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पैनी दृष्टि और जागरूकता का समन्वय है मधुमती

राधावल्लभ त्रिपाठी
संपादक, मधुमती।

मधुमती का मई का अंक आद्यंत देखा और पढा। आफ संपादन में मधुमती लगातार निखरती चली जा रही है। हर-एक अंक के सामग्री संयोजन में संपादकीय की पैनी दृष्टि और जागरूकता नजर आ रही है। इस अंक में आपका संपादकीय महामारी के विषम समय की वैश्विक परिप्रेक्ष्य में एक मीमांसा प्रस्तुत करता है। बद्रीनारायण और संजय जोठे के लेखों में महामारी से उत्पन्न संकट और भविष्य की पडताल की गई है। इनके लेख समाजशास्त्रीय दृष्टि से बेबाक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। यह दृष्टि मनुष्य के बहिर्जगत् पर ज्यादा विचार करती है, अंतर्जगत् पर नहीं। यह सत्य है कि महामारी ने हमारे बाहर की दुनिया को बदल डाला है, और कोविद के बाद का संसार वैसा नहीं रहेगा, जैसा उसके पहले था। पर इसने क्या हमें भीतर से भी कुछ बदला है, और इस भीतर से बदलने का असर का हमारे संसार पर पडेगा -यह भी हम सब को मिल कर विचार करना चाहिए।
कोराना या कोविद-19 की त्रासदी से गुजरते हुए चार महीने से ऊपर का समय हो गया। सारे विश्व पर यह एक अभूतपूर्व संकट है। इसके पहले भी महामारियाँ और प्राकृतिक आपदाएँ आती रहीं हैं, पर इतनी बडी चेतावनी के साथ नहीं। खतरे की घंटी जैसी अबकी बार बजी है, वैसी पहले कभी नहीं बजी।
प्रकृति हमेशा मनुष्य को उसकी चिरंतन सहचरी की भाँति खतरों की पूर्वसूचना देती है। हमारी संवेदनाएँ भोथरी हो गई हैं, हम प्रकृति की आवाजों को सुनना भूल गए हैं, उसके दिए संकेतों को पहचानना भूल गए हैं। हम गाफिल रहते हैं। हमें पता नहीं चलता कि प्रकृति चेतावनी की दस्तक दे-दे कर लौट गई है। हम बहुत देर से चेतते हैं, फिर हम बीमारी का ऊपर-ऊपर से तुरत इलाज कर देना चाहते हैं। बीमारी की जड तक हम नहीं जाते। बीमारी का बीज कहीं और होता है, हम उसकी छोटी-छोटी शाखाएँ काट कर दिखाते हैं कि हमने उसे निर्मूल कर दिया है, बीमारी भीतर बनी रहती है वह फिर किसी दूसके रूप में प्रकट हो जाती है। बीच- बीच में कहीं-कहीं कटने मिटने से बच रह गए जंगल के छोटे टुकडों में थोडे-से जीव जंतु और कुछ पक्षी भी शेष बचे रहे। पक्षी तो इसलिए भी बच जाते हैं कि प्रकृति ने उन्हें उडान भरने की शक्ति दी है। आदमी आग लगाता है, वे ऊपर उड जाते हैं, आदमी जंगल काटता है, वे उड कर कहीं और अपने लिए शरण खोज लेते हैं। हमारी दिनचर्या बदल गई। हम पहले से ज्यादा सलीके से रहने लगे। हमारी दिनचर्याएँ सुधरने लगीं। हम, जो आदमी नहीं रह गए थे मशीन बनते जा रहे थे, हम फिर से थोडे-थोडे आदमी बनने लगे। हम बाहर आ कर देखते, तो हवा साफ लगने लगती। प्रकृति हँसती गुनगुनाती नजर आती। महामारी के फैलने के चिंतादायक समाचार आ रहे थे, इनके साथ ऐसी खबरें भी आतीं, जिनसे हमारे चेहरे खिल उठते। गंगा का पानी इतना उजला और साफ हो गया, नर्मदा जो करोडों रुपया खर्च करने से निर्मल और प्रसन्न न हुईं थी, वे हँसी और खिलखिलाईं। प्रकृति ने हमें चेतावनी दे कर हमें हमारा वह रूप दिखा दिया था, जो वास्तविक था, उसने वे मुलम्मे और नकली खोल उतार दिए थे, जो हमने ओढ रखे थे।
एक तालाबंदी हमारे बाहर है एक हमारे भीतर। बाहर की तालाबंदी तो जल्दी टूट ही जाएगी, पर हमने अपनी चेतना पर जो तालाबंदी कर रखी है, वह कब खुलेगी? भीतर की तालाबंदी में हम अपनी आत्मा के अकेलेपन में मरते जा रहे हैं। क्या हम अपने भीतर जा कर मर गई संवेदनाओं को फिर से जगा सकेंगे, प्रकृति की आवाजों को फिर से सुनने और पहचानने लगेंगे, जिससे अब की बार उसके द्वारा दी गई चेतावनी बेकार न जाए?
भीतर के निर्वासन को तोडने के लिए जो उपाय किए जाते रहे हैं, वे भटकाने वाले हैं। वे उस सृष्टि से हमें नहीं जोडते जिससे हम उपजे हैं, और जिसके कारण हम हैं और जिसका विनाश हम करते आ रहे हैं। हमारे पुरखे इस सृष्टि से एकाकार थे। प्रकृति का विनाश कर के हम अपना विनाश करते आ रहे हैं - यह समझ व्पक स्तर पर बने, उसके आनुसार हमारा आचरण बदले। इसके लिए हमें अभियान चलाना चाहिए।
आलमशाह खान के कथासंसार पर हुसैनी बोहरा के लेख ने सन् 1971-72 के उन दिनों की याद ताजा कर दी जब मैं उदयपुर विश्वविद्यालय (महाराणा भूपाल कालेज) के संस्कृत विभाग में व्याख्याता था। हिंदी विभाग हमारे विभाग के सबसे करीब था, अध्यापकों में आपस में मिलना-जुलना, हँसी-ठिठौली, बहस, लडाई-झगडे खूब चलते रहते थे। अक्सर आलम शाह खान से अक्सर भेंट हो जाती, हालांकि हिंदी के अध्यापकों में मेरी घनिष्ठता नवलकिशोरजी से विशेष थी। इन्हीं दिनों धर्मयुग में आलमशाह खान की पहली कहानी छपी थी, धर्मयुग उस समय घर-घर में पढी जाने वाली पत्रिका थी। आलम शाह खान को घेर कर उन की कहानी पर हम लोग उनसे बात करते रहते।
ब्रजरत्नदास और मीरां पर माधव हाडा का लेख रोचक है। अनुसंधान का नवनीत हाडाजी ने परस दिया है। मीरां की समीक्षाओं का बहुत सरस लेखा-जोखा पहली बार पढने को मिला। उतना ही उत्तम इस अंक में कविताओं का चयन भी है।
उम्मीद है कि ऐसी ही चयनबुद्धि और संयोजनपटुता से आप मधुमती लंबे समय तक निकालते रहेंगे, और एक यशस्वी संपादक के रूप में पहचाने जाएँगे।
- राधावल्लभ त्रिपाठी, पूना
प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, संस्कृत साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान, अध्येता हैं।