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झाड-झंखाड में बढता हरा वृक्ष

यशपाल वैद
गुजरा हुआ जमाना में मुझे अपने बचपन की अनेक यादें मिलती हैं। कई पात्र हैं जिनसे किसी न किसी रूप में साक्षात्कार होता है। मेरे स्वप्नों-दुस्वप्नों में आकर मुझे कँपाते हैं और मैं डिंगा की गली-मुहल्लों में विचरता हूँ। बेशक मेरा जन्म भगोवाल (गुजरात-पाकिस्तान) में हुआ, लेकिन मेरा बचपन डिंगा में ही बीता। यादों के उन तिलमिले में 1947 के विभाजन के किसी मास के वह दिन-आज भी किसी काली छाया की तरह आँखों के सामने मंडरा रहे हैं। जब मैं बडेभाई (कृष्णबलदेव वैद), साथ में बडी बहिन और उनकी मुझ से दो वर्ष छोटी बेटी, अपने माता-पिता के साथ एक मुसलमान घर में, घर के कुछ कटी हुई भूने की छोटी कोठरी में दुबके-सहमे बैठे थे। बाहर नारेबाजी के साथ मार-काट, लूट-पाट-आगजनी चल रही थी। बचने की कोई उम्मीद न थी, हांलाकि उस मुसलमान का संरक्षण प्राप्त था, लेकिन खतरा बना हुआ था क्योंकि उसी का नौकर हम पर कुल्हाडा चलाते-चलाते न जाने हमारी किस याचना के तहत रूक गया था। याद आता है, कितना सच है, लेकिन मेरी याद में बैठा है कि बडे भाई ने बहिन से कहा था कि तुम्हारी भक्ति के प्रताप को मानते हुए यदि हम बच गये तो मैं मानूँगा ईश्वर है। आज अपनी उस स्वर्गीय बहिन को नतमस्तक हूँ जो जीवनभर (विधा-१९८२) हम भाईयों के लिए मनोकामना करती रहीं। बेशक भाई के.बी.वैद उपने नास्तिक होने की बात अब भी कहते हैं, तो भले ही करते हों लेकिन उनके व्यवहार में उनकी सच्चाई-उनकी निष्कपटता, उनकी स्पष्टवादिता, न्यायप्रियता अपने आस्तिकता के तत्त्व दर्शाती है। अपने लेखन में खुदा, नाखुदा, परमात्मा, ईश्वर का इन्कार-नकार भी उन्हें खुदा के निकट ही लाता है क्योंकि किसी न किसी रूप में वह स्मरण तो करते हैं। तथाकथित कई आस्तिकों से इन्हीं कारणों में वह आगे निकल जाते हैं।
विभाजन के दर्द को लेकर इधर आए। भाईसाहब ने अंग्रेजी की अपनी एम.ए. पूरी की और पाँचवी-छठी कक्षा से आगे बढते हुए जब मिडिल और हाई स्कूल पास किया तब तक वह हंसराज कॉलेज, दिल्ली में अध्यापन कराने लगे थे। उनके विवाह से पूर्व ही उनकी लेखक मंडली थी जिसमें मित्र तौंऊबी हो, मखमूर जालन्धरी हों या बाद में उनके वरिष्ठ भीष्म साहनी हों, या समकालीन रामकुमार, निर्मल वर्मा-देवेन्द्र इस्सर हों। और भी कई नाम हैं जिनको सिलसिलेवार मैं यहाँ नहीं रख पा रहा। जब मैं हंसराज कॉलेज में दाखिल हुआ तो मैं साईंस का छात्र था लेकिन मेरी रूचि साहित्य में होना स्वाभाविक थी। गोरा, गुड अर्थ बाईबल, मदर, गाँधी की आत्मकथा, जैसी पुस्तकें वह मुझे पढने के लिए सुझाते रहते और मैं अपनी पढाई के साथ उनकी हिन्दी-उर्दू-अंग्रेजी में प्रकाशित-अप्रकाशित रचनाएँ पढ जाता। रेडियो नाटक देने के लिए आकाशवाणी केन्द्र भी जाता, कल्चरल प्रोग्राम में पढने के लिए उनकी कहानी भी इस्सरजी को जो राजेन्द्र नगर में पास ही रहते थे, देने जाता। राजेन्द्र नगर, पटेल नगर शक्ति नगर की किसी न किसी साहित्यिक गोष्ठी में उनके हमउम्र या वरिष्ठ साहित्यकारों को आते-जाते देखता। शक्तिनगर में विष्णु प्रभाकरजी का भाग याद आ रहा है। वहाँ दूसरे सन्दर्भ में अलग से डाक्टर मुल्कराज आनन्द भी आए जिनके लिए में साईकिल पर टैक्सी लेने गया। वह १९५३ से १९५६ तक की बातें है। १९५८ में कृष्णबलदेव वैद अमेरिका गये, कॉलेज से छुट्टी पर, फुलब्राईट स्कालरशिप पर हार्वड विश्वविद्यालय से अवेरी जेम पर पीएच.