fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

कुँआ और आकाश

कृष्ण बलदेव वेद
वह एक कुएं के किनारे बैठा ऊपर तने आकाश को निहार रहा था, मानो उसमें कुएं के अक्स को टटोल रहा हो.
(मैं अगर चाहूँ तो इस वाक्य में अपनी व्यर्थता का अक्स देख सकता हूँ, लेकिन मैं ऐसा क्यों चाहूँगा, चाहूँगा तो मानूँगा क्यों, लेकिन चाहने और मानने के बगैर भी मैं इस वाक्य में अपनी व्यर्थता का अक्स देख सकता हूँ. इसलिए मान ही लूं कि देख रहा हूँ.)
वह उस समय संदर्भविहीन महसूस कर रहा था, इसलिए शायद कुछ मुक्त भी, इसीलिए शायद उस कुएं में झाँकने के बजाय आकाश को निहार रहा था, कुछ इस तरह से जैसे उसमें कुएं के अक्स को देख रहा हो, और इस तरह से भी जैसे उस अक्स में अपनी व्यर्थता का अक्स भी देख रहा हो, और शायद इस तरह से भी जैसे उसमें कुछ भी न देख रहा हो,या वही देख रहा हो जो वहाँ नहीं था, जो नहीं था. कहीं भी, या शायद देख न रहा हो, देखने की कोशिश कर रहा हो, उस कोशिश में असफल हो रहा हो, उस असफलता पर इतरा रहा हो, सोच रहा हो यह असफलता असाधारण है, साधारण-असाधारण असफलताओं से भी कुछ ऊपर है, इस पर इतराया जा सकता है, इसे अपनाया जा सकता है, सोच रहा हो और सिहर रहा हो, ऐसे जैसे कोई किसी काली नीली संभावना या प्रेरणा या पीडा पर अचानक सिहर उठे, अकेला, किसी कुएं के किनारे बैठा, ऊपर तने आकाश को निहारता हुआ, संदर्भहीन, लेकिन अमुक्त, ऊपर उसे जो संशयग्रस्त मुक्ति दे दी गई थी, वह अब वापस ली जा रही है, क्योंकि वह मुक्त नहीं, होना चाहता है, मुक्त, इसलिए कभी-कभी उसे अपनी संदर्भविहीनता पर मुक्ति का अपमान हो जाता है, किसी किसी उडते हुए क्षण में, क्षीण-सा गुमान, जिसे गुमान का दर्जा दे देना भी शायद ठीक नहीं, इसीलिए वह कभी-कभी किसी कुएं के किनारे जा बैठता है, कुछ इस तरह से कि देखने वाले को यह अंदेशा होता रहे कि वह उसमें छलाँग लगा देगा या यूं ही उसमें गिर जाएगा, जैसे किसी भी कुएं के किनारे बैठा या रेंगता हुआ कोई कीडा अनायास उसमें गिर जाता है और किसी दूसरे कीडे को खबर तक नहीं होती, लेकिन वह कीडा नहीं वह उस कुएं में गिरना नहीं चाहता था, उसमें छलाँग लगाने की बात वह सोच सकता था, शायद इसलिए भी वह आकाश को निहार रहा था, मानो महाशून्य से छलाँग लगाने की इजाजत या शक्ति मांग रहा हो, मानो यह आशा भी कर रहा हो कि महाशून्य ही उसे उस कुएं में धकेल देगा और यह याचना भी कि वह ऐसा कर दे... (मैं रुक क्यों गया? मुझे रोक किसने दिया? मुझे रुकना नहीं चाहिए था, रोका नहीं जाना चाहिए था, लेकिन जब तक मैं अपने वजूद को भूलूँगा नहीं तब तक रुकता रहूँगा, बार-बार, रोक दिया जाता रहूँगा. बार पूछता रहूँगा, बार-बार, मैं रुक क्यों गया, मुझे रोक किसने दिया, मैं अपने वजूद को भूल नहीं सकेंगे, कभी भी, ज्यादा देर तक, कुछ-कुछ देर तक भूलता रहूँगा, बार-बार, यही गनीमत है, हो सकता है किसी मुकाम पर मैं अपने वजूद के जंजाल से मुक्त हो जाए, अचानक, अपनी कोशिश से नहीं, वैसे ही, किसी दैवी या दानवी दखलअंदाजी से, उसी तरह जैसे कोई कीडा किसी कुएं में गिर कर या किसी पाँव के नीचे कुचला