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साहित्य के अनन्य वैद्य : कृष्ण बलदेव वैद

ब्रजरतन जोशी
बडी विडम्बना की बात है कि हिन्दी आलोचना अपने सर्वाधिक प्रयोगशील लेखक के लेखन पर उदासीनता के पथ पर है। कृष्ण बलदेव वैद हिन्दी के उन महान रचनाकरों में हैं जिनके प्रयोगधर्मी लेखन ने हिन्दी लेखन को एक नई ऊँचाई दी हैं। विधाओं की संरचना को उलटा-पुलटा। मनुष्य की आंतरिक और बाह्य विसंगतियों, यातनाओं, परस्पर संबंधों में उपजी समस्यात्मकता को जितना प्रखर, निष्कंप निष्ठा के साथ वैद ने अपने कथा साहित्य में उभारा है, वह अपने आप में अप्रतिम है। उनके सृजन भूगोल में धुसते ही समस्त द्वैत अद्वैत में बदल जाते हैं। उनका बहुरंगी, बहुवर्णी और मर्मस्पर्शी लालित्यता से भरपूर गद्य मन की जटिल संरचना को पाठकों के सामने रखता है। उनके सृजन में आधुनिकता के आवेग में दबी मनस्थितियाँ अपनी तरह का एक मायालोक या कह लें नितान्त भिन्न किस्म की आँचलिकता रचती है जिसका अस्तित्व स्थानीय भूगोल से अलग है।
हिन्दी के इतने समर्थ सपूत को हम से बिछुडे लगभग चार-पाँच माह हो चुके हैं, लेकिन परिदृश्य में किसी का ध्यान उनके अवदान को रेखांकित करने की तरफ नहीं गया। हमने पहले भी यह सजगता प्रदर्शित की थी और उल्लेख किया था कि हिन्दी आलोचना, विधाओं की राजनीति और आलोचकों और लेखकों की परस्पर राजनीति के चलते अक्सर हम बहुत से मूर्धन्यों का आकलन करने से चुक जाते हैं या उनके अवदान की तरफ यथा समय हमारा पर्याप्त ध्यान जा नहीं पाता। मधुमती इसे लेकर सजग है। इस कडी में हमने फरवरी के अंक में कवि प्रदीप पर विशेष सामग्री दी थी। इसी क्रम में इस अंक में हम कृष्णबलदेव वैद के रचनात्क अवदान को देखने-दिखाने का यत्किंचित प्रयत्न कर रहे हैं।
रचनाकारों की कईं तरह की कोटियाँ बनाई जाती रही है। उनमें से एक कोटि यह भी है कि मूल रूप से रचनाकार दो कोटि के हैं। एक वे जो भाषा में लिखने-पढने के लिए जाने जाते हैं। दूसरे, वे जिनके लिखने-पढने, जीने से भाषा जानी जाती है। हिन्दी साहित्य का इतिहास इसका साक्षी है। अगर हम वस्तुनिष्ठ दृष्टि से विचार करें, तो साहित्य के इतिहास में दर्ज रचनाकरों के अवदान को इन दो मुख्य कोटियों के निकष पर कसें, तो तय मानिये कि दूसरी काटि के रचनाकारों की संख्या बहुत कम होगी जबकि प्रथम कोटि में यह संख्या बहुत बडी सामने आएगी।
