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परम्परा का मूल्यांकन

राजकुमार
जो आधुनिक नहीं है, वह पारम्परिक है। पश्चिम आधुनिक है। बाकी दुनिया पारम्परिक। किन्तु उसे पश्चिमी आधुनिकता के निकष पर स्वयं का आधुनिकीकरण करना होगा। समाजशास्त्रीय विमर्श में आधुनिकीकरण की सारी बहसें, लम्बे समय तक, इसी दायरे में होती रहीं। असल में परम्परा के मूल्यांकन की आवश्यकता ही तब महसूस हुई, जब परम्परा की परिकल्पना आधुनिकता के विलोम के रूप में की गयी। उल्लेखनीय है कि बीसवीं सदी से पहले परम्परा शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में किया जाता था, परम्परा के समकालीन अर्थ से वह काफी अलग था। किन्तु यह एक लम्बी कहानी है, और उधर भटक गए तो मूल विषय पर वापस आना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए वह बहस फिर कभी .....।
परम्परा की चर्चा कुछ इस ढब पर शुरू हुई जैसे वह सहज सुलभ है और जरूरत उसकी ओर सिर्फ इशारा करने की है कि देखो वह रही परम्परा। रामविलास शर्मा ने परम्परा का मूल्यांकन पुस्तक में लिखा है जो महत्त्व ऐतिहासिक भौतिकवाद के लिए इतिहास का, वही आलोचना के लिए साहित्यिक परम्परा का है। इतिहास के ज्ञान से ऐतिहासिक भौतिकवाद का विकास होता है, साहित्य की परम्परा के ज्ञान से प्रगतिशील आलोचना का विकास होता है।
परम्परा की चर्चा चली ही थी कि यह संशय उठने लगा कि परम्परा का मतलब सभी लोगों के लिए एक ही है या अलग-अलग। जल्द ही समझ में आ गया कि परम्परा के मानी-मकसद सभी के लिए एक जैसे नहीं होते। परम्परा को चिन्हित और व्याख्यायित करना पडता है। व्याख्या की भी राजनीति होती है। इसीलिए अलग-अलग विचारधाराएँ परम्परा को अपने ढंग से व्याख्यायित करने और अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश करती हैं। यह बात साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में भी दिखायी पडती है। टी.एस. इलियट और एफ.आर. लीविस के लिए परम्परा का जो मतलब है, रेमण्ड विलियम्स और टेरी ईगल्टन के लिए परम्परा का वही मतलब नहीं है। वस्तुतः परम्परा आविष्कृत और अर्जित की जाती है। हाब्सबाम और रेंजर ने तो बाकायदा एक पुस्तक ही सम्पादित कर दी इन्वेन्शन ऑफ ट्रेडीशन। छानबीन करने पर मालूम हुआ कि बहुत-सी परम्पराएँ, जिन्हें पुरानी बताया जा रहा था, वास्तव में निकट अतीत में गढी गयी थीं। जो परम्पराएँ पुरानी भी हैं, व्याख्या और मूल्यांकन के द्वारा वे भी पुनर्नवीकृत होती रहती हैं। ए.के. रामानुजन के ढब पर कहें, तो परम्परा बढई के उस चाकू के समान है जिसके सभी हिस्से बदले जा चुके हैं किन्तु उसे यही लगता है कि यह वही चाकू है, जो काफी पहले उसे विरासत में मिला था।
