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जहाँ ईश्वर नहीं था

गोपाल माथुर
आँख कुछ देर से खुली। बाहर सुबह जैसा कुछ भी नहीं लगा, हालांकि सूरज निकल चुका था, पर वह घने बादलों के पीछे कैद था। बारिश बादलों में लौट गईं थी और हवाएँ भी थक कर पेडों की डालों पर सुस्ता रही थीं। घर के सामने वाली सडक पर जगह जगह पानी के गड्ढे जमा थे। जब कोई कार या स्कूटर गुजरता, रुका हुआ पानी हवा में उडने लगता था। बारिश में भीगी कुछ चिडियाएँ बिजली के तारों पर अपने पंख सुखा रही थीं।
सब कुछ ठीक वैसा ही था, जैसा बारिश की किसी सुबह हो सकता है। बस, मुझ ही सुबह में सुबह की अनुभूति नहीं हो पा रही थी। क्षण भर के लिए मुझे लगा कि कहीं यह शाम का धुँधलका तो नहीं! पर मैं जिस खिडकी पर खडा हुआ था, वह पूर्व दिशा की ओर ही खुलती थी। घने बादलों के बावजूद भी सुबह का पहला आलोक वहाँ से मुझे ही ताक रहा था। समय तो सुबह का ही था !
मैं एक बार फिर बिस्तर पर लेट गया। मुझ न तो उठने की इच्छा हो रही थी और न ही सो जाने की। लेटे लेटे मैं देर तक छत की ओर ताकता रहा। मुझे लगा, जैसे वहाँ एक नीला समुन्दर हो, जिसकी उत्ताल तरंगें सूरज को लील जाना चाहती हों। पर कुछ समुद्री परिन्दों ने उन्हें रोक रखा था।
यह मुझे कैसे अनुभव हो रहे थे !
खिडकी पर लगा पर्दा जोर से हिला, तब मैं तन्द्रा से जागा। रुकी हुई हवा फिर से चलने लगी थी। जैसे स्टेशन पर रुकी हुई रेलगाडी फिर चल पडी हो। मैं उसकी आवाज को सुन सकता था। वह मुझे रौंदती हुई गुजर गई, पर मैं कुछ भी महसूस नहीं कर सका। न ठंड, न कोई कँफपी, कुछ भी नहीं। मुझे जरा-सी खरौंच तक नहीं आई थी। बस, इतना अवश्य हुआ कि अब मेरे लिए और देर लेटे रह पाना असंभव हो गया था।
मैं उठा और आदतन सीधा रसोई में चला गया। मैंने चाय का पानी चढाया, हालांकि सुबह का समय होने के बाद भी मुझे चाय की तलब महसूस नहीं हो रही थी। गैस पर पानी किसी चिडचिडी बुढिया की तरह खदके जा रहा था।
सहसा मेरा ध्यान अपने पाँवों की ओर गया। मुझे आश्चर्य हुआ कि मैं नँगे पाँव था। मैंने चप्पलें नहीं पहनी हुई थीं, जिन्हें मैं बिस्तर से उठते ही पहना करता था। मैं चाहता तो जाकर चप्पलें पहन सकता था, पर मुझे इसकी कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुई। आश्चर्य तो यह था कि मैं अपने नंगे पाँवों के नीचे कुछ भी महसूस नहीं कर पा रहा था।
लौटते समय मैंने देखा कि दीवार पर लगी घडी की दोनों सइयाँ टूटी पडी थीं और एक तिलचट्टा वहाँ बिखरा हुआ समय खा रहा था।
चाय का मग लिए मैं बॉलकनी में आ बैठा। आदतन मैं ऐसा ही किया करता था। आराम कुर्सी पर बैठ कर मैंने चाय की एक घूँट भरी, लेकिन मुझ कोई स्वाद नहीं आया। हॉकर अखबार फेंक गया था, जो मेरी कुर्सी के पास ही पडा हुआ था। मैंने अखबार उठाया और बिना तह खोले ही छपे हुए काले अक्षरों को ताकता रहा। उन्हीं चिर परिचित समाचारों की टूटी बिखरी लाइनें बाहर निकल कर जोर-जोर से चीख रही थीं। वे चीखें मेरी पुरानी परिचिता थीं पर मेरी उत्सुकता जाग्रत नहीं कर पा रही थीं। मैंने तहाया हुआ अखबार वैसे ही रख दिया। वे चीखें भी कट गईं।
मैं फिर से चाय पीने लगा। चाय मीठी थी कि कडवी, या फिर स्वादहीन, मुझे कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था।
पहली बार मुझे लगा कि मुझे कुछ हो गया था। कुछ ऐसा, जो नहीं होना चाहिए था। मैं वह मैं नहीं रह गया था, जो कल रात सोते समय था। भीतर कहीं कुछ खाली सा अवश्य लग रहा था, वैसे नहीं, जैसे बर्तन उडेल देने के बाद वह खाली हो जाया करता है, बल्कि जैसे गिलहरी के फुदक कर चले जाने के बाद मुंडेर खाली लगा करती है। पता नहीं क्यों, बॉलकनी में बैठे रह पाना संभव नहीं हो पा रहा था। अन्ततः मैं उठा और अन्दर चला आया। मैं क्यों बॉलकनी में बैठ नहीं पा रहा था और क्यों उठ कर अन्दर चला आया था, मेर पास इन प्रश्नों का भी कोई मुकम्मल उत्तर नहीं था।
क्या मैं रोबो में तब्दील हो गया था ?
मैंने अपने हाथ पर च्यूँटी काटी, लेकिन मुझ कुछ भी महसूस नहीं हुआ। न च्यूँटी का काटा जाना और न ही कोई दर्द। लाल त्वचा मुझ विद्रूपता से ताक रही थी। सहसा मैंने अपने दोनों हाथों में मुट्ठियाँ बाँधी और उन्हें जोर से दीवार पर कई बार दे मारा। दोनों मुट्ठियों की सरहदों पर लाल खून के चिकत्ते जमा हो गए थे, लेकिन मैं कुछ भी महसूस कर पाने के दायरे से परे चला गया था।
***
पहली बार मुझे लगा कि मैं मर चुका था।
पहली बार मुझे लगा कि वह चिडिया उड गई थी, जो मेर अन्दर घर बना कर रहा करती थी।
पहली बार मुझे लगा कि मैं देह से जीवित था, लेकिन भीतर से मर चुका था।
***
यह एक विचित्र अनुभव था। पर चूँकि यह अनुभव मैं महसूस कर पा रहा था, इसलिए इसका सीधा-सा अर्थ मैंने यह निकाला कि मैं मरने और नहीं मरने की सीमा रेखा पर खडा हुआ था। एक ऐसी सीमा रेखा, जहाँ जीवित रह कर भी मरा जा सकता था और मर कर भी जीवित रहा जा सकता था, जहाँ अनुभूतियाँ दस्तक तो देती थीं, पर उन्हें महसूस नहीं किया जा सकता था। यही वह नीला समुन्दर था, जिसके न तो पार जाया जा सकता था और न ही इस पार रहा जा सकता था।
ऐसा भी नहीं कि मुझ इस अजीबोगरीब स्थिति से डर लगा हो। मेरे मन में कहीं कोई बेचैनी नहीं थी और न ही कोई छटपटाहट थी। सिर्फ एक अथाह खालीपन था, जो मुझ में पैर पसारे बैठा हुआ था। जिसके गोल घूमते भँवर में मेरे महसूस करने की क्षमता कहीं गहरे में समा गईं थीं।
तभी मेरी पत्नी मोर्निंग वॉक से लौटी।
तुमने चाय पी ली? घर में आते ही उसने पूछा।
हाँ।
मैं अपने लिए बना रही हूँ। तुम और लोगे?