डी. कर के १९६१ में लौटे। इस बीच उनके मेरे लिए पत्र, पिता-माता कि लिए पत्र और वहाँ रहते हुए इस्सर की चिन्ता और बेचैनी आज भी में सोच सकता हूँ। किन्तु उनके इस गुण को मैं महसूस करता हूँ कि व्यर्थ ही भावुकता और शिष्टाचार में न पडकर प्रेक्टीकल सहायता के पक्षधर हैं- यह परिवार में कोई बीमार हो या कष्ट में हो। यहाँ पैसे की जरूरत है पैसा और दूसरी जरूरत हो जरूरत मुहैया करने में पीछे नहीं रहते। जबकि जमा खर्च करने वालों में नहीं और न ही किसी का झूठ वह सहन कर पाते है। उस समय उनका गुस्सा देखते ही बनता है उसी तरह जब रिलेक्स मूड में रहे तो उनके कहकहे, हँसी देखते ही बनती है। आर्थिक कठिनाइयों से ... का भी उनका अपना तरीका रहा है- उस वक्त लेखक हो, ट्यूशन हो- जिसे वह कप आफ पोझा... कहते रहे क्यों न कहना पडे किन्तु किसी गलत समझौते का सहारा वह कदापि नहीं लेते। मैंने व्यक्तिगत जीवन में उनके इस रूप में कितना ग्रहण किया, मैं आत्मविश्वास के साथ नहीं कह सकता, किन्तु मेरी कोशिश जरूर रही है कि उनकी यह आदतें अपना सकूँ- किसी विवशता में घुटने टेके हो, तो आत्म ग्लानि जरूर रही है- रहती है।
साठ के दशक में वह १९६६ में दुबारा अध्ययन के लिए अमेरिका जाने से पूर्व चण्डीगढ पंजाब विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में रीडर थे। दिल्ली में वहाँ जाने पर मुझे दो-तीन अवसर याद आते हैं जब इन्द्रनाथ मदान और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के साथ उनकी आतमीयता देखकर मुझे प्रसन्नता हुई। याद आ रहा है कि संध्या के समय गोष्ठी में आचार्य द्विवेदी के हाथों उन्हें एक पान मिला, तो मुझे भी एक पान का टुकडा मिला। तभी से वह मेरे सामने आचार्य जी के पांडित्य का उल्लेख करते और बाण भट्ट की आत्मकथा को वह हिन्दी उपन्यास साहित्य में मील का पत्थर मानते हैं।
भाईसाहब कृष्णबलदेव वैद देश की जड से जुडे हुए साहित्यकार हैं। कभी-कभार मैं सोचता हूँ कि विदेश आत्राओं में कई बाहर जाने वाले, विदेश में रहने वाले अनेक वर्षों के अनुभव, विदेशी लेखकों से मुलाकातें, विदेशी पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशन- क्या यह सभी लिखकर यात्रा संस्मरण जैसी अद्भुद पुस्तकें लिखकर जहाँ अपनी पुस्तकों की संख्या बढा सकते हैं, वहाँ पाठकों को रसविभोर भी कर सकते हैं। हांलाकि मुझे याद आता है उनका ही एक जापानी छात्र मेकोरा ओढा जो दिल्ली में मेरे पास एक छोटे कमरे में रहा था- एक दो रात- और अन्य जापानी लेखकों के बारे में उन्होंने इलस्टरेडि वीकली में शुरू में लिखा भी। अब कहाँ ऐसा लेखक, शायद मेरी नजर में नहीं आया है, लेकिन अपनी शर्तों पर लिखने और छपने वाले बडे भाई से मैं ऐसे प्रश्न