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दुर्गम रास्तों की सुगम कथा

राकेश मूथा
बावरा मन का फरेब हिन्दी व राजस्थानी की प्रतिष्ठित कथाकार ज़ेबा रसीद का उपन्यास है। ज़ेबा की राजस्थानी व हिन्दी की 26 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। 1968 से लगातार वे लेखन कार्य कर रही हैं। लगभग यह वर्ष उनके लेखन का 52वाँ वर्ष है। अपने लेखन के 52वें वर्ष लेखिका के द्वारा रचित इस उपन्यास में नारी मन की चाहतों व उनकी सामाजिक बँधनों में गुजर रही जिन्दगी के वे लम्हें कैद हैं जहाँ वो कभी खुद से गुफ्तगू कर रही है और कहीं अपने जीवन मूल्यों व बंधनों के भीतर कैद अपनी रूह से आत्मालाप कर रही हैं। उनकी सुंदर व स्वाभाविक भाषा की सरसता में कमजोर कथानक (कमजोर इस नाते कि इस तरह के कथानक अनेक किताबों व फिल्मों में आ चुके हैं।) के बावजूद यह उपन्यास पाठकों को पढने के लिए मजबूर करते हुए कुछ बुनियादी सवाल उठाने में सफल रहा है।
डॉ. संदीप अवस्थी किताब के फ्लैश पर लिखते हैं कि समकालीन साहित्य जगत में राजस्थान की सशक्त लेखिका ज़ेबा रसीद का यह नया उपन्यास एक नया विमर्श परिवार शरणम गच्छामि देता है। वस्तुतः निम्मी, जुबी, माधुरी तीन स्त्रियों के माध्यम से उन सभी कठिनाइयों और दुर्गम रास्तों पर इस तरह कथा जाती है कि पात्रों के साथ-साथ पाठक भी यात्रा कर लेता है।
साहित्यकार केशरीनाथ त्रिपाठी किताब के बारे में बताते हुए लिखते हैं कि आधुनिक सभ्यता के दौर में नारी मन का आलोडन, विलोडन, विवशता, घुटन, संवेदनशीलता, प्रेम की महत्ता को उच्चनिखार देने का सफल प्रयास इस में दृष्टिगोचर होता है। मानवीय संबंधों में आये ज्वार-भाटे से उत्पन्न उस दर्द की कसक का अनूठा चित्रण लेखिका की कलम ने किया है। इसी प्रकार डॉ. रमासिंह के अनुसार पति-पत्नी के संबंध भी सब व्यवसायिक हो गये हैं। नारी केवल पति के प्रमोशन की खातिर अन्य पुरुष से संबंध बनाये - क्या एक पतिव्रता नारी सोच सकती है, क्यों पुरुष घर में सुन्दर पत्नी के रहते हुए अन्य नारी से संबंध बनाता है। अब तो सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे स्वीकृति दे दी है। सब स्वतंत्र, सब आजाद। यह कैसा समाज? सवाल उठाती है ज़ेबा। मनोहर सिंह राठौड साहित्यकार व चित्रकार किताब के फ्लैश पर लिखते हैं कि समाज वर्षों से स्त्री जाति का हर स्तर पर शोषण करता आया है और अब विवाहोतर संबंधों को वैध मान लिया गया है। इससे औरत फिर कहीं छली तो नहीं जा रही है? परिवार या विवाह नामक संस्था चरमरा तो नहीं जायेगी? इस सब सवालों के जवाब तलाशती विदुषी लेखिका ने स्त्री-पुरुष संबंधों के कथानक के बहाने शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक स्तर पर पडताल की है। इन सभी साहित्यकारों की टिप्पणियाँ प्रस्तुत इसलिए की गई हैं कि लेखक इन टिप्पणियों से सहमत होते हुए यही कहना चाहता है कि लेखिका ने अगर कथानक को और नवीन व रोचक बनाया होता, तो यह उपन्यास आज के समय का बरसों तक याद किये जाने वाला उपन्यास हो सकता था। वरिष्ठ कथाकार ने इतना कुठ इस उम्र में जो लिखा है वो और श्रेष्ठ होता अगर प्रकाशन शब्दों की त्रुटियों को सुधारता व कुछ स्थलों पर पेज दुबारा छप गये है, ऐसा नहीं होता। बरहाल ज़ेबा रसीद की भाषा प्रवाह क्षमता व उनके लगातार लेखन की जिनती तारीफ की जाए कम हैं। प्रश्नों व उत्तरों का यह दस्तावेज स्त्रीमन की अनुगूंजों व आज के आधुनिक दौर मं बाजारवाद की संस्कृति में बदलते प्रेम संबंधों के विलाप का स्वर देने के साथ स्त्री के भीतर की प्रेम भावना के रहस्यों को उजागर करता है।