अ.... हाँ.....नहीं, रहने दो। मैं यह निर्णय नहीं कर पा रहा था कि मुझे और चाय पीनी चाहिए कि नहीं !
महत्त्वपूर्ण चाय नहीं थी, बल्कि यह अहसास था कि मैं निर्णय ले पाने की स्थिति में नहीं रह गया था। ऐसा भी नहीं कि इस अहसास ने मुझे असमंजस में डाल दिया था अथवा भयभीत कर दिया था। मैं पूर्ववत् शान्त और संवेदनहीन महसूस कर रहा था.....कोरा और निचाट !
मैं सोफे पर बैठ गया और मैंने टीवी ऑन कर दिया। टीवी के दृश्य बाहर निकल कर कमरे में फैल गए थे और आवाजें मेर कानों से टकरा कर लौट रही थीं। छत का नीला समुन्दर सब कुछ निगलता जा रहा था। निरर्थकता पाँव पसारे बैठी हुई थी।
कुछ देर बाद पत्नी भी वहीं आ बैठी। मेर मना कर देने के बाद भी वह दो कप चाय बना लाई थी। चाय का कप देखते ही मुझ उबकाई-सी महसूस हुई। अन्दर कुछ था, जो बाहर आना चाह रहा था। सुबह की पहली चाय भी जैसे बाहर आने का रास्ता ढूँढ रही थी। मैं टीवी पर से निगाह हटाकर चाय को ताकने लगा था।
तुम्हें क्या हो गया है? पत्नी की चिन्ता किसी गेंद की तरह लुढक कर मुझ तक आ गई थी।
क्या हो गया है ! मैंने प्रतिप्रश्न किया।
पता नहीं, पर हुआ कुछ जरूर है। सारी रात तुम बडबडाते रहे थे।
क्या कह रही हो!
सच कह रही हूँ। कल रात तुम बहुत हो गया, बहुत हो गया बडबडा रहे थे.... क्या बहुत हो गया? पत्नी चाय पी रही थी।
मुझे क्या मालूम ! मैं निर्विकार भाव से पत्नी को देखने लगा था, जरूर कोई सपना देख रहा होऊँगा।
नहीं, वह सपने में बडबडाना नहीं था.... जैसे तुम पूरी तरह जागे हुए थे और कुछ कहना चाह रहे थे।
मुझे कुछ याद नहीं.... ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं स्वयं तो नींद में होऊँ और मेरी आवाज बाहर भटकती रहे!
उस मेरी बात समझ में नहीं आई, नहीं बताना चाहते तो मत बताओ, पर इस तरह की उलझी हुई बातें तो मत करो !
एक बार मन हुआ कि मैं पत्नी को सब कुछ बता द, उसे नीले समुन्दर के बारे में बता दूँ जिसे मैंने लेटे-लेटे अपने कमरे की छत पर देखा था, उस भंवर के बारे में बता दूँ जिसने मेरे अहसासात लील लिए थे।.... पर मुझसे एक शब्द भी नहीं बोला गया। यह भी नहीं कि कैसे मैं सुबह से ही बुझा हुआ और निचाट महसूस कर रहा था ! भाषा किसी शब्दकोश में जा छिपी थी।
चाय खत्म करते हुए पत्नी ने कहा, आज ऑफिस में एक मीटिंग है। मुझे जल्दी जाना होगा। मैं कार ले जाऊँ ?
हालांकि वह मुझसे कुछ पूछ रही थी, लेकिन वह प्रश्न कम और सूचना ज्यादा थी। पर मुझे कोई खीज महसूस नहीं हुई थी। पत्नी ने मानो कोई प्रश्न किया ही नहीं था। मैं वैसे ही निर्विकार बैठा रहा।
तुम स्कूटर ले जाना। पत्नी ने निर्णय सुनाया।
ठीक है।
मैं चुप रहा। पत्नी के लिए गए निर्णय से दरअसल मुझे कोई अन्तर नहीं पडा था। वह अपने रोजाना के कामों में व्यस्त हो गई थी, जबकि मेरा मन कुछ भी करने का नहीं हो रह था। पेट में कुछ ऊब-डूब होने लगी थी, पर वह कम से कम भूख तो किसी हाल में नहीं थी।
खिडकी के बाहर बिजली के तार पर बैठा एक कौवा मुझे घूर रहा था। क्या वह अपना हिस्सा लेने आया था?
इस बार बैठे रहना दूभर हो चला था... नहीं, मैं पूरी तरह मरा नहीं था। कुछ अहसासात अभी भी मुझ में साँस ले रहे थे। यह जान कर मुझ खुश होना चाहिए था, पर चाह कर भी खुश होने का कोई भाव मैं अपने भीतर जगा नहीं पा रहा था। यह अवश्य लगा कि मुझे कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे इस जडता को तोडा जा सके। लेकिन क्या, यह निर्णय कर पाना अब मेरे लिए संभव नहीं रहा था।
मुझे याद आया कि मुझ भी दफ्तर जाना होता है। मैं उठा और मैंने यन्त्रवत दफ्तर जाने के लिए अपने कपडे निकाले, जूते पॉलिश किए, प्रतिदिन की तरह बैडरूम व्यवस्थित किया, और शेव बनाने शीशे के सामने जा खडा हुआ। हर घटना एक व्यर्थ के रुटीन में बदल चुकी थी, जैसे कोई कैसेट बार-बार बजाया जा रहा हो।
अरे! शीशे में यह कौन था ! इतने भद्द से कान, खिचडी से बाल, किसी फटे हाल भिखारी सी आँखें....शीशे में से मेरा चेहरा भी मुझे पहचान नहीं पा रहा था। इतनी वीरानी तो पहले कभी इस चेहरे पर नहीं थी। क्या मुझमें कोई और आकर रहने लगा था ?
