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पूरे सच की अधूरी कथा

पंकज पराशर
न जाने क्यों महात्मा गाँधी की आत्मकथा सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा’ पढते हुए मुझे बारहा मिजार् गालिब याद आते रहे। ये कैसा इत्तफाक है कि जिस साल 15 फरवरी, 1869 को मिजार् ने इस फानी दुनिया को अलविदा कहा, उसी साल अक्तूबर महीने की दूसरी तारीख को कबा गाँधी उर्फ करमचंद गाँधी के घर में सृजन की आदिम पुकार के साथ मोहनदास दाखिल हुए। मलाल दोनों शख्सियत को ता-उम्र इस बात का रहा कि या रब वे न समझे हैं, न समझेंगे मिरी बात। दोनों के मुँह में सत्ता के शास्ताओं ने जबाँ और डालने की बारहा कोशिशें की, पर यकीन मानिये, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं। चूँकि शख्सियत और आदत दोनों मुआमले में दोनों एक-दूसरे के विपरीत धु*व हैं, लेकिन न समझे जाने का जो दुःख है, बकौल हजारीप्रसाद द्विवेदी, उससे बडा दुःख शायद ही दुनिया में कोई और हो। इस दुःख से दोनों को जंदगी-भर जूझना पडा। गालिब और गाँधी ता-उम्र न समझे जाने के दुःख से दुःखी रहे...और जीवन की साँझ में बहुत-बहुत अकेले! गाँधी की मौत के बाद तो यह दुःख और दारुण हो गया है। आज उन्हें समझने की चेष्टा करते हुए लोग दिखना तक नहीं चाहते। हाँ, चरखा कातकर, नाटकीय अंदाज में लच्छेदार बातें करके उनसे भी बडे बनने के लिए हलकान हुए जा रहे हैं! कुछ इस तरह कि बकौल मीर, जो शक्ल नजर आई तस्वीर नजर आई! जिधर देखिये मार तमाम तस्वीरें हैं और तस्वीरों से छवि गढने, छलने वाले तरह-तरह के सौदागर-ए-तस्वीर हैं! जबकि गाँधी के शैदाई तो मैला आँचल में जीने वाले बावनदास जैसे संत-कार्यकर्ता रहे, जो जीते-जी ही उपेक्षित हो गए और हत्या के बाद चेथरिया पीर में बदल दिये गए! जैसे गाँधी की हत्या के बाद मठी गाँधीवादियों और वैचारिक अवसरवादियों ने गाँधी के जीवन और उनके विचारों को समझने की जगह उन्हें महज तस्वीरों और मूर्तियों तक सीमित कर देने की कोशिशें की हैं! जबकि अदा और दावा ऐसी मोहब्बत का कि क्या कहने! लेकिन हम जानते हैं, करे है अदावत भी वो इस अदा से/ लगे है जैसे मोहब्बत करे है।

