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जिन्हें मैंने जाना कुछ ऐसे

दया दीक्षित
होते हैं कुछ लोग ऐसे! जो इतिहास रचते हैं! गिरीराज किशोर ऐसे ही रचनाकार हैं। शताब्दी के यशस्वी कथाकार, उपन्यासकार गिरिराज किशोर श्रेष्ठ गद्यकार, उद्भट विचारक, राष्ट्रीय भावधारा के प्रखर चिंतक, निर्भीक, निष्पक्ष, साहित्यकार के रूप में बहुआयामी, बहुमुखी प्रतिभा के पुँज के रूप में हिन्दी साहित्य जगत को समृद्ध करने वाले हिन्दी के कालजयी रचनाकार हैं, जब तक उनका रचनात्मक साहित्य मानव और मानवता की प्रेरणा का संबल प्रदान करता रहेगा, तब तक वे यशकाय रूप में हमारे बीच सर्वत्र विद्यमान रहगे।
हिन्दी साहित्य में ऐसे रचनाकारों की कमी नहीं है। जिनका कतित्व तो क्रांतिकारी था, किन्तु व्यक्तित्व की धूमिल परतों के कारण, उनका साहित्य, जनमानस का हित न कर सका, इसके बरअक्स यदि कथाकार गिरीराज किशोर की बात की जाए, तो वे जितने बडेकद के रचनाकार हैं, उतने ही बडे कद के व्यक्ति हैं। संभवतः यह अन्तर कर पाना मुश्किल है कि वे शब्दशिल्पी हैं या श्रेष्ठ व्यक्ति हैं।
यदि ऐसा ना होता तो लोग उन्हें देखने के लिए लालायित, उत्सुक जिज्ञासु न होते ! कई उदाहरणों में से सिर्फ दो उदाहरणों का यहाँ उल्लेख कर रही हूँ। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह उदाहरण सुने नहीं आँखों देखे हैं। मैंने देखा, मैंने क्या, कानपुर के अधिसंख्य लब्ध-प्रतिष्ठ साहित्यकारों ने देखा और साक्षी भी बने हैं।
अवसर था, साहित्य सृजन संस्था द्वारा 2018 में आयोजित कृति विमर्श,पुरस्कार वितरण व सम्मान समारोह का! हमारी संस्था ने इस वार्षिक समारोह में गिरिराज किशोर की सद्य प्रकाशित कृति आंजनेय जयते पर चर्चा रखी थी। स्थानीय स्तर पर कथाकार राजेन्द्रराव, सतीश गुप्त व डॉ. सुषमा त्रिपाठी, अनूप शुक्ल व मेरे वक्तव्य थे, जबकि बीज वक्तव्य के लिये श्री मनोज कुमार श्री वास्तव; अपर मुख्य सचिव, मध्यप्रदेश शासन, जिन्होंने सुंदरकांड की अभूतपूर्व व्याख्या वैश्विक संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में की है, हमारे आमंत्रण पर वे कानपुर आये। जब उनका बीज वक्तव्य हुआ, तो उन्होंने शासन की अभूतपूर्व व्यस्तताओं के बीच कानपुर आने के जो कारण बताए उनमें एक था। गिरिराज किशोर को देखने का! कार्यक्रम में गिरिराज किशोरजी उपस्थित थे। मनोजजी के शब्द थे-मध्यप्रदेश सरकार द्वारा अभी हाल के दिनों में श्री गिरिराज किशोर को विशेष सम्मान और पुरस्कार दिया जाना था। यह पुरस्कार प्रदेश के माननीय मंत्रीजी के हाथों दिया जाता था, जब गिरिराजजी को उक्त आशय का पत्र प्रेषित करते हुए भोपाल में समारोह में आने का आमंत्रण दिया गया, तब उनका उत्तर इन्कार में आया-मैं किसी मंत्री के हाथ से पुरस्कार/सम्मान नहीं लूँगा।
वे कार्यक्रम में नहीं आये। तब मध्यप्रदेश सरकार ने अपने सुयोग्य प्रतिनिध के कानपुर गिरिराजजी के आवास पर भेज कर उनका सम्मान अर्पित किया। तभी से मेरे मन में गिरिराजजी को देखने की, उन्हें सुनने की प्रबल इच्छा जाग उठी थी कि आज भी ऐसे साहित्यकार हैं, जिनका व्यवहार संतन को भला सीकरी सो का काम चरितार्थ करता है।
दूसरा उदाहरण है कि एक संगोष्ठी का। आयोजन मेरे आवास पर था। अध्यक्षता गिरिराजजी की थी, नगर के साहित्यकारों के साथ ही दिल्ली से दो साहित्यकार आए थे। मेरे महाविद्यालय के सहकर्मी, शोध छात्र-छात्राएँ भी उपस्थित थे। संगोष्ठी में जब मेरे कनिष्ठ सहकर्मी (सम्प्रति-प्रयागराज विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर) ने वक्तव्य दिया, तो उन्होंने कहा- जब से मैं कानपुर आया हूँ, तब से गिरिराजजी के विषय में इतना कुछ जाना, समझा कि उनसे मिलने की तीव्र अभिलाषा जाग उठी। कई बार प्रयास किया, लेकिन असफल रहा, आज जब महाविद्यालय में मैडम ने बताया कि गिरिराजजी संगोष्ठी की अध्यक्षता करेंगें, तब मुझे अत्यंत हर्ष हुआ! मैं गिरिराजजी को देखने, उनका सान्निध्य प्राप्त करने के लिए यहाँ उपस्थित हुआ हूँ।
उक्त दोनों उदाहरण ऐसे हैं, जिनकी साक्षी मैं तो हूँ ही, अन्यान्य साहित्यिक बधु-बांधवियाँ भी हैं।
ऐसा क्या था उनमें? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जा सकता है कि ऐसा बहुत कुछ उनमें थे, जो अन्यान्य साहित्यकारों से उन्हें अलग करता है, एक वैशिष्ट्य देता है। पदमश्री सम्मान तो बहुतों को मिलता रहा है, किन्तु कितने हैं, उनमें से जो निरन्तर उस सम्मान की पात्रता सिद्ध करते हैं। कानपुर में ही कितने लोगों को पदमश्री प्राप्त हैं, मगर गिरिराज किशोरजी जैसी बहुमुखी, बहुउद्देशीय सक्रियता शायद ही किसी में हो! चाहे उत्तर प्रदेश सरकार या केन्द्रीय सरकार या अन्यान्य राज्यों की सरकार, चाहे कोई भी दल हो गिरिराजजी को जहाँ जो वैचारिक वंचना दिखी, कथनी, करनी का विरोधाभास दिखा, उन्होंने खुलकर बेबाकी से पारदर्शिता के साथ अपनी बात रखी, सुझाव प्रस्तुत किए। उनके कई सुझावों को ज्यों का त्यों मान भी लिया गया! अकार के उनके संपादकीयों में मौजूदा परिदृश्य पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया होती थी। सभा संगोष्ठियों, सेमिनारों में स्थानीय स्तर पर ही नहीं देश में सुदूर अँचलों की यात्राएँ भी उन्होंने की। आयुर्वाधक्य के बावजूद।
कानपुर में उनके आदर सम्मान का अंदाज हमें लगाया जा सकता है कि लोग पारस्परिक वार्तालाप में उनके लिए पदमश्री का संबोधन प्रयुक्त करते थे। आज पदमश्री आ रहे हैं। पदमश्री ने आज यह बयान दिया.... पदमश्री से समय मिल गया है कार्यक्रम के लिए आदि-आदि।
इतना सम्मान! कानपुर के किसी अन्य साहित्यकार का हुआ हो, मेरे स्मरण में नहीं आता है। इतने सम्मानित, सुयोग्य रचनाकार पर यदि कॉफी टेबिल बुक निकले, तो आश्चर्य की बात नहीं!