जैसा कि पहले कहा गया, परम्परा पहले एक थी। सहज-सुलभ। फिर दूसरी परम्परा निकल आयी। एक बार निकल पडी, तो फिर दूसरी पर ही क्यों ठहरती। दूर तलक गयी। एक से अनेक हो गयी। एक ही सभ्यता में अनेक परम्पराओं का सहअस्तित्व स्वीकार कर लिया गया। यह भी मान लिया गया कि संवाद-विवाद करते हुए परम्परा निरन्तर बदलती रहती है। भला हो ग्राम्शी का जिन्होंने यह बताया कि जातीय परम्परा में जब कोई विजातीय तत्त्व आ मिलता है तो परम्परा में बडी तेजी से बदलाव होने लगता है। जैसे उन्नीसवीं सदी में औपनिवेशिक आधुनिकता ने पहले से चल रही परम्पराओं को लगभग अपदस्थ कर दिया। इसीलिए उन्नीसवीं-बीसवीं सदी का शायद ही कोई विचारक-रचनाकार हो जो औपनिवेशिक आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा से पूरी तरह अछूता रह गया हो। उन्नीसवीं-बीसवीं सदी के सभी महान चिन्तक रचनाकार औपनिवेशिक आधुनिकता के ज्ञान के सान्निध्य में विकसित होते हैं। शायद ही कोई ऐसा चिन्तक-रचनाकार हो जिसे अंग्रेजी का ज्ञान न रहा हो। कहा जाता है कि दयानन्द सरस्वती को अंग्रेजी नहीं आती थी। अंग्रेजी उन्हें भले न आती रही हो किन्तु अंग्रेजी ज्ञान-परम्परा से वे वाकिफ थे। क्योंकि ये ज्ञान उस समय समूचे माहौल में छाया हुआ था। चाहे राजा राममोहन राय हों, चाहे फुले, तिलक, गोखले, गाँधी, अम्बेडकर, विवेकानन्द नेहरू हों, वामपंथी, दक्षिणपंथी, समाजवादी ही क्यों न हो- इनमें से कोई ऐसा नहीं जो औपनिवेशिक आधुनिकता की ज्ञानमीमांसा से पूर्णतः असम्पृक्त रह गया हो। ये अवश्यक है कि किसी के यहाँ यह प्रभाव ज्यादा गहरा है, तो किसी के यहाँ बिल्कुल हल्का। लेकिन अछूता कोई नहीं। गाँधी भी नहीं। ये संभव भी नहीं था। जैसे कबीर कई मामलों में अपने समय से आगे हैं, किन्तु स्त्री के मुद्दे पर तुलसी से भी गए गुजरे लगते हैं। वैसे ही भारतीय नवजागरण-स्वाधीनता आन्दोलन के दौर के सभी चिन्तक-रचनाकार-कलाकार, उनका जाति-धर्म कुछ भी हो, औपनिवेशिक ज्ञान परम्परा से पूरी तरह आक्रान्त भले न हो, असम्पृक्त भी नहीं हैं। इस प्रसंग की विशद चर्चा का अवकाश यहाँ नही है। फिलहाल मैं अपना ध्यान परम्परा के मूल्यांकन से जुडी हुई समस्याओं पर केन्द्रित करना चाहता हूँ, इसलिए उस प्रसंग की विस्तार में चर्चा फिर कभी करूंगा।
इस्लाम के आगमन के बाद भी बदलाव आया किन्तु हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में कहें तो वह बदलाव सिर्फ चार आने भर था। उसे बदलाव तो कहा जाएगा लेकिन गुणात्मक बदलाव नहीं। परम्परा में गुणात्मक बदलाव आया उन्नीसवीं सदी में, जब पश्चिमी आधुनिकता ने भारतीय परम्परा को लगभग अपदस्थ कर दिया। इसे पैराडाइम शिफ्ट भी कहा जा सकता है। अब समूची भारतीय परम्परा को आधुनिकता के निकष पर तौला जाने लगा। केवल उन्हीं तत्त्वों को सार्थक/प्रासंगिक माना गया जो इस कसौटी पर खरे उतरे!