गाँधी ने जिस हिंदुस्तान को बहुत करीब और आत्मीय ढंग से समझने के लिए रेलगाडी के तीसरे दर्जे में सफर किया, सूट-बूट से एक धोती पर आ गए, उस हिंदुस्तान को बहुत शातिराना तरीके से एक संघीय राज्य से भारत-माता के बिंब में रिड्यूस किया जा रहा है। ऐसे में भारत नामक माता के इस दारुण दुःख का अंदाजा लगाइए, जिनसे वे अधिकार तक छीन लिए गए हैं कि वे खुद यह तय कर सकें कि उनके पुत्रों में कौन सुपुत्र है और कौन कुपुत्र! ऐसी भारत नामक माता के एक पुत्र गाँधी, जो एक से दूसरे को अलग करने, मनुष्य को उसकी गरिमा से नीचे गिराने वाली वर्चस्व की सत्ता से एक चिर-असहमत व्यक्ति थे-जिनकी हत्या से कुछ कम इस देश के स्वयंभू न्यायाधीश और क्या करते! दरअसल वैचारिक अतिवादियों को मज्झिम निकाय कभी नहीं सुहाता। न महात्माओं (महात्मा बुद्ध और महात्मा गाँधी) के भीतर वैष्णव जन की तरह भीतर पैठ करके परायी पीर जानने की जरूरत कभी महसूस होती है। जातियों, धर्मों और गुटों में बँटे हुए समाज में वर्चस्व की सत्ता जिस तरह सोचने-बोलने की आदी रही है, उसमें हिंदू अतिवादी यह कहते रहे कि गाँधी मुस्लिम समर्थक हैं, जबकि मुस्लिम अतिवादी यह कहकर गाँधी की निंदा करते रहे कि वे मुसलमानों के शत्रु हैं। सन् 1936 में मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग की एक सभा में अध्यक्षीय भाषण देते हुए कहा कि गाँधी ने कांग्रेस को हिंदूवाद के पुनरुद्धार का उपकरण बना दिया है। उनका आदर्श हिंदू धर्म का पुनरुद्धार तथा इस देश में हिंदू राज स्थापित करना है। वे इस्लाम के दुश्मन हैं। वे हिंदू राज के तहत मुसलमानों को झुकाना और गुलाम बनाना चाहते हैं। क्या वाकई गाँधी ऐसा करना चाहते थे? यदि यह सच है, तब तो हिंदूवादी ताकतों को उनसे बहुत खुश होना चाहिए था! लेकिन सन् 1939 में हिंदुस्थान के आकांक्षी माधव सदाशिव गोलवलकर ने कहा, बहुत अजीब बात है कि गद्दारों को राष्ट्रीय नेताओं के रूप में गद्दी पर बैठाया जा रहा है और देशभक्तों को बदनाम किया जा रहा है। जिन लोगों ने हिंदू-मुस्लिम एकता के बगैर कोई स्वराज नहीं का नारा लगाया है, उन्होंने हमारे समाज के साथ बडा विश्वासघात किया है। उन्होंने हमारे महान् प्राचीन लोगों की जीवन भावना की हत्या का घृणित अपराध किया है। बकौल उनके, ये जिन लोग जिसे कहा जा रहा है वे कोई और नहीं गाँधी थे, जो मुस्लिम और हिंदू दोनों अतिवादियों की आँख के किरकिरी थे! इस प्रसंग में एक और घटना को यहाँ जान लेना गैर-मुनासिब न होगा। हिंदुओं-मुसलमानों के बीच बढती राजनीतिक खाई को भरने की कोशिश वाली जिन्ना और गाँधी की जब बंबई (अब मुंबई) वार्ता टूटी, तो जिन्ना ने कहा, जैसे मैं मुसलमानों का प्रतिनिधि बन कर आपसे बात करता हूँ, वैसे ही आप हिंदुओं के प्रतिनिधि बनकर मुझसे बात करेंगे, तो हम सारा मसला हल कर लेंगे। लेकिन दिक्कत यह है मिस्टर गाँधी कि आप हिंदू-मुसलमान दोनों के प्रतिनिधि बनकर मुझसे बात करते हैं, जो मुझे कबूल नहीं है। इसके जवाब में गाँधी ने उचित ही कहा, यह तो मेरी आत्मा के विरुद्ध होगा कि मैं किसी धर्म विशेष या संप्रदाय विशेष का प्रतिनिधि बनकर आफ साथ सौदा करूँ! इस भूमिका में मैं किसी बातचीत के लिए तैयार नहीं हूँ। ...और उसके बाद जो वहाँ से गाँधी लौटे, तो उन्होंने दोबारा फिर कभी जिन्ना से बात नहीं की।

धार्मिक अतिवादियों के विपरीत गाँधी के धर्म का अर्थ है-ईश्वरमय जीवन जीना। ईश्वर का मतलब किसी रूप, किसी साँचे में ढले हुए देवता नहीं। किसी मंदिर में रहने वाले मूर्तिमान ईश्वर नहीं। उनके लिए ईश्वर का अर्थ है-सत्य और सत्य आचरण। इसलिए यह आकस्मिक नहीं है कि सन् 1903 में गाँधी जब पहली बार बनारस गए, तो एक हिंदू होने की वजह से यह बिल्कुल स्वाभाविक था कि उनके मन में काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन की इच्छा जगी। मगर उन्होंने मंदिर परिसर में जो देखा, उससे उन्हें घोर निराशा हुई। मक्खियों का झुंड, दुकानदारों और तीर्थयात्रियों का शोर गाँधी के लिए बिल्कुल असहनीय था। वे लिखते हैं, पतली और संकरी गलियों से होकर जाना था। हर ओर भारी कोलाहल था। गंदगी के कारण मक्खियाँ उड रही थीं। भीड अलग। दुकानदार उसके बीच अपना सामान बेचने के लिए अलग हल्ला मचा रहे थे। वो अपने खिलौने और मिठाइयाँ बेचने के लिए लोगों को पुकार रहे थे। जब मैं मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुँचा, तो सामने सडे हुए फूल पडे मिले। मैं ज्ञानवापी के करीब आ गया। खिन्न और क्षुब्ध महसूस कर रहा था। ये सोच रहा था क्या इस हाल में किसी को भी ईश्वर मिल सकते हैं या वो शांति से ईश्वर को याद कर सकता है। उसके बाद देखा कि लोग सिक्कों को अपनी भक्ति को जाहिर करने का जरिया बनाए हुए हैं, जिसकी वजह से न केवल संगमरमर के फर्श में दरारें दिखने लगी हैं, बल्कि इन सिक्कों पर धूल के जमने की वजह से वहाँ बहुत गंदगी भी दिख रही थी। ईश्वर की तलाश में वह मंदिर के पूरे परिसर में भटकते रहे, मगर सिवाए धूल और गंदगी के उन्हें वहाँ और कुछ नहीं दिखा।

