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वह प्याऊ वह प्यास वह ओक

अनिरुद्ध उमट
कुछ संयोग अजीब होते हैं उनके प्रति हम तय नहीं कर पाते कि उन्हें हम सुखद मानें या क्या करें। पर उनके होने से हम जीवन भर खुद को मुक्त नहीं कर पाते हैं। अनायास ही कुछ घट जाता है जीवन में और हम उसके साथ रहने लगते हैं। बहुत बाद में इसमें नियति का चेहरा साफ उभर सामने आता है।
वैद साहब के साथ का मेरा सफर ऐसा ही रहा।
अजीब घटनाक्रम में उनसे अचानक मिलना हुआ। वह मिलना न हो पाता तो शायद मैं आज उपन्यास नहीं लिख पा रहा होता। उन्हीं के प्रोत्साहन, आग्रह से मैं अपना पहला उपन्यास अँधेरी खिडकियाँ लिख पाया था। जिसके बारे में उन्होंने पत्र लिखते कहा था, इस उपन्यास में आप ने हिन्दी के आम उपन्यासों से एक जोखिम भरी दूरी बराबर, शुरू से आखिर तक बनाए रखी है। भाषा, विन्यास, वार्तालाप, वर्णन, संवेदना- सभी में। यह सब पहले ही उपन्यास में- प्रशंसनीय दुःसाहस है। ..तत्व की बात यही है कि आप का उपन्यास असाधारण है। इसकी आवाज नयी है, इसकी लग्जिशें दिलचस्प है। इसे दोबारा-दोबारा पढने की ख्वाहिश होती है। इस पत्र में उन्होंने सिर्फ तारीफ ही नहीं की बल्कि कमजोर पक्षों की ओर भी साफगोई से ध्यान दिलाया था, मैंने आप का उपन्यास अँधेरी खिडकियाँ पढ तो लिया है, लेकिन ठीक-ठीक समझ भी लिया हो, कह नहीं सकता। पढते समय कहीं कहीं झटके लगे, तो कहीं-कहीं चमत्कृत भी हुआ। पहले उपन्यास में आम तौर पर बहुत कुछ भर देने की कोशिश कुछ लेखक जाने-अनजाने कर जाते हैं, आप ने भी ऐसा किया है, इसीलिए शायद कहीं-कहीं मुझे महसूस हुआ कि आप सायास कलात्मक या अनूठा या मार्मिक हो रहे हैं। कुछ दूसरों के साए भी उपन्यास पर डोलते दिखाई देते हैं, उनमें शायद मेरा साया भी हो।....भाषा में कहीं कहीं अनावश्यक अमूर्तन जरूर है, जैनेन्द्रीय लहजा भी मुझे कहीं कहीं अखरा, हो सकता है यह मेरी अपनी समस्या हो।...गला फाडने की बात को मेरा ख्याल है, इतनी बार नहीं दोहराया जाना चाहिए था। लेकिन तमाम नुकताचीनियों के बावजूद आप का यह उपन्यास बचा रह जाता है, और यह आशा बँधाता है कि आप का अगला उपन्यास और गहरा, और कठिन, और संभला हुआ, और मौलिक होगा। आप को अपने पहले प्रयास पर गर्व होना चाहिए।
इसके कुछ साल बाद जब मेरा दूसरा उपन्यास पीठ पीछे का आँगन उन्हें पढने को मिला, तो उनकी बेहद उत्साही प्रतिक्रिया मुझ तक पहुँची। उसे पढ मैं अरसे तक बेहद के आश्चर्य में रहा, पीठ पीछे का आँगन आज दिन-भर रुक-रुक कर, चाव और प्यार से, पढता रहा और तुम्हारी कलाकारी से अभिभूत होता रहा। पिछले तीन-चार सालों में शायद ही किसी उपन्यास को मैंने इतने प्यार से पढा हो। पहले वाक्य ने ही मुझे जकड लिया - अंतहीन काली ऊन। अंधेरे को ऐसी अनूठी उपमा शायद ही किसी और ने दी हो। मैंने पढते हुए इतने निशान लगाए हैं, इतने वाक्य के नीचे लकीरें खींची है कि कोई देखे तो हैरान हो। जाहिर है कि मैं तुम्हारे इस उपन्यास से बहुत प्रभावित, बहुत आश्वस्त, बहुत चमत्कृत हुआ हूँ। पहले उपन्यास (अंधेरी खिडकियाँ) में जो संभावनाएँ थीं, इसमें वे साकार हो गई हैं। सबसे अधिक मैं इस बात से प्रभावित हूँ कि तुम सारे उपन्यास में बहुत संयत हो ... और तुम ने एक तरह से (फिर) स्थापित कर दिया है कि उपन्यास में अमूर्तन सम्भव ही नहीं, सुन्दर भी हो सकता है, कि प्रयोग अराजकता का पर्याय नहीं, कि प्रयोगवादी उपन्यास भी उपन्यास ही है...