परम्परा ही नहीं, भारत भी बदलता है। इसलिए न तो परम्परा और न ही भारत की कोई तात्विक पहचान बनायी जा सकती। परम्परा और भारत की अस्मिता का ऐतिहासिक दृष्टि से ज्यादा बेहतर अध्ययन किया जा सकता है। फिराकने हिन्द (भारत) के बारे में लिखा हैः
सरजमीने हिन्द पर अक्वामे आलम के फिराक
काफिले बसते गये, हिन्दोस्तां बनता गया
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भारतीय बौद्धिक परम्परा के वैशिष्ट्य को रेखांकित करने के लिए पुनर्नवता शब्द का प्रयोग किया है। पुनर्नवता कैसे संभव होती है? परम्परा और आधुनिकता में द्विवेदी जी लिखते हैं पुरानी पीढी से प्राप्त वह जीवन्त गतिशील एवं मानवीय मूल्य जिसमें बहुत कुछ कटता, छँटता, जुडता चला जाता है- वह है परम्परा। कटने-छँटने-जुडने की प्रक्रिया परम्परा ही नहीं, भारतीय अस्मिता के सन्दर्भ में चलती रहती है- काफिले बसते गए और हिन्दोस्तां बनता गया।
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साहित्य, कला और ज्ञान-विज्ञान के अनुशासनों का स्वभाव और चरित्र एक जैसा नहीं होता। इसलिए उनके मूल्यांकन की कसौटी भी एक जैसी नहीं हो सकती। सम्प्रति मैं सिर्फ साहित्यिक-आलोचनात्मक परम्परा की बात करूँगा। प्रश्न यह है कि क्या साहित्य सिर्फ विचारधारा है? इस विषय पर बहुत लिखा गया है। *यादातर विचारक इस बात पर सहमत दीखते हैं कि साहित्य की प्रकृति को सिर्फ विचारधारा में निःशेष नहीं किया जा सकता। दूर क्यों जायँ स्वयं डॉ. रामविलास शर्मा ने लिख है कि साहित्य का अध्ययन इन्द्रिय-बोध, भावबोध और विचार-बोध के स्तर पर किया जाना चाहिए। सबसे तेजी से विचार-बोध में बदलाव आता है। भावबोध में बदलाव बहुत धीमे-धीमे आता है। इन्द्रियबोध में तो कोई गुणात्मक परिवर्तन आता ही नहीं? सुख-दुख के संवेग, तो कमोबेश यथावत् हैं। इसीलिए किसी रचना का विचारधारात्मक रूप सबसे पहले अप्रासंगिक होता है। सिर्फ राजनीतिक मुद्दों के इर्द-गिर्द रची गयी रचनाएँ बहुत जल्दी बासी पड जाती है। लेकिन जो रचनाएँ भावबोध और इन्द्रियबोध के स्तर पर समृद्ध होती है, वे लम्बे समय तक पुनर्नवता अर्जित करती रहती हैं। श्रेष्ठ साहित्यिक कृतियाँ सिर्फ वैचारिक ज्ञान नहीं देतीं; मनुष्य के भावजगत, इन्द्रिय बोध और उसकी सौन्दर्याकांक्षा के बारे में भी ऐसा कुछ अनुभूत कराती हैं जो कोई अन्य अनुशासन नहीं करा सकता। अभिनवगुप्त ने नाटक के संदर्भ में भावानुकीर्त्त से संभव अलौकिकता की चर्चा की है। नामवर सिंह के शब्दों अलौकिक ठेठ भारतीय शब्द है। अलौकिक और पारलौकिक दो भिन्न शब्द है। अलौकिक-मतलब जो लौकिक होते हुए भी एकदम लौकिक नहीं है। स्पष्ट है कि इस अलौकिक की अनुभूति कोई और विद्या नहीं करा सकती। संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्यों को साहित्य के इस वैशिष्ट्य का एहसास था। संभवतः इसीलिए प्रभुसम्मित, सुहृदसम्मित और कान्तासम्मित जैसी श्रेणियाँ बनायी गयीं और साहित्य को कान्तासम्मित उपदेश कहा गया।