वे आगे लिखते हैं, मैं मंदिर के अंदर गया। दर्शन के बाद दक्षिणा देने की बारी आई, तो मैंने वाकई एक पाई चढाई, यूँ भी दक्षिणा में मेरी कोई श्रद्धा नहीं है। मेरी उस एक पाई को देखकर मंदिर के पंडे की भाव-भंगिमाएँ ही बदल गईं। उसने ना केवल वो पाई उठाकर मेरी ओर फेंक दी, बल्कि मुझे अपशब्द भी कहे। उसने शाप देने के अंदाज में कहा, तू अगर इस तरह ईश्वर का अपमान करेगा, तो सीधे नरक में जाएगा। पंडे ने दो-चार बातें और सुना दीं। यह झेल चुकने के बाद भी असीम धैर्य से गाँधी जी ने पंडे को जवाब दिया, महाराज मेरा तो जो होना होगा, वो होगा ही, लेकिन मंदिर में एक पुजारी के मुँह से ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं। ये पाई लेना हो लीजिए, अन्यथा मैं तो आगे बढ रहा हूँ। पंडे ने सुनते ही दो-चार बातें और सुना दीं। मैं चल पडा, लेकिन पुजारी की नीयत शायद उस पाई को भी गंवाने की नहीं थी। उसने वापस बुलाया और कहा, अच्छा जो भी तुझे देना हो वो रख दे। मैं नहीं चाहता कि तेरे साथ भगवान कुछ भी बुरा करें। मैंने चुपचाप उसे पाई दी और चल दिया। ऐसे तीर्थों में भगवान के नाम पर कितना ढोंग, पाखंड और अधर्म होता है। तो ऐसे थे गाँधी के मंदिर और मंदिर जैसे धार्मिक परिसर में होने वाले अधर्म और और पंडों के प्रति राय। पर जब सत्ता का पूरा आधार ही मंदिर बनाने और पंडों-पुरोहितों के हाथ में सत्ता सौंपने की हो, तो ऐसे में भला गाँधी उनके लिए कितनी देर तक काम के साबित हो सकते हैं?

गाँधी एक साधारण हिंदू की तरह सारे धर्मों को समान रूप से मानते थे। उन्होंने कहा कि सत्य के अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं। ईश्वर की या सत्य की प्राप्ति का आधार है-प्रेम एवं अहिंसा। जीव मात्र के प्रति समदृष्टि। इसलिए गाँधी ने बिल्कुल साफ तौर पर कहा था-जिस सत्य की सर्वव्यापक विश्व भावना को अपनी आँख से प्रत्यक्ष देखना हो, उसे निम्नतम प्राणी से आत्मवत प्रेम करना चाहिए। गाँधी से पूर्व भारतीय आध्यात्मिक साधना परंपरा में प्राप्ति का लक्ष्य था-मोक्ष प्राप्त करना। जबकि गाँधी के लिए धर्म अंतःकरण के सत्य से चेतना का संबंध स्थापित करना है। धर्म दरअसल गाँधी के लिए इस भौगोलिक क्षेत्र में बसी सभ्यता और यहाँ के लोक-समाज को अभिव्यक्त करनेवाली एक व्यापक सामुदायिक संस्कृति मात्र थी, जिनमें तमाम भिन्नताओं के बावजूद आपस में जोडनेवाले कुछ सामान्य तत्व मौजूद थे। जो एक अत्यंत प्राचीन और आध्यात्मिक ज्ञान-परंपरा के न केवल हिस्सा थे, बल्कि गाँधी ने इसमें दुनियाभर के अन्य सभी धर्मों की अच्छाइयों का समावेश कर इसे और व्यापक बनाने की कोशिश की थी। मंदिर के लिए पूरे देश को आग में झोंक देने वालों ने धर्म को राजनीतिक एजेंडे के हिसाब से समझा है, धार्मिक ग्रंथों के जरिये भी नहीं। जबकि गाँधी जैसे हिंदू ने दुनिया के बडे और महान लोगों के दर्शन और विचार के जरिये ईश्वर को समझने का प्रयास किया था। गाँधी अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के समाधान के लिए अलग-अलग धर्मों के बारे में लिखी गई कई पुस्तकों के शरण में गए। उन्होंने नर्मदा शंकर की धर्म-विचार, मैक्स मूलर की हिन्दुस्तान क्या सिखाता है? के अतिरिक्त थियॉसॉफिकल सोसायटी द्वारा प्रकाशित उपनिषदों के अनुवाद पढे. वाशिंगटन इरविंग की लिखी लाइफ ऑफ मोहम्मद एंड हिज सक्सेसर्स और थॉमस कार्लाइल द्वारा मुहम्मद की प्रशंसा में लिखी गई पुस्तक के अलावा दी सेइंग्स ऑफ जरथ*ुस्ट्रा भी पढी। लियो टॉल्सटॉय की गॉस्पेल्स इन ब्रीफ और व्हॉट टू डू, एडविन अर्नॉल्ड की गौतम बुद्ध पर लिखी प्रसिद्ध पुस्तक लाइट ऑफ एशिया वह पहले ही पढ चुके थे. अर्नॉल्ड द्वारा द सॉन्ग सेलेस्टियल के नाम से गीता के किए गए अनुवाद को भी वे पढ चुके थे।