मैं यह सब सोच ही रहा था कि रेजर में ब्लेड डालते हुए मेरी अँगुली कट गई और खून बहने लगा। मैं अपने बहते खून को वॉश बेसिन में टपकते हुए देखता रहा। मुझ आश्चर्य हुआ कि न तो मुझ दर्द महसूस हो रहा था और न ही कोई परेशानी। मैं चुपचाप अपने बहते खून को देखता रहा। पूरा वॉश बेसिन लाल हो गया था।
तभी पत्नी वहाँ आई और इतना खून देख कर उसकी जोर से चीख निकल गई। पत्नी की चीख मेर कानों में पडी, तब जाकर मुझ होश आया।
यह क्या हो गया? पत्नी ने पूछा।
क्या हो गया? मैंने पत्नी का प्रश्न दोहराया।
तुम्हारी अँगुली से खून बह रहा है।
मैंने बहते खून को इस तरह देखा, मानों पहली बार देख रहा होऊँ, ब्लेड से अँगुली कट गई है। तुम घबराओ मत, मैं डिटौल लगा लेता हूँ।
पत्नी ने जल्दी से सामने के कैबिनेट से डिटौल और रूई निकाली और मेरी अँगुली में लगाने लगी, ऐसे कैसे कट लग गया? तुम अपना जरा भी ध्यान नहीं रखते।
मैं वहीं एक कुर्सी पर बैठ गया और पत्नी को देखता रहा, जो अब वॉश बेसिन साफ करने में लगी हुई थी और आदतन लगातार बोले जा रही थी। पहली बार मेरे मन में विचार आया कि मेरी पत्नी जिन्दा थी, पूरी तरह जिन्दा, मेरी तरह सपंदनविहीन नहीं।
हाँ, यही समय है उसे सब कुछ बताने का, मैंने सोचा।
सुनो, मुझे तुमसे कुछ कहना है। मैं धीरे से बुदबुदाया।
पत्नी ने वाश बेसिन की सफाई करते करते अपना सिर मेरी ओर घुमाया, क्या?
पत्नी की निगाहें मुझ पर लगी हुईं थीं। मैं अपनी पत्नी की उत्सुकता का महज हल्का-सा अन्दाज ही लगा पा रहा था।
क्या? पत्नी ने अपना प्रश्न दोहराया। वह कुछ सुनना चाह रही थी, कुछ ऐसा, जो उसे पता नहीं था।
एकाएक मुझ कुछ भी याद नहीं आया कि मैं कहना क्या चाह रहा था, पर अगले ही क्षण मुझ अपनी विचित्र स्थिति का ख्याल हो आया, मुझे लगता है कि मैं मर गया हूँ।
पत्नी सफाई करते करते सहसा रुक गई और औचक मुझे देखने लगी। फिर जोर से हँस पडी, तो मेरे सामने क्या तुम्हारा भूत बैठा हुआ है !
नहीं, मैं सच कह रहा हूँ। मैंने अपनी बात पर कायम रहते हुए स्थिर स्वर में कहा। मेरी आवाज में कोई उत्तेजना नहीं थी, मैं मर गया हूँ और जीवित हूँ।
पत्नी ने इन व्यर्थ की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं ली। उसे घर का काम निपटा कर ऑफिस भी जाना था, रात को कोई बुरा सपना देखा था क्या?
नहीं, कोई सपना नहीं देखा था.... तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा है?
अचानक वह अपना काम छोड कर मेरे सामने आ बैठी, यह तुम्हें क्या हो गया है? सारी रात बडबडाते रहे थे.... रात को ज्यादा पी ली थी क्या?
मैं कल रात की बात याद करने की कोशिश करने लगा, पर यकायक कुछ भी याद नहीं आया, तुम जानती हो कि मैं ड्रिंक्स का शौकीन नहीं हूँ। दो पैग से ज्यादा कभी लेता नहीं.... मुझ पर विश्वास करो, मैं सचमुच मर गया हूँ।
इस बार उसके चेहरे पर चिन्ता की लकीरें उभर आईं थीं। वह ध्यान से मुझे देखने लगी कि कहीं मैं झूठ तो नहीं बोल रहा था, लेकिन चूँकि मैं झूठ नहीं बोल रहा था, इसलिए मेरे चेहरे पर झूठ का कोई भाव नहीं था।
क्या उसे नीला समुन्दर दिख गया होगा? वह भँवर...और वह कौवा, जो अपना हिस्सा माँगने आया था?
तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा न! पर अभी तुमने देखा न कि ब्लेड से मेरी अँगुली कट गई थी, खून बह रहा था, पर न तो मुझे दर्द महसूस हो रहा था और ही कोई परेशानी हो रही थी। मैंने कहा, जैसे छोटी-सी यह घटना मुझे मृत सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण हो।
वह एकटक मुझे देखती रही, संभवतः तोल रही थ कि मैं किस हद तक उसे परेशान कर सकता था। थोडी देर बाद वह उठी ओर मेरे पास आकर बैठ गई। उसने मेरा हाथ अपने हाथों में लिया और उस अँगुली को ध्यान से देखने लगी, जिस पर रूई का फाया अभी भी लगा हुआ था। अचानक उसने मेरी कटी हुई अँगुली को जोर से मरोडा। रुका हुआ खून फिर से बहने लगा था। इस बार भी पहले की तरह मुझे कोई दर्द महसूस नहीं हो रहा था।
कुछ महसूस हुआ? उसने पूछा।
कुछ भी नहीं...
मुझे लगता है, तुम्हें किसी डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
डॉक्टर....?