नीलिमा टिक्कू के कहानी संग्रह इंसानियत डॉटकाम में कुल ग्यारह कहानियाँ है। ममता कालिया नीलिमा टिक्कू के रचना संसार के बारे में लिखती है नीलिका टिक्कू जिस सरलता और सरसता से अपना कथा वितान खडा करती है यह दक्षता आज धूमिल पडती जा रही है। चन्द्रकांता भी पुस्तक के प्रारंभ में अपनी टिप्पणी में कहती हैं कि बेहिचक बिना किसी वाद और बडे फैशन से आक्रांत हुए मूल्य छिन्न समय में मुहाल होते रिश्तों में सेंध लगाकर उनमें सार्थकता करती ये कहानियाँ एक स्वस्थ समाज के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भागीदारी निभाती हैं। इन दोनों प्रतिष्ठित साहित्यकारों की टिप्पणी से सहमत होने पर ये टिप्पणियाँ आफ सामने प्रस्तुत की गईं हैं।
महाश्वेता देवी की कहानी रत्तनदायिनी के अंत में दिया गया व्यक्तव्य याद आता है, जो रत्तनदायिनी-यशोदा की मृत्यु पर प्रस्फुटित हुआ-यशोदा ईश्वर का रूप थी। उसने वही किया जो उसने सोचा। यशोदा की मृत्यु ईश्वर की मृत्यु थी। जब वह ईश्वर की लीला के रूप में यहाँ मत्य मानव बन कर आई, तब सभी ने उसे भुला दिया। उसे अवश्यक सदा ही अकेला मरना होगा। यह व्यक्तव्य इंसानियत के संदर्भ में कितना सटीक बैठता है। इंसानियत को हमेशा अकेले ही मरना होता है। इंसानियत जिंदा रहती भी है इस यथार्थ में तो ढिबरी की टिमटिमाती लौ की तरह। जितनी देर वह लौ लड सके प्रतिकूल हवाओं के खिलाफ बस उतना की उसका जीवन है। कहानीकार नीलिमा टिक्कू ने इस कहानी संग्रह में इंसानियत की ऐसी ग्यारह लौ जगाई, वे सभी लौ या तो लडते लडते बुझ गई हैं या बुझते बुझते लड रही है।
समीक्षित पुस्तक कीसमीक्षा के प्रारंभ में जो शीर्षक दिया गया है तोहफा कैसा लगा मीता इस कहानी संग्रह में सम्मिलित एक कहानी है। इस कहानी की सरलता व बिना किसी कृत्रिमता के सहज कहन में गुंथा हुआ कथ्य इसे विशिष्ट बनाता है। कहानी पढते समय जो-जो विचार पाठक के मन में आते हैं, वे विचार आज समाज में जो पाठक देख रहा है उससे उपजे हैं - अगर कहानी के अंत में कहानीकार ने कहानी के नायक मीता के भाई से जो कहलाता है, वह इंसानियत का बेजोड उदाहरण है। मीता का भाई ये कहता है- सुन मीता, कल तुने कार में मुझसे ये सवाल पूछा था ना कि अब माँ का क्या होगा? पगली क्या माँ केवल तेरी ही है, हमारी नहीं? मीता मैं विदेश से अपना काम समेट कर यहाँ अपने देश वापस आ गया हूँ। एक साल का समय इसीलिए लगा। अब हम माँ के साथ यहीं रहेंगे अपने इसी घर में। यही तेरी राखी का उपहार है। ये उपहार बहिन की उन सभी दुश्चिन्ताओं को समाप्त कर देता है जो उसके मन में माँ को लेकर उपजी थी। उसे यकीन ही नहीं होता कि उसे ऐसा तोहफा मिलेगा। इस तोहफे को प्राप्त कर मीता की आँखों से आँसूं निकलते हैं और पाठक के मन में भी इंसानियत चस्पा होती है।
कहानी के संदर्भ में बहुत पहले प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह जी ने कहा था रसग्रहण के कार्य में हर पाठक अकेला है और अपनी नियति का पथ उसे अकेले ही तय करना है। हर पाठक अपने जीवन की क्षमताओं विषमताओं के बीच अपने मूल्यों से अपना अकेलापन लिए जब किसी कृति-कहानी, कविता उपन्यास या चित्र या संगीत के द्वारा अपने अकेलेपन मं जो कुछ जोडता है- उसमें इंसान के अकेलेपन का संवर्द्धन होता है। इंसान अपने संवद्धित अकेलेपन के साथ अपनी नियति को बदलने की ताकत कला के सहारे अवश्य प्राप्त करता है। यही नामवर सिंह जी का इन पंक्तियों में आशय होगा।
