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अंधेरे की झील में

पूनम अरोडा
एक बार किसी ने रामकृष्ण परमहंस से पूछा कि क्या आपने ईश्वर को देखा है तो उन्होंने कहा कि मैंने ईश्वर को तो नहीं देखा लेकिन एक स्वप्न देखा था। उस स्वप्न में मुझे एक झील दिखाई दी। झील काई से ढकी हुई थी। फिर मैंने देखा कि हवा का एक झोंका आया और काई धीरे-धीरे एक और सरकती गई और मुझे बिल्कुल नीला पानी दिखाई दिया। तब मैंने सोचा कि नीला पानी यथार्थ है और जब हवा का झोंका दोबारा आया तो काई फिर झील पर आ गई। तब मैंने सोचा कि यह माया है लेकिन उन्होंने इसके बाद कहा कि यह माया उस यथार्थ के बिना नहीं रह सकती है और न ही यथार्थ उस माया के बिना रह सकता है।
कृष्ण बलदेव वैद को आखिर क्यों पढा जाये? क्या इसलिए कि उनके यहाँ इल्हाम और दरवेश और इबारत का इनर्शिया किसी जादुई तल को नहीं छूता बल्कि वह कठोर, बेलिहाज, और बेचैन है। जैसे जल पर छाई काई। जिस यथार्थ की छवि में माया नहीं वह छवि तो पहले ही खंडित और अधूरी है।
पूर्व में ऐसे कम ही लेखक हुए हैं जो अपने अतीत में जाकर अपनी भविष्य रेखा खुद बनाते आये हैं। जिन्होंने अपने जन्म की पुष्टि स्वयं की हो और जो अपनी माया के स्वप्न रच पाने में सक्षम हों। कृष्ण बलदेव वैद को एक ऐसा लेखक माना जाए कि उन्होंने अपने जन्म से पूर्व ही जन्म ले लिया था तो इस बात को कुछ ऐसे समझना होगा कि वे अंधेरे और परखे गए सत्यों पर आघात करने के लिए अपने ही सृजन को स्वयं के ही संशयों से कभी मुक्त नहीं कर पाए। वे जानते थे कि यथार्थ और माया, ध्वनि और प्रतिध्वनि है। लेकिन उनकी इच्छा इससे भी आगे का मार्ग खोज लेती है। वे एक ऐसी झील का अंधेरा अपनी स्याही से लिख देते हैं जिसकी सीढियाँ नीचे कभी नहीं जाती।
संसार की तमाम लीलाओं में एक बार कोई लीला मेरे आस-पास भी बन जाती है। मैं सच कहूँ तो वैद साहब को जानना मेरे लिए प्रारब्ध की प्रीति बनी और निमित्त भी किसी योग द्वारा जन्मा। इसी योगमाया में, जब मैं देख रही थी कि अनुपस्थिति एक छलावे के अलावा कभी-कभी संधान और समाधान भी हो सकती है, एक बार वे मेरे एकांतवास में दो दिन मेरे समक्ष रहे। मैं यथार्थ और माया के मध्य की लीला में एक दृश्य बनाने लगी, संवाद करने की मुकम्मल जगह बनाने लगी। उन्हें के।बी कह कर संबोधित करना चाहती थी लेकिन चुप रही। मैं जानना चाहती थी कि वे अपने लेखन में यथार्थ की चीड-फाड क्यों करते रहे? क्यों वे अपने लिखे को बार-बार एक औघड की तरह निर्दयी कामनाओं के हवाले करते रहे? जहाँ छल होता वहाँ वे आसक्त हो जाते प्रतीत होते हैं और जहाँ कर्म होता वहाँ शब्दों के भस्म होने की परिणिति लिख देते हैं। अब तक मैं समझ गई थी कि मैं भी उस काई को हटाने का प्रयास कर रही हूँ जिसकी गहराई का अहसास करना मेरे लिए कोई सृष्टि-विधान नहीं है। और अफसोस कि अपने एकांतवास में मैं उनसे बात नहीं कर पाई। केवल देखती रही। जैसे देखना भी एक विचार हो, जैसे दृश्य रचना ही विचार हो। विचार और संवाद के असभ्यपन से इस माया को नष्ट करना मुझे बहुत घृणित प्रतीत हुआ।