जाकर अपने नन्हे से, अनावश्यक से, वजूद से मुक्त हो जाता है, और तब मैं इस आख्यान को उडने दे सकते, हो सकता है लेकिन होगा नहीं, न हो, उम्मीद नहीं छोडूंगा, मैं जो उम्मीद और इंतजार से मुक्त हो जाने की इच्छा और उम्मीद के गोरखधंधे में फँसा हुआ न चैन की साँस ले पा रहा न फाँसी, मैं जिसने इस गोरखधंधे की कई अपूर्ण और दोषपूर्ण तस्वीरें उतारी है और हर तस्वीर उतार लेने के बाद महसूस किया है कि मैं इस गोरखधंधे से कभी निकल नहीं पाएंगे, क्योंकि शायद मैं इसमें से निकलना ही नहीं चाहता, दरअसल, ऊपर से चाहे कितना छटपटाऊँ, कि छटपटाने से ही मुझे कुछ राहत मिलती है, मिलती नहीं लेकिन यह भ्रम होता रहता है कि मिल रही है, राहत, ऐसी जो किसी और हरकत से नहीं मिलती, इसलिए छटपटाना ही मेरा धर्म बनता जा रहा है, धर्म नहीं कर्म, मेरा एकमात्र असली का...)
हूँ
आकाश और महाशून्य से निराश होकर या शायद अपनी गर्दन की ऐंठन को कुछ कम करने के खयाल से या शायद किसी भी मुद्रा में ज्यादा देर न रह पाने की आदत या मजबूरी के कारण उसने उस कुएं में झाँकना शुरू कर दिया जिसके किनारे वह बैठा हुआ था. संदर्भविहीन सा, शायद कुछ मुक्त सा भी, हालांकि हकीकत में वह था नहीं, संदर्भविहीन या मुक्त, होता तो कुएं में झाँकता न आकाश को निहारता, तो क्या करता, कहना मुश्किल है, शायद कुछ भी नहीं करता, सिर्फ बैठा होता या सिर्फ होता, नहीं, होने को सिर्फ से सीमित करना ठीक नहीं, खैर, जब उस कुएं में झाँकने पर, काफी देर झाँकते रहने पर, उसे कुछ दिखाई नहीं दिया, थरथराते हुए खामोश अँधेरे के सिवा, और जब उसे उस थरथराते हुए खामोश अँधेरे में भी कुछ दिखाई नहीं दिया-कोई अक्स, अपना या अपने ही जैसे किसी और का या ऊपर तने आकाश का या याद में कैद किसी पुराने चेहरे का या अपने किसी भूत या भय का- तो उसका जी चाहा कि वह उस कुएं में छलाँग लगा दे या उसमें लुढक जाए, नहीं, यहाँ गलती से या किसी कमजोरी के तहत उस कुएं में छलाँग लगा देने या लुढक जाने की क्षणिक और क्षीण सी तरंग को कोई एक कारण थमा देने की कोशिश कर दी गई है, इस कोशिश को कुचल या भुला दिया जाए, लेकिन अब आगे कैसे बढा जाए, उससे करवाया क्या जाए? क्यों न उसे उस कुएं में झाँकते रहने दिया जाए, जिसमें उसे थरथराते अँधेरे के सिवा कुछ नजर नहीं आ रहा था, बावजूद इसके कि कुछ ही क्षणों की एकटक झाँक के बाद उसे महसूस होना शुरू हो गया था जैसे उसके सारे अंग आँखों में बदल गए हों, अनगिनत आंखों में, या शायद सिर्फ बीनाई में, लेकिन नहीं, आँखों के बगैर बीनाई हो सकती नहीं, बीनाई के बगैर आँखें हो सकती हैं,
लेकिन यह भी तो मुमकिन है कि उस कुएं में थरथराते हुए खामोश अँधेरे के सिवा कुछ हो ही नहीं उस वक्त, उसके लिए, जिसे अभी तक कोई नाम नहीं दिया गया, जो उस कुएं के किनारे न जाने क्यों जा बैठा था, उस समय, जब कायदे से, किसी भी कायदे से, उसे कहीं और होना चाहिए था, शायद कहीं सोया हुआ होना चाहिए था, अकेले या किसी के साथ, वैसे यह जरूरी नहीं कि उसके उस समय वहाँ बैठे हुए होने को किस तफ्तीश का निशाना बनाया जाए. जरूरी हो न हो. यहाँ यह नहीं किय जाएगा....