अभिनवगुप्त के गुरूभट्ट तोत ने कहा था कि धार्मिक ग्रन्थों में उल्लिखित कवि और काव्यशास्त्र की परम्परा में आने वाले कवि के बीच कडाई से भेद करने की जरूरत है। भट्टनायक ने ग्रन्थों की स्पष्ट तीन श्रेणियाँ बनायीं और कहा किः 1. धार्मिक ग्रन्थों में शब्द प्रधान होता है, 2. ऐतिहासिक पौराणिक आख्यानों में अर्थ प्रमुख हता है। 3. साहित्य मंक शब्द और अर्थ दोनों महत्त्वपूर्ण होते हैं और सौन्दर्यप्रक्रिया प्रधान होती है। अतः यह कहना अनुचित नहीं होगा कि भारत में साहित्यिक और धार्मिक अवधारणाएँ अलग-अलग थीं। ऐसा न होता तो काव्यशास्त्र का विकास ही संभव न होता। शेल्डन पोलक की माने तो सौन्दर्यशास्त्र का आविष्कार पश्चिम में एलेक्जेण्डर वामगार्टेन द्वारा 1735 में किया गया। काण्ट का क्रिटीक ऑफ जजमेण्ट (1790) सौन्दर्यशास्त्र की पश्चिमी परम्परा का मूलभूत ग्रन्थ है। किन्तु गैडमर के अनुसार काण्ट और विशेष रूप से शिलरमाचर के यहाँ सौन्दर्यशास्त्रीय चेतना के अभ्युदय के साथ ही सौन्दर्यशास्त्रीय ज्ञान का अवमूल्यन भी शुरू हो जाता है। ज्ञान का मतलब वैज्ञानिक ज्ञान हो गया। कला से मिलने वाला ज्ञान अपनी व्यक्तिपरक प्रकृति के कारण अ-ज्ञान की श्रेणी में डाल दिया गया। जो विज्ञानजन्य नहीं है, वह ज्ञान नहीं है। कहने की जरूरत नहीं कि भारतीय परम्परा में साहित्य-कला के अवमूल्यन का ऐसा साक्ष्य संभवतः खोजने पर भी नहीं मिलता।
लब्बोलुआब यह कि साहित्य को किसी समाजशास्त्रीय-ऐतिहासिक- राजनीतिक दस्तावेज की तरह नहीं पढा जा सकता। साहित्य की दुनिया से ताल्लुक रखने वाले लोगों को इस बात का एहसास हो या न हो, मशहूर राजनीतिशास्त्री सुदीप्तो कविराज को इस सच्चाई का इल्म अवश्य है। लिखते हैं मैं मानता हूँ, कि साहित्यिक कृति का अध्ययन करते समय उसकी अविभाज्यता का सम्मान करना बहुत जरूरी है। साहित्यिक कृतियों को कभी भी ऐतिहासिक अध्ययन के अभिलेखागार के रूप में निःशेष नहीं कर देना चाहिए।
स्पष्ट है कि सुदीप्तो कविराज भी यह समझते हैं कि साहित्यिक कृतियों को समाजवैज्ञानिक दस्तावेज के रूप में नहीं पढा जा सकता। किन्तु विगत वर्षों में समाजविज्ञान और राजनीतिक विमर्शों का इतना दबाव रहा है कि साहित्य को दैनिक समाचार पत्र या पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज के रूप में पढे जाने की माँग की जाती रही है। इससे समाजविज्ञान का भला तो क्या होता, साहित्य का नुकसान जरूर हुआ है। जैसे समूचा साहित्य विचारधारात्मक माँग और उसके द्वारा मुहैया कराई गयी समझदारी की बुनियाद पर लिखा जा रहा है। एक तरह से उसे समाज विज्ञान का उच्छिष्ट बना दिया है। विचारधाराओं से उसने इतना अधिक लिया है कि देने के लिए उसके पास ऐसा कुछ नहीं बचा जो किसी का दिया न हो। कुछ ऐसा दो जिसे कह सको कि वह तुम्हारा है!