साधारण यथार्थ के बगैर, भाषा और शिल्प सहारे, आंतरिकता के सहारे, मानवीय लाचारियों के सहारे......कहने का मतलब यह कि तुम ने अपने इस काम से मुझे प्रभावित ही नहीं किया, बल्कि मोह भी लिया।
इसके बाद फिर मैं बरसों तक उपन्यास नहीं लिख पाया, बल्कि खुद को रोके रखा। मगर वैद साहब से निरन्तर रचनाओं के मार्फत सँवाद रहा। वे जब भी मेरा लिखा कुछ पढते तो पत्र अवश्य लिखते जिसमें उनकी साफगोई उन्हें आज यादगार बनाती है। एक बडा लेखक किस तरह अपने से काफी कनिष्ठ लेखक के लेखन के प्रति सचेत रहता है व सचेत करता है यह उस साथ को याद कर महसूस किया जा सकता है। आज उस समय को याद करते जब मैं पीछे देखते उस देखने को लिख रहा हूँ तो अपने में एक उपस्थिति को निरन्तर जाग्रत महसूस करता हूँ। यह एक तरह से एक लेखक का अपना एक अंश अन्य लेखक में हस्तांतरित कर देने-सा है। उनकी उम्मीदें, उनके सपने, उनकी यात्रा, उनके अनुभव इस प्रक्रिया में जीवन भर फिर हम में जीवित रहती है।
फिर बीच में एक मौन आता है।
ऐसा मौन जो चुप्पी से अलग होता है, जिसमें निरन्तर संवाद परस्पर प्रवाहित रहता है। हर बार उपस्थित होने की अनुभूति प्रकट करना वहाँ आवश्यक नहीं रहती। यह एक तरह का परस्पर का सघन रूप होता है। बस, यह अनुभूति स्पंदित रहती है कि हम साथ हैं।
वैद साहब की मेरे लेखक से अपेक्षा मुझे निरन्तर संयमित, सक्रिय रखे रही, एक अदृश्य संपादन मेरा होता रहा। उनके इशारे, उनकी आपत्तियाँ संगी बनी रहीं। बीच-बीच में इस अवधि में आते उनके पत्रों में उनका यह स्वर प्रोत्साहित करता रहता, इतना लम्बा मौन? ठीक तो हैं?...आप को अब यह भरोसा होना चाहिए कि आप का काम मुझे अच्छा लगता है, उसमें दम है, ताजगी है, कलाबोध है...हिंदी साहित्य के हीन पक्ष - सम्मान, पुरस्कार, धूमधाम... से विमुख हो / रह कर ही काम किया जा सकता, किया जाना चाहिए। ईमानदारी को मैं एक अनिवार्य लेखकीय धर्म मानता हूँ और वह तभी संभव है जब इधर-उधर के प्रलोभनों को इधर-उधर करते रहने की कोशिश निरन्तर जारी रहे।...तुम्हारे काम की गति और गरिमा को देखते हुए मुझे / हमें यह आश्वासन मिलता है कि तुम अच्छा काम कर रहे हो, करते रहोगे--सारी कठिनाइयों और रुकावटों के बावजूद।
यह ठोस ठावस का स्वर जीवन को बहुत बडी शक्ति देता है। जीवनभर की दिशा और तेवर तय कर देता है।
फिर वे अमेरिका चले गए, वहीं बेटी के पास चम्पाजी के साथ रहने लगे। तब मुझे उनका अब तक लिखा याद आता और उनकी खीज, ऊब, अकेलेपन की मारकता महसूस होती जो उन्होंने अपने अंतिम समय की सांय-सांय कभी दर्ज की थी, बल्कि जिसे वे मारू राग कहते थे। बहुत कम लेखक होते हैं जो बहुत पहले आने वाले समय की मारकता को यूं दर्ज कर पाते हैं। उस सब को याद कर मुझे उनके उस प्रवास के अकेलेपन और विस्थापन की पीडा का अहसास होता, किन्तु किसी के भी ऐसे अकेलेपन के समक्ष हम इस घडी निरुपाय हो जाते हैं।
