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ट्राॅफी

सरिता कुमारी
किवाड खोलते ही चरमराहट की आवाज, निस्तब्धता का सीना चीर कर, माहौल में एक अनचाही गूँज पैदा कर गई। यह गूँज उसकी स्मृतियों की मजबूत दीवार में भी सेंध लगा गई। बदरंग, धूल- धूसरित किवाड के पीछे अनमना सा खडा, वह सोच में था कि घर की बैठक के साथ सटे हुए इस छोटे-से कमरे के भीतर कदम बढाए या नहीं। उसने कुछ झिझक के साथ कमरे में एक उडती निगाह डाली। कमरा धूल और मकडी के जालों से अटा पडा था। न जाने कब से बंद पडा था। न जाने कब तक यूँ ही बंद पडा रहता अगर बाबूजी के जाने के बाद, इस मकान को बेचने की फिक्र में उसे यहाँ आना नहीं पडता।
अब जब आया था तो इस कमरे का आकर्षण उसे इसके पास खींच ही लाया था। कमरे के लकडी के दरवाजे के जंग लगे सांकल पर लटकता, जंग लगा पुराना ताला, पत्थर की कितनी मजबूत चोटों के बाद टूटा था। पुरानी चीजों की मजबूती पुरानी स्मृतियों सी हैरान करने वाली होती है। उसे सचमुच उम्मीद नहीं थी कि जंग लगे ताले को तोडने में उसे पूरा आधा घण्टा लगेगा। ताला तोडने के बाद वह उदासी से उसे थोडी देर घूरता रहा था। इस ताले ने कभी उसके सपनों ओर इच्छाओं पर भी बेरहमी से ताला जड दिया था।
एक गहरी साँस छोडकर मकडी के जाले हाथ से हटाता, वह कमरे में घुस आया था। पर जाले थे कि लाख छुडाने पर भी जहाँ - तहाँ उसके कपडे और शरीर पर बेतरह चिपक गए थे जैसे भूली इच्छाओं की चुभती स्मृतियों का मजबूत जाल उस पर डाल रहे थे। स्मृतियाँ लाख छुडाने पर भी मकडी के जाले-सी परत दर परत उससे चिपक रही थीं, वह छुडाना चाह रहा था पर इस कोशिश में और उलझता जा रहा था।
वह कमरे की एक - एक चीज को गौर से देख रहा था। कभी यह बहुत छोटा-सा खूबसूरत कमरा, इस घर में रहने वाले परिवार के सदस्यों के गौरव का केन्द्र बिन्दु होता था। करीने से सजा - सँवरा, इस घर के एक विशेष व्यक्ति की उपलब्धियों का बखान करता हुआ। पर अब खास कुछ नहीं रखा था उस कमरे में, सिवाय एक पुरानी लकडी की मेज के ऊपर करीने से रखी हुई उस ट्राॅफी के सिवा। ट्राॅफी... वही ट्राॅफी... वह ठगा-सा देखता रह गया।
उसे शक तो था कि ये ट्राॅफी कहीं इस बंद कमरे में तो नहीं रखी थी... पर शक ही था, यकीन नहीं। जब सब के सब पदक और ट्राॅफियों को उसके सामने ही बाबूजी गुस्से में उठाकर बाहर ले गए थे तो उसे यकीन नहीं हुआ था कि वह सच में उन्हें बाहर तालाब में फेंक आएँगे... इस ट्राॅफी को भी। उसे तो अब तक यही लगता रहा था कि बाबूजी इसे भी फेंक आए थे, तो क्या यह सच नहीं था? वह भी इसे कभी नहीं फेंक पाए जैसे वह अपने जेहन के किसी मजबूत कोने में चिपकी इसकी यादें कभी नहीं नोंच कर फेंक पाया था। तो ये यहाँ पडी है बरसों से... धूल मिट्टी से अटी, बदरंग पर अब भी स्वरूप में उसी भव्यता के साथ। वह नम आँखों के साथ मुस्करा दिया... एक दर्दीली मुस्कान। कितना कठिन दिन था वह। उसके अब तक के पैंतालीस बरस के सम्पूर्ण जीवन का सबसे मुश्किल दिन।
सटाक... सटाक पतली केन उसकी फैली हथेलियों पर पड रही थी। इस एक घटना की याद आते ही, उसकी आँखें बरबस ही छलक पडी थीं। पेट से सिसकी का गुबार उठा और गले तक आकर घुट गया। कभी हल्की-सी चपत भी न लगाने वाले पिताजी ने कितना मारा था उसे उस दिन।