पंजाब के डिंगा में जन्में वैद अपने आखिरी समय में अमरीका थे, लेकिन इस बार चंपाजी के बगैर। चंपाजी उनसे पहले दुनिया छोड गईं जबकि वे दोनों साथ-साथ अपने अंत की प्रतीक्षा कर रहे थे। कैसा होता है अपने अंत की प्रतीक्षा करना? पर फिर सोचती हूँ वे कुकी(अपनी प्यारी पालतू कुतिया) की मौत के बाद भी तो अपने अंत की ओर थोडे-से सरक आये थे। कुकी का स्मृति-चित्र मेरे भीतर भी निर्मित हो गया है। काली और छोटी पूँछ की मल्लिका को वे प्यार से कुक्सिया बेगम, कुक्स, कुक, रॉमस कुक आदि कह कर पुकारते थे। कभी उनके रचे चरित्रों को याद करने लगती हूँ, तो कुकी सबसे पहले जहन में दौडी आती है। एक नहीं बल्कि कई साझे लेकिन अदृश्य संवादों की नियति के द्वार खुलते रहे और मैं वैदियत की कंपन को महसूस करती रही। ऐसा संयोग बनता रहा और मैं इन संयोगों की साक्षी बन वैद साहब के जीवन और लेखन में प्रवेश कर एक ऐसे धर्म को निभाने की पुरजोर कोशिश करने लगी जो धर्म वैद साहब का अपना बनाया, निभाया और किसी भी संतुलन की दरकार रखने की इच्छा से मुक्त था और है।
तलघर
एक लेखक कब जन्म लेता है? क्या तब जब वह लिखने और छपने की प्रक्रिया में आ जाता है या तब जब वह अपने जीवन की सारी छोटी-बडी दुर्दशाओं और भव्यताओं का गणित बना रहा होता है। लिखना भी एक अंतरंगता है और अपनी अंतरंगता के बीज को किन्हीं निर्दोष भंगिमाओं में एक पदार्थ रूप में विकसित करना उसकी अनुकृति है। इसी अंतरंगता की अनुभवशाला में लेखक खुद को उसकी आँच में तपा रहा होता है और औपचारिक तौर पर वह इसे शुरुआती समय में जान भी नहीं पाता। अपना स्वर, अपनी आवाज और साधना की पद्धति (लेखकीय कर्म में) को खोज पाना एक दिलचस्प और गहरी प्रक्रिया है।
इस भाव में क्लासिक उपन्यास उसका बचपन से अपने लेखकीय जीवन में प्रवेश करने वाले वैद को केवल प्रयोगधर्मी लेखक कह देना काफी नहीं हो सकता। वे अपने स्वर और लय की प्रत्येक तान और तार को स्वयं ही तोडते आये, जबकि यह घटना अन्य द्वारा निर्मित नियमों के हिंसक चयन में घटित होने की संभावना अधिक रखती थी। लेकिन ऐसा विलक्षण अनुभव और साहस वे किसी और को भला थमा भी कैसे सकते थे? वे कभी इन पक्षों में नहीं दिखाई दिए जहाँ उन्होंने अपनी कल्पनाओं या मर्यादा को भारतीय जनमानस की स्वीकृति का साहित्यिक सांस्कृतिक लिबास ओढाने का अनावश्यक प्रयास किया हो। हिन्दी पाठक वर्ग के लिए वे उस तरह से स्वीकार्य कभी नहीं रहे जिस तरह उनके समकालीन। अपने शब्द-चयन, शिल्प और उनसे बर्ताव को लेकर वे अश्लील, बेबाक और कभी तो उबकाई से भरे लेखक के रूप में नकारे जाते रहे। लेकिन यही तो एक पक्ष है भाषा और उसके प्रति आचरण की विक्षिप्तता का जिसे हमारा समाज जन्म तो देता आया है, लेकिन सृजन के आख्यान में सहन कभी नहीं कर पाया। अश्लील और श्लील की परिभाषा से मुक्त वैद अपनी लेखकीय सक्षमता की अपनी बोध-ध्वनि को सुनते रहे। उस ध्वनि के सुर उनकी प्रत्येक कृति में हैं और सचेत और निर्भीक पाठक भी इसे सुनने का दावा करता है...