हिन्दी पट्टी में अब तक किसी साहित्यकार पर इतनी वृहदाकार कॉफी टेबिल बुक नहीं निकली। यह वरेण्य कार्य संपादित किया सत्तर पार के रचनाकार श्री हरेन्द्र भदोरिया ने। इस सेवानिवृत्त वायुसेनाकर्मी ने अपनी लगन, परिश्रम और एकनिष्ठता से इस महत्त्वपूर्ण कार्य को सफलतापूर्वक सम्पन्न किया!
गिरिराजजी पर एक बेहद विशिष्ट तथा उपलब्धि पूर्ण कॉफी टेबिल बुक तैयार हो गई! हम लोग जोर-शोर से उसके लोकार्पण की तैयारी कर रहे थे। देश के विशिष्ट महानुभावों से अध्यक्षता व वक्तव्य हेतु कानपुर आने की बात हो चुकी थी, किंतु नियत तिथि से पहले ही गिरिराजजी के साथ बडी अनहोनी हो गई। अक्टूबर को एक रात्रि में वे लघुशंका के लिये पलंग से उठे, किन्तु कुछ कदम ही चले होंगे कि पर्दे में उलझ कर ऐसे गिरे कि फैक्चर हो गया। वे कुछ दिन अस्पताल में भर्ती रहे फिर डिस्चार्ज होकर घर आ गए।
कितनी सारी बातें, घटनाएँ, बैठकें हैं, कहाँ से शुरू करूँ! कुछ सोचने, समझने, बूझने की स्थिति बन पाए कि इससे पहले याद आ रहा है उनका घर। अखंड शांति, सौम्यता और कम से कम मेरे लिए तो औपचारिकेतर शिक्षालय। अधिकतर कुछ न कुछ सीख कर, प्रेरित होकर शिक्षा लेकर आई उनके घर से।
गिरिराजजी से परिचय कब कैसे हुआ यह सब बाद में। अभी तो मस्तिष्क में उनका घर जीवंत हो उठा है। सो चलिये वहीं चलते हैं। वहीं से आरम्भ करती हूँ।
उनके घर मैं अधिकतर कॉलेज के समय के बाद ही गई हूँ। अपने कार्य स्थल यानी डी.ए.वी. कॉलेज से गिरिराजजी का घर लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर है। जबकि किदवई नगर, जहाँ मैं रहती हूँ, वहाँ से लगभग 15-16 मील दूर है। यह तो दोपहर के भोजन का वक्त होता है! पर अब करूँ भी तो क्या? उनसे काम भी ऐसे थे कि टाले भी तो नहीं जा सकते। उनकी बगिया में तरह-तरह के कॉटन न जाने किन-किन रंग बिरंगे नन्हें नन्हें फूलों के पौधे। खूब बडी फली- फूली रामा-श्यामा तुलसीजी, मंजरियों के संभार से भूमि का स्पर्श करती हुई, छोटी-छोटी नारंगियाँ लगी हैं। कोई हल्की हरी तो कोई एक साथ हरे और नारंगी रंगों से संयुक्त ओह! अद्भुत विलक्षण! कोई छोटी, तो कोई अपनी पूर्णता में इठलाती हुई। नयनाभिराम! सम्मोहक!