कुछ राजनीतिक लुंपेंस ने गाँधी को महज एक चालाक गुजराती बनिया में महदूद कर देने की भी कोशिश की, लेकिन गाँधी के साथ काफी वकत बिताने वाले उनके एक यहूदी मित्र हेनरी पोलक लिखते हैं, जन्म से वह वैष्णव बनिया हैं, मगर प्रकृति में ब्राह्मण हैं। अपने साथियों के शिक्षक हैं, पर उपदेशक के रूप में नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से। आवेग में क्षत्रिय हैं, क्योंकि उदारता से उन सारे लोगों की रक्षा करते हैं, जिन्होंने उन पर खुद के संरक्षण को लेकर भरोसा किया है। वे अपनी पसंद से शूद्र हैं, क्योंकि अपने सबसे कमजोर और तिरस्कृत साथियों के सेवक हैं। उनके धर्म का मतलब शक्ति और सहिष्णुता से है। वह जन्म से हिंदू हैं, मगर वह मुस्लिमों, ईसाइयों, पारसियों, यहूदियों, बौद्धों, कन्फ्यूशियों का सम्मान करते हैं और सभी को अपना आध्यात्मिक भाई मानते हैं। वह उनमें से किसी के साथ भेद नहीं करते। वह यह मानते हैं कि सारे धर्म मुक्ति की ओर ले जाते हैं, यह सब ईश्वर को अलग अलग तरीके से देखने के मार्ग हैं और सभी मनुष्य पहले मानव हैं और उसके बाद ही वह किसी धर्म के अनुयायी। इसलिए सभी धर्मों को मानने वाले यहाँ तक किसी भी धर्म को नहीं मानने वाले भी उनके मित्र, प्रशंसक और मददगार हैं। हेनरी पोलक अनुभवों से उपजे विचारों को जान लेने के बाद इस बिदु पर स्वयं गाँधी के विचारों को देखना भी बेहद जरूरी है। 22 अप्रैल, 1938 को अखबारों को दिए गए एक वक्तव्य में गाँधी ने कहा था, मेरा हिंदुत्व किसी संप्रदाय की सीमा में बँधा हुआ नहीं है। इस्लाम, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, जरथ*ुस्त धर्म की जितनी भी अच्छाइयों से मैं अवगत हूँ, वे सब इसमें शामिल हैं। कहना न होगा कि उन्होंने अपना जीवन सत्य या सच्चाई की व्यापक खोज में समर्पित कर दिया। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनी स्वयं की गलतियों और खुद पर प्रयोग करते हुए उन्होंने सीखने की कोशिश की। इसलिए यह अकारण नहीं कि अपनी आत्मकथा को उन्होंने सत्य के प्रयोग कहा और आत्मकथा का लेखन बीसवीं शताब्दी में सत्य, अहिंसा और ईश्वर का मर्म समझने-समझाने के विचार से किया।

