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नौ कविताएँ

मनोज कुमार झा
फल

आप मेरा कुछ बिगाड नहीं सकते
बडी लम्बी यात्रा तय की है मैंने
एक बीज से वृक्ष तक
अधिक से अधिक आप मुझे काट सकते हैं
मगर कटना तो वृक्ष का फल है
चिता में लगाएँ या घर में
ढेरों पक्षी हैं मेरे साथ
फैलाने के लिए मेरे बीज को
रोने के लिए मेरे कट के गिरने पर।


दुर्योग

माँगने के लिए फैला हुआ हाथ
ठीक विलोम है
बच्चे की मालिश कर रहे हाथ का।
मगर क्या दुर्योग था कि
एक हाथ फैला
फिर सरसों तेल आया
फिर मालिश हुई।

प्रमाण

एक बार मुझे चोर ना होने को
प्रमाणित करने के लिए कहा गया।
मैं छोटों से मिला
बडों से मिला
मझोलों से।
फिर एक चोर मिला
उसने कहा
दिल्ली जाओ
वहाँ एक सीढी मिलेगी
चढते जाना उस पर
ऊपर और ऊपर
फिर कोई दिव्य पुरुष मिलेगा
वह जो कहे याद कर लेना
उसे नीचे आकर प्रचारित करना
फिर तुम्हारे चोर ना होने का प्रमाण पत्र
तुम्हे मिल जाएगा।

दुख-कथा

दुख की घडी बीतती नहीं
यह घडी नहीं एक
दुख रिसता रहता है
ज्यों देह से पसीना ।
शाम को लौटते हो
अँधेरी गली को
पार कर पहुँचते हो कमरे तक
थोडी रोशनी में देखते हो ताला
फिर याद आता है भूल गया चाबी चाय की दुकान पर
थोडा ठकमकाते हो
फिर सोचते हो
थोडी और देर लोगों के बीच बीतेगा
लौटते हो पीछे
देह से रिसता है पसीना
आगे की कथा हर दुखियारा जानता है।

एकांत

तुम्हारी मृत्यु देखूँ, तो सिर्फ तुम्हारी मृत्यु देखूँ
तुम्हारे बच्चे नहीं, परिवार नहीं
पशु नहीं, पक्षी नहीं
सुबह नहीं, शाम नहीं
दिवस नहीं, रात्रि नहीं
जल नहीं, अग्नि नहीं
सिर्फ तुम्हारी मृत्यु
और मुझ पर पडती उसकी छाया।

जमीन से रिश्ता

कितनी बार कहूँ--यहाँ का हूँ
तो यहाँ का माना जाऊँगा
पाँच बार या एक सौ आठ बार?
कितनी चिताएँ दिखाऊँ, कितनी कब्रें
पूर्वजों की।
रिश्ते की कितनी दादियाँ दिखाऊँ, कितनी चाचियाँ, कितनी बहनें?
क्या रसखान से रिश्ते दिखाने पर नहीं मानोगे
कि मेरा रिश्ता इस अजीम मुल्क से है?
क्या-क्या दिखाऊँ
यहाँ के अमरूद पर मेरे दाँतों के निशान
या मेरे कपडों पर यहाँ के जामुन के दाग?
कहने से क्या होता है, मगर
कागज दिखाओ -भी तो सबसे पहले कहना ही है।
घर और पीपल

हर बार निकलता है
घर से
हर बार रोक लेता है यह पीपल का पेड
पक्षियों का कलरव
झूलने लगता हूँ इसके वायवीय जडों को पकड कर
कभी यहाँ आकर चाँदनी में गायब हो जाती है बेचैनी
तो कभी अँधियारे में धुल जाता है अकारण क्रोध
तो कभी मन को शीतल कर देती है इसकी छाँह।

तो क्या घर से इस पीपल के लिए ही निकलता हूँ
निकलता तो हूँ कहीं सुदूर अज्ञात के लिए
लेकिन इतनी बार लौटा हूँ यहाँ से
कि कई बार शक होता कि यहीं तक के लिए तो नहीं निकलता।
एक ही तो रास्ता है बाहर जाने का
एक ही तो स्थान यहाँ बचपन में खेलने थे
एक ही तो इतने जीवों का बसेरा
एक ही तो पुल घर से अज्ञात यात्राओं तक।

क्यों लौट जाता हूँ वहाँ से
कौन बाँध देता है पाँव में ऊखल
कौन फेर देता है सिर पर हाथ
कौन लिख देता है चित्त पर कि घर लौटो?

क्या हर आदमी के पास एक पीपल होता है
जहाँ से वह घर लौट जाता है?
हर आदमी का क्रोध कहीं आके थम जाता है
कहीं थिर हो जाती है बेचैनी
कितना अच्छा हो कि हर आदमी के पास हो एक पीपल
और उससे भी पहले सब के पास हो एक घर।


मजूर

वह जब गाँव पहुँचा काँटों को धाँगता
पथरीले पथों पर मिट्टी करता

(करता रात दिन एक
जिसके पेट पीठ एक)

तो ओसारे की मिट्टी को लिलार से छुआ
जैसे खेत से लौटे बैल नाद को छूते हैं

खूँटे में फिर बंधेगा
रसी फिर कसेगी


उपरांत

पूरी ईख चूस लेना
जूते की पालिस कर लेना
बच्चों को होमवर्क करा देना
ताश की बाजी खत्म कर लेना
फिर आना मेरी अंत्योष्टि में
मन हो तो

हर दोस्त मरने के बाद लाश ही तो है!


सम्पर्क : सुरेश कुमार मिश्र,
दीवानी तकीया कथालवारी,
दरभंगा, बिहार ८४६००४,
मो. ७६५४८९०५९२