विस्थापन जीवन का जीवन भर चलता है। वीरू से विमल तक। इन दो नामों में विस्थापन रूप बदल-बदल कर इधर- उधर डोलता रहता है। सनातन ऊब और संशय बेचैन किए रहते हैं। यह बेचैनी भाषा में पगलाए जीव-सी कुलबुलाती रहती है। आरम्भ में लगता है कोई कैसे इस सब में रह पाता होगा, फिर एक समय बाद लगता है इसी तरह रह सकता है, मैं उस इन्तेहा पर आ पहुँचा हूँ जहाँ दर्द की दर्दलादवा की कमन्द नहीं पहुँचती, जहाँ पहुँच जाने पर सब जंजाल झड जाते हैं क्योंकि जिस्म जड हो जाता है। अगर मैं उस इन्तेहा पर आ पहुँचा हूँ, तो सवाल यह है तो कोई सवाल नहीं होना चाहिए, लेकिन कई सवाल हैं और सब एक साथ उठ रहे हैं जैसे जानते हों कि मैं उस इन्तेहा पर हूँ जिसके बाद उनका सामना करने का समय उन्हें बिठाने की कोशिश करने का समय नहीं रहता न होने के बराबर रह जाता है जिसके बाद समय का हिसाब बेमानी है जिसके बाद सब कुछ बेमानी है जिसके पहले का सब बेमानी नजर आता है जिसके बाद कुछ नजर नहीं आता। मैं उस इन्तेहा पर आ पहुँचा हूँ मैं किसी इन्तेहा पर नहीं पहुँचा मैं कहीं नहीं पहुँचा मैं सिर्फ समाप्त हो रहा हूँ मैं समाप्त हो रहा हूँ मैं इन्तेहा पर नहीं अंत पर हूँ अंत पर नहीं उसके आसपास उड रहा हूँ क्योंकि अगर एन अंत पर होता तो कोई आवाज न होती, तो यह आलाप न होता...। (दर्द ला दवा)
जिस तरह जीवन मे संयोग अपनी छटा से आते, घटित होते हैं, उसी तरह वक्त के करवट बदलने की कथा भी कम नहीं होती है। संयोग की चमक के इतर करवट की टीस ज्यादा गहरे मारक होती है। यहाँ मियाँ गालिब इस गली को गुंजाए रहते... कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे नीमकश को, ये खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता...वैद साहब का हमारे जीवन में होना होती या होता के बीच का होना है। वे वैद की दी हुई वह नमक की डली है जिसे जबान पर रखना होता है मगर जिसे न हम चूस पाते हैं न उससे आजाद हो पाते हैं। अलबत्ता उनका वैद होना किसी मजाहिया विडम्बना के हिंडोले से कम नहीं, जिसके हर बार ऊपर जाने, नीचे आने में हमारे प्राण ही हलक को सुखा देते हैं। उनका विमल ऐसा ही इजादि खुराफाती सनकी खाजी टीस को धुआँ बनाने वाला कोई अय्यार था। जिन्होंने वैद द्वारा दर्ज जख्म के नमक चाटने को सहा या हँसी के पगलाए पलों में महसूस किया है वे जानते हैं वह पीर किस कदर मारू रही होगी, जो चरम पर जाते मोहक हो जाती थी।
एक लेखक अंततः कुछ सिखाने से ज्यादा बहुत सहने की कलाएँ साझा करने को विकल रहता है। वैद साहब के यह यह सहना एक उधडी मुस्कान में तब्दील हो अकेलेपन के तारों को कसने से अधिक टूटने से बचाने की चिंता ज्यादा होता है। वे मृत होने में इस कदर उजले प्रतीत होते हैं कि जीवन का सारा धवल कारोबार ध्वस्त हो जाता है।
मेरे जीवन के सूखे कुएँ में से जब बौने ही बौने निकल रहे थे, तब पहली बार डोल भार से ऊपर आने में जोर खा रहा था। बौनों के देस से पहली बार कोई विराट विडम्बना का वीरू विमल होने को प्रगट हो रहा था। जिस के हाथों मेरे पहले उपन्यास की नाल कटनी थी और हिंदी साहित्य की नाल ठुकनी थी।