इस पुस्तक का शीर्षक बडा अटपटा है- सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा। इसे लिखते समय गाँधीजी का जोर आत्मकथा पर नहीं था शायद। मेरा ख्याल है कि इसलिए आत्मकथा शब्द को शीर्षक में पीछे रखा गया है। प्राथमिकता उन्होंने सत्य के प्रयोग को दी, इसलिए उसे आगे रखा गया। आत्मकथा में अपने आत्म के बहाने आत्म-विज्ञापन ही प्रमुख न हो जाए, इसलिए वे यह लिखने के के लिए बहुत सहजता से तैयार नहीं हुए। वे लिखते हैं, मुझे आत्मकथा कहाँ लिखनी है? मुझे तो आत्मकथा के बहाने सत्य के जो अनेक प्रयोग मैंने किए, उनकी कथा लिखनी है। यह सच है कि उनमें मेरा जीवन ओत-प्रोत होने के कारण कथा एक जीवन-वृत्तांत जैसी बन जाएगी। लेकिन अगर उसके हर पन्ने पर मेरे प्रयोग ही प्रकट हों, तो मैं स्वयं उस कथा को निर्दोष मानूँगा। मैं ऐसा मानता हूँ कि मेरे सब प्रयोगों का पूरा लेखा-जोखा जनता के सामने रहे, तो वह लाभदायक सिद्ध होगा अथवा यों समझिए कि यह मेरा मोह है। मुझे सत्य के शास्त्रीय प्रयोगों का वर्णन करना है, मैं कितना भला हूँ इसका वर्णन करने की मेरी तनिक भी इच्छा नही है। जिस गज से स्वयं मैं अपने को मापना चाहता हूँ और जिसका उपयोग हम सब को अपने अपने विषय में करना चाहिए। यह बात सन् 1921 की है। उसके बाद तो गाँधीजी एक के बाद एक नए कामों में लगते चले गए। गिरफ्तार हुए, जेल गए और जब जेल से छूटकर आए, तो फिर वही अनुरोध कि वे जल्दी से आत्मकथा लिख कर पूरा करें, पर उनके पास समय कहाँ था? हालाँकि गाँधी अपना हर काम घडी की सुइयाँ देखकर काम निपटाते थे!

गाँधी के आत्मकथा लेखन का जो दौर है, जब वे देश को एक नई भूमिका के लिए तैयार करने में दिन-रात जुटे हुए थे। अपनी बात सब तक पहुँचाने के लिए उनके पास अपने अखबार भी थे और उसके लिए तमाम व्यस्तताओं के बाद भी उन्हें हर हफ्ते कुछ-न-कुछ लिखना होता था। तो यह जो कुछ-न-कुछ लिखना ही होता था, तो उन्होंने सोचा कि तो फिर आत्मकथा क्यों न लिखूँ। इस तरह यह विचित्र कथा मूल गुजराती में 29 नवंबर 1925 से 3 फरवरी 1929 तक साप्ताहिक किस्तों में नवजीवन अखबार में छपी। फिर इसी का अँगरेजी अनुवाद 3 दिसंबर 1925 से 7 फरवरी 1929 तक यंग इंडिया के अंकों में क्रमशः छपा। कई मिले-जुले कारणों से हिंदी में अनुवाद का पहला खंड पुस्तक रूप में पहली बार सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली से सन् 1929 में छपा और फिर इसके अनेक संस्करण सामने आए, लेकिन गाँधीजी की सभी रचनाओं का कॉपीराइट रखने वाला नवजीवन ट्रस्ट हिंदी संस्करण पहली बार 1957 में ही छाप सका। तब से अब तक इसके अनेक संस्करण निकल चुके हैं। पाकिस्तान में भी इसका उर्दू संस्करण वहीं के प्रकाशकों ने छापा है। भारतीय भाषाओं के अलावा सत्य के इस विचित्र प्रयोग को दुनिया की अनेक भाषाओं में भी अनूदित किया जा चुका है। अँगरेजी में यहाँ भी छपी और देश के बाहर भी छपी। फिर स्पेनी, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, इतालवी, जर्मन, पोलिश, स्विस, तुर्की भाषा के अलावा अरबी में भी इसका अच्छा स्वागत हुआ। चीनी और जापानी, नेपाली और तिब्बती भाषा के संस्करण भी उपलब्ध हैं।

