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पैरों में फिर पीड उठी है...

तसनीम खान
आम दिनों-सी रौनक नहीं थी घर में। सब चुप चुप-सा था। कोई सुनसान सा। एक सदमा सा जैसे चारों ओर फैलता जा रहा था। चौक, कमरे, बरामदा, चौका। सब पर चुप्पी थी। ऐसा नहीं था कि घर में कोई नहीं था। वही बरसों का कुटुम्ब था। चार भाई, उनकी बीवियाँ, बच्चे और उन सभी के अब्बा-अम्मा। अब्बा-अम्मा की चारों बहुएँ भी इन दिनों एक-दूसरे की ओर हँसकर देखती। कोई बरतन नहीं टकराता था और न ही कोई आवाज, न कोई कंधा ही टकराता। न अब्बा किसी को डाँटते और न ही कोई उनकी आवाज से सहम जाता। कोई 83 बरस गुजार चुके थे दुनिया में। फिर भी कमर झुकी न थी। कोई 6 फीट लम्बे अब्बा पैरों में दर्द के मारे चलते तो छडी लेकर थे। लेकिन लम्बे-लम्बे पैरों से लम्बी फलाँगे यों मारते कि साथ चलते चारों बेटे पीछे ही रह जाते। वो पलट कर मुस्कुराते तो उनका रौब खूब दिखाई देता। उस वक्त वे पैरों का दर्द भी भूल जाते।
घर भर में सबसे तेज आवाज किसी की सुनी जाती तो, वो अब्बा की ही थी। सबसे तेज हँसी भी। खाना खाने के बाद अल्लाह का शुऋ अदा भी वे तेज आवाज में करते। लेकिन इन दिनों यह तेज आवाज आती ही न थी। वो खामोश रहते। अक्सर धीमी आवाज में टीवी देखते। फिर कोई उदासी घेर लेती और वो अपनी रजाई ओढ सोने का जतन करते देखे जाते। सर्दी भी इस बार खूब पड रही थी। दिसंबर बीतने जा रहा था। हमेशा सर्दी ज्यादा ही होती, पर इस बार सितम और भी था। अम्मा उनके नींद के जतन को खूब समझती। वो भी उनकी रजाई ठीक करने, कंधों तक ओढाने का जतन करती, जैसे उनकी खामोशी को पढ रही हो। फिर वो भी अपने पानदान की डब्बियों को बेवजह बाहर निकालती और फिर उसे भर देती।
चौक में लगे पलंग पर धूप सेंकती अपनी चारों बहुओं की फुसफुसाहट को ताकती और देखती सब कितना बदल गया इन दिनों। बाहर एक दीवार-सी खिंच रही थी तो घर के भीतर नाइत्तेफाकी की दीवारें इन्हीं दिनों में गिर गई थी।
जाहिदा...
अब्बा ने शाम का खाना खाकर, अपने धोए हाथ तौलिए से पौंछते धीमे से अम्मा को आवाज दी थी।
जी...
अम्मा उसी तखत पर बैठी थी, आवाज देने पर पास आ गई।
वो दोपहर को चारों भाई क्या बात कर रहे थे?
अम्मा कुछ सकपका गई। उन्हें लगा था कि वो सो रहे हैं और चारों भाई भी, वो सुन न सकें इसलिए बहुत धीमे ही बात कर रहे थे, फिर भी अब्बा को भनक थी कुछ।
अअ, आं, हाँ, कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं।
मैंने सुना फिरोज जोधपुर वाले घर के बारे में कुछ कह रहा था।
अजी, नहीं जी। आपने शायद यों ही सुन लिया। आफ दिमाग में वही कुछ चल रहा होता है न। उन्होंने अब्बा के हाथ से तौलिया लेकर दरवाजे पर फैलाते हुए कुछ अटकते हुए कहा।
अब्बा ने गहरी नजरों से उनकी ओर देखा, वो फिर सकपका गईं। बिना बात ही पान लगाने लगीं।
फिरोज कह रहा था कि सैनी जी जोधपुर वाले घर की आधी कीमत भी देने को तैयार नहीं। कल तक जो मुंह मांगी कीमत दे रहे थे, वो आज आधी भी नहीं दे रहे। आखिर क्या हो गया है सबको?
अजी, आप क्यूं परेशान होते हैं, चारों भाई जानें। हमारी तो उम्र हो चुकी। अब उनके नसीब में क्या है, अल्लाह बेहतर जानता है। आप आराम करो।
नहीं जाहिदा, बात उनके नसीब की नहीं है। बात मेरी मेहनत की है, मेरी मेहनत की कमाई की है। मैंने उस घर की हर ईंट को सींचा। उसके लिए मीलों पैदल चला हूँ मैं। इतना कि छाले पड गए। लेकिन खुश था कि पहली बार लगा मैं अपनी जमीन पर अपने लिए छत डाल रहा हूँ । यहाँ यह घर तो बाउजी का है, लेकिन वो मेरा... मेरा अपना घर। हमने तो यही सोचा था ना कि उस एक घर की कीमत में चारों बेटों को अलग घर मिल जाएंगे। सब अपनी गृहस्थी में मजे में रहेंगे। मगर, मगर... अब लोग ऐसे जताने लगे कि वो मेरा कभी था ही नहीं। क्या वाकई इस जमीन पर मेरा कोई हक नहीं?
उनके चेहरे का रौब उदासी में तब्दील हो गया था और कडक आवाज भर्रा रही थी। इस उम्र में भी गठीले बदन वाले अब्बा का शरीर कम्पन कर रहा था। उन्हें दाँत भींचता देख अम्मा पान छोड उठी और दोनों हाथों का घेरा बना उन्हें सहारा दिया।
कुछ नहीं है, हाफिज साहब, कुछ नहीं। सब ठीक होगा।
अचानक हाथों का घेरा समेटा और कंधों पर रख बोली। आप ये जो दिनभर टीवी देखते हो न, इसका नतीजा है कि आप दिलो-दिमाग को इतनी तकलीफ दे रहे हो। कल ही हटवाती हूँ, इसे यहाँ से।
उनकी बात में एक थपकी सी थी और दिलासा भी।
दिलासा मत दो जाहिदा। हालत इतने भी आसान नहीं रहे। देखो शाहीन बाग को 10 दिन ही हुए और माहौल कितना खराब हो गया। अब मेरे पास तो न मेरे मां-बाप के कागज हैं और ही मेरे या तेरे यहाँ पैदा होने के। हमारे साथ, हमारे बच्चों को भी बुरे दिन न देखने पड जाएं। कहाँ से लाउं वो कागज जो बता सकें कि यह जमीन, यह मिट्टी मेरी ही है।
फिर वही बात, आप सोचो मत, सो जाओ तो मन हल्का रहेगा।
हँसते-खेलते रिश्ते दिन ब दिन बिगडते चले जा रहे हैं, तो मैं चैन से कैसे सो सकता हूँ जाहिदा? जो सैनी जी, दिन-रात भाईजी भाईजी कहते नहीं थकते, वो आज सब भूल गए। अपना सबकुछ हम पर न्यौछावर करने वाले सैनी जी आज मौके का फायदा उठा रहे।
फायदा क्या उठा रहे, धमकी ही दे रहे हैं कि अब यहाँ वैसे भी कौन रहने देगा। कह रहे थे कि हो सकता है अपनी जमीनों से बेदखल कर दिए जाओ, तो बेहतर है जो दे रहे हैं, चुपचाप ले लो।
अफरोज ने उनके सामने रखी कुर्सी पर बैठते कहा।
अम्मा ने उस पर आँख निकाली, चुप रहने का इशारा किया, लेकिन उसे अनदेखा कर दिया गया।
अब्बा, अभी आधी दे रहा है, वही ले लेते हैं, आगे यह भी नहीं मिलने वाला।
कैसे नहीं मिलने वाला। और बात कीमत की भी नहीं, बात व्यवहार की है, माहौल की है। क्या इन दस दिनों में इंसान ही बदल गए अफरोज। ये वही तो लोग हैं, जिनके मोहल्ले में अकेला हमारा मुसलमानों का परिवार था, लेकिन कभी किसी ने महसूस ही नहीं होने दिया और आज वही आँख फेर रहे हैं। घर की कीमत आधी हो गई और हमारे रिश्तों की कीमत खत्म?