इस अनुपम पुष्टवाटिका के बीचो-बीच पडी बेंत की मेज! चारों और से मेज को घेरे कुर्सियाँ। कई बार, खासकर सर्दियों में, यहीं हमारा उठना बैठना होता था। हाडकंपाऊ ठंड में उजली-उजली नर्म धूप, भला किसे अच्छी नहीं लगती। इस वाटिका में अपरान्ह तक धूप का ही साम्राज्य रहता।
आदरणीया मीराजी (गिरिराजजी की अद्धांगिनी) या कभी चिरंजीव अनीस (सुपुत्र) या कभी आज्ञापालक, बाहरी कक्ष (बैठक) में बैठने को कह एकाध बात के पश्चात् भीतर चले जाते।
दृष्टि उलझ कर रह जाती है, शीशे के चमचमाते फेस वाली अलमारी में! व्यास सम्मान, साहित्य अकादमी सम्मान न जाने कितने राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सम्मानों के प्रतीक चिन्ह सामने की दीवार पर कईं चित्रावलियाँ -देश के राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, प्रतिभा पाटिल के साथ।
कहिये दयाजी! भीतर से आते हुए मुस्करा कर कह रहे हैं गिरिराजजी। मेरी सिट्टी पिट्टी गुम! जी....जी....नमस्कार गिरिराजजी! कहती हुई मैं मन ही मन संकोच से भर उठती। इतने बडे साहित्यकार से क्या और कैसे बात करूँ। कॉलेज में बी.ए., एम.ए. की कक्षा लेना और बात है गोष्ठियों-सेमिनारों में व्याख्यान देना और बात ह। लेकिन यहाँ तो बात ही दूसरी है। अंतरराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध शख्शियत! महीनों नहीं, वर्षों मेरी यही हालत रही। भरसक संयत होने का प्रयास करती! जब कि जो भी परामर्श उनसे लिया, बहुत सहज भाव से उन्होंने मुझे मार्गदर्शन दिया है। उनकी यही सहजता मुझे उत्तरोतर सहज और संयत बना रही थी।
वर्ष 2010 में एक बार मैंने कहा, गिरिराजजी, बच्चों और युवाओं में हिन्दी के प्रति आकर्षण जगे, वे भाषा और साहित्य में दिलचस्पी लें, आगे बढें इसके लिये मैं दो खण्डों वाली (भाषा व कथा साहित्य) एक प्रतियोगी किताब निकाल रही हूँ। (अब तक चार किताबें मेरी आ चुकी थी। प्रकाशकों के साथ मेरा न लिया न दिया का आँकडा था। एकाध बार कहा तो प्रकाशक का जवाब था अरे बहिनजी, 10-15 हजार से आपका कुछ भला नहीं होगा, हमारी तो दाल रोटी इसी से चलती है, आफ भाई हैं हमें, कमा लेने दीजिये...)
गिरिराजजी- देख लो, कितना खर्च आता है
मैंने कहा-जी, जितना भी हो करेंगे। गिरिराजजी का धीमा-सा स्वर हाँ, अपरिग्रह जरूरी है। यह सुनकर मैं चुप रह गई। फिर मैंने कहा-इस संग्रह के लिए आपकी एक कहानी लेनी है। गिरिराजजी बोले-कौन-सी? जी, पाँचवाँ परांठा मेरा जवाब था! गिरिराजजी -ये आपने कहाँ से पढी?
मेरे आगे धर्म संकट! पढी तो नहीं है। मगर सुना जरूर है। कानपुर के लोगों से और बाहर के लोगों से भी। अभी कुछ दिनों पहले मैं लखनऊ संकुल के 150-200 नवोदय विद्यालयों के हिंदी शिक्षकों को राजभाषा हिन्दी का प्रशिक्षण देने के लिये सरसौल स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय गई थी। वहाँ समापन सत्र में अतिथि के रूप में लखनऊ के आई.ए.एस. श्री तिवारीजी भी आए थे। बात साहित्य से होती कानपुर के साहित्यकारों पर आ गई। वे बोले वहाँ गिरिराज किशोर हैं। जब वे आई.आई.टी. कानपुर में थे, तब मैं उनसे मिला था, उनकी कहानी पाँचवाँ पराठा मैंने पढी थी, बहुत ही संवेदनशील और अभूतपूर्व कथा है।
मैंने यही सब कह दिया। गिरिराजजी ने कहा-वाह! किसी के कहने से आपने मान लिया? मुझे गलती का एहसास हुआ। बात तो सही है। मुझे स्वयं पढना चाहिये। फिर तो एक जिद्द-सी सवार हुई। खोज-खोज कर, खरीद कर, प्रकाशकों से बात करके मैंने उनके कईं कहानी संग्रह पढ डाले। मगर, चार मोती बेआब तथा जगतारनी और अन्य कहानियाँ कथा संग्रह न तो मिले न इनके प्रकाशकों का ही कुछ पता चला। हार कर मैंने गिरिराजजी से ही इन संग्रहों की माँग की।
उदासीन भाव से गिरिराजजी ने कहा, - देखूँगा, कहाँ रखे हैं। ढूँढ तो लूँ। और हफ्ते भर बाद दोंनों संग्रह मेरे पास थे। मूल्य देखा! प्रकाशक देखा!
अब बताएँ भला मेरी जन्मतिथि के दशक पूर्व यानी 1965 से पहले छपी ये किताबें भला 2012 में कैसे मिलतीं। प्रकाशक तक सिरे से अदृश्य! मूल्य ढाई आना! तीन आना! जितनी उमर में मनुष्य दो आश्रम (ब्रह्यचर्य, गृहस्थ) पूरे करके तीसरें में (वानप्रस्थ) प्रविष्ट होता है, उतनी, बल्कि कुछ ज्यादा उमर है गिरिराजजी के लेखन की! बहरहाल किस्सा कोताह यह कि मैंने इन दोनों संग्रहों को भी पढ लिया। ओह! जिस बीते जमाने में आना-पाई चलते थे, मर्यादा के नाम पर दम्पत्ति तक साथ-साथ बाहर नहीं निकलते थे, निकलना तो दूर घर में बडों के सामने परस्पर तो क्या बच्चों तक से नहीं बोलते/खिलाते थे, ऐसे संकुचित समय में इतनी बोल्ड कथाएँ। जडता के खिलाफ ऐसा खुलापन! ताज्जुब हुआ देख पढकर। इस बात पर भी कि अर्द्धशताब्दी से अधिक के विपुल, बहुआयामी, बहुमुखी लेखन में दोहराव कहीं नही! छोटी से छोटी घटनाओं बडे से बडे मुद्दों में भी! चाहे कथा कहानियाँ हों, उपन्यास नाटक, संपादकीय लेख-आलेख या अन्यान्य चिंतन ग्रंथ या सामग्री हो..।
हाँ, तो कहानी की बात चल रही थी, अब क्या बताऊँ कई कहानियाँ एक से बढकर एक 22 कहानियाँ मेरी श्रेष्ठता सूची में विद्यमान!
गिरिराजजी ने कहा!