दिलचस्प है कि स्वयं रामविलास शर्मा ने लिखा था कि साहित्य मंस सिर्फ विचारधारा नहीं होती। साहित्य इन्द्रियबोध, भावबोध और विचारबोध से बनता है। उल्लेखनीय है कि विचारों में बदलाव बहुत तेजी से होता है किन्तु भावबोध बहुत धीरे-धीरे बदलता है। इन्द्रियबोध में कोई बुनियादी बदलाव तो शायद कभी होता ही नहीं! वे रचनाएँ जो विचारबोध-प्रधान होती हैं, बहुत जल्दी कालकवलित हो जाती हैं। सुख-दुख के संवेद तो कमोबेश यथावत् रहते हैं? इसीलिए साहित्यिक कृतियों का मूल्यांकन सिर्फ विचार-बोध की बुनियाद पर नहीं किया जा सकता। साहित्यिक कृतियाँ मनुष्य की सौन्दर्याकांक्षा को उसके भावबोध और इन्द्रियबोध के स्तर पर समृद्ध करती हैं। याद कीजिए कि माक्र्स ने लिखा है कि मनुष्य की कलात्मक अर्हता, विश्व को सौन्दर्यात्मक दृष्टि से देखने की उसकी सामर्थ्य, उसका सौन्दर्य-बोध और कलाकृतियों को रचने की उसकी योग्यता का सम्बन्ध मानव-समाज की प्रगति और इस हेतु मनुष्य द्वारा किये गये श्रम से है। आर्थिक और दार्शनिक पाण्डुलिपि 1844 में माक्र्स ने सुन्दर को देखने और रचने और वस्तुओं क सौन्दर्य के नियमानुसार बनाने में श्रम की भूमिका का उल्लेख किया है मनुष्य किसी भी चीज को सिर्फ उपयोगिता की दृष्टि से नहीं बनाता, सौन्दर्य की दृष्टि से भी बनाता है। वास्तव में मनुष्य की मनुष्यता या नैतिकता भी इसी सौन्दर्य-दृष्टि का विस्तार है। मनुष्य का सौन्दर्य बोध सिर्फ जन्मजात नही है, समाज के विकास के साथ उसका भी विस्तार हुआ है। किन्तु समाज का विकास और कला-साहित्य का विकास समान गति से नहीं होता। रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है सभ्यता के विकास के साथ कविता करना कठिन होता चला जाएगा। रामचन्द्र शुक्ल के इस कथन से समकालीन कविवृन्द तो सहमत होने से रहे, और हों भी क्यों, रामचन्द्र शुक्ल थे तो जातिवादी ही! सच तो यह है कि सभ्यता के विकास के साथ कविता करना आसान होता जाता है! इस समय हिन्दी में जितने कवि कविता कर रहे हैं उतने कवि शायद ही कभी सक्रिय रहे होंगे। लेकिन मुसीबत यह है कि माक्र्स ने भी कुछ ऐसी ही बात लिख डाली हैं। लिखते हैं पूँजीवादी उत्पादन का रुख आध्यात्मिक उत्पादन की कुछ शाखाओं के प्रति शत्रुतापूर्ण है। जैसे कला और कविता। जो भी हो, इससे कला और साहित्य के विशिष्ट चरित्र का पता तो चलता ही है। संभवतः इसीलिए संरचनावादी माक्र्सवादी पियरे माशरे ने अपनी पुस्तक थियरी ऑफ लिटरेरी प्रोडक्शन में लिखा कि साहित्य का स्वभाव ही ऐसा है कि कुछ अंशों में वह विचारधारा का अनुमोदन करता है, किन्तु साथ ही उसके अन्तर्विरोधों को भी उद्घाटित कर देता है। श्रेष्ठ साहित्य किसी भी विचारधारा का आँख मूँदकर कर अनुगमन नहीं करता। संभवतः प्रेमचंद को भी इस बात का एहसास था। इसीलिए साहित्य को उन्होंने राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल कहा था। वस्तुतः साहित्य और विचारधारा का सम्बन्ध सीधा नहीं जटिल है। साहित्य से जो मिलता है, वह विचारधारा से मिलने वाले सत्य से काफी अलग है। विचारधारा गलत होने पर भी रचना श्रेष्ठ हो सकती है, और इसका उल्टा भी संभव है कि विचारधारा सही होने के बावजूद रचना श्रेष्ठ न हो। संभवतः इसीलिए फ्रेडरिक एंगेल्स ने मारगेट हार्कनस को सन् 1888 में लिखे