कृष्ण बलदेव वैद दूसरी कोटि के अग्रगण्य रचनाकार हैं। वे स्वभाव से संतुष्ट हिन्दी परम्परा के असंतुष्ट नायक हैं। असंतुष्ट इस रूप व अर्थ में कि उसका सारा सृजन, उसकी सारी कला चेतना निरन्तर खुद का संधान करती हुई स्वयं को तोडती रहती है। इसलिए विधाओं की संरचना और सरहद को लेकर उनमें एक असंतुष्टि का प्रबल भाव निरन्तर बना रहा। उनका सृजनात्मक असंतोष हिन्दी के मौलिक रचनाकारों के लिए एक प्रेरणा बना। वे हिन्दी के उन चुनिन्दा जिम्मेदार नायकों में अग्रणी हैं जो अपनी सृजनात्मक चेतना से फूल की तरह खिलते हुए एक अद्वितीय वटवृक्ष बन गए हैं। जिसकी छाँह में, जिसके कोटर में हिन्दी का गद्य अपनी केचुली उतार कर नवीन काया धारण करता है। वे विधा के स्वभाव को जानकर तद्नुकूल भाषा को नयी अर्थवता देने की कामयाब कोशिश करते हैं। सामान्यतः देखा यह गया है कि रचनाकार का अपनी विधा के सैद्धान्तिक रूप और उसमें हो रहे परिवर्तनों की तरफ अपेक्षाकृत कम ध्यान जाता है। पर वैद का सर्जक तो जागरूक है। उनकी यह सजगता, जागरूकता उन्हें प्रज्ञा की शक्ति का इस्तेमाल करने वाला शानदार लेखक बनती है। उनका लिखा गद्य प्रज्ञा की शक्ति बनाम ज्ञान के साहित्य में प्रज्ञा की शक्ति का प्रमुख पैरोकार है। वे हिन्दी के सर्वाधिक प्रयोगधर्मी गद्यकार हैं। कुछ आलोचकों ने उनकी आलोचना करते हुए उन्हें परम्परा भंजक के रूप में देखा है। लेकिन गौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि उनका लिखा परम्परा मुक्त नहीं परम्परा युक्त है। क्योंकि वे परम्परा के पुरुषार्थ को साधकर प्रयोग का पथ प्रशस्त करते हैं। पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने उनके व्यक्तित्व का आकलन करते हुए ठीक ही कहा कि तुम्हारे लेखन को मैं एक ऐसे हरे भरे वृक्ष में देखता हूँ जो बिना किसी खाद के झाड-झंखाड के बीच बढता ही चला जाता है। प्रकृति में प्राकृतिक रूप में
वे हमारे चिर-परिचित संसार की नितान्त नयी व्याख्या के साथ उसे देखने का एक नवीन दृष्टिबोध भी हमें देते हैं। ऐसा इसलिए संभव होता है कि उनके यहाँ यथार्थ और प्रयोग का असंतुलन नहीं वरन् संतुलन है। वे यथार्थवादी परम्परा के साथ प्रयोग का बेहद संतुलित प्रयोग करने वाले विरल रचनाकार हैं। सामान्यतः होता यह है कि रचनाकर एकांगी या एक रेखीय राह पर चलते हुए फार्म की तलाश करता है, लेकिन वैद का सर्जक अपनी समझ, संयम और विवेक का सांगोपांग इस्तेमाल करते हुए हिन्दी का जातीय फार्म तलाशने की कवायद ही नहीं करता बल्कि हमारी अपनी कथा परम्परा का भरपूर उपयोग करते हुए अपने सृजनात्मक सामर्थ्य का परिचय देता है। वे स्वयं कई बार यह कह चुके थे कि यथार्थवाद की प्रधानता ने या प्रभाव ने हमारे विवेक को दूषित कर दिया है। इसी दूषित विवेक की शुद्धि के लिए वे कल्पना, अनुप्रास, श्लेष और भाषा के मिले-जुले रसायन से ऐसे लालित्यपूर्ण गद्य की रचना को संभव बनाते हैं जो व्यक्ति को अपने आत्म के बेहद करीब लाता है।