बरसों अपने अज्ञान को कम करने की कोशिशों में बर्बाद कर दिए। किताबें पढीं। हर किताब में हजारों निशान लगाए। सैकडों कॉपियाँ भर डालीं। रट्टे लगाए। पुस्तकालयों में भूत की तरह मंडराता रहा। किताबों की दुकान में घंटों एक टांग पर खडे होकर तपस्या की। फूलों के नाम याद किये। परिंदों की बोलियाँ सुनीं। वक्ताओं के भाषण झेले। सेमिनारों को सहन किया। तितलियों के पंख पहचानने की कोशिश की। इतिहास का मर्म और क्रम जानना चाहा। भाषा विज्ञान की भूलभुलैया में भी भटक कर देख लिया। विज्ञान के वैविध्य से चकित होता रहा। गणित की गहराइयों में बार बार गुम हुआ। दर्शन के दरवाजे से कई बार सर फोडा। अध्यात्मवाद से आतंकित हो के भी देख लिया। जर्रे जर्रे का जिगर चीरने वालों को भी देख लिया..
बस। बस। बस।
अब मैंने मान लिया है कि मेरा अज्ञान अक्षय है।
प्रवास गंगा
दरअसल जिस ओर से उन्हें देखा जा सकता था वह राह यहाँ बन ही नहीं पाई थी। इसके भी कारण थे- एक तो अपने जीवन का ज्यादातर समय वे प्रवास में रहे। दूसरा कि वे एक तरह से अपने ही देश में, अपनी ही साहित्यिक भूमि पर व्यवस्थाओं का शिकार हो गए। वैद ने कभी अपने लेखन में अतिभावुकता को स्थान नहीं दिया और न ही अतिरिक्त आवरण की कभी आवश्यकता महसूस की। वे स्व के आडंबर को लगभग नग्न करते आये क्योंकि उन्हें न तो स्वीकार्य होने का इच्छा थी, न वे इसके लिए कोई स्पष्टीकरण ही चाहते थे। जिस अक्षुण्ण नैतिकता के अछूत सम्मोहन में वे ऐन्द्रिकता की सत्ता को अंतिम आहुति देने को आतुर दिखाई देते थे वह अक्सर विचलन के भाव का आत्मालाप बन जाता था।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति, पावकः।
न चैंन क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ल।।
अर्थात न शस्त्र इसे काट सकते हैं, न आग इसे जला सकती है... न पानी इसे भिगो सकता है, न हवा इसे सुखा सकती है...
मिखाइल बुलगाकोव के उपन्यास मास्टर और मार्गरीटा में वोलान्द पांडुलिपि के बारे में यही कहता है कि मन्युस्क्रिप्ट्स डोंट बर्न । वैद के संदर्भ में यह एक ऐसा आत्मघाती सत्य है जिसके लिए किसी आंतरिक सहोदर की चौखट पर घण्टों खडे रहने की जरूरत नहीं बल्कि वैद को आत्मसात करने के लिए आंतरिक समृद्धि और उसकी समूची पीडा के द्वंद को समझना होगा। उस पीडा को जो न असहाय है और न सांत्वना का भक्षण करती है। वैद एक देव-प्रेत सरीखे लेखक हैं जो जितने विराट हैं उतने ही क्रूर। वे अभिव्यक्ति की लीला को सदृश्य ही दिखाना चाहते हैं जैसे वे वास्तविकता का निर्वाह कर रही होती हैं। लेकिन उनका क्रूर होना अभिव्यक्ति के क्षणों में अपने कथ्य या पात्रों को अनाथ या ऊष्माहीन बना कर त्रस्त कर देना नहीं होता। व्यवहार में पात्र किसी दृष्टिभ्रम का शिकार नहीं हो रहे होते बल्कि मनोवैज्ञानिक तौर पर अपना ही शिकार हो रहे होते हैं। यहाँ मैं वैद की विलक्षण कृति नर नारी के पात्रों को याद करती हूँ तो बडी सरलता से वैद के मनोविज्ञान की सशक्त संभावनाओं पर विचार कर पाती हूँ। नर नारी के पात्र आत्मबोध से तिरस्कृत अपराधबोध के प्रतीक नजर आते हैं और इसकी अबोधता में वे उतने ही फूहड भी नजर आते हैं। सीमा इस उपन्यास का एक मुख्य पात्र है, संवेदना और आत्मविश्वास के स्तर पर वह अपने