पत्र में लिखा कि मैंने सभी घोषित इतिहासकारों, अर्थशास्त्रियों, सांख्यिकीविदों से *यादा बालजाक से सीखा। यह सही है कि बालजाक राजतंत्र के समर्थक थे फिर भी उनका महान कार्य कुलीन वर्ग के अवश्यंभावी क्षरण पर शोकगीत की तरह है और उनकी सहानुभूति उस वर्ग के साथ है जो समाप्त होने के लिए अभिशप्त है। अतीत, वर्तमान और भविष्य के सभी जोलाओं को मिला लीजिए, तब भी मेरी दृष्टि में बालजाक इनसे बडे यथार्थवाद के उस्ताद हैं। उनकी कृति ह्यूमन कॉमेडी फ्रांसीसी समाज का अद्भुत यथार्थवादी इतिहास प्रस्तुत करती है। एंगेल्स ने अन्यत्र यह भी लिखा कि रचनाकार के विचार जितने छिपे रहें, कलाकृति के लिए उतना ही अच्छा है। और ये भी ‘कई बार कलाकार अपनी कलात्मक अक्षमता छिपाने के लिए राजनीतिक जुमलेबाजी का इस्तेमाल करते हैं।
यथार्थवाद का अध्ययन करने वाले चिन्तक-आलोचकों में जार्ज लूकाच का स्थान बहुत ऊँचा है। उनकी सभी बातों से तो सहमत हो पाना मुश्किल है, किन्तु यह सही है कि यथार्थवाद की कोई गंभीर चर्चा उनको छोडकर नहीं की जा सकती। लूकाच ने स्टडीज इन यूरोपियन रियलइज्म, स्टडीज इन कन्टेम्पररी रियलिज्म जैसी पुस्तकों और रियलइज्म इन बैलेन्स जैसे निबन्धों में यथार्थवादी उपन्यासों का गंभीर अध्ययन किया है। लूकाच ने सिर्फ वामपंथी उपन्यासकारों को महत्त्वपूर्ण नहीं माना। उनका विचार था कि सामाजिक सम्बन्धों के वास्तविक चरित्र की समग्रता को दिखाने वाला कोई भी रचनाकार महत्त्वपूर्ण हो सकता है। उसकी विचारधारा और राजनीतिक सम्बद्धता कुछ भी हो! इसीलिए लूकाच ने बालजाक का समर्थन किया। जबकि बालजाक राजतंत्र के समर्थक थे और लूकाच माक्र्सवाद में विश्वास रखते थे। लूकाच का मानना था कि रचनाकार के दृष्टिकोण से रचना का दृष्टिकोण ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। विचारधारा को लेकर लूकाच का दृष्टिकोण लचीला था। उनका खयाल था कि महान कृतियाँ एक अपनी दुनिया रचती हैं। यह दुनिया वास्तविक दुनिया से विशिष्ट और भिन्न होती है। हूबहू वैसी हो ही नहीं सकती और यदि ऐसा यत्न किया भी गया तो उसकी परिणति प्रकृतवाद (Naturalism)में होगी। उसे आलोचनात्मक यथार्थवाद नहीं कहा जाएगा। लूकाच आलोचनात्मक यथार्थवाद के हिमायती थे और यथार्थवादी साहित्य के लिए समग्रता और परिप्रेक्ष्य के महत्व पर जोर देते थे। यथार्थवादी आलोचना के लिए रचना का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बहुत महत्त्वपूर्ण है। रचना का मूल्यांकन इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए समग्रता में करना चाहिए। यहाँ-वहाँ से कुछेक पंक्तियाँ उठाकर किसी रचना की न तो प्रशंसा की जानी चाहिए और न ही निन्दा। परिप्रेक्ष्य को भुला देंगे, तो नितान्त समसामयिक सन्दर्भों में उसे प्रासंगिक बनाने की कोशिश करेंगे। किन्तु प्रासंगिकता की चर्चा अभी थोडी देर बाद करेंगे। पहले यह देख लें कि लेनिन ने टॉलस्टॉय के बारे में क्या कहा। एंगेल्स और लूकाच की तरह लेनिन ने भी यह माना कि अपनी विचारधारात्मक सीमाओं के बावजूद टॉलस्टॉय का यथार्थवाद भविष्य के लेखकों के लिए आदर्श मॉडल है। लेनिन ने टॉलस्टॉय एज ए मिरर ऑफ रशियन रिवोल्यून में लिखा है कि टॉलस्टॉय के लेखन के अन्तर्विरोध वास्तव में उन अन्तर्विरोधी परिस्थितियों को प्रतिबिम्बित