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दस कविताएँ

ध्रुव शुक्ल
तन की आँच का सहकार

जितने हो, वही बने रहो
बहुत होने की इच्छा ले डूबती है
कोई नहीं उठाता किसी का भार

अपने-से कम मत रहो
न ज्यादा हो जाओ अपने-से
पैदा होते हैं इसी से
गुलामी और अत्याचार

किसी डाल से टूटकर गिरा है जीवन
अधफ फल-सा
उसे चाहिए तन की आँच का सहकार
कोई आश्रय नहीं
परस्पर आश्रित है संसार

कामनाओं का कारोबार
जीवन से दूर उडाये जाती विषय-बयार
ठहर जाती है फिर उसी डाल पर
गिरा देती है उस अधफ फल को
जिसे चाहिए तन की आँच का सहकार

मजहबों को समझ नहीं आया
इतिहासकारों को भी
समझ नहीं आ रहा सत्य का आधार
वे कह रहे हैं...
सत्य के बाहर है आदमी का घरबार
ार देखने की फुर्सत
बहुत करीब से घर देख रहा हूँ
चुनौती ही ऐसी मिली
घर से बाहर नहीं आ सकता
आग का छप्पर साधे
पृथ्वी के किसी कोने में रखे
खाली घडे जैसा
मन के चाक पर घूमता घर
घडे के जल में
दिन भर बैठा रहता है सूर्य
रात को चन्द्रमा
अँधियारे पाख में अंधेरा
परछाइयाँ नाचती हैं सबकी
इस घर में
ऋतुकाल में बसा हुआ है घर
उतर आते हैं मेघ
छा जाती है गहरी धुंध
व्याकुल रहते हैं रंग
प्रकट होने के लिए
इतने बडे खेत जैसे घर में
क्या बोऊँ, क्या काटूँ
घर से बाहर आकर
किसको जीतूँ, किससे हारूँ
इस घर से बाहर कोई घर हो
तब ही बाहर आऊँ
चुनौती ही ऐसी मिली
घर से बाहर नहीं आ सकता
सामूहिक भय में बसी है मृत्यु

हिरनों के झुण्ड पर दबे-पाँव
झपटता है सिंह
अकेला करता है सबको
किसी एक को उठा ले जाता है रोज

भयभीत समूहों का अविवेक
छिन्न-भिन्न करता है जीवन को
रोज पीछा करती है अकाल मृत्यु

समूह में कोई नहीं
जो देख पाये सबकी तरफ
सब अपनी-अपनी जान बचाते
सुनते रहते हैं आहट
पास आती मृत्यु की

सामूहिक भय में बसी है मृत्यु
सब अकेले पड जाते हैं समूह में
भागते हैं सबको अकेला छोडकर
छिन्न-भिन्न करते रहते हैं सबका जीवन

अन्याय से असहयोग के काबिल
नहीं रह जाते सहयोग के अभाव में
अन्याय की जय बोलते हैं
रस्सी में साँप जैसा फैला है भ्रम
पृथ्वी पर फैला है भ्रम
रस्सी में साँप जैसा
मृत्यु से भयभीत जीवन
ठिठक गया है बीच राह में

अवसर पाकर फैली है महामारी
छिपे हैं जिसकी ओट में अदृश्य मायावी
जो छीनेंगे स्वाधीनता
बचे हुए जीवन की

जान जा रही है उन बूढों की
जो बता सकते हैं जीवन की पहचान
जान बचाकर भाग रहे हैं देहगाँव की ओर
वे कर्मकुशल कारीगर दुनिया के
जिनके हाथों में बसी हुई है लोक-कला
उनको पीछे छोड
रचा जा रहा है कोई प्रतिसंसार

अदृश्य मायावी
धीरे-धीरे मारेंगे स्वतंत्र इच्छा को
मारेंगे उनको भी
जिनमें बची रहेगी आखिर तक
रचने की इच्छा
इस तरह ढाले जायेंगे शरीर
नहीं होगा जिनमें अपना मन
पृथ्वी के जन जैसा
नहीं होगा अपना तन
फिर वह जहान भी नहीं होगा
जिसे छोडकर
चला जायेगा कितना सारा जीवन

कोई मायावी रस्सी
बाँध रही जीवन को
न जाने कहाँ खींचकर लिए जा रही
जहाँ कोई किसी के लिए
नहीं जियेगा निर्भय होकर
सब अपने-अपने भय में
अपना घर खोजेंगे

प करने वालों का इतिहास

आदिकाल से
तप करने वाले माँगते रहे ब्रह्मास्त्र
अमर होकर चाहते रहे विध्वंस
टोकता रहा आकाश
दिग्विजय का कोई अर्थ नहीं
मृत्यु की गोद में बैठा है जीवन
कोई अमर नहीं

सदियाँ बीत गयीं
डूब जाता है सूर्यास्त के साथ
प्रतिदिन हरेक संकल्प
खो जाता है वरदानों का तेज
सुबह तक टल जाता है युद्ध
शोक में डूबी रहती है रात
गले लगाती है गोद में रखकर
बडे प्रेम से मृत्यु
जी उठता है नेत्रों में जल
युद्ध के शिविर में