अब्बा आप क्यूं मलाल कर रहे हैं। उस घर से हमें कुछ ना मिले तो भी क्या। यह घर तो है ना। हम चारों के लिए यह एक छत बहुत है।
सबसे बडे बेटे फिरोज ने उन्हें लेटाते हुए कहा।
उसकी झूठी मुस्कुराहट उन्हें समझ आ रही थी।
जोधपुर के उस मोहल्ले की छोडो, हमारा यह डीडवाना का कस्बा कितना अच्छा है। अच्छा, अब्बा देखो, अगला साल 2020 खत्म होने से पहले ही उपर एक कमरा और चुनवा दूँगा। जमील की शिकायत दूर हो जाएगी कि वो छोटा है, तो सबसे छोटा कमरा उसके हिस्से आया। फिरोज ने लेटे हुए अब्बा के पैर सहलाते कहा। वो बचपन से ही अब्बा के पैर सहलाता रहा। वो जरा बडा हुआ तभी से अब्बा जब भी लेटते उसे आवाज लगा देते। वो कई देर तक अब्बा के पैर सहलाता रहता और अब्बा सुकून से सो जाते। कभी-कभार बुदबुदाते भी।
अब पीड ठंडी पडी है।
तब वो नहीं समझता कि कौनसी पीड ठंडी पडी है। उसने कभी पूछा ही नहीं। अब बखूबी समझता है कि अब्बा की कोई भी पीड ठंडी ऐसे ही पडती है। उसे उनका मीलों चलने का दर्द खुद में महसूस होता और वो कभी-कभार रातभर उनके पैर ही सहलाता रहता।
पर मेरी जमीन का क्या फिरोज? ये सब जमीन मेरी नहीं है क्या? फिर उनकी आवाज भर्रा रही थी। अम्मा ने झट से उनके सिर पर हाथ रख तसल्ली दी।
देखो, सब हमारा ही है। चार बेटे, बहुएँ, बच्चे, ये घर, जमीन, आसमान सब।
क्यूं दिलासे देती हो जाहिदा। तुम जानती हो, मेरे लिए जमीन का मतलब क्या है। यह कहते हुए उन्होंने करवट ले ली।
उनके करवट लेने का मतलब सभी समझते। फिरोज, छोटे भाई अफरोज पर आँखें तरेरते बाहर निकल गया। पीछे अफरोज भी। अम्मा कुछ देर उनके सिर पर हाथ फिराती रही, उनके चेहरे को गौर से देखा। वहाँ झुर्रियों में बरसों के उतार-चढाव देख वो खामोश थी। कुछ न कहा। और दिन वो उनके खामोशी से घबरा जाती कि कहीं फिर दिल का दौरा न पड जाए। उनकी उम्र अम्मा को अब डराती। लेकिन इस वक्त अब्बा को अकेला खामोशी से लेटने देना ही उन्हें ठीक लगा। कुछ दर्द खामोशी की दवा से ही ठीक होते हैं। वैसे भी उनके जख्म उनकी यादों में भरते हैं और खुलते भी हैं, कभी जलते भी हैं।
जुलाई आखिर का कोई दिन रहा होगा, जब भारत-पाकिस्तान के अलग-अलग आजाद होने की सुन अफरा-तफरी का माहौल सा था। बाडमेर सीमा के बाद का बडा शहर होने के चलते दोनों तरफ के लोगों का जमघट-सा लगा था जोधपुर में। जाने वालों के लिए भी और आने वालों के लिए भी यह कोई आखिर बार मिला देने वाला शहर था। यहीं आखिरी बार उस घर में झगडे की आवाजें सुनाई दी थी। जो खाप्टे वाली मस्जिद के बिलकुल सामने था।
हम वहाँ नहीं जाएंगे। हमारा सब कुछ यहीं है, हम कहीं नहीं जा रहे हैं।
यह कहते मीर बक्श जी ने रफीका के हाथ से उसके सामान का बक्सा दालान में फेंक दिया था। वो पाँचों भाई और उनकी दो साल की बहन सहमे हुए सब देख रहे थे। यों भी बडे भाई 20 साल के आमिर और इन पाँच भाइयों को दालान में हर दिन दोनों के झगडे सुनने की आदत-सी थी। वो सहमकर दोनों के मारपीट तक पहुँच चुके झगडे के खत्म होने का इंतजार करते रहते। छोटी आशिया अभी यह सब समझती न थी।
तुम्हें अपनी जान की न पडी हो। मुझे तो मेरी और मेरे बच्चों की जान प्यारी है। हम जाएँगे। और हमारे सभी रिश्तेदार भी तो वहाँ जा रहे हैं। फिर हम यहाँ रहकर क्या करेंगे। उसने आखिरी बार समझाने का दाँव खेला हो जैसे।
कुछ भी करेंगे, लेकिन मेरी मिट्टी छोड नहीं जाउंगा।
तो मरो इस मिट्टी में, मैं अपने भाइयों के साथ जाऊँगी। रफीका ने बडा कठोर फैसला सुनाया था, इस दालान में।
तुम ऐसा नहीं कर सकती। और आमिर ने भरोसा दिलाया है न, कुछ न होगा। वो नायब तहसीलदार का इंस्पेक्टर है। उसके चलते कोई हमारे घर की तरफ देखेगा भी नहीं।
मुझे नहीं चाहिए आमिर और तुम, दोनों रहो यहाँ । वो अपनी इंस्पेक्टरी नहीं छोडेगा और तुम यह देश। और मैं तुम सबको छोड दूँगी। मेरे इन बच्चों का मुस्तकबिल यहाँ दिखाई नहीं देता मुझे। यहाँ पता नहीं कब मारे जाएँ।
उसने अपनी दो साल की बेटी आशिया को सीने से लगा लिया। अपने सात बच्चों में से 20 साल के आमिर को लेकर उसे कोई खास लगाव न था। वो हमेशा उसे अपने खिलाफ और मीर बक्श यानी उसके शौहर की ओर झुकाव लिए ही पाती। सारे रिश्तेदारों को अपने घर छोड पाकिस्तान जाते देख-सुन उसका दिल घबरा जाता था। वो रात-रातभर अपने बच्चों की ओर देखती। आमिर को छोड पाँच और बेटे और एक बेटी आशिया के लिए अनजाना ही डर सताए जाता। अब जब उसके माँ-बाप के साथ सभी भाइयों ने पाकिस्तान जाना तय किया तो उसने भी बक्सा तैयार कर लिया।
पर मीर बक्श यह जगह छोडने तैयार नहीं थे।
रफीका, हम यहीं खुश रहेंगे देखना। यह दिन टल जाने दे बस। उन्होंने भी अकेले होने से पहले छूटती जिंदगी को एक और मौका दिया जैसे।
लेकिन रफीका ने पलटकर नहीं देखा। भाइयों ने सामान उठाया और उसने सबसे छोटे दोनों बच्चों को सीने से लगाया। मीर बक्श उस जिद्दी औरत को जाते हुए देर तक देखते रहे। जब तक खाप्टे के इस मोड से वो मुड न गई। छोटी आशिया अपनी माँ के कंधे से सटी अनजाने ही अपने अब्बा को सिर पर हाथ रखे सलाम कर रही थी। पाँचों बेटों में से अकेला हाफिज उन्हें मुड-मुडकर देख रहा था। उसने कहा था अब्बा से कि वो कहीं नहीं जाना चाहता, लेकिन माँ ने उसे नहीं छोडा। वो भी खाप्टे के उस मोड पर बहुत कुछ छोडे जा रहा था। उसके घर का दरवाजा छूट भले गया, लेकिन उसकी नजरों के भीतर से ओझल न हो सका। अपने अब्बा की, उनके मोड से मुड आने की उम्मीद भरी नजरें उसकी धडकनों को तोड रही थीं। उसने कसकर अपने कुर्ते के ऊपर से सीने को पकड रखा था। दूसरे हाथ की छोटी गठरी उस पर भारी होने लगी।
अब्बा कहते, कोई बवाल न होगा। देखना सब ठीक होगा। हम हँसी-खुशी अपनी ही जमीन पर रहेंगे। जमीन का मतलब उनके लिए कोई घर न था, वो दस साल का हाफिज बखूबी समझता। फिर वो मिट्टी में खेलते-खेलते मुट्ठी भर उसकी खुशबू सूँघ लेता। गीली मिट्टी से अपने घर बनाते-बनाते वो उस घर के पास ही लेट जाता। फिर उसे मिट्टी में सना देख अम्मा उसकी तबीयत सुधार देती।
वो खुशबू उसके साथ-साथ रही और अब्बा की एक जोडी वो आँखें भी।