फिर जाएगा खेलने, बोल, फिर जाएगा? फिर से स्कूल बंक करेगा, बता? मैं हाडतोड मेहनत करता हूँ कि तू कुछ पढ - लिख जाए... पर नहीं तुझे तो भूत सवार है खेलने का... खिलाडी बनेगा... चैम्पियन बनेगा... समझ में नहीं आता तुझे कि बरबाद हो जाएगा।
वह गुस्से में पागल हो गए थे और घर के पीछे बँसवाडी से बिजली की फुर्ती से पहली बार एक पतली केन तोडकर उस पर पिल पडे थे। वह पतली केन उसके थके शरीर पर बरसा रहे थे और मुँह से बरसते शब्दों में अपने जीवन भर की भडास।
बाबूजी, नहीं बाबूजी, मत मारो, माफ कर दो... आगे से नहीं जाऊँगा। वादा करता हूँ, बाबूजी, कभी नहीं जाऊँगा... प्लीज, बाबूजी, मत मारो। वह दर्द से बिलबिला रहा था और गिडगिडा रहा था। बाबूजी के इस रूप की तो उसने कभी कल्पना तक नहीं की थी।
क्या पाएगा खेलकर, तेरे बाप ने क्या पा लिया खेलकर... कुछ नहीं मिलेगा इन ट्राॅफियों से... पेट की आग नहीं बुझेगी इनसे। जिन्दगी नहीं चलेगी। यहाँ फुटबॉल खेलकर कुछ नहीं हासिल होगा...किसी का जीवन नही सँवरा...तेरा क्या सँवरेगा! समझता क्यों नहीं तू ... अपने बाप को देखकर भी कुछ नहीं सीखता...!
कहते - कहते उन्होंने बाँस की तीखी केन फेंक दी थी और खुद भी रो पडे थे। फिर बिजली की फुर्ती से उठे थे और बैठक से जुडे इसी छोटे से कमरे में सजे, सारे पदक और ट्राॅफी एक चादर में बटोरकर, घर से बाहर निकल गए थे। दर्द से तिलमिलाए तन - मन के साथ वह उनके पीछे - पीछे भागा था। घर के पीछे के तालाब में बेरहमी से उन्होंने उठाकर, उस खनखनाती गठरी को गहरे पानी में फेंक दिया था। वह रोना भूलकर अवाक देखता रह गया था। वापस आकर, उन्होंने इस कमरे में साँकल चढाकर,मजबूत ताला जड दिया था, मानो अपने जीवन के बीते दिनों पर भी ताला जड दिया हो।
बाबूजी का यह अप्रत्याशित मेलोड्रामा, उस दिन उसे बिल्कुल समझ में नहीं आया था। उसके दुःखते तन पर कई दिन तक माँ गरम हल्दी-तेल मलती रही थीं। वह सुबक कर रहा जाता था, माँ उसे खींचकर अपनी गोद में छुपा लेती थीं। बारह बरस की उम्र में, उसके सबसे खूबसूरत ख्वाब का कत्ल हो गया था, उसके अपने ही पिता के हाथों उस दिन।
उसे नशा था फुटबॉल का, गाढा नशा। फुटबॉल की एक झलक और उसकी धमनियों में बिजलियाँ दौडने लगती थीं। मैदान में जब वह उतरता था तो मानो फुटबॉल को भी उससे इश्क हो जाता था, मानो एक - दूसरे के जादू में बँधे वे फिरकी से नाचते थे मैदान में और देखने वाले यह खेल मुग्ध होकर देखते रह जाते थे। वह खेलना चाहता था और बस खेलना चाहता था। उसे यकीन था, वह एक दिन इतना अच्छा खेलेगा कि देश की टीम में होगा, जैसे कभी उसके बाबूजी खेले थे देश की टीम में।
घर पर सजे पदक और ट्राॅफियाँ, उनके उत्कृष्ट खेल का बखान आज भी करते थे। विनय की नन्हीं आँखें छुटपन से उन्हें देखकर आत्मविभोर रहती थीं। उसकी मासूम आँखों में वह सुनहरे रंग की चमचमाती बडी सी ट्राॅफी, किसी जादू से कम नहीं लगती थी। वह रोज थोडी देर अपलक उसे निहारता था और अद्भुत खुशी और गर्व से भर जाता था। माँ ने न जाने कितनी बार उसे बताया था कि यह ट्राॅफी बाबूजी को एक महत्त्वपूर्ण मैच में, सबसे अधिक गोल करने के लिए मिली थी। यह जानते हुए भी वह बार - बार पूछता और माँ बिना चिढ, हर बार हँस कर जवाब देती थीं।
मैं भी जीतूँगा एक दिन, अम्मा, इससे भी बडी ट्राॅफी एक दिन, देखना तुम...