पति से कहीं अधिक उदार और स्वाभिमानी है। वहीं सीमा के पति की बहन भी एक सशक्त और विद्रोहिणी स्त्री के रूप में उपन्यास में अपनी उपस्थिति दजर् कराती है लेकिन नर नारी के स्त्री पात्रों में एक स्त्री ऐसी भी है जो टेक्स्ट के परिवेश को ही मनोवैज्ञानिक ढंग से दकियानूसी बना देती है जो अपने पुत्र-प्रेम की शिकार है। बहुत दयनीय प्रतीत होती है किसी पात्र की ऐसी स्थिति जो सत्य के बरक्स खुद को ऐसी जगह खडे होने के लिए सांत्वना देती हो। उसी तरह से उसका बचपन का बीरू और उसकी बहन देवी भी सम्पूर्ण उपन्यास में अपनी विवशता के कारण ही हर ओर नहीं दिखाई देते बल्कि यह कथावस्तु ही उनके चारों ओर होने का अभ्यास करती दिखाई देती है और यह अभ्यास एक गल्प नहीं बल्कि वेदना निर्मित करता है। वैद अपने पात्रों को विकल्प भी नहीं देते। बीरू एक बालक के रूप में उस अंत तक शायद न भी पहुँचता, लेकिन वैद उस ध्वनि के आदि नहीं जो पूर्व परिचित हो, जिसे हिन्दी साहित्य सरलता से ग्रहण कर लेता है।
अपनी शैली और कथ्य को लेकर हमेशा प्रयोगात्मक रीति में रहने वाले लेखक जिन्हें अपनी परंपरा का ऐसा अकेला लेखक भी कहा जाता है जिन्होंने मानव मन की गूढताओं की पडताल में वर्ग, जाति और लिंग के भेद को खुद पर कभी हावी नहीं होने दिया। ये गुण अवगुण न बने इस बात का ख्याल वैद ने अपनी कृतियों में रखा। हालांकि वे अपनी शैली को दोहराते भी हैं। उसका बचपन में वे बीरू के द्वारा कथ्य के सूत्र पकडते हुए बढते हैं तो मायालोक, नर नारी में वे अपने नैरेटिव में एक अलग तरह का आख्यान रचते हैं। दूसरा न कोई में वे भारतीय मानस के लिए एक अदम्य साहस के आख्यान का खेल रचते हैं। यह सब इतना सायास प्रतीत नहीं होता। लगता है भीतर कोई जिज्ञासा है जो उनसे चाहती है कि वे खुद को नकारें, सृजन में अपने ढाँचे को उस जडता तक ले जाएँ जहाँ संरचना का कोई सारांश न हो बल्कि एक खुला आकाश हो।
खंडों में आलाप
* अगर आप एक चींटी को गौर से देखें तो उसमें भी शायद आपको वही नजर आ जाए, जो एक हाथी में नजर आता है।
मैं परस्पर विरोधी कामनाओं का कैदी हूँ- सफलता और असफलता, शोहरत और गुमनामी, इज्जत और बेइज्जती, अनुराग और वैराग्य, सोहबत और तन्हाई की कामनाओं का।
* प्रूस्त शब्दों की महल और कैथीड्रल उतारता है। बैकिट शब्दों की गुफाएं बनाता है जिनमें अंधेरे का आलोक होता है जो फालतू चीजों से पाक होता है, जहाँ मौन वास करता है, या फिर कुछ मंत्र, मौन की आराधना में। जहाँ साँसों का संगीत सुना जा सकता है। जहाँ जिस्म आत्माओं में बदल जाते हैं।
प्रूस्त प्यार की गुत्थियों और ग्रंथियों का जिस विस्तार और गहराई और सफाई से बयान करता है वे मुझे विस्मित करते हैं। हेनरी जेम्स और प्रूस्त में साम्य है, बैकिट और प्रूस्त में नहीं।
* ईश्वर है? वह हो न हो, उस पर विश्वास भी उतना ही जरूरी है जितना अविश्वास। जो लोग (जोब/मीरा/प्रह्लाद/द्रौपदी) ईश्वर की शरण मे जा पडते हैं। उन्हें शांति तो मिल ही जाती है, और कुछ मिले न मिले। शांति की भी कई किस्में हैं अशांति की भी। कला की अशांति ही उसकी शांति है।
* मेरी अपनी जो कटी-फटी विक्षिप्त अंदरूनी दुनिया है-जिसमें अँधेरा, धुँआ,अशांति, अप्रेम, अस्वस्थता, अस्थिरता, अनिश्चितता है। उसी की अभिव्यक्ति मेरी नियति है। और उस अभिव्यक्ति से मुझे कुछ हासिल शायद ही हो, जो होगा उससे मेरी संतुष्टि नहीं होगी।