किसी साइकिएट्रिस्ट को.... एक साइकिएट्रिस्ट ही तुम्हारा इलाज कर सकता है। पत्नी ने अपना निर्णय सुनाया, मैं हितेश से बात करती हूँ।
हितेश, यानी कि डॉक्टर हितेश, मेरी पत्नी का स्कूल फ्रेन्ड।
***
हितेश के प्रति मेरी धारणा विशेष अच्छी नहीं थी। मुझे हमेशा लगता था कि मेरी पत्नी और हितेश के बीच कुछ चल रहा था, कुछ ऐसा, जो नहीं चलना चाहिए था। हालांकि इसका कोई ठोस सबूत मेरे पास नहीं था। बस, एक बार मैंने उन दोनों को एक रेस्तराँ में अकेले लंच लेते हुए देखा था, जिसका उसने मुझसे कभी कोई जिक्र नहीं किया था।
पर उस दिन पत्नी की हितेश के यहाँ जाने की घोषणा के बावजूद भी मेरे मन में हितेश के प्रति कोई दुर्भावना पैदा नहीं हुई थी और न ही मेरे मन में पत्नी पर किसी प्रकार का गुस्सा या द्वेष उत्पन्न हुआ था। मैं निर्विकार बैठा रहा, जैसे वह मेरी पत्नी नहीं, किसी दूसरे की पत्नी हो।
इसका एक मात्र कारण यह था कि मैं भी कमरे में रखे सोफे, टीवी, कम्प्यूटर, मेज, कुर्सियों की तरह सामान में बदल चुका था। अन्तर केवल इतना था कि मैं चल फिर पा रहा था, बातें कर पा रहा था... पर केवल इतने भर से आप किसी को जीवित तो नहीं मान सकते न! मुझे कोई उम्मीद नहीं थी कि डॉक्टर कुछ कर पाएगा।
जब हम डॉक्टर के क्लीनिक पहुँचे, वहाँ पहले से ही कुछ मरीज बैठे हुए थे। उनके चेहरे वैसे ही थे, जैसे प्रायः अस्पतालों में पाए जाते हैं। चारों ओर फिनायल की गंध फैली हुई थी। दीवारों पर मानसिक बीमारियों सम्बन्धित चार्ट लटके हुए थे, जो सान्त्वना देने के लिए कम, डराने के लिए ज्यादा थे।
काउन्टर पर बैठी तीन आँख वाली लडकी ने पत्नी को देख कर मुस्कराई। तीसरी आँख से वह, वह सब देख लेती थी, जो अन्यथा नहीं देखा जा सकता था। वह पत्नी को पहचानती थी। उसने पत्नी को संकेत कर अपने पास बुलाया और बोली, मैम, डॉक्टर साहब ने आपको ऊपर बुलाया है।
ओके। पत्नी ने कहा।
डॉक्टर का घर क्लीनिक के ऊपर ही था। खास मिलने वाले मरीजों को वह ऊपर ही देखा करता होगा, मैंने सोचा। पत्नी उसके लिए खास रही होगी। वह मेरे आगे आगे चल रही थी। वह क्लीनिक के सारे रास्ते जानती थी। क्लीनिक के सारे गलियारे, दरवाजे, खिडकियाँ उससे बात कर रहे थे, जो इस बात का गवाह थे कि वह यहाँ प्रायः आया जाया करती है। देखा जाए तो मेरी इस खोज से मेरी पत्नी और हितेश के सम्बन्धों को लेकर मेरा संदेह गहरा जाना चाहिए था, किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैं तटस्थ भाव से पत्नी के पीछे चलता रहा।
सीढियाँ सीधे हितेश के ड्राॅइंग रूम में खुलती थीं। पीछे की ओर खिडकियाँ थीं, जहाँ से वह नीला समुन्दर दिखाई दे रहा था, जिसे सुबह मैंने अपने घर की छत पर देखा था। वह काला कौवा भी वहीं कहीं होगा, पर मुझे दिखाई नहीं दिया।
हितेश हमारी ही प्रतीक्षा कर रहा था। उसकी पत्नी भी वहीं थीं। हम सोफे पर बैठ गए। सोफा दर्द से बिलबिलाया। केवल एक मैं ही उसकी बिलबिलाहट सुन सकता था। मुझे लगा, जैसे कुछ कबूतर भी सोफे की कैद से आजाद होकर खिडकियों पर बैठ गए हों।
हितेश, इन्हें एग्जामिन करो। ये सुबह से ही बहकी बहकी बातें कर रहे हैं। पत्नी ने बिना एक क्षण का भी समय गंवाए कहा।
हुआ क्या है? हितेश ने पूछा।
इन्हीं से पूछो.... पत्नी ने मेरे स्थान पर उत्तर दिया।
हितेश मेरी ओर घूमा। उसने मेरी आँखों में आँखें डालीं और सीधा प्रश्न किया, बताइये, क्या हुआ।
हितेश का प्रश्न मेरे कानों में बजता रहा। मैं उसकी आँखें देख रहा था, जहाँ पिछली रात का सपना अटका हुआ था। क्षण भर के लिए मुझे याद नहीं आया कि मुझे हुआ क्या था ! मैंने हितेश की आँखों में अपनी पत्नी को ढूँढने का प्रयास भी किया, पर बिना किसी ईर्ष्या के। पत्नी उसकी आँखों में अपने सम्पूर्ण बनाव श्ाृंगार के साथ बैठी हुई थी।
बताओ न ! पत्नी का आग्रह से भरा स्वर उभरा।
क्या बताऊँ डॉक्टर ! मुझे तो खुद ही समझ में नहीं आ रहा है कि मुझे हुआ क्या है? मैंने अपनी लाचारी प्रकट की। जब आदमी को कुछ समझ में नहीं आता, तब वह बगलें झाँकने के अतिरिक्त और कर भी क्या सकता है ! हालांकि मुझे खीज आनी चाहिए थी पर नहीं आई।
शायद पत्नी इस उत्तर की अपेक्षा नहीं कर रही थी, नहीं, इन्हें कुछ हुआ जरूर है। ये देखो, सुबह इनकी अँगुली कट गई थी, बहुत सारा खून भी बहा, पर इन्हें कोई दर्द महसूस ही नहीं हो रहा था। पत्नी ने एक साँस में अपनी बात कह डाली थी।
ऐसा कैसे हो सकता है! हितेश ने अपनी शंका प्रकट की।
ऐसा ही हुआ है और वह भी मेरे सामने। पत्नी ने अपनी बात पर जोर देते हुए तुरंत कहा।
वह कुछ देर चुप बैठा रहा। फिर गम्भीर आवाज में बोला, मुझे इनसे अकेले में बात करनी होगी।
यकायक सन्नाटा छा गया। उनका सीधा-सा अर्थ था कि दोनों महिलाएँ वहाँ से उठ कर चली जाएँ। वे दोनों यदि स्वयं उठ कर चली जाती, तब बात अलग थी, किन्तु जब कोई आपको फोर्सफुली जाने के लिए कहे, तब एक अजीब-सी मनःस्थिति हो जाती है।
पर उनके पास हितेश की बात मानने के अतिरिक्त कोई चारा भी नहीं था। उन दोनों के चले जाने के बाद हितेश मेरे पास सरक आया, जैसे हमारे बीच कोई भेद भरे संवाद होने हो। उसने मेरे दोनों हाथों को अपन हाथों में ले लिया और फुसफुसाया, अब बताओ, हुआ क्या है?
मैं चुप बैठा रहा। यदि मैं उसे बता देता कि मैं मर चुका हूँ, तो निश्चय ही वह मेरा मजाक उडा देता, दरअसल मुझे सुबह से ही कुछ महसूस नहीं हो रहा है....
क्या सिर पर कोई चोट वगैरहा लगी थी ?
नहीं।
कोई डिप्रेशन?
मैंने अपना सिर हिलाया।
ऑफिस या घर में कोई कॉम्प्लीकेशन?