भई, यह आपका क्षेत्र है, इसमें मैं क्या बोलूँ। मैं कुछ नहीं कह सकता। जो लेना हो, ले लीजिये उनका टका-सा जवाब। पल्लाझाडू-सा।
इसी प्रसंग से अनायास ध्यान आया प्रियंवद का। गिरिराजजी की बात हो, प्रियंवदजी का नाम न आए, यह कैसे हो सकता है? प्रियंवदजी का! जिन्होंने गिरिराजजी के पत्रिका मंच के स्वप्न को अकार में रूपायित करने का प्रबंधकीय दायित्व दशकों तक सँभाला। गिरिराजजी से उनकी अंतरंगता! बरसों दशकों का संग साथ। कुछ जरूरी काम के साथ मैं वह रजिस्टर भी ले गई जिसमें मैंने प्रश्न बनाए थे। जब निर्धारित काम की बातें हो गईं, तो विनम्रता के साथ मैंने कहा-प्रियंवदजी समावर्तन के लिये मुझे गिरिराजजी का साक्षात्कार लेना है, मैंने कुछ प्रश्न बनाए हैं, देख लीजिये।
मैं क्यो देखूँ?
सुनकर अचकचा-सी गई, मुझे कुछ समझ नहीं आया कि क्या कहूँ! मैंने तो ये सोचा था कि गिरिराजजी जैसे प्रतिष्ठित, बहुआयामी रचनाकार के विषय में कुछ ऐसा तो नहीं, जो छूट रहा हो, मैं न देख पाई हूँ, मुझसे कोई चूक हो रही हो। प्रियंवदजी अगर देख लेंगे, तो जरूर बता देंगे।
अगर आप देख लें, तो ठीक हैं मैंने फिर कहा।
हँसते हुए प्रियंवदजी ने कहा-आप ही बताइये। मैं क्यों देखूँ। अरे भाई साक्षात्कार आपको लेना है, पत्रिका ने आप से कहा है। पत्रिका मं आप भेजेंगी, गिरिराजजी से प्रश्न आप करेंगी। आप प्रश्न बना चुकी हैं अच्छा है। अब भला मैं क्या देखूँ।
जी कह कर रह गई। ज्यादा बुरा लगा। विवेक ने फिर कहा,-इसमें कोई बात नहीं। प्रियंवद बडे रचनाकार हैं, कुछ सोच कर ही कह रहे होंगे। मगर विचार के यह तर्क भाव को पच न सके कभी, न तब न आज भी। यह अलग बात है कि समावर्तन के उस साक्षात्कार की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई।
हाँ ! तो पुनः कहानी की बात करूँ! मुश्किल से एक कहानी का चयन मैंने कर ही लिया, लगा कि गिरिराजजी को बताना चाहिये। विवेक ने कहा बिल्कुल नहीं। जब वे इतने उदासीन हैं, इन सबसे, तो जब छपवा लेना तभी प्रति देना। देख ही लेंगे तब तो! उनके यहाँ जाने पर बातों के क्रम में कभी चाय, कभी फल कभी मिष्ठान और पानी चलता रहता, गिरिराजजी अधिकांशतः इन सबमें से कुछ नहीं लेते, अगर कभी कुछ लिया भी तो अत्यल्प। अगर सेब है, तो एक या दो फाँक वो भी बिना छिलके की। चूँकि अक्सर दोपहर भेजन का ही समय रहता था सो मुझसे अनुरोध! अनुरोध क्या गरिमामंडित आदेश-चलिये भोजन तैयार है। मेरी क्या मजाल! न कह सकूँ! और फिर मीराजी! साक्षात् अन्नपूर्णा! हाथों में ऐसा रस कि जो एक बार उनकी रसोई में कोई जीम ले मना शायद ही कर पाए।
खाइये कभी उनके हाथों के बने बाजरे के पुए, मक्के की, उडद की कचौरियाँ, गाजर का हलुआ, इडली सांभर....मौसमी अचार, तली मटर, पालक मिक्स, उडद की दाल, सब्जी, पनीर, भाँति-भाँति की मिस्सी, सादी, मकाई, बाजरे की रोटियाँ.....। मैने तो हमेशा ही भूख से अधिक भोजन किया है। गिरिराजजी तो मितभोजी हैं। ज्यादा से ज्यादा एक फुल्का, दाल या सब्जी या सांभर के साथ जरा से चावल दाल, दही। बस हो गया भोजन! चिडियों जैसा...।
मीराजी की मोहक मुस्कान! वत्सल आग्रह के साथ भोजन कराना। अन्य घरेलू बातों में उनके सुझाव! अनमोल धरोहर होंगे उन विरलों के लिये, जिन्हें उनकी वत्सलता प्राप्त है। मुझे उनकी वत्सलता ईश्वरीय अनुदान के रूप में सहज सुलभ है। इस उम्र में भी घर-बाजार, हाट के, गृहस्थी के काम, कहाँ किस जगह अच्छी दालें, मसाले मिलते हैं, यह उनसे ही जाना। आनन्द तब आता है जब उनके पत्नी रूप के तार्किक संवादों के आगे इतना बडा विख्यात लेखक गऊ-सा पति बन चुप रह जाता है। (लो भई डाल दिये हथियार वाली मुद्रा में) और वे अवसर भी कम नहीं जब जरा-सी भी लेखक की खीझ पर मीराजी की उन्हें रिझाने की तरह-तरह की कोशिशें करते और लेखक की खीझ गायब।
क्या पचपन के बाद, बचपन की संगत भी व्यक्ति के व्यक्तित्व में मिलने लगती है?