नीलिमा टिक्कू की कहानियाँ अब और नहीं, अपने पराए, अनूठा संकल्प, तुम्हारी नंदिनी, वर्तमान युग में आर्थिक विषमताओं में खत्म हो रहे मूल्यों के काण उपजी हताशाओं का व उन टूटते मूल्यों में बढती क्रूरता को पाठक के सामने लाकर उनके अकेलेपन को सोच की नयी दिशा देती हैं।
कुछ पात्रों का संवाद पढ आप स्वयं ही अनुमान लगाएँ कि ये कहानियाँ क्या कह रही हैं -
पढ लिख कर निशा ने नौकरी नहीं को थी, उसका कहना था कि जिन घरों की स्थिति फटीचर होती है वहीं औरतों को नौकरी करनी पडती है। इसी सोच के साथ वो अपने पिता के पैसों पर ऐशो--आराम की जिन्दगी निकाल रही थी। (पृ.सं. 16)
गर्व से दमदमाती वह हर समय अपने बेटे की बलैया उतारती रहती। अक्सर कहती - मेरे पिता की लम्बी-चौडी जायदाद संभालने के लिए एक वारिस जरुरी था।
अगर दूसरी बेटी हो जाती तो क्या कर लेती तुम? मेरी बात सुन कर उसने मुझे घूरते हुए कहा -
तुम बहुत मूर्ख हो अबीर। इसीलिए मैंने तुम्हें कभी बताया नहीं। इससे पहले जो मेरा गर्भपात हुआ था, वो मैंने स्वयं करवाया था, क्योंकि गर्भ में बेटी थी।
निशा तुम पागल तो नहीं हो, बिना मुझ से पूछे - चलो पूछा नहीं, अपनी जान की फिक्र नहीं की तुमने? तुम्हें कुछ हो जाता तो अपनी नन्हीं बेटी का क्या होता। और एक मासूम की जान लेने से पहले तुम्हारा चित्त नहीं दहला? (पृ. 16-17)
- ये दोनों ही संवाद तुम्हारी नंदिनी से लिये गये हैं। क्रूरता कितनी सहजता से घर में आ गई है। गर्भपात कर एक औरत द्वारा बेटी को मारना इतना सहज हो रहना, समाज की क्रूरता का पर्दाफाश करता है। अपने पिता के पैंसों के दम पर पैदा हुआ गुरुर नारी के मन-कामकाजी स्त्री का यह असम्मान का का भाव पैदा करता है।
माँ कम से कम बक्सा तो ढंग का लाती और ये कपडे का थैला कितना खराब लायी हो। यह तो अच्छा हुआ कि मेरे साथ अनिता या कोई बच्चा नहीं आया। वैसे ही गाँव का कहकर मेरा मजाक बनता जा रहा है।
बेटा गाँव से निकलकर मेहनत कर तुमने इतनी तरक्की की है, इसमें कैसी शर्म? ये गर्व की बात है। यह बक्सा तेरे पिताजी की निशानी है। अनिता और बच्चे कोई पराये नहीं है, तुम्हारे जितने-बच्चे ही तो हैं। माँ तुम नहीं समझोगी, और ये निशानी-विशानी जैसी दकियानूसी विचार छोडों, जमाने के साथ चलना सीखों। (पृ. सं.77)
यह कहकर बेटा रास्ते में एक जगह गाडी रोक बाजार से नया बैग लेकर आता है और सारा सामान बैग व प्लास्टिक की थेली में डाल देता है। निशानी वाला थैला व वो कपडे की थैली अब नहीं रहती। ऐसा विचार रखने वाला पात्र आगे कहानी में क्या सोचेगा, क्या करेगा आप खुद जान सकते हैं। नीलिमा टिक्कू के इससे पूर्व तीन संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कहानियों में जो उनके कथा बुनने का तरीका है वो आक्रांत नहीं करता, चौंकाने की चेष्टा नहीं करता, जो है उसे वैसा बताती ये कहानियाँ समय का ज्यों का त्यों दस्तावेज है। ये उनकी खूबी है तो यह खूबी इन कहानियों की कमजोरी भी है। कहानी में जो कल्पनाशीलता का पक्ष है वह यथार्थ से इतना मेल खा गया है कि कभी-कभार ये कहानियाँ सच्ची घटनाओं का बयान मात्र लगती हैं। हाँ, जहाँ-जहाँ अपनी कल्पना शक्ति का वे इस्तेमाल करती है वे कहानियाँ यथार्थ से अलग हो कहानी के पूर्ण स्वरूप में आती है। नीलिमा टिक्कू जैसी सशक्त रचनाकार से अभी और उम्मीद है।


पुस्तक का नाम बावरा मन का फरेब
लेखिका ज़ेबा रसीद
प्रकाशक मिनर्वा पब्लिकेशन, जोधपुर
मूल्य २५०/-
इंसानियत डॉट कॉम

पुस्तक का नाम तोहफा कैसा लगा मीता.
लेखिका नीलिमा टिक्कू
प्रकाशक बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य 200/-

सम्पर्क : डी-60, शास्त्री नगर,
जोधपुर - ३४२००३
मो. ९४१४४७७४५९