बिल्कुल भी नहीं।
कुछ देर तक वह मुझे देखता रहा। फिर सोचते हुए बोला, नीचे क्लीनिक में चलो। कुछ एग्जामिनेशन्स करने पडेंगे।
उसने मेरे अनेक क्लीनिकल एग्जामिनेशन्स किए। सभी रिपोर्ट्स नोर्मल निकली। दिल भी सामान्य गति से धडक रहा था, साँसें भी यथावत चल रही थीं और आँखें भी ठीक थीं।
अन्त में उसने घोषणा की, आप बिल्कुल ठीक हैं... सिर्फ आपको शॉक ट्रीटमेन्ट की जरूरत है...
उसन मुझे बिजली के झटके लगाए, क्या कुछ महसूस हुआ?
नहीं, डॉक्टर... कुछ भी नहीं।
अब डॉक्टर के बेचैन होने की बारी थी। उसके इतने वर्षों का अनुभव कोई काम नहीं आ रहा था। खीज कर उसने मुझसे खासा बुरा व्यवहार करना शुरू कर दिया। उसने मुझे बताया कि वह मुझे शुरू से ही नापसंद करता रहा था। वह मुझे गंदी गंदी गालियाँ देने पर उतर आया था और मुझ यह बताना भी नहीं भूला कि यदि मैं बीच में नहीं आता, तो आज मेरी पत्नी उनकी पत्नी होती!
मुझे गुस्सा दिलाने या चिढाने के उसके सारे प्रयास व्यर्थ जा चुके थे। मुझ पर रत्ती भर भी प्रभाव नहीं पडा था।
इस बीच उसके कमरे का सारा सामान हवा में घूमने लगा था। किसी निश्चित गति से नहीं, बेतरतीब-सा, जैसे तेज अंधड में न जाने क्या क्या इधर उधर उडने लगता है !
चैम्बर में सिर्फ उसी की आवाजें गूँज रही थीं। एक आवाज दूसरी आवाज का गला घोटने को आमादा थी, जबकि मैं चुपचाप उसका बोलना सुन रहा था और शायद उसकी असिस्टेंट भी। वह बोलना भी नहीं था, सिर्फ होठों का फडफडाना था। जैसे ऊपर वाला होठ नीचे वाले से कुश्ती लड रह हो। काफी देर तक बडबडाने के बाद जब वह चुप हुआ, तब वह जोर-जोर से हाँफ रहा था। उसे साँस लेने के लिए बार-बार सतह पर आना पड रहा था। उसका चेहरा पसीने से तर था और वह थका हुआ लग रहा था।
थोडी देर खामोशी छाई रही।
आपको इस तरह मेरा नाराज होना बुरा लगा होगा, इसके लिए मैं माफी चाहता हूँ। कुछ देर बाद डॉक्टर ने कहा।
नहीं, डॉक्टर, मुझे जरा भी बुरा नहीं लगा। दरअसल मुझे कुछ महसूस ही नहीं हो रहा है। मैंने उसे सीधे देखते हुए कहा।
जरा-सा भी नहीं...?
जरा भी नहीं। मैंने झिझकते हुए कहा, डॉक्टर साहब, मुझे लगता है कि मै कि मैं मर गया हूँ... मर गया हूँ और जिन्दा हूँ।
यकायक कमरे में शान्ति छा गई, असीम शान्ति। अँधड भी थम गया और कमरे का सामान यथावत अपनी-अपनी जगह पर आ लगा।
डॉक्टर प्रेसक्रिप्शन पर कुछ लिखते लिखते अचानक रुक गया। अब वह मुझे ध्यान से देख रह था और अपना बॉल पेन अपने हाथ में घुमाए जा रहे था, आपको ऐसा कब से लग रहा है?
आज सुबह से...
सुबह ऐसा क्या हुआ था ?
कुछ भी नहीं।...मैं रोज की ही तरह सोकर उठा, मैंने चाय बनाई, पर मुझे कोई स्वाद नहीं आया... अखबार पढने का प्रयास किया, पर पढ नहीं पाया... शेव बनाना चाहता था, लेकिन अपनी अँगुली कटा बैठा...
यह तो कोई कारण नहीं हुआ....
डॉक्टर, महत्त्वपूर्ण ये घटनाएँ नहीं हैं, महत्त्वपूर्ण यह है कि मैं इन्हें करते हुए कुछ भी महसूस नहीं कर पा रहा था। मैंने सुबह की सारी घटनाएँ डॉक्टर को विस्तार से बताईं, यह तो कुछ भी नहीं, आफ इलेक्ट्रिक शॉक तक मैं सहजता से झेल गया, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो!
डॉक्टर की निगाहें अब तक मुझ पर गडी हुई थीं।
मुझे पूरा विश्वास है कि यदि आप मेरी एक टाँग या हाथ काट दें, तब भी मैं उफ तक नहीं करूँगा। मैंने कहा।
इस बार वह कुछ ज्यादा बेचैन दिखाई दिया, जैसी कि मेरी पत्नी यह सच जानने के बाद सुबह घर पर दिखाई दे रही थी, जैसे कि मेरी पत्नी का चेहरा उनके चेहरे पर चस्पा हो गया था।
अपनी हथेली मेज पर रखो।
अभी मैंने हथेली मेज पर रखी ही थी कि उसने पूरी ताकत लगा कर अपना बॉल पेन मेरी हथेली के बीचोबीच घौंप दिया। खून की एक धार फूट निकली थी। उसका पेन मेरी हथेली में धँसा हुआ था।
डॉक्टर की असिस्टेंट जोर से चीख पडी थी।
और मुझे लगा, जैसे किसी चीटीं ने काटा हो! बस!!