इस आत्मकथा में गाँधी सत्य पर जो इतना जोर देते हैं कि सत्य को ईश्वर का पर्याय बना देते हैं, उस सत्य को लेकर उनके मन में क्या अवधारणा है, यह स्वयं उन्हीं की जुबान में पढ ली जै, सत्य की शोध के साधन जितने कठिन हैं, उतने ही सरल भी हैं। वे अभिमानी को असंभव मालूम होंगे और एक निर्दोष बालक को बिल्कुल संभव लगेंगे। सत्य के शोधक को रजकण से नीचे रहना पडता है। सारा संसार रजकणों को कुचलता है, पर सत्य का पुजारी तो जब तक इतना अल्प नहीं बनता कि रजकण भी उसे कुचल सके, तब तक उसके लिए स्वतंत्र सत्य की झाँकी भी दुर्लभ है। यह चीज वशिष्ठ-विश्वामित्र के आख्यान में स्वतंत्र रीति से बतायी गयी है। ईसाई धर्म और इस्लाम भी इसी वस्तु को सिद्ध करते हैं। सत्य के प्रति वे इतने आग्रहशील हैं कि उनके लिए सत्य सबसे पहले है, उसके बाद ही कुछ और। इसलिए वे चंपारण के किसान राजकुमार शुक्ल की भावुक बातों को सुनकर फौरन नहीं मान लेते, न चंपारण जाने के लिए फौरन राजी हो जाते हैं। राजकुमार शुक्ल जब तीन बार लगातार उनसे मिले, तब जाकर वे चंपारण जाने को राजी हुए और वहाँ पहुँचने के बाद भावुकता को परे हटाया फिर अपनी कसौटी सामने रखी-सत्य की। वे हरेक किसान के बयान लेते समय, अंग्रेजों के खिलाफ शिकायत लिखवाते समय किसानों से एक-एक बात, एक-एक तथ्य को लेकर अच्छे वकील की तरह खूब जिरह करते। सच में झूठ के मिश्रण की आशंका को निर्मूल साबित करने के लिए अनेक प्रश्न पूछते और जिस किसी किसान की शिकायत में झूठ या किसी तरह की अतिश्योक्ति की उन्हें गंध आती, उस किसान के पूरे मामले को वहीं छोड दिया जाता। फिर उसके बाद कोई सिफारिश, कोई भावुकता उनके निर्णय को डिगा नहीं सकती थी। इस मामले में उनका साफ मानना था कि झूठ के पुलिंदे एकत्र करके सच की लडाई नहीं लडी जा सकती। इस घटिया कृत्य को गाँधी दूध में जहर मिलाने-जैसा मानते थे। सत्य के प्रयोग में नील का धब्बा नामक अंश इस बात की तस्दीक करता है कि चंपारण के मामले को गाँधी ने यूँ ही नहीं उठा लिया था।

अपने सत्य के लिए लडने, निरंतर आग्रहशील बने रहने, अपने सत्य के लिए बिना डिगे, बिना घबराए अनशन और उपवास करके जान की बाजी लगा देने का जो निर्भीक साहस है, उसके पीछे शायद उनके बचपन के वे संस्कार हैं, जो उन्होंने अपनी माता से पाया। वे लिखते हैं, मेरे मन पर यह छाप रही है कि माता साध्वी स्त्री थीं। वे बहुत श्रद्धालु थीं। बिना पूजा-पाठ के कभी भोजन न करतीं। हमेशा हवेली (वैष्णव-मंदिर) जातीं। जब से मैंने होश सँभाला तब से मुझे याद नहीं पडता कि उन्होंने कभी चातुर्मास का व्रत तोडा हो। वे कठिन से कठिन व्रत शुरू करतीं और उन्हें निर्विघ्न पूरा करतीं। लिए हुए व्रतों को बीमार होने पर भी कभी न छोडतीं। ऐसे एक समय की मुझे याद है कि जब उन्होंने चांद्रायण का व्रत लिया था। व्रत के दिनों में वे बीमार पडीं, पर व्रत नहीं छोडा। चातुर्मास में एक बार खाना तो उनके लिए सामान्य बात थी। इतने से संतोष न करके एक चौमासे में उन्होंने तीसरे दिन भोजन करने का व्रत लिया था। लगातार दो-तीन उपवास तो उनके लिए मामूली बात थी। एक चातुर्मास में उन्होंने यह व्रत लिया था कि सूर्यनारायण के दर्शन करके ही भोजन करेंगी। उस चौमासे में हम बालक बादलों के सामने देखा करते कि कब सूरज के दर्शन हों और कब माँ भोजन करें। यह तो सब जानते है कि चौमासे में अक्सर सूर्य के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। मुझे ऐसे दिन याद हैं कि जब हम सूरज को देखते और कहते, माँ-माँ, सूरज दीखा और माँ उतावली होकर आती इतने में सूरज छिप जाता और माँ यह कहती हुई लौट जातीं कि कोई बात नहीं, आज भाग्य में भोजन नहीं है और अपने काम में डूब जातीं। घर के संस्कारों ने उन्हें ईश्वर में आस्था ही नहीं, सत्य के प्रति आग्रहशीलता भी दी। इसलिए गाँधी के सच और गाँधी के राम के बीच एक मजबूत सेतु बन जाता था।

