सिरे तक उड जाऊँ, फिर नीचे डाईव बॉम्बर की तरह तुम्हें पकडूँ और उठाकर अपने घोंसले में रख दूँ। - स्वदेश दीपक के नाटक सबसे उदास कविता से।
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अंग्रेजी पढना और अंग्रेजी में सोचना किराये के मकान में रहने जैसा है। एक असुरक्षा लगातार बनी रहती है। इस किराये के मकान से मुझे कभी भी निकाला जा सकता है। लेकिन मुझे असुरक्षा में रहने का लम्बा अनुभव है। यानी किराये के मकान में रहने का लम्बा अनुभव है। इसलिए इस असुरक्षा की आदत पड गई है। पर हिंदी मुझे अपना असली घर लगता है।
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इस दुनिया में जितनी भी सुन्दरता है उसमें हम सभी का हिस्सा है। कम से कम हम दोनों तो उस सुन्दरता पर बात करें। कम से कम हम दोनों तो उस सुन्दरता पर कुछ देर ठहर कर सोचें। क्यों ना हम एक भरी दोपहरी बस बैठे रहें और समय को साफ पानी की तरह बहते हुए देखें। या एक खाली शाम को चाय के प्याले के साथ शाम को लगातार अपना रंग बदलते हुए देखें।
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एक साजश के तहत ढेर सारे शब्दों के अर्थ स्थाई किये जा रहे हैं। कुछ समझदार और ताकतवर लोग चाहते हैं कि हम भूल जाएँ किसी शब्द से जुडे हुए ढेरों छाया, आवाजें, रंग, उम्मीद और कई दुनिया। वो चाहते हैं की हमें लाल शब्द के बारे में सोचते हुए सिर्फ खून के धब्बे या कफन याद आए। कोई फूल, किसी दोस्त की कमीज या किसी लडकी का पुराना स्वेटर याद ना आए। वो इस दुनिया में इतनी हिंसा और घृणा भर देना चाहते हैं कि हम किसी शब्द की आदिमता और सम्भावना तक पहुँच ही ना पायें।
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लडकी- कैसा लगता है इन दिनों तुम्हें ?
लडका- ऐसा लगता है कि जंदगी और मौत के बीच में कहीं फंस गया हूँ। ना जी पा रहा हूँ और ना ही मर पा रहा हूँ।
लडकी- ये कब से लग रहा है तुम्हें?
लडका- कुछ दिनों पहले किसी ने मेरे ऊपर बिना हथियार के हमला किया। उसने सिर्फ कुछ शब्द इस्तेमाल किए थे और उसी समय से मैं थोडा-थोडा मर रहा हूँ।
लडकी- इस धीमी मौत के बारे में क्या तुमने किसी को बताया?
लडका- नहीं। इस तरह से धीरे-धीरे मरना पुनर्जीवित होना भी है। लगातार मरते हुए जंदगी का मतलब थोडा ज्यादा समझ में आता है।
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लडकी- इन दिनों उदास क्यों रहते हो?
लडका- मुझे लगता है कि मैं बहुत कुछ देख और सुन नहीं पा रहा हूँ। इसलिए कई बार उदास हो जाता हूँ।
लडकी- इसके पीछे कोई कारण है क्या?
लडका- मुझे लगता है की मेरे आँख, नाक, कान ने सोचना शुरू कर दिया है। सोचने का काम पहले सिर्फ दिमाग करता था। लेकिन अब शरीर के लगभग सारे अंगों ने सोचने का काम शुरू कर दिया है।
लडकी-इसमें बुरा क्या है?
लडका- आँख का काम देखना और दिखाना है। सोचना नहीं। कान का काम सुनना है। नाक का काम सूँघना। लेकिन अब ये सारे अंग अपना काम भूल गए हैं और इन्होंने सोचना शुरू कर दिया है। मेरी जंदगी में दिमाग की दखलंदाजी बढती जा रही है। ये दुखद है।
लडकी-पर ये कैसे हुआ होगा ?