दर्द हुआ? डॉक्टर ने पूछा।
नहीं...जरा भी नहीं।
उसने जल्दी से पेन बाहर खींचा और चिल्ला कर अपनी असिस्टेंट से ड्रेसिंग करने के लिए कहा। वह डसिंग रूम की ओर भागी और जल्दी से एक ट्रोली ले आई, जिसमें ड्रेसिंग का सामान रखा हुआ था। बिना एक भी पल गंवाए उसने ड्रेसिंग मेरे जख्म पर लगा दिया। मैंने देखा कि वह काँप रही थी, जबकि मैं जडवत बैठा हुआ था। यन्त्रणा का एक भी भाव मेरे चेहरे पर नहीं था।
आपकी कुछ और जाँचें करवानी होंगी। फिलहाल आप ये दवाईयाँ ले लीजिए। वह बोला और अपने कपडे झाडने लगा, जिन पर अभी अभी आए अँधड की गर्द जमा हो गई थी।
***
मैं क्लीनिक के कम्पाउन्ड में अपनी कार के पास यूँ ही खडा रहा और पोर्च में गिरे पेड के पत्तों को देखता रहा। मैंने कब उन्हें गिनना शुरू कर दिया था, मुझे स्वयं ही इस बात का पता नहीं चल पाया था। जरा-सी भी हवा चलती, तो पत्ते उडने लगते और मुझे फिर से गिनती शुरू करनी पडती।
मुझे ठीक से नहीं मालूम कि पत्नी को आने में कितना समय लगा। वह समय से बाहर का समय था, जो अपनी अस्मिता खो कर स्वयं को ढूँढ रहा था। मैंने समझने का प्रयास किया कि उस अपरिभाषित समय में मैं कहाँ था? शायद वहीं या कहीं नहीं... कहीं समय के दायरे से परे तो नहीं! यह एक भयानक अहसास था, जिससे मुझे डर जाना चाहिए था, पर मैं डर नहीं रहा था। मैं अनवरत संज्ञाविहीन बना हुआ था।
मैंने अपनी हथेली को देखा, जिस पर पट्टी बँघी हुई थी। गहरे लाल रंग का एक चिकत्ता ठीक बीचो-बीच उभर आया था। क्षणभर के लिए मुझे विश्वास नहीं हुआ कि वह मेरा ही खून था। डॉक्टर के अनुसार वह मेरे जीवित होने का पुख्ता सबूत था जबकि मेरे मर जाने का सबूत मेरे मन के भीतर कहीं गहरे छिपा हुआ था।
तभी पत्नी बाहर आई। बहुत सारी घबराहट उसके चेहरे पर चस्पा थी। मैं तटस्थ भाव स उसे आते हुए देख रहा था।
तुम घबराओ मत। तुम्हें कुछ नहीं हुआ है। यह एक प्रकार का मेन्टल डिसऑर्डर है... दिमाग का नर्वस् सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा हैं। दवाइयाँ लोगे, तो ठीक हो जाओगे।
तब तक ऐसा ही रहूँगा ? मैंने पूछा। हालांकि मैं अपनी इस हालत से जरा भी परेशान नहीं था।
तुम बिल्कुल ठीक हो..अच्छा बताओ, मैं कौन हूँ!
तुम मेरी पत्नी हो।
हम कहाँ गए थे ?
डॉक्टर के पास।
देखा, तुम्हें सब कुछ पता है... तुम्हें कुछ नहीं हुआ है।
पत्नी के इतने आसान विश्लेषण से मैं हतप्रभ रह गया। मुझे यह भी लगा कि चूँकि मैं हतप्रभ रह गया हूँ, इसका सीधा-सा अर्थ यह निकलता है कि मैं थोडा बहुत जीवित अवश्य हूँ। पर यह कैसा विचित्र जीवित होना था, जिसमें जीवन का लेश मात्र भी अंश नहीं था!
रास्ते से दवाइयाँ खरीदते हुए हम घर आ गए। उसने न तो मुझे ऑफिस जाने दिया और न ही खुद गई।
***
फिर मैं अकेले ही घर से बाहर निकल आया। रास्ते कहीं खो गए थे और अब वहाँ एक लम्बी अंधेरी सुरंग थी, जिसमें मुझे टटोलते हुए आगे बढना पड रहा था। यूँ तो सुरंग में अंधेरा था, पर थोडी देर बाद आँखों ने अंधेरे में देखने की कूवत हासिल कर ली थी। सुरंग की दीवारों पर सीलन थी, पता नहीं वे आँसू थे कि आहें ! शायद मैं रोना चाहता था, किन्तु रो पाना मेरे बस में नहीं था।
आप कुछ करना चाहें और नहीं कर सकें, इससे बडी त्रासदी और क्या हो सकती है ! हालांकि मैं इस अहसास को पूरी तरह महसूस कर पाने की स्थिति में नहीं था, किन्तु यह अवश्य लग रहा था कि कुछ अनचाहा अवश्य घटित हो रहा है।
शायद मैं बहुत देर उस सुरंग में चलता रहा था। गहरा अंधेरा और घुटन होने के बावजूद भी न तो मेरा दम घुट रहा था और न ही मुझे साँसों की जरूरत महसूस हो रही थी। मैं कहाँ जा रहा था और क्यों जा रहा था, इन प्रश्नों का मेरे पास कोई माकूल जवाब नहीं था। बस, चलते जाना था, क्योंकि चलने के अतिरिक्त कुछ और किया जाना संभव नहीं था।
काफी देर बाद मुझे रोशनी का एक मुहाना दिखाई दिया। पता नहीं मैं उस मुहाने तक पहुँचा था या वह मुहाना स्वयं मेरे पास खिसक कर आया था। पर इतना तो मुझे अहसास हो ही गया था कि वह मुहाना मुझे उस सुरंग से निजात दिला देने वाला था।
जहाँ में बाहर निकला, वह एक शहर था। ऊँची-ऊँची इमारतें, भागता दौडता ट्रेफिक, तेज आवाजें, एक दूसरे से अपरिचित लोग, हाँफती-काँपती साँसों में बिंधी जिन्दगियाँ... और एक दम तोडती नदी, झुलसे हुए पेड, धुँए में लिपटा आकाश...
मैंने एक बेनूर-सी लडकी को सडक के किनारे बहते गंदे नाले के पास सिसकते हुए देखा।
तुम कौन हो ? मैंने उससे पूछा।
मुझे नहीं पहचानते ! मैं ऑक्सीजन हूँ।
मैंने सद्भावना से उसके सिर पर हाथ फेरा, तुम्हारा यह क्या हाल हो गया है ! मैं तुम्हारा इलाज करवाऊँगा।
तभी एक पुलिस वाले ने मेरे पाँव पर जोर से डंडा मारा, लडकी को छेडता है! चल थाने।
वह मुझे खींच कर थाने ले जाने लगा। लडकी अपनी निरीह आँखों से मुझे जाते हुए देखती रही। वह कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं थी। वह वैसे ही सिसकती रही।
मैंने कहा, भले ही मुझे थाने ले चलो, पर उस बेचारी को कुछ खाने को तो दे दो। लगता है उसने सदियों से कुछ खाया नहीं है। बेचारी मर जाएगी।
पुलिस वाला गुर्राया, वह जिन्दा बच जाएगी, तो हम मर जाएँगे...फिर हमें अगला केस कहाँ से मिलेगा !
आप समझ नहीं रहे हैं भाई साहब। वह जीवित रहेगी, तभी तो आप जिन्दा रह पाएँगे। मैंने उसे समझाने का प्रयास किया। पर वह हर समझ से परे जा चुका इन्सान निकला। उसे सिर्फ अपने पुलिस केसों का टार्गेट पूरा करना था।
क्या वह पुलिस वाला भी मर चुका था? मेरी तरह? क्या मैं सपंदनहीन लोगों के शहर में आ गया था! इस शहर तक पहुँचने में उस अंधेरी सुरंग को पार करना क्या आवश्यक था? कहीं वह सुरंग एक मृत शहर को दूसरे मृत शहर से जोडने का माध्यम भर तो नहीं थी !