रोज होते युद्ध का अंत देखकर
एक सुबह अपने आप प्रकट हुआ प्रेम
उसके लिए नहीं किया किसी ने तप
वह तो बसा हुआ है जीवन में
जन्म से ही मिला हुआ है सबको
साँसों की लय पर सधा हुआ है
पृथ्वी को पाँवों से नहीं नापता प्रेम
उसमें बसी है हृदय से नापने की कला
वह किसी दूरी को जानता ही नहीं
उसे चाहिए सिर्फ दो गज जमीन

विपदा आती रहती है बार-बार

हम समर्थक नहीं किसी के
प्रवर्त्तक हैं अपने स्वभाव के
अपने राग-विराग के
अपनी-अपनी आग के
शोक-हर्ष-भय-प्रेम वियोग
योग-कुयोग अपने-अपने भोग
कम पड जाता है सहयोग
तृष्णा-जल से प्यास बुझाते
हरदम हम प्यासे रह जाते
अपने दुख के कुण्डों में
अपना-अपना प्रतिबिम्ब देखते
अपने में खो जाते
कहाँ कोई बहुमत है
सबका अपना-अपना मत है

सबका अपना-अपना संसार
सदियों से विफल हमारी चुनी हुई सरकार
विपदा आती रहती है बार-बार
हम करते रहते उपचार
संयम और क्षमा के आगे
हो जाते लाचार

निर्भर जीवन

जीवन पर-निर्भर है
निर्भर है पृथ्वी पर
जल पर निर्भर है
निर्भर है अग्नि पर
आकाश पर निर्भर है
निर्भर है हवा पर
सृष्टि की लोकसभा पर निर्भर है
निर्भर नहीं स्वार्थ पर
परमार्थ पर निर्भर है

आत्मा केवल साक्षी है
इस पर-निर्भर का
न्याय और अन्याय से परे
सबमें रमता है
धर्म इसी के धारण पर निर्भर है
कर्म इसी के कारण पर निर्भर है

आत्म तिरंगा नहीं
जहाँ चाहें फहरा दें
जो मन में आये चेहरा दें
प्रजातंत्र को

वह रंगहीन सब उसमें बसे हुए हैं
हर कोई जीता-मरता है
उसमें कोई बाजार नहीं भरता है

जैसे दिन कोई बच्चे हों

जब दिन छोटे लगते थे उसको
तब से दिन को बडा बनाने की
उसकी आदत नहीं गयी
वह देर रात तक
खटती-खपती रहती घर में
बडे हो रहे थे जब बच्चे
दिन छोटे पड जाते उसको
जैसे दिन कोई बच्चे हों

वह कहती रहती...
दिन छोटा पड जाये तो
कोई काम नहीं होता है पूरा
दिन बडे और रातें छोटी हों
काम अधूरा रह जाये तो
उमर अधूरी-सी लगती है

कितने दिन बीते, रातें कितनी बीतीं
बच्चे पाँवों पर खडे हुए
दूर दुनिया में किसी काम से चले गये
उसकी सुबह-शाम से चले गये

अब दिन बहुत बडे लगते हैं उसको
दिन तब तक नहीं डूबता
जब तक सब बच्चों से
बात नहीं हो जाती उसकी
छोटी हो जाती हैं रातें
बीत गये छोटे-से दिन की यादों में
अब नींद नहीं आती है उसको

हम प्रभुता के गुन गाते-गाते ऊब गये

युगों-युगों से हमें मिले
वरदानों के आकाँक्षी
शापग्रस्त नायक
उनने पायी जो विद्या
वे बीच डगर में भूल गये
उनकी जय और पराजय की
गाथाओं में
डूबता चला गया जीवन सबका
उनके दर्पों के सर्प
काटते रहे हमें
पूरे जीवन का दाँव लगाकर
वे जुआ खेलते रहे
जीवन की जय तो हुई नहीं
उनकी प्रभुता के गुन गाते
हम ऊब गये
वे व्यर्थ हुए , सब डूब गये
चलो अब हम सब
अपनी सुनीति रचें
अपने बीज बचाकर
अपनी सुरुचि रचें
अपनी बहुरूपा प्रकृति बीच
घुल-मिलकर
अपना तन-मन साधें
कविता रचने के लिए
शब्द बचाकर रख लें
सागर तट की ओर जा रही
पृथ्वी को
हम अपने पास बुला लें
प्रलय रोक दें
आत्मालोचन

कैसे मान लिया हमने --
जीवन है कारागार
हम मुक्त नहीं , बंदी हैं
अपनी कारा में?

कब जान लिया हमने --
होंगे अपने सच के पक्ष में
तो रह जायेंगे अकेले?
दूसरा कोई नहीं
हम किससे भयभीत?

क्यों ठान लिया हमने --
न्याय नहीं कर सकते अपना
बिना राज्य के होता है अन्याय?
स्वराज्य को भूल
हमें क्यों बंदी होना स्वीकार?

सदियों पुरानी आदत
बेडियाँ पहने रहने की
क्यों नहीं छूटती?

होने लगे प्रकट
उद्धारक कारागृह में?
वे तोड बेडियाँ
क्यों कारागृह से बाहर आते?
हम क्यों कारागृह में ही रह जाते?

सम्पर्क - 2/45, दानिश हिल्स व्यू, कोलार रोड,
भोपाल-४६२०४२
मो. ०९४२५३०१६६२