(लेकिन क्यों? क्यों जरूरी नहीं? क्यों यहाँ यह नहीं किया जाएगा
यानी उसके उस समय उस कुएं के किनारे बैठे हुए होने को किसी तफ्तीश का निशाना नहीं बनाया जाएगा? क्या मुझे इन सवालों का सामना नहीं करना चाहिए? क्या मैं इस आख्यान को उडते देखना चाहता हूँ?
सचमुच? क्या कोई आख्यान कभी भी उड सकता है? सचमुच? क्या हर आख्यान की हर उडान पर उसके आख्याता का अंकुश हर क्षण नहीं रहता? ये सवाल सवाल नहीं, जान के बवाल हैं, इन्हें मसल कर ही आगे बढ सकूँगा, मैं जो अभी तक किसी भी सवाल को मसल नहीं सका, पूरी तरह, मैं जिसके गले मे हर समय सवालों के हार लटके रहते हैं. हार नहीं साँप, ऐसे जो मेरा गला भी नहीं घोंटते, पूरी तरह, मुझे साँस भी नहीं लेने देते. पूरी तरह, न मुझे सोने देते हैं, पूरी तरह, और न मुझे जागने देते हैं, पूरी तरह. मैं इन सवालों को भूलने का खयाल छोड कर ही आगे बढ सकूँगा. थोडा-थोडा, रुक-रुक कर, ऐसे कि देखने वाले को, या शायद न देखने वाले को. या शायद देखने वाले को भी और न देखने वाले को भी, यही भ्रम हो कि मैं आगे नहीं बढ रहा, कि मैं पीछे हट रहा हूँ, या शायद यह कि मैं आगे बढ रहा हूँ न पीछे हट रहा हूँ, एक ही जगह पर अटका हुआ हूँ, किसी ऐसे कीडे की तरह जिसकी सारी टाँगें टूट गई हों, तोड दी गई हों, जो एक ही जगह अटका हुआ कसमसा रहा हो, धूल से लथपथ, पथलथ, कीडों की टाँगें नहीं होती, उनकी टाँगों को टाँगें नहीं कहते, मुझे कीडों के बारे में कोई जानकारी नहीं, मैं मुहावरे के कीडों की ही बात कर रहा हूँ. मुहावरे के कीडों की बात भी वही कर सकते हैं, पूरे अधिकार के साथ, जिन्हें असली कीडों के बारे में पूरी जानकारी हो, पूरी न सही अधूरी तो हो, मेरी सभी जानकारियाँ अधूरी हैं, इसीलिए मेरे सब अधिकार अधूरे हैं. इसीलिए शायद मेरे सब आख्यान अधूरे हैं, वे भी जो ऊपर से पूरे नजर आते हैं, अधूरे आख्यान बुरे नहीं होते, जरूरी नहीं कि वे बुरे ही हों, इसलिए मुझे अपने गले से लटके हुए सवालों के बावजूद आगे बढते रहना चाहिए. यह जानते हुए कि मैं आगे बढ नहीं पा रहा, यह जानते हुए कि आगे बढने की जिद भले ही जरूरी हो, आगे बढना जरूरी नहीं, यह जानते हुए भी कि आगे बढने और पीछे हटने में कोई ऐसा अंतर नहीं जिस पर आगे बढने वाले को गर्व हो, पीछे हटने वाले को शर्म, यह मानते हुए भी कि एक ही जगह पर अटके पडे रहने, पडे रह कर तडपते रहने में, तडपते रह कर तडप के अंत का इंतजार करते रहने में भी कोई ऐसी खास बात नहीं जिस पर खुश हुआ जा सके या खाक, खैर..)