अपने सत्य ही नहीं, समाज के क्रूर सत्य भी उनकी दृष्टि से बच नहीं पाते। वे लिखते हैं, हिंदू-संसार में विवाह कोई ऐसी-वैसी चीज नहीं। वर-कन्या के माता-पिता विवाह के पीछे बरबाद होते हैं, धन लुटाते हैं और समय लुटाते हैं। महीनों पहले से तैयारियाँ होती हैं। कपडे बनते है, गहने बनते है, जातिभोज के खर्च के हिसाब बनते हैं, पकवानों के प्रकारों की होड बदी जाती है। औरतें, गला हो चाहे न हो तो भी गाने गा-गाकर अपनी आवाज बैठा लेती हैं, बीमार भी पडती हैं। पडोसियों की शांति में खलल पहुँचाती हैं। बेचारे पडोसी भी अपने यहाँ प्रसंग आने पर यही सब करते हैं, इसलिए शोरगुल, जूठन, दूसरी गंदगियाँ, सब कुछ उदासीन भाव से सह लेते हैं।’ हालांकि भारतीय समाज में बाल विवाह को लेकर गाँधीजी से पहले बाल विवाह को रोकने के लिए इतिहास में कई लोग आगे आये, जिनमें सबसे प्रमुख राजाराम मोहन राय और केशबचन्द्र सेन हैं, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार से विशेष विवाह अधिनियम पास करवाया और विवाह के लिए लडकों की उम्र 18 वर्ष एवं लडकियों की उम्र 14 वर्ष निर्धारित की गई एवं इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। इसके बावजूद गाँधीजी के समय तक भारतीय समाज पर इसका कोई खास असर नहीं पडा था। जिसके कारण गाँधी जी तथा उनके भाइयों के साथ वही परंपरा दोहराई गई, जो इस कानून के बनने से पहले प्रचलित थी। इसलिए बाल विवाह के कारण अपने तथा अपने भाइयों के जीवन पर पडे असर को लेकर गाँधी जी भारतीय विवाह की प्रथा की तीव्र आलोचना करते हैं, ब्याह का परिणाम यह हुआ कि हम दो भाइयों का एक वर्ष बेकार गया। मेरे भाई के लिए तो परिणाम इससे भी बुरा रहा। ब्याह के बाद वे स्कूल पढ ही न सके। कितने नौजवानों को ऐसे अनिष्ट परिणाम का सामना करना पडता होगा, भगवान ही जाने! विद्याभ्यास और विवाह दोनों एक साथ तो हिंदू समाज में ही चल सकते है।

किसी के आचरण और विचारों की आलोचना यदि आप उसके जीवन-काल में करें, तो संभव है कि वह व्यक्ति उन बातों पर गौर करे। अपने आचरण और विचार दोनों में सुधार लाने की कोशिश करे। आलोचना एक ऐसा आत्मीय और जिम्मेदारियों से भरा कार्य है, जिससे आप संबंधित व्यक्ति को इसी जन्म में बेहतर होने/करने की राह दिखाते हैं। लेकिन यदि संबंधित व्यक्ति अहंकारी हो, तो फिर तो वह अपनी आलोचना सुन ही नहीं ३सकता। क्योंकि वह अपने भीतर की कमियों को देखने और सुधारने की जगह प्रायः दूसरों को उसकी कमियाँ बताने में लगा रहता है! जबकि मर चुके व्यक्ति की हमें उस बात को याद करना चाहिए, जिसमें कुछ सार, कुछ तत्त्व हो। यदि आप मृत व्यक्ति की कमियों-कमजोरियों की ओर इशारा करते रहते हैं, तो आपकी बातों पर गौर करने और अपने भीतर सुधार करने के लिए वह इस संसार में मौजूद नहीं है! ऐसे में आपकी आलोचना से कुछ इस तरह का नकारात्मक माहौल बन जाता है कि लोगों की नजर आम तौर उस व्यक्ति की कमियों की ओर ही जाती है। मृत व्यक्ति की अच्छाइयाँ कथित ईमानदार आलोचना से उत्पन्न नकारात्मकताओं के बीच कहीं खो-सी जाती है। इस संदर्भ में गाँधी ने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में अपने एक शिक्षक के बारे में लिखा है, बडों के दोष न देखने का गुण मुझ में स्वभाव से ही था। बाद में इन शिक्षक के दूसरे दोष भी मुझे मालूम हुए थे। फिर भी उनके प्रति मेरा आदर बना ही रहा। मैं यह जानता था कि बडों की आज्ञा का पालन करना चाहिए। वे जो कहें सो करना करे, उसके काजी न बनना। भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा में दिन-रात शिष्य अपने गुरु के परिवार के साथ रहते थे। शिक्षा पूरी होने के बाद जब शिष्य अपने-अपने घर लौटते थे, तो गुरु अपने शिष्यों से बहुत प्रेम और अनुराग से कहते कि मेरे साथ रहते हुए तुम लोगों ने मेरी कमियों, मेरे दोषों को भी देखा होगा। तुम उसे भूल जाना है और मेरे आचरण और विचार में से जो बातें ग्राह्य लगे, मात्र वही अपनाना। यह अकारण नहीं कि हमारे यहाँ सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उडाय की बातें कही गई हैं। गुरु भी अंततः मनुष्य होते हैं, देवता नहीं। जाहिर है, मानवीय गुण-दोष से रहित वे भी नहीं होते। जैसे गाँधी भी अंततः मनुष्य ही थे-तमाम मानवीय गुण-दोषों से युक्त, लेकिन व्यवहार और विचार दोनों की कमियों को निरंतर दूर करने के प्रति अति साकांक्ष!