करते हैं जिसमें किसानों को हमारी क्रान्ति में ऐतिहासिक भूमिका निभानी है। टॉलस्टॉय मौलिक रचनाकार हैं क्योंकि उनके दृष्टिकोणों की समग्रता रूसी ऋान्ति के वैशिष्ट्य को अभिव्यक्त करती है। रूसी क्रान्ति का वैशिष्ट्य यह है कि यह किसान-बुर्जुआ क्रन्ति है। सिर्फ बुर्जुआ क्रान्ति नहीं। उल्लेखनीय है कि रूसी क्रान्ति के बाद यह बात जोर पकडने लगी कि सर्वहारा द्वारा रचित संस्कृति ही स्वीकार्य है। जो सर्वहारा द्वारा रचित नहीं है, वह त्याज्य है। इस प्रवृत्ति को प्रोलेकुल्त कहा गया और जदानोव जैसे सिद्धान्तकारों ने उसे हवा दी। फिर क्या था, संस्कृति के उन रूपों को तहस-नहस किया जाने लगा जिनके रचयिता सर्वहारा वर्ग से नहीं आते थे। लेनिन ने इस प्रवृत्ति की आलोचना की और कहा कि हम मानव सभ्यता की समूची विरासत के वारिस हैं। हमारा दायित्व है कि हम उसे संरक्षित करें और इस संस्कृति के जो मानवीय एवं मुक्तिदायी पक्ष हैं, उन्हें और विकसित करें।
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प्रो. नामवर सिंह ने प्रासंगिकता का प्रमाद निबन्ध में लिखा है कि जब हम किसी प्राचीन कृति को आज के लिए प्रासंगिक कहते हैं, तो इसमें यह अर्थ निहित है कि हम उस कृति के युग की अपनी विशिष्टता को पहचानने के साथ ही अपने युग की विशिष्टता से भी परिचित हैं और इस प्रकार हमें दोनों युगों के अन्तर की स्पष्ट अवगति है। प्रासंगिकता का निर्णय इतिहासबोध के इस ढाँचे में ही संभव है। ... कोई प्राचीन कृति हमारे आज के सभी प्रश्नों का सही उत्तर देकर अथवा देने के कारण प्रासंगिक नहीं होती। ... प्रासंगिक क्या वही है जो हमारे विचारों का अनुमोदन करता है और आज के अनुकूल हैं? जो आज से भिन्न है और हमें चुनौती देता है, वह प्रासंगिक क्यों नहीं है? आज यह सवाल उठाना इसलिए जरूरी है कि प्रासंगिकता की चिन्ता प्रमाद के हद तक बढ गयी है। अतीत के हर बडे लेखक को किसी न किसी तरह प्रासंगिक बनाने की कोशिश हो रही है कि अतीत तो सुरक्षित रहा ही नहीं, वर्तमान की अपनी विशिष्टता भी लुप्त हो रही है- यहाँ तक कि अतीत और वर्तमान का अन्तर मिटता जा रहा है ....। प्रो. नामवर सिंह ने इस प्रसंग में ब्रेख्त को उद्धृत किया है; जब हमारे रंगमंच अन्य युग के नाटक खेलते हैं तो दूरी खत्म कर देना चाहते हैं- अन्तराल भर देते हैं और दूरी मिटा देते हैं। लेकिन हमें जो आनन्द मिलता है वह तुलनाओं में, दूरी में और असमानताओं में मिलता है।
अन्त में इस चर्चा के कुछ बिन्दुओं को हम सूत्रबद्ध कर सकते हैं:
1. आलोचनात्मक या साहित्यिक कृतियों को
समकालीन बनाने या उन्हें समकालीनता के
निकष पर कसने के बजाय ऐतिहासिक दूरी का एहसास बनाये रखते हुए इन्हें आलोचनात्मक दृष्टि से
देखने-समझने की जरूरत है।
2. न तो कृति को समकालीन बनाने और समकालीन निकष पर कसने की जरूरत है और न ही स्वयं को
रचना के अनुरूप ढालने की आवश्यकता है।
3. रचनाकाल और समकाल के बीच ऐतिहासिक अन्तराल को बनाये रखते हुए द्विपक्षीय संवाद की
आवश्यकता है। प्रो. नामवर सिंह के शब्दों में नये परिप्रेक्ष्य में नया चेहरा दिखाने का यह आघात अथवा
विस्मय ही वह प्रत्याभिज्ञान है, जिसे हम प्रासंगिकता कहते हैं।

सम्पर्क : न्यू एफ-14, हैदराबाद कॉलोनी,
वाराणासी, 221005, मो. ९४१५२०१२८१