बवाल के माहौल से ठीक पहले वे लोग मीरपुर खास पहुँच चुके थे। कुछ ट्रेन, कुछ बस और कुछ सफर पैदल निकला। इधर भी वही अफरा-तफरी मची थी। सिंध प्रांत का यह इलाका लगभग खाली हो गया था। यहाँ रहने वाले सिंधी लोग बस्ती छोड निकल चुके थे। बाकी भी अपना सामान समेट रहे थे आजादी का दिन आने से पहले, सभी को अपनी जगह नहीं, अपना देश भी बदलना था। किसी बवाल के अंदेशे में हर कोई काँपता फिर रहा था। लोग अपनी पीढियों से सींचे पुश्तैनी मकान छोड गए थे। मकान ही क्या, भरे-पूरे घर ही थे। अनाजों के ड्रम भरे थे और कपडों की गठरियां भी गली भर में बिखरी मिली। अम्मा रफीका अपनी तेज तर्रार आदतों से खानदान भर में मशहूर थीं और यहाँ आते ही खूब होशियारी दिखाई। सिंधी बस्ती के दो घर रोके थे उसने। रोकना तो पाँच चाहती थी, अपने बेटों के लिए, लेकिन उसके भाइयों को भी तो घर चाहिए थे। वो मन मसोस कर उन दो घरों को फिर बसाने में जुट गई।
लेकिन क्या बसा था। कुछ भी तो न बसा था। बवाल बढता जा रहा था और गलियों में सन्नाटा पसर रहा था। दूसरी ओर से आकर बसे इंसान भी इस बस्ती में कोई खुश न दिखाई दे रहे थे। हर घर में पथराई आँखों के कुछ लोग रहा करते। बच्चों की आँखें भी तो पथरा गई थी। अपने मोड, अपनी दहलीजें, खेल के दोस्त, घर के दालान, कुछ की मां, कुछ के बाप और कुछ के बच्चे यहाँ रहने वालों की यादों में घूमते, उनके भीतर शोर मचाए रखते और बाहर कचोटने वाला सन्नाटा।
दिन में कई बार अपनी अम्मा और अब्बा को लडते सुनने वाले हाफिज की आंखें क्या कान भी पथरा गए। ऐसे कि अब भी वो सुन्न होकर बस उन्हीं आवाजों को सुनने की कोशिश करते। आँख-कान क्यों उसकी तो नाक तक पथरा गई थी। अपने दालान की मिट्टी उसे अपने शरीर पर मली लगती और वो चौंककर अपन कुर्ते के भीतर झाँकने लगता।
इस पथराई बस्ती, जो अब सिंधी बस्ती की बजाय सैयदों की बस्ती कही जाने लगी, उसी में रह रहे पथराए लोगों की जिंदगी रूकी नहीं थी। चलती जा रही थी। चली जा रही थी।
दो घरों में से एक में रफीका ने किराएदार रख लिए, तो इस बडे परिवार को खाने की कमी न आई। उस एक घर में वो सात लोग अपनी जिंदगी को सहज बनाने में जुटे थे। कोई सहज नहीं हो पा रहा था, तो वो हाफिज ही था। वो अपनी अम्मा के बताए काम खामोशी से किसी बेजान मशीन की तरह किए जाता। बात तो वो किसी से नहीं करता। वो बस देखता रहता कि कैसे तीनों बडे भाई और एक छोटा भाई यहाँ रम गए थे। दो बडे भाई नए आए लोगों के लिए टूटे-फूटे घरों को ठीक करने की मजदूरी कर थोडा बहुत कमा लेते। वहीं तीसरे ने घर के बाहर ही कुछ पुराने कपडों की दुकान खोली थी। नए आए लोगों को कम दामों पर गली-गली की गठरियाँ जोड इकट्ठा किए कपडे बेच देता। हाफिज उनके लिए कोई काम का नहीं था तो अम्मा उससे घर के काम कराती। वो आशिया को बहलाने से लेकर कपडे धोना, सफाई करने तक का सारा काम करता। छोटा भाई भी इसमें हाथ बंटा देता। वो मिट्टी से बर्तनों को रगडते हुए कई बार उसे सूंघ लेता, लेकिन कोई ऐसी खुशबू न थी, जो उसके भीतर बसी खुशबू से मेल खाती हो।
यह करता देख, कभी-कभार अम्मा की डाँट तो कभी एक थप्पड आ लगता गाल पर।
ये मिट्टी खा-खाकर ही गलता जा रहा है। जितना खिलाती हूँ अंग नहीं लगता तुझे। जाने किस पे चला गया मनहूस।
मनहूस भी उसे यों कहा जाता कि वो अपने सात भाई-बहनों में कुछ काला था और बेहद कमजोर डील-डौल का।
बडे भाई कालू कह देते, तो माँ मनहूस, बद्सूरत जैसा ही कुछ। वो मीर बख्श और बडे बेटे आमिर को लेकर जो भी कुँठा होती वो हाफिज पर ही निकालती। हालांकि अकेले में उसे इस बात पर अपराध बोध भी होता, खुद को खूब झिडकती भी। उसे फिर मीर बक्श और आमिर पर गुस्सा हो आता कि वो दोनों भी साथ आते तो घर में इतनी मायूसी पसरी न होती। वो किसी कोने में जार-जार रोती और मीर बख्श के पाकिस्तान आ जाने की दुआएँ माँगा करती।
जब भी हिंदुस्तान का कोई जत्था आता, तो वो छत से उन जाते लोगों की भीड में कभी आमिर को तलाशती तो कभी मीर बख्श को। हालांकि वो तलाशना चाहती नहीं थी, वो तो बस अपने अपराधबोध को कम करने का एक उपक्रम भर करती। शायद ऐसा कर वो अपने मन का कोई बोझ कम करने की कोशिश में लगी रहती। लेकिन कभी उसे भी नहीं लगा कि कोई राहत मिली हो। कभी वो बडी परेशान हो जाती यह सोचकर कि आमिर की शादी हुई होगी तो बहूँ को आमिर और उसके ससुर मीर बख्श ने सास के बारे में क्या बताया होगा? बताया होगा कि कोई पत्थर दिल थी। या कि उसे मीर बख्श से ज्यादा अपने भाई प्यारे थे। अपने बडे दालान वाले घर को छोड, यहाँ दूसरे वतन में लोगों के मजबूरी में छोडे गए घरों को शान से चोरी कर लेने वाली एक बदगुमान औरत है।
उसने अपने दुपट्टे से मुँह को ढक लिया।
ऐसे ही मुँह ढकते और कभी खुद को सही साबित करने वाली ऊहापोह में गुजरती रफीका ने यहाँ तीन साल गुजार लिए थे। सरकार ने उनके रोके घरों को उनके नाम कर दिया था। जिंदगी कुछ सामान्य होने लगी थी। हिंदुस्तान से चिट्ठी-पत्री के सिलसिले भी शुरू हुए। लेकिन उनके घर न कोई खत आता, न ही भेजा जाता।
ना, ऐसा नहीं है कि लिखा नहीं जाता। लिखा क्या, लिखे जाते थे। रफीका लिख देती कि यहाँ आ जाओ, सभी हँसी-खुशी साथ रहेंगे। कोई झगडा अब न होगा।
हाफिज परचूनी का सामान जिस कागज में लाता। वो अपने लिए रख लेता। वो लिखता, अब्बा मुझे वहाँ बुला लो, यहाँ की मिट्टी मेरी अपनी नहीं।
इसी तीसरे साल में कपडों का व्यापार अच्छा चल निकला था। तीनों बडे इसी काम में लग गए। उसी साल दो बडों का निकाह रफीका ने अपने भाइयों की बेटियों से करा दिया। वो बहुत खुश थी कि अब उसकी कुछ जिम्मेदारियाँ पूरी होंगी, तो शायद अपराधबोध भी कम हो जाएगा। लेकिन हाफिज की पथराई आँखें इन तीन सालों में भी किसी तरह उसे नहीं जीने दे रही थी। रफीका जब भी उसकी तरफ देखती, एक शूल-सी लगती सीने में। लगता मीर बख्श उसे नफरत से देख रहा है और आमिर सवालिया नजरों से। हाफिज को जर्द चेहरा उसे उसका माझी याद दिलाए रखता।
तेरह साल के बच्चे, कमठा-मजदूरी कर घर चला लेते हैं, लेकिन यह तो भाइयों के बने बनाए कारोबार की ओर भी नहीं देखता। पता नहीं इस घर में ही गडा रहेगा क्या?
अम्मा ने उसके सामने खाने की थाली लगभग पटकते हुए ही कहा।
दोनों भाभियाँ, जो उसके मामू की बेटियाँ ही थी यानी उसकी कजिन, वो भी दिन-रात उसे मनहूस कहकर ही बुलाती। अम्मा उनसे कुछ न कहती। शायद उसी अपराधबोध में कोई राहत मिलती होगी उन्हें।
बेवतनों को कहाँ राहत मिलती है। मिलती भी होगी तो उसे न मिली।
सात साल की होते-होते आशिया एक दिल चल बसी। टीबी ने घेर रखा था अरसे थे। उसी टीबी की शिकार रफीका इस घर के बिलकुल बाहर बरामदे के एक कोने के पलंग पर अलग-थलग पडी रहती। जिन घरों को उसने इस मीरपुर खास में आते ही रोका था, वहाँ अब उसके लिए जगह नहीं रह गई थी। कई बार जिंदगी में किसी घर की जगह नहीं होती तो कई घरों में एक जिंदगी के लिए जगह नहीं होती। उसकी जिंदगी में तो यह दोनों हादसे ही हो चुके थे। वो दीवार की ओर मुँह किए अपने इन्हीं हादसों का हिसाब-किताब कर रही थी कि एक हाथ ने उसके बालों को सहलाया। वो चौंक उठी।
सामने हाफिज था, उसके लिए खाने की थाली लिए। उसने हाफिज का चेहरा हाथ में लिए कितनी ही बार देखा, लेकिन वहाँ कोई भाव न थे। न तो नफरत के और न किसी मोहब्बत के। वो तो पथराया-सा ही रहा इन पाँच सालों में। उसे याद आया। उसने नीचे से ऊपर तक हाफिज को देखा। पैरों में चप्पल नहीं बिवाइयाँ थीं।
जिस हाथ से हाफिज ने अम्मा को खिलाने के लिए कोर तोडा था, उस हाथ को अम्मा ने कसकर पकड लिया।
कितनी टांचे पडी हैं इन हाथों में, क्यों करता है इतना काम। घरभर के बर्तन-कपडे क्या तेरे लिए ही हैं। क्यों बुहारता है तू इस घर को उनके लिए।
यह काम आपका ही दिया हुआ है अम्मा, अब भी वही कर रहा हूँ।
अम्मा ने गौर से देखा, वाकई हाफिज का चेहरा सूता हुआ था। कोई अहसास वहाँ अम्मा ने नहीं देखे थे।
हाफिज, हाफिज, देख मेरी ओर, नफरत से देख बेटा। मैंने दी ना तुझे ऐसी जिंदगी।
नहीं अम्मा, यह हमारा नसीब यहाँ ले आया।
झूठ बोलता है तू, झूठ बोलता है। मैं लाई यहाँ पर, मैं लाई तुझे तेरी जिंदगी के उस मोड से घसीट कर। तेरी जिंदगी का कोई सिरा वहीं कहीं रह गया हाफिज। जा, जा तू। फिर से पकड ले अपनी जिंदगी का हिस्सा।
मैंने कुछ छोडा ही कहाँ अम्मा कि पकड लूं।
हाँ, यही कि तू यहाँ का हो ही नहीं सका। जहाँ का है, वहाँ का मैंने नहीं होने दिया। तू ऐसा कर, तू जा, तू चला जा यहाँ से। लौट जा अपनी जडों की ओर। लौट जा अपनी मिट्टी में। उडेल लेना जीभर उसे बदन पर। शायद फल जाए तेरी जिंदगी। यह कहते अम्मा ने उसे धक्का दे दिया। कमजोर देह का हाफिज गिरा और थाली दूर जा गिरी।
आवाज सुनते ही दरवाजे पर दोनों बहुएँ आ गई।
अब तुम मनहूसों ने खाना फेंकना भी शुरू कर दिया। एक तो इतना खर्च कर, तुम बेकारों का पेट भरो, इस पर भी लानतें।
हाफिज ने खुद को संभाला, फिर अम्मा को।
अम्मा, मैं कहीं नहीं जा रहा। तुम्हें अकेले छोडना गुनाह होगा मेरे लिए।
गुनाह, हाँ, गुनाह ही है किसी को छोडना। अपनी जमीन छोडना, अपने लोगों को छोडना। बता, बता तो, मैं इतनी बीमार होती तो तेरे अब्बा छोड देते क्या? कभी नहीं। आमिर किस कदर आगे-पीछे घूमता। बडे डॉक्टर तो उसके कहने भर से मेरे पास बैठे रहते। और वो, वो हमारे रामावतार काकोसा, वो तो अपनी दुकान की हर देसी दवाई दे-देकर उकता देते मुझे।
तुझे पता है, तेरा कमजोर बदन देख, रोजाना कोई न कोई दवा ले आते। जाने कितने नुस्खे आजमाए हैं उन्होंने तेरे उपर। अब तक तो तुझे हट्टा-कट्टा बना देते।
इस बात पर पहले तो वो खूब हँसी और फिर रोई भी। लेकिन हाफिज बस एकटक देखे जा रहा था। उसके पास जताने को कुछ न था वहाँ।
तू रोता है न हँसता है, हाफिज। तो क्या यह सब भी मेरे कसूर में जोडेगा।
नहीं अम्मा, ऐसा नहीं है।
ऐसा ही तो है, तू ही मुझे मेरे गुनाहों से आजाद कर सकता है। उस मिट्टी की खुशबू में मिल जा जाकर। जा।
इस बार हाफिज ने कोई जवाब ना दिया। मगर अम्मा जानती थी, वतन से दूरी हाफिज को जीने नहीं देगी और वो जिंदा रही तो हाफिज जा न सकेगा। अपने अपराधबोध में सोई अम्मा फिर न उठ सकी।
लेकिन बरामदे का पलंग खाली नहीं था। अब दिनभर का काम कर हाफिज की थकी कमजोर देह सर्दियों की रात में भी इसी पलंग पर निकलती। उसके बिस्तर उसे नाकाफी रहते, लेकिन वो कुछ कचरा जलाकर अपने लिए सर्दी का इंतजाम करता रहता।
उसकी ठिठुरती देह देख, वहाँ से गुजर रहे सन्नी बाबूजी ने अपनी कंधे की चादर उस पर डाल दी। उसने देखा सन्नी बाबूजी झुके उससे कुछ पूछ रहे हैं।
सन्नी बाबूजी इस सिंधी बस्ती यानी अब सैयदों की बस्ती के सबसे आखिरी छोर पर अपने कुछ परिवारों के साथ रहते। ये कुछ परिवार ही थे, जो सिंध प्रांत के इस कस्बे में बचे रह गए थे।
जी, जी बाबूजी।
क्या हुआ बेटा, बाहर क्यों सोते हो इतनी सर्दी म।
इन घरों में जगह नहीं है बाबूजी, वैसे भी कौन-से मेरे हैं। मेरा घर तो वहाँ है, सरहद पार। बडे दालान वाला।
कुछ यादें धुंधली नहीं पडती बेटा, कितनी भी कोशिश कर लो।
नहीं बाबूजी, मैं ऐसी कोई कोशिश नहीं करता। मैं एक दिन फिर लौट जाऊँगा वहाँ।
कैसे जाओगे? अब तो दोनों ओर की सरकारों ने सरहद पर सख्ती कर दी है। खूब जाँच होती है। कई कागज-पत्र माँगते हैं। है कुछ तुम्हारे पास।
उसने ना में गर्दन हिला दी।
चलो अभी सो जाओ। सुबह आकर कोई जुगत बैठाते हैं।
हाफिज की आँखों में पहली बार कोई रोशनी उठी। एक उम्मीद की रोशनी। वो घुप्प अँधेरे में भी बाबूजी को जाते हुए देख पा रहा था।
उसने महसूस किया कि वो उनके ही परिवारों की खून-पसीने की मेहनत से बनाई सपनों की दीवारों के एक कब्रिस्तान पर बैठा है। जिस पर उसका कोई हक नहीं। उसने हक जताया भी नहीं था कभी, लेकिन आज यहाँ बैठना उसके लिए एक बोझ की तरह था। यह चबूतरा उस ओर के कई बच्चों की यादों का कब्रिस्तान ही था, वो जल्दबाजी में उसकी सीढियाँ उतर गया और पूरी रात सडक पर बिता दी। दूसरे दिन इस कब्रिस्तान रूपी बस्ती में वो कहीं नजर नहीं आया। वो जिंदगी ढूंढने निकल चुका था।
मीरपुर खास से निकलते ही उसके पैर जैसे हवा में उडने लगे थे। यहाँ तब बस्तियाँ नहीं के बराबर थी। वो इस इलाके में अपने लम्बे पैरों से डीग भरता, फलाँगे मारता काफिले से बहुत आगे निकल जाता। जैसे उसे अपनी पैदाइश के पंद्रहवें साल में चलना सीखा हो। वो दूर से अपने काफिले को अपने पास आते देखता तो मुस्कुरा देता, कि वो ही है, जो मीलों पैदल सबसे जल्दी चल सकता है। मुस्कुराना भी उसने इस पंद्रहवें साल में ही सीखा, ऐसा उसे महसूस हुआ। महसूस करना भी अब ही सीखा था। तभी तो उत्साहित था, अपनी जमीन की ओर से आते खिंचाव से सम्मोहित हो वो उस ओर चला जा रहा था। किसी टीले पर बैठ सूरज को क्षितिज में अस्त होते देखता तो लगता वहीं कहीं उसका खूबसूरत शहर भी है, घर भी है, अपने भी और अपनापन भी।
कोई 30 लोगों का काफिला होगा यह, जिसमें हाफिज अकेला ही गैर सिंधी था। लेकिन यह फर्क न उसे महसूस हुआ और ना बाकि लोगों को। कुछ दिनों तक वो उन लोग की मश्क से पानी पीने में झिझकता, लेकिन अब तो वो झिझक भी नहीं रही। सभी तो उसके जैसे ही थे, एक जैसे। सभी का रास्ता एक, मंजिल भी एक।
जहाँ कहीं थकान उतारने बैठते औरतों का निशाना हाफिज ही होता।
क्यों, मीरपुर का पानी लगा नहीं बदन को।
बदन को पानी नहीं मिट्टी चाहिए। घर जाकर उसी से नहाऊँगा, तब देखना पहचान नहीं सकोगी। बिलकुल मोटा-ताजा लगूंगा।
वो अपना मुँह फुलाकर कहता और काफिले में हंसी दौड जाती।
कोई तीन महीनों में वो उमरकोट से कुछ आगे ही निकल सके थे।
बाबूजी, इतना धीरे चलेंगे तो बहुत वक्त लगेगा उस पार जाने में।
अपनी चाह के रास्ते लम्बे ही हुआ करते हैं। और हमारे पास कोई कागज भी तो नहीं। अभी तो दोनों सरहदों पर गश्ती बहुत खडे रहते हैं। लूट लें तो कोई बात नहीं, पर जान का खतरा भी तो है। बस जरा समझदारी से चलना पडेगा। नाम बदल-बदलकर और रास्ता बदल-बदलकर। अभी तो कोई तीन महीने ही और लगेंगे।
उसने लम्बी साँस ली। फिर क्षितिज की ओर देखा। रेगिस्तानी इलाकों का क्षितिज भी कुछ ज्यादा दूरी पर होता होगा। यहाँ के लोगों का सूरज दूर है, रोशनी भी।
वो उसी रोशनी का पीछा करता चलता जा रहा था। मीलों तय किए थे उसने और कई कोस चलना था। उसका कमजोर शरीर और कमतर होता जा रहा था, लेकिन उसके चलने में उसकी कमजोरी को जोर नहीं चला करता। फलाँगे मारते-मारते ही वो इस पंद्रहवें साल में जैसे कई बरसों से चल रहा था। कस्तूरी की तरह। जिस मिट्टी की खुशबू खुद उसके बदन में थी, उसी में बच्चों की तरह हाथ-पाँव मारना चाहता था। उसके मन की कस्तूरी उसी खुशबू की ओर दौड रही थी। अपनी जिंदगी के वो पाँच साल, जो उसने जीएं ही नहीं, वो तो उसी कब्रिस्तान में छोड आया था।
छह महीने होने जा रहे थे जब काफिला थारपारकर पहुँचा। यहाँ कुछ गश्ती थे। उनके नाम की पूछताछ को जुटे। हाफिज पेट पकड देर तक हँसता रहा था, जब सभी ने अपने नाम रटे गए मुस्लिम नाम बताए थे। वैसे भी इतने महीनों में सभी की दाढी इतनी बढ चुकी थी कि पहचाना जाना वैसे भी मुश्किल था। थारपारकर से कुछ ही दूरी पर थी हिंदुस्तान की सरहद। वो उतावला हो उठा।
हम उस ओर क्यों नहीं जा रहे?
हमें सीधे रास्ते नहीं जाना है। जहाँ से ये लोग ले जाएंगे, वहाँ से जाना है। शायद 15-20 दिन और लगेंगे।
वो बच्चों-सा रुँआसा हो गया।
बाबूजी बहुत दिन हो गए, वतन ढूँढते हुए। सामने है तो क्यों नहीं जा सकता।
अब तुम उस वतन के नहीं हो बच्चे। जैसा कहते हैं, करो। नहीं तो सारी उम्र वतन के निशां को तरसोगे।
उसके रोंगटे खडे हो गए। वो वहाँ के स्थानीय लोगों के पीछे चलते अपने काफिले में शामिल हो गया। छाछरो के करीब पहुँचते ही काफिले में हलचल हुई। कुछ लोग उस्तरे ले आए थे। सभी मर्दों को यहाँ गंजा किया गया। उसका कुर्ता पाजामा उतारकर धोती और कुर्ता पहनाया गया।
यों सभी एक जैसे ही दिख रहे थे। यह इसलिए भी जरूरी था कि गंजे सिर और सफेद कपडों से रेगिस्तान में दूर से कोई देख नहीं पाता। फिर भी काफिले को छितरे हुए चलना था। यानी सात-आठ लोगों के अलग-अलग दल बना दिए गए। हाफिज पहले ही दल में था।
बाबूजी ने उसे समझाया था कि सरहद पार कोई नाम पूछे तो लाला रमानी बताना है। उसे कई बार रटाया। लेकिन वो डर रहा था, उसने बाबूजी से कहा कि वे भी साथ चले। लेकिन बाबूजी ने समझाया अभी उन्हें बाकियों को पार पहुँचाना है, अंत में जाएँगे। छाछरों के उस रेगिस्तान में वो बाबूजी को अपने पीछे, बहुत पीछे छोडता जा रहा था। वो लम्बी फलाँगें नहीं मार रहा था, उसे बाबूजी से अपने पैर बँधे महसूस हो रहे थे। इस रेगिस्तान में भी वो दूर से गंजे हो चुके बाबूजी को आसानी से पहचान पा रहा था। सामने उसकी अपनी जमीन थी और पीछे छूटते बाबूजी का मोह भी था। अपने बचपन के उन दस सालों बाद इस पंद्रहवें साल में उसकी आँख में फिर आँसू थे। फिर रोना अभी-अभी कुछ देर पहले ही उसने सीखा था।
हाफिज को उसका नाम रटाते हुए ले जा रहे लोग सरहद से पहले ही अलग हो गए। बाकी और दूसरे रास्तों से चले, लेकिन उसे चौहटन की सरहर पर छोड दिया गया, जहाँ कोई गश्ती नहीं दिखाई दे रही थी। बाबूजी के दिए दो रुपए उसने अपनी धोती की गाँठ में बाँध रखे थे। बार-बार वहाँ हाथ लगाकर तसल्ली करता कि अब भी उसके पास पैसा है। चौहटन में वो किस ओर जा रहा था, खुद उसे भी नहीं मालूम, लेकिन हाँ वो चला जा रहा था। कहीं मिट्टी कंटीली थी तो कहीं मुलायम। यहाँ शाम होते जब कहीं दूर लालटेन जली तो उसे दिशा मिली बस्ती की।
बस्ती से कुछ दूरी पर उसने रात काटी। सुबह बस की पौं पौं से उसकी नींद खुली। पता चला कि वो बस के रास्ते के बीचोबीच ही सो रहा है। खलासी ने लगभग उसे लात मारते उठाया।
वो लगभग काँपते हुए उठा। उठते ही उसने हाथ जोड लिए थे, जैसा की बाबूजी ने उससे कहा था।
कांई भायो, कठै जाणो हो के आत्महत्या करबा नै सू तो है।
वो मुझे शहर तक जाना है।
बाडमेर जासी बस, चालै है कै?
हाँ, हाँ।
यह कहते वो बस में चढ गया। मन में कोई डर था, लेकिन बरसों बाद उसे वो जिंदगी मिली, जिसकी तलाश में वो आया। अपनी बोली सुनने को क्या मिली, वो तो मन ही मन बौरा गया। अपना माझी जैसे वो इस खलासी के बोल सुनकर ही भूल गया हो। मारवाड में जन्मे हाफिज को यह बोली कई देर तक अपने कानों में घुलती महसूस हुई। उसके आँखों के कोने भीग रहे थे। लेकिन पहली जरूरत सीट पर बैठ जाना था। कई महीनों से चल रहे पाँव थके से लग रहे थे। चप्पल के नाम पर पतला-सा चमडा बचा था। पैरों पर उसने कई जगह पट्टीयाँ बाँध रखी थी। उनमें कहीं टीस उठ रही थी। थके शरीर को सीट पर पसरते ही नींद आ गई।
कुछ ही घंटों के सफर के बाद खलासी ने झिंझोड दिया।
भायो, अठै ही उतरनो है, नी तो बस पाछी वठै ही छोड देसी, जठौ से तू आयो।
हाफिज पीछे जाने के नाम से डर गया। अपने दो कपडों की गाँठ जैसी गठरी को उठाया और बस से उतर गया।
वो अपनी जमीन पर बौराया-सा था। वो नहीं जानता था कि किधर जाना है। जल्दबाजी में खलासी से पूछ नहीं पाया कि जोधपुर की बस कहाँ से कब मिलती है। अब वो इस अनजान से शहर में मारा मारा घूम रहा था। वहीं किसी रास्ते पर वो देर तक बैठा रहा, उम्मीद में कि शायद यहाँ से कोई राह मिले उसके घर तक जाने वाली।
उस विशाल बरगद के नीचे वो पालथी मारे देर तक बैठा शाम हो गई थी और उसका पतला पेट कमर से चिपक रहा था। सुबह से कुछ घूंट पानी ही पी पाया था। थकान के मारे शरीर वहीं बरगद के गट्टे पर ही ढेर हो गया। देर रात आँख खुली तो उसने अपने आपको एक कमरे में पाया। आसपास देखा कोई न था। उसने संभाला तो उसकी गठरी उसके पास ही थी। दरवाजे से कोई वर्दी पहने आदमी अंदर आया और उसे खाने की थाली पकडा दी।
शायद तुम भूखे हो।
उसने बिना कुछ बोले थाली ले ली। भूख की वजह से वो कुछ सोच नहीं पा रहा था। उसने कुछ ही पल में थाली पूरी कर ली।
वर्दी वाला हँसने लगा।
कई दिनों से नहीं खाया?
जी।
ये पैरों में इतने जख्म क्यों हैं। क्या दूर से चलकर आए हो, सरहद पार से।
आखिर के शब्दों पर हाफिज सहम गया। उससे ना नहीं कहा गया। वो कुछ नहीं बोला।
कहाँ के रहने वाले हो।
इस सवाल पर हाफिज में कुछ हिम्मत आई।
जोधपुर।
जोधपुर से इधर क्यों आए, कहाँ जाना है?
जोधपुर ही जाना है भाई साहब।
तो यहाँ कहाँ से आ रहे हो?
बाबूजी ने कितना ही रटाया, लेकिन वो यहाँ झूठ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाया।
मीरपुर खास से।
क्या?
वर्दी वाले को शक तो था ही, उसके कह देने पर वो चौंकते हुए अपनी कुर्सी से उठा।
क्या तुम जानते हो, सरहद पार से चोर रास्ते से हिंदुस्तान आने की सजा?
सजा, सजा क्यों? मैं तो अपने ही घर जाने के लिए आया हूँ। अपनी ही जमीन पर लौटा हूँ ं। मुझे क्यों सजा हो। लौट आना कोई गुनाह तो नहीं।
पता नहीं कैसे उसने यह सब कहने की हिम्मत जुटा ली।
वर्दी वाले ने आसपास देखा, कोई न था। हवलदार शायद गश्त पर थे। वो उसके पास बैठ गया।
जोधपुर में कहाँ घर है तुम्हारा?
खाप्टे पर।
वहाँ किसको जानते हो, नाम तो बताओ।
उसे अपने बडे भाई की याद हो आई वो नायब तहसीलदार के नीचे इंस्पेक्टर हुआ करते। कहते- मारवाड में कहीं भी रास्ता भटक जाओ, तो मेरा नाम ले देना।
सैयद आमिर अली साहब का छोटा भाई हूँ।
वर्दी वाला झटके से उठ खडा हुआ।
घबराओ मत, तुम्हे कुछ न होगा। सो जाओ, सुबह घर के लिए रवाना हो जाना।
हाफिज इत्मीनान से उस पतली-सी लकडी की बेंच पर लेट गया। उसे यकीन था कि उसके भाई का नाम यहाँ तो चलता ही होगा।
सुबह उसकी आँख खुली तो वर्दी वाला उसके सामने ही था।
बाहर मेरे दो हवलदार हैं, वो तुम्हें घर तक पहुँचाएँगे।
वो चुपचाप हवलदारों के बीच जाकर खडा हो गया। वो जीप से रेगिस्तान के रास्ते नाप रहे थे। हालांकि पूरे रास्ते तीनों ने आपस में कोई बात न की। वो खामोशी को समझ नहीं पा रहा था। कभी तो डर जाता और कभी मन ही मन खुद को दिलासा देता कि भाई का नाम चल जाएगा।
जीप के हिचकोलों में उसे उंट की सवारी याद हो आई, जब भाई पहली बार सिवाना गए थे ऊँट पर तो उसे भी ले गए थे। ऊँट के हिचकोलों में उसे खूब नींद आई थी। अभी भी आ गई। मीलों के सफर के बाद नींच हिचकोलों में कहाँ टूटती है। उसका पूरा बदन एक सुकून में था। उस बदन की खुशबू यहाँ की हवा में मिली महसूस हो रही थी। नींद में भी उसके नथुने इस खुशबू को जोर-जोर से खींच रहे थे।
रास्त लम्बा था और उसकी नींद भी लम्बी। यह भी पाँच साल बाद उसकी आँखों में इतनी भरी थी कि सुकून से वो सो सके। उसकी उम्र का यह पंद्रहवां साल इतना सुकून में होगा, उसने नहीं सोचा था।
हवलदार ने झिंझोडकर उसे उठाया।
उठो खाप्टा आ गया।
गहरी नींद नहीं, लम्बे सपने से जागा था वो।
खाप्टा।
उसने जीप से सिर बाहर निकाल यहाँ वहाँ नजर दौडाई। आँखों में चमक उभरी और वो जीप से कूद पडा। उसे ऐसे कूदते देख दोनों हवलदार भी हँसी नहीं रोक पाए। लेकिन कुछ आदेश के चलते वो ज्यादा देर वहाँ नहीं रुक सकते थे। तुरंत निकलना था। इसलिए खाप्टे के कोने की परचूनी दुकान पर उसे बिना कुछ कहे ही छोड गए।
वो जीप को जाते देख हैरान था कि वो जिनका नाम नहीं जानता, वो यहाँ छोड भी गए और वो उनका शुक्रिया भी अदा न कर सका। शुक्रिया तो वो बाबूजी को भी कहना भूल गया था, जिन्होंने उसके सफर को दिशा दी। मंजिल तक पहुँचाने वाले इन तीन वर्दीधारियों को भी कुछ नहीं कह पाया। यह कौन थे, क्यों मदद की, यहाँ छोडकर क्यों चले गए? वो कुछ समझ नहीं पाया।
पलट के देखा तो वही मोड था यह, जहाँ से सबकुछ उससे छूटा था। वो उछल पडा कि उसकी धोती खुल गई।
यह देख परचूनी वाले बुजुर्ग ने उसको डांट लगाई।
कुण है रे? काँई करै है अठै? भाग।
उसके दिल और दिमाग में बिजली कौंध गई। उसने धोती को लूँगी की तरह लपेटा और दुकान में ही घुस आया।
काकोसा, काकोसा, मैं, मैं हाफिज।
रामावतार ने हैरानी से उसे देखा। बूढी आँखें फैल गई। उन्होंने दाएँ-बाएँ देखा, दुकान पर काम करने वाले छोरे को वहाँ से भाग जाने को डांट लगाई। उसके जाते ही उन्होंने हाफिज को गले लगा लिया।
और चुप रहने का इशारा किया। खामोशी से उसका हाथ पकडा और घर तक ले आया। घर का दरवाजा खोलने को हाफिज बेहद उत्सुक था, लेकिन रामावतार काकोसा ने उसका हाथ दबाया। उसने देखा कोई डर था, जो खामोशी से घिरा था। उन्होंने घर के दरवाजे का एक पट खोल उसे हाथ पकड अंदर कर दिया। खुद दरवाजा बंद कर लौट आए दुकान पर।
हाफिज घर के दालान में खडा उसे पूरे घर को देख रहा था। कुछ भी तो नहीं बदला था यहाँ इन पाँच सालों में। कुछ भी नहीं। सीढियों पर उतरती शाम उसने बरसों बाद देखी थी। वो पागलों सा सीढयिों पर दौडने-उतरने लगा। यह शोर देख अंदर चटाई के परदों के भीतर से आवाज आई।
कौन है, कौन है वहाँ?
एक जनानी आवाज सुन वो डर गया। सोचा कहीं घर किसी ओर को देकर अब्बा और भाई कहीं चले तो नहीं गए और भी जाने क्या-क्या सोचा उसने। तेजी से सीढियाँ उतर आया।
सामने कोई चार साल का बच्चा था।
कौन हो आप?
मैं, हाफिज हूँ, यह मेरा घर है।
हाफिज।
परदे की ओट से किसी औरत ने नाम दोहराया और दालान में आ गई।
तुम हाफिज हो, इसके अब्बा के भाई?
हाँ, मैं आमिर भाई का छोटा भाई हूँ।
पाकिस्तान से आए हो?
यह कहते वो पंद्रह साल के कमजोर शरीर वाले हाफिज का हाथ पकड सबसे कोने वाले कमरे में ले गई।
तुम जानते हो, यहाँ पाकिस्तान से आने वालों पर कितनी नजर रखी जा रही है। तुम्हें किसी ने देखा तो मुसीबत होगी। भाई सरकार के नौकर हैं, नौकरी पर बात बन आएगी।
हाफिज सहम गया। दीवार से चिपक गया जैसे। वो तो अपनी मिट्टी अपनी जमीन में नई जिंदगी शुरू करने आया था, लेकिन यहाँ तो उसे देख हर किसी का चेहरा डर में डूबा था।
भाभी, क्यों कोई मुसीबत खडी करेगा। यह तो मेरा अपना वतन है ना।
इस बारे में बात बाद में करेंगे। तुम्हारे भाई दौरे पर गए हैं। एक-दो दिन में लौटेंगे, तब सोचेंगे, क्या करना ह।
और अब्बा? अब्बा कहाँ हैं?
वो तो तुम लोगों के जाने के सालभर में ही अल्लाह को प्यारे हुए। तबसे मैं और आमिर अकेले थे यहाँ। अब यह तुम्हारा भतीजा है बस।
हाफिज की खुशी कहीं चली गई जैसे। अब्बा को उसने पाँच साल पहले आखिरी बार देखा था उस मोड पर। वो तो लौट आया मोड से, लेकिन अब्बा नहीं लौटने वाले।
पलंग पर बैठते वो हार मान चुका था। जोर, जोर से रोया।
भाभी ने प्यार से उसके कंधों पर हाथ रख दिलासा दिया।
रोओ मत भाई, सब ठीक होगा। पानी पी लो और आराम कर लो। मैं खाना ले आती हूँ। नहीं पहले गर्म पानी लाती हूँ। देखों पैर कितने जख्मी हैं तुम्हारे।
रोते हाफिज को नर्म लहजे ने चुप करा दिया। उसके जख्मों पर फाहे रख दिए। गर्म पानी में उसके पैरों को डूबोकर, वो घी ले आई। तौलिए से पैरों के तलवों को पौंछा और खूब घी मल दिया उन पर।
देखना जख्म जल्दी ठीक होंगे और दर्द भी जाता रहेगा।
दर्द तो वाकई जाता रहा। उसे अम्मा और अब्बा दोनों के हाथ इन नर्म हाथों में महसूस हुए। खाना खाकर उसे फिर गहरी नींद आ गई।
इस घर में दूसरा दिन उसके लिए खास रहा। सुबह उसे नर्म आवाज और नर्म हाथों ने उठाया।
चाचा, चाचा उठो। हम बहुत सारा खेलना है। बहुत सारा। चार साल के अतीक ने हाथ फैलाते हुए कहा।
पंद्रह सालों में इस तरह उठना भी उसके लिए पहला अहसास था। वो मुस्कुराते हुए उठा। कमजोर शरीर में जान न थी, लेकिन गोल-मोल अतीक को वो गोद में उठाने का मोह न छोड सका।
अरे, उतारो, उतारो इसे। बदन पर जोर पडेगा।
जिससे पहली बार मिला, वो बडी ही फिक्रमंदी से उससे कह रही थी और वो उन्हें मना नहीं कर सकता था। एक ही दिन में वो उसे अपनी-सी ही लगी। अम्मा-सी।
भाभी, बस कुछ थकान ही तो है। उतर जाएगी एक दो दिन में।
थकान ही नहीं उतारनी है, कुछ बदन भी बनाना होगा। यह लो पी लो।
भाभी ने एक काढे का प्याला उसके आगे कर दिया।
यह क्या है?
रामावतार काकोसा ने भिजवाया है। कहा है सुबह खाली पेट यही पीना है। गोंद की रवी जैसा कुछ है।
उसे अम्मा की बात याद हो आई कि इस घर में बीमार पडे, तो कई लोग खडे मिलते हैं खयाल रखने। अपनी मिट्टी नहीं, उसे तो अपने लोग भी मिल गए थे। लेकिन खडा वो नहीं हो पा रहा था। वो पलंग पर ही बैठा रहा। पूरा दिन उसने इसी कमरे में गुजारा। अतीक पूरे दिन उसके साथ यहीं रहा।
शाम होते घर के बाहर आहट हुई। भाभी ने पहले ही कह दिया था कि कमरे के भीतर ही रहें। वो आहट सुन भी बाहर नहीं आया। कुछ लोगों की बातचीत जरूर सुनाई दे रही थी। उन लोगों को दूसरे दिन का काम समझाकर रवाना किया गया और फिर दालान से आगे वो दो कदम बढे। रसोई बना रही अतीक की अम्मी को सलाम किया गया। वो सलाम का जवाब देती उठ खडी हुई और पास ही के कमरे में ले गई। हाफिज का पूरा ध्यान उधर से आ रही आवाजों पर ही था।
भाभी ने हाफिज के मीरपुर खास से यहाँ तक के सफर के बारे में बताया, बात पूरी होने से पहले ही वो उठ खडे हुए और दौडते हुए उस कोने के कमरे तक पहुंचे। उसे पलंग पर ना देख वो पलटे तो हाफिज सहमा हुआ, सिर झुकाए दरवाजे के पास खडा था।
यहाँ आओ, आओ।
कितनी रौबदार आवाज थी उनकी। उन्होंने हाथ फैला दिए थे, शायद हाफिज को डरा देख।
वो भाई से लिपट गया। रोते हाफिज को चुप कराते भाई ने उसे नई जिंदगी में नया नाम दिया।
आज से तुम्हारा नाम सैयद अली है। हाफिज को हममें से कोई नहीं जानता। ठीक।
उसने बस गर्दन भर हिला दी।
सालेहा, इसका खयाल रखो और सप्ताहभर में इसका डील-डौल मेरे जैसा हो जाना चाहिए।
जी।
और हाँ, अभी घर से बाहर या लोगों के सामने आने के लिए तुम्हें कुछ महीने इंतजार करना होगा। तब तक यह कमरा और अतीक। यही तुम्हारी जिंदगी हैं।
इससे बेहतरीन जिंदगी के बारे में सोचा ही नहीं भाई। घर में ही रहना चाहता हूँ। बरसों की लूँ, ठंडी न पडे तब तक घर से नहीं निकलूंगा। आप कहेंगे तो भी नहीं।
भाई ने हाफिज को गले लगाया। चार आँखों की कोरे भीगी हुई थीं।
अतीक के साथ ने 15 साल के हाफिज के बच्चा मन को जिंदा कर दिया था। अब वो भी भाभी से अपनी पसंद का खाना बनाने की जिद करता। खूब खाता, खूब सोता और अतीक के साथ खूब खेलता। घर में कुछ ही लोगों का आना जाना था, लेकिन हाफिज, आमिर और सालेहा का डर जाता रहा। कोई भी घर में उस नई आवाज की या किसी नए शख्स होने का सवाल ही नहीं करता। पडोसी जानकर भी अनजान ही बने रहे। कहीं से कोई शिकायत नहीं उठी। उस खाप्टे पर सबकुछ पहले की तरह ही था। कहीं कोई भनक नहीं थी कि कोई पाकिस्तान से इस मोहल्ले तक आया। कोई जख्म खामोशी से भरा जा रहा था। सामूहिक तौर पर। रामावतार काकोसा पहले की तरह ही देसी दवाई देने घर आते, लेकिन एक बार भी हाफिज के बारे में जिक्र नहीं छेडा।
यानी हर किसी ने अपने हाथों से मरहम ही रखा था हाफिज के गहरे जख्मों पर। जख्म मरहमों की इतनी परतों में दब गया कि वो जख्म ही नहीं रहा। कुछ हवाएं, कुछ मिट्टी, कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं, बिना कुछ कहे ही सर्द जिंदगी पर सुकून की गर्माहट ओढा देते हैं। उसे अपनी जमीन, अपनी मिट्टी से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन उसे उम्मीद से बढकर मिला था।
छह महीने में ही भाई का प्रमोशन हो गया। नायब तहसीलदार बन बिलाडा पोस्टिंग मिल गई। और ऐसे हाफिज का वनवास भी पूरा हुआ। नए लोगों के बीच आमिर अपने छोटे भाई को बिना झिझक मिलवाता।
जिंदगी का नया सिरा पुराने गलकर छूट चुके सिरे की भी भरपाई कर रहा था। कमजोर डील-डौल भाई आमिर की बराबरी करने लगा था। रंग रेत की तरह सुनहरा होता जा रहा था। भाई का रौब भी उसकी आवाज से झलकता, लेकिन, लेकिन पैरों की थकान नहीं मिटी थी। वो कभी दिन में कभी सोने से पहले अतीक को पैरों पर बैठा लेता। बस यही एक पीड थी, जो दिन में कभी उठती, कभी बैठती। जो उसे उसका मीलों का सफर हर दिन याद दिलाती। इन पांच बीते सालों में हाफिज के सैयद अली के नाम से कई कागज तैयार थे। भाई ने डीडवाना की पुश्तैनी जमीन, जो कस्टोडियम में चली गई थी, सैयद अली के नाम पर ही फिर खरीद ली थी।
उसी पाँचवें साल जोधपुर में आरएसी के लिए दौड हुई और आमिर अली का छोटा भाई सैयद अली भी सरकारी नौकर हुआ।
पहली ही पोस्टिंग असम लगी। जब भी घर आता, अपनी महीनों की जमा तनख्वाह अपनी भाभी के उन नर्म हाथों में पकडा देता, जिन्होंने सबसे पहले उसके दर्द को सहलाया था। भाभी उस तनख्वाह को एक गांठ में बांध देती।
हाफिज की जिंदगी को पाकिस्तान से हिंदुस्तान की साबित करने की जुगत में लगे रहे भाई-भाभी को उसकी शादी का खयाल भी उसकी नौकरी लगने के सालों बाद आया।
हाफिज को तो जैसे अब जिंदगी से कोई शिकायत नहीं रही थी।
जाहिदा और हाफिज दोनों ही हैरान से थे, जब भाभी ने गांठ में से पूरे 35 हजार रुपए निकाल उनके हाथ में दिए। हाफिज ने बताया कि आरएसी बटालियन में उसका साथी सैनी जी के घर के पास एक जमीन बिकाउ है। 30 हजार कीमत की है। भाभी ने झट 35 हजार धर दिए हाथ में। कहा- तुम्हारी अब तक की कमाई है।
भाभी ये तो आफ लिए थे।
तुम्हारे भाई जो कमाते हम तीनों में बहुत पडता है। मैंने तो तुम्हारे घर के लिए ही जोडे थे।
हाफिज ने इस बार भाभी के हाथ ही चूम लिए।
भाभी इन हाथों का सहारा न होता तो मैं ही न होता।
जोधपुर के खेतानाडी में हाफिज और जाहिदा का अपना घर, उसमें चार बेटे खुशहाल जिंदगी। बस रात की शुरुआत हाफिज से आज भी जरा मुश्किल ही कटती। सबसे बडे बेटे फिरोज को वो अपनी टाँगों पर बैठा लेते, कि उनके पैर भूल सके उस लम्बे चलने को। बेटा बडा होने लगा तो वो कई घंटों अपने अब्बा के पैर सहलाता। अब्बा बुदबुदाते, बहुत पीड है इन पैरों में, जरा जोर से सहला दे फिरोज। उसे वक्त जैसे वो अपने दर्द को दबाने की भीख माँग रहे होते। जाहिदा भी फिरोज के साथ उनके पैर दबाने और उनका दर्द हल्का करने में लग जाती।
इस पूरे खेतानाडी इलाके में वो अकेला परिवार था जो मुस्लिम था। लेकिन अपनी जमीन, अपनी मिट्टी में काहे का डर, सब अपने ही हैं। खाप्टे पर हाफिज ने यही देखा और यहाँ भी। बडे सुकून से कटती जिंदगी पर वे नाज करते। जाहिदा से कहते, देख मैंने मेरे पंद्रहवें साल में पहली बार अपनी जिंदगी के लिए फैसला किया, अपने वतन लौटने का, यहाँ के रिश्तों में जीने का। रिश्ते तो रिश्ते, दोस्त भी सैनी जैसे मिले जो इशारे पर जान दे दें। मोहल्ले में जो इज्जत है, वो कहीं ओर कहाँ मिलती?
सैनी जी और हाफिज दोनों ने साथ नौकरी की, साथ ही रिटायर हुए। दोनों के घरों की दीवार भी एक ही थी। दोनों ने रिटायरमेंट के बाद साथ घूमने के कई सपने देखे थे, लेकिन घर की जिम्मेदारी में सपने पूरे न हो सके।
रिटायर होते-होते चारों बेटों ने खुद ही डीडवाना वाले पुश्तैनी घर में रहने का फैसला कर लिया था। चारों में से सरकारी नौकर तो कोई नहीं हुआ, लेकिन रंग-रोशन में काफी नाम था फिरोज, अफरोज का। धीरे-धीरे चारों ही इस काम से जुडे। डीडवाना के व्यापारी उन्हें काम के लिए वहाँ बुलाते रहते। रोजी-रोटी का मौका वहाँ मिला तो पूरा परिवार वहीं चल दिया। हाफिज भी चाहता था कि उम्र के कुछ साल अपने बुजुर्गों के घर में बिता लें। जिसे बडे भाई ने कस्टोडियम से उन्हीं के नाम खरीदा था। भाई की यादें लिए वो इस घर में आ गए थे।
चारों बेटे यहाँ अच्छा कमा लेते। छोटी जगह पर सेठ बहुत थे। उन्हीं के घरों के साथ आसपास की जगहों से भी उन्हें खूब काम मिल जाता। एक छह महीने के सीजन में सालभर का जुटा लेते।
यहीं बसने का मन जब सभी ने बना लिया तो चारों ने अब्बा से इजाजत चाही कि जोधपुर वाले घर को बेच डीडवाना में ही चारों के लिए घर बनवा दिए जाएं। अब्बा को परेशानी ना थी। वो तो अपनी मिट्टी में यहाँ -वहाँ रहकर ही खुश थी। अपने वतन में थे, यही बहुत था। उन्हें पता था, सैनी जी को भी अपने बेटे के लिए पास ही का घर चाहिए। वो कई बार हाफिज से कह चुके थे कि कीमत से ज्यादा रकम वो देने को तैयार हैं। जब हाफिज ने मन बनाया, तब तक उनकी नजर और जबान दोनों में फर्क आ गया था। पिछली बार जब वो सैनीजी से बात करने गए तो उन्होंने गाली देकर निकाला था उन्हें। हाँ, पाकिस्तानी कह देना उनके लिए गाली जैसा ही था। पाकिस्तानी क्यों, उन्हें अफगानिस्तानी, बांग्लादेशी या अमेरिकी भी कह देता तो उनके लिए वो भी गाली ही थी। उन्हें कोई इस मिट्टी से अलग कर देखे, यह उनसे बर्दाश्त न होता।
आज वो नींद में बुदबुदाए नहीं चिल्ला रहे थे।
फिरोज, फिरोज, बहुत जोर की पीड उठी है।
पास बैठी जाहिदा घबरा गई। फिरोज, अफरोज भी आ गए।
वो आंखें बंद किए, पैर पटक रहे थे। लगातार चिल्ला रहे थे।
पीड उठ रही है, दबा दो इसे, पीड उठ रही है।
फिरोज, अफरोज दोनों ही पैरों को जोर-जोर से दबाने लगे। जाहिदा ने सिर सहलाया। कुछ देर में चिल्लाना फिर बुदबुदाने में बदल गया।
पैरों में पीड उठ रही है, दबा दो। पीड फिर उठी है।
हाफिज ने नींद में देखा, सन्नी बाबूजी, वो वर्दी वाला, दो हवलदार, रामावतार काकोसा, भाभी के हाथ, पडोसियों की खामोशी, न जाने कितनी ही तहों में उन जख्मों पर मरहम रखा गया था। एक बार में ही सारी तहें उधड गई। इस बार पैरों में पीड इतनी उठी कि चीखें भीतर दबने लगी। साँसें भी। बुदबुदाते सोए हाफिज अली अगली सुबह खामोश हो गए। उनके पैरों की ये पीड आखिरी थी।

सम्पर्क द्वारा इकरामुद्दीन खान (एडवोकेट),
डी-156, ड्राइडन पब्लिक स्कूल के पास,
हसनुपरा ए (*), जोधपुर - 302006