गाँधी ने सत्य के आग्रही होने के पीछे अपने गुरु के जिस आचरण की चर्चा की है, दरअसल वह घटना गाँधी के पोरबंदर में रहते हुए तब घटी, जब वे स्कूली छात्र थे। वे लिखते हैं, हाईस्कूल के पहले ही वर्ष की, परीक्षा के समय की एक घटना उल्लेखनीय हैं। शिक्षा विभाग के इंसपेक्टर जाइल्स विद्यालय का निरीक्षण करने आए थे। उन्होंने पहली कक्षा के विद्यार्थियों को अँगरेजी के पाँच शब्द लिखाए। उनमें एक शब्द केटल (द्मद्गह्लह्लद्यद्ग) था। मैंने उसके हिज्जे गलत लिखे थे। शिक्षक ने अपने बूट की नोंक मारकर मुझे सावधान किया, लेकिन मैं क्यों सावधान होने लगा? मुझे यह ख्याल ही नहीं हो सका कि शिक्षक मुझे पास वाले लडके की पट्टी देखकर हिज्जे सुधार लेने को कहते हैं। मैने यह माना था कि शिक्षक तो यह देख रहे हैं कि हम एक-दूसरे की पट्टी में देखकर चोरी न करें। सब लडकों के पाँचों शब्द सही निकले और अकेला मैं बेवकूफ ठहरा। शिक्षक ने मुझे मेरी बेवकूफी बाद में समझाई, लेकिन मेरे मन पर कोई असर न हुआ। मैं दूसरे लडकों की पट्टी में देखकर चोरी करना कभी न सीख सका। जिस सत्य के आग्रह से उन्होंने आत्मकथा लिखना प्रारंभ किया था, उसे इन सब विवरणों को बताने के बाद वे और भी गहरे उतरकर लिखते हैं। सत्य को जैसा मैंने देखा है जिस मार्ग को देखा है, उसे बताने का मैंने सतत प्रत्यन किया है, क्योंकि मैंने यह माना है कि उससे पाठकों के मन में सत्य और अहिंसा के विषय में अधिक आस्था उत्पन्न होगी। पूरे सच की यह अधूरी कथा अन्याय, आतंक और निरंतर बढती कलुषता के बीच पुनि-पुनि देखे-पढे जाने के लिए आकर्षित करती है, लेकिन गाँधी के जीवन के बाद के सच से हमें परिचित नहीं कराती, जो *यादा दारुण और भयावह है। जिसे नई पीढी नहीं जानती और पुरानी पीढी के लोग भी भूल गए हैं! नोआखाली में अपने सचिव प्रो. निर्मल कुमार बोस से बहुत दुखी होकर गाँधी ने कहा था, मैं सफल होकर मरना चाहता हूँ, विफल होकर नहीं। पर हो सकता है कि विफल ही मरूँ।

अगस्त 1947 में आजादी मिली और अक्तूबर 1947 में अपने पहले जन्मदिन के मौके पर गाँधी ने कहा, आज तो मेरा जन्मदिन है। मेरे लिए तो आज यह मातम मनाने का दिन है। मैं आज तक जिंदा पडा हूँ! इस पर मुझको खुद आश्चर्य होता है। शर्म लगती है। मैं वही शख्स हूँ कि जिसकी जबान से एक चीज निकलती थी कि ऐसा करो तो करोडों लोग उसको मानते थे, पर आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है। मैं कहूँ तुम ऐसा करो, नहीं, ऐसा नहीं करेंगे। मैं तो कहता-कहता चला जाऊँगा, लेकिन किसी दिन याद आऊँगा कि एक मिस्कीन आदमी जो कहता था, वही ठीक था। मैं तो आजकल का ही मेहमान हूँ। कुछ दिनों में यहाँ से चला जाऊँगा। पीछे आप याद किया करोगे कि बूढा जो कहता था वह सही बात है। एक बूढा, अपने जीवन की साँझ में जो निपट अकेला हो गया था, जिजीविषा के विपरीत अपने बचे हुए जीवन को लेकर दुःखी था! अपनी हत्या से पहले मैला आँचल का बावनदास का भी मन फट गया था, धरती फाटे मेघ जल कपडा फाटे डोर। तन फाटे की औखदी मन फाटे नहीं ठौर! मन के फटने के साथ ही मौत ने जैसे दोनों की सुन ली! लोग नहीं सुन पाए कि अपने सच की अधूरी कथा कहते हुए गाँधी क्या-क्या कह गए, जिसे तब के लोग नहीं सुन पाए। पूरे सच की कथा कहने वाले गाँधी की अब भी भला कौन सुन रहा है!

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सम्पर्क-सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग,

अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय,

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