नहीं ही कर सकता तो इसकी पृष्ठ में भी कुछ बातें-घटनाएँ-सन्दर्भ हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा त्रिवेणी सभागार में आयोजित आमने-सामने कार्यक्रम याद आता है। जिसमें एक प्रकार का गुजरा हुआ जमाना का विमोचन था। उपन्यास का अंश वैदजी द्वारा पढा जाना और फिर प्रश्न-उत्तर। यह तो हुआ ही, भीष्मजी मुख्य अतिथि थे- नागार्जुन, अज्ञेय जी, और असंख्य युवा वरिष्ठ साहित्यकार उपस्थित थे। सभागार में जाने से पूर्व चाय-पान का प्रबन्ध था और बाहर चलते-फिरते अपने-अपने साथियों से मिलने-मिलाने का काम था। एक साहित्यिक बन्धु वैदजी से अलग से कह रहे थे मेरी इच्छा तो है कि दूरदर्शन पर आपकी इन्टरव्यू लूं, लेकिन भाईसाहब ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो वह बताने लगे अरअसल वह कह तो रहे थे, लेकिन चाह रहे थे मि मैं इस काम में अपनी ओर से उन्हें कहूँ हाँ, जरूर करो, मैं तो ऐसा नहीं कर सकता, अगर इच्छा है तो साफ कहें- मैं चाहता हूँ आप सहमति दो, ये सुनकर चुप रह गया। कई वर्ष बाद ऑटोमेटिक ढंग से मृणाल पांडे ने अपने ढंग से उनका इन्टरव्यू लिया। इसी सोच के तहत मैं सोचता हूँ क्या कतिपय लेखक योजनाबद्ध अपनी रचना प्रक्रिया और लिखने के दौरान किसी पुरस्कार प्राप्ति के लिए सचेत होकर कथ्य को कोई दिशा देते होंगे। वैदजी क्या इसके विपरीत कर जाते हैं। नहीं- ऐसा नहीं हो सकता- वह तों शिल्प ही कथ्य है की उद्घोषणा कर के लिखते हैं। भला वह ऐसा भी क्योंकर करेंगे। निजी दमखम पर लिखना, छपना उनकी फितरत में आ बसा है, ऐसे वार्तालाप-हिदायत वह दे जाते हैं। विमल उर्फ जाएं.... प्रकाशन और गॉडो का इन्तजार (अनुवाद) प्रकाशन इसकी बहुत हद तक पुष्टि करता है। वह समझौतावादी नहीं हो सकते और यदि कहीं किसी वक्त किसी कारण बाहरी प्रचलित रीतियों से उनको आघात भी पहुँचता है और फरस्ट्रेशन आती है, तो इसको भी दूर करने का आधार उनका लेखन है। ऐसा मैंने उनके चेहरों के हाव-भवों में देखा है। मुझे और और प्रसंग याद आ रहा है। १९९३ में उनका कहानी संग्रह लीला आया था और इत्तफाक से मैं अम्बाला से दिल्ली में था। एक सुबह आचार्य विद्यानिवास मिश्र के गीतांजलि स्थित निवास जाना हुआ, चम्पाजी भी साथ थीं। दोनों साहित्यकारों में मित्र भाव से वार्तालाप में लगा। किसी सन्दर्भ में उत्कृष्ण गद्य की बात हुई, तो आचार्य हमारी प्रसाद द्विवेदी जी को याद किया गया। साथ में महादेवी वर्मा के गद्य की तारफ की गई। किसी संन्दर्भ में उपेन्द्र नाथ अश्क की डाभी जैसी उत्कृष्ट कहानियाँ देने का उल्लेख हुआ तो फिर एकाएक मिश्र जी ने हँसते-हँसते कहा तुम्हारे लेखन को मैं एक ऐसे हरे भरे वृक्ष में देखता हूँ जो बिना किसी खाद के झाड-झंखाड के बीच बढता ही चला जाता है। प्रकृति में प्राकृतिक रूप में - हम तीनों मन्द-मन्द मुस्काते हुए उठे थे।
मेरे जेहन में आता है कि काला-कोलाज में भरमार मेटाफर तो नर-नारी के कथ्य को इस कठिन शैली में प्रस्तुत में लेखकीय यातना-सन्तुष्टि का क्या अनुमान लगाया जा सकता है।

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