तो वह गुमनाम उस गुमनाम कुएं में झाँकते-झाँकते जब उस थरथराते खामोश अँधेरे से उकता गया, या खौफजदा हो गया, या कुछ उकता और कुछ खौफजदा हो गया, तो उसने अपने सर को सीधा करना चाहा, उसे सीधा करने के लिए जब उसने गरदन के खम को सीधा किया तो उसे महसूस हुआ जैसे किसी ने उसके दाएं कान के नीचे एक फौलादी नाली की ठंडी नोंक रख दी हो, उसे दबाना शुरू कर दिया हो, कुछ इस तरह से जैसे उसे झुका रहा हो कि अगर उसने सर उठाया तो उसके सर को उडा दिया जाएगा, और तब वह समझ गया कि अब उसके साथ जो हो रहा था, किसी दुःस्वप्न में ही हो रहा था, कि अब उसके साथ जो होगा, किसी दुःस्वप्न में ही होगा, कि अब तक जो उसके साथ हुआ था, किसी दुःस्वप्न में ही हुआ था, कि वह किसी दुःस्वप्न में ही उस कुएं के किनारे जा बैठा था, वह किसी दुःस्वप्न में ही कुछ देर पहले तक ऊपर तने आकाश को निहार रहा था, कि वह किसी दुःस्वप्न में ही कुछ देर पहले तक उस कुएँ में झाँक रहा था, और उकता या खौफजदा हो जाने के बाद उसने जब अपना सिर सीधा करने के लिए अपनी गरदन के खम को सीधा करना चाहा तो किसी ने.... और तभी यह सारी समझ उसके जहन पर कौंध गई थी, और उसकी आँखें बंद हो गई थीं, लेकिन इस समझ-कौंध के बावजूद कि जो कुछ हुआ और हो रहा था किसी दुःस्वप्न में ही हुआ और हो रहा था, उसकी दहशत में कोई कमी नहीं हुई थी, हालांकि दहशत के बावजूद उसे एक असंभव सी हँसी भी आ रही थी, जिसे दबाए रखने की कोशिश में उसने अपने जबडे कस लिए थे और गोली छूटने या किसी आदेश या धमकी का इंतजार करना शुरू कर दिया था, यह जानते हुए कि दु स्वप्नों में छूटने वाली गोलियाँ और धमकियाँ सुनाई नहीं देतीं, कि दुःस्वप्नों में मिलने वाले आदेश निःशब्द ही होते हैं, कि दुःस्वप्नों के इंतजार अंतहीन महसूस होते हैं, कि दुःस्वप्नों के नायक मरते नहीं- यह सब जानते हुए भी गुमनाम पूरी तरह गुम नहीं हो सका, न ही पूरी तरह बेपरवाह, बल्कि उसे महसूस हुआ जैसे उसे उसकी सारी विफलताओं का सार किसी ऐसी तसवीर में दिखाया जा रहा हो जो तसवीर न होते हुए भी तसवीर दिखाई दे रही हो, उस वक्त उस दुःस्वप्न में, साफ साफ, लेकिन जिसे दूसरे दिन वह देख सकेगा न बयान कर सकेगा और इस अहसास के साथ गुथा हुआ एक और अहसास कि उसे कोई सबक सिखाया जा रहा हो, कोई ऐसा सबक जो वह सीखना तो चाहता था, लेकिन सीख नहीं पा रहा था क्योंकि वह एक दुःस्वप्न देख रहा था, देख नहीं जी रहा था और इस अहसास के साथ एक और अहसास गुथा हुआ था कि उसने खुद ही उस फौलादी नाली की ठंडी नोंक को अपने दाएँ कान के नीचे दबा दिया था, कि वह खुद ही अपने आपको धमका रहा था, और इस अहसास के साथ एक चेहरा चिपका हुआ था जो उसका नहीं था लेकिन जो और किसी का भी नहीं हो सकता था, और तब उसका मन हुआ था कि वह उस चेहरे को नोच ले, लेकिन वह जानता था कि जब वह हाथ उठाएगा तो उसके हाथ गायब हो जाएँगे, जब वह आँखें खोलना चाहेगा तो उसकी आंखें गायब हो जाएँगी, और जब वह चिल्लाना चाहेगा तो उसकी आवाज गायब हो जाएँगी, और तब शायद वह दुःस्वप्न टूटना शुरू हो जाएगा, उसकी गरदन पर उस नाली का ठंडा दबाव धीमा होना शुरू