* जिस सहजता से लोग प्रेम शब्द का प्रयोग करते हैं मैं नहीं कर सकता। ऐसी ही असहजता मुझे देशप्रेम में भी होती है। प्रेम का रूमानी रूप मुझे लुभाता तो है, भरमाता नहीं। विरह को भी एक हद तक ही बर्दाश्त कर सकता हूँ।
* असली अफीम लेखक वही जिसे पढकर जलन न हो, महसूस हो जीवन कुछ समय के लिए जंजालमुक्त हो गया है, जी चाहे कि वह अजीम लेखक कहीं छिपा बैठा हमें देख रहा हो, और यह सब सोचते-सोचते और उस लेखक को पढते-पढते आँखों में आँसू आ जाएँ, कृतज्ञता के आँसू।
आँखें अथाह कुँए
* प्रेम कामुकता के बगैर अधूरा, कामुकता प्रेम के बगैर भी कभी-कभी पूरी हो जाती है।
* मैं परिवार पद्धति का समर्थक नहीं। कलाकार को परिवार की पद्धति रास नहीं आती। उसे आकाश चाहिए या फिर शून्य।
* हर रात एक गुढा, हर नींद एक मौत। हर सुबह एक संभावना।
वैद के आलाप यहाँ-वहाँ उनकी डायरियों में बिखरे पडे हैं और इन खंडित आलापों में जिस संदिग्ध स्वर का भ्रम होता है दरअसल यह वही ब्रह्म है जो शब्दों का होश है, अंत की हवस है, समाधि का दर्पण है या समय की मौत है। वैद इस ब्रह्म की सुवासित कब्र पर विदा-गीत गोदते रहे। वे शायद ही कुछ जानने के लिए लिखते थे या फिर शायद वे जानने के बाद की विरक्ति में माया के लोक को बार-बार अपनी इंद्रियों में रचते हों। हर लेखक अपने कथ्य में अपने अनुसार प्रवेश करता है और वही उसका अपनी कृति के साथ सबसे सत्य संवाद भी होता है। वैद अपने जीवन-अनुभवों के दर्पण से अपनी रचनाशीलता में उतरे। अगर ऐसा न होता तो वे उसका बचपन और गुजरा हुआ जमाना कभी नहीं लिख पाते। किशोर बीरू के रूप में विभाजन की भयावह त्रासदी का समय और ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह दरअसल उन्हें नास्तिक नहीं बनाता बल्कि इस अदृश्य नास्तिक(आस्तिक) होने की यात्रा में वैद उस प्रार्थना में थे जो उन्हें साधारण मानव से कहीं ऊँचा उठा देती है।
और जो स्वप्न थे
वैद के स्वप्न कभी-कभी मुझे एक सिनेमैटिक आतंक देते हैं। नींद और जाग के मध्य स्वप्न की महीन तार से झूलता एक वयोवृद्ध, किस तरह अपने स्वप्नों के जाले हटा कर जाग में लौटता होगा? स्वप्नों की यह यात्रा उन्हें कितना थका देती होगी? तर्क और भावना, खौफ और सावधानी, विस्मय और संकेत, की सीढियों से उतरते उन्हें किस तनाव से गुजरना पडता होगा, इस भय के भाव को समझने के लिए भी एक भाषिक यंत्र की आवश्यकता पडती है। यहाँ मुझे स्वप्नों की भाषा पर रूसी फिल्मकार आंद्रेई तारकोवस्की की एक उत्कृष्ट सिनेमाई कृति मिरर की याद आती है जिसमें आंद्रेई के स्वप्न भी उसी तरह कवितामय प्रतीत होते हैं जिस तरह वैद के स्वप्न किसी भी आकार, आकृति और ध्वनि में दिखाई देते हैं। आंद्रेई के स्वप्नों का आख्यान विराट, भावुक और जादुई है। इल्हाम की जागृति अपनी करुणा के साथ है जहाँ सौंदर्य के बोध का भी अमल होता है।
स्वप्नों का आख्यान वैद के यहाँ भी टूटा-सा है और जैसा कि उन्हें होना भी चाहिए। यही स्वप्नों की गोपनीयता का मर्म है।