जीवन का अस्तित्व के साथ अटूट रिश्ता है। उनके गद्य में अस्तित्व के अनेक नए रूपक, आयाम खुलते हैं। वे मनोलोक के अंचल में अद्वितीय अनुभवों की गहराई में जाकर अस्तित्व के वे रूप और अनुभूतियाँ हम से साझा करते हैं जो कि अन्यत्र दुर्लभ हैं। इसलिए उनकी उपमाएँ, भाषायी लालित्य चमत्कृत करता है। वे जीवन के नहीं अस्तित्व के चितेरे हैं। बहुरंगी जीवन का कोई ऐसा हिस्सा नहीं जो उनकी नजर से बच सका हो। इन अर्थों में वे अभिव्यक्ति के लीलाधर हैं। उनका आडम्बरहीन लेखन जीवन की लय, साँसों की सरगम का संगीत है। इसलिए उनके कथा साहित्य में अभिव्यक्ति संरचना का सांगीतिक ढाँचा मौजूद है। शास्त्रीय संगीत से उनका गहरा जुडाव था। अतः उनका रचनाकार शास्त्रीय संगीत की कथाविहीनता को अपनाकर बिना नैरेटिव के मनुष्य की आत्मा का कोना-कोना झाँक लेता है। प्रायः रचनाकार शैली की शालीनता पर केन्द्रित रहता है, पर उनका रचनाकार शैली की शालीनता के बरअक्स शोखी को अधिक महत्त्व देता है। यह शोखी ही उन्हें हिन्दी गद्य संसार में अपनी तरह का अद्भुत नायक बनाती है।
ऊब उनके साहित्य का केन्द्रीय विषय रहा है। अपने एक साक्षात्कार में ऊब के चित्रण पर उठे सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि मैं असफलताओं का उस्ताद हूँ। ऊब से जुडे प्रश्न के प्रत्त्युतर में वे कहते हैं कि ऊब का सम्बन्ध केवल पश्चिम से नहीं है। जीवन के साथ ऊब का रिश्ता शाश्वत है। वे मानते हैं कि उनका ऊब के साथ रिश्ता मनोवैज्ञानिक नहीं आध्यात्मिक है। पाठक/विद्वान अध्येता जरा गौर करेंगे, तो पाएँगे कि ऊब से शुरू होती उनकी यात्रा अपने होने की खोज से आगे बढकर आस्था-अनास्था के राजमार्गों से जूझती हुई संशय की तंग गलियों से निकलकर ईश्वर के साथ हमारे होने की अनुभूति का अजस्र स्रोत बन जाती है।
वे केवल अपने नाम से ही वैद नहीं हैं बल्कि उनका काम उन्हें हिन्दी का अनन्य वैद्य (बैद) स्थापित करता है। आयरनी और ह्यूमर के साथ अनेक स्तरों पर जुझते हिन्दी साहित्य में चाहे वह शिल्प हो या कथ्य अथवा भाषा हो या परम्परा सबके साथ प्रयोग की जुगलबन्दी करते हुए उनके भीतर का वैद्य हिन्दी की मौलिक पगडण्डी और रचनाकत्मक स्वास्थ्य की सेहत को परिवर्धित करता है। सचमुच, वे हिन्दी साहित्य, भाषा की कमजोरियों की पहचान तो करते ही हैं साथ ही एक कुशल वैद्य की भाँति उनका परम्परा युक्त निदान अपनी सर्जनात्मक सामर्थ्य और कला चेतना से हमारे सम्मुख रखते हैं। उनकी यह अनूठी कला चेतना ही उन्हें हिन्दी का अनन्य वैद्य (बैद)बनाती है।
वे हमारे समय के उन मूर्धन्यों में सबसे महत्त्वपूर्ण हैं कि जिनका लिखा न केवल हमारे मन का मैल ही धोता है वरन अपने असंख्य अद्वितीय अनुभव माटी कणों की रगड के माध्यम से हमारे अंतःपुर को चमका भी देता है। इसी चमक से वे गद्य के प्रांगण में भाषा का नृत्य और कौतुक हमारे सम्मुख रचते हैं। विमल की संरचना में क्रियाओं का लोप इसी का प्रमाण है।