हो जाएगा, लेकिन वह नहीं चाहता था कि ऐसा हो, इसलिए उसने उस चेहरे को नोचने के खयाल को वहीं खत्म कर दिया.... (तो मैंने उस बेनाम को नाम दे ही दिया, गुमनाम, शायद मैंने नहीं, तो और किसने, शायद मैंने ही, अपनी किसी सचेत इच्छा से नहीं, किसी रूढि के दबाव से ही, ऐसे दबाव से जिसे मैं अस्वीकार करना चाहता था लेकिन कर नहीं सका, क्योंकि नामहीन नायक को आखिर तक निभाना आसान नहीं होता, क्योंकि यह दिक्कत महसूस होने लगती है कि वह और उस का इशारा उसी नामहीन नायक की तरफ है या किसी और पात्र की तरफ, नामहीन नायक कई और दिक्कतें भी पैदा कर देता है, पाठक के लिए, और आलोचक को यह कहने का मौका मिल जाता है कि ये सारी दिक्कते अनावश्यक हैं, कि आख्यानकार को अपनी कलाबाजियों के लिए इनका दामन नहीं पकडना चाहिए, कि ये सब किसी उदात्त मान्यता में से नहीं उपजीं, लेकिन यह मैं किधर बहक गया, किधर बहका जा रहा हूँ लेकिन बल्कि एक और औपन्यासिक रूढि को तोडफोड ही रहा हूँ, अपने अटपटे ढंग से, उसी को जिसके अनुसार आख्यानकार हमेशा अपनी रचना के बाहर और ऊपर कहीं बैठा अपने बाल या नाखून सवार रहा होता है, रचना में उसका साया तक दिखाई नहीं देता, मैं यहा ब तक दिखाई देता रहूँगा, और सुनाई भी, जब तक गुमनाम अपने पैरो पर खडा नहीं हो जाता, पूरी तरह, और मुझे उखाड कहीं बाहर और ऊपर धकेल नहीं देता, लो मैंने अपना भंडा खुद फोड दिया, पाठक और आलो क मुझे दाद दें.) और तब गुमनाम ने अपने आपको नोचना शुरू कर दिया, मैं क्यों इस कुएं के किनारे आ बैठा, मैं क्यों इसमें झाँक रहा था, मैं क्यो जपर तन आकाश को निहार रहा था, मैंने ही इस आततायी को अपने सर पर सवार कर लिया, अब मैं काँप क्यों रहा हूँ इससे पूछ क्यों नहीं लेता कि यह चाहता क्या है, पूछने की भी जरूरत नहीं, मैं जानता हूँ यह शता चाहता है, मैं जानता हूँ यह क्या साबित कर दिखाना चाहता है. वह मुझे मेरा चेहरा दिखा रहा है, मेरा डरपोक चेहरा, यह मुझे बता रहा है कि मैं बेईमान हूँ, डरपोक बेईमान, यह मुझे बता रहा है कि मैं न इस कुएं में झाँक सकता हूँ, न ऊपर तने आकाश को निहार सकता हूँ, पूरी तरह, कि मैं न इस कुएं में छलाँग लगा सकता हूँ, न ऊपर तने आकाश में उड सकता हूँ. पूरी तरह, यह मुझे ललकार भी रहा है, लताड भी, लेकिन यह मुझे क्या ललकारा. क्या लताडेगा, मैं खुदकुश खुद इस काम के लिए काफी हूँ, लेकिन यह यही तो कहना चाहता है कि मैं खुदकुश नहीं, कि मैं खाम खुदकुश से, नाकाम खुदकुश हूँ, असफल आत्महत्यारा हूँ, कुएं के किनारे बैठक में झाँकता भर हुआ, कहता रहे, मेरा क्या लेना है, मैं खुद भी तो यही कहता हूँ, लेकिन क्यों न अब, अभी, चुपचाप इस कुएं में कूद पडू या लुढक जाऊँ, शायद यह भी मेरे साथ कूद पडे या लुढक जाए, हो सकता है इसी के हाथों मेरा काम तमाम हो जाए, हो सकता है इसके हाथ मेरे ही हों, या मेरे इसके, अब मैं फिर बहाने बीन रहा हूँ, बेईमान बहाने, न डूब मरने के बहाने, डरपोक बहाने, और मुझे मजा आ रहा है, बहानेबाजी का मजा, अपने आपको कोसने का मजा, पीटने का, अपनी खाल उधेडने का, अपनी जान लेने का, अपनी जान न ले पाने का...