शायद हाँ, या शायद निष्छलता या अधिकार या वत्सलता या तरीका या सलीका...कारण जो भी हो, कई बार कई ऐसी बातें घट ही जाती हैं, जिनके निशान कभी नहीं मिटते। मालूम ही नहीं चलता कि वजह क्या थी? माकूल थी भी या नहीं? एक बार कुछ कागजात मुझे गिरिराजजी के पास पहुँचाने थे। कॉलेज के आज्ञापालक को मैंने लिफाफा दे दिया। उन दिनों बहुत थोडे-से अंतराल में मुझे दो गोष्ठियाँ सम्पन्न करानी थीं। इन दिनों दो-दो प्रकोष्ठों की संयोजिका हाने के कारण मेरी व्यस्तताएँ बेहद बढी हुई थीं। प्रकोष्ठों की वार्षिक संगोष्ठियाँ जल्दी-जल्दी सम्पन्न करानी थीं। कई चरणों में सदस्यों के साथ बैठकें करनी पडती थी। कक्षाएँ लेना अलग। एक किताब की भूमिका लिख रही थी। और एक अन्य कृति का लोकार्पण वक्तव्य था। अत्यंत दबाव के कारण समयाभाव में मैंने आज्ञापालक को भेजा। गिरिराजजी को फोन पर सूचित करते-करते मेरे मुँह से निकल गया-उसे बा की प्रति दे दीजियेगा। कल आपने कहा था कि मुश्किल से एक प्रति बच पाई है, आफ लिये। वो आ रहा है, अभी पाँचेक मिनिट में आफ पास होगा। गिरिराजजी ने कहा-किसे? क्या दे दूँ? अक्सर ही ऐसा होता था, कि मुझे फोन पर बातें दोहरानी पडती थी। मैंने कहा जी, रामेन्द्र (आज्ञापालक) को बा उपन्यास।
गिरिराजजी -जाइये, मैं नहीं देता, मेरे पास नहीं है कोई उपन्यास..। दूसरे दिन मैंने फोन पर कहा-गिरिराजजी, मेरी प्रति किसी को दीजिये नहीं, मैं स्वयं आऊँगी लेने! गिरिराजजी-नहीं-नहीं! आप व्यस्त हैं। आने की जरूरत नहीं, प्रति कोई ले गया, मेरे पास नहीं है।
स्वर की गंभीरता व रोष से मुझे लगा कल जल्दी में कुछ अनुचित बोल गई मैं। सोच-समझ कर बोलना चाहिये था? कुछ तो है? समझ नहीं आ रहा था। अभी फोन पर हुई इस बातचीत से तो मेरा संशय और बढ गया, मुहर लग गई कुछ तो है, पर जब तक समझ पाई फोन कट चुका था। अब?
इसके बाद जब व्यस्तताएँ कम हुईं। तब गिरिराजजी के यहाँ जाना हुआ! कुछ देर की बातचीत के बाद मैंने कहा-बा की प्रति लेने आई थी। गिरिराजजी मेरे पास नही है। कह कर दूसरी और देखने लगे। (ठीक ऐसे जैसे कोई बालक अपनी वस्तु को छिपाने का असफल प्रयास करे)
मैं समझ गई! प्रति तो है, लेकिन देना चाहते हुए भी नाराजगी जता रहे हैं। अब क्या कहूँ? मैं क्या करूँ, इतने बडे लेखक! तुरंत मैंने अपने कान पकडे - मुख से निकला अंजाने में कोई गलती हो गई हो तो......आगे के शब्द अस्पष्ट से निकले.....माफ कर दें। कह कर मैं चुप हो गई। यह देखकर मुस्कराते हुए बिना कुछ कहे गिरिराजजी सोफे से उठे, भीतर गये और कुछ देर बाद बा की प्रति लिये वापस आए, मैंने खडे होकर ससम्मान प्रति उनके हाथ से ली!
जानते हैं प्रथम पृष्ठ पर गिरिराजजी ने क्या लिखा था?
प्रिय दयाजी को नाराजगी के साथ।
मैं सुधि हूँ, जाने अंजाने आ जाती हूँ!
हूँ अतीत, पर वर्तमान में मुस्काती हूँ।।
लीजिये, सुधि हो आई उस वाकये की! उन दिनों प्रगतिशील लेखक संघ की कानपुर इकाई के गठन की बातें हो रही थीं। कानपुर (श्री अरविंद राज पूर्णकालिक सदस्य कम्यूनिस्ट पार्टी) और कानपुर के बाहर के (डॉ. संजय, बनारस) लोगों का मुझ पर बेहद दबाव था कह सकते हैं, कि मेरा घेराव किया जा रहा था कि मैं प्रलेस का पुर्नगठन करू! जोर-शोर से तैयारियों हो रही थी। एक बैठक नारायणी धर्मशाला और दूसरी मेरे आवास कन्हैया भवन में हो चुकी थी। अब तक मुझे अंदाजा हो गया था इन सब गतिविधियों से कि यहाँ बातें ज्यादा काम कम की स्थिति है! बहरहाल अपनी शर्तों पर मैं आगे बढ रही थी, पता चला कि गिरिराजजी की प्रलेस के मंच से दूरी है। उसी उपक्रम में डॉ. खान फारूक अहमद और शायद अरविंदजी गिरिराजजी से बात करने आये थे, मै भी वहाँ थी। इससे पूर्व बातचीत में गिरिराजजी ने प्रलेस का अपना कटु अनुभव मुझसे साझा किया था, उन दिनों का जिन दिनों यशपाल तथा अन्यान्य अग्रपंक्ति के लेखक प्रलेस से जुडे थे और गिरिराजजी प्रलेस के पदेन सदस्य थे।
पूर्व निर्णयानुसार वे लोग गिरिराजजी से अनुरोध कर रहे थे। इस पर गिरिराजजी ने संक्षेप में ही सही उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया और अपनी असहमति जाहिर की। वे लोग जो हो गया उस पर धूल डालो वाले भाव से एक तरह से गिरिराजजी को मना रहे थे, मैंने ज्योंही उनके सुर में सुर मिलाया, तुरंत गिरिराजजी ने खीझ भरे आक्रोश के साथ कहा-ऐसे कैसे चला जाऊँ! इतना सब हो चुका है। आप जानती हैं फिर भी.....(ठीक वैसे अंदाज में जहाँ, दूसरों की बेअदबी की झुंझलाहट अपनों पर बरसती है) मैं उनकी इस झुंझलाहट पर मुस्करा कर रह गई!
जलपान के बाद हम सभी विदा हो गए। दूसरे दिन गिरिराजजी का फोन! मैंने फोन रिसीव किया-नमस्कार गिरिराजजी!
-नमस्कार, आपको बुरा लगा होगा, मुझे माफ कर दीजिये।
मै चकित! आश्चर्य से जडीभूत -जी? मुझे समझ में नहीं आ रहा है?