....जीवन के रिक्त स्थानों को भरना नहीं था बल्कि उनकी रिक्तता को रिसने का रचाव उपलब्ध कराना था।
बहुत अनमने मन से मैं बरसों बाद उपन्यास की खाट की मूँज कसने को उमडता भाषा की प्याऊ के आगे ओक लगाए आभासी जल पीने को प्रस्तुत हो रहा था तब मुझे नहीं पता था वह प्याऊ वह प्यास वह ओक किसी के जाने के संकेत खुद में समाए है।
काला कोलाज की काली स्याही की सियाह इबारत तब पन्नों पर बिखर रही थी जिसमें से असँख्य कंठों का वैपरीत्य रूदन में रूह-रूह चिन्दी हो रहा था। तब, मैं नींद नहीं जाग नहीं तीसरा उपन्यास खुद को लिखते देख पा रहा था। वह देख पाना आँखों से सलेटी बूरा झडने जैसा था। नींद और जाग, ऊब और इंतजार के बीच की पतली गली कोई टूटे तारे की लकीर-सी उमडती पीठ थी जिसकी दोनों करवटें उदास किस्सों के बोझ का बोझिल झिलमिल था।
वे अंतिम साँसे तोड मरोड रहे थे और मैं इस सब से पृथक अनथक उन्हें जीवित अपने बेहद करीब महूसस कर रहा था। तुम्हें याद करते करते उनके प्राण गए, तुम्हारे इंतजार में उनके प्राण अटके थे। काला कोलाज ठंडा कुआँ था जिसमें से यह राख उड रही थी।
इस साल के किसी दिन मैं बीकानेर के हेडपोस्ट ऑफिस के काउंटर पर खडा था, पीले लिफाफे की जबरदस्त पैकिंग लिए। किसी तरह अमेरिका में उनके ठिकाने का पता लिया था। एक बेहद दुबली पैकिंग में मेरा बेहद बेहद था। काउंटर से आवाज आई कि पहुँचने में पन्द्रह दिन लगेंगे। मैंने कहा मगर मिलनी जरूरी है, तो उसने कहा जरूर मिलेगी । वह जरूर मिलेगी यह जान मैं निहाल मन बेहाली से गाफिल था। गाफिल का फिलहाल फिर जीवन भर एक सरोता था, जो परत दर परत काटते रहने को ....
मैंने उन्हें नींद और जाग के बीच की गली से आते अपने जाते फिर गली की कसावट की कशिश में कसते महसूस किया। वे मेरे बेहद करीब थे सात समंदर, सात पर्वत, सात तालों से पार।
कुछ दिन पहले ही भोपाल के इंडियन कॉफी हाऊस में मुझे एक लेखक मित्र एक तस्वीर दिखा रहा था जिसमें वैद साहब अमेरिका में अपने निवास में बेहद कमजोर से दिख रहे थे, जैसे कोई बूढी चिडिया अँधेरे बन्द कमरे में उडती उडती थक कर निढाल हो। वह चोंच खोल कुछ चिंचिया पाएगी, या पंखों में कुछ हवा भर पाएगी ऐसा नहीं लग रहा था फिर भी मन कहता था कि शायद....ऐसा हो।
पोस्ट ऑफिस के बाबू कह रहे थे पन्द्रह दिन में पहुँच जाएगी।
बरसों बाद...वे देखेंगे कि ...
तभी एक शाम चित्रकार मित्र मनीष पुष्कले का संदेश आया...वैद साहब नहीं रहे।
वे शांत हो पाए आखिरकार जीवन भर की हैरानियों से।
मगर मेरी डाक वहाँ जिस पते पर पहुँचनी है वहाँ अब कौन उसे ग्रहण करेगा...
विस्थापन जीवन में एक बार या एक ही के साथ नहीं होता। वह हर करवट कोडे मारता अनजान द्वीपों पर पटकता रहता है। अमेरिका में उनकी देह शांत हुई वहीं उनका अंतिम संस्कार हुआ। वहीं किसी कोने में कुछ दिन बाद नींद नहीं जाग नहीं पहुँची होगी...कभी न लौटने को दो लोग विदेश में शांत हुए।

पत्र लिखें, अगर मैं उसी गहराई और अंदाज के जवाब न दे सकूँ तो भी। मैंने बेंच की तलाश छोड दी है, मकान छोडने के लिए तैयार हो रहा हूँ। (11.10.93)

आपका।
के.बी.
सम्पर्क- माजीसा की बाडी,
गवर्नमेन्ट प्रेस के सामने,
बीकानेर - ३३४००१,
मो. ९२५१४१३०६०