वैद के स्वप्नों से एक भाप उठती है। भाप का कर्म है कुछ क्षणों की अदृश्यता निर्मित करना। उसी तरह स्वप्न, क्रिया में रूपांतरित होकर काया के निस्पंद होने का गुण जन्मते हैं। वैद अपने स्वप्नों के संसार को कौतुक दृष्टा बन कर देखते थे। 9 जनवरी 2003 का उनका एक स्वप्न- एक लडकी को अचानक उसके होंठो पर चूम लेता हूँ, जैसे कोई किसी बच्ची के होठों को चूम ले, उसके जिस्म को हाथ नहीं लगाता। हम दोनों खडे हैं। उसके होठ याद हैं, उसका चेहरा भी। वह मेरी हरकत पर हैरान हुई है। वह हैरानी उसकी आँखों से भी टपक रही है, उसके चेहरे से भी,उसके होठों से भी। पहली बार की ही तरह मैं फिर उसके होठों को चूम लेता हूँ। अबकी बार उसके चेहरे का रंग कुछ बदल गया लगता है। उस पर कुछ जर्दी-सी दिखाई देती है। तीसरी बार फिर उसके होंठो को चूम लेता हूँ। यह सब कुछ क्षणों में ही हो जाता है। उसकी आँखें मुझ पर टिकी रहती हैं, मेरी उस पर। मैं अपने जिस्म से आगाह हूँ न उसके जिस्म से। तीसरे बोसे के बाद शायद मुझे घुँधला-सा आभास होता है कि वह अवस्त्रा और सुडौल है। बोसों में होठों का स्पर्श ही होता है, उलझाव नहीं। तीसरे बोसे के बाद मैं उससे कहता हूँ ( हो यह भी सकता है कि कहता नहीं, सिर्फ सोचता हूँ) जिस्म होना ही नहीं चाहिए, एक सुराख मुँह की जगह होना चाहिए, एक कहीं और। फिर नींद आधी खुल जाती है।
20 सितंबर 2004 का एक और स्वप्न-
कल रात मुझे एक बुरा स्वप्न आया था। तीसरी या चौथी मंजिल की छत से शांतनु(रचना का बेटा) किसी ऐसे झूले पर था जिस पर खडे होकर यहाँ के कामगार घर बनाते हैं या घरों की मरम्मत या उनकी लिपाई-पुताई करते हैं। मैं उसे देख रहा हूँ और उसके बारे में चिंतित हूँ फिर अचानक वह गायब हो जाता है और मुझे ख्याल आता है कि वह शांतनु नहीं था, उर्वश थी। स्वप्न में ही मैं सीढियाँ उतरता हुआ चिल्लाता हूँ, चम्पा, चम्पा! नींद खुल जाती है और मैं पसीने से तर-ब-तर हूँ।
इस तरह वैद अक्सर अपने स्वप्नों को विचार-दृश्य, भय-प्रतीकों और स्मृति-छवियों में रचते थे। हालांकि स्वप्नों की व्याख्या करना भी सरल नहीं है और कलाकार या लेखक के स्वप्न कई तहों में होते हैं। इनमें काल्पनिक विचारों की संभावना को भी नकारा जा सकता।
सिगमंड फ्रायड की पुस्तक द इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स में शाब्दिक अर्थ में स्वप्न-व्याख्या दी गई है कि सभी सपनों की विषय-वस्तु की प्रेरणा दमित इच्छा की कामनापूर्ति है और स्वप्न देखे जाने का उत्प्रेरक प्रायः स्वप्न से पिछले दिन की घटनाओं में पाया जा सकता है, जिसे उन्होंने दिवस अवशेष कहा।
वैद अपने गद्य के जोखिम भरे इलाकों में अपनी भाषिक समृद्धि के आलोक में भटकते रहे। उन्हें किस शय की खोज थी या खीज थी, कहा नहीं जा सकता। कहा भी जा सकता तो यह नहीं कहा जा सकता कि क्यों थी? यह कहा भी जा सकता कि इसलिए थी तो भी यह नहीं देखा जा सकता कि वह शय कैसी थी? हम अंत की पुकार को सुनने के लिए प्रारंभ की गति बार-बार रचते हैं। जैसे वैद काया की प्रार्थना में लिखते हैं-
मैं नहीं जानती तुम अगर नहीं हो और मैं हूँ तो मैं क्या करूँ क्या न करूँ/ मैं नहीं जानती तुम अगर नहीं हो और मैं हूँ तो मैं तडपना बन्द कैसे करूँ/मैं नहीं जानती तुम अगर नहीं हो और मैं हूँ तो मैं अपनी फरियाद कहाँ ले जाऊँ/मैं नहीं जानती....

सम्पर्क- shreekaya@gmail.com