-कल मुझे आपसे उस तरह नहीं कहना चाहिये था!
मैं-किस तरह? क्या? मुझे बिल्कुल समझ में नही आ रहा है।
-वे लोग मान नहीं रहे थे आप भी उनका साथ दे रही थी, फिर भी मुझे आपसे झुंझला कर नहीं बोलना चाहिये था, आपको बुरा लगा होगा?
-अरे आपने ऐसा कहा ही क्या था, गिरिराजजी प्लीज ऐसा न कहें! दूर-दूर तक भी मेरे मन में कोई बात है ही नहीं! बडी मुश्किल से उन्हें समझा सकी।
उस पूरे दिन मेरा ध्यान गिरिराजजी की इस घनी संवेदनशीलता, निरहंकारी नमनीयता पर जाता रहा। आज भी इस वाकये का ध्यान आता है, तो नतमस्तक हो जाती हूँ। सुयश सफलता के इस शीर्ष के साथ, उम्र की इस दहलीज पर, जहाँ से प्रबुद्धों के केवल प्रबोधन ही प्रबोधन सुनाई पडते हैं, वहाँ गिरिराजजी की ऐसी संवेदनशीलता, नमनीयता, कोमलता, राई भरी बात के लिये पहाड जैसी भारी अपराध बोधग्रस्तता। जिस सन में जिस समय में मैंने जन्म लिया था। उस समय तक गिरिराजजी लेखन में नाम कमाकर सुचर्चित हो गए थे, फिर भी मुझ कनिष्ठ साहित्यिक से ऐसा माफीनामा! हे ईश्वर! हे राम!
पं.श्री राम शर्मा आचार्य ने लिखा है कि व्यक्ति का चिंतन चाल और चरित्र को निर्धारित करता है। अगर थोडा-सा ध्यान दिया जाए, तो आचार्यजी की इस उक्ति को गिरिराजजी के व्यक्तित्व में आसानी से कोई भी देख सकता है। पहला गिरमिटिया और बा के रचनाकार ने दशकों तक गाँधी वांड्मय की शोध- खोज ही नहीं की वरन उन स्थानों का (देश-विदेश के) भी अध्ययन किया, जहाँ गाँधीजी रहे या गये थे। परकाया प्रवेशी चिंतन के बिना क्या ऐसी कालजयी कृतियों की रचना असंभव है?
आशय यह कि एक लंबे अंतराल तक गाँधी, गाँधीवाद को मन मस्तिष्क में संपोषित करते-करते कब मसिजीवी से आगे बढ गिरिराजजी गाँधीवादी एक्टिविज्म में आ गये यह तो शायद गिरिराजजी भी नहीं जान पाए होंगे।
देश की राजनीति को, राजनेताओं के कार्यों को गिरिराजजी विश्लेषित करके नहीं छोड देते, उसके उचित-अनुचित में भी दखल रखते रहे, आवश्यकतानुसार सुझाव देने से भी नहीं चूकते, फिर वे चाहे प्रदेश के मंत्रियों के मसले हो या केन्द्र के राजनीतिज्ञों के मसले हो या किसी प्रथम श्रेणी ब्यूरोक्रेटस् का मामला हो! या अग्रधारा के अन्नाहजारे जैसे समाजसेवियों के कार्यों का विश्लेषण या उन्हें सुझाव देने की बात हो!
राजनीति ही क्यों, साहित्य जगत में भी कितने ऐसे है जो कथनी करनी में एक है! इतनी कम संख्या है ऐसे लोगो की कि गिनने पर कई उँगलियां भी रिक्त ही रह जाएँगी। और गिरिराजजी! जिन्होंने नारी अस्मिता सम्मान के पक्ष में उस शीर्ष प्रकाशन से अपनी पुस्तकें वापस ले ली थी, कहा तो बहुत से लेखकों ने था। मगर चालीस हजार रू. देकर अपनी प्रतियाँ लेने वाले सिर्फ और सिर्फ गिरिराज किशोर ही थे। एक पेंशन प्राप्त रचनाकार की यह दायित्वसजगता, यह प्रतिबद्धता क्या अपने आप में बे-मिसाल मिसाल नहीं है! कितने हैं ऐसे स्वनामधन्य हैं, जो मंच से कह सके कि अपनी किताबों को लगवाने (देश के वि.वि. पाठ्यक्रम में) के लिये कभी प्रयास नहीं किया....। मुझे याद आ रही है यह उक्ति, तरूवर फल नहीं खात हैं, सरवर पिएँ न पान.....।
यह कर्तव्यनिष्ठा, यह दायित्व बोध, यह सतत् कर्मयोग, देश के प्रति ऐसी संवेदना.....क्या यह सब गाँधी जी का स्मरण नहीं कराता। पूर्णकालिक लेखन के बावजूद लेखकीय सनकों से दूर पूर्ण अनुशासित दिनचर्या, प्रार्थना ध्यान में अडिग अमिट विश्वास व गति क्या महात्मा गाँधी का स्मरण नहीं कराते।
हाथ में लिये काम के प्रति ऐसी अटूट लगन, ऐसा संकल्प कि फिर दूसरा काम नहीं.....!
एक दिन कॉलेज के शोधकक्ष में बैठी काम कर रही थी। शायद अक्टूबर के प्रथम सप्ताह का समय था! मोबाइल की घंटी बज उठी देखा गिरिराजजी हैं।
नमस्कार गिरिराजजी ! मैंने ससम्मान कहा!
नमस्कार! व्यस्त न हों तो मेरा एक काम कर दीजिये।
जी! जी, जरूर....। बताएँ
आप मेरी कहानियों का सम्पादन कर दीजिये.... प्रकाशक का अनुरोध आग्रह है! मैं अभी दूसरे काम में हूँ! समय नहीं मिल रहा है! मैंने प्रकाशक से कह दिया ह, आप बात कर लें!
मुझे सुन कर बडी प्रसन्नता हुई! कहानियाँ तो मैंने पूरी पढ रखी थीं! मेरे लिये अत्यंत आसान था यह!