अनेक प्रश्न मुँहबाए खडे थे। एक प्रश्न दूसरे प्रश्न को जन्म देकर नई उलझने पैदा करता जा रहा था। प्रश्नों के हुजूम में उत्तर कहीं नहीं थे। दरअसल उत्तरों की किसी को परवाह भी नहीं थी। क्योंकि उत्तरों का सीधा सम्बन्ध समाधानों से होता है। और यदि समाधानों का क्रियान्वयन कर दिया जाता, तो सारी अव्यवस्था व्यवस्थित नहीं हो जाती !
पुलिस स्टेशन में मुझे खूब मारा पीटा गया। मैं लहूलुहान था, पर मुझे कोई दर्द महसूस नहीं हो रहा था। वे मुझसे पैसा चाहते थे। अंत में जब उन्हें विश्वास हो गया कि मेरी जेब में एक फूटी कौडी भी नहीं थी, तब उन्होंने मुझे उठा कर सडक पर फेंक दिया।
वहीं मुझे एक हैण्डपम्प दिखाई दिया। मुझे शायद पानी पी लेना चाहिए था, हालांकि मुझे कोई प्यास महसूस नहीं हो रही थी। मैंने पानी निकालने का प्रयास किया, लेकिन एक बूँद भी पानी बाहर नहीं आया। हैण्डपम्प का मुँह सांय-सांय करता रहा।
भाई, क्या दूर देश से हो? किसी ने सान्त्वना भरी आवाज में पूछा।
पता नहीं... शायद इसी देश से हूँ।
तो इतना भी नहीं जानते कि जमीन का पानी मर चुका है! वह मुझे हैरत से ताक रहा था।
मुझे हैरान होना चाहिए था, पर हुआ नहीं, अच्छा! तो क्या प्यास भी मर चुकी है?
प्यास भला कैसे मर सकती है! उसने दूर इशारा करते हुए कहा, वह लम्बी कतार देख रहे हो न! वहाँ राजा की सरकारी दुकान से पानी मिलता है, एक बाल्टी रोज।
बस! इतने से तो मेरे मोजे भी न धुलें!
अब वह मुझे घूरने लगा था, तो मेरा शक ठीक निकला। तुम इस देश के नहीं हो, क्योंकि यहाँ तो एक बाल्टी से पूरा दिन निकालना पडता है।
वह मुझ पर झपटा, जैसे बाज अपने शिकार पर झपटता है। मैंने पाया कि उसकी सान्त्वना देती आवाज एक खूंखार गुर्राहट में बदल चुकी थी। पर इससे पहले कि वह मुझे पकड पाता, मैं पूरा जोर लगा कर भाग छूटा। मैं भाग रहा था मैं क्यों भाग रहा था, यह तो पता नहीं, पर बदहवास नहीं था। न तो बच जाने की कोई खुशी थी और न ही किसी प्रकार का कोई डर। मैं बस भागे चला जा रहा था।
जिस जगह मैं रुका, वह जगह एक बीयाबान थी। दूर-दूर तक कहीं कोई नहीं था। न आदमी, न जानवर, न पेड, न हवा!
ईश्वर भी नहीं था वहाँ !
***
पर आखिर मैं कब तक भागता! अन्ततोगत्वा पकडा गया। उसने सबसे पहले मेरे पाँवों में भारी पत्थर बाँधे, ताकि मैं भाग न सकूँ। लेकिन न तो मुझे पत्थरों का बोझ महसूस हो रहा था और न ही चल पाने में कोई असुविधा। मैं चाहता तो एक बार फिर भाग सकता था। पर भागा नहीं। मेरे पास इस बात का भी कोई जवाब नहीं है कि मैं क्यों नहीं भागा !
वह मुझे राजा के पास ले गया।
राजा एक ऊँचे तख्त पर बैठा हुआ था। उसका चेहरा अँधेरे में गुम था। उसका कोई चेहरा था भी कि नहीं, यह भी निश्चयपूर्वक कहा नहीं जा सकता। पर इतना तो निश्चित था कि वह हमें देख पा रहा था, हम उसे नहीं। उसकी केवल आवाज सुनी जा सकती थी।
जो आदमी मुझे घसीटता हुआ राजा के पास ले गया था, उसने मुझे भरे दरबार में दरबारियों के बीचो-बीच पटक दिया। सारे दरबारी सिर झुकाए अपनी अपनी कुर्सी सँभाले हुए बैठे हुए थे। उन सभी के ऊपर एक एक तलवार लटकी हुई थी, जिसका रिमोट राजा के पास था।
जहाँपना, मैं एक विदेशी को लाया हूँ, जो घुसपैठ कर के यहाँ आ गया है। वह आदमी बोला।
राजा गुर्राया, तुम कैसे कह सकते हो कि यह घुसपैठिया है।
यह हैण्डपम्प में से पानी निकालने की कोशिश कर रहा था। अगर यह इस देश का होता, तो क्या नहीं जानता कि जमीन का पानी मर चुका है?
अच्छा ! राजा ने हुंकार भरी।
और यह लम्बी लम्बी कतारों के बारे में भी कुछ नहीं जानता... फिर तो यह घुसपैठिया ही हुआ न !
राजा का गुस्से से लबालब स्वर मुझ तक आया, बिल्कुल। तुम्हें बताना पडेगा कि आखिर तुम आए कहाँ से हो?
एक सुरंग से....
किस सुरंग से?
इस बार जो आदमी मुझे वहाँ लाया था, वह बोला, हर आदमी अपनी ही सुरंग से चल कर यहाँ पहुँचता है जहाँपना।
ठीक कह रहे हो। अब राजा मुझे सम्बोधित कर रहा था, तुम्हारा अपराध सिद्ध हुआ... तुम्हें फाँसी की सजा सुनाई जाती है।
पर मैं तो मर चुका हूँ। मरा हुआ दुबारा कैसे मारा जा सकता है ! मैंने कहा।
राजा थोडी देर सोचता रहा, फिर बोला, तो फिर तुम्हें उस अंध कूप में डाल दिया जाएगा, जहाँ फाँसी पर लटकाने के बाद लाशें फैंकी जाती हैं, जहाँ चील, कव्वे और गिद्ध रहवास करते हैं।
मैं कुछ नहीं बोला। बल्कि सच तो यह था कि मुझे यह जान कर तसल्ली मिली कि अब मेरे साथ मेरी देह को भी मृत्यु मिलने वाली थी। तसल्ली क्या होती है, यह चीज मुझे अपने मरने के बाद पहली बार महसूस हुई थी।
राजा के आस-पास छाया अंधेरा अब धीरे-धीरे मेरी ओर बढने लगा था। चुपचाप बैठ कर तमाशा देखने वाले दरबारी भी उस अंधेरे की जद में आने लगे थे। वे यथावत चुप थे, संभवतः राजा के पास रिमोट से भयभीत। जो आदमी मुझे राजा के पास लाया था, वह अन्तर्घ्यान हो चुका था। मेरे पाँवों में बँधे पत्थर अपने आप खुल कर कहीं चले गए थे। मैं ठीक से कुछ समझ नहीं पा रहा था, पर शायद मैं उडाने भरने की कगार पर था।
पर हम तुम्हें यूँ ही अँध कूप में नहीं फैकेगे। तुम्हारी अन्तिम इच्छा अवश्य पूरी करेंगे। राजा का अपेक्षाकृत नर्म स्वर मुझ तक आया, तुम्हें हैण्डपम्प के पास पकडा गया था। तुम्हें खत्म करने से पहले हम तुम्हें पानी अवश्य पिलाएँगे। क्या तुम प्यासे हो ?