यात्रा उनके सृजन का एक महत्त्वपूर्ण बीजाक्षर है। उनकी यात्राएँ जोखिम भरी और रोमांचक है। यात्रा उनका मूल स्वभाव है। इसलिए उनकी सभी यात्राएँ सीमित नहीं है वरन् वे मल, मूत्र व वर्जित प्रदेशों के भूगोल को लाँघकर सौन्दर्य के शिखर तक जाती है। उनका लिखा इसका साक्षी है। वे अलक्षित, अस्पर्शी, अग्राह्य और विद्रूप में भी सौन्दर्य की तलाश कर लेते हैं। ऐसा वह इसलिए कर पाते हैं कि क्योंकि वे जीवन को अखण्ड दृष्टि से देखते हैं, खण्ड दृष्टि से नहीं। जीवन में उचित गरिमा से हीन वंचित वस्तुओं, भावों के चित्रण में वे सकुचाते नहीं वरन् उनका रचनाकार उदात बोध, भाव का परिचय देकर अपनी लोकतान्त्रिकता को पाठक के सामने कलेजे की तरह रख देता है। यह उनके ही रचनाकार की खूबी है कि वह अचेतन की अतल अँधेरी गहराइयों को अपने पाठक के सम्मुख अपने कलात्मक भाषायी व्यवहार के बल पर दिन के उजाले की तरफ आलोकित कर दिखलाता है। इसलिए उनके रचे पात्रों में बाहर की चकाचौंध कम और भीतर की हलचलें ज्यादा हैं। उनके सर्जक का अनुभव और निरीक्षण अपनी तरह की विरलता से युक्त है। अपनी इसी कलात्मक, अन्वेषी चेतना के कारण वे सृजन के बीहड को पाठक की यात्रा के लिए सुरम्य उद्यान में बदल देते हैं।
हिन्दी गद्यकारों के इतिहास में वे अकेले ऐसे शिल्पी हैं जो इस काम को बखूखी न केवल अंजाम ही देते हैं बल्कि नये आयाम भी रचते चलते हैं। उनकी यह अनूठी दृष्टि, चेतना की उन्हें हिन्दी का अप्रतिम गद्य नायक बनाती है। वे हिन्दी में अनुपन्यास रचनेवाले रचनाकार हैं। अपने उपन्यास काला कालोज को वे अनुपन्यास ही मानते हैं। उनकी एक खूबी यह भी है कि वे प्रचलित पारिभाषिक अर्थों, विधा एवं ढाँचे की उपस्थिति को अनुपस्थित करते हुए मौलिक मार्ग का संधान करते चलते हैं। इस यात्रा को उनकी हर कृति में आसानी से दृष्टिगत किया जा सकता है।
विगत चार माह से पूरा विश्व कोरोना महामारी की चपेट में है। हम सब सकारात्मक ऊर्जा के साथ इस विकट समय का सामना कर भी रहे हैं। इसी क्रम में विगत अंक के महत्त्वपूर्ण रचनाकारों जिनमें यशस्वी कवि अरुण कमल, लोकमर्मज्ञ डॉ. श्रीलाल मोहता, वरिष्ठ कवि विजेन्द्र, चर्चित कवि विनोद पदरज, युवा कवि-आलोचक, समाजशास्त्री बद्रीनारायण ने अपनी स्वेच्छा से अपना मानदेय मुख्यमंत्री सहायता कोष हेतु अर्पित किया है। राजस्थान साहित्य अकादमी परिवार उनके इस प्रेरक अवदान के प्रति गहरी कृतज्ञता ज्ञापित करता है।
इस अंक में आदरणीय गिरिराज किशोरजी पर केन्द्रित एक संस्मरणात्मक आलेख के साथ, कहानियाँ, कविताएँ, यात्रा संस्मरण, डायरी अंश, अनुवाद और समीक्षा, साहित्यिक परिदृश्य, प्राप्ति स्वीकार, संवाद निरन्तर की नियमित स्तरीय सामग्रीआफ लिए प्रस्तुत है।
अंक पर आपकी विश्लेषणात्मक राय की प्रतीक्षा रहेगी। घर पर रहें, स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें। शुभकामनाओं के साथ -