यह काम सम्पन्न होने से पहले ही प्रभात प्रकाशन से अनुबन्ध के साथ दस हजार रू. का चैक मेरे नाम! यह मेरे लिये अप्रत्याशित तथा आश्चर्यजनक था। दिल्ली के कुछ प्रकाशक इतने भले? इतने सदय?......काम तो दिल्ली के लिये पहले भी किया था..... बहरहाल चैक की न कोई वांछा मुझे थी, न ही औचित्य समझ में आया। चूँकि चैक मेरे नाम से था, मजबूरी थी। प्रभात प्रकाशन से बात की इसलिये भी कि मेरे चैक और प्रूफ के साथ नासिराजी के प्रूफ (कहानी संग्रह) और उनके नाम का चैक था। इस चैक की राशि भी उतनी थी। मैंने अविलंब इन सबको डाक द्वारा प्रेषित किया। चैकराशि लेकर गिरिराजजी के घर गई। औपचारिक बातों के बाद चैकराशि का लिफाफा उनकी मेज पर रख दिया।
गिरिराजजी -ये क्या है, भाई?
जी, प्रभात प्रकाशन से आई हुई राशि है, इसे आप स्वीकार करें!
गिरिराजजी - नहीं! यह मैं नहीं ले सकता। मैंने आग्रह किया कि आपकी कहानियाँ हैं। सामग्री हैं, मैंने तो बस संपादकीय लिखा है, कहानियों का चयन कर दिया बस!
गिरिराजजी- काम आपका है, आपने किया है, इसे रखें। मैं- जी - लेकिन...।
गिरिराजजी कक्ष से उठ कर भीतर चले गए। मुझे कुछ नहीं सूझा हाथ बढाकर टेबिल पर रक्खा लिफाफा उठा कर पर्स में डाल लिया।
दया चलो खाना खाओ। आदणीया मीरा जी के वत्सल आदेश से यंत्र चलित-सी मैं भोजनकक्ष की और चल देती हूँ! हाथों को देख रही हूँ। गंदे हैं।
देख क्या रही हो, दो-दो बाथरूम हैं, वाशबेसिन हैं, जहाँ चाहों वहाँ धो लो। भोजन की मेज पर नानी का ढाबा से यानी रसोईघर से (नानी का ढाबा एक सुन्दर-सी कलाकृति पर यह नाम नाती-पातों पोतियों के समृद्ध परिवार की सौभाग्य लक्ष्मी (टचवुड) मीराजी के नन्हें मुन्नों नेलिखकर रसोईघर के द्वार के बगल में सज्जित कर दिया हैं, उन्हीं में से नन्हीं वान्या तो अब बडी होकर आजकल लंदन गई है डेवलपमेंट स्टडी के लिये) भोजन सामग्री रखती मीराजी एक कुशल मनोवैज्ञानिक की भाँति मेरे मनोभाव देख कर मुस्कराती कह रही हैं मुझसे हाथ धाने को! जी! कह कर मैं उठ खडी हुई! गंदे हाथ धोने के लिये।
विचारों की प्रबल आँधी! भावावेग! तो गिरिराजजी जानते थे कि इतनी राशि प्रकाशक से प्राप्त होगी! उन्हें करना ही क्या था। कुछ अपनी कहानियाँ और एक पैरा बहुत से बहुत एक पृष्ठ का संपादकीय या स्वगत कथन ही तो लिखना था। आज जब बडे-बडे सेठ साहूकार, ब्यूरोक्रेटस, करोडपति चंद रूपयों के लिये छोटी से छोटी धनराशि के लिये भी भागते, दौडते ललायित रहते हैं, तब सेवानिवृत्त गृहस्थ (वह भी ऐसे जिनके घर में मित्रों, अनुसंधित्सुओं साहित्यकारों की बराबर आवाजाही रहती है...) का यह कार्य! तुरंत उन्हीं का धीमा-सा कहा वाक्य याद या गया-अपरिग्रह जरूरी है।
परिचय की बात सेचती हूँ तो ऐसा लगता है जैसे आदरणीया मीराजी और उनके पति गिरिराजजी से मेरी आत्मीयता लगाव इस जन्म से नहीं जन्मों से है। जबकि अभी दो नहीं डेढ दशक का समय भी पूरा नहीं हो पाया!
स्थानीय मासिक पत्रिका सामर्थ्य की और से एक विशाल सम्मान समारोह का आयोजन था, आयोजकों ने कार्यक्रम संचालन का दायित्य मुझें सौंपा था। समारोह में गिरिराज किशोरजी सम्मानित अतिथि के रूप में आमंत्रित थे। मैंने अपने विभाग में गिरिराज किशोरजी के विषय में बात की। डॉ. रामेश वर्मा व डॉ. प्रतीक मिश्र, वरिष्ठ प्रखर मुखर कवि पत्रकार सहकर्मी बंधुओं ने विस्तार से गिरिराजजी के बारें में मुझे बताया। पहली बार उसी सम्मान समारोह में गिरिराज किशोरजी से औपचारिक बातचीत हुई।
यह वह समय था जब हंस से मेरे जुडाव की गहराईं आकार ले रही थी और हंस के मानसरोवर क्लब का गठन मैंने कर लिया था, इस चौदह सदस्यीय क्लब में मेरे शोधछात्र-छात्राएँ, महाविद्यालयी शिक्षक-शिक्षिकाएँ तथा सखियाँ थी। प्रतिमाह हंस की सामग्री पर चर्चा होती थी। वर्ष में एक बार पुस्तक चर्चा का वृहद् आयोजन होता था। 2008 में पुस्तक चर्चा के लिये दो पुस्तकों-स्त्री आकांक्षा के मानचित्र, सामयिक प्रकाशन तथा तेइस लेखिकाएँ और राजेन्द्र यादव (किताब घर) का चयन किया गया। अतिथि, के रूप में पुस्तक लेखिका गीताश्री और अभिषेक कश्यप आ रहे थे। मैंने इस संपूर्ण आयोजन की चर्चा के साथ गिरिराजजी से इस संगोष्ठी के लिए समय माँगा और अत्यंत सहज भाव से गिरिराजजी ने समय दे दिया! संगोष्ठी सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गई।