लडका- शायद इस विचित्र समय के कारण।
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"I believe the whole universe partakes in an individualÓs pain. Poetry will survive as the symbol of hope. It is the hope of what has no hope. It is the love of what has no love. Like death, poetry was born with human and will die when the last of the beings contemplates the last of the sunsets". ~ Contemporary Latin-American poet Raul Zurita at Kochi-Muziris Biennale (KMB)
आज फिर से निर्मल वर्मा को पढकर सुकून मिला। उनकी लम्बी कहानी कव्वे और काला पानी पढा। क्या निर्मल वर्मा को पढने का एक तरीका ये हो सकता है कि आप कई दिनों तक भूखे रहें। अन्न, जल और वायु से दूर रहें और फिर निर्मल वर्मा को पढें। मुझे लगता है कि निर्मल वर्मा को पढते हुए आपको अन्न, जल और वायु, तीनों मिलता है। निर्मल वर्मा का साहित्य अमृत-मंथन से निकला साहित्य है। निर्मल वर्मा की हर कहानी वेद की किसी सूक्ति की तरह लगती है, जिसका अर्थ खोजने में शायद पूरा जीवन निकल जाए। अपने तमाम अबोलेपन और अनकहेपन के बावजूद निर्मल वर्मा उस पीडा को हमारे सामने रख देते हैं जो हमें मनुष्य होने के कारण भोगनी पडती है। हमारी गलती सिर्फ इतनी है की हम मनुष्य हैं। हमारा एक देह है और ये देह इस संसार से जुडा हुआ है।
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हमारे भीतर एक हिस्सा है जो सिर्फ और सिर्फ महसूस करने का काम करता है। वो हिस्सा तर्क नहीं करता। सिर्फ महसूस करता है अपनी पूरी आदिमता के साथ। कविता या कोई भी कला उसी हिस्से की उपज है। कवि होना इस पृथ्वी को पूरे आश्चर्य से देखना है। ठीक उस मनुष्य की तरह जो पहली बार इस पृथ्वी पर आया था। कविता के आधार में भावुकता है। कवि होना एक खास तरह के भयंकर बीमारी के साथ जीना है। इस जानलेवा बिमारी को पालना या इस बिमारी के साथ जीना किसी भी कलाकार के लिए आसान नहीं रहा होगा। हर ईमानदार कलाकार अपने समय का आखिरी कलाकार होता है। किसी लुप्त हो रही भाषा की तरह या लुप्त हो रहे किसी नृत्य की तरह। कविता से जुडी ईमानदारी और मेहनत से अब भी कोसों दूर हूँ। पर इस भयंकर बीमारी के साथ जीना अच्छा लगता है। इसमें मुक्ति भले ना हो मुक्ति का भ्रम तो है।
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अनुवाद का काम एक तरह से प्रार्थना है उस अज्ञात शक्ति से की हे ईश्वर! हम अपने अहम से बाहर आ पायें। किसी से जुड पायें। किसी को सुन पायें। किसी को अपने आप को सौंप पायें। किसी दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार कर पायें। ये स्व का धीरे-धीरे विलोप होना है और पर का स्वागत है।
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हम सभी अपनी इच्छाओं के साथ बहुत अकेले हैं। कोई कभी नहीं जा पाएँगा हमारे मौत का कारण। वो लोग मौत का निशान हमारे शरीर पर खोजेंगे, पर हम हजारों साल पहले ही उदासी के कारण मर चुके थे। अब सिर्फ अजन्मी कविताएँ या अजन्मे बच्चे ही हमें बचा सकते हैं। उन लोगों ने हमेशा चाहा कि हमारी इच्छाएँ बूढी हो जाएँ। हम सरकारी फाइलों जैसी जंदगी जीना शुरू कर दें। पर फिर भी हमने अपने भीतर किसी गूँगे बच्चे की हँसी और किसी अपाहिज औरत का बचा-खुचा साहस बचा लिया है। हमारे होने या ना होने से इस दुनिया को कोई फर्क नहीं पडने वाला। ये दुनिया तभी तक है, जब तक हम इसे देख पा रहें हैं।
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Writing is all about process of friendship with 'nothingness'.
कला को जीने का समय सबसे महत्त्वपूर्ण समय है। इसका मतलब ये नहीं कि कला के दूसरे क्षणों का महत्त्व नहीं है। कला की तैयारी मुझे कला के सम्प्रेषण से कहीं ज्यादा आकर्षित करती है। मेरे लिए कला की तैयारी का यह मतलब नहीं है कि किसी कला या अपने काम पर बहुत व्यवस्थित होकर काम करना। पर इसके बजाए कला के हर छोटे से छोटे हिस्से को जानने की कोशिश करना। जब कोई भी कलाकार काम करना शुरू करता है तो ये देखना दिलचस्प होता है कि वो किस तरह से अपने काम के हर छोटे और मामूली हिस्से को जानने, समझने और बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा है। चाहे कला का कोई भी माध्यम हो, सृजन का सुख और प्रसव पीडा दोनों ही जीवन भर किसी कलाकार के साथ रहता है। कला के सम्प्रेषण के बाद कला कलाकार के हाथ में नहीं रह जाती। कला का सम्प्रेषण कला की विदाई भी है। अपने कला का सम्प्रेषण करते समय कलाकार अपने कुछ निहायती निजी अनुभवों को विदा कर रहा होता है, इस भरोसे के साथ की शायद इन अनुभवों को कोई जानने, समझने और हिस्सा बनने की कोशिश करेगा। कल सत्यजीत रे की अप्पू ट्राइलॉजी देखने की बाद घंटों कला की तैयारी वाले पक्ष पर सोचता रहा। कला सम्प्रेषण का जीवन कितना छोटा है?
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कला बोध से अबोध की यात्रा है। कला के साथ रहने के लिए बोध से ज्यादा अबोध होने की जरूरत है। अबोधपन वो स्थिति है जिसमें ये एहसास लगातार बना रहता है कि मुझे क्या-क्या नहीं पता। और मैं कितना कम जानता हूँ। बिना अबोधपन के कला के साथ नहीं रहा जा सकता। बोध का भाव कुछ-कुछ संतोष की तरह लगता है। पर यह भटका भी सकता है। अबोधपन ही असल में किसी कलाकार को बचाए रखता है।

सम्पर्क : C/O अशोक भाई पटेल,
सी-3, संतोष नगर,
एम. एन. कॉलेज रोड, विसनगर,
जिला-मेहसाणा, गुजरात (384315)
मोबाईल : ०८७५८१२७९४० ईमेल : rakeshansh@gmail.com