मैं एक विचित्र स्थिति में था। शायद प्यास जैसी कोई चीज मुझे महसूस भी हो रही थी। पर यह प्यास उससे भिन्न थी, जिससे गला सूखता है। मैंने कहना शुरू किया।
हाँ, मैं प्यासा हूँ। मेरी आँखों को प्यास लगी है। मैं नर्म मखमली सुबह देखना चाहता हूँ, मुस्कराते हुए फूलों पर ओस की बूँदें देखना चाहता हूँ। कितना खुशनुमा होगा तितलियों को और गिलहरियों को और चिडियाओं को और बादलों को और हवाओं को देखना, जो घरों के छोटे-छोटे बच्चों से बतिया रही होंगी। मंदिरों में घंटियों की घ्वनियाँ होंगी, गुरूद्वारों में शब्द कीर्तन, मस्जिदों में अजान और चर्चों में कोरल्स। उन्हें गाकर फिर सब एक साथ बगीचे में आएँगे और गले मिल कर खुशियों का मधुर गीत गुनगुनाएंगे। पिछली रात उन गीतों को तारों ने लिखा होगा, चाँद ने संगीत दिया होगा और खामोश सडकों ने जिसे सबसे पहले गुनगुनाया होगा। तमाम कायनात उस गीत को सुनेगी, पेड झूमने लगेंगे, जमीन खिल उठेगी, नीला आकाश अपनी स्निग्ध आँखों से उसे पीने लगेगा। रिश्तों को बासी नहीं होने दिया जाएगा, दोस्त, पडौसी सब मिल कर बगीचे में परिन्दों का कलरव सुनेंगे, जो उनके अपने बच्चों के कंठ से फूटा होगा.... सब के मन में आशा की एक किरण होगी, कि आज का दिन अच्छा जाएगा। न राजा होगा, न रंक। पृथ्वी अपनी निश्चित गति से घूमती रहेगी और माँएं अपने बच्चों के लिए मीठे पकवान बनाएँगी। प्रेम जीने के लिए हवा पानी की तरह आवश्यक होगा। झाडियों के पीछे दुबके प्रेमी जोडे वहीं जमीन पर प्रेम की कविताएँ लिखेंगे, जिन्हें कालजयी आख्यानों में जगह मिलेगी। हिंसा शब्दकोश का एक शब्द बन कर रह जाएगी और पीडा को भी पीडित किया जाएगा। दुःख होगा, पर दुःखों से मुक्ति दिलवाने वाले ज्यादा होंगे। हर व्यक्ति अपना गवाह खुद होगा। उसकी जवाबदेहियाँ उसके अपने कन्धों पर टिकी होंगी, जिनका इतिहास उसे स्वयं लिखना होगा। आदमी की परछाइयाँ उससे लम्बी नहीं होंगी। नदी के पुल पर खडा हर व्यक्ति आत्महत्या नहीं करेगा और न ही सूने प्लेटफॉर्म पर खडा इन्सान मरने के मंसूबे लिए हुए माना जाएगा। चित्रकार सुनहरे चित्र चित्रित करेंगे जिनमें उल्लाहस के रंग भरे होंगे, गायकों की सुरलहरियाँ मन को खुशियों से स्पंदित कर देंगी और नृत्यांगनाएँ पृथ्वी को रिझा देने वाले नृत्य करेंगी। झीलों में पक्षियों का बसेरा होगा और मछलियाँ नीली झील में अठखेलियाँ करती रहेंगी। ठाठें मारता समुद्र अपनी बाहें खोल कर नदियों के साफ जल का स्वागत करेगा और बारिशें हर छत पर बरसेंगी...
बोलते-बोलते मुझे लगा कि मुझे मेरे ही शब्दों ने रस्सी बन कर बाँध दिया था। असंतुलन की स्थिति में मैं लडखडा कर गिर गया। बेहोश होते होते मुझ राजा की आवाज सुनाई दी, अब समझ में आया कि यह जीते जी क्यों मर गया था !
***
अब कैसा महसूस कर रहे हो ? पत्नी ने पूछा।
अब काफी ठीक लग रहा है। पत्नी से संभावित बहस से बचने के लिए मैंने कहा।
लेकिन पत्नी ने मेरा झूठ ताड लिया था, तुम झूठ बोलने लगे हो, इसका मतलब यह हुआ कि तुम ठीक हो रहे हो!
वह मुझे खुश दिखाई दी, खुश भी और आश्वस्त भी। जैसे उसने अपनी तमाम चिन्ताएँ बुहार दी हों। अचानक वह मेरे पास आकर बैठ गई और उसने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए, जानते हो, आज बच्चों ने तुम्हारे लिए एक सरप्राइज पार्टी अरेन्ज की है।
मैं उसे लगातार देखे जा रहा था।
वैसे तो उन्होंने तुम्हें बताने के लिए मना किया था, पर मुझे बताए बिना रहा नहीं जा रहा। वह मेरे कुछ और पास खिसक आई, वे आज रात तुम्हारा बर्थ डे किसी रिसोर्ट में प्लान कर रहे हैं।
मेरा बर्थ ड ! पर मैं तो मर चुका हूँ !!
एक झटके से उसने अपना हाथ खींच लिया। वह मेरी एक ही बात सुनते सुनते पक गई थी और शायद गुस्से में मेज पर रखा काँच का गिलास जमीन पर दे मारती कि तभी दोनों बच्चे वहाँ आ गए।
अरे! रुचि और ईशान ! अब तक कहाँ थे तुम दोनों? मैंने उन्हें देखते ही कहा।
सहसा पत्नी जोर से चिल्लाई, देखा, तुमने अपने बच्चों को पहचान लिया। तुम मरे नहीं हो, तुम जिन्दा हो !

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