अगले वर्ष पुनः 2009 में अरमापुर पी.जी. कॉलेज के सभागार में मैंने मानसरोवर क्लब की द्विदिवसीय वृहद संगोष्ठी का आयोजन किया। इसमें दोनों दिन यशकाय राजेन्द्र यादव तथा आज के विख्यात उपन्यासकार संजीव, मैत्रेयीपुष्पा, हेतु भारद्वाज जैसे दिग्गज साहित्यकारों के वक्तव्य हुए। प्रथम दिन की अध्यक्षता मानसरोवर क्लब के अध्यक्ष वरिष्ठ कथाकार, दैनिक जागरण के साप्ताहिक परिशिष्ट पुनर्नवा के संपादक श्री राजेन्द्रराव ने की। बीज वक्तव्य गिरिराज किशोरजी का था। उस पूरे वक्तव्य में बहुत गंभीरता के साथ उन्होंने हिंदी भाषा को लेकर जो बातें की उन बातों ने बहुत गहराई से मुझे झकझोरा। फिर तो संयोग कुछ ऐसे बने कि कई बार मैंने गिरिराजजी, के वक्तव्य यहाँ तक कि कानपुर के बाहर (कथाक्रम संगोष्ठी लखनऊ) भी सुने। प्रायः हर बार मुझे भाषा साहित्य समकालीन अर्थ, राज, समाज पर उनके संवेदनशील वक्तव्यों ने उद्वेलित किया! इन्हीं दिनों आकाशवाणी कानपुर के ज्ञानवाणी चैनल में थोडे थोडे-से अंतराल पर मेरी साहित्यिक, सांस्कृतिक शैक्षणिक प्रस्तुतियों का प्रसारण हो रहा था। जनवरी के प्रथम सप्ताह में प्रस्तुति के बाद जलपान के मध्य में आकाशवाणी के स्टेशन मैनेजर श्री माथुर ने मुझसे 26 जनवरी के लिये प्रस्तुति की बात की! तय हुआ कि पहला गिरमिटिया पर गिरिराजजी का साक्षात्कार मैं लूँ।
आकाशवाणी कानपुर का वह साक्षात्कार सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गया। धीरे-धीरे मैंने गिरिराजजी के अन्यान्य उपन्यासों को पढना शुरू कर दिया! अकार के सम्पादकीयों के माध्यम से गिरिराजजी के चिंतक रूप से भी परिचित हो रही थी। इस बीच अपनी संस्था-साहित्य सृजन के कृति-विमर्श के आयोजन भी कर रही थी। गिरिराजजी के चार उपन्यासों की चर्चा साहित्य सृजन के मंच से हुई! साहित्यिक कारणों से गिरिराजजी के घर मेरा आना-जाना बढ गया था! बहुत कम ऐसा हुआ जब वहाँ केवल मैं ही थी अन्यथा तो दूर-दराज के साहित्यकार, शोध छात्र य गाँधीवादी चिंतकों को वहाँ बैठे पाया। यह गिरिराजजी की सदाशयता और आत्मीयता ही थी कि जब भी मैंने उनसे मिलने की अनुमति माँगी तो उन्होंने मुझे सहर्ष समय दिया।
साठ पार का जीवन, पूर्ण युवा ऊर्जा से कैसे जिया जा सकता है, इसके विरल उदाहरण ही मिलते हैं। गिरिराजजी ऐसे ही विरल व्यक्तित्व सम्पन्न साठ पार के युवा हैं। सधी बँधी समयसारिणी के अनुसार खान, पान, ध्यान ही नहीं सामाजिक साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी सहभागिता, नियमानुशासन, समयानुशासन अपने आप में एक मिसाल है। आयोजन के लिये जो समय जितने बजे का दिया हैं, उसमें क्षण भर का भी विलंब नहीं।
गिरिराजजी नियमित लेखन के साथ अखबारों पत्रिकाओं दूरदर्शन आकाशवाणी के क्षेत्र में ही नहीं सोशलमीडिया के क्षेत्र में भी निरंतर सक्रिय रहे। सरकार कोई भी हो, आईना दिखाने का काम उन्होंने पूरी दायित्व सजगता से किया। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की वस्तुओं की नीलामी रूकवाने की मुहिम चलाने वाले गिरिराज किशोरजी ही एक मात्र इस विशाल राष्ट्र के ऐसे मसिजीवी सपूत हैं, गाँधीजी की करोडों संतानों में से एक हैं, जिन्होंने तन मन धन से वर्षों निरंतर प्रयास किया, और गाँधी जी की वस्तुओं की नीलामी रूकवा कर ही माने। अन्ना आंदोलन के समय जब बडी-बडी बातें करने वाली साहित्यक बिरादरी चुप थी, तब भी गिरिराज किशोरजी के मुखर सहयोग व अनशन का साक्षी पूरा कानपुर नगर बना। हालांकि दृश्य मीडिया ने देश को इस तथ्य से अवगत कराया। अपने विशाल निजी पुस्तकालय की पुस्तकें महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी वि.वि.,वर्धा को दान करने वाले गिरिराजजी की इसके पीछे की दूरदर्शिता तथा पुस्तकों के प्रति संवेदनशीलता का सहज अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
पाँच दशकों से लेखन की अनवरत प्रक्रिया में न कभी आई.आई.टी. की नौकरी बाधा बनी, न वहाँ की प्रतिकूल परिस्थितियाँ, न ही अन्य कोई कारण। इससे उनकी लेखकीय प्रतिबद्धता का अंदाज लगता है। बेशक इस लेखन के मूल में उनकी अर्द्धांगिनीं मीरा जी के समर्पण सहयोग को स्मरण में रखना ही होगा।
गिरिराजजी का व्यक्तित्व अपने समकालीनों के लिये तो प्रेरणा स्त्रोत हैं ही, आगत पीढियों के लिये हिन्दी भाषा तथा साहित्य के लिये सदासर्वदा श्रेष्ठ संप्रेरक, पथ प्रदर्शक का काम करेगा। ऐसा मेरा विश्वास है।

सम्पर्क - कन्हैया भवन,
१२८/३८७ वाई वन ब्लॉक,
किदवई नगर, कानपुर-२०८०११, मो. ९४१५५३७६४४