(यह मैंने इस कमबख्त से क्या सुचवा दिया, क्यों सुचवा दिया, मैंने ही सुचवाया या यह खुद सोच गया, यह सोच क्या यहाँ उचित है, यह सोच है या कुछ और, इसके दिमाग की मोच, या मौज, अगर मुझे कोई उपदेश ही देना है तो खुल कर क्यों न दूं, लेकिन मैं अपने आपको कोस क्यों रहा हूँ, इस कमबख्त की ही तरह इसी की देखादेखी, मैं कैसा सर्जक हूँ, मैं तो इससे भी गया बीता हूँ, अपने इस कठपुतली से भी, मैं अपने कठपुतले का कठपुतली, मुझे भी मजा आ रहा है, अपने आपको कोसने का, पीटने का, अपनी जान लेने का, अपनी जान न लेने का, मुझे अब सँभल जाना चाहिए, इसे सँभाल लेना चाहिए, इससे कुछ करवाना चाहिए, इस गुमनाम, गुमअकल से...)
और तब उसने अपने सर पर सवार भूत से कहा, क्या चाहते हो।
उस भूत ने जवाब में अपना दबाव बढा दिया. तब गुमनाम बोला. सोच रहे हो. गोली दाग क्यों नहीं देते? भूत ने जवाब में दबाव कुछ और न दिया. गुमनाम बोला, मैं इस दबाव से दबने वाला नहीं, मैं जो करूँगा अपनी मरजी से ही करूंगा, तुमसे दब कर नहीं, मैं आत्महत्यारा हूँ या होना चाहता हूँ, मैं किसी हत्यारे का हुक्म नहीं मानूँगा, तुम मेरी हत्या तो कर सकते हो, मुझसे मेरी मरजी के खिलाफ आत्महत्या नहीं करता सकते. उस भूत ने जब जवाब में अपना दबाव हटा लिया तो गुमनाम गम हो गया, गुमसुम, अपने आप में, उस कुएं में, ऊपर तने आकाश में, उस कुएं के थरथराते हुए खामोश अँधेरे में, आकाश के महाशून्य में, और सोचने लगा, क्या सचमुच मैंने अपनी हिम्मत से उस भूत को भगा दिया
क्या सचमुच वे बोल मेरे ही थे, यह सोच मेरी ही है, क्या मैं सचमुच इस कुएं के किनारे बैठा हूँ, क्या मैं सचमुच हूँ, क्या मैं सचमुच में ही हूँ, क्या मैं सचमुच एक असफल आत्महत्यारा ही हूँ, करूंगा, क्या मैं सचमुच एक दुःस्वप्न में ही हूँ, एक असफल उपन्यास का असफल नायक, जिसे एक असफल उपन्यासकार रचने का एक असफल प्रयास कर रहा है? और तब उसने एक आवाज को सुना र्‍ तुम अभी पैदा ही नहीं हुए। पूरी तरह, पहले पैदा तो हो लो, पूरी तरह, फिर यह सब पूछना, तब तक चुप मार कर बैठे रहो, समझे...
(यह आवाज किसकी थी? किसी की भी हो, मेरी नहीं थी, मैं तो गुमनाम में ही गुम था. पता नहीं कौन मौका देख मेरे बेचारे नायक को मेरी ओर से धमका कर भाग गया! अब देखें गुमनाम क्या करता है और मैं उससे क्या करवा पाता हूँ.)
यह कहानी कृष्ण बलदेव वैद की असंकलित कहानी है।

सौजन्य से : पीयूष दईया
सम्पर्क - जीएफ-1, प्लॉट नं. 324, सेक्टर-4,
वैशाली गाजियाबाद २०१०१० मो. ९२१२३९५६६०