माँ उसकी इस बात पर अनमनी-सी मुस्करा देतीं तो वह जोश में कहता।
माँ, सच में, मैं बाबूजी से भी अच्छा... बहुत अच्छा खेलूँगा एक दिन...
माँ हमेशा बात बदल देतीं और कहतीं, पढाई पर ध्यान दे विन्नू, तेरे बाबू जी को नहीं पसंद कि तू खिलाडी बने... जानता तो है बेटा, कितनी बार तो कह चुके वो कि खेल - कूद तभी तक ठीक है जब तक पढाई पर जरा भी असर न आए।
पर, बाबूजी भी तो एक खिलाडी बने थे...
उन्हें इसी बात का तो मलाल है विन्नू... उन्हें लगता है जो गलती उन्होंने की, वो गलती उनका बेटा न दोहराए... ढंग से पढ-लिख गए होते, तो अपने सहपाठियों की तरह ढंग की नौकरी में होते, कमा - खा रहे होते...ऐसे पाई -पाई के लिए हाडतोड मेहनत नहीं कर रहे होते...!
माँ कि इस बात पर विनय चुप हो जाता था, यही बात तो बाबूजी भी बार -बार कहते रहते थे। विन्नू पढने में अच्छा था, अपनी क्लास में हर परीक्षा में पहले तीन स्थान पर तो रहता ही था, दो बार तो क्लास में फर्स्ट भी आ चुका था। बाबूजी को लगता था वह ऐसे ही पढता रहा, तो उसका भविष्य उज्ज्वल है, सुरक्षित है।
खिलाडियों का इस देश में कोई भविष्य नहीं...! वह प्रायः बहुत हताश होकर कहते। विन्नू सहम जाता था।
वह पढाई में जितना अच्छा था, खेल में उससे भी अधिक अच्छा था। उसे लगता था, एक दिन जब वह बहुत बडा खिलाडी बन जाएगा तो बाबूजी की राय बदल जाएगी। वह खुद भी तो एक बहुत अच्छे खिलाडी थे, फिर ऐसी बातें क्यों करते थे।
इसीलिए करते हैं विन्नू, जो उन्होंने भुगता है, वह तुझे भुगतते हुए नहीं देखना चाहते, समझाकर बेटा! कहकर माँ इस बहस पर विराम लगा देतीं।
पर विन्नू कहाँ मानने वाला था, जब भी समय मिलता वह फुटबॉल में मग्न रहता, अपने मोहल्ले में वह बडे-बडे लडको से भी अच्छा खेलता था। मोहल्ले की फुटबॉल टीम का वह सबसे मजबूत खिलाडी था। अधिकांश मैच उसके बलबूते ही जीत जाते थे वे। दुर्गा पूजा के पहले मोहल्ले के लडकों ने दूसरे मोहल्ले की टीम के साथ मैच रखे थे। विन्नू के बिना ये मैच तो होने ही नहीं थे।
पर आपने तो मैच दिन में रख दिए संजू भइय्या, मेरा तो स्कूल होगा मैं कैसे खेलूँगा।
एक-दो दिन स्कूल की छुट्टी कर ले विन्नू! बडी मुश्किल से सेट हुआ है सबकुछ। हम भी तो स्कूल से छुट्टी मारेंगे उस दिन। एक - दो दिन में कुछ नहीं होता। पर तेरे बिना मैच जीतना लगभग असम्भव है विन्नू। जानता तो है... कर ले न छुट्टी। संजू भइय्या ने बडे मान से उससे अनुरोध किया था।
बाबूजी बहुत नाराज होंगे भइय्या, वह कभी नहीं मानेंगे कि मैं स्कूल का नागा करूँ।
नहीं होंगे... जब हम जीत जाएँगे, तो उन्हें भी बहुत अच्छा लगेगा। वो भी तो एक फुटबॉल प्लेयर थे कभी... वो नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा... इसमें कुछ भी गलत नहीं विन्नू। अपने मोहल्ले की इज्जत तेरे ही हाथ में है।
विनय भी यह मैच किसी हालत में छोडना नहीं चाहता था। उसे भी लगा एक - दो दिन स्कूल नहीं गए तो किसे पता चलेगा। पर ऐसी बातें कहाँ छुपती हैं, बाबूजी को पता चला गया और उसकी उम्मीद के विपरीत उसकी ऐसी जबरदस्त मरम्मत हो गई थी।
अतीत में विचरते विनय के जेहन में बार-बार ये सवाल हथौडे सा बज उठता, पर ये ट्राॅफी यहाँ कैसे रह गई थी? विनय दिमाग पर जोर डालकर सोच रहा था। उस दिन जल्दबाजी में पिताजी से ये छूट तो नहीं गई थी, पर इतने करीने से कैसे रखी है? तो क्या बाद में कभी इस कमरे को खोला था किसी ने और पीछे छूट गई इस ट्राॅफी को सँभाल कर रख दिया था... पर बाबूजी ने तो चाबी भी तालाब में फेंक दी थी... तो क्या कोई और भी चाबी थी उस ताले की... क्या पता? हार मानकर विनय ने इस विषय पर अपनी सोच को विराम दिया। क्या जाने क्या हुआ था? पर ट्राॅफी तो सालों बाद भी इस बंद कमरे में मेज के बीचो-बीच चौधरी-सी उसी जगह विराजमान थी।
विनय अपनी माँ से किया वादा कि वह इससे बडी और खूबसूरत ट्राॅफी लाएगा एक दिन जब बाबूजी से भी बडा फुटबॉल प्लेयर बन जाएगा। सोचते हुए एक गहरी हताशा से भरी साँस छोडकर रह गया।
उस वक्त तो नहीं पर धीरे - धीरे उसे बाबूजी की वह हताश प्रतिक्रिया समझ में आ गई थी। उसे समझ में आ गया था कि उन्होंने उसे गुस्से में नहीं बल्कि अपने ही भय से लडने में असफल होने पर प्रतिक्रिया स्वरूप उसे उस दिन कूट दिया था। वह बहुत अच्छे खिलाडी थे कभी और खेल के चक्कर में पढाई में पिछड गए थे। दसवीं भी मुश्किल से पास कर पाए थे। जब खेल का भूत उतरा, तो देखा जीवन की पक्की जमीन नदारद थी। खेल के कोटे से जो नौकरी मिल रही थी, वह मनमाफिक नहीं थी। उनके सहपाठी जो पढने में अच्छे थे, अच्छे पदों पर पहुँच गए थे, तो वह छोटी- मोटी नौकरी कैसे करते। बिजनेस में हाथ-पैर आजमाने की कोशिश की पर व्यवसायियों वाली बुद्धि के अभाव में बुरी तरह असफल होते रहे। कई धन्धे बदले, कर्ज में अलग डूबते चले गए। आर्थिक स्थिति सच में बेहद खराब थी।
इस पुराने मोहल्ले के केन्द्र में स्थित उनका ये घर ही सहारा था। पुराने जमाने का बना एक मजबूत घर जिसमें कई कमरे थे, आगे - पीछे खूब जमीन, जिससे जुडा एक पुराना तालाब था। जब हालात बहुत खराब थे तब इसी मकान के कुछ कमरे किराये पर चढा दिए गए थे, जो उनकी आय का एकमात्र स्थायी स्रोत था।
कई व्यवसाय बदलने के बाद अंत में कपडे का व्यापार बाबूजी की किस्मत को रास आया था और उनकी लडखडाती आर्थिक हालत थोडा सँभली थी। तब तक वह बारहवीं कर चुका था और अपने फुटबॉल प्रेम को बेरहमी से अपने दिलोदिमाग में दफन कर चुका था। उसके पीछे दोनों छोटे भाई भी कभी खेल के प्रति अपनी दीवानगी का रंच मात्र भी प्रदर्शन नहीं कर पाए। उस दिन की उसकी पिटाई और पदक व ट्राॅफियों की वह जलसमाधि, एक दुःखद अनहोनी थी, जिसे कोई भी दोहराना नहीं चाहता था। जब वह बारहवीं में बहुत अच्छे अंकों से पास हुआ, तो बाबूजी की आँखें छलक पडी थीं।
विन्नू तुम सबसे बडे हो बेटा। जिस राह जाओगे, छोटे भाई भी उसी राह जाएँगे। तुम्हें आगे - आगे उनका रास्ता साफ करना है...जीवन में एक सुरक्षित राह चुनने में ही भलाई है बेटा!
विनय ने चौंक कर उनकी तरफ देखा था और अनकहे का अर्थ समझते हुए धीमी आवाज में बस इतना ही कह पाया था।
जी, पिताजी कोशिश करूँगा!
विन्नू एक दिन समझोगे बेटा कि मैं गलत नहीं था।
उन्होंने थूक गटकते हुए कठिनाई से कहा था। विनय ने उनकी आँखों में छलकता दर्द महसूस किया था और उस वक्त कुछ और नहीं बोल पाया था। एम. कॉम. करने के तुरन्त बाद ही विनय एक प्रतिष्ठित सरकारी बैंक में पी.ओ. की परीक्षा में सफल होकर, उच्च अधिकारी के पद पर नियुक्त हो गया था। अच्छी तनख्वाह, सुख सुविधाएँ, सुरक्षित कॅरियर। पिताजी गद्गद थे उसकी सफलता पर।
समय के साथ दोनों छोटे भाई भी पढ - लिखकर उच्च पदों पर नियुक्त हो गए थे। बूढे माता - पिता को विनय अपने साथ ही ले आया था। उनके पीछे छूटा ये घर, बंद ही पडा था। कुछ कमरे किराए पर चढे थे जिससे साफ - सफाई और घर की देखभाल होती रहती थी। कुछ माह पहले ही कुछ दिनों के अन्तराल में, माँ - बाबूजी दोनों परलोक सिधार गए थे। विनय और उसके भाइयों को लगा कि ये घर - जमीन अब बेच देनी चाहिए। इसी विचार को अंजाम देने वह बरसों बाद इस घर में आया था। माँ - बाबूजी की पहले की तरह सशरीर उपस्थिति नहीं थी इस घर में अब। और इसीलिए इस कमरे को हाथ लगाने का साहस जुटा पाया था वह।
अतीत से गुजरते हुए वह ट्राॅफी पर हौले - हौले बरसों की जमी धूल हटाने लगा। कैसा तो चमकीला रंग था यह कि अब भी धुँधली ही सही इसकी पीली रंगत बरकरार थी। हाथ से, फिर अपनी शर्ट उतारकर रगड - रगड कर उसने काफी धूल उतार दी। बरसों बाद वह ट्राॅफी मानो फिर खिल उठी और उसके साथ ही मानो बीता वक्त जिंदा हो गया।
उसके बाबूजी जिन्दा हो गए। निस्संदेह बाबूजी के प्राण बसते थे इसमें तभी तो वह इसे कभी फेंक नहीं पाए थे। वह अभिभूत-सा उसमें झिलमिलाता अपना चेहरा थोडी देर घूरता रहा, सहसा उसे लगा कि उसका चेहरा उसके बारह बरस के बेटे में बदल गया। उसका बेटा विभु जो फुटबॉल का दिवाना है और बिल्कुल वैसे ही खेलता है जैसे कभी वह खेलता था। फुटबॉल और विभु में बिलकुल वैसा ही इश्क है जैसे कभी उसका था। जब कभी उसने विभु को फुटबॉल खेलते देखा था, वह भौंचक रह गया था, फुटबॉल यों उसके इशारे पर नाचती थी जैसे उसकी जर-खरीद गुलाम हो। विभु भी एक बहुत बडा फुटबॉल का खिलाडी बनना चाहता है। विनय भी दबे स्वर में उससे बार-बार कहता रहता है, खेलों पर पढाई का रत्ती भर भी हर्जा नहीं होना चाहिए।
नहीं होगा पापा पढाई का हर्जा ... खेलना भी तो जरूरी है हेल्थ के लिए...। विभु कभी-कभी बोल पडता है।
जाने क्यों और कैसे वह भी अपने बाबूजी की भाषा ही बोलता है विभु से। विभु कभी सुनता है और कभी अनसुना कर देता है। विनय के मन में ऐसे पलों में केन की सटाक... सटाक की क्रूर धुन सुनाई पड रही होती है और वह खुद में ही सिमट जाया करता है घबराकर।
हाथ में ट्राॅफी लिए विनय, सहसा फफक कर रो पडा। थोडी देर यूँ ही रोता रहा फिर न जाने किस आवेग में कमरे से तेजी से बाहर निकला और तेज कदमों से चलता हुआ घर के पीछे तालाब के किनारे जाकर खडा हो गया।
वहाँ खडा वह हरे-मटमैले तालाब के पानी को गौर से देखता रहा न जाने कितनी देर तक। बचपन में उस घटना के बाद वह इस तालाब के आस- पास भी फटकने से कतराता था। पर आज वह तालाब के उस हिस्से को घूर रहा था, जहाँ बाबूजी ने एक झटके में पूरी ताकत से पदकों और ट्राॅफियों से भरी वह खनकती पोटली तालाब में अन्दर की ओर फेंक दी थी। पोटली गहरे पानी में बुडबुड की आवाज के साथ पल में ही डूब गई थी, ऊपर बुलबुले तैरते रहे थे। वह कुछ देर खडा अतीत की उस जानलेवा बुडबुड की उदास धुन को सुनता रहा। बनते - फूटते उन बुलबुलों को चुपचाप देखता रहा।
विनय के दिलोदिमाग में भी उस पल, अतीत के उन बुलबुलों के साथ, कई बुलबुले बन रहे थे, फूट रहे थे। उन बुलबुलों में कभी फुटबॉल का एक नामी खिलाडी बन उसका बेटा विभु झिलमिलाने लगता तो कभी उसी की तरह एक नियत सुरक्षित जिन्दगी जीता एक नौकरीपेशा विभु। किसी बुलबुले में उसके पिताजी की तरह घोर आर्थिक तंगी से जूझता विभु तैरने लगता तो किसी बुलबुले से सटाक... सटाक की भयावह आवाज के साथ साँप की जिह्वा सी लपलपाती पतली बाँस की केन...उसकी ओर लपकने लगती।
वह समझ नहीं पा रहा था कि किस बुलबुले को वह फूटने से पहले अपनी हथेली में सुरक्षित सजा ले। वह जब सोच - सोचकर थक गया और किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सका तो फिर झटके से मुडा और तेज कदमों से वापस चल पडा। हाँ, पर एक बात तो वह तय कर चुका था कि उसके विभु की हथेलियों और पीठ पर तीखी केन की सटाक-सटाक की विनाशकारी आवाज कभी नहीं गूँजेगी। यह सोचते हुए सुनहरे रंग की उस भव्य ट्राॅफी को उसने कसकर अपने सीने से भींच ली। मानो वह ट्राॅफी, ट्राॅफी नहीं बल्कि उसके अपने बाबूजी हों। सहसा, उसे लगा, ट्राॅफी के ठण्डे, मजबूत, अद्भुत स्पर्श में उसके बाबूजी बडी कोमलता से उसके दिलोदिमाग में तारी अतीत के भयावह जाले साफ कर रहे हों। अनिर्णय की धार कुन्द हो गई और निर्णय की तीखी, चमकीली धार जगमगा उठी।
वह ट्राॅफी को सीने से लगाए इस विश्वासभरे निर्णय के साथ घर की ओर चल पडा कि एक दिन उसका विभु इससे भी बडी और खूबसूरत ट्राॅफी लेकर आएगा। कभी इस ट्राॅफी को देखते हुए उपजा, उसकी नन्हीं आँखों का जो सपना, अधूरा ख्वाब बनकर रह गया था, वो सपना उसकी विभु की आँखों में हकीकत बनकर तैरेगा। विभु के ख्वाब, उसके ख्वाबों की तरह अधूरे नहीं रहेंगे। इसके लिए एक पिता के नाते वह जो कुछ भी कर सकता है, करेगा। इन विचारों से ओत-प्रोत उसका मन-मस्तिष्क अगाध सुकून से भर गया। ट्राॅफी ने उसके बरसों पहले राख हुए सपनों में एक नई चिन्गारी पैदा कर दी थी। एक बुलबुला जिसमें विभु अन्तर्राष्ट्रीय फुटबॉल मैच खेलने में तल्लीन है, उसने मन की हथेलियों